Adhyaya 223
Vana ParvaAdhyaya 22336 Verses

Adhyaya 223

Draupadī’s Instruction on Marital Conduct and Household Discipline (चित्तग्रहण-उपदेश)

Upa-parva: Strī-dharma and Gṛha-nīti Discourse (Draupadī’s Counsel Episode)

This adhyāya records Draupadī’s structured counsel describing an “apeta-doṣa” (fault-avoiding) path for sustaining the husband’s goodwill and reducing conflict with co-wives. She frames the husband as a decisive locus of prosperity and harm, asserting that favor yields desired outcomes while anger brings severe consequences. The instruction emphasizes that comfort is not obtained through comfort alone; disciplined effort and forbearance are presented as means to secure well-being. Practical directives follow: affectionate service, pleasing food and adornment, prompt and respectful reception at the doorway, and personal initiative even when attendants are tasked. Draupadī advises guarding private speech shared by the husband to prevent alienation through misreporting. She recommends cultivating the husband’s allies and benefactors while distancing from his adversaries, avoiding arrogance and heedlessness, and maintaining restraint and silence when appropriate. The chapter ends with guidance on suitable female companionship—associating with reputable, virtuous women and avoiding disruptive or criminal company—presented as conducive to reputation, religious merit, and social stability.

Chapter Arc: राजन्! वंश-परम्परा के ज्ञाता द्विजाति बताते हैं कि जो अग्नि सबको परिचित है, वही अनेक नाम-रूपों में प्रकट होकर असंख्य ‘धिष्ण्य’ और अग्नि-वंशों का मूल बनता है। → कथन विस्तार पाता है—पूर्वोक्त चालीस पुत्रों के अतिरिक्त भी पाँच पुत्रों का उल्लेख, फिर ‘पावक’ को भूतों का पति, भुवन-भर्ता और महातेजस्वी कहकर उसकी सर्वव्यापकता स्थापित की जाती है। अग्नि विविध देशों में विचरता है; समुद्र के भीतर नाना स्थानों में भ्रमण करता हुआ अनेक धिष्ण्यों/देव-आश्रयों की उत्पत्ति का कारण बनता है। → नदियों को धिष्ण्यों की ‘माताएँ’ घोषित कर (सिन्धु, पंचनद, देविका, सरस्वती, गंगा, शतकुम्भा, सरयू, गण्डकी, चर्मण्वती, मही आदि) अग्नि-तत्त्व का भूगोल और वंश एक साथ बाँध दिया जाता है—और फिर निर्णायक वाक्य आता है: सब अग्नियों में एक ही हुताशन है; जैसे ज्योतिष्टोम यज्ञ एक होकर भी अनेक विधियों में प्रकट होता है, वैसे ही ‘एक’ अग्नि बहुधा निःसृत है। → वक्ता क्रमबद्ध रूप से इन ‘अप्रमेय, तिमिरापह, श्रीमन्त’ अग्नियों की उत्पत्ति-परम्परा समेटता है और श्रोता को निष्कर्ष देता है—अद्भुत-अग्नि का माहात्म्य जैसा वेदों में है, वैसा ही सब अग्नियों का समझो; भेद नाम-रूप का है, तत्त्व एक है।

Shlokas

Verse 1

हि ० आय न | हि 7 आम ३. तप अर्थात्‌ पांचजन्यके जो पूर्वोक्त चालीस पुत्र बताये गये हैं, उनके सिवा, पाँच पुत्र और भी उन्होंने उत्पन्न किये थे। उनके नाम क्रमश: इस प्रकार हैं--पुरंदर, ऊष्मा, मनु, शम्भु और आवसथ्य। उनका तीसरेसे छठे श्लोकतक वर्णन है। २. श्रुति भी कहती है--“आदित्यो वा अस्तं यन्नग्निमनुप्रविशति ।” ३. बलद, मन्युमान्‌ तथा विष्णु नामक अग्नि भानुकी भार्या सुप्रजासे उत्पन्न हैं। इसी प्रकार “आग्रयण' “अग्रह” और 'स्तुभ'--ये तीन अग्नि बृहद्भधासाकी संतान हैं। - मिट्टीके प्याले या पुरवेका नाम कपाल है। द्वाविशर्त्याधिकॉद्विशततमो< ध्याय: सह नामक अग्निका जलनमें प्रवेश और अथर्वा अंगिराद्धारा पुन:उनका प्राकट्य मार्कण्डेय उवाच आपस्य मुदिता भार्या सहस्य परमा प्रिया । भूपतिर्भुवभर्ता च जनयत्‌ पावकं परम्‌,मार्कण्डेयजी कहते हैं--राजन्‌! जलमें निवासके कारण प्रसिद्ध हुए 'सह” नामक अग्निके एक परम प्रिय पत्नी थी जिसका नाम था मुदिता। उसके गर्भसे भूलोक और भुवर्लोकके स्वामी सहने “अद्भुत'- नामक उत्कृष्ट अग्निको उत्पन्न किया

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ଜଳସହ ବାସ-ସମ୍ବନ୍ଧରୁ ‘ସହ’ ନାମେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଅଗ୍ନିଙ୍କର ‘ମୁଦିତା’ ନାମକ ଏକ ପରମପ୍ରିୟା ପତ୍ନୀ ଥିଲେ। ଭୂପତି ଓ ଭୁବନଭର୍ତା ସେହି ସହ, ତାଙ୍କ ଗର୍ଭରୁ ‘ଅଦ୍ଭୁତ’ ନାମକ ପରମ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପାବକଙ୍କୁ ଜନ୍ମ ଦେଲେ।

Verse 2

भूतानां चापि सर्वेषां य॑ प्राहु: पावकं पतिम्‌ | आत्मा भुवनभर्तेति सान्वयेषु द्विजातिषु,ब्राह्मणलोगोंमें वंशपरम्पराके क्रमसे सभी यह मानते और कहते हैं कि “अद्भुत” नामक अग्नि सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति हैं। वे ही सबके आत्मा और भुवनभर्ता हैं

ବଂଶପରମ୍ପରା ରକ୍ଷା କରୁଥିବା ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଏହି କଥା କୁହାଯାଏ—‘ପାବକ’ ସମସ୍ତ ଭୂତଙ୍କର ଅଧିପତି; ସେହି ହିଁ ସବୁଙ୍କ ଆତ୍ମା ଓ ଭୁବନଭର୍ତା।

Verse 3

महतां चैव भूतानां सर्वेषामिह यः पति: । भगवान्‌ स महातेजा नित्यं चरति पावक:,“वे ही इस जगतके सम्पूर्ण महाभूतोंके पति हैं। उनमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य सुशोभित हैं। वे महातेजस्वी अग्निदेव सदा सर्वत्र विचरण करते हैं

ଏହି ଜଗତର ସମସ୍ତ ମହାଭୂତଙ୍କର—ଏବଂ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କର—ଯେ ଅଧିପତି, ସେହି ହିଁ ଭଗବାନ। ସେଇ ମହାତେଜସ୍ବୀ ପାବକ ସଦା ସର୍ବତ୍ର ବିଚରଣ କରନ୍ତି।

Verse 4

अन्निर्गुहपतिर्नाम नित्य यज्ञेषु पूज्यते । हुतं वहति यो हव्यमस्य लोकस्य पावक:,“जो अग्नि गृहपति नामसे सदा यज्ञमें पूजित होते हैं तथा हवन किये गये हविष्यको देवताओंके पास पहुँचाते हैं, वे अद्भुत अग्नि ही इस जगत्‌को पवित्र करनेवाले हैं

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଯେ ଅଗ୍ନି ‘ଗୃହପତି’ ନାମରେ ସଦା ଯଜ୍ଞରେ ପୂଜିତ, ସେଇ ହୁତ ହବିଷ୍ୟକୁ ଦେବତାମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ବହନ କରେ; ସେଇ ଅଦ୍ଭୁତ ପାବକ ଏହି ଲୋକକୁ ପବିତ୍ର କରେ।

Verse 5

अपां गर्भो महाभागः सच्त्वभुग्‌ यो महाद्धुत: । भूपतिर्भुवभर्ता च महत: पतिरुच्यते,“जो “आप' नामवाले सहके पुत्र हैं, जो महाभाग, सत्त्वभोक्ता, भूलोकके पालक और भुवर्लोकके स्वामी हैं, वे अद्भुत नामक महान्‌ अग्नि बुद्धितत््वके अधिपति बताये जाते हैं!

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ସେ ‘ଅପାଂ ଗର୍ଭ’ ନାମରେ ପରିଚିତ—ମହାଭାଗ୍ୟବାନ ଓ ସମସ୍ତ ସତ୍ତ୍ୱର ଭୋକ୍ତା; ସେଇ ମହା ‘ଅଦ୍ଭୁତ’, ପୃଥିବୀର ଅଧିପତି ଓ ଲୋକଧାରକ; ଏବଂ ସେଇ ‘ମହତ୍’ ତତ୍ତ୍ୱର ପତି ବୋଲି କୁହାଯାଏ।

Verse 6

दहन्‌ मृतानि भूतानि तस्याग्निर्भरतो5भवत्‌ | अग्निष्टोमे च नियत: क्रतुश्रेष्ठो भरस्य तु,“उन्हीं “अद्भुत” या गृहपतिके एक अग्निस्वरूप पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम “भरत' है। ये मरे हुए प्राणियोंके शवका दाह करते हैं। भरतका अग्निष्टोम यज्ञमें नित्य निवास है, इसलिये उन्हें “नियत” भी कहते हैं। नियतका संकल्प उत्तम है

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ସେଇ ଗୃହପତି-ଅଗ୍ନିରୁ ଅଗ୍ନିସ୍ୱରୂପ ପୁତ୍ର ଜନ୍ମିଲା, ଯାହାର ନାମ ‘ଭରତ’ ପ୍ରସିଦ୍ଧ। ସେ ମୃତ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କ ଦେହକୁ ଦହନ କରେ। ଏବଂ ଭରତ ଯଜ୍ଞଶ୍ରେଷ୍ଠ ଅଗ୍ନିଷ୍ଟୋମରେ ସଦା ନିୟତ ଥାଏ, ତେଣୁ ସେ ‘ନିୟତ’ ବୋଲି ମଧ୍ୟ ପରିଚିତ; ଯାହାର ସଙ୍କଳ୍ପ ଉତ୍ତମ।

Verse 7

स वद्िः प्रथमो नित्य देवैरन्विष्यते प्रभु: । आयान्तं नियतं दृष्टवा प्रविवेशार्णवं भयात्‌,“प्रथम अग्नि 'सह' बड़े प्रभावशाली हैं। एक समय देवतालोग उनको हढूँढ़ रहे थे। उनके साथ अपने पौत्र नियतको भी आता देख (उससे छू जानेके) भयसे वे समुद्रके भीतर घुस गये

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—‘ସହ’ ନାମକ ସେଇ ପ୍ରଥମ, ନିତ୍ୟ ଓ ପ୍ରଭୁ ଅଗ୍ନିକୁ ଏକ ସମୟରେ ଦେବମାନେ ଖୋଜୁଥିଲେ। ନିଜ ପୌତ୍ର ନିୟତ ଆସୁଥିବାକୁ ଦେଖି, ତାହାର ସ୍ପର୍ଶଭୟରୁ, ସେ ଭୟାକୁଳ ହୋଇ ସମୁଦ୍ରରେ ପ୍ରବେଶ କଲା।

Verse 8

देवास्तत्रापि गच्छन्ति मार्गमाणा यथादिशम्‌ | दृष्टवा त्वग्निरथर्वाणं ततो वचनमत्रवीत्‌,तब देवतालोग सब दिशाओंमें उनकी खोज करते हुए वहाँ भी पहुँचने लगे। एक दिन अथर्वा (अंगिरा)-को देखकर अग्निने उनसे कहा--

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଯଥାନିର୍ଦ୍ଦେଶ ଦିଗଦିଗନ୍ତରେ ଖୋଜୁଥିବା ଦେବମାନେ ସେଠାକୁ ମଧ୍ୟ ପହଞ୍ଚିଲେ। ତାପରେ ଅଗ୍ନି ଅଥର୍ବାଙ୍କୁ ଦେଖି ତାଙ୍କୁ କଥା କହିଲା।

Verse 9

देवानां वह हव्यं त्वमहं वीर सुदुर्बल: । अथ त्वं गच्छ मध्वक्ष॑ प्रियमेतत्‌ कुरुष्व मे,वीर! तुम देवताओंके पास उनका हविष्य पहुँचाओ। मैं अत्यन्त दुर्बल हो गया हूँ। अब केवल तुम्हीं अग्निपदपर प्रतिष्ठित हो जाओ और मेरा यह प्रिय कार्य सम्पन्न करो”

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—“ହେ ବୀର! ଦେବମାନଙ୍କ ପାଇଁ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ହବିଷ୍ୟ ତୁମେ ବହନ କର। ମୁଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ବଳ ହୋଇପଡ଼ିଛି। ତେଣୁ, ହେ ମଧୁନୟନ! ଏବେ ତୁମେ ଯାଅ ଏବଂ ମୋର ପ୍ରିୟ ଏହି କାର୍ଯ୍ୟ—ଏହି ଅଭିଷ୍ଟ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ—ସମ୍ପନ୍ନ କର, ହେ ଶୂର!”

Verse 10

प्रेष्य चाग्निरथर्वाणमन्यं देशं ततो5गमत्‌ । मत्स्यास्तस्य समाचख्यु: क्रुद्धस्तानग्निरब्रवीत्‌ भक्ष्या वै विविधैभविर्भविष्यथ शरीरिणाम्‌

ଅଥର୍ବାଙ୍କୁ ପଠାଇ ଅଗ୍ନି ପରେ ଅନ୍ୟ ଦେଶକୁ ଗଲେ। ମତ୍ସ୍ୟମାନେ ସେ କଥା ତାଙ୍କୁ ଜଣାଇଲେ; ତେଣୁ କ୍ରୋଧିତ ଅଗ୍ନି କହିଲେ—“ତୁମେ ନିଶ୍ଚୟ ନାନା ପ୍ରକାରରେ ଦେହଧାରୀ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କର ଭକ୍ଷ୍ୟ ହେବ; ଯଜ୍ଞରେ ମଧ୍ୟ ବିଭିନ୍ନ ରୂପରେ ଅର୍ପିତ ହେବ।”

Verse 11

इस प्रकार अथर्वाको भेजकर अग्निदेव दूसरे स्थानमें चले गये। किंतु मत्स्योंने अथर्वासे उनकी स्थिति कहाँ है, यह बता दिया। इससे कुपित होकर अग्निने उन्हें शाप देते हुए कहा --“तुम लोग नाना प्रकारसे जीवोंके भक्ष्य बनोगे” ।। अथर्वाणं तथा चापि हव्यवाहो<ब्रवीद्‌ वच:,तदनन्तर अग्निने अथर्वासे फिर वही बात कही। उस समय देवताओंके कहनेसे अथर्वा मुनिने सह नामक अग्निदेवसे अत्यन्त अनुनय-विनय की; परन्तु उन्होंने न तो हविष्य ढोनेका भार लेनेकी इच्छा की और न वे अपने उस जीर्ण शरीरका ही भार सह सके। अन्ततोगत्वा उन्होंने शरीर त्याग दिया

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଏଭଳି ଅଥର୍ବାଙ୍କୁ ପଠାଇ ହବ୍ୟବାହକ ଅଗ୍ନି ଅନ୍ୟ ସ୍ଥାନକୁ ଚଲିଗଲେ। କିନ୍ତୁ ମତ୍ସ୍ୟମାନେ ଅଗ୍ନି କେଉଁଠି ଅଛନ୍ତି ତାହା ଅଥର୍ବାଙ୍କୁ କହିଦେଲେ। ଏଥିରେ କ୍ରୋଧିତ ଅଗ୍ନି ସେମାନଙ୍କୁ ଶାପ ଦେଇ କହିଲେ—“ତୁମେ ନାନା ପ୍ରକାରରେ ଦେହଧାରୀ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କର ଭକ୍ଷ୍ୟ ହେବ।” ତାପରେ ଅଗ୍ନି ଅଥର୍ବାଙ୍କୁ ପୁଣି ସେଇ କଥା କହିଲେ। ତେବେ ଦେବମାନଙ୍କ କଥାରେ ମୁନି ଅଥର୍ବା ‘ସହ’ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଅଗ୍ନିଦେବଙ୍କୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଅନୁନୟ କଲେ; କିନ୍ତୁ ଅଗ୍ନି ନ ହବିଷ୍ୟ ବହନର ଭାର ନେବାକୁ ଚାହିଲେ, ନ ନିଜ ଜୀର୍ଣ୍ଣ ଶରୀରର ଭାର ସହିପାରିଲେ। ଶେଷରେ ସେ ଶରୀର ତ୍ୟାଗ କଲେ।

Verse 12

अनुनीयमानो हि भृशं देववाक्याद्धि तेन सः । नैच्छद्‌ वोढुं हवि: सोढुं शरीरं चापि सो5त्यजत्‌,तदनन्तर अग्निने अथर्वासे फिर वही बात कही। उस समय देवताओंके कहनेसे अथर्वा मुनिने सह नामक अग्निदेवसे अत्यन्त अनुनय-विनय की; परन्तु उन्होंने न तो हविष्य ढोनेका भार लेनेकी इच्छा की और न वे अपने उस जीर्ण शरीरका ही भार सह सके। अन्ततोगत्वा उन्होंने शरीर त्याग दिया

ଦେବମାନଙ୍କ କଥାରେ ବାରମ୍ବାର ଅତ୍ୟନ୍ତ ଅନୁନୟ କରାଗଲା ମଧ୍ୟ ସେ ସମ୍ମତ ହେଲେ ନାହିଁ। ନ ସେ ହବିଷ୍ୟ ବହନର ଭାର ନେବାକୁ ଚାହିଲେ, ନ ନିଜ ଜୀର୍ଣ୍ଣ ଶରୀରର ଭାର ସହିପାରିଲେ। ଶେଷରେ ସେ ଶରୀର ତ୍ୟାଗ କଲେ।

Verse 13

स तच्छरीरं संत्यज्य प्रविवेश धरां तदा । भूमिं स्पृष्टासजद्‌ धातून्‌ पृथक्‌ पृथगतीव हि,उस समय अपने उस शरीरको त्यागकर वे धरतीमें समा गये। भूमिका स्पर्श करके उन्होंने पृथक्‌ू-पृथक्‌ बहुत-से धातुओंकी सृष्टि की

ତାପରେ ସେ ନିଜ ଶରୀର ତ୍ୟାଗ କରି ଧରାଭିତରେ ଲୀନ ହେଲେ। ଭୂମିକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରି ସେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରଚୁର ଧାତୁମାନଙ୍କ ସୃଷ୍ଟି କଲେ—ପ୍ରତ୍ୟେକକୁ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ଭାବେ।

Verse 14

पूयात्‌ स गन्ध॑ तेजश्न अस्थिभ्यो देवदारु च । श्लेष्मण: स्फाटिकं तस्य पित्तान्मारकतं तथा,“सह” नामक अग्निने अपने पीब तथा रक्तसे गन्धक एवं तैजस धातुओंको उत्पन्न किया। उनकी हडियोंसे देवदारुके वृक्ष प्रकट हुए। कफसे स्फटिक तथा पित्तसे मरकतमणिका प्रादुर्भाव हुआ

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ— ତାହାର ପୁୟରୁ ଗନ୍ଧକ ଓ ତେଜୋମୟ ପଦାର୍ଥ ଉତ୍ପନ୍ନ ହେଲା; ତାହାର ଅସ୍ଥିରୁ ଦେବଦାରୁ ବୃକ୍ଷ ପ୍ରକଟ ହେଲେ। ତାହାର ଶ୍ଲେଷ୍ମରୁ ସ୍ଫଟିକ ଓ ପିତ୍ତରୁ ତଥା ମରକତମଣି ଉଦ୍ଭବ ହେଲା।

Verse 15

यकृत्‌ कृष्णायसं तस्य त्रिभिरेव बभु: प्रजा: । नखास्तस्याभ्रपटलं शिराजालानि विद्रुमम्‌,और उनका यकृत्‌ (जिगर) ही काले रंगका लोहा बनकर प्रकट हुआ। काष्ठ, पाषाण और लोहा--इन तीनोंसे ही प्रजाजनोंकी शोभा होती है। उनके नख मेघसमूहका रूप धारण करते हैं। नाडियाँ मूँगा बनकर प्रकट हुई हैं

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ— ତାହାର ଯକୃତ କଳା ଲୋହା ରୂପେ ପ୍ରକଟ ହେଲା। କେବଳ ତିନି ପଦାର୍ଥ—କାଠ, ପାଷାଣ ଓ ଲୋହା—ଦ୍ୱାରା ପ୍ରଜାମାନେ ନିଜ ରୂପ-ଶୋଭା ଲାଭ କଲେ। ତାହାର ନଖ ମେଘପଟଳ ସଦୃଶ ହେଲା, ଏବଂ ଶିରାଜାଳ ପ୍ରବାଳ ରୂପେ ପ୍ରକଟ ହେଲା।

Verse 16

शरीराद्‌ विविधाश्रान्ये धातवोडस्थाभवन्‌ नृप । एवं त्यक्त्वा शरीरं च परमे तपसि स्थित:,राजन्‌! सह अग्निके शरीरसे अन्य नाना प्रकारके धातु उत्पन्न हुए। इस प्रकार शरीर त्यागकर वे बड़ी भारी तपस्यामें लग गये

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ— ହେ ନୃପ, ତାହାର ଶରୀରରୁ ଅନ୍ୟ ନାନା ପ୍ରକାର ଧାତୁ ଉତ୍ପନ୍ନ ହେଲା; ଅସ୍ଥିମାନେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରକଟ ହେଲେ। ଏଭଳି ଶରୀର ତ୍ୟାଗ କରି ସେ ପରମ ତପସ୍ୟାରେ ଅବସ୍ଥିତ ରହିଲା।

Verse 17

भग्व्धिरादिभिर्भूयस्तपसोत्थापितस्तदा । भृशं जज्वाल तेजस्वी तपसा55प्यायित: शिखी,जब भृगु और अंगिरा आदि ऋषियोंने पुनः: उनको तपस्यासे उपरत कर दिया, तब वे तपस्यासे पुष्ट हुए तेजस्वी अग्निदेव अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ— ତେବେ ଭୃଗୁ, ଅଙ୍ଗିରା ଆଦି ଋଷିମାନେ ପୁନର୍ବାର ନିଜ ତପସ୍ୟାଦ୍ୱାରା ତାହାକୁ ଉଦ୍ବୋଧିତ କଲେ। ସେଇ ତପସ୍ୟାରେ ପୁଷ୍ଟ ତେଜସ୍ବୀ ଅଗ୍ନିଦେବ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭାବେ ଜ୍ୱଳି ଉଠିଲେ।

Verse 18

दृष्टवा ऋषिं भयाच्चापि प्रविवेश महार्णवम्‌ | तस्मिन्‌ नष्टे जगद्‌ भीतमथर्वाणमथाश्रितम्‌ | अर्चयामासुरेवैनमथर्वाणं सुरादय:,महर्षि अंगिराको सामने देख वे अग्नि भयके मारे पुनः महासागरके भीतर प्रविष्ट हो गये। इस प्रकार अग्निके अदृश्य हो जानेपर सारा संसार भयभीत हो अथर्वा--अंगिराकी शरणमें आया तथा देवताओंने इन अथर्वाकी पूजा की

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ— ଋଷିଙ୍କୁ ଦେଖି ଏବଂ ଭୟରୁ ମଧ୍ୟ ସେ (ଅଗ୍ନି) ପୁନର୍ବାର ମହାସମୁଦ୍ରରେ ପ୍ରବେଶ କଲା। ସେ ଅଦୃଶ୍ୟ ହେବା ପରେ ସମଗ୍ର ଜଗତ ଭୀତ ହୋଇ ଅଥର୍ବାଙ୍କ ଶରଣ ନେଲା; ଏବଂ ଦେବତାମାନେ ଆଦି ସେଇ ଅଥର୍ବାଙ୍କୁ ପୂଜା କଲେ।

Verse 19

अथर्वा त्वसृजललोकानात्मना55लोक्य पावकम्‌ । मिषतां सर्वभूतानामुन्ममाथ महार्णवम्‌,अथरवनि सब प्राणियोंके देखते-देखते समुद्रकों मथ डाला और अग्निदेवका दर्शन करके स्वयं ही सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଅଥର୍ବା ନିଜ ଶକ୍ତିରେ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ସୃଷ୍ଟି କଲେ। ଅଗ୍ନିଦେବଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କରି, ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ଦେଖୁଥିବାବେଳେ, ସେ ମହାସମୁଦ୍ରକୁ ମଥିଲେ।

Verse 20

एवमग्निर्भगवता नष्ट: पूर्वमथर्वणा । आहूत: सर्वभूतानां हव्यं वहति सर्वदा,इस प्रकार पूर्वकालमें अदृश्य हुए अग्निको भगवान्‌ अंगिराने फिर बुलाया। जिससे प्रकट होकर वे सदा सम्पूर्ण प्राणियोंका हविष्य वहन करते हैं

ଏହିପରି ପୂର୍ବକାଳରେ ଅନ୍ତର୍ଧାନ ହୋଇଥିବା ଅଗ୍ନିକୁ ଭଗବାନ୍ ଅଥର୍ବା ପୁନର୍ବାର ଆହ୍ୱାନ କଲେ। ପ୍ରକଟ ହୋଇ ସେ ସଦା ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ହବିଷ୍ୟ ବହନ କରନ୍ତି।

Verse 21

एवं त्वजनयद्‌ धिष्ण्यान्‌ वेदोक्तान्‌ विबुधान्‌ बहून्‌ । विचरन्‌ विविधान्‌ देशान्‌ भ्रममाणस्तु तत्र वै,उस समुद्रके भीतर नाना स्थानोंमें विचरण एवं भ्रमण करते हुए सह अग्निने इसी प्रकार विविध भाँतिके बहुत-से वेदोक्त अग्निदेवों तथा उनके स्थानोंको उत्पन्न किया

ଏହିପରି ସେଠାରେ ବିଭିନ୍ନ ଦେଶରେ ବିଚରଣ ଓ ଭ୍ରମଣ କରୁଥିବାବେଳେ, ସେ ବେଦୋକ୍ତ ଅନେକ ଧିଷ୍ଣ୍ୟ (ଅଗ୍ନି-ସ୍ଥାନ) ଓ ଅନେକ ଦେବତାଙ୍କୁ ଉତ୍ପନ୍ନ କଲେ।

Verse 22

सिन्धुनदं पञजचनदं देविकाथ सरस्वती । गड़ा च शतकुम्भा च सरयूर्गण्डसाह्दया,एता नद्यस्तु धिष्ण्यानां मातरो या: प्रकीर्तिता: । सिन्धुनद, पंचनद, देविका, सरस्वती, गंगा, शतकुम्भा, सरयू, गण्डकी, चर्मण्वती, मही, मेध्या, मेधातिथि, ताम्रवती, वेत्रवती, कौशिकी, तमसा, नर्मदा, गोदावरी, वेणा, उपवेणा, भीमा, वडवा, भारती, सुप्रयोगा, कावेरी, मुर्मुरा, तुंगवेणा, कृष्णवेणा, कपिला तथा शोणभद्र “-ये सब नदियाँ और नद हैं, जो अग्नियोंके उत्पत्ति-स्थान कहे गये हैं

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ସିନ୍ଧୁ, ପଞ୍ଚନଦ, ଦେବିକା ଓ ସରସ୍ୱତୀ; ଗଙ୍ଗା ଓ ଶତକୁମ୍ଭା; ସରୟୂ ଓ ଗଣ୍ଡକୀ—ଏହି ନଦୀମାନେ ଧିଷ୍ଣ୍ୟମାନଙ୍କ ‘ମାତା’ ବୋଲି ପ୍ରସିଦ୍ଧ।

Verse 23

चर्मण्वती मही चैव मेध्या मेधातिथिस्तदा । ताम्रवती वेत्रवती नद्यस्तिस्रो5<थ कौशिकी

ତଥା ଚର୍ମଣ୍ୱତୀ ଓ ମହୀ; ପରେ ମେଧ୍ୟା ଓ ମେଧାତିଥି; ଏବଂ ତାମ୍ରବତୀ ଓ ବେତ୍ରବତୀ—ଏହି ତିନି ନଦୀ—ତା’ପରେ କୌଶିକୀ ମଧ୍ୟ।

Verse 24

तमसा नर्मदा चैव नदी गोदावरी तथा । वेणोपवेणा भीमा च वडवा चैव भारत

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ତମସା, ନର୍ମଦା ଓ ଗୋଦାବରୀ; ତଥା ବେଣା, ଉପବେଣା, ଭୀମା ଏବଂ ବଡ଼ବା—ଏହି ନଦୀମାନେ ମଧ୍ୟ (ପବିତ୍ର) ଅଟନ୍ତି।

Verse 25

भारती सुप्रयोगा च कावेरी मुर्मुरा तथा । तुड़्वेणा कृष्णवेणा कपिला शोण एव च

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—(ସେଠାରେ) ଭାରତୀ ଓ ସୁପ୍ରୟୋଗା; ତଥା କାବେରୀ ଓ ମୁର୍ମୁରା; ଏହିପରି ତୁଡ୍ବେଣା, କୃଷ୍ଣବେଣା, କପିଲା ଏବଂ ଶୋଣ ନଦୀମାନେ ମଧ୍ୟ ଅଛନ୍ତି।

Verse 26

अद्भुतस्य प्रिया भार्या तस्य पुत्रो विभूरसि:,अद्भुतकी जो प्रियतमा पत्नी है, उसके गर्भसे उनके “विभूरसि” नामक पुत्र हुआ। अग्नियोंकी जितनी संख्या बतायी गयी है, सोमयागोंकी भी उतनी ही है। वे सब अग्नि ब्रद्माजीके मानसिक संकल्पसे अत्रिके वंशमें उनकी संतानरूपसे उत्पन्न हुए हैं

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଅଦ୍ଭୁତଙ୍କର ଏକ ପ୍ରିୟା ପତ୍ନୀ ଥିଲେ; ତାଙ୍କ ଗର୍ଭରୁ ‘ବିଭୂରସି’ ନାମକ ପୁତ୍ର ଜନ୍ମ ନେଲା। ଯେତେ ପାବକ (ଅଗ୍ନି) କୁହାଯାଇଛି, ସେତେଇ ସୋମଯାଗ ମଧ୍ୟ ଅଛି। ସେ ସମସ୍ତ ପବିତ୍ର ଅଗ୍ନି ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ମାନସ ସଙ୍କଳ୍ପରୁ, ଅତ୍ରିଙ୍କ ବଂଶରେ ସନ୍ତାନରୂପେ ପ୍ରକଟ ହୋଇଥିଲେ।

Verse 27

यावन्तः पावकाः: प्रोक्ता: सोमास्तावन्त एव तु । अन्रेश्नाप्यन्वये जाता ब्रह्मणो मानसा: प्रजा:,अद्भुतकी जो प्रियतमा पत्नी है, उसके गर्भसे उनके “विभूरसि” नामक पुत्र हुआ। अग्नियोंकी जितनी संख्या बतायी गयी है, सोमयागोंकी भी उतनी ही है। वे सब अग्नि ब्रद्माजीके मानसिक संकल्पसे अत्रिके वंशमें उनकी संतानरूपसे उत्पन्न हुए हैं

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଯେତେ ପାବକ (ଅଗ୍ନି) ଘୋଷିତ, ସେତେଇ ସୋମଯାଗ ମଧ୍ୟ ଅଛି। ସେ ଅଗ୍ନିମାନେ ସାଧାରଣ ଦେହଜ ଜନନରୁ ନୁହେଁ; ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ମାନସ ପ୍ରଜା ହୋଇ ବଂଶପରମ୍ପରାରେ ପ୍ରକଟ ହେଲେ।

Verse 28

अत्रि: पुत्रान्‌ स्रष्टकामस्तानेवात्मन्यधारयत्‌

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ସୃଷ୍ଟି କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରି, ଅତ୍ରି ପ୍ରଥମେ ସେମାନଙ୍କୁ ନିଜ ମଧ୍ୟରେ ଧାରଣ କଲେ।

Verse 29

तस्य तद्ब्रह्मणः कार्यन्निर्हरन्ति हुताशना: । अत्रिको जब प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने उन अग्नियोंको ही अपने हृदयमें धारण किया। फिर उन ब्रह्मर्षिके शरीरसे विभिन्न अग्नियोंका प्रादुर्भाव हुआ ।। २८ ई || एवमेते महात्मान: कीर्तितास्ते5ग्नयो मया

ସେହି ହୁତାଶନମାନେ ସେହି ବ୍ରହ୍ମକାର୍ଯ୍ୟକୁ ନିର୍ବାହ କରନ୍ତି। ଯେତେବେଳେ ଅତ୍ରିଙ୍କୁ ପ୍ରଜାସୃଷ୍ଟି କରିବାର ଇଚ୍ଛା ହେଲା, ସେତେବେଳେ ସେ ଏହି ଅଗ୍ନିମାନଙ୍କୁ ନିଜ ହୃଦୟରେ ଧାରଣ କଲେ। ପରେ ସେହି ବ୍ରହ୍ମର୍ଷିଙ୍କ ଶରୀରରୁ ବିଭିନ୍ନ ଅଗ୍ନି ପ୍ରାଦୁର୍ଭୂତ ହେଲେ। ଏହିପରି ସେହି ମହାତ୍ମା ଅଗ୍ନିମାନଙ୍କୁ ମୁଁ କୀର୍ତ୍ତନ କଲି।

Verse 30

अद्भुतस्य तु माहात्म्यं यथा वेदेषु कीर्तितम्‌

ବେଦମାନଙ୍କରେ ଯେପରି କୀର୍ତ୍ତିତ, ସେହି ଅଦ୍ଭୁତଙ୍କ ମାହାତ୍ମ୍ୟକୁ ମୁଁ ଏବେ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବି।

Verse 32

इत्येष वंश: सुमहानग्नीनां कीर्तितो मया । योडर्चितो विविधैर्मन्त्रैहव्यं वहति देहिनाम्‌,इस प्रकार मेरेद्वारा अग्निदेवके महान्‌ वंशका प्रतिपादन किया गया। वे भगवान्‌ अग्नि विविध वेदमन्त्रोंद्वार पूजित होकर देहधारियोंके दिये हुए हविष्यको देवताओंके पास पहुँचाते हैं

ଏହିପରି ଅଗ୍ନିଦେବମାନଙ୍କର ଅତ୍ୟନ୍ତ ମହାନ ବଂଶକୁ ମୁଁ କୀର୍ତ୍ତନ କଲି। ବିଭିନ୍ନ ମନ୍ତ୍ରଦ୍ୱାରା ଅର୍ଚ୍ଚିତ ହୋଇ ସେ ଭଗବାନ୍ ଅଗ୍ନି ଦେହଧାରୀମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଅର୍ପିତ ହବ୍ୟକୁ ବହନ କରି ଦେବତାମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ପହଞ୍ଚାନ୍ତି।

Verse 222

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आज्ञिरसोपाख्यानेडग्निसमुद्धवे द्वाविंशत्यधिकद्विशततमो5ध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ବନପର୍ବରେ, ମାର୍କଣ୍ଡେୟ-ସମାସ୍ୟାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଆଜ୍ଞିରସୋପାଖ୍ୟାନରେ—ଅଗ୍ନି-ସମୁଦ୍ଭବ ବିଷୟକ—ଦ୍ୱିଶତ ଦ୍ୱାବିଂଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।

Verse 253

एता नद्यस्तु धिष्ण्यानां मातरो या: प्रकीर्तिता: । सिन्धुनद, पंचनद, देविका, सरस्वती, गंगा, शतकुम्भा, सरयू, गण्डकी, चर्मण्वती, मही, मेध्या, मेधातिथि, ताम्रवती, वेत्रवती, कौशिकी, तमसा, नर्मदा, गोदावरी, वेणा, उपवेणा, भीमा, वडवा, भारती, सुप्रयोगा, कावेरी, मुर्मुरा, तुंगवेणा, कृष्णवेणा, कपिला तथा शोणभद्र “-ये सब नदियाँ और नद हैं, जो अग्नियोंके उत्पत्ति-स्थान कहे गये हैं

ଏହି ନଦୀମାନେ ଧିଷ୍ଣ୍ୟମାନଙ୍କ (ଯଜ୍ଞାଗ୍ନି-ସ୍ଥାପନାସ୍ଥାନମାନଙ୍କ) ‘ମାତା’ ବୋଲି ପ୍ରକୀର୍ତ୍ତିତ—ଯେଉଁଠାରୁ ଯଜ୍ଞାଗ୍ନି ସ୍ଥାପିତ ଓ ପୋଷିତ ହୁଏ: ସିନ୍ଧୁ, ପଞ୍ଚନଦ, ଦେବିକା, ସରସ୍ୱତୀ, ଗଙ୍ଗା, ଶତକୁମ୍ଭା, ସରୟୂ, ଗଣ୍ଡକୀ, ଚର୍ମଣ୍ୱତୀ, ମହୀ, ମେଧ୍ୟା, ମେଧାତିଥି, ତାମ୍ରବତୀ, ବେତ୍ରବତୀ, କୌଶିକୀ, ତମସା, ନର୍ମଦା, ଗୋଦାବରୀ, ବେଣା, ଉପବେଣା, ଭୀମା, ବଡ଼ବା, ଭାରତୀ, ସୁପ୍ରୟୋଗା, କାବେରୀ, ମୁର୍ମୁରା, ତୁଙ୍ଗବେଣା, କୃଷ୍ଣବେଣା, କପିଲା ଏବଂ ଶୋଣଭଦ୍ର। ଏହି ସମସ୍ତ ନଦୀ ଅଗ୍ନିମାନଙ୍କର ଉତ୍ପତ୍ତି-ସ୍ଥାନ ଭାବେ ସ୍ମରିତ।

Verse 293

अप्रमेया यथोत्पन्ना: श्रीमन्तस्तिमिरापहा: । राजन्‌! इस प्रकार मैंने इन अप्रमेय, अन्धकारनिवारक तथा दीप्तिमान्‌ महामना अग्नियोंकी जिस क्रमसे उत्पत्ति हुई है, उसका तुमसे वर्णन किया

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍, ଏହିପରି ମୁଁ କ୍ରମକ୍ରମେ ତୁମକୁ ବର୍ଣ୍ଣନା କଲି ଯେ ସେଇ ଅପ୍ରମେୟ, ଅନ୍ଧକାର-ନିବାରକ, ଦୀପ୍ତିମାନ୍ ଓ ମହାତ୍ମା ଅଗ୍ନିମାନେ କିପରି ଉତ୍ପନ୍ନ ହେଲେ।

Verse 306

तादृशं विद्धि सर्वेषामेको होषु हुताशन: । वेदोंमें "अद्भुत! नामक अग्निके माहात्म्यका जैसा वर्णन है, वैसा ही सब अग्नियोंका समझना चाहिये; क्योंकि इन सबमें एक ही अग्नितत्त्व विद्यमान है

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ଅଗ୍ନିକୁ ଏକେ ସ୍ୱରୂପର ବୋଲି ଜାଣ; କାରଣ ସେମାନଙ୍କ ସବୁଠାରେ ଏକେ ଅଗ୍ନିତତ୍ତ୍ୱ ଅଛି। ତେଣୁ ବେଦରେ ‘ଅଦ୍ଭୁତ’ ଅଗ୍ନିର ଯେ ମାହାତ୍ମ୍ୟ ବର୍ଣ୍ଣିତ, ସେହି ମାହାତ୍ମ୍ୟକୁ ସମସ୍ତ ଅଗ୍ନିରେ ମଧ୍ୟ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ଜାଣିବା ଉଚିତ।

Verse 316

एक एवैष भगवान्‌ विज्ञेय: प्रथमो5जड्लिरा: ३१ ।। बहुधा निःसृतः कायाज्ज्योतिष्टोम: क्रतुर्यथा । ये प्रथम भगवान्‌ अग्नि, जिन्हें अंगिरा भी कहते हैं, एक ही हैं, ऐसा जानना चाहिये। जैसे ज्योतिष्टोम यज्ञ उद्धिद्‌ आदि अनेक रूपोंमें प्रकट हुआ है, उसी प्रकार एक ही अग्नितत्त्व प्रजापतिके शरीरसे विविध रूपोंमें उत्पन्न हुआ है

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଏହି ପ୍ରଥମ ଭଗବାନ୍ ଅଗ୍ନି, ଯାହାକୁ ‘ଅଙ୍ଗିରା’ ବୋଲି ମଧ୍ୟ କୁହାଯାଏ, ସେ ନିଶ୍ଚୟ ଏକେ—ଏହିପରି ଜାଣ। ଯେପରି ଏକ ଜ୍ୟୋତିଷ୍ଟୋମ ଯଜ୍ଞ ଅନେକ ରୂପ ଓ ପ୍ରୟୋଗରେ ପ୍ରକାଶ ପାଏ, ସେପରି ପ୍ରଜାପତିଙ୍କ ଦେହରୁ ଏକେ ଅଗ୍ନିତତ୍ତ୍ୱ ନିଷ୍କ୍ରମଣ କରି ବିଭିନ୍ନ ରୂପରେ ପ୍ରାଦୁର୍ଭୂତ ହୋଇଛି।

Frequently Asked Questions

How to preserve marital stability and avert rivalry-driven discord through disciplined conduct—especially reception etiquette, controlled speech, and prudent social alignment within a household marked by multiple relationships and external pressures.

Affection and stability are maintained through intentional service, restraint, and situational awareness: respect in daily rituals, confidentiality, avoidance of heedlessness, and association with ethically reputable companions.

It does not present a formal phalaśruti formula; however, it implies outcomes—reputation, prosperity, social harmony, and merit—by describing the benefits of the husband’s favor and the social consequences of disciplined versus careless conduct.