
भद्रवटगमनम् — स्कन्देन महिषदानवनिग्रहः (Bhadravaṭa Procession and Skanda’s Neutralization of Mahiṣa)
Upa-parva: Mārkaṇḍeya-upākhyāna (Śiva–Skanda/Deva-Asura episode at Bhadravaṭa)
Mārkaṇḍeya narrates Śiva’s radiant departure toward Bhadravaṭa with Umā, mounted on a sun-like chariot drawn by lions, amid a vast and symbolically ordered celestial entourage (Kubera in Puṣpaka, Indra on Airāvata, Varuṇa with aquatic beings, Yama with Mṛtyu and personified afflictions, and many cosmic collectives). Śiva addresses Skanda (Mahāsena/Kṛttikāsuta), confirming his command role and directing him to guard a particular Marut formation; Skanda assents and is promised welfare through devotion and readiness to appear when needed. After Skanda is dismissed, a sudden portent overwhelms the devas, followed by the emergence of a formidable hostile force that routes the divine host. Indra stabilizes morale and reorganizes resistance, but the daitya Mahiṣa escalates the threat by seizing Rudra’s chariot. Śiva then recalls Skanda as the decisive countermeasure. Skanda arrives in martial radiance, releases his śakti, beheads Mahiṣa, and disperses the remaining hostile forces; the devas praise Skanda’s first famed deed, forecasting enduring renown. The chapter closes with a phalaśruti: attentive recitation of Skanda’s birth/deeds yields prosperity and proximity to Skanda’s sphere.
Chapter Arc: मार्कण्डेय ऋषि यज्ञ-विद्या के एक सूक्ष्म रहस्य का द्वार खोलते हैं—श्रुति-वाक्य के अनुसार अग्नि और सोम को ‘उपांशु’ (मन्द/गुप्त) मन्त्रोच्चारण के साथ आज्यभाग अर्पित करने का विधान, और उसके पीछे छिपा कारण। → आंगिरस-वंशी तपस्वी पुत्र-प्राप्ति हेतु दीर्घकाल तक तीव्र तप करते हैं—ऐसा पुत्र चाहिये जो ब्रह्मा के समान यशस्वी और धर्मिष्ठ हो। पर यज्ञ-मार्ग में विघ्न खड़े होते हैं: विनायक-गण हवि का अपहरण करते, अग्नियों के भाग में बाधा डालते और यज्ञ को अस्थिर कर देते हैं। → सृष्टि-रहस्य का विस्फोटक वर्णन—देव-तत्त्वों/अग्नि-स्वरूपों की उत्पत्ति और साम-स्वरों (बृहत्, रथन्तर) का प्राकट्य; साथ ही यह निर्णायक संकेत कि चिताग्नि (संस्कारित, प्रज्वलित अग्नि) और मन्त्र-शक्ति ही विघ्नकारियों को रोकने का वास्तविक अस्त्र है। → यज्ञ-निपुण विद्वान बाह्य वेदी पर विनायकों के लिये ‘तदादान’ (उचित अर्पण/प्रबन्ध) करते हैं ताकि वे मुख्य अग्नि के समीप न आयें; मन्त्रों से शान्त की गयी अग्नि यज्ञ-भाग की रक्षा करती है। अंततः हवि-विभाग का नियम स्थिर होता है और तपस्वी/यजमान परम प्रसन्नता पाते हैं। → आंगिरसोपाख्यान की धारा आगे बढ़ती है—यज्ञ-रक्षा के इस विधान के बाद पुत्र-प्राप्ति/फल-प्राप्ति का अगला चरण किस रूप में प्रकट होगा?
Verse 1
#::73:.8 #::3:.:7 () हि २ 7 ३. “अग्नीषोमावुपांशु यष्टव्यावजामित्वाय” इस श्रुतिमें अग्नि और सोमको उपांशु मन्त्रोच्चारणपूर्वक आज्यभाग अर्पण करनेका विधान है। यहाँ सोमके साथ जिस अग्निको आज्यभागका अधिकारी बताया गया है, वह “वीर” नामक अनि ही है। २. ये वाक्के अभिमानी देवता हैं। “तस्य वाचा सृष्टौ पृथिवी चाग्निश्व' इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है। विशर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: पाञज्चजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन मार्कण्डेय उवाच काश्यपो हाथ वासिष्ठ: प्राणश्न॒ प्राणपुत्रक: । अग्निराड्धिरसश्वैव च्यवनस्त्रिषु वर्चक:,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! कश्यपपुत्र काश्यप, वसिष्ठ-पुत्र वासिष्ठ, प्राणपुत्र प्राणक, अंगिराके पुत्र च्यवन तथा त्रिवर्चा-ये पाँच अग्नि हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଯୁଧିଷ୍ଠିର! କାଶ୍ୟପଙ୍କ ପୁତ୍ର କାଶ୍ୟପ, ବସିଷ୍ଠଙ୍କ ପୁତ୍ର ହାଠ-ବାସିଷ୍ଠ, ପ୍ରାଣ ଓ ପ୍ରାଣପୁତ୍ରକ, ଆଙ୍ଗିରସ ବଂଶୀୟ ଅଗ୍ନି, ଏବଂ ତ୍ରିବର୍ଚ୍ଚା ଚ୍ୟବନ—ଏହି ପାଞ୍ଚଟି ପାଞ୍ଚଜନ୍ୟ ପବିତ୍ର ଅଗ୍ନି। ଏବେ ତାଙ୍କର ଉତ୍ପତ୍ତି ଓ ସନ୍ତତି ବର୍ଣ୍ଣିତ ହେବ।
Verse 2
अचरन्त तपस्तीव्रं पुत्रार्थ बहुवार्षिकम् । पुत्रं लभेम धर्मिष्ठं यशसा ब्रह्मणा समम्
ପୁତ୍ରଲାଭ ପାଇଁ ଆମେ ଅନେକ ବର୍ଷ ଧରି ତୀବ୍ର ତପସ୍ୟା କଲୁ—ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ସମ ଯଶସ୍ବୀ ଏବଂ ପରମ ଧର୍ମିଷ୍ଠ ପୁତ୍ର ଆମକୁ ମିଳୁ ଭାବେ ପ୍ରାର୍ଥନା କରି।
Verse 3
इन्होंने पुत्रकी प्राप्तिके लिये बहुत वर्षोतक तीव्र तपस्या की। इनकी तपस्याका उद्देश्य यह था कि हम ब्रह्माजीके समान यशस्वी और धर्मिष्ठ पुत्र प्राप्त करें ।। महाव्याह्तिभिर्ध्यात: पञ्चभिस्तैस्तदा त्वथ । जज्ञे तेजो महार्चिष्मान् पज्चवर्ण: प्रभावन:,पूर्वोक्त पाँच अग्निस्वरूप ऋषियोंने महाव्याह्ृृतिसंज्ञक पाँच मन्त्रोंद्वारा- परमात्माका ध्यान किया, तब उनके समक्ष अत्यन्त तेजोमय, पाँच वर्णोंसे विभूषित एक पुरुष प्रकट हुआ, जो ज्वालाओंसे प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होता था। वह सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करनेमें समर्थ था
ଅଗ୍ନିସ୍ୱରୂପ ସେଇ ପାଞ୍ଚ ଋଷି ପାଞ୍ଚ ମହାବ୍ୟାହୃତି ଦ୍ୱାରା ପରମାତ୍ମାଙ୍କୁ ଧ୍ୟାନ କଲେ। ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ତାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଅପାର ତେଜରେ ଦୀପ୍ତ, ମହାଜ୍ୱାଳାରେ ପ୍ରଜ୍ୱଲିତ, ପାଞ୍ଚ ବର୍ଣ୍ଣରେ ବିଭୂଷିତ ଓ ଅଦ୍ଭୁତ ପ୍ରଭାବଶାଳୀ ଏକ ପୁରୁଷ ପ୍ରକଟ ହେଲେ—ଯିଏ ସୃଷ୍ଟିକାର୍ଯ୍ୟରେ ସମର୍ଥ।
Verse 4
समिद्धो5ग्नि: शिरस्तस्य बाहू सूर्यनिभौ तथा । त्वड्नेत्रे च सुवर्णाभे कृष्णे जड्घे च भारत,भारत! उसका मस्तक प्रज्वलित अग्निके समान जगमगा रहा था, दोनों भुजाएँ प्रभाकरकी प्रभाके समान थीं, दोनों आँखें तथा त्वचा--सुवर्णके समान देदीप्यमान हो रही थीं और उस पुरुषकी पिण्डलियाँ काले रंगकी दिखायी देती थीं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ତାଙ୍କର ଶିର ଜ୍ୱଳନ୍ତ ଅଗ୍ନି ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ ଥିଲା; ଦୁଇ ଭୁଜା ସୂର୍ଯ୍ୟ ସମ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ। ତାଙ୍କର ତ୍ୱଚା ଓ ନେତ୍ର ସୁବର୍ଣ୍ଣ ପରି ଜ୍ୟୋତିର୍ମୟ ଥିଲେ, କିନ୍ତୁ ତାଙ୍କର ଜଂଘା କଳା ଦିଶୁଥିଲା।
Verse 5
पज्चवर्ण: स तपसा कृतस्तै: पञ्चभिर्जनै: । पाज्चजन्य: श्रुतों देवः पजचवंशकरस्तु सः,उपर्युक्त पाँच मुनिजनोंने अपनी तपस्याके प्रभावसे उस पाँच वर्णवाले पुरुषको प्रकट किया था, इसलिये उस देवोपम पुरुषका नाम पाञज्चजन्य हो गया। वह उन पाँचों ऋषियोंके वंशका प्रवर्तक हुआ
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ସେହି ପାଞ୍ଚ ମୁନି ତପସ୍ୟାର ପ୍ରଭାବରେ ପଞ୍ଚବର୍ଣ୍ଣ ପୁରୁଷକୁ ପ୍ରକଟ କରିଥିଲେ। ତେଣୁ ସେ ଦେବସଦୃଶ ପୁରୁଷ ‘ପାଞ୍ଚଜନ୍ୟ’ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ହେଲେ ଏବଂ ସେହି ପାଞ୍ଚ ଋଷିଙ୍କ ବଂଶର ପ୍ରବର୍ତ୍ତକ ଓ ପ୍ରବାହକ ହେଲେ।
Verse 6
दशवर्षसहस््राणि तपस्तप्त्वा महातपा: । जनयत् पावकं घोरं पितृणां स प्रजा: सृजन्,फिर महातपस्वी पाञ्चजन्यने अपने पितरोंका वंश चलानेके लिये दस हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करके भयंकर दक्षिणाग्निको उत्पन्न किया
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ମହାତପସ୍ବୀ ପାଞ୍ଚଜନ୍ୟ ଦଶହଜାର ବର୍ଷ ଧରି ଘୋର ତପ କଲେ। ପିତୃବଂଶ ଚାଲୁ ରଖିବାକୁ ଉଦ୍ଦିଷ୍ଟ ହୋଇ ସେ ଭୟଙ୍କର ପବିତ୍ର ଅଗ୍ନିକୁ ଉତ୍ପନ୍ନ କଲେ ଏବଂ ପରେ ପ୍ରଜାସୃଷ୍ଟିରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ ହେଲେ।
Verse 7
बृहद् रथन्तरं मूर्थ्नों वक्त्राद् वा तरसाहरौ । शिवं नाभ्यां बलादिन्द्रं वाय्वग्नी प्राणतोडसृजत्,उन्होंने मस्तकसे बृहत् तथा मुखसे रथन्तर सामको प्रकट किया। ये दोनों वेगपूर्वक आयु आदिको हर लेते हैं, इसलिये “तरसाहर” कहलाते हैं। फिर उन्होंने नाभिसे रुद्रको, बलसे इन्द्रको तथा प्राणसे वायु और अग्निको उत्पन्न किया
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ସେ ମସ୍ତକରୁ ‘ବୃହତ୍’ ନାମକ ସାମ ଏବଂ ମୁଖରୁ ‘ରଥନ୍ତର’ ନାମକ ସାମକୁ ପ୍ରକଟ କଲେ; ଦୁହେଁ ତୀବ୍ର ବେଗରେ ପ୍ରାଣ ଓ ଆୟୁ ହରଣ କରନ୍ତି ବୋଲି ‘ତରସାହର’ ଭାବେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ। ପରେ ସେ ନାଭିରୁ ରୁଦ୍ର (ଶିବ), ବଳରୁ ଇନ୍ଦ୍ର, ଏବଂ ପ୍ରାଣରୁ ବାୟୁ ଓ ଅଗ୍ନିକୁ ଉତ୍ପନ୍ନ କଲେ।
Verse 8
बाहुभ्यामनुदात्तौ च विश्वे भूतानि चैव ह । एतान् सृष्टवा ततः पठच पितृणामसृजत् सुतान्,दोनों भुजाओंसे प्राकृत और वैकृत भेदवाले दोनों अनुदात्तोंको मन और ज्ञानेन्द्रियोंके समस्त (छहों) देवताओंको तथा पाँच महाभूतोंको उत्पन्न किया। इन सबकी सृष्टि करनेके पश्चात् उन्होंने पाँचों पितरोंके लिये पाँच पुत्र और उत्पन्न किये
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ସେ ଦୁଇ ଭୁଜାରୁ ପ୍ରାକୃତ ଓ ବୈକୃତ ଭେଦବିଶିଷ୍ଟ ଦୁଇ ‘ଅନୁଦାତ୍ତ’କୁ, ମନ ଓ ଜ୍ଞାନେନ୍ଦ୍ରିୟମାନଙ୍କର ଅଧିଷ୍ଠାତୃ ସମସ୍ତ ଦେବତାଙ୍କୁ, ଏବଂ ପଞ୍ଚ ମହାଭୂତକୁ ଉତ୍ପନ୍ନ କଲେ। ଏସବୁ ସୃଷ୍ଟି କରି ପରେ ସେ ପିତୃମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଜନ୍ମ ଦେଲେ।
Verse 9
बृहद्रथस्य प्रणिधि: काश्यपस्य महत्तर: । भानुरज्धिरसो धीर: पुत्रो वर्चस्य सौभर:,(जिनके नाम इस प्रकार हैं--) वासिष्ठ बृहद्रथके अंशसे प्रणिधि, काश्यपके अंशसे महत्तर, अंगिरस च्यवनके अंशसे भानु तथा वर्चके अंशसे सौभर नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ବୃହଦ୍ରଥଙ୍କ ଅଂଶରୁ ପ୍ରଣିଧି ଜନ୍ମିଲେ, କାଶ୍ୟପଙ୍କ ଅଂଶରୁ ମହତ୍ତର; ଅଙ୍ଗିରସଙ୍କ ଅଂଶରୁ ଧୀର ଭାନୁ, ଏବଂ ବର୍ଚ୍ଚସଙ୍କ ଅଂଶରୁ ସୌଭର ନାମକ ପୁତ୍ର ଉତ୍ପନ୍ନ ହେଲେ।
Verse 10
प्राणस्य चानुदात्तस्तु व्याख्याता: पञचविंशति: । देवान् यज्ञमुषश्नान्यानू सूृजत् पञ्चदशोत्तरान्,प्राणके अंशसे अनुदात्तकी उत्पत्ति हुई। इस प्रकार पचीस पुत्रोंके नाम बताये गये। तत्पश्चात् “तप” नामधारी पांचजन्यने यज्ञमें विघध्म डालनेवाले अन्य पंद्रह उत्तर देवों (विनायकों)-की सृष्टि की। उनका विवरण इस प्रकार है--सुभीम, अतिभीम, भीम, भीमबल और अबल--इन पाँच विनायकोंकी उत्पत्ति उन्होंने पहले की, जो देवताओंके यज्ञका विनाश करनेवाले हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ପ୍ରାଣରୁ ଅନୁଦାତ୍ତ ମଧ୍ୟ ଉତ୍ପନ୍ନ ହେଲା, ଏବଂ ତାହାର ପଚିଶ ପୁତ୍ରଙ୍କ ନାମ ବ୍ୟାଖ୍ୟା କରାଗଲା। ତାପରେ ‘ତପ’ ନାମଧାରୀ ପାଞ୍ଚଜନ୍ୟ ଦେବମାନଙ୍କ ଯଜ୍ଞରେ ବିଘ୍ନ କରୁଥିବା ଆଉ ପନ୍ଦର ଦେବୋପମ ବିନାୟକଙ୍କୁ ସୃଷ୍ଟି କଲା। ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ପ୍ରଥମେ ପାଞ୍ଚଜଣ ଜନ୍ମିଲେ—ସୁଭୀମ, ଅତିଭୀମ, ଭୀମ, ଭୀମବଳ ଓ ଅବଳ—ଯେମାନେ ଦେବଯଜ୍ଞ ନାଶକ ବିଘ୍ନକାରୀ।
Verse 11
सुभीममतिभीम॑ं च भीम॑ भीमबलाबलम् | एतान् यज्ञमुष: पज्च देवानां हासृजत् तप:,प्राणके अंशसे अनुदात्तकी उत्पत्ति हुई। इस प्रकार पचीस पुत्रोंके नाम बताये गये। तत्पश्चात् “तप” नामधारी पांचजन्यने यज्ञमें विघध्म डालनेवाले अन्य पंद्रह उत्तर देवों (विनायकों)-की सृष्टि की। उनका विवरण इस प्रकार है--सुभीम, अतिभीम, भीम, भीमबल और अबल--इन पाँच विनायकोंकी उत्पत्ति उन्होंने पहले की, जो देवताओंके यज्ञका विनाश करनेवाले हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ତପ ଦେବମାନଙ୍କ ଯଜ୍ଞକୁ ହରଣ କରୁଥିବା ଏହି ପାଞ୍ଚ ‘ଯଜ୍ଞମୁଷ’ଙ୍କୁ ସୃଷ୍ଟି କଲା—ସୁଭୀମ, ଅତିଭୀମ, ଭୀମ, ଭୀମବଳ ଓ ଅବଳ।
Verse 12
सुमित्रं मित्रवन्तं च मित्रज्ञं मित्रवर्धनम् । मित्रधर्माणमित्येतान् देवानभ्यसृजत् तप:,इनके बाद पाञ्चजन्यने सुमित्र, मित्रवान, मित्रज्ञ, मित्रवर्धन और मित्रधर्मा--इन पाँच देवरूपी विनायकोंको उत्पन्न किया
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ତାପରେ ତପ ସୁମିତ୍ର, ମିତ୍ରବାନ, ମିତ୍ରଜ୍ଞ, ମିତ୍ରବର୍ଧନ ଓ ମିତ୍ରଧର୍ମା—ଏହି ଦେବସ୍ୱରୂପମାନଙ୍କୁ ସୃଷ୍ଟି କଲା।
Verse 13
सुरप्रवीरं वीरं॑ च सुरेशं च सुवर्चसम् । सुराणामपि हन्तारं पञ्चैतानसृजत् तपः,तदनन्तर पाञ्चजन्यने सुरप्रवीर, वीर, सुरेश, सुवर्चा तथा सुरहन्ता--इन पाँचोंको प्रकट किया
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ତା’ପରେ ତପ ସୁରପ୍ରବୀର, ବୀର, ସୁରେଶ, ସୁବର୍ଚ୍ଚସ ଏବଂ ସୁରହନ୍ତା—ଏହି ପାଞ୍ଚଜଣଙ୍କୁ ପ୍ରକଟ କଲା।
Verse 14
त्रिविध॑ संस्थिता होते पडच पञठ्च पृथक् पृथक् । मुष्णन्त्यत्र स्थिता होते स्वर्गतो यज्ञयाजिन:,इस प्रकार ये पंद्रह देवोपम प्रभावशाली विनायक पृथक्-पृथक् पाँच-पाँच व्यक्तियोंके तीन दलोंमें विभक्त हैं। इस पृथ्वीपर ही रहकर स्वर्गलोकसे भी यज्ञकर्ता पुरुषोंकी यज्ञ- सामग्रीका अपहरण कर लेते हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଏହି ପନ୍ଦରଜଣ ତିନି ଦଳରେ ବିନ୍ୟସ୍ତ; ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦଳରେ ପାଞ୍ଚଜଣ କରି, ପରସ୍ପର ପୃଥକ୍। ସେମାନେ ଏଠି ପୃଥିବୀରେ ରହି ମଧ୍ୟ, ଯେନ ସ୍ୱର୍ଗରୁ ହେଉ, ଯଜ୍ଞ କରୁଥିବା ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ଯଜ୍ଞ-ସାମଗ୍ରୀକୁ ଅପହରଣ କରିନେଉଛନ୍ତି।
Verse 15
तेषामिष्टं हरन्त्येते निघ्नन्ति च महद्धवि: । स्पर्थया हव्यवाहानां निध्नन्त्येते हरन्ति च,ये विनायकगण अग्नियोंके लिये अभीष्ट महान् हविष्यका अपहरण तो करते ही हैं, उसे नष्ट भी कर डालते हैं। अग्निगणोंके साथ लाग-डाँट रखनेके कारण ही ये हविष्यका अपहरण और विध्वंस करते हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଏହି ବିନାୟକଗଣ ଯଜ୍ଞରେ ଅର୍ପିତ ଇଷ୍ଟ ମହାହବିକୁ ହରଣ କରନ୍ତି ଏବଂ ତାହାକୁ ନଷ୍ଟ ମଧ୍ୟ କରନ୍ତି। ହବ୍ୟବାହକ ଅଗ୍ନିମାନଙ୍କ ସହ ସ୍ପର୍ଧାରୁ ଏମାନେ ହବିକୁ ଛିନି ନେଇ ବିନାଶ କରନ୍ତି।
Verse 16
बहिर्वेद्यां तदादानं कुशलै: सम्प्रवर्तितम् । तदेते नोपसर्पन्ति यत्र चाग्नि: स्थितो भवेत्,इसीलिये यज्ञनिपुण विद्वानोंने यज्ञशालाकी बाह्य वेदीपर इन विनायकोंके लिये देयभाग रख देनेका नियम चालू किया है; क्योंकि जहाँ अग्निकी स्थापना हुई हो, उस स्थानके निकट ये विनायक नहीं जाते हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଏହିହେତୁ ଯଜ୍ଞରେ କୁଶଳମାନେ ବାହ୍ୟ ବେଦୀରେ ସେହି ଦାନଭାଗ ରଖିବା ପ୍ରଥା ପ୍ରଚଳିତ କରିଛନ୍ତି; କାରଣ ଯେଉଁଠାରେ ଅଗ୍ନି ସ୍ଥାପିତ ଥାଏ, ସେଠାକୁ ଏହି ବିନାୟକମାନେ ନିକଟବର୍ତ୍ତୀ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 17
चितोअग्निरुद्धतन् यज्ञ पक्षाभ्यां तान् प्रबाधते । मन्त्रै: प्रशमिता होते नेष्टं मुष्णन्ति यज्ञियम्,मन्त्रद्वारा संस्कार करनेके पश्चात् प्रजजलित अग्निदेव जिस समय आहुति ग्रहण करते हुए यज्ञका सम्पादन करते हैं, उस समय वे अपने दोनों पंखों (पार्श्ववर्ती शिखाओं) द्वारा उन विनायकोंको कष्ट पहुँचाते हैं (इसीलिये वे उनके पास नहीं फटकते)। मन्त्रोंद्वारा शान्त कर देनेपर वे विनायक यज्ञसम्बन्धी हविष्यका अपहरण नहीं कर पाते हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ସଂସ୍କାରପୂର୍ବକ ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ ଅଗ୍ନି ଯେତେବେଳେ ଯଜ୍ଞକାର୍ଯ୍ୟ ପ୍ରବର୍ତ୍ତନ କରେ, ସେତେବେଳେ ନିଜର ଦୁଇ ପାର୍ଶ୍ୱ ଶିଖା—ଯେନ ଦୁଇ ପକ୍ଷ—ଦ୍ୱାରା ସେହି ବାଧକ ବିନାୟକମାନଙ୍କୁ ପୀଡ଼ା ଦେଇ ଦମନ କରେ। ମନ୍ତ୍ରଦ୍ୱାରା ଶାନ୍ତ କରାଗଲେ ସେମାନେ ଯଜ୍ଞୀୟ ହବି ହରଣ କରିପାରନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 18
बृहदुक्थस्तपस्यैव पुत्रो भूमिमुपाश्रित: । अन्निहाोत्रे हूयमाने पृथिव्यां सद्धिरिज्यते,इस पृथ्वीपर जब अग्निहोत्र होने लगता है, उस समय तप (पाञ्चजन्य)-के ही पुत्र बृहदुक्थ इस भूतलपर स्थित हो श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा पूजित होते हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ତପସଙ୍କ ପୁତ୍ର ବୃହଦୁକ୍ଥ ଏହି ଭୂମିରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ଅଛନ୍ତି। ଏବଂ ପୃଥିବୀରେ ଯେତେବେଳେ ଅଗ୍ନିହୋତ୍ରରେ ଆହୁତି ଦିଆଯାଏ, ସେତେବେଳେ ସଦ୍ଜନମାନେ ତାଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି ପୂଜନ କରନ୍ତି।
Verse 19
रथन्तरश्न॒ तपस: पुत्रो$ग्नि: परिपठ्यते | मित्रविन्दाय वै तस्य हविरध्वर्यवों विदु:,तपके पुत्र जो रथन्तर नामक अग्नि कहे जाते हैं, उनको दी हुई हवि मित्रविन्द देवताका भाग है, ऐसा यजुर्वेदी विद्वान् मानते हैं। महायशस्वी तप (पाज्चजन्य) अपने इन सभी पुत्रोंके सहित अत्यन्त प्रसन्न हो आनन्दमग्न रहते हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ତପସଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ‘ରଥନ୍ତର’ ନାମକ ଅଗ୍ନି ପରମ୍ପରାରେ ପଠିତ ହୁଏ। ଯଜୁର୍ବେଦୀ ଅଧ୍ୱର୍ୟୁମାନେ ଜାଣନ୍ତି ଯେ ସେହି ଅଗ୍ନିରେ ଅର୍ପିତ ହବି ଦେବତା ମିତ୍ରବିନ୍ଦାଙ୍କ ଭାଗ। ଏହିପରି ମହାୟଶସ୍ବୀ ତପସ ନିଜ ସମସ୍ତ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ ଆନନ୍ଦରେ ଅବସ୍ଥିତ ରହନ୍ତି।
Verse 20
मुमुदे परमप्रीतः सह पुत्र्महायशा:,तपके पुत्र जो रथन्तर नामक अग्नि कहे जाते हैं, उनको दी हुई हवि मित्रविन्द देवताका भाग है, ऐसा यजुर्वेदी विद्वान् मानते हैं। महायशस्वी तप (पाज्चजन्य) अपने इन सभी पुत्रोंके सहित अत्यन्त प्रसन्न हो आनन्दमग्न रहते हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ— ମହାଯଶସ୍ବୀ ତପସ୍ ପରମ ପ୍ରୀତ ହୋଇ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆନନ୍ଦରେ ମଗ୍ନ ହେଲେ। ତପସଙ୍କ ପୁତ୍ରରୂପେ ‘ରଥନ୍ତର’ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଯେ ଅଗ୍ନିମାନେ, ସେମାନଙ୍କୁ ଦିଆଯାଇଥିବା ହବିକୁ ଯଜୁର୍ବେଦୀ ପଣ୍ଡିତମାନେ ‘ମିତ୍ରବିନ୍ଦ’ ଦେବତାଙ୍କ ଭାଗ ବୋଲି ମାନନ୍ତି। ଏହିପରି ପାଞ୍ଚଜନ୍ୟ ନାମରେ ମଧ୍ୟ ପରିଚିତ ତପସ୍ ସମସ୍ତ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପରିବୃତ ହୋଇ ଅତ୍ୟନ୍ତ ତୁଷ୍ଟ ଓ ହର୍ଷମଗ୍ନ ରହିଲେ।
Verse 219
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेययमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ उतन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ବନପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ମାର୍କଣ୍ଡେୟ-ସମାସ୍ୟାପର୍ବରେ ଆଙ୍ଗିରସୋପାଖ୍ୟାନ-ବିଷୟକ ଦୁଇଶେ ଉଣେଇଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 220
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आद्धिरसोपाख्याने विंशत्यधिकद्धिशततमो<ध्याय:
ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ବନପର୍ବରେ, ମାର୍କଣ୍ଡେୟ-ସମାସ୍ୟାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଆଦ୍ଧିରସୋପାଖ୍ୟାନରେ ଦୁଇଶେ କୋଡ଼ିଏତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।
The devas face a governance dilemma under sudden destabilization: whether morale and coordination can be restored without abandoning duty. The narrative resolves it through legitimate command (Indra’s rally) and specialized intervention (Skanda’s mandated role).
Duty is situational and continuous: one must remain available for rightful tasks, and disciplined devotion combined with readiness to act is presented as a pathway to śreyas (welfare and excellence).
Yes. The chapter states that one who recites the account of Skanda’s birth/deeds with concentration attains prosperity in this world and reaches Skanda’s sphere (Skanda-sālokyatā), framing the narrative as both history and devotional text.