Adhyaya 216
Vana ParvaAdhyaya 21633 Verses

Adhyaya 216

आरण्यकपर्वणि अध्यायः २१६ — इन्द्र-स्कन्द-संमुखता वज्रप्रहारश्च (Indra approaches Skanda; vajra strike and the arising of Viśākha)

Upa-parva: Mārkaṇḍeya-saṃvāda (Skanda–Indra episode context)

Mārkaṇḍeya describes a formidable divine mobilization: planets and subsidiary grahas, sages, the Mothers (Mātṛ-gaṇas), and blazing attendants assemble around Mahāsena (Skanda). Observing uncertain prospects of victory yet desiring success, Indra mounts Airāvata and advances with the gods in a rapid, martial procession marked by banners, armor, and varied weapons. As Indra issues a lion-like challenge, Skanda answers with a sea-like roar; the shock disorients the divine host. Seeing the gods approach with hostile intent, Skanda emits intensified flames that scorch the deva-soldiery, driving them to seek refuge with him rather than with Indra. Abandoned, Indra hurls the vajra at Skanda’s right side; the strike pierces, and from the vajra-impact arises another radiant warrior, Viśākha, described as youthful, golden-armored, and spear-bearing. Confronted by this manifestation, Indra submits with folded hands; Skanda grants him and the host assurance of safety (abhaya), after which the gods celebrate with instruments, signaling restored order and acknowledged supremacy.

Chapter Arc: मार्कण्डेय ऋषि युधिष्ठिर को धर्मव्याध-कौशिक संवाद की कड़ी में देवताओं की गणना (तैंतीस देव) और ‘धर्म’ के सूक्ष्म स्वरूप की पृष्ठभूमि देकर कथा में प्रवेश कराते हैं—जहाँ एक साधारण-सा कसाई असाधारण धर्म-प्रकाशक बनकर खड़ा है। → कौशिक ब्राह्मण धर्मव्याध के घर पहुँचकर उसके आचरण, सत्यशीलता और धर्मज्ञान से चकित होता है। व्याध अपने माता-पिता—दोनों गुरुजनों—का दर्शन कराकर बताता है कि ‘माता-पिता की सेवा’ ही उसकी तपस्या है। ब्राह्मण के मन में प्रश्न उठता है: शूद्र-योनि में जन्मा यह व्यक्ति इतना ऊँचा धर्म कैसे जानता है? → धर्मव्याध अपने पूर्वजन्म का वृत्तांत खोलता है—अकार्य कर बैठने (अनुचित कर्म) से मन की तीव्र पीड़ा, और क्रोधमूर्च्छित ऋषि का शाप: ‘तू क्रूर व्याध होकर शूद्र-योनि में जन्मेगा।’ यही मोड़ बताता है कि पतन का कारण कर्म है, और उत्थान का साधन भी कर्म ही—सेवा, संयम, सत्य। → व्याध स्पष्ट करता है कि ब्राह्मणों का अपराध उसके लिए ‘अनतिक्रमणीय’ है; वह विनय, सेवा और सत्य के बल पर धर्म का उपदेशक बना है। कौशिक को संकेत मिलता है कि धर्म जन्म-आधारित नहीं, आचरण-आधारित है; और गुरु केवल वेदपाठी नहीं—माता-पिता भी प्रत्यक्ष गुरु हैं। → कथा अगले चरण की ओर बढ़ती है—कौशिक के लिए धर्मव्याध आगे और कौन-से सूक्ष्म धर्म-नियम, प्रायश्चित्त और आचरण-मार्ग बताएगा, जिनसे उसका अहं और क्रोध पूर्णतः गल सके?

Shlokas

Verse 1

६:22...8 #::3..7 | आए आप5ह - आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, इन्द्र और प्रजापति--ये तैंतीस देवता हैं। पजञ्चदर्शाधिकद्विशततमो< ध्याय: धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्णको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना मार्कण्डेय उवाच गुरुं निवेद्य विप्राय तौ मातापितरावुभौ । पुनरेव स धर्मात्मा व्याधो ब्राह्मणमब्रवीत्‌

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଧର୍ମାତ୍ମା ବ୍ୟାଧ ପ୍ରଥମେ ବ୍ରାହ୍ମଣ-ଗୁରୁଙ୍କୁ ନିଜ ମାତାପିତା—ଉଭୟଙ୍କ ବିଷୟ ନିବେଦନ କରି, ପୁନର୍ବାର ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ କହିଲା।

Verse 2

मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! इस प्रकार धर्मात्मा व्याधने कौशिक ब्राह्मणको अपने माता-पितारूप दोनों गुरुजनोंका दर्शन कराकर पुनः उससे इस प्रकार कहा -- ३ ॥। प्रवृत्तचक्षुर्जातो 5स्मि सम्पश्य तपसो बलम्‌ । यदर्थमुक्तोडसि तया गच्छ त्वं मिथिलामिति,“ब्राह्मण!” माता-पिताकी सेवा ही मेरी तपस्या है। इस तपस्याका प्रभाव देखिये। मुझे दिव्य-दृष्टि प्राप्त हो गयी है, जिसके कारण उस पतिव्रता देवीने जो सदा पतिकी ही सेवामें संलग्न रहनेवाली, जितेन्द्रिय तथा सत्य एवं सदाचारमें तत्पर है, आपको यह कहकर यहाँ भेजा था कि “आप मिथिलापुरीको जाइये। वहाँ एक व्याध रहता है। वह आपको सब धर्मोका उपदेश करेगा”

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—“ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ଏହିପରି ଧର୍ମାତ୍ମା ବ୍ୟାଧ କୌଶିକ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ମାତା-ପିତା ରୂପ ଦୁଇ ଗୁରୁଜନଙ୍କ ଦର୍ଶନ କରାଇ ପୁନର୍ବାର କହିଲା—‘ମୋର ଅନ୍ତର୍ଦୃଷ୍ଟି ଜାଗ୍ରତ ହୋଇଛି; ତପସ୍ୟାର ବଳ ଦେଖ। ସେହି ପତିବ୍ରତା ଦେବୀ ତୁମକୁ “ମିଥିଲାକୁ ଯାଅ” ବୋଲି କହିଥିଲେ—ତାହାର କାରଣ ଏହି। ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ମାତାପିତାଙ୍କ ସେବା ହିଁ ମୋର ତପସ୍ୟା; ତାହାର ପ୍ରଭାବରେ ମୁଁ ଦିବ୍ୟଦୃଷ୍ଟି ପାଇଛି।’”

Verse 3

पतिशुश्रूषपरया दान्तया सत्यशीलया । मिथिलायां वसेद्‌ व्याध: स ते धर्मान्‌ प्रवक्ष्यति,“ब्राह्मण!” माता-पिताकी सेवा ही मेरी तपस्या है। इस तपस्याका प्रभाव देखिये। मुझे दिव्य-दृष्टि प्राप्त हो गयी है, जिसके कारण उस पतिव्रता देवीने जो सदा पतिकी ही सेवामें संलग्न रहनेवाली, जितेन्द्रिय तथा सत्य एवं सदाचारमें तत्पर है, आपको यह कहकर यहाँ भेजा था कि “आप मिथिलापुरीको जाइये। वहाँ एक व्याध रहता है। वह आपको सब धर्मोका उपदेश करेगा”

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—“ପତିସେବାରେ ପରାୟଣ, ଇନ୍ଦ୍ରିୟଦମନଶୀଳା, ସତ୍ୟଶୀଳା ଓ ସଦାଚାରନିଷ୍ଠା ସେହି ଦେବୀ ଏହି ସନ୍ଦେଶ ଦେଇଥିଲେ—‘ମିଥିଲାରେ ଜଣେ ବ୍ୟାଧ ବସେ; ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ, ସେ ତୁମକୁ ଧର୍ମମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ପ୍ରବଚନ କରିବ।’”

Verse 4

ब्राह्मण उवाच पतिव्रताया: सत्याया: शीलाढ्याया यतव्रत । संस्मृत्य वाक्‍्यं धर्मज्ञ गुणवानसि मे मत:,ब्राह्मण बोला--उत्तम व्रतका पालन करनेवाले धर्मज्ञ व्याध! उस सत्यपरायणा और सुशीला पतिव्रता-देवीके वचनोंका स्मरण करके मुझे यह दृढ़ विश्वास हो गया है कि तुम उत्तम गुणोंसे सम्पन्न हो

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—ହେ ଯତବ୍ରତ! ସେହି ସତ୍ୟପରାୟଣା, ସୁଶୀଳା, ପତିବ୍ରତା ନାରୀଙ୍କ ବଚନ ସ୍ମରଣ କରି ମୋର ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ ହେଲା—ତୁମେ ଧର୍ମଜ୍ଞ, ଏବଂ ମୋ ମତରେ ତୁମେ ଉତ୍ତମ ଗୁଣରେ ସମ୍ପନ୍ନ।

Verse 5

व्याध उवाच यत्‌ तदा त्वं द्विजश्रेष्ठ तयोक्तो मां प्रति प्रभो । दृष्टमेव तया सम्यगेकपत्न्या न संशय:,धर्मव्याधने कहा-<द्धिजश्रेष्ठ! प्रभो! उस पतिव्रता देवीने पहले आपसे मेरे विषयमें जो कुछ कहा है, वह सब ठीक है। इसमें संदेह नहीं कि उसने पातिव्रत्यके प्रभावसे सब कुछ प्रत्यक्ष देखा है

ଧର୍ମବ୍ୟାଧ କହିଲା—ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ, ପ୍ରଭୋ! ସେ ଏକପତ୍ନୀବ୍ରତା ପତିବ୍ରତା ନାରୀ ମୋ ବିଷୟରେ ପୂର୍ବେ ଆପଣଙ୍କୁ ଯାହା କହିଥିଲେ, ସେ ସବୁ ଯଥାର୍ଥ। ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ—ପାତିବ୍ରତ୍ୟର ପ୍ରଭାବରେ ସେ ସବୁକିଛି ସମ୍ୟକ୍ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦେଖିଥିଲେ।

Verse 6

त्ववनुग्रहबुद्धया तु विप्रैतद्‌ दर्शितं मया । वाक्यं च शृणु मे तात यत्‌ ते वक्ष्ये हित॑ द्विज,विप्रवर! आपपर अनुग्रह करनेके विचारसे ही मैंने ये सब बातें आपके सामने रखी हैं। तात! आप मेरी बात सुनिये। ब्रह्म! आपके लिये जो हितकर है वही बात बताऊँगा

ଧର୍ମବ୍ୟାଧ କହିଲା—ହେ ବିପ୍ର! ଆପଣଙ୍କୁ ଅନୁଗ୍ରହ କରିବା ଭାବନାରୁ ମୁଁ ଏ ସବୁ କଥା ଆପଣଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ରଖିଛି। ତାତ, ମୋ କଥା ଶୁଣନ୍ତୁ। ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଆପଣଙ୍କ ହିତକର ଯାହା, ସେହି କଥା ମୁଁ କହିବି।

Verse 7

त्वया विनिकृता माता पिता च द्विजसत्तम | अनिसृष्टोडसि निष्क्रान्तो गृहात्‌ ताभ्यामनिन्दित

ଧର୍ମବ୍ୟାଧ କହିଲା—ହେ ଦ୍ୱିଜସତ୍ତମ! ତୁମେ ତୁମ ମାତା ଓ ପିତାଙ୍କୁ ଅନ୍ୟାୟ କରିଛ। ସେମାନଙ୍କ ଅନୁମତି ବିନା ତୁମେ ଘରୁ ବାହାରିଗଲ—ଯଦିଓ ଜନ୍ମତଃ ତୁମେ ଅନିନ୍ଦ୍ୟ।

Verse 8

वेदोच्चारणकार्यार्थमयुक्त तत्‌ त्वया कृतम्‌ तव शोकेन वृद्धौ तावन्धी भूती तपस्विनौ

ଧର୍ମବ୍ୟାଧ କହିଲା—ବେଦୋଚ୍ଚାରଣ ଓ କର୍ମକାର୍ଯ୍ୟର ନିମିତ୍ତ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ଯାହା କରିଛ, ତାହା ଅଯୁକ୍ତ। ତୁମ ଶୋକ ଓ ଅବହେଳାରେ ସେ ଦୁଇ ବୃଦ୍ଧ ତପସ୍ବୀ ଅନ୍ଧ ହୋଇପଡ଼ିଛନ୍ତି—ଅସହାୟ ହୋଇଗଲେ।

Verse 9

द्विजश्रेष्ठ] आपने माता-पिताकी उपेक्षा की है। वेदाध्ययन करनेके लिये उन दोनोंकी आज्ञा लिये बिना ही आप घरसे निकल पड़े हैं। अनिन्द्य ब्राह्मण! यह आपके द्वारा अनुचित कार्य हुआ है। आपके शोकसे ये दोनों बूढ़े एवं तपस्वी माता-पिता अन्धे हो गये हैं ।। तौ प्रसादयितुं गच्छ मा त्वां धर्मोडत्यगादयम्‌ | तपस्वी त्वं महात्मा च धर्मे च निरत: सदा,आप उन्हें प्रसन्न करनेके लिये घर जाइये। ऐसा करनेसे आपका धर्म नष्ट नहीं होगा। आप तपस्वी, महात्मा तथा निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं

ବ୍ୟାଧ କହିଲା—ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତୁମେ ମାତାପିତାଙ୍କୁ ଅବହେଳା କରିଛ। ସେମାନଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ନେଇନଥାଇ ବେଦାଧ୍ୟୟନ ପାଇଁ ଘର ଛାଡ଼ି ବାହାରିଗଲ। ନିର୍ଦୋଷ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ଏହା ତୁମ ପକ୍ଷରୁ ଅନୁଚିତ କାର୍ଯ୍ୟ। ତୁମ ଶୋକରେ ସେଇ ବୃଦ୍ଧ ତପସ୍ବୀ ମାତାପିତା ଅନ୍ଧ ହୋଇଗଲେ। ତେଣୁ ଘରକୁ ଯାଇ ସେମାନଙ୍କୁ ପ୍ରସନ୍ନ କର; ଏହାରେ ତୁମ ଧର୍ମ କ୍ଷୟ ହେବ ନାହିଁ। ତୁମେ ତପସ୍ବୀ, ମହାତ୍ମା ଏବଂ ସଦା ଧର୍ମରେ ନିରତ।

Verse 10

सर्वमेतदपार्थ ते क्षिप्रं तौ सम्प्रसादय । श्रद्दधस्व मम ब्रह्मन्‌ नान्यथा कर्तुमहसि । गम्यतामग्य विप्रषषे श्रेयस्ते कथयाम्यहम्‌,परंतु माता-पिताको संतुष्ट न करनेके कारण आपका यह सारा धर्म और व्रत व्यर्थ हो गया है। अतः शीघ्र जाकर उन दोनोंको प्रसन्न कीजिये। ब्रह्मन! मेरी बातपर श्रद्धा कीजिये। इसके विपरीत कुछ न कीजिये। ब्रह्मर्ष! आप अपने घर जाइये और माता-पिताकी सेवा कीजिये। यह मैं आपके लिये परम कल्याणकी बात बता रहा हूँ

ବ୍ୟାଧ କହିଲା—ମାତାପିତାଙ୍କୁ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ନ କରିଥିବାରୁ ତୁମର ଏ ସବୁ ନିଷ୍ଫଳ ହୋଇଗଲା। ଶୀଘ୍ର ଯାଇ ସେ ଦୁଇଜଣଙ୍କୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ପ୍ରସନ୍ନ କର। ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ମୋ କଥାରେ ଶ୍ରଦ୍ଧା ରଖ; ଏହାର ବିପରୀତ କରିବା ତୁମ ପାଇଁ ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ। ହେ ବ୍ରହ୍ମର୍ଷି! ଆଜିହିଁ ଘରକୁ ଯାଅ ଓ ମାତାପିତାଙ୍କ ସେବା କର—ଏହିଟି ତୁମ ପରମ ଶ୍ରେୟ, ମୁଁ ଘୋଷଣା କରୁଛି।

Verse 11

ब्राह्मण उवाच यदेतदुक्तं भवता सर्व सत्यमसंशयम्‌ | प्रीतो5स्मि तव भद्र| ते धर्माचारगुणान्वित,ब्राह्मण बोला--धर्म, सदाचार और सदगुणोंसे सम्पन्न व्याध!! आपका भला हो। आपने यह जो कुछ बताया है, सब निःसंदेह सत्य है। मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—ଧର୍ମ, ସଦାଚାର ଓ ସଦ୍‌ଗୁଣରେ ଯୁକ୍ତ ବ୍ୟାଧ! ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ତୁମେ ଯାହା କହିଛ, ସେ ସବୁ ନିଃସନ୍ଦେହ ସତ୍ୟ। ମୁଁ ତୁମପରେ ପ୍ରସନ୍ନ।

Verse 12

व्याध उवाच दैवतप्रतिमो हि त्वं यस्त्वं धर्ममनुव्रत: । पुराणं शाश्ष॒तं दिव्यं दुष्प्राप्पमकृतात्मभि:,धर्मव्याधने कहा--विप्रवर! आप देवताओंके समान हैं; क्योंकि आपने उस धर्ममें मन लगाया है, जो पुरातन, सनातन, दिव्य तथा मनको न जीतनेवाले पुरुषोंके लिये दुर्लभ है

ବ୍ୟାଧ କହିଲା—ହେ ବିପ୍ରବର! ତୁମେ ଦେବତାସଦୃଶ; କାରଣ ତୁମେ ଯେ ଧର୍ମକୁ ଅନୁସରଣ କରୁଛ, ସେ ଧର୍ମ ପୁରାତନ, ଶାଶ୍ୱତ, ଦିବ୍ୟ ଏବଂ ଅସଂୟତ ମନ ଥିବା ଲୋକଙ୍କ ପାଇଁ ଦୁର୍ଲଭ।

Verse 13

मातापित्रो: सकाशं हि गत्वा त्वं द्विजसत्तम । अलन्द्रितः कुरु क्षिप्रं मातापित्रोर्हि पूजनम्‌ । अत: परमहं धर्म नानन्‍्यं पश्यामि कंचन,द्विजश्रेष्ठी आप माता-पिताके पास जाकर आलस्यरहित हो शीघ्र ही उनकी सेवामें लग जाइये। मैं इससे बढ़कर और कोई धर्म नहीं देखता

ବ୍ୟାଧ କହିଲା—ହେ ଦ୍ୱିଜସତ୍ତମ! ମାତାପିତାଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ଆଳସ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରି ଶୀଘ୍ରେ ତାଙ୍କର ପୂଜା ଓ ସେବା କର। ଏହାଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧର୍ମ ମୁଁ ଆଉ କୌଣସି ଦେଖୁନାହିଁ।

Verse 14

ब्राह्मण उवाच इहाहमागतो दिष्ट्या दिष्ट्या मे सज्भतं त्वया । ईदृशा दुर्लभा लोके नरा धर्मप्रदर्शका:,ब्राह्मण बोला--नरश्रेष्ठ! मेरा बड़ा भाग्य था, जो यहाँ आया और सौभाग्यसे ही मुझे आपका संग प्राप्त हो गया। संसारमें आप-जैसे धर्मका मार्ग दिखानेवाले मनुष्य दुर्लभ हैं

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏଠାକୁ ଆସିବା ମୋର ମହାଭାଗ୍ୟ; ସୌଭାଗ୍ୟବଶତଃ ଆପଣଙ୍କ ସଙ୍ଗ ମୋତେ ମିଳିଲା। ଲୋକରେ ଆପଣଙ୍କ ପରି ଧର୍ମପଥ ପ୍ରଦର୍ଶକ ମନୁଷ୍ୟ ଦୁର୍ଲଭ।

Verse 15

एको नरसहस्रेषु धर्मविद्‌ विद्यते न वा । प्रीतो5स्मि तव सत्येन भद्र| ते पुरुषर्षभ,हजारों मनुष्योंमेंसे कोई एक भी धर्मके तत्त्वको जाननेवाला है या नहीं--यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। पुरुषर्षभ! आपका कल्याण हो। आज मैं आपके सत्यके कारण आपपर बहुत प्रसन्न हूँ

ହଜାର ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଧର୍ମତତ୍ତ୍ୱ ଜାଣୁଥିବା ଜଣେ ମଧ୍ୟ ଅଛନ୍ତି କି ନାହିଁ—ଏହା ନିଶ୍ଚିତ କହିହେବ ନାହିଁ। ପୁରୁଷର୍ଷଭ! ଆପଣଙ୍କ ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ଆଜି ଆପଣଙ୍କ ସତ୍ୟବଚନରେ ମୁଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ।

Verse 16

पतमानोउद्य नरके भवतास्मि समुद्धृतः । भवितव्यमथैवं च यद्‌ दृष्टोईसि मयानघ,अनघ! मैं नरकमें गिर रहा था। आज आपने मेरा उद्धार कर दिया। इस प्रकार जब मुझे आपका दर्शन मिल गया, तब निश्चय ही आपके उपदेशके अनुसार भविष्यमें सब कुछ होगा

ଅନଘ! ମୁଁ ଆଜି ନରକକୁ ପତିତ ହେଉଥିଲି; ଆପଣ ମୋତେ ଉଦ୍ଧାର କଲେ। ଏବେ ଆପଣଙ୍କ ଦର୍ଶନ ପାଇବା ପରେ, ଆଗକୁ ସବୁ କିଛି ଆପଣଙ୍କ ଉପଦେଶ ଅନୁସାରେ ହେବ—ଏହା ନିଶ୍ଚିତ।

Verse 17

राजा ययातिर्दाहित्रै: पतितस्तारितो यथा । सद्धिः पुरुषशार्दूल तथाहं भवता द्विज:,राजा ययाति स्वर्गसे गिर गये थे; परंतु उनके उत्तम स्वभाववाले दौतह्ित्रों (पुत्रीके पुत्रों)- ने पुनः उनका उद्धार कर दिया--वे पूर्ववत्‌ स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित हो गये। पुरुषसिंह! इसी प्रकार आपने भी आज मुझ ब्राह्मणको नरकमें गिरनेसे बचाया है

ରାଜା ଯୟାତି ସ୍ୱର୍ଗରୁ ପତିତ ହୋଇଥିଲେ; କିନ୍ତୁ ତାଙ୍କ ସଦ୍ଗୁଣୀ ଦୌହିତ୍ରମାନେ (କନ୍ୟାର ପୁତ୍ରମାନେ) ତାଙ୍କୁ ଉଦ୍ଧାର କରି ପୁନଃ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ କରିଥିଲେ। ପୁରୁଷଶାର୍ଦୂଲ! ସେହିପରି ଆଜି ଆପଣ ଏହି ଦ୍ୱିଜକୁ ନରକପତନରୁ ରକ୍ଷା କଲେ।

Verse 18

मातापितृभ्यां शुश्रूषां करिष्ये वचनात्‌ तव । नाकृतात्मा वेदयति धर्माधर्मविनिश्चयम्‌,मैं आपके कहनेके अनुसार माता-पिताकी सेवा करूँगा। जिसका अन्तः:करण शुद्ध नहीं है, वह धर्म-अधर्मके निर्णयको बतला नहीं सकता

ଆପଣଙ୍କ ବଚନାନୁସାରେ ମୁଁ ମାତା-ପିତାଙ୍କ ସେବା କରିବି। ଯାହାର ଅନ୍ତଃକରଣ ଶୁଦ୍ଧ ଓ ସଂଯତ ନୁହେଁ, ସେ ଧର୍ମ-ଅଧର୍ମର ନିଷ୍ପତ୍ତିକୁ ଜାଣିପାରେ ନାହିଁ।

Verse 19

दुर्जेय: शाश्वतो धर्म: शूद्रयोनौ हि वर्तते । नत्वां शूद्रमहं मन्‍्ये भवितव्यं हि कारणम्‌,आश्चर्य है कि यह सनातन धर्म, जिसके स्वरूपको समझना अत्यन्त कठिन है, शूद्रयोनिके मनुष्यमें भी विद्यमान है। मैं आपको शूद्र नहीं मानता। आपका जो शूद्रयोनिमें जन्म हो गया है, इसका कोई विशेष कारण होना चाहिये

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—ଏହି ଶାଶ୍ୱତ ଧର୍ମ ଦୁର୍ଜେୟ, ବୁଝିବାକୁ ମଧ୍ୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ କଠିନ; ତଥାପି ଶୂଦ୍ର-ଯୋନିରେ ଜନ୍ମିତ ମନୁଷ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ଏହା ବିଦ୍ୟମାନ। କିନ୍ତୁ ମୁଁ ତୁମକୁ ଶୂଦ୍ର ମନେ କରେନି; ସେହି ଅବସ୍ଥାରେ ତୁମ ଜନ୍ମ ପଛରେ ନିଶ୍ଚୟ କୌଣସି ଗଭୀର କାରଣ ଅଛି।

Verse 20

येन कर्मविशेषेण प्राप्तेयं शूद्रता त्वया । एतदिच्छामि विज्ञातुं तत््वेन हि महामते । कामया ब्रूहि मे सर्व सत्येन प्रयतात्मना,महामते! जिस विशेष कर्मके कारण आपको यह शाूद्रयोनि प्राप्त हुई है, उसे मैं यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ। आप सत्य और पवित्र अन्तःकरणके विश्वासके अनुसार स्वेच्छापूर्वक मुझे सब कुछ बताइये

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—ହେ ମହାମତେ! କେଉଁ ବିଶେଷ କର୍ମର ଫଳରେ ତୁମେ ଏହି ଶୂଦ୍ରତ୍ୱ ପାଇଲ? ମୁଁ ଏହାକୁ ତତ୍ତ୍ୱତଃ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ଜାଣିବାକୁ ଚାହେଁ। ସତ୍ୟରେ, ସଂଯମିତ ଓ ପବିତ୍ର ମନେ, ସ୍ୱଇଚ୍ଛାରେ ମୋତେ ସବୁ କହ।

Verse 21

व्याध उवाच अनतिक्रमणीया वै ब्राह्मुणा मे द्विजोत्तम | शृणु सर्वमिदं वृत्तं पूर्वदेहे ममानघ,धर्मव्याधने कहा--विप्रवर! मुझे ब्राह्मगोंका अपराध कभी नहीं करना चाहिये। अनघ! मेरे पूर्वजन्मके शरीरद्वारा जो घटना घटित हुई है, वह सब बताता हूँ, सुनिये

ବ୍ୟାଧ କହିଲା—ହେ ଦ୍ୱିଜୋତ୍ତମ! ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ମୁଁ କେବେ ଅତିକ୍ରମ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ। ହେ ଅନଘ! ଶୁଣ—ମୋ ପୂର୍ବଦେହରେ ମୋ ଦ୍ୱାରା ଯାହା ଘଟିଥିଲା, ସେ ସମସ୍ତ ବୃତ୍ତାନ୍ତ ମୁଁ କହୁଛି।

Verse 22

अहं हि ब्राह्मण: पूर्वमासं द्विजवरात्मज: । वेदाध्यायी सुकुशलो वेदाज़्ानां च पारग:

ବ୍ୟାଧ କହିଲା—ପୂର୍ବେ ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ ଏକ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଥିଲି, ଏକ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦ୍ୱିଜଙ୍କ ପୁତ୍ର। ମୁଁ ବେଦାଧ୍ୟୟନରେ ନିରତ, ଅତ୍ୟନ୍ତ କୁଶଳ, ଏବଂ ବେଦଜ୍ଞାନର ପାରକୁ ପହଞ୍ଚିଥିଲି।

Verse 23

मैं पूर्वजन्ममें एक श्रेष्ठ ब्राह्मणका पुत्र और वेदाध्ययनपरायण ब्राह्मण था। वेदांगोंका पारंगत विद्वान्‌ माना जाता था। मैं विद्याध्ययनमें अत्यन्त कुशल था ।। आत्मदोषकृतैब्रह्मन्नवस्थामाप्तवानिमाम्‌ । कश्चिद्‌ राजा मम सखा भर्नुर्वेदपरायण:

ବ୍ୟାଧ କହିଲା—ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ନିଜ ଦୋଷର କାରଣରୁ ମୁଁ ଏହି ଅବସ୍ଥାକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇଛି। ଭୃଙ୍ଗୁ ନାମକ ଜଣେ ରାଜା—ମୋର ସଖା—ବେଦପରାୟଣ ଥିଲେ।

Verse 24

एतस्मिन्नेव काले तु मृगयां निर्गतो नृप:,ब्रह्म! इसी समय राजा अपने मन्त्रियों तथा प्रधान योद्धाओंके साथ शिकार खेलनेके लिये निकले। उन्होंने एक ऋषिके आश्रमके निकट बहुत-से हिंसक पशुओंका वध किया

ସେହି ସମୟରେ ରାଜା ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ଓ ପ୍ରଧାନ ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କ ସହିତ ମୃଗୟାକୁ ବାହାରିଲେ। ଏକ ଋଷିଙ୍କ ଆଶ୍ରମ ସମୀପରେ ସେ ଅନେକ ହିଂସ୍ର ପଶୁଙ୍କୁ ବଧ କଲେ।

Verse 25

सहितो योधमुख्यैश्न मन्सत्रिभिश्न सुसंवृत: । ततो<भ्यहन्‌ मृगांस्तत्र सुबहूनाश्रमं प्रति,ब्रह्म! इसी समय राजा अपने मन्त्रियों तथा प्रधान योद्धाओंके साथ शिकार खेलनेके लिये निकले। उन्होंने एक ऋषिके आश्रमके निकट बहुत-से हिंसक पशुओंका वध किया

ପ୍ରଧାନ ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କ ସହିତ ଏବଂ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଘେରାଯାଇ ରାଜା ମୃଗୟାକୁ ବାହାରିଲେ। ପରେ ଆଶ୍ରମ ସମୀପରେ ସେଠାରେ ସେ ଅନେକ ମୃଗ (ବନ୍ୟ ପଶୁ)କୁ ବଧ କଲେ।

Verse 26

अथ क्षिप्त: शरो घोरो मयापि द्विजसत्तम । ताडितश्न॒ ऋषिस्तेन शरेणानतपर्वणा,द्विजश्रेष्ठ) तदनन्तर मैंने भी एक भयानक बाण छोड़ा। उसकी गाँठ कुछ झुकी हुई थी। उस बाणसे एक ऋषि मारे गये

ତାପରେ, ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଏକ ଭୟଙ୍କର ଶର ଛାଡ଼ିଲି। ଯାହାର ଗାଠ ଅଳ୍ପ ଝୁକା ଥିଲା; ସେଇ ଶରରେ ଆଘାତ ପାଇ ଏକ ଋଷି ନିହତ ହେଲେ।

Verse 27

भूमौ निपतितो ब्रह्म॒न्नुवाच प्रतिनादयन्‌ । नापराध्याम्यहं किंचित्‌ केन पापमिदं कृतम्‌,ब्रह्म! बाण लगते ही वे मुनि पृथिवीपर गिर पड़े और अपने आर्तनादसे उस वन्य प्रदेशको गुँजाते हुए बोले, “आह! मैं तो किसीका कोई अपराध नहीं करता हूँ। फिर किसने यह पापकर्म कर डाला?”

ହେ ବ୍ରହ୍ମନ୍! ଶର ଲାଗିବା ସହିତ ସେ ମୁନି ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଗଲେ ଏବଂ ଆର୍ତ୍ତନାଦରେ ଅରଣ୍ୟକୁ ପ୍ରତିଧ୍ୱନିତ କରି କହିଲେ—“ହାୟ! ମୁଁ କାହାରି ଅପରାଧ କରିନାହିଁ; ତେବେ ଏହି ପାପକର୍ମ କିଏ କଲା?”

Verse 28

मन्वानस्तं मृगं चाहं सम्प्राप्त: सहसा प्रभो । अपश्यं तमृषिं विद्धं शरेणानतपर्वणा,प्रभो! मैंने उन्हें हिंसक पशु समझकर बाण मारा था। अतः सहसा उनके पास जा पहुँचा। वहाँ जाकर देखा कि झुकी हुई गाँठवाले उस बाणसे एक ऋषि घायल होकर धरतीपर पड़े हैं

ପ୍ରଭୋ! ମୁଁ ତାଙ୍କୁ ହିଂସ୍ର ମୃଗ ଭାବି ଶର ଛାଡ଼ିଥିଲି। ତେଣୁ ମୁଁ ସହସା ସେଠାକୁ ପହଞ୍ଚିଗଲି; ସେଠାରେ ଦେଖିଲି—ଅଳ୍ପ ଝୁକା ଗାଠ ଥିବା ସେଇ ଶରରେ ବିଦ୍ଧ ଏକ ଋଷି ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଛନ୍ତି।

Verse 29

अकार्यकरणाच्चापि भृशं मे व्यथितं मन: । तमुग्रतपसं विप्र॑ं निष्टनन्तं महीतले,यह न करनेयोग्य पाप कर डालनेके कारण मेरे मनमें उस समय बड़ी पीड़ा हुई। वे उग्र तपस्वी ब्राह्मण उस समय धरतीपर पड़े-पड़े कराह रहे थे

ଯାହା କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ, ସେହି କାମ କରିଦେଇଥିବାରୁ ମୋ ମନ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବ୍ୟଥିତ ହେଲା। ମୁଁ ଦେଖିଲି—ଉଗ୍ରତପସ୍ବୀ ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଭୂମିରେ ପଡ଼ି କରାହୁଛନ୍ତି; ମୋର ପାପକର୍ମ ପାଇଁ ତୀବ୍ର ପଶ୍ଚାତ୍ତାପ ମୋତେ ଆବରଣ କଲା।

Verse 30

अजानता कृतमिदं मयेत्यहमथाब्रुवम्‌ क्षन्तुमहसि मे सर्वमिति चोक्तो मया मुनि:,मैंने साहस करके उन मुनीश्वरसे कहा--“भगवन्‌! अनजानमें मेरे द्वारा यह अपराध बन गया है। अतः आप यह सब क्षमा कर दें”

ତାପରେ ମୁଁ ସାହସ କରି କହିଲି—“ଏହା ମୋ ଦ୍ୱାରା ଅଜାଣତେ ହୋଇଗଲା; ଭଗବନ୍, ମୋର ଏ ସବୁକୁ କ୍ଷମା କରନ୍ତୁ।” ଏଭଳି ଭାବେ ମୁଁ ମୁନିଙ୍କୁ ନିବେଦନ କଲି।

Verse 31

ततः प्रत्यब्रवीद्‌ वाक्यमृषिर्मा क्रोधमूर्च्छित: । व्याधस्त्वं भविता क्रूर शूद्रयोनाविति द्विज,मेरी बात सुनकर ऋषि क्रोधसे व्याकुल हो गये और उत्तर देते हुए बोले--“निर्दयी ब्राह्मण! तू शूद्रयोनिमें जन्म लेकर व्याध होगा"

ମୋ କଥା ଶୁଣି ଋଷି କ୍ରୋଧାବେଶରେ କହିଲେ—“ହେ କ୍ରୂର! ତୁମେ ଶୂଦ୍ର-ଯୋନିରେ ଜନ୍ମ ନେଇ ବ୍ୟାଧ ହେବ, ହେ ଦ୍ୱିଜ!”

Verse 215

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे पजञ्चदशाधिकद्वधिशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसगास्यापर्वमें ब्राह्मण- व्याधसंवादविषयक दो सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ବନପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ମାର୍କଣ୍ଡେୟ-ସମାସ୍ୟାପର୍ବରେ ବ୍ରାହ୍ମଣ-ବ୍ୟାଧ ସଂବାଦବିଷୟକ ଦୁଇଶେ ପନ୍ଦରତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 233

संसर्गाद्‌ धनुषि श्रेष्ठस्ततो 5हमभवं द्विज । ब्राह्मण! अपने ही दोषोंके कारण मुझे इस दुरवस्थामें आना पड़ा है। पूर्वजन्ममें जब मैं ब्राह्मण था, एक धरनुर्वेद-परायण राजाके साथ मेरी मित्रता हो गयी थी। उनके संसर्गसे मैं धनुर्वेदकी शिक्षा लेने लगा और धनुष चलानेकी कलामें मैंने श्रेष्ठ योग्यता प्राप्त कर ली

ହେ ଦ୍ୱିଜ! ସଙ୍ଗତିର ପ୍ରଭାବରୁ ମୁଁ ଧନୁଷ୍ୟ-ବିଦ୍ୟାରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ହୋଇଥିଲି। ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ, ମୋର ନିଜ ଦୋଷରୁ ମୁଁ ଏହି ଦୁରବସ୍ଥାକୁ ପହଞ୍ଚିଛି। ପୂର୍ବଜନ୍ମରେ ମୁଁ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଥିବାବେଳେ ଧନୁର୍ବେଦ-ପରାୟଣ ଜଣେ ରାଜାଙ୍କ ସହ ମୋର ମିତ୍ରତା ହୋଇଥିଲା; ତାଙ୍କ ସାନ୍ନିଧ୍ୟରୁ ମୁଁ ସେହି ବିଦ୍ୟା ଶିଖିଲି ଏବଂ ଧନୁଷ୍ୟ ଚାଳନାର କଳାରେ ଅସାଧାରଣ ନିପୁଣତା ଲାଭ କଲି।

Frequently Asked Questions

The tension lies between coercive assertion of authority (Indra’s armed advance and vajra deployment) and the ethical restoration of order through refuge and protection (the gods seeking śaraṇa and Skanda granting abhaya after demonstrating superior force).

Power is not self-validating: legitimacy is stabilized when strength is paired with restraint and protection; the episode models how dominance can transition into security-giving governance rather than continued escalation.

No explicit phalaśruti is present in the provided verses; the chapter’s meta-function is exemplum-based—teaching through narrated precedent within Mārkaṇḍeya’s discourse rather than through a stated reward formula.