Adhyaya 93
Udyoga ParvaAdhyaya 9361 Verses

Adhyaya 93

उद्योगपर्व — अध्याय ९३: कृष्णस्य धृतराष्ट्रोपदेशः (Kṛṣṇa’s Counsel to Dhṛtarāṣṭra in the Assembly)

Upa-parva: Krishna–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda (Peace Counsel in the Royal Assembly)

Vaiśaṃpāyana reports that, as the assembled rulers sit in silence, Kṛṣṇa rises and speaks with deliberate public audibility, addressing Dhṛtarāṣṭra as the responsible sovereign. The discourse argues for śama (conciliation) between Kurus and Pāṇḍavas as an attainable policy outcome if the king chooses to act. Kṛṣṇa frames the Kuru lineage as eminent and ethically obligated to embody compassion, non-cruelty, straightforwardness, forbearance, and truth, warning that neglect will allow a severe crisis to destroy the earth’s political order. He assigns agency: peace depends on Dhṛtarāṣṭra and on Kṛṣṇa’s mediation—Dhṛtarāṣṭra should discipline his sons, while Kṛṣṇa will stabilize the opposing side. The speech emphasizes pragmatic statecraft: unity with the Pāṇḍavas increases security and legitimacy, whereas war entails mutual depletion and civilian ruin. Kṛṣṇa also critiques assembly ethics—when dharma is injured by adharma and truth by falsehood under observers, the sabhā itself is morally compromised. He concludes by urging Dhṛtarāṣṭra to grant the Pāṇḍavas their due share, avert large-scale loss, and restore stable governance; the gathered kings inwardly approve, yet none speaks immediately after.

Chapter Arc: रात्रि के अवसान पर विदुर के धर्मार्थकाम-सम्बन्धी विविध वचनों को सुनते हुए श्रीकृष्ण का मन स्थिर और तेजस्वी रहता है—मानो नीति की धारा के बीच स्वयं नीति का स्रोत बैठा हो। → प्रभात होते ही अमिततेजस्वी शौरि राजसभा की ओर प्रस्थान करते हैं। सभाद्वार पर पहुँचकर, कैलास-शिखर के समान रथ से उतरते हैं; भीतर धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोण और समस्त कुरुवृद्ध-युवा उपस्थित हैं। कर्ण और दुर्योधन श्रीकृष्ण के निकट ही एक आसन पर बैठकर अपने ‘अमर्ष’ को दबाए रखते हैं—सभा में शांति के नीचे ज्वाला धधकती है। → माधव मुसकराते हुए धृतराष्ट्र तथा भीष्म-द्रोण आदि को यथावय अभिवादन/संवाद करते हैं; उसी क्षण सभा के मध्य में पीताम्बरधारी श्यामकान्ति श्रीकृष्ण स्वर्णपात्रस्थ नीलमणि के समान दीप्त हो उठते हैं और समस्त राजाओं की दृष्टि अमृत की तरह तृप्त न होने वाली होकर उन्हीं पर टिक जाती है। → सभा-प्रवेश, आसन-व्यवस्था और दृष्टि-केन्द्र का स्थिर होना—दूतकार्य के लिए मंच तैयार हो जाता है: एक ओर धर्मात्मा दूत, दूसरी ओर क्रोध से भरे कर्ण-दुर्योधन, और बीच में मौन प्रतीक्षा करती कुरुसभा। → अब श्रीकृष्ण क्या वचन कहेंगे—क्या यह सभा शांति का द्वार बनेगी या युद्ध का शंख?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वनें श्रीकृष्णवाक्यविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ९३ ॥। [दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २३ “लोक हैं।] अपन क्ाा बछ। अर: 2 चतुर्नवतितमो< ध्याय: दुर्योधन एवं शकुनिके द्वारा बुलाये जानेपर भगवान्‌ श्रीकृष्णका रथपर बैठकर प्रस्थान एवं कौरवसभामें प्रवेश और स्वागतके पश्चात्‌ आसनग्रहण वैशम्पायन उवाच तथा कथयतोरेव तयोरबुद्धिमतोस्तदा । शिवा नक्षत्रसम्पन्ना सा व्यतीयाय शर्वरी,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! उस समय बुद्धिमान श्रीकृष्ण तथा विदुरके इस प्रकार वार्तालाप करते हुए ही वह नक्षत्रोंसे सुशोभित मंगलमयी रात्रि बहुत-सी व्यतीत हो चुकी थी इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णका सभामें प्रवेशविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ९४ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके १० ६ श्लोक मिलाकर कुल ६४ ६ “लोक हैं।] न२््च्स्स्स्ारिस्सि ह्य £:ानप्ट् पञ्चनवतितमो< ध्याय: कौरवसभामें श्रीकृष्णका प्रभावशाली भाषण वैशम्पायन उवाच तेष्वासीनेषु सर्वेषु तूष्णीम्भूतेषु राजसु । वाक्यमभ्याददे कृष्ण: सुदंष्टरो दुन्दुभिस्वन:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ସେ ସମୟରେ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଓ ବିଦୁର ଏହିପରି କଥାବାର୍ତ୍ତା କରୁଥିବାବେଳେ, ନକ୍ଷତ୍ରଶୋଭିତ ସେଇ ମଙ୍ଗଳମୟ ରାତିର ଅଧିକାଂଶ ଅତିବାହିତ ହୋଇଗଲା।

Verse 2

धर्मार्थकामयुक्ताश्च विचित्रार्थपदाक्षरा: । शृण्वतो विविधा वाचो विदुरस्यथ महात्मन:,महात्मा श्रीकृष्ण धर्म, अर्थ और कामके विषयमें अनेक प्रकारकी बातें कहते रहे। उनकी वाणीके पद, अर्थ और अक्षर बड़े विचित्र थे; अतः महात्मा विदुर भगवानकी कही हुई उन विविध वार्ताओंको प्रसन्नता-पूर्वक सुनते रहे। इस प्रकार अमिततेजस्वी श्रीकृष्ण और विदुर दोनों ही एक-दूसरेकी मनोनुकूल कथावार्तामें इतने तन्‍्मय थे कि बिना इच्छाके ही उनकी वह रात्रि बहुत-सी व्यतीत हो गयी थी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାତ୍ମା ବିଦୁର ଶୁଣୁଥିବାବେଳେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଧର୍ମ, ଅର୍ଥ ଓ କାମ ବିଷୟରେ ନାନା ପ୍ରକାରେ କଥା କହୁଥିଲେ। ତାଙ୍କ ବାଣୀର ପଦ, ଅର୍ଥ ଓ ଅକ୍ଷର ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିଚିତ୍ର ଓ ବିବିଧ ଥିଲା; ତେଣୁ ବିଦୁର ଆନନ୍ଦସହିତ ସେହି ବିଭିନ୍ନ ଆଲୋଚନା ଶୁଣୁଥିଲେ।

Verse 3

कथाभिरनुरूपाभि: कृष्णस्यामिततेजस: । अकामस्येव कृष्णस्य सा व्यतीयाय शर्वरी,महात्मा श्रीकृष्ण धर्म, अर्थ और कामके विषयमें अनेक प्रकारकी बातें कहते रहे। उनकी वाणीके पद, अर्थ और अक्षर बड़े विचित्र थे; अतः महात्मा विदुर भगवानकी कही हुई उन विविध वार्ताओंको प्रसन्नता-पूर्वक सुनते रहे। इस प्रकार अमिततेजस्वी श्रीकृष्ण और विदुर दोनों ही एक-दूसरेकी मनोनुकूल कथावार्तामें इतने तन्‍्मय थे कि बिना इच्छाके ही उनकी वह रात्रि बहुत-सी व्यतीत हो गयी थी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଅମିତତେଜସ୍ବୀ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଅନୁରୂପ ସେହି କଥାବାର୍ତ୍ତାରେ ଲୀନ ଥିବାବେଳେ ରାତି କଟିଗଲା; କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଏମିତି ଲାଗିଲା ଯେ ମନେ ହେଲା ଇଚ୍ଛା ନଥିଲେ ମଧ୍ୟ ରାତି ଚାଲିଗଲା। ଧର୍ମ ଓ ସଦାଚାର ବିଷୟକ ପରସ୍ପର ପ୍ରିୟ ଆଲୋଚନାରେ ଦୁହେଁ ଏତେ ତନ୍ମୟ ଥିଲେ ଯେ ସମୟର ଭାନ ରହିଲା ନାହିଁ।

Verse 4

ततस्तु स्वरसम्पन्ना बहव: सूतमागधा: । शड्खदुन्दुभिनिर्घोषै: केशवं प्रत्यवोधयन्‌,तदनन्तर मधुर स्वरसे युता बहुत-से सूत और मागध शंख और दुन्दुभियोंके घोषसे भगवान्‌ श्रीकृष्णको जगाने लगे

ତାପରେ ମଧୁର ସ୍ୱରସମ୍ପନ୍ନ ଅନେକ ସୂତ ଓ ମାଗଧ ଶଙ୍ଖ ଓ ଦୁନ୍ଦୁଭିର ଘୋଷରେ କେଶବଙ୍କୁ ଜଗାଇଲେ।

Verse 5

तत उत्थाय दाशाह ऋषभ: सर्वसात्वताम्‌ | सर्वमावश्यकं चक्रे प्रातःकार्य जनार्दन:,तब समस्त यदुवंशियोंके शिरोमणि दशार्हनन्दन श्रीकृष्णने शय्यासे उठकर प्रात:कालका समस्त आवश्यक कर्म क्रमश: सम्पन्न किया

ତାପରେ ଦାଶାର୍ହମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଓ ସମସ୍ତ ସାତ୍ୱତମାନଙ୍କ ଶିରୋମଣି ଜନାର୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଶୟ୍ୟାରୁ ଉଠି, ପ୍ରାତଃକାଳର ସମସ୍ତ ଆବଶ୍ୟକ କର୍ମ କ୍ରମେ ସମ୍ପନ୍ନ କଲେ।

Verse 6

कृतोदकानुजप्य: स हुताग्नि: समलंकृत: । ततश्नादित्यमुद्यन्तमुपातिषछतत माधव:,संध्या-तर्पण और जप करके अन्निहोत्र करनेके पश्चात्‌ माधवने अलंकृत होकर उदयकालमें सूर्यका उपस्थान किया

ସନ୍ଧ୍ୟା-ତର୍ପଣ ଓ ଜପ ସମାପ୍ତ କରି, ବିଧିପୂର୍ବକ ଅଗ୍ନିହୋତ୍ର କରି ମାଧବ ଅଲଙ୍କୃତ ହେଲେ; ତାପରେ ପ୍ରଭାତେ ଉଦୟମାନ ସୂର୍ଯ୍ୟଙ୍କୁ ଉପସ୍ଥାନ କଲେ।

Verse 7

अथ दुर्योधन: कृष्णं शकुनिश्चापि सौबल: । संध्यां तिष्ठन्तम भ्येत्य दाशाहमपराजितम्‌,इसी समय राजा दुर्योधन और सुबलपुत्र शकुनि भी संध्योपासनामें लगे हुए अपराजित वीर दशार्हनन्दन श्रीकृष्णके पास आये और उनसे इस प्रकार बोले--“गोविन्द! महाराज धृतराष्ट्र सभामें आ गये हैं। भीष्म आदि कौरव तथा अन्य समस्त भूपाल भी वहाँ उपस्थित हैं। जैसे स्वर्गमें देवता इन्द्रका आवाहन करते हैं, इसी प्रकार भीष्म आदि सब लोग आपसे वहाँ दर्शन देनेकी प्रार्थना करते हैं।! यह सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने परम मधुर सान्त्वनापूर्ण वचनद्वारा उन दोनोंका अभिनन्दन किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ତେବେ ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଓ ସୁବଳପୁତ୍ର ଶକୁନି, ସନ୍ଧ୍ୟାଉପାସନାରେ ନିମଗ୍ନ ଦାଶାର୍ହବଂଶୀ ଅପରାଜିତ ବୀର ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସି କହିଲେ— “ଗୋବିନ୍ଦ! ମହାରାଜ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ସଭାକୁ ପ୍ରବେଶ କରିଛନ୍ତି। ଭୀଷ୍ମପ୍ରମୁଖ କୌରବବୃଦ୍ଧମାନେ ଓ ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ରାଜାମାନେ ସେଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ। ଯେପରି ସ୍ୱର୍ଗରେ ଦେବମାନେ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କୁ ଆହ୍ୱାନ କରନ୍ତି, ସେପରି ଭୀଷ୍ମାଦି ସମସ୍ତେ ଆପଣଙ୍କ ଦର୍ଶନ ପାଇଁ ସଭାକୁ ଆସିବାକୁ ପ୍ରାର୍ଥନା କରୁଛନ୍ତି।” ଏହା ଶୁଣି ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମଧୁର ଓ ସାନ୍ତ୍ୱନାପୂର୍ଣ୍ଣ ବଚନରେ ସେ ଦୁଇଜଣଙ୍କୁ ଅଭିନନ୍ଦନ କଲେ।

Verse 8

आचतक्षेतां तु कृष्णस्य धृतराष्ट्रं सभागतम्‌ । कुरूंश्व॒ भीष्मप्रमुखान्‌ राज्ञ: सर्वाश्व पार्थिवान्‌,इसी समय राजा दुर्योधन और सुबलपुत्र शकुनि भी संध्योपासनामें लगे हुए अपराजित वीर दशार्हनन्दन श्रीकृष्णके पास आये और उनसे इस प्रकार बोले--“गोविन्द! महाराज धृतराष्ट्र सभामें आ गये हैं। भीष्म आदि कौरव तथा अन्य समस्त भूपाल भी वहाँ उपस्थित हैं। जैसे स्वर्गमें देवता इन्द्रका आवाहन करते हैं, इसी प्रकार भीष्म आदि सब लोग आपसे वहाँ दर्शन देनेकी प्रार्थना करते हैं।! यह सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने परम मधुर सान्त्वनापूर्ण वचनद्वारा उन दोनोंका अभिनन्दन किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେମାନେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଜଣାଇଲେ— “ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ସଭାକୁ ଆସିଛନ୍ତି। ଭୀଷ୍ମପ୍ରମୁଖ କୁରୁମାନେ ଓ ସମସ୍ତ ରାଜାମାନେ ସେଠାରେ ସମବେତ। ସ୍ୱର୍ଗରେ ଦେବମାନେ ଯେପରି ଶକ୍ରଙ୍କୁ ଆହ୍ୱାନ କରନ୍ତି, ସେପରି ସେମାନେ ଆପଣଙ୍କୁ ଆହ୍ୱାନ କରୁଛନ୍ତି— ଆସି ଦର୍ଶନ ଦିଅନ୍ତୁ।” ଏହା ଶୁଣି ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମଧୁର ଓ ସାନ୍ତ୍ୱନାପୂର୍ଣ୍ଣ ବଚନରେ ସେମାନଙ୍କୁ ସ୍ୱାଗତ କଲେ।

Verse 9

त्वामर्थयन्ते गोविन्द दिवि शक्रमिवामरा: । तावभ्यनन्दद्‌ गोविन्द: साम्ना परमवल्गुना,इसी समय राजा दुर्योधन और सुबलपुत्र शकुनि भी संध्योपासनामें लगे हुए अपराजित वीर दशार्हनन्दन श्रीकृष्णके पास आये और उनसे इस प्रकार बोले--“गोविन्द! महाराज धृतराष्ट्र सभामें आ गये हैं। भीष्म आदि कौरव तथा अन्य समस्त भूपाल भी वहाँ उपस्थित हैं। जैसे स्वर्गमें देवता इन्द्रका आवाहन करते हैं, इसी प्रकार भीष्म आदि सब लोग आपसे वहाँ दर्शन देनेकी प्रार्थना करते हैं।! यह सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने परम मधुर सान्त्वनापूर्ण वचनद्वारा उन दोनोंका अभिनन्दन किया

“ଗୋବିନ୍ଦ! ସ୍ୱର୍ଗରେ ଅମରମାନେ ଯେପରି ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କୁ ପ୍ରାର୍ଥନା କରନ୍ତି, ସେପରି ସେମାନେ ଆପଣଙ୍କୁ ପ୍ରାର୍ଥନା କରୁଛନ୍ତି।” ଏହା ଶୁଣି ଗୋବିନ୍ଦ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମଧୁର ଓ ସାନ୍ତ୍ୱନାପୂର୍ଣ୍ଣ ବଚନରେ ସେ ଦୁଇଜଣଙ୍କୁ ଅଭିନନ୍ଦନ କଲେ।

Verse 10

ततो विमल आदित्ये ब्राह्मणे भ्यो जनार्दन: । ददौ हिरण्यं वासांसि गाश्षाश्वांक्ष परंतप:,तदनन्तर निर्मल सूर्यदेवका उदय हो जानेपर शत्रुओंको संताप देनेवाले भगवान्‌ जनार्दनने ब्राह्मणोंको सुवर्ण, वस्त्र, गौ तथा घोड़े दान किये। अनेक प्रकारके रत्नोंका दान करके खड़े हुए उन अपराजित दाशा्ह वीरके पास जाकर सारथिने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया

ତାପରେ ନିର୍ମଳ ସୂର୍ଯ୍ୟ ଉଦୟ ହେବା ସହ, ଶତ୍ରୁସନ୍ତାପକ ଭଗବାନ ଜନାର୍ଦନ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ସୁବର୍ଣ୍ଣ, ବସ୍ତ୍ର, ଗାଈ ଓ ଘୋଡ଼ା ଦାନ କଲେ।

Verse 11

विसृज्य बहुरत्नानि दाशार्हमपराजितम्‌ । तिष्ठन्तमुपसंगम्य ववन्दे सारथिस्तदा,तदनन्तर निर्मल सूर्यदेवका उदय हो जानेपर शत्रुओंको संताप देनेवाले भगवान्‌ जनार्दनने ब्राह्मणोंको सुवर्ण, वस्त्र, गौ तथा घोड़े दान किये। अनेक प्रकारके रत्नोंका दान करके खड़े हुए उन अपराजित दाशा्ह वीरके पास जाकर सारथिने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया

ବହୁ ପ୍ରକାର ରତ୍ନ ଦାନ କରି, ସେଠାରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଦାଶାର୍ହବଂଶୀ ଅପରାଜିତ ବୀରଙ୍କ ନିକଟକୁ ସାରଥି ଯାଇ, ତାଙ୍କ ପାଦପଦ୍ମରେ ମସ୍ତକ ନମାଇ ପ୍ରଣାମ କଲା।

Verse 12

ततो रथेन शुभ्रेण महता किड्किणीकिना । हयोत्तमयुजा शीघ्रमुपातिषछ्तत दारुक:,इसके बाद क्षुद्र घण्टिकाओंसे विभूषित और उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए चमकीले विशाल रथके साथ दारुक शीघ्र ही भगवान्‌की सेवामें उपस्थित हुआ

ତେବେ ଦାରୁକ ଉତ୍ତମ ଘୋଡ଼ା ଯୋଗାଯୋଗିତ, ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ଓ ବିଶାଳ—କ୍ଷୁଦ୍ର କିଙ୍କିଣୀର ଝଙ୍କାରେ ଶୋଭିତ—ରଥ ସହିତ ଶୀଘ୍ର ଭଗବାନଙ୍କ ସେବାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲା।

Verse 13

(तस्मै रथवरो युक्त: शुशुभे लोकविश्रुत: । वाजिभि: शैब्यसुग्रीवमेघपुष्पबनलाहकै: ।। भगवानके लिये जोतकर खड़ा किया हुआ वह विश्वविख्यात श्रेष्ठ रथ बड़ी शोभा पा रहा था। उसमें शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामवाले चार घोड़े जुते हुए थे। शैब्यस्तु शुकपत्राभ: सुग्रीव: किंशुकप्रभ: । मेघपुष्पो मेघवर्ण: पाण्डुरस्तु बलाहक: ।। उनमेंसे शैब्यका रंग तोतेकी पाँखके समान हरा था। सुग्रीव पलासके फूलकी भाँति लाल था। मेघपुष्पकी कान्ति मेघोंके ही समान थी और बलाहक सफेद था। दक्षिणं चावहच्छैब्य: सुग्रीव: सव्यतो5वहत्‌ । पृष्ठवाहौ तयोरास्तां मेघपुष्पबनलाहकौ ।। शैब्य दाहिने भागमें जुतकर उस रथका वहन करता था और सुग्रीव बाँयें भागमें। मेघपुष्प और बलाहक क्रमश: इनके पीछे जुते हुए थे। वैनतेय: स्थितस्तस्यां प्रभाकरमिव स्पृशन्‌ । तस्य सत्त्ववत: केतौ भुजगारिरशो भत ।। सत्वगुणके अधिष्ठानस्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्णके रथमें लगे हुए ध्वजदण्डकी उस पताकामें सूर्यका स्पर्श करते हुए-से सर्पशत्रु विनतानन्दन गरुड विराज रहे थे। तस्य कीर्तिमतस्तेन भास्वरेण विराजता । शुशुभे स्यन्दनश्रेष्ठ: पतगेन्द्रेण केतुना ।। कीर्तिमान्‌ श्रीकृष्णका वह श्रेष्ठ रथ उस उज्ज्वल एवं प्रकाशमान गरुडथ्वजके द्वारा बड़ी शोभा पा रहा था। रुक्मजालै: पताकाभि: सौवर्णेन च केतुना । बभूव स रथश्रेष्ठ; कालसूर्य इवोदित: ।। सोनेकी जालियों, पताकाओं तथा सुवर्णमय ध्वजके द्वारा भगवान्‌का वह उत्तम रथ प्रलयकालमें उदित हुए सूर्यके समान उद्धासित हो रहा था। पक्षिध्वजवितानैश्न रुक्मजालकृतान्तरै: । दण्डमार्गविभागैश्व सुकृतैर्विश्वकर्मणा ।। प्रवालमणिहेमैश्व मुक्तावैडूर्य भूषणै: । किड्किणीशतसड्चैश्व वालजालकृतान्तरै: ।। कार्तस्वरमयीभिश्न पद्मिनीभिरलंकृत: । शुशुभे स्यन्दनश्रेष्ठस्तापनीयैश्न पादपै: ।। व्याप्रसिंहवराहैश्न गोवृषैर्मुगपक्षिभि: । ताराभिभर्भास्करैश्लापि वारणैश्न हिरण्मयै: ।। वज्ाड्कुशविमानैश्व कूबरावृत्तसंधिषु ।) उस रथके गरुडध्वज, चँदोवे, स्वर्णजालविभूषित मध्यभाग तथा पृथक्‌-पृथक्‌ दण्डमार्गोका विश्वकर्माने सुन्दर ढंगसे निर्माण किया था। प्रवाल (मूँगा), मणि, सुवर्ण, वैदूर्य, मुक्ता आदि विविध आभूषणों, शत-शत क्षुद्रधघण्टिकाओं तथा वालमणिकी झालरोंसे उस रथके अन्तःप्रदेश सुसज्जित किये गये थे। सुवर्णमय कमलिनियों, तपाये हुए सुवर्णके ही वृक्षों तथा व्याप्र, सिंह, वराह, वृषभ, मृग, पक्षी, तारा, सूर्य और हाथियोंकी स्वर्णमयी प्रतिमाओंसे उस श्रेष्ठ रथकी अत्यन्त शोभा हो रही थी। कूबर (युगंधर)-की गोलाकार संधियोंमें वज्ञ, अंकुश तथा विमानकी आकृतियोंसे उस रथको विभूषित किया गया था। तमुपस्थितमाज्ञाय रथं दिव्यं महामना: । महाभ्रघननिर्घोषं सर्वरत्नविभूषितम्‌,महान्‌ सजल मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर शब्द करनेवाले तथा सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित हुए उस दिव्य रथको उपस्थित जान अग्नि एवं ब्राह्मणोंको दाहिने करके, गलेमें कौस्तुभभणि डालकर, अपनी उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित होते हुए, कौरवोंसे घिरकर एवं वृष्णिवंशी वीरोंसे सुरक्षित हो समस्त यादवोंको आनन्द प्रदान करनेवाले महामना शूरनन्दन जनार्दन श्रीकृष्ण उस रथपर आरूढ़ हुए

ତାଙ୍କ ପାଇଁ ପୂର୍ବରୁ ଯୋଗାଯୋଗିତ, ଲୋକବିଖ୍ୟାତ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରଥ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶୋଭା ପାଉଥିଲା। ତାହାରେ ଶୈବ୍ୟ, ସୁଗ୍ରୀବ, ମେଘପୁଷ୍ପ ଓ ବଲାହକ ନାମକ ଚାରି ଘୋଡ଼ା ଯୁକ୍ତ ଥିଲେ।

Verse 14

आने प्रदक्षिणं कृत्वा ब्राह्मणांश्व जनार्दन: । कौस्तुभं मणिमामुच्य श्रिया परमया ज्वलन्‌,महान्‌ सजल मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर शब्द करनेवाले तथा सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित हुए उस दिव्य रथको उपस्थित जान अग्नि एवं ब्राह्मणोंको दाहिने करके, गलेमें कौस्तुभभणि डालकर, अपनी उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित होते हुए, कौरवोंसे घिरकर एवं वृष्णिवंशी वीरोंसे सुरक्षित हो समस्त यादवोंको आनन्द प्रदान करनेवाले महामना शूरनन्दन जनार्दन श्रीकृष्ण उस रथपर आरूढ़ हुए

ଜନାର୍ଦନ ଅଗ୍ନି ଓ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ପ୍ରଦକ୍ଷିଣ କରି; କୌସ୍ତୁଭ ମଣି ଧାରଣ କରି, ପରମ ଶ୍ରୀରେ ଦୀପ୍ତ ହୋଇ ସେଇ ଦିବ୍ୟ ରଥ ସମୀପକୁ ଆସିଲେ।

Verse 15

कुरुभि: संवृतः कृष्णो वृष्णिभिश्चाभिरक्षित: । आतिष्ठत रथं शौरि: सर्वयादवनन्दन:,महान्‌ सजल मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर शब्द करनेवाले तथा सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित हुए उस दिव्य रथको उपस्थित जान अग्नि एवं ब्राह्मणोंको दाहिने करके, गलेमें कौस्तुभभणि डालकर, अपनी उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित होते हुए, कौरवोंसे घिरकर एवं वृष्णिवंशी वीरोंसे सुरक्षित हो समस्त यादवोंको आनन्द प्रदान करनेवाले महामना शूरनन्दन जनार्दन श्रीकृष्ण उस रथपर आरूढ़ हुए

କୁରୁମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଘେରାଯାଇ ଓ ବୃଷ୍ଣିବୀରମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସୁରକ୍ଷିତ, ସମସ୍ତ ଯାଦବଙ୍କୁ ଆନନ୍ଦ ଦେଇଥିବା ଶୌରି ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ସେଇ ରଥରେ ଆରୋହଣ କଲେ।

Verse 16

अन्वारुरोह दाशारईं विदुर: सर्वधर्मवित्‌ । सर्वप्राणभुतां श्रेष्ठ सर्वबुद्धिमतां वरम्‌,समस्त प्राणियोंमें श्रेष्ठ और सम्पूर्ण बुद्धिमानोंमें उत्तम दशार्हनन्दन श्रीकृष्णके पश्चात्‌ समस्त धर्मोंके ज्ञाता विदुरजी भी उस रथपर जा बैठे

ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଓ ସମସ୍ତ ବୁଦ୍ଧିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଉତ୍ତମ ଦାଶାର୍ହନନ୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ପରେ, ସର୍ବଧର୍ମବିଦ୍ ବିଦୁର ମଧ୍ୟ ସେଇ ରଥରେ ଆରୋହଣ କଲେ।

Verse 17

ततो दुर्योधन: कृष्णं शकुनिश्चापि सौबल: । द्वितीयेन रथेनैनमन्वयातां परंतपम्‌,तदनन्तर शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीकृष्णके पीछे-पीछे दुर्योधन और सुबलपुत्र शकुनि भी दूसरे रथपर बैठकर चले

ତାପରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ସନ୍ତାପ ଦେଉଥିବା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଓ ସୁବଳପୁତ୍ର ଶକୁନି ମଧ୍ୟ ଦ୍ୱିତୀୟ ରଥରେ ଚଢ଼ି ଅନୁସରଣ କଲେ।

Verse 18

सात्यकि: कृतवर्मा च वृष्णीनां चापरे रथा: । पृष्ठतो$नुययु: कृष्णं गजैरश्वेः रथैरपि,सात्यकि, कृतवर्मा तथा वृष्णिवंशके दूसरे रथी भी हाथी, घोड़ों तथा रथोंपर बैठकर श्रीकृष्णके पीछे-पीछे गये

ସାତ୍ୟକି ଓ କୃତବର୍ମା, ଏବଂ ବୃଷ୍ଣିବଂଶର ଅନ୍ୟ ରଥୀମାନେ ମଧ୍ୟ—କେହି ହାତୀରେ, କେହି ଘୋଡ଼ାରେ, କେହି ରଥରେ—ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଅନୁଗମନ କଲେ।

Verse 19

तेषां हेमपरिष्कारैर्युक्ता: परमवाजिभि: । गच्छतां घोषिण श्षित्ररथा राजन्‌ विरेजिरे,राजन्‌! उन सबके जाते समय सोनेके आभूषणोंसे विभूषित, उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए एवं गम्भीर घोषयुक्त उनके विचित्र रथ बड़ी शोभा पा रहे थे

ହେ ରାଜନ୍! ସେମାନେ ଯାଉଥିବାବେଳେ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଅଳଙ୍କାରରେ ସୁଶୋଭିତ, ଉତ୍ତମ ଘୋଡ଼ାରେ ଯୁକ୍ତ ଏବଂ ଗମ୍ଭୀର ଘୋଷରେ ନିନାଦିତ ସେମାନଙ୍କ ବିଚିତ୍ର ରଥଗୁଡ଼ିକ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶୋଭା ପାଉଥିଲା।

Verse 20

सम्मृष्टसंसिक्तरज: प्रतिपेदे महापथम्‌ । राजर्षिचरितं काले कृष्णो धीमाडञ्छ़िया ज्वलन्‌,अपनी दिव्य कान्तिसे प्रकाशित होनेवाले परम बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्ण यथासमय उस विशाल राजपथपर जा पहुँचे, जिसपर पूर्वकालके राजर्षि यात्रा करते थे। वहाँकी धूल झाड़ दी गयी थी और सर्वत्र जलसे छिड़काव किया गया था

ନିଜ ଦିବ୍ୟ କାନ୍ତିରେ ଜ୍ୱଳମାନ, ପରମ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯଥାସମୟରେ ସେହି ବିଶାଳ ରାଜପଥକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲେ, ଯାହା ପୂର୍ବକାଳରେ ରାଜର୍ଷିମାନେ ଯାତ୍ରା କରୁଥିଲେ। ସେଠାର ଧୂଳି ଝାଡ଼ି ଦିଆଯାଇଥିଲା ଏବଂ ସର୍ବତ୍ର ଜଳ ଛିଟାଯାଇଥିଲା।

Verse 21

श्रीकृष्णका कौरवस भामें प्रवेश ततः प्रयाते दाशाहिें प्रावाद्यन्तैकपुष्करा: । शड्खाश्न दश्ष्मिरे तत्र वाद्यान्यन्यानि यानि च,भगवान्‌ श्रीकृष्णके प्रस्थान करनेपर ढोल, शंख तथा दूसरे-दूसरे बाजे एक साथ बज उठे

ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିବା ସହିତ ଢୋଲ-ନଗାଡ଼ା ଏକାସାଥିରେ ବାଜି ଉଠିଲା; ସେଠାରେ ଶଙ୍ଖ ଫୁଙ୍କାଗଲା, ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ବାଦ୍ୟମାନେ ମଧ୍ୟ ନିନାଦିତ ହେଲେ।

Verse 22

प्रवीरा: सर्वलोकस्य युवान: सिंहविक्रमा: । परिवार्य रथं शौरेरगच्छन्त परंतपा:,शत्रुओंको संताप देनेवाले, सिंहके समान पराक्रमी तथा सम्पूर्ण जगतके प्रख्यात तरुण वीर भगवान्‌ श्रीकृष्णके रथको घेरकर चलते थे

ସମଗ୍ର ଲୋକରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ, ସିଂହସଦୃଶ ପରାକ୍ରମୀ ଓ ଶତ୍ରୁସନ୍ତାପକ ଯୁବ ବୀରମାନେ ଶୌରି (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କ ରଥକୁ ଘେରି ଅଗ୍ରସର ହେଉଥିଲେ।

Verse 23

ततो<न्ये बहुसाहस्रा विचित्राद्भुतवासस: । असिप्रासायुधधरा: कृष्णस्यासन्‌ पुर:सरा:,श्रीकृष्णके आगे चलनेवाले सैनिकोंकी संख्या कई सहस्र थी। उन सबने विचित्र एवं अद्भुत वस्त्र धारण कर रखे थे। उनके हाथोंमें खड्ग और प्रास आदि आयुध शोभा पाते थे

ତାପରେ କୃଷ୍ଣଙ୍କ ଆଗରେ ଚାଲୁଥିବା ଅନ୍ୟ ଅନେକ ସହସ୍ର ସେନା ଅଗ୍ରସର ହେଲେ। ସେମାନେ ବିଚିତ୍ର ଓ ଅଦ୍ଭୁତ ବସ୍ତ୍ର ପିନ୍ଧିଥିଲେ, ଏବଂ ହାତରେ ଖଡ୍ଗ, ପ୍ରାସ ଆଦି ଆୟୁଧ ଝଲମଲ କରୁଥିଲା।

Verse 24

गजा: पञ्चशतास्तत्र रथाश्चासन्‌ सहस्रश: । प्रयान्तमन्वयुर्वीरं दाशाहमपराजितम्‌,किसीसे पराजित न होनेवाले दशार्हवंशी वीर भगवान्‌ श्रीकृष्णके पीछे उस यात्राके समय पाँच सौ हाथी और सहस्रों रथ जा रहे थे

ସେହି ଯାତ୍ରାବେଳେ କାହାରୁ ଅପରାଜିତ ଦାଶାର୍ହ ବୀର ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ପଛରେ ପାଞ୍ଚଶେ ହାତୀ ଓ ସହସ୍ର ସହସ୍ର ରଥ ଅନୁସରଣ କରୁଥିଲେ।

Verse 25

पुरं कुरूणां संवृत्तं द्रष्टकामं जनार्दनम्‌ । सबालवृद्धं सस्त्रीकं रथ्यागतमरिंदम,शत्रुदमन जनमेजय! उस समय भगवान्‌ श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये बालक, वृद्ध तथा स्त्रियोंसहित कौरवोंका सारा नगर सड़कपर आ गया था

ଶତ୍ରୁଦମନ ଜନମେଜୟ! ସେତେବେଳେ ଜନାର୍ଦନ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କ ଦର୍ଶନ ଇଚ୍ଛାରେ କୌରବମାନଙ୍କ ସମଗ୍ର ନଗର—ଶିଶୁ, ବୃଦ୍ଧ ଓ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହ—ରାସ୍ତାକୁ ଓହ୍ଲାଇ ଆସିଥିଲା।

Verse 26

वेदिकामश्रिताभिक्षू समाक्रान्तान्यनेकश: । प्रचलन्तीव भारेण योषिद्धिर्भवनान्युत,छतोंके सड़ककी ओरवाले भागपर बैठी हुई झुंड-की-झुंड स्त्रियोंके भारसे मानो हस्तिनापुरके वे सारे भवन कम्पित-से हो रहे थे

ରାସ୍ତାମୁହାଁ ଛାତ-ମଞ୍ଚରେ ବସିଥିବା ନାରୀମାନଙ୍କ ଭିଡ଼ର ଭାରରେ ହସ୍ତିନାପୁରର ସେଇ ସମସ୍ତ ଭବନ ମାନୋ କମ୍ପିତ ହେଉଥିଲା।

Verse 27

स पूज्यमान: कुरुभि: संशृण्वन्‌ मधुरा: कथा: । यथाहईं प्रतिसत्कुर्वन्‌ प्रेक्षमाण: शनैर्यया,भगवान्‌ श्रीकृष्ण कौरवोंसे सम्मानित होते हुए, उनकी मीठी-मीठी बातें सुनते हुए और यथायोग्य उनका भी सत्कार करते हुए धीरे-धीरे सबकी ओर देखते जा रहे थे

କୁରୁମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସମ୍ମାନିତ ହୋଇ ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ତାଙ୍କର ମଧୁର କଥା ଶୁଣୁଥିଲେ; ଯଥୋଚିତ ଭାବେ ପ୍ରତିସତ୍କାର କରୁଥିଲେ ଏବଂ ସଂଯମରେ ଧୀରେ ଧୀରେ ସମସ୍ତଙ୍କ ଉପରେ ଦୃଷ୍ଟି ପକାଇ ଆଗେଇ ଯାଉଥିଲେ।

Verse 28

ततः सभां समासाद्य केशवस्यानुयायिन: । सशड्खेैरवेणुनिर्घोषैर्दिश: सर्वा व्यनादयन्‌,कौरवसभाके समीप पहुँचकर श्रीकृष्णके अनुगामी सेवकोंने शंख और वेणु आदि वाद्योंकी ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजा दिया

ତାପରେ ସଭାଗୃହ ସମୀପକୁ ପହଞ୍ଚି କେଶବଙ୍କ ଅନୁୟାୟୀ ସେବକମାନେ ଶଙ୍ଖଧ୍ୱନି, ବେଣୁନାଦ ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ବାଦ୍ୟର ଘୋଷରେ ସମସ୍ତ ଦିଗକୁ ଗୁଞ୍ଜାଇଦେଲେ।

Verse 29

ततः सा समिति: सर्वा राज्ञाममिततेजसाम्‌ | सम्प्राकम्पत हर्षेण कृष्णागमनकाड्क्षया,तत्पश्चात्‌ अमिततेजस्वी राजाओंकी वह सारी सभा भगवान्‌ श्रीकृष्णके शुभागमनकी आकांक्षाके कारण हर्षोल्लाससे चंचल हो उठी

ତାପରେ ଅମିତତେଜସ୍ବୀ ରାଜାମାନଙ୍କ ସେଇ ସମଗ୍ର ସଭା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ଶୁଭାଗମନର ଆକାଙ୍କ୍ଷାରେ ହର୍ଷରେ କମ୍ପି ଉଠି ଚଞ୍ଚଳ ହେଲା।

Verse 30

ततो<भ्याशगते कृष्णे समहृष्यन्‌ नराधिपा: । श्रुत्वा तं रथनिर्घोषं पर्जन्यनिनदोपमम्‌

ତାପରେ କୃଷ୍ଣ ନିକଟକୁ ଆସୁଥିବାବେଳେ ନରାଧିପମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ହର୍ଷିତ ହେଲେ। ବର୍ଷାମେଘର ଗର୍ଜନ ସଦୃଶ ତାଙ୍କ ରଥର ସେଇ ଭୟଙ୍କର ନିନାଦ ଶୁଣି ସମସ୍ତଙ୍କ ମନେ ଉତ୍ସାହ ଜାଗିଉଠିଲା।

Verse 31

आसाद्य तु सभाद्वारमृषभ: सर्वसात्वताम्‌ | अवतीर्य रथाच्छौरि: कैलासशिखरोपमात्‌

ସଭାଦ୍ୱାରକୁ ପହଞ୍ଚି ସମସ୍ତ ସାତ୍ୱତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶୌରି ରଥରୁ ଅବତରିଲେ—ସେଇ ରଥ କୈଲାସ ଶିଖର ସଦୃଶ ଭବ୍ୟ ଥିଲା।

Verse 32

नवमेघप्रतीकाशां ज्वलन्तीमिव तेजसा । महेन्द्रसदनप्रख्यां प्रविवेश सभां तत:

ତେବେ ସେ ସଭାଗୃହରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ—ନବ ମେଘ ପରି ଘନ-ଶ୍ୟାମ, ତଥାପି ତେଜରେ ଯେନ ଜ୍ୱଳନ୍ତ; ଏବଂ ସେ ସଭା ମହେନ୍ଦ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ଭବନ ସଦୃଶ ଭବ୍ୟ ଓ ଦୀପ୍ତିମାନ ଥିଲା।

Verse 33

श्रीकृष्णके निकट आनेपर उनके रथका मेघगर्जनाके समान गम्भीर घोष सुनकर सभी नरेश रोमांचित हो उठे। सभाके द्वारपर पहुँचकर सर्वयादवशिरोमणि भगवान्‌ श्रीकृष्णने कैलासशिखरके समान समुज्ज्वल रथसे नीचे उतरकर नूतन मेघके समान श्याम तथा तेजसे प्रज्वलित-सी होनेवाली इन्द्रभवनतुल्य उस कौरव-सभाके भीतर प्रवेश किया ॥। ३० -३२ ।। पाणोौ गृहीत्वा विदुरं सात्यकिं च महायशा: । ज्योतींष्यादित्यवद्‌ राजन्‌ कुरून्‌ प्राच्छादयज्छ़िया,राजन! जैसे सूर्य अपनी प्रभासे आकाशके तारोंको तिरोहित कर देते हैं, उसी प्रकार महायशस्वी भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपनी दिव्य कान्तिसे कौरवोंको आच्छादित करते हुए विदुर और सात्यकिका हाथ पकड़े सभामें आये

ରାଜନ, ମହାଯଶସ୍ବୀ ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ବିଦୁର ଓ ସାତ୍ୟକିଙ୍କ ହାତ ଧରି କୌରବ-ସଭାରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ। ଯେପରି ସୂର୍ଯ୍ୟ ନିଜ ପ୍ରଭାରେ ଆକାଶର ତାରାମାନଙ୍କୁ ଅଦୃଶ୍ୟ କରେ, ସେପରି ତାଙ୍କ ଦିବ୍ୟ ଶ୍ରୀ-କାନ୍ତିରେ କୌରବମାନେ ଯେନ ଆଚ୍ଛାଦିତ ଓ ମ୍ଲାନ ହୋଇଗଲେ।

Verse 34

अग्रतो वासुदेवस्य कर्णदुर्योधनावुभौ । वृष्णय: कृतवर्मा चाप्यासन्‌ कृष्णस्य पृष्ठत:,वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके आगे-आगे कर्ण और दुर्योधन थे और उनके पीछे कृतवर्मा तथा अन्य वृष्णिवंशी वीर थे

ବାସୁଦେବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କ ଆଗରେ କର୍ଣ୍ଣ ଓ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ—ଦୁହେଁ ଥିଲେ; ଏବଂ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ପଛରେ କୃତବର୍ମା ସହ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ବୃଷ୍ଣିବଂଶୀ ବୀରମାନେ ଥିଲେ।

Verse 35

धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य भीष्मद्रोणादयस्तत: । आसनेभ्यो5चलन्‌ सर्वे पूजयन्तो जनार्दनम्‌,उस समय भीष्म और द्रोणाचार्य आदि सब लोग भगवान्‌ श्रीकृष्णका सम्मान करनेके लिये राजा धृतराष्ट्रको आगे करके अपने आसनोंसे उठकर आगे बढ़े

ତେବେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ଆଗରେ ରଖି ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ ଆଦି ସମସ୍ତେ ଜନାର୍ଦନ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କୁ ପୂଜା-ସତ୍କାର କରିବା ପାଇଁ ନିଜ ନିଜ ଆସନରୁ ଉଠି ଆଗକୁ ବଢ଼ିଲେ।

Verse 36

अभ्यागच्छति दाशाहें प्रज्ञाचक्षुनरिश्वर: । सहैव द्रोणभीष्माभ्यामुदतिष्ठन्महायशा:,ब्छ्खटाए- 00 - >खऋू | दशाहईनन्दन श्रीकृष्णके आते ही महायशस्वी प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्र भीष्म और द्रोणाचार्यके साथ ही उठ गये थे

ଦାଶାର୍ହ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ନିକଟକୁ ଆସିବାମାତ୍ରେ, ମହାଯଶସ୍ବୀ ନରାଧିପ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର—ଚକ୍ଷୁହୀନ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରଜ୍ଞାରେ ଦେଖୁଥିବା—ଭୀଷ୍ମ ଓ ଦ୍ରୋଣଙ୍କ ସହିତ ସହସା ଉଠି ଦାଁଡ଼ାଇଲେ।

Verse 37

उत्तिष्ठति महाराजे धृतराष्टे जनेश्वरे । तानि राजसहस्राणि समुन्तस्थु: समनन्‍्तत:,महाराज धुृतराष्ट्रके उठनेपर वहाँ चारों ओर बैठे हुए सहस्रों नरेश उठकर खड़े हो गये

ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କର ସ୍ୱାମୀ ମହାରାଜ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଉଠି ଦାଁଡ଼ାହେବା ସହିତ, ଚାରିଦିଗରେ ବସିଥିବା ସେହି ସହସ୍ର ରାଜାମାନେ ମଧ୍ୟ ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ଉଠି ଦାଁଡ଼ାହେଲେ।

Verse 38

आसन सर्वतोभद्रं जाम्बूनदपरिष्कृतम्‌ । कृष्णार्थे कल्पितं तत्र धृतराष्ट्रस्य शासनात्‌,राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञासे वहाँ भगवान्‌ श्रीकृष्णके लिये सुवर्णभूषित सर्वतोभद्र नामक सिंहासन रखा गया था

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ସେଠାରେ କୃଷ୍ଣଙ୍କ ପାଇଁ ‘ସର୍ବତୋଭଦ୍ର’ ନାମକ, ଶୁଦ୍ଧ ସୁବର୍ଣ୍ଣରେ ଶୋଭିତ ଏକ ସିଂହାସନ ସଜାଯାଇଥିଲା।

Verse 39

स्मयमानस्तु राजानं भीष्मद्रोणौ च माधव: । अभ्यभाषत धर्मात्मा राज्ञश्नान्यान्‌ यथावय:,उस समय धर्मात्मा भगवान्‌ श्रीकृष्णने मुसकराते हुए राजा धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोणाचार्य तथा अवस्थाके अनुसार अन्य राजाओंसे भी वार्तालाप किया

ସେତେବେଳେ ଧର୍ମାତ୍ମା ମାଧବ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ହସିମୁହଁରେ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ, ଏବଂ ଭୀଷ୍ମ-ଦ୍ରୋଣଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କଲେ; ତଥା ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ପଦମର୍ଯ୍ୟାଦା ଓ ବୟସ ଅନୁସାରେ ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନଙ୍କ ସହିତ ମଧ୍ୟ କଥା ହେଲେ।

Verse 40

तत्र केशवमानर्चु: सम्यगभ्यागतं सभाम्‌ । राजान: पार्थिवा: सर्वे कुरवश्च जनार्दनम्‌,वहाँ सभामें पधारे हुए भगवान्‌ श्रीकृष्णका भूमण्डलके राजाओं तथा सभी कौरवोंने भलीभाँति पूजन किया

ସେଠାରେ ସଭାକୁ ଯଥାବିଧି ଆସିଥିବା ଜନାର୍ଦନ କେଶବଙ୍କୁ ପୃଥିବୀର ସମସ୍ତ ରାଜା ଓ କୌରବମାନେ ଯଥୋଚିତ ଭାବେ ପୂଜା-ସତ୍କାର କଲେ।

Verse 41

तत्र तिष्ठन्‌ स दाशाहों राजमध्ये परंतप: । अपश्यदन्तरिक्षस्थानृषीन्‌ परपुरंजय: । ततस्तानभिससम्प्रेक्ष्य नारदप्रमुखानृषीन्‌,राजाओंके बीचमें खड़े हुए शत्रुनगरविजयी परंतप श्रीकृष्णने देखा कि आकाशमें कुछ ऋषि-मुनि खड़े हैं। उन नारद आदि महर्षियोंको देखकर श्रीकृष्णने धीरेसे शान्तनुनन्दन भीष्मसे कहा-- “नरेश्वर! इस राजसभाको देखनेके लिये ऋषिगण पधारे हैं

ରାଜାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଦାଁଡ଼ାଇଥିବା ଦାଶାର୍ହ ପରନ୍ତପ, ଶତ୍ରୁପୁରବିଜୟୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଆକାଶରେ ଅବସ୍ଥିତ କିଛି ଋଷିଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ। ପରେ ନାରଦ-ପ୍ରମୁଖ ସେହି ମହର୍ଷିମାନଙ୍କୁ ସାବଧାନରେ ନିରୀକ୍ଷଣ କଲେ।

Verse 42

अभ्यभाषत दाशार्हों भीष्म शान्तनवं शनै: । पार्थिवीं समितिं द्रष्टमूषयो$भ्यागता नूप,राजाओंके बीचमें खड़े हुए शत्रुनगरविजयी परंतप श्रीकृष्णने देखा कि आकाशमें कुछ ऋषि-मुनि खड़े हैं। उन नारद आदि महर्षियोंको देखकर श्रीकृष्णने धीरेसे शान्तनुनन्दन भीष्मसे कहा-- “नरेश्वर! इस राजसभाको देखनेके लिये ऋषिगण पधारे हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଦାଶାର୍ହ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଶାନ୍ତନୁନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ଧୀରେ କହିଲେ— “ନରେଶ୍ୱର! ଏହି ରାଜସଭା ଦେଖିବାକୁ ଋଷିଗଣ ଆସିଛନ୍ତି।” ଆକାଶରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ନାରଦାଦି ମହର୍ଷିମାନଙ୍କୁ ଦେଖି, ରାଜନୈତିକ ଚର୍ଚ୍ଚା ଓ ସମୀପ ଯୁଦ୍ଧ ମଧ୍ୟ ଉଚ୍ଚ ଧର୍ମ-ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ଦୃଷ୍ଟିରେ ସାକ୍ଷୀଭାବେ ଦେଖାଯାଉଛି ବୋଲି କୃଷ୍ଣ ସୂଚନା ଦେଲେ।

Verse 43

निमन्त्रयन्तामासनैश्नव सत्कारेण च भूयसा । नैतेष्वनुपविष्टेषु शक्यं केनचिदासितुम्‌,“इन्हें अत्यन्त सत्कारपूर्वक आसन देकर निमन्त्रित किया जाय, क्योंकि इनके बैठे बिना कोई भी बैठ नहीं सकता

ନୂତନ ଆସନ ଦେଇ ଅଧିକ ସତ୍କାର ସହିତ ସେମାନଙ୍କୁ ଆମନ୍ତ୍ରଣ କରି ବସାଯାଉ; କାରଣ ସେମାନେ ବସିନଥିଲେ କେହି ବସିପାରିବେ ନାହିଁ।

Verse 44

पूजा प्रयुज्यतामाशु मुनीनां भावितात्मनाम्‌ | ऋषीउ्छान्तनवो दृष्टवा सभाद्वारमुपस्थितान्‌

ଭାବିତାତ୍ମା ମୁନିମାନଙ୍କୁ ଶୀଘ୍ର ପୂଜା-ସତ୍କାର ଦିଆଯାଉ। ସଭାଦ୍ୱାରେ ଉପସ୍ଥିତ ଋଷିମାନଙ୍କୁ ଦେଖି ଶାନ୍ତନୁନନ୍ଦନ (ଭୀଷ୍ମ) ଏହି କଥା କହିଲେ।

Verse 45

त्वरमाणस्ततो भृत्यानासनानीत्यचोदयत्‌ | “पवित्र अन्तःकरणवाले इन मुनियोंकी शीघ्र पूजा की जानी चाहिये।” शान्तनुनन्दन भीष्मने मुनियोंको देखकर सभाद्वारपर स्थित हुए राजकर्मचारियोंको बड़ी उतावलीके साथ आज्ञा दी--'अरे! आसन लाओ' || ४४ ह ।। आसनान्यथ मृष्टानि महान्ति विपुलानि च

ତାପରେ ସେ ତ୍ୱରାନ୍ୱିତ ହୋଇ ଭୃତ୍ୟମାନଙ୍କୁ ଆସନ ଆଣିବାକୁ ଆଦେଶ ଦେଲେ— “ପବିତ୍ର ଅନ୍ତଃକରଣବାନ ଏହି ମୁନିମାନଙ୍କୁ ବିଳମ୍ବ ନକରି ପୂଜା-ସତ୍କାର କରିବା ଉଚିତ; ଏହେ! ଆସନ ଆଣ।” ତା’ପରେ ଭଲଭାବେ ମଜାଇଥିବା, ବଡ଼ ଓ ବିଶାଳ ଆସନ ଆଣାଗଲା।

Verse 46

तेषु तत्रोपविष्टेषु गृहीतार्ष्यषु भारत

ହେ ଭାରତ! ସେମାନେ ସେଠାରେ ଉପବିଷ୍ଟ ହେଲେ ଏବଂ ଋଷି-ସମ୍ମତ ଆଚାର-ବିଧି ଗ୍ରହଣ ହେଲା ପରେ…

Verse 47

दुःशासन: सात्यकये ददावासनमुत्तमम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଦୁଃଶାସନ ସାତ୍ୟକିଙ୍କୁ ଉତ୍ତମ ଆସନ ଦେଲା; ତୀବ୍ର ଆଲୋଚନାର ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱୀ ପକ୍ଷମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶିଷ୍ଟାଚାର ଓ ଆତିଥ୍ୟର ବାହ୍ୟ ମର୍ଯ୍ୟାଦା ରହିଲା।

Verse 48

अविदूरे तु कृष्णस्य कर्णदुर्योधनावुभौ

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କୃଷ୍ଣଙ୍କ ଅବିଦୂରେ କର୍ଣ୍ଣ ଓ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ—ଉଭୟ ଥିଲେ; ସଂଘର୍ଷର ନିର୍ଣ୍ଣାୟକ ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ କୃଷ୍ଣଙ୍କ ଚାରିପାଖେ ନେତାମାନେ ଏକତ୍ର ହେବା ସମୟରେ ତାଙ୍କର ସନ୍ନିହିତ ଉପସ୍ଥିତି ପ୍ରଭାବ ପକାଇଲା।

Verse 49

गान्धारराज: शकुनिर्गान्धारैरभिरक्षित:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଗାନ୍ଧାରରାଜ ଶକୁନି ଗାନ୍ଧାରୀୟମାନଙ୍କ ରକ୍ଷାରେ ସୁରକ୍ଷିତ ଥିଲେ; ଏହା ତାଙ୍କର ନିଶ୍ଚିତ ସ୍ଥିତି ଓ ନିଜ ଲୋକଙ୍କ ସଂଗଠିତ ସମର୍ଥନକୁ ସୂଚାଇଲା।

Verse 50

विदुरो मणिपीठे तु शुक्लस्पर्ध्याजिनोत्तरे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବିଦୁର ମଣିମୟ ପୀଠରେ ଉପବିଷ୍ଟ ଥିଲେ ଏବଂ ନିର୍ମଳ ଶ୍ୱେତ ମୃଗଚର୍ମ ପରିଧାନ କରିଥିଲେ; ତାଙ୍କ ଭଙ୍ଗୀରେ ତପସ୍ବୀୟ ଗରିମା ଥିଲା—ସଂଯମ ଓ ଧର୍ମବୁଦ୍ଧିରେ ଚାଳିତ ଜୀବନର ସୂଚନା।

Verse 51

संस्पृशन्नासनं शौरेमहामतिरुपाविशत्‌ । परम बुद्धिमान्‌ विदुर भगवान्‌ श्रीकृष्णके आसनका स्पर्श करते हुए एक मणिमय चौकीपर, जिसके ऊपर श्वैत रंगका स्पृहणीय मृगचर्म बिछाया गया था, बैठे थे || ५० हू ।। चिरस्य दृष्टवा दाशाह राजान: सर्व एव ते

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଆସନକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରି ମହାମତି ଶୌରି (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ଉପବିଷ୍ଟ ହେଲେ। ପରମବୁଦ୍ଧିମାନ ବିଦୁର ମଧ୍ୟ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ପାଇଁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ଆସନକୁ ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ସ୍ପର୍ଶ କରି, ଶ୍ୱେତ ମୃଗଚର୍ମ ପତିତ ମଣିମୟ ଚୌକିରେ ବସିଲେ। ଦୀର୍ଘକାଳ ପରେ ଦାଶାର୍ହଙ୍କୁ ଦେଖି ସେଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ସମସ୍ତ ରାଜା ଏକାଗ୍ର ହେଲେ।

Verse 52

अतसीपुष्पसंकाश: पीतवासा जनार्दन:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଅଲସୀ ଫୁଲ ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ, ପୀତବସ୍ତ୍ରଧାରୀ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ଶାନ୍ତ ଓ ମଙ୍ଗଳମୟ ତେଜରେ ଯୁକ୍ତ ହୋଇ ପ୍ରକଟ ହେଲେ—ଯୁଦ୍ଧକୁ ନେଇଯାଉଥିବା ତଣାପୋଡ଼ ମଧ୍ୟରେ ଦିବ୍ୟ ପଥପ୍ରଦର୍ଶନ ଓ ଧର୍ମସ୍ଥିରତାର ସଙ୍କେତ ସ୍ୱରୂପ।

Verse 53

व्यभ्राजत सभाम ध्ये हेम्नीवोपहितो मणि:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସଭାମଧ୍ୟରେ ସେ ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣରେ ଜଡିତ ମଣି ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ ଥିଲେ; ବୃଦ୍ଧମାନେ ଓ ରାଜାମାନେ ଏକତ୍ର ଥିବା ସେଇ ସଦସରେ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କର ଗମ୍ଭୀର ଗୌରବ ଅତ୍ୟଧିକ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ହୋଇ ଦିଶୁଥିଲା।

Verse 54

अलसीके फूलकी भाँति मनोहर श्याम कान्तिवाले पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण उस सभाके मध्यभागमें स्वर्ण-पात्रमें रखी हुई नीलमणिके समान शोभा पा रहे थे ।। ततस्तृष्णीं सर्वमासीद्‌ गोविन्दगतमानसम्‌ | न तत्र कश्चित्‌ किज्चिद्‌ वा व्याजहार पुमान्‌ क्वचित्‌,उस समय वहाँ सबका मन भगवान्‌ गोविन्दमें ही लगा हुआ था। अतः सभी चुपचाप बैठे थे। कोई मनुष्य कहीं कुछ भी बोल नहीं रहा था

ଅଲସୀ ଫୁଲ ପରି ମନୋହର ଶ୍ୟାମକାନ୍ତିଧାରୀ, ପୀତାମ୍ବରଧାରୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ସଭାର ମଧ୍ୟଭାଗରେ ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣପାତ୍ରରେ ରଖା ନୀଳମଣି ପରି ଶୋଭା ପାଉଥିଲେ। ତାପରେ ସବୁକିଛି ନିରବ ହୋଇଗଲା; କାରଣ ସମସ୍ତଙ୍କ ମନ ଗୋବିନ୍ଦରେ ଲୀନ ହୋଇଥିଲା। ସେଇ ସଭାରେ କେଉଁଠି ମଧ୍ୟ କେହି ଏକ ଶବ୍ଦ ମଧ୍ୟ କହିଲେ ନାହିଁ।

Verse 94

इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णस भाप्रवेशे चतुर्नवतितमो< ध्याय:

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ସଭାପ୍ରବେଶ ବର୍ଣ୍ଣନାକରୁଥିବା ଚତୁର୍ନବତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।

Verse 456

मणिकाजउ्चनचित्राणि समाजहुस्ततस्ततः । तब सेवकोंने इधर-उधरसे मणि एवं सुवर्ण जड़े हुए शुद्ध, विशाल एवं विस्तृत आसन लाकर रख दिये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ସେବକମାନେ ନାନା ଦିଗରୁ ମଣି ଓ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଜଡିତ, ଶୁଚି, ବିଶାଳ ଓ ବିସ୍ତୃତ ଆସନଗୁଡ଼ିକୁ ଶୀଘ୍ର ସଂଗ୍ରହ କରି ଆଣି ଯଥାସ୍ଥାନରେ ରଖିଦେଲେ।

Verse 466

निषसादासने कृष्णो राजानश्व यथासनम्‌ | भारत! अर्घ्य ग्रहण करके जब ऋषिलोग उन आसनोंपर बैठ गये, तब भगवान्‌ श्रीकृष्ण तथा अन्य राजाओंने भी अपना-अपना आसन ग्रहण किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କୃଷ୍ଣ ନିଜ ଆସନରେ ବସିଲେ, ରାଜାମାନେ ମଧ୍ୟ ଯଥାଯଥ ଭାବେ ନିଜ-ନିଜ ସ୍ଥାନରେ ଆସୀନ ହେଲେ। ହେ ଭାରତବଂଶଜ! ଋଷିମାନେ ଅର୍ଘ୍ୟ ଗ୍ରହଣ କରି ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ଆସନରେ ବସିବା ପରେ, ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଓ ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନେ ମଧ୍ୟ ନିଜ-ନିଜ ଆସନ ଗ୍ରହଣ କଲେ।

Verse 476

विविंशतिर्ददौ पीठं काज्चनं कृतवर्मणे । दुःशासनने सात्यकिको उत्तम आसन दिया एवं विविंशतिने कृतवर्माको स्वर्णमय आसन प्रदान किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବିବିଂଶତି କୃତବର୍ମାଙ୍କୁ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ପୀଠ ଦେଲେ। ଦୁଃଶାସନ ସାତ୍ୟକିଙ୍କୁ ଉତ୍ତମ ଆସନ ପ୍ରଦାନ କଲେ।

Verse 486

एकासने महात्मानौ निषीदतुरमर्षणौ । अमर्षमें भरे हुए महामना कर्ण और दुर्योधन दोनों एक आसनपर श्रीकृष्णके पास ही बैठे थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଅମର୍ଷରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ସେଇ ଦୁଇ ମହାତ୍ମା, କର୍ଣ୍ଣ ଓ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ନିକଟରେ ଏକେ ଆସନରେ ବସିଲେ।

Verse 496

निषसादासने राजा सहतपुत्रो विशाम्पते । जनमेजय! गान्धारदेशीय सैनिकोंसे सुरक्षित पुत्रसहित गान्धारराज शकुनि भी एक आसनपर बैठा था

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ପ୍ରଜାଧିପତି ରାଜା ନିଜ ପୁତ୍ର ସହିତ ନିଜ ଆସନରେ ବସିଲେ। ଗାନ୍ଧାରଦେଶୀୟ ସୈନିକମାନଙ୍କ ରକ୍ଷାରେ ଥିବା ଗାନ୍ଧାରରାଜ ଶକୁନି ମଧ୍ୟ ନିଜ ପୁତ୍ର ସହିତ ଏକେ ଆସନରେ ବସିଲେ।

Verse 513

अमृतस्येव नातृप्यन्‌ प्रेक्षमाणा जनार्दनम्‌ | सब राजा दीर्घकालके पश्चात्‌ दशार्हकुलभूषण भगवान्‌ जनार्दनको देखकर उन्हींकी ओर एकटक दृष्टि लगाये रहे, मानो अमृत पी रहे हों। इस प्रकार उन्हें तृप्ति ही नहीं होती थी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନାର୍ଦନଙ୍କୁ ଏକଟକ ଦେଖୁଥିବା ସେ ରାଜା ତୃପ୍ତ ହେଉନଥିଲେ; ଯେପରି ଅମୃତ ପାନ କଲେ ମଧ୍ୟ ତୃପ୍ତି ହୁଏନାହିଁ। ଦୀର୍ଘକାଳ ପରେ ଦଶାର୍ହକୁଳଭୂଷଣ ଭଗବାନ ଜନାର୍ଦନଙ୍କ ଦର୍ଶନ ପାଇ ସେ ତାଙ୍କ ପ୍ରତି ଦୃଷ୍ଟି ଅଟକାଇ ରଖିଲେ—ମନେ ହେଲା ଯେନ ଅମୃତର ଆସ୍ୱାଦ ନେଉଛନ୍ତି; ତଥାପି ତାଙ୍କର ତୃପ୍ତି ହେଲା ନାହିଁ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether the sovereign will enforce lawful restraint within his own family—granting a just settlement and curbing harmful ambition—or allow partiality and inaction to convert a resolvable succession dispute into widespread destruction.

Governance is ethical agency: peace is achievable when rulers choose truth, restraint, and public welfare over short-term acquisition. Institutional silence in the face of wrongdoing is portrayed as a failure of dharma, not neutrality.

No explicit phalaśruti is stated in this passage; instead, the chapter uses consequentialist meta-commentary—warning that ignored counsel and assembly complicity lead to systemic harm—thereby underscoring the interpretive value of dharma-centered political judgment.