
Udyoga-parva Adhyāya 71 — Kṣatra-dharma Counsel, Public Legitimacy, and Mobilization
Upa-parva: Udyoga-parva — Strategic Counsel and War-Readiness Discourse (Chapter 71 context)
A senior authoritative voice addresses Yudhiṣṭhira after receiving Sañjaya’s report, stating that the speaker understands both parties’ intentions: Yudhiṣṭhira’s mind is dharma-oriented, whereas the Dhārtarāṣṭras are driven by hostility and acquisitiveness. The discourse argues that what can be obtained without conflict may be preferable, yet sustained compromise is not a stable duty for a kṣatriya; victory or death in sanctioned combat is presented as fate-allotted, and cowardice is rejected. The speaker warns that continued softness will invite further seizure of the kingdom and that the opposing party will not satisfy Yudhiṣṭhira’s aims out of compassion, fear, or dharmic reasoning. The text recalls the deception in the dice episode in the presence of elders, emphasizing Duryodhana’s shamelessness and the wider assembly’s disapproval; reputational condemnation is treated as politically decisive. The speaker proposes to remove ambiguity among kings by publicly stating Yudhiṣṭhira’s virtues and the adversary’s transgressions, including in civic gatherings. Finally, the chapter pivots to practical readiness: signs and omens are described as severe; armaments, armor, chariots, standards, elephants and horses are to be made ready; and it is asserted that Duryodhana will not return the previously seized kingdom while alive.
Chapter Arc: उद्योग-पर्व के निर्णायक मोड़ पर युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से अपने हृदय का अभिप्राय निवेदित करते हैं—अब वही समय है जब मित्रों के मित्रवत्सल केशव को आगे बढ़कर संकट-तारण करना चाहिए। → युधिष्ठिर धृतराष्ट्र की पुत्र-गृद्धि और लोभ-ग्रस्त अंधता का चित्र खींचते हैं—राजा स्वधर्म नहीं देख पा रहा, और दुर्योधन के वश में होकर अनुचित शासन का अनुसरण कर रहा है। वे युद्ध के अनिवार्य परिणामों पर भी विचार रखते हैं: धन-सम्पत्ति का नाश मृत्यु से भी बड़ी आपदा बन जाता है; युद्ध में प्रायः वही धीर, दयालु, लज्जाशील श्रेष्ठ जन मारे जाते हैं; और विजय के बाद भी निर्वेद (जीवन से विरक्ति) घेर लेता है। → युधिष्ठिर केशव से स्पष्ट निवेदन करते हैं कि इस ‘अर्थकृच्छ’ (अत्यंत कठिन) स्थिति में वे पुरुषोत्तम के अतिरिक्त किसी और से पूछने योग्य नहीं—और कृष्ण को धर्म-संगत, युक्तियुक्त, हितकर वचन बोलने का अधिकार सौंपते हैं: चाहे सान्त्व (समझौता) हो या कठोर नीति, जो धर्म से संयुक्त हो वही कहें। → कृष्ण-शरणागति का स्वर दृढ़ होता है—पाण्डव माधव का आश्रय लेकर निर्भय हैं और यदि धर्म की रक्षा हेतु युद्ध अनिवार्य हो तो भी वे उसे स्वीकार करने को तैयार हैं; साथ ही कृष्ण को कौरव-सभा में दूत बनकर जाने का नैतिक-राजनीतिक दायित्व सौंपा जाता है। → कृष्ण के वचन और दूत-यात्रा की दिशा तय हो चुकी है—अब प्रश्न यह है कि धृतराष्ट्र-दुर्योधन की सभा धर्मयुक्त सलाह को स्वीकार करेगी या विनाश की ओर बढ़ेगी।
Verse 1
ऑपन--माजल बछ। अफ<-जआकऋज (भगवदयानपर्व) द्विसप्ततितमो< ध्याय: युधिष्ठटिरका बरस ष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका १ बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप वैशम्पायन उवाच संजये प्रतियाते तु धर्मराजो युधिष्ठिर: । (अर्जुनं भीमसेनं च माद्रीपुत्री च भारत । विराटद्रुपदौ चैव केकयानां महारथान् ।। अब्रवीदुपसड्रम्य शड्खचक्रगदाधरम् ।। अभियाचामहे गत्वा प्रयातुं कुरुसंसदम् । वैशम्पायनजी कहते हैं--भारत! इधर संजयके चले जानेपर धर्मराज युधिष्ठिरने भीमसेन, अर्जुन, माद्रीकुमार नकुल-सहदेव, विराट, द्रपद तथा केकयदेशीय महारथियोंके पास जाकर कहा--'हमलोग शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके पास चलकर उनसे कौरवसभामें जानेके लिये प्रार्थना करें। यथा भीष्मेण द्रोणेन बाह्लीकेन च धीमता ।। अन्यैश्न कुरुभि: सार्ध न युध्येमहि संयुगे । “वे वहाँ जाकर ऐसा प्रयत्न करें, जिससे हमें भीष्म, ट्रोण, बुद्धिमान् बाह्नीक तथा अन्य कुरुवंशियोंके साथ रणक्षेत्रमें युद्ध न करना पड़े। एष न: प्रथम: कल्प एतन्न: श्रेय उत्तमम् ।। एवमुक्ता: सुमनसस्ते5भिजम्मुर्जनार्दनम् । “यही हमारा पहला ध्येय है और यही हमारे लिये परम कल्याणकी बात है।” राजा युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर वे सब लोग प्रसन्नचित्त होकर भगवान् श्रीकृष्णके समीप गये। पाण्डवै: सह राजानो मरुत्वन्तमिवामरा: ।। तदा च दुःसहा: सर्वे सदस्यास्ते नरर्षभा: । उस समय शत्रुओंके लिये दुःसह प्रतीत होनेवाले वे सभी नरश्रेष्ठ सभासद् भूपालगण पाण्डवोंके साथ श्रीकृष्णके निकट उसी प्रकार गये, जैसे देवता इन्द्रके पास जाते हैं। जनार्दनं समासाद्य कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: ।। ) अभ्यभाषत दाशार्हमृषभं सर्वसात्वताम्,समस्त यदुवंशियोंमें श्रेष्ठ दशारहकुलनन्दन जनार्दन श्रीकृष्णके पास पहुँचकर कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने इस प्रकार कहा--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସଞ୍ଜୟ ଚାଲିଯାଇଥିବା ପରେ ଧର୍ମରେ ଅଟୁଟ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଅର୍ଜୁନ, ଭୀମସେନ, ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର ନକୁଳ-ସହଦେବ, ଏବଂ ବିରାଟ, ଦ୍ରୁପଦ ଓ କେକୟଦେଶର ମହାରଥୀମାନଙ୍କୁ ସମୀପ କରି, ଶଙ୍ଖ-ଚକ୍ର-ଗଦାଧାରୀ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ବିଷୟରେ କହିଲେ—“ଆସ, ଆମେ ଯାଇ ତାଙ୍କୁ କୁରୁସଭାକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିବାକୁ ବିନୟରେ ପ୍ରାର୍ଥନା କରିବା। ସେଠାରେ ସେ ଏମିତି ପ୍ରୟାସ କରନ୍ତୁ ଯେ ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, ବୁଦ୍ଧିମାନ ବାହ୍ଲୀକ ଓ ଅନ୍ୟ କୁରୁମାନଙ୍କ ସହ ରଣଭୂମିରେ ଆମକୁ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ନ ପଡ଼ୁ। ଏହା ଆମର ପ୍ରଥମ ସଙ୍କଳ୍ପ; ଏହାହିଁ ଆମ ପାଇଁ ପରମ ଶ୍ରେୟ।” ଏମିତି କହିବା ପରେ ସେମାନେ ଆନନ୍ଦଚିତ୍ତରେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲେ। ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଦୁର୍ଧର୍ଷ ସେଇ ରାଜାମାନେ ଓ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ସଭାସଦମାନେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ କୃଷ୍ଣଙ୍କ ନିକଟକୁ ଏମିତି ଗଲେ, ଯେପରି ଦେବମାନେ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଆନ୍ତି। ଜନାର୍ଦ୍ଦନଙ୍କୁ ପହଞ୍ଚି କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସମସ୍ତ ସାତ୍ୱତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦାଶାର୍ହ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କଲେ।
Verse 2
अयं स काल: सम्प्राप्तो मित्राणां मित्रवत्सल | न च त्वदन्यं पश्यामि यो न आपत्सु तारयेत्,“मित्रवत्सल श्रीकृष्ण! मित्रोंकी सहायताके लिये यही उपयुक्त अवसर आया है। मैं आपके सिवा दूसरे किसीको ऐसा नहीं देखता, जो इस विपत्तिसे हमलोगोंका उद्धार करे
“ମିତ୍ରବତ୍ସଳ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ମିତ୍ରମାନଙ୍କୁ ସାହାଯ୍ୟ କରିବାର ଏହି ନିର୍ଣ୍ଣାୟକ ସମୟ ଏବେ ଆସିପହଞ୍ଚିଛି। ଏହି ବିପଦରୁ ଆମକୁ ଉଦ୍ଧାର କରିପାରିବେ—ଆପଣ ଛଡ଼ା ଅନ୍ୟ କାହାକୁ ମୁଁ ଦେଖୁନାହିଁ।”
Verse 3
त्वां हि माधवमश्रित्य निर्भया मोघदर्पितम् । धार्तराष्ट्रं सहामात्यं स्वयं समनुयुड्क्ष्महे,“आप माधवकी शरणमें आकर हम सब लोग निर्भय हो गये हैं और व्यर्थ ही घमंड दिखानेवाले धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन तथा उसके मन्त्रियोंको हम स्वयं युद्धके लिये ललकार रहे हैं
“ମାଧବ! ଆପଣଙ୍କ ଶରଣ ନେଇ ଆମେ ନିର୍ଭୟ ହୋଇଛୁ; ଅର୍ଥହୀନ ଦର୍ପ ଦେଖାଉଥିବା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ତାଙ୍କ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହ ଆମେ ନିଜେ ଯୁଦ୍ଧକୁ ଆହ୍ୱାନ କରୁଛୁ।”
Verse 4
यथा हि सर्वास्वापत्सु पासि वृष्णीनरिंदम । तथा ते पाण्डवा रक्ष्या: पाह्ुस्मानू महतो भयात्,'शत्रुदमन! जैसे आप वृष्णिवंशियोंकी सब प्रकारकी आपत्तियोंसे रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आपको पाण्डवोंकी भी रक्षा करनी चाहिये। प्रभो! इस महान् भयसे आप हमारी रक्षा कीजिये'
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ଶତ୍ରୁଦମନ! ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଆପତ୍ତିରେ ଆପଣ ଯେପରି ବୃଷ୍ଣିବଂଶକୁ ରକ୍ଷା କରନ୍ତି, ସେପରି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଆପଣଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରିବା ଉଚିତ। ପ୍ରଭୁ! ଏହି ମହାଭୟରୁ ଆମକୁ ରକ୍ଷା କରନ୍ତୁ।”
Verse 5
श्रीभगवानुवाच अयमस्मि महाबाहो ब्रूहि यत् ते विवक्षितम् | करिष्यामि हि तत् सर्व यत् त्वं वक्ष्यसि भारत,श्रीभगवान् बोले--महाबाहो! यह मैं आपकी सेवाके लिये सर्वदा प्रस्तुत हूँ। आप जो कुछ कहना चाहते हों, कहें। भारत! आप जो-जो कहेंगे, वह सब कार्य मैं निश्चय ही पूर्ण करूँगा
ଶ୍ରୀଭଗବାନ କହିଲେ—“ମହାବାହୋ! ମୁଁ ଏଠାରେ ପ୍ରସ୍ତୁତ; ତୁମେ ଯାହା କହିବାକୁ ଚାହୁଁଛ, କହ। ହେ ଭାରତ! ତୁମେ ଯାହା ଆଦେଶ କରିବ, ସେ ସବୁ ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ ପୂରଣ କରିବି।”
Verse 6
युधिछिर उवाच श्रुतं ते धृतराष्ट्रस्य सपुत्रस्य चिकीर्षितम् । एतद्धि सकलं॑ कृष्ण संजयो मां यदब्रवीत्,युधिष्ठिरने कहा--श्रीकृष्ण! पुत्रोंसहित राजा धृतराष्ट्र क्या करना चाहते हैं, यह सब तो आपने सुन ही लिया। संजयने मुझसे जो कुछ कहा है, वह धृतराष्ट्रका ही मत है। संजय धृतराष्ट्रका अभिन्नस्वरूप होकर आया था। उसने उन्हींके मनोभावको प्रकाशित किया है। दूत संजय स्वामीकी कही हुई बातको ही दुहराया है; क्योंकि यदि वह उसके विपरीत कुछ कहता तो वधके योग्य माना जाता
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ କୃଷ୍ଣ! ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କ’ଣ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛନ୍ତି, ତୁମେ ଏହା ପୂର୍ବରୁ ଶୁଣିଛ। ସଞ୍ଜୟ ମୋତେ ଯାହା କହିଲେ, ସେ ସବୁ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କର ନିଜ ମତ ଓ ନିଶ୍ଚୟ।
Verse 7
तन्मतं धृतराष्ट्रस्य सो5स्यात्मा विवृतान्तर: । यथोक्त दूत आचहष्टे वध्य: स्यादन्यथा ब्रुवन्,युधिष्ठिरने कहा--श्रीकृष्ण! पुत्रोंसहित राजा धृतराष्ट्र क्या करना चाहते हैं, यह सब तो आपने सुन ही लिया। संजयने मुझसे जो कुछ कहा है, वह धृतराष्ट्रका ही मत है। संजय धृतराष्ट्रका अभिन्नस्वरूप होकर आया था। उसने उन्हींके मनोभावको प्रकाशित किया है। दूत संजय स्वामीकी कही हुई बातको ही दुहराया है; क्योंकि यदि वह उसके विपरीत कुछ कहता तो वधके योग्य माना जाता
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଏହା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କର ନିଜ ମତ। ସଞ୍ଜୟ ମନେ ହେଉଛି ତାଙ୍କର ଆତ୍ମାସ୍ୱରୂପ—ଅନ୍ତର୍ଭାବ ଖୋଲି ଆସିଛି। ଦୂତ ସ୍ୱାମୀ କହିଥିବା କଥାକୁ ଯଥାର୍ଥ କହେ; ନହେଲେ ବିପରୀତ କହିଲେ ସେ ଦଣ୍ଡଯୋଗ୍ୟ ହୁଏ।
Verse 8
अप्रदानेन राज्यस्य शान्तिमस्मासु मार्गति । लुब्ध: पापेन मनसा चरन्नसममात्मन:,राजा धृतराष्ट्रको राज्यका बड़ा लोभ है। उनके मनमें पाप बस गया है। अतः वे अपने अनुरूप व्यवहार न करके राज्य दिये बिना ही हमारे साथ संधिका मार्ग ढूँढ़ रहे हैं
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ରାଜ୍ୟ ନ ଦେଇ ସେ ଆମ ସହିତ ସନ୍ଧି ଖୋଜୁଛି। ଲୋଭରେ ଚାଳିତ, ପାପେ ଦୂଷିତ ମନ ନେଇ, ନିଜ ପଦମର୍ଯ୍ୟାଦାକୁ ଅନୁରୂପ ନ ହୋଇ ଶାନ୍ତିର ପଥ ଖୋଜୁଛି।
Verse 9
यत् तद् द्वादश वर्षाणि वनेषु हुषिता वयम् । छटद्माना शरदं चैकां धृतराष्ट्रस्य शासनात्,प्रभो! हम तो यही समझकर कि धुृतराष्ट्र अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर रहेंगे, उन्हींकी आज्ञासे बारह वर्ष वनमें रहे और एक वर्ष अज्ञातवास किया। श्रीकृष्ण! हमने अपनी प्रतिज्ञा भंग नहीं की है; इस बातको हमारे साथ रहनेवाले सभी ब्राह्मण जानते हैं
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ପ୍ରଭୋ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ଆମେ ବାରୋ ବର୍ଷ ବନରେ ରହିଲୁ, ଏବଂ ଗୋଟିଏ ବର୍ଷ ଛଦ୍ମରେ (ଅଜ୍ଞାତବାସରେ) କାଟିଲୁ।
Verse 10
स्थाता न: समये तस्मिन् धृतराष्ट्र इति प्रभो । नाहास्म समयं कृष्ण तद्धि नो ब्राह्मणा विदु:,प्रभो! हम तो यही समझकर कि धुृतराष्ट्र अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर रहेंगे, उन्हींकी आज्ञासे बारह वर्ष वनमें रहे और एक वर्ष अज्ञातवास किया। श्रीकृष्ण! हमने अपनी प्रतिज्ञा भंग नहीं की है; इस बातको हमारे साथ रहनेवाले सभी ब्राह्मण जानते हैं
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ପ୍ରଭୋ! ସେହି ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ସମୟରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ନିଜ ପ୍ରତିଜ୍ଞାରେ ଅଟୁଟ ରହିବେ ବୋଲି ଆମେ ଭାବିଥିଲୁ। ହେ କୃଷ୍ଣ! ଆମେ ସମ୍ମତି ଭଙ୍ଗ କରିନାହିଁ—ଏହା ଆମ ସହିତ ଥିବା ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଜାଣନ୍ତି।
Verse 11
गृद्धों राजा धृतराष्ट्र: स्वधर्म नानुपश्यति । वश्यत्वात् पुत्रगृद्धित्वान्मन्दस्यान्वेति शासनम्,परंतु राजा धृतराष्ट्र तो लोभमें डूबे हुए हैं। वे अपने धर्मकी ओर नहीं देखते हैं। पुत्रोंमें आसक्त होकर सदा उन्हींके अधीन रहनेके कारण वे अपने मूर्ख पुत्र दुर्योधनकी ही आज्ञाका अनुसरण करते हैं
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଲୋଭରେ ଆବୃତ; ସେ ନିଜ ଧର୍ମକୁ ଆଉ ଦେଖୁନାହାନ୍ତି। ପୁତ୍ରମୋହର ବଶରେ ସେ ସଦା ମୂର୍ଖ ପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ଆଜ୍ଞାକୁ ହିଁ ଅନୁସରଣ କରନ୍ତି।
Verse 12
सुयोधनमते तिष्ठन् राजास्मासु जनार्दन । मिथ्या चरति लुब्ध: सन् चरन् हि प्रियमात्मन:,जनार्दन! उनका लोभ इतना बढ़ गया है कि वे दुर्योधनकी ही हाँ-में-हाँ मिलाते हैं और अपना ही प्रिय कार्य करते हुए हमारे साथ मिथ्या व्यवहार कर रहे हैं
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ! ସୁଯୋଧନଙ୍କ ମତରେ ଅଟୁଟ ରହି ରାଜା ଆମ ସହିତ ମିଥ୍ୟା ଆଚରଣ କରୁଛନ୍ତି। ଲୋଭରେ ପ୍ରେରିତ ହୋଇ ସେ ନିଜକୁ ପ୍ରିୟ ଲାଗୁଥିବା କାର୍ଯ୍ୟକୁ ହିଁ କରନ୍ତି, ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ଇଚ୍ଛାକୁ ହିଁ ସମର୍ଥନ କରନ୍ତି।
Verse 13
इतो दुःखतरं कि नु यदहं मातरं ततः । संविधातुं न शकनोमि मित्राणां वा जनार्दन,जनार्दन! इससे बढ़कर महान् दुःखकी बात और क्या हो सकती है कि मैं अपनी माता तथा मित्रोंका भी अच्छी तरह भरण-पोषणतक नहीं कर सकता
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ! ଏହାଠାରୁ ଅଧିକ ଦୁଃଖ କ’ଣ ହୋଇପାରେ—ମୁଁ ମୋ ମାତାଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ, ମୋ ମିତ୍ରମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ, ଯଥାଯଥ ଭାବେ ପୋଷଣ କରିପାରୁନାହିଁ।
Verse 14
काशिकभिश्रेदिपज्चालै मत्स्यैश्न मधुसूदन । भवता चैव नाथेन पज्च ग्रामा वृता मया,मधुसूदन! यद्यपि काशी, चेदि, पांचाल और मत्स्यदेशके वीर हमारे सहायक हैं और आप हमलोगोंके रक्षक और स्वामी हैं; (आपलोगोंकी सहायतासे हम सारा राज्य ले सकते हैं) तथापि मैंने केवल पाँच ही गाँव माँगे थे
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ମଧୁସୂଦନ! କାଶୀ, ଚେଦି, ପାଞ୍ଚାଳ ଓ ମତ୍ସ୍ୟଦେଶର ବୀରମାନେ ଆମ ସହାୟ; ଆପଣ ନିଜେ ଆମ ନାଥ ଓ ରକ୍ଷକ। ଏପରି ସହାୟତାରେ ଆମେ ସମଗ୍ର ରାଜ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଦାବି କରିପାରୁଥିଲୁ; ତଥାପି ଅନାବଶ୍ୟକ ରକ୍ତପାତ ରୋକିବାକୁ ଧର୍ମସଂଯମରେ ମୁଁ କେବଳ ପାଞ୍ଚଟି ଗ୍ରାମ ମାଗିଲି।
Verse 15
अविस्थलं वृकस्थलं माकन्दी वारणावतम् | अवसानं च गोविन्द कज्चिदेवात्र पउचमम्,गोविन्द! मैंने धृतराष्ट्रसे यही कहा था कि तात! आप हमें अविस्थल, वृकस्थल, माकन्दी, वारणावत और अन्तिम पाँचवाँ कोई-सा भी गाँव जिसे आप देना चाहें, दे दें। इस प्रकार हमारे लिये पाँच गाँव या नगर दे दें; जिनमें हम पाँचों भाई एक साथ मिलकर रह सकें और हमारे कारण भरतवंशियोंका नाश न हो
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ଗୋବିନ୍ଦ! ମୁଁ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ଏହିପରି କହିଥିଲି—‘ତାତ! ଆମକୁ ଅବିସ୍ଥଳ, ବୃକସ୍ଥଳ, ମାକନ୍ଦୀ, ବାରଣାବତ ଏବଂ ପଞ୍ଚମ ଭାବେ ଆପଣ ଯେକୌଣସି ଗୋଟିଏ ଗ୍ରାମ ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, ସେହିଟି ଦିଅନ୍ତୁ। କେବଳ ପାଞ୍ଚଟି ଗ୍ରାମ କିମ୍ବା ନଗର ଦିଅନ୍ତୁ, ଯେଉଁଠାରେ ଆମ ପାଞ୍ଚ ଭାଇ ଏକାସାଥି ରହିପାରିବୁ ଏବଂ ଆମ କାରଣରେ ଭାରତବଂଶର ନାଶ ନ ହେଉ।’
Verse 16
पज्च नस्तात दीयमन्तां ग्रामा वा नगराणि वा | वसेम सहिता येषु मा च नो भरता नशन्,गोविन्द! मैंने धृतराष्ट्रसे यही कहा था कि तात! आप हमें अविस्थल, वृकस्थल, माकन्दी, वारणावत और अन्तिम पाँचवाँ कोई-सा भी गाँव जिसे आप देना चाहें, दे दें। इस प्रकार हमारे लिये पाँच गाँव या नगर दे दें; जिनमें हम पाँचों भाई एक साथ मिलकर रह सकें और हमारे कारण भरतवंशियोंका नाश न हो
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ପିତା! ଆମକୁ କେବଳ ପାଞ୍ଚଟି—ଗ୍ରାମ ହେଉ କି ନଗର—ଦିଅନ୍ତୁ, ଯେଉଁଠାରେ ଆମ ପାଞ୍ଚଭାଇ ଏକସାଥି ଶାନ୍ତିରେ ବସିପାରିବୁ। ଗୋବିନ୍ଦ! ଆମ କାରଣରେ ଭରତବଂଶର ନାଶ ନ ହେଉ।
Verse 17
न च तानपि दवुष्टात्मा धार्तराष्ट्रोडनुमन्यते । स्वाम्यमात्मनि मत्वासावतो दुःखतरं नु किम्,परंतु दुष्टात्मा दुर्योधन सबपर अपना ही अधिकार मानकर उन पाँच गाँवोंको भी देनेकी बात नहीं स्वीकार कर रहा है। इससे बढ़कर कष्टकी बात और क्या हो सकती है?
କିନ୍ତୁ ସେଇ ଦୁଷ୍ଟାତ୍ମା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ସେଗୁଡ଼ିକୁ ମଧ୍ୟ ମନୋନୀତ କରୁନାହିଁ। ସମସ୍ତ ଉପରେ ନିଜର ହିଁ ସ୍ୱାମିତ୍ୱ ଭାବି ସେ ପାଞ୍ଚଟି ଗ୍ରାମ ମଧ୍ୟ ଦେବାକୁ ଅସ୍ୱୀକାର କରୁଛି। ଗୋବିନ୍ଦ! ଏହାଠାରୁ ବଡ଼ ଦୁଃଖ ଆଉ କ’ଣ?
Verse 18
कुले जातस्य वृद्धस्य परवित्तेषु गृद्धयत: । लोभ: प्रज्ञानमाहन्ति प्रज्ञा हन्ति हता द्वियम्,मनुष्य उत्तम कुलमें जन्म लेकर और वृद्ध होनेपर भी यदि दूसरोंके धनको लेना चाहता है तो वह लोभ उसकी विचारशक्तिको नष्ट कर देता है। विचारशक्ति नष्ट होनेपर उसकी लज्जाको भी नष्ट कर देती है
ଉତ୍ତମ କୁଳରେ ଜନ୍ମ ନେଇ ବୃଦ୍ଧ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଯଦି କେହି ପରଧନକୁ ଲୋଭ କରେ, ସେଇ ଲୋଭ ତାହାର ବିବେକକୁ ନଷ୍ଟ କରେ; ବିବେକ ନଷ୍ଟ ହେଲେ ତାହା ପୁଣି ଲଜ୍ଜା ଓ ସଂଯମକୁ ମଧ୍ୟ ଧ୍ୱଂସ କରେ।
Verse 19
ह्वीरहता बाधते धर्म धर्मो हन्ति हत: श्रियम् श्रीहता पुरुषं हन्ति पुरुषस्याधनं वध:,नष्ट हुई लज्जा धर्मको नष्ट कर देती है। नष्ट हुआ धर्म मनुष्यकी सम्पत्तिका नाश कर देता है और नष्ट हुई सम्पत्ति उस मनुष्यका विनाश कर देती है, क्योंकि धनका अभाव ही मनुष्यका वध है
ଲଜ୍ଜା ନଷ୍ଟ ହେଲେ ଧର୍ମ ନଷ୍ଟ ହୁଏ; ଧର୍ମ ନଷ୍ଟ ହେଲେ ଶ୍ରୀ-ସମ୍ପଦ ନଷ୍ଟ ହୁଏ; ସମ୍ପଦ ନଷ୍ଟ ହେଲେ ମନୁଷ୍ୟ ନିଜେ ନଷ୍ଟ ହୁଏ—କାରଣ ଧନହୀନତା ହିଁ ମନୁଷ୍ୟର ବଧ।
Verse 20
अधनाद्धि निवर्तन्ते ज्ञातय: सुहृदो द्विजा: । अपुष्पादफलादू् वृक्षाद् यथा कृष्ण पतत्त्रिण:,श्रीकृष्ण! धनहीन पुरुषसे उसके भाई-बन्धु, सुहृद् और ब्राह्मणलोग भी उसी प्रकार मुँह मोड़ लेते हैं, जैसे पक्षी पुष्प और फलसे हीन वृक्षको छोड़कर उड़ जाते हैं
ହେ କୃଷ୍ଣ! ଧନହୀନ ପୁରୁଷଠାରୁ ତାହାର ଜ୍ଞାତି-ବନ୍ଧୁ, ସୁହୃଦ ଓ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ମଧ୍ୟ ସେହିପରି ଦୂରେଇଯାଆନ୍ତି, ଯେପରି ପୁଷ୍ପ ଓ ଫଳ ନଥିବା ଗଛକୁ ଛାଡ଼ି ପକ୍ଷୀମାନେ ଉଡ଼ିଯାଆନ୍ତି।
Verse 21
एतच्च मरणं तात यन्मत्त: पतितादिव । ज्ञातयो विनिवर्तन्ते प्रेतसत््वादिवासव:,तात! जैसे पतित मनुष्यके निकटसे लोग दूर भागते हैं और जैसे मृत शरीरसे प्राण निकल जाते हैं, उसी प्रकार मेरे कुटुम्बीजन भी जो मुझसे मुँह मोड़ रहे हैं, यही मेरे लिये मरण है
ତାତ! ଯେପରି ପତିତ ମଣିଷଙ୍କ ନିକଟରୁ ଲୋକେ ଦୂରେ ସରିଯାନ୍ତି ଏବଂ ଯେପରି ନିର୍ଜୀବ ଦେହରୁ ପ୍ରାଣ ବିଦାୟ ନେଇଯାଏ, ସେପରି ମୋର ନିଜ ଜ୍ଞାତିମାନେ ମୋତେ ଛାଡ଼ି ମୁହଁ ଫେରାଉଛନ୍ତି—ଏହିଟି ମୋ ପାଇଁ ମରଣ।
Verse 22
नात:ः पापीयसीं काज्चिदवस्थां शम्बरो<ब्रवीत् । यत्र नैवाद्य न प्रातर्भोजनं प्रतिदृश्यते,जहाँ आज और कल सबेरेके लिये भोजन नहीं दिखायी देता, उस दरिद्रतासे बढ़कर दूसरी कोई दुःखदायिनी अवस्था नहीं है; यह शम्बरका कथन है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ: ଶମ୍ବର କହିଛନ୍ତି—ଏହାଠାରୁ ଅଧିକ ଦୁର୍ଦ୍ଦଶା ଆଉ କିଛି ନାହିଁ; ଯେଉଁଠାରେ ଆଜି ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଭୋଜନ ଦିଶେ ନାହିଁ, ଓ କାଲି ସକାଳ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଆହାର ଦେଖାଯାଏ ନାହିଁ। ଏମିତି ଦାରିଦ୍ର୍ୟଠାରୁ ବଡ଼ ଦୁଃଖ ନାହିଁ।
Verse 23
धनमाहूु: परं धर्म धने सर्व प्रतिष्ठितम् । जीवन्ति धनिनो लोके मृता ये त्वधना नरा:,धनको उत्तम धर्मका साधक बताया गया है। धनमें सब कुछ प्रतिष्ठित है। संसारमें धनी मनुष्य ही जीवन धारण करते हैं। जो निर्धन हैं, वे तो मरे हुएके ही समान हैं
ଧନକୁ ପରମ ଧର୍ମର ସାଧନ ବୋଲି କୁହାଯାଏ; ଧନରେ ସବୁକିଛି ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ। ଲୋକେ ଧନୀମାନଙ୍କୁ ହିଁ ଜୀବନ୍ତ ମାନନ୍ତି; ଯେ ଧନହୀନ, ସେ ମୃତ ସମାନ।
Verse 24
ये धनादपकर्षन्ति नरं स््वबलमास्थिता: । ते धर्ममर्थ कामं च प्रमथ्नन्ति नरं च तम्,जो लोग अपने बलमें स्थित होकर किसी मनुष्यको धनसे वंचित कर देते हैं, वे उसके धर्म, अर्थ और कामको तो नष्ट करते ही हैं, उस मनुष्यको भी नष्ट कर देते हैं
ଯେମାନେ ନିଜ ବଳରେ ଭରସା କରି କାହାକୁ ଧନରୁ ବଞ୍ଚିତ କରନ୍ତି, ସେମାନେ ତାଙ୍କର ଧର୍ମ, ଅର୍ଥ ଓ କାମକୁ ମାତ୍ର ନୁହେଁ—ସେଇ ମଣିଷକୁ ମଧ୍ୟ ନଷ୍ଟ କରିଦିଅନ୍ତି।
Verse 25
एतामवस्थां प्राप्यैके मरणं वव्रिरे जना: । ग्रामायैके वनायैके नाशायैके प्रवव्रजु:,इस निर्धन अवस्थाको पाकर कितने ही मनुष्योंने मृत्युका वरण किया है। कुछ लोग गाँव छोड़कर दूसरे गाँवमें जा बसे हैं, कितने ही जंगलोंमें चले गये हैं और कितने ही मनुष्य प्राण देनेके लिये घरसे निकल पड़े हैं
ଏମିତି ଦାରିଦ୍ର୍ୟ ଅବସ୍ଥା ପାଇ କେତେକ ଲୋକ ମରଣକୁ ବରଣ କରିଛନ୍ତି। କେହି ନିଜ ଗାଁ ଛାଡ଼ି ଅନ୍ୟ ଗାଁରେ ବସିଛନ୍ତି; କେହି ବନକୁ ଚାଲିଯାଇଛନ୍ତି; ଆଉ କେହି ନିଜ ନାଶ ଖୋଜି ଘରୁ ବାହାରିପଡ଼ିଛନ୍ତି—ମନେ ହୁଏ ପ୍ରାଣ ତ୍ୟାଗ କରିବାକୁ ଯାଉଛନ୍ତି।
Verse 26
उन्मादमेके पुष्यन्ति यान्त्यन्ये द्विषतां वशम् । दास्यमेके च गच्छन्ति परेषामर्थहेतुना,कितने लोग पागल हो जाते हैं, बहुत-से शत्रुओंके वशमें पड़ जाते हैं और कितने ही मनुष्य धनके लिये दूसरोंकी दासता स्वीकार कर लेते हैं
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— କେହି କେହି ଉନ୍ମାଦରେ ପଡ଼ନ୍ତି; କେହି ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ବଶରେ ଯାଆନ୍ତି; ଆଉ କେହି ଧନର ହେତୁରେ ପରଙ୍କ ଦାସତ୍ୱ ମଧ୍ୟ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତି।
Verse 27
आपदेवास्य मरणात् पुरुषस्य गरीयसी । श्रियो विनाशस्तद्धयस्य निमित्तं धर्मकामयो:,धन-सम्पत्तिका नाश मनुष्यके लिये भारी विपत्ति ही है। वह मृत्युसे भी बढ़कर है, क्योंकि सम्पत्ति ही मनुष्यके धर्म और कामकी सिद्धिका कारण है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ମନୁଷ୍ୟ ପାଇଁ ସମୃଦ୍ଧିର ନାଶ ମୃତ୍ୟୁଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ ଭାରୀ ଆପଦ; କାରଣ ଧନ-ସମ୍ପତ୍ତି ହିଁ ଧର୍ମ ଓ କାମ ସାଧନର ଉପାୟ।
Verse 28
यदस्य धर्म्य मरणं शाश्व॒तं लोकवर्त्म तत् । समन्तात् सर्वभूतानां न तदत्येति कश्चन,मनुष्यकी जो धर्मानुकूल मृत्यु है, वह परलोकके लिये सनातन मार्ग है। सम्पूर्ण प्राणियोंमेंसे कोई भी उस मृत्युका सब ओरसे उल्लंघन नहीं कर सकता
ଧର୍ମାନୁକୂଳ ମୃତ୍ୟୁ ହିଁ ପରଲୋକକୁ ଯିବାର ସନାତନ ପଥ। ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କେହି ମଧ୍ୟ କୌଣସି ଭାବେ ସେହି ନିୟତିକୁ ଅତିକ୍ରମ କିମ୍ବା ଏଡ଼ାଇ ପାରେ ନାହିଁ।
Verse 29
न तथा बाध्यते कृष्ण प्रकृत्या निर्धनो जन: । यथा भद्रां श्रियं प्राप्प तया हीन: सुखैधित:,श्रीकृष्ण! जो जन्मसे ही निर्धन रहा है, उसे उस दरिद्रताके कारण उतना कष्ट नहीं पहुँचता, जितना कि कल्याणमयी सम्पत्तिको पाकर सुखमें ही पले हुए पुरुषको उस सम्पत्तिसे वंचित होनेपर होता है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ହେ କୃଷ୍ଣ! ଯେ ଜନ୍ମଜାତ ଭାବେ ଦରିଦ୍ର, ସେ ଦରିଦ୍ରତାରେ ତେତେ କଷ୍ଟ ପାଏ ନାହିଁ; ଯେତେ ଶୁଭମୟ ସମୃଦ୍ଧି ପାଇ ସୁଖରେ ପାଳିତ ଲୋକ, ସେହି ସମୃଦ୍ଧି ହରାଇଲେ ପାଏ।
Verse 30
स तदा5>त्मापराधेन सम्प्राप्तो व्यसनं महत् | सेन्द्रान् गर्हयते देवान् नात्मानं च कथठ्चन,यद्यपि वह मनुष्य उस समय अपने ही अपराधसे भारी संकटमें पड़ता है, तथापि वह इसके लिये इन्द्र आदि देवताओंकी ही निन््दा करता है; अपनेको किसी प्रकार भी दोष नहीं देता है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ନିଜ ଅପରାଧରୁ ମହା ବିପଦରେ ପଡ଼ିଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ସେ ଇନ୍ଦ୍ର ଆଦି ଦେବତାମାନଙ୍କୁ ନିନ୍ଦା କରେ; ନିଜକୁ କୌଣସି ଭାବେ ଦୋଷ ଦିଏ ନାହିଁ।
Verse 31
न चास्य सर्वशास्त्राणि प्रभवन्ति निबर्हणे । सोऊभिक्रुध्यति भृत्यानां सुहृदश्चा भ्यसूयति,उस समय सम्पूर्ण शास्त्र भी उसके इस संकटको टालनेमें समर्थ नहीं होते। वह सेवकोंपर कुपित होता और सगे-सम्बन्धियोंके दोष देखने लगता है
ସେ ସମୟରେ ସମସ୍ତ ଶାସ୍ତ୍ର ମଧ୍ୟ ତାହାର ସଙ୍କଟ ନିବାରଣ କରିବାକୁ ସମର୍ଥ ହୁଏନାହିଁ। ସେ ଭୃତ୍ୟମାନଙ୍କ ଉପରେ କ୍ରୋଧ କରେ ଏବଂ ହିତେଷୀ ଓ ସ୍ୱଜନମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ମଧ୍ୟ ଈର୍ଷ୍ୟା-ସନ୍ଦେହରେ ଦୋଷ ଖୋଜିବାକୁ ଲାଗେ।
Verse 32
त॑ तदा मन्युरेवैति स भूय: सम्प्रमुह्ति । स मोहवशमापन्न:ः क्रूरं कर्म निषेवते,निर्धन अवस्थामें मनुष्यको केवल क्रोध आता है, जिससे वह पुनः मोहाच्छन्न हो जाता ->-विवेकशक्ति खो बैठता है। मोहके वशीभूत होकर वह क्रूरतापूर्ण कर्म करने लगता है
ତେବେ କେବଳ କ୍ରୋଧ ତାକୁ ଆବର୍ତ୍ତ କରେ, ଏବଂ ସେ ପୁନର୍ବାର ମୋହରେ ଭ୍ରମିତ ହୁଏ। ମୋହବଶ ହୋଇ ସେ କ୍ରୂର କର୍ମରେ ଲିପ୍ତ ହୁଏ।
Verse 33
पापकर्मतया चैव संकरं तेन पुष्यति । संकरो नरकायैव सा काष्ठा पापकर्मणाम्,इस प्रकार पापकर्मोमें प्रवृत्त होनेके कारण वह वर्णसंकर संतानोंका पोषक होता है और वर्णसंकर केवल नरककी ही प्राप्ति कराता है। पापियोंकी यही अन्तिम गति है
ଏଭଳି ପାପକର୍ମରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ ହୋଇ ସେ ବର୍ଣ୍ଣସଙ୍କରକୁ ପୋଷଣ କରେ। ଏହି ବର୍ଣ୍ଣସଙ୍କର କେବଳ ନରକପ୍ରାପ୍ତିକୁ ନେଇଯାଏ—ପାପକର୍ମର ଏହିଏ ଶେଷ, କଟୁ ପରାକାଷ୍ଠା।
Verse 34
न चेत् प्रबुध्यते कृष्ण नरकायैव गच्छति । तस्य प्रबोध: प्रज्जैव प्रज्ञाचक्षुस्तरिष्पति,श्रीकृष्ण! यदि उसे फिरसे कर्तव्यका बोध नहीं होता, तो वह नरककी दिशामें ही बढ़ता जाता है। कर्तव्यका बोध करानेवाली प्रज्ञा ही है। जिसे प्रज्ञारूपी नेत्र प्राप्त हैं, वह निश्चय ही संकटसे पार हो जायगा
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— “ହେ କୃଷ୍ଣ! ଯଦି ମନୁଷ୍ୟ ପୁନଃ କର୍ତ୍ତବ୍ୟବୋଧରେ ଜାଗ୍ରତ ହୁଏନାହିଁ, ତେବେ ସେ ନରକଦିଗକୁ ହିଁ ଅଗ୍ରସର ହୁଏ। ତାହାର ସତ୍ୟ ପ୍ରବୋଧ ହେଉଛି ପ୍ରଜ୍ଞା ନିଜେ; ଯାହାର ପ୍ରଜ୍ଞାରୂପ ନେତ୍ର ଅଛି, ସେ ନିଶ୍ଚୟ ଆପଦାକୁ ଅତିକ୍ରମ କରିବ।”
Verse 35
प्रज्ञालाभे हि पुरुष: शास्त्राण्येवान्ववेक्षते । शास्त्रनिष्ठ: पुनर्धर्म तस्य हीरड्रमुत्तमम्,प्रज्ञाकी प्राप्ति होनेपर पुरुष केवल शास्त्रवचनोंपर ही दृष्टि रखता है। शास्त्रमें निष्ठा होनेपर वह पुनः धर्म करता है। धर्मका उत्तम अंग है लज्जा, जो धर्मके साथ ही आ जाती है। लज्जाशील मनुष्य पापसे द्वेष रखकर उससे दूर हो जाता है। अतः उसकी धन-सम्पत्ति बढ़ने लगती है। जो जितना ही श्रीसम्पन्न है, वह उतना ही पुरुष माना जाता है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— “ପ୍ରଜ୍ଞା ଲାଭ ହେଲେ ମନୁଷ୍ୟ ମାର୍ଗଦର୍ଶନ ପାଇଁ କେବଳ ଶାସ୍ତ୍ରକୁ ହିଁ ଦେଖେ। ଶାସ୍ତ୍ରନିଷ୍ଠ ହେଲେ ସେ ପୁନଃ ଧର୍ମାଚରଣ କରେ। ତାହା ପାଇଁ ଧର୍ମର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆଭୂଷଣ ହେଉଛି ଲଜ୍ଜା; ଏହା ଧର୍ମ ସହିତ ସ୍ୱାଭାବିକ ଭାବେ ଆସେ, ପାପ ପ୍ରତି ଘୃଣା ଜଗାଇ ତାହାରୁ ଦୂରେ ରଖେ, ଏବଂ ତାହାରେ ତାହାର ସମୃଦ୍ଧି ଓ ପ୍ରତିଷ୍ଠା ବଢ଼େ।”
Verse 36
ह्वीमान् हि पापं प्रद्वेष्टि तस्य श्रीरभिवर्धते । श्रीमान् स यावत् भवति तावद् भवति पूरुष:,प्रज्ञाकी प्राप्ति होनेपर पुरुष केवल शास्त्रवचनोंपर ही दृष्टि रखता है। शास्त्रमें निष्ठा होनेपर वह पुनः धर्म करता है। धर्मका उत्तम अंग है लज्जा, जो धर्मके साथ ही आ जाती है। लज्जाशील मनुष्य पापसे द्वेष रखकर उससे दूर हो जाता है। अतः उसकी धन-सम्पत्ति बढ़ने लगती है। जो जितना ही श्रीसम्पन्न है, वह उतना ही पुरुष माना जाता है
ଲଜ୍ଜାଶୀଳ ମଣିଷ ପାପକୁ ଘୃଣା କରି ତାହାଠାରୁ ଦୂରେ ରହେ; ତେଣୁ ତାହାର ଶ୍ରୀ-ସମ୍ପଦ ବଢ଼େ। ଏବଂ ଯେତେ ଯେତେ କେହି ଶ୍ରୀମନ୍ତ, ସେତେ ସେତେ ଲୋକେ ତାକୁ ‘ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ପୁରୁଷ’ ବୋଲି ମାନନ୍ତି।
Verse 37
धर्मनित्य: प्रशान्तात्मा कार्ययोगवह: सदा । नाधर्मे कुरुते बुद्धि न च पापे प्रवर्तते,सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाला पुरुष शान्तचित्त होकर नित्य-निरन्तर सत्कर्मोमें लगा रहता है। वह कभी अधर्ममें मन नहीं लगाता और न पापमें ही प्रवृत्त होता है
ଯେ ପୁରୁଷ ସଦା ଧର୍ମନିଷ୍ଠ, ଶାନ୍ତଚିତ୍ତ ଏବଂ ନିତ୍ୟ ସତ୍କର୍ମର ଯୋଗକୁ ବହନ କରେ, ସେ ସଦା ଶୁଭ କର୍ମରେ ଲିନ ରହେ। ସେ କେବେ ଅଧର୍ମରେ ବୁଦ୍ଧି ଲଗାଏ ନାହିଁ, ନ ପାପରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ ହୁଏ।
Verse 38
अद्वीको वा विमूढो वा नैव स्त्री न पुन: पुमान् । नास्याधिकारो धर्मेडस्ति यथा शूद्रस्तथैव सः:,जो निर्लज्ज अथवा मूर्ख है, वह न तो स्त्री है और न पुरुष ही है। उसका धर्म-कर्ममें अधिकार नहीं है। वह शूद्रके समान है
ଯେ ନିର୍ଲଜ୍ଜ କିମ୍ବା ବିମୂଢ଼, ସେ ନ ସତ୍ୟ ସ୍ତ୍ରୀ, ନ ସତ୍ୟ ପୁରୁଷ। ଧର୍ମବିଷୟରେ ତାହାର କୌଣସି ଅଧିକାର ନାହିଁ; ସେ ଶୂଦ୍ର ସମାନ।
Verse 39
ह्वीमानवति देवांश्व॒ पितृनात्मानमेव च । तेनामृतत्वं ब्रजति सा काष्ठा पुण्यकर्मणाम्,लज्जाशील पुरुष देवताओंकी, पितरोंकी तथा अपनी भी रक्षा करता है। इससे वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। वही पुण्यात्मा पुरुषोंकी परम गति है
ଲଜ୍ଜାଶୀଳ ପୁରୁଷ ଦେବତାମାନଙ୍କୁ, ପିତୃମାନଙ୍କୁ ଏବଂ ନିଜ ଆତ୍ମାକୁ ମଧ୍ୟ ରକ୍ଷା କରେ। ସେଇ ଗୁଣରେ ସେ ଅମୃତତ୍ୱକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ; ଏହିଏ ପୁଣ୍ୟକର୍ମୀମାନଙ୍କର ପରମ କାଷ୍ଠା।
Verse 40
तदिदं मयि ते दृष्ट॑ प्रत्यक्ष मधुसूदन । यथा राज्यात् परिभ्रष्टो वसामि वसतीरिमा:,मधुसूदन! यह सब आपने मुझमें प्रत्यक्ष देखा है कि मैं किस प्रकार राज्यसे भ्रष्ट हुआ और कितने कष्टके साथ इन दिनों रह रहा हूँ
ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଏ ସବୁ ତୁମେ ମୋ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦେଖିଛ—ମୁଁ କିପରି ରାଜ୍ୟରୁ ଚ୍ୟୁତ ହେଲି ଏବଂ ଏବେ ଏହି ନିବାସଗୁଡ଼ିକରେ କିପରି କଷ୍ଟରେ ରହୁଛି।
Verse 41
ते वयं न श्रियं हातुमलं न््यायेन केनचित् । अत्र नो यतमानानां वधश्चेदपि साधु तत्,अतः हमलोग किसी भी न्यायसे अपनी पैतृक सम्पत्तिका परित्याग करनेयोग्य नहीं हैं। इसके लिये प्रयत्न करते हुए यदि हमलोगोंका वध हो जाय तो वह भी अच्छा ही है
ସତ୍ୟଧର୍ମକୁ ଭଙ୍ଗ କରୁଥିବା କୌଣସି ତଥାକଥିତ ‘ନ୍ୟାୟ’ର ଆଧାରରେ ଆମେ ଆମ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ସମୃଦ୍ଧି ଓ ପୈତୃକ ଅଧିକାର ତ୍ୟାଗ କରିବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ। ଏହି ଅଧିକାର ପାଇଁ ଚେଷ୍ଟା କରୁଥିବାବେଳେ ଯଦି ଆମର ବଧ ମଧ୍ୟ ହୋଇଯାଏ, ସେଥି ମଧ୍ୟ ଭଲ—କାରଣ ଧର୍ମ ପାଇଁ ପତନ, ଅନ୍ୟାୟକୁ ମାନି ବଞ୍ଚିବାଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ।
Verse 42
तत्र नः प्रथम: कल्पो यद् वयं ते च माधव । प्रशान्ता: समभूताश्च श्रियं तामश्रुवीमहि,माधव! इस विषयमें हमारा पहला ध्येय यही है कि हम और कौरव आपसमें संधि करके शान्तभावसे रहकर उस सम्पत्तिका समानरूपसे उपभोग करें
ମାଧବ! ଏହି ବିଷୟରେ ଆମର ପ୍ରଥମ ସଙ୍କଳ୍ପ ଏହି—ଆମେ ଓ କୌରବମାନେ ସନ୍ଧି କରି, ଶାନ୍ତ ହୋଇ ସମାଧାନରେ ରହି, ସେହି ସମୃଦ୍ଧିକୁ ସମଭାବେ ଉପଭୋଗ କରିବା। ନୀତିର ପ୍ରଥମ ପ୍ରାଧାନ୍ୟ ଯୁଦ୍ଧଜୟ ନୁହେଁ; ସମ୍ମତି ଓ ସାଧାରଣ ମଙ୍ଗଳ।
Verse 43
तत्रैषा परमा काष्ठा रौद्रकर्मक्षयोदया । यद् वयं कौरवान् हत्वा तानि राष्ट्राण्यवाप्रुम:,दूसरा पक्ष यह है कि हम कौरवोंको मारकर सारा राज्य अपने अधिकारमें कर लें; परंतु यह भयंकर क्रूरतापूर्ण कर्मकी पराकाष्ठा होगी (क्योंकि इस दशामें कितने ही निरपराध मनुष्योंका संहार करनेके पश्चात् हमारी विजय होगी)
ଆଉ ଦ୍ୱିତୀୟ ପକ୍ଷ ହେଉଛି—କୌରବମାନଙ୍କୁ ହତ୍ୟା କରି ସେହି ରାଜ୍ୟଗୁଡ଼ିକୁ ଅଧିକାର କରିବା; କିନ୍ତୁ ଏହା କ୍ରୂର କର୍ମର ପରାକାଷ୍ଠା, ଭୟଙ୍କର ହିଂସାର ‘ସଫଳ’ ପରିଣତି ହେବ। ଏପରି ବିଜୟ ଅନେକ ନିରପରାଧଙ୍କ ସଂହାର ପରେ ମାତ୍ର ମିଳେ।
Verse 44
ये पुनः स्युरसम्बद्धा अनार्या: कृष्ण शत्रव: । तेषामप्यवध: कार्य: किं पुनर्ये स्युरीदूशा:,श्रीकृष्ण! जिनका अपने साथ कोई सम्बन्ध न हो तथा जो सर्वथा नीच एवं शत्रुभाव रखनेवाले हों, उनका भी वध करना उचित नहीं है। फिर जो सगे-सम्बन्धी, श्रेष्ठ और सुहृद् हैं, ऐसे लोगोंका वध कैसे उचित हो सकता है?
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ଯେମାନେ ଆମ ସହିତ ଅସମ୍ବନ୍ଧିତ ଓ ଆଚରଣରେ ଅନାର୍ୟ ହୋଇ ଶତ୍ରୁଭାବ ଧରିଛନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ବଧ କରିବା କି ସତ୍ୟରେ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ? ତେବେ ଯେମାନେ ଆମର ନିଜ ଜ୍ଞାତି—ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଓ ସୁହୃଦ—ସେମାନଙ୍କ ବଧ କିପରି ଧର୍ମସଙ୍ଗତ ହେବ?
Verse 45
ज्ञातयश्वैव भूयिष्ठा: सहाया गुरवश्च न: । तेषां वधो5तिपापीयान् किं नो युद्धेडस्ति शो भनम्
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଆମ ସମ୍ମୁଖରେ ଯେମାନେ ଅଧିକାଂଶ ଅଛନ୍ତି, ସେମାନେ ଆମର ନିଜ ଜ୍ଞାତି—ସହାୟ ମଧ୍ୟ, ପୂଜ୍ୟ ଗୁରୁଜନ ମଧ୍ୟ। ସେମାନଙ୍କ ବଧ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପାପମୟ। ତେବେ ଏହି ଯୁଦ୍ଧରେ ଆମ ପାଇଁ ଶୁଭ କିମ୍ବା ଶୋଭା କ’ଣ ରହିବ?
Verse 46
हमारे विरोधियोंमें अधिकांश हमारे भाई-बन्धु, सहायक और गुरुजन हैं। उनका वध तो बहुत बड़ा पाप है। युद्धमें अच्छी बात क्या है? (कुछ नहीं) ।। पाप: क्षत्रियधर्मो5यं वयं च क्षत्रबन्धव: । स नः स्वधर्मो<धर्मो वा वृत्तिरन्या विगर्हिता,क्षत्रियोंका यह (युद्धरूप) धर्म पापरूप ही है। हम भी क्षत्रिय ही हैं, अतः वह हमारा स्वधर्म पाप होनेपर भी हमें तो करना ही होगा, क्योंकि उसे छोड़कर दूसरी किसी वृत्तिको अपनाना भी निन्दाकी बात होगी
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ଯୁଦ୍ଧରୂପ କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମ ମୋତେ ପାପସଦୃଶ ଲାଗେ, ଏବଂ ଆମେ ମଧ୍ୟ କ୍ଷତ୍ରିୟବଂଶର ବନ୍ଧନରେ ବଦ୍ଧ। ତଥାପି ଏହିଏ ଆମ ସ୍ୱଧର୍ମ—ଅଧର୍ମ ପରି ଦିଶିଲେ ମଧ୍ୟ—କାରଣ ଏହାକୁ ଛାଡ଼ି ଅନ୍ୟ ଜୀବିକା ଗ୍ରହଣ କରିବା ନିନ୍ଦନୀୟ ହେବ।
Verse 47
शूद्र: करोति शुश्रूषां वैश्या वै पण्यजीविका: । वयं वधेन जीवाम: कपाल ब्राह्मुणैर्व॒तम्,शूद्र सेवाका कार्य करता है, वैश्य व्यापारसे जीविका चलाते हैं, हम क्षत्रिय युद्धमें दूसरोंका वध करके जीवन-निर्वाह करते हैं और ब्राह्मणोंने अपनी जीविकाके लिये भिक्षापात्र चुन लिया है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ଶୂଦ୍ର ସେବାରେ ଜୀବିକା କରେ, ବୈଶ୍ୟ ବ୍ୟାପାରରେ। ଆମେ କ୍ଷତ୍ରିୟ ଯୁଦ୍ଧରେ ପରଙ୍କୁ ବଧ କରି ଜୀବନ ଚାଲାଉ; ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଭିକ୍ଷାପାତ୍ରକୁ ବ୍ରତରୂପେ ଜୀବିକା କରିଛନ୍ତି।
Verse 48
क्षत्रिय: क्षत्रियं हन्ति मत्स्यो मत्स्येन जीवति । थवा श्वानं हन्ति दाशार्ह पश्य धर्मो यथागत:,क्षत्रिय क्षत्रियको मारता है, मछली मछलीको खाकर जीती है और कुत्ता कुत्तेको काटता है। दशा्हनन्दन! देखिये; यही परम्परासे चला आनेवाला धर्म है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— କ୍ଷତ୍ରିୟ କ୍ଷତ୍ରିୟକୁ ବଧ କରେ; ମାଛ ମାଛକୁ ଖାଇ ଜୀବେ; କୁକୁର କୁକୁରକୁ କାମୁଡ଼େ। ହେ ଦାଶାର୍ହ! ଦେଖ—ଏହିଏ ଲୋକରେ ପରମ୍ପରାଗତ ଧର୍ମ।
Verse 49
युद्धे कृष्ण कलिरनर्नित्यं प्राणा: सीदन्ति संयुगे । बल॑ तु नीतिमाधाय युध्ये जयपराजयौ,श्रीकृष्ण! युद्धमें सदा कलह ही होता है और उसीके कारण प्राणोंका नाश होता है। मैं तो नीतिबलका ही आश्रय लेकर युद्ध करूँगा। फिर ईश्वरकी इच्छाके अनुसार जय हो या पराजय
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ହେ କୃଷ୍ଣ, ଯୁଦ୍ଧରେ ସଦା କଲହ ହୁଏ, ଏବଂ ସେହି ସଂଘର୍ଷରେ ପ୍ରାଣ କ୍ଷୟ ହୋଇ ନଶ୍ଟ ହୁଏ। ତେଣୁ ମୁଁ ନୀତିବଳକୁ ମାତ୍ର ଆଶ୍ରୟ କରି ଯୁଦ୍ଧ କରିବି; ପରେ, ହେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ, ଈଶ୍ୱରଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ଜୟ ହେଉ କି ପରାଜୟ।
Verse 50
नात्मच्छन्देन भूतानां जीवितं मरणं तथा । नाप्यकाले सुखं प्राप्यं दु:खं वापि यदूत्तम,प्राणियोंक जीवन और मरण अपनी इच्छाके अनुसार नहीं होते हैं (यही दशा जय और पराजयकी भी है)। यदुश्रेष्ठी किसीको सुख अथवा दुःखकी प्राप्ति भी असमयमें नहीं होती है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କର ଜୀବନ ଓ ମୃତ୍ୟୁ ନିଜ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ହୁଏ ନାହିଁ; ସେପରି ଜୟ-ପରାଜୟ ମଧ୍ୟ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ସ୍ୱେଚ୍ଛାଧୀନ ନୁହେଁ। ହେ ଯଦୁଶ୍ରେଷ୍ଠ, କାହାକୁ ମଧ୍ୟ ସୁଖ କି ଦୁଃଖ ଅକାଳରେ ମିଳେ ନାହିଁ; କାଳ ପକ୍କ ହେଲେ ତେବେ ତାହା ଆସେ।
Verse 51
एको हापि बहून् हन्ति घ्नन्त्येकं बहवो<प्युत । शूरं कापुरुषो हन्ति अयशस्वी यशस्विनम्,युद्धमें एक योद्धा भी बहुत-से सैनिकोंका संहार कर डालता है तथा बहुत-से योद्धा मिलकर भी किसी एकको ही मार पाते हैं। कभी कायर शूरवीरको मार देता है और अयशस्वी पुरुष यशस्वी वीरको पराजित कर देता है
କେବେ କେବେ ଯୁଦ୍ଧରେ ଗୋଟିଏ ଯୋଦ୍ଧା ଅନେକଙ୍କୁ ସଂହାର କରିଦିଏ, ଆଉ କେବେ କେବେ ଅନେକେ ମିଶି ମଧ୍ୟ ଗୋଟିଏକୁ ମାରିପାରନ୍ତି। କେବେ କେବେ କାୟର ଶୂରକୁ ମାରେ, ଏବଂ ଅଯଶସ୍ବୀ ଯଶସ୍ବୀକୁ ପରାଜିତ କରେ।
Verse 52
जयो नैवोभयोर्दष्टो नोभयोश्व॒ पराजय: । तथैवापचयो दृष्टो व्यपयाने क्षयव्ययौ,न तो कहीं दोनों पक्षोंकी विजय होती देखी गयी है और न दोनोंकी पराजय ही दृष्टिगोचर हुई है। हाँ, दोनोंके धन-वैभवका नाश अवश्य देखा गया है। यदि कोई पक्ष पीठ दिखाकर भाग जाय, तो उसे भी धन और जन दोनोंकी हानि उठानी पड़ती है
ଏପରି ସଂଘର୍ଷରେ ଦୁଇ ପକ୍ଷର ଏକାସାଥି ଜୟ କେବେ ଦେଖାଯାଏ ନାହିଁ, ନା ଦୁଇ ପକ୍ଷର ଏକାସାଥି ପରାଜୟ। କିନ୍ତୁ ଦୁଇ ପକ୍ଷର ଧନ-ବୈଭବର ଅପଚୟ ନିଶ୍ଚୟ ଦେଖାଯାଏ। ଏବଂ ଯେ ପକ୍ଷ ପିଠ ଦେଖାଇ ପଳାଏ, ସେଥିରେ ମଧ୍ୟ ଧନ ଓ ଜନ—ଦୁହିଁର ହାନି ଅବଶ୍ୟ ହୁଏ।
Verse 53
सर्वथा वृजिन युद्ध को घ्नन् न प्रतिहन्यते । हतस्य च हृषीकेश समौ जयपराजयौ,इससे सिद्ध होता है कि युद्ध सर्वथा पापरूप ही है। दूसरोंको मारनेवाला कौन ऐसा पुरुष है, जो बदलेमें स्वयं भी मारा न जाता हो? हृषीकेश! जो युद्धमें मारा गया, उसके लिये तो विजय और पराजय दोनों समान हैं
ଏଥିରୁ ସିଦ୍ଧ ହୁଏ ଯେ ଯୁଦ୍ଧ ସର୍ବଥା ପାପରୂପ। ଅନ୍ୟକୁ ମାରୁଥିବା ଲୋକ କିଏ ଯେ ପ୍ରତିଘାତରେ ନିଜେ ମରେ ନାହିଁ? ହୃଷୀକେଶ! ଯେ ଯୁଦ୍ଧରେ ହତ, ତାହା ପାଇଁ ଜୟ ଓ ପରାଜୟ ଦୁହିଁ ସମାନ।
Verse 54
पराजयश्न मरणान्मन्ये नैव विशिष्यते । यस्य स्याद् विजय: कृष्ण तस्याप्यपचयो ध्रुवम्,श्रीकृष्ण! मैं तो ऐसा मानता हूँ कि पराजय मृत्युसे अच्छी वस्तु नहीं है। जिसकी विजय होती है, उसे भी निश्चय ही धन-जनकी भारी हानि उठानी पड़ती है
ହେ କୃଷ୍ଣ! ମୋ ମତରେ ପରାଜୟ ମୃତ୍ୟୁଠାରୁ କିଛି ମଧ୍ୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନୁହେଁ। ଯାହାର ଜୟ ହୁଏ, ତାହାର ମଧ୍ୟ ନିଶ୍ଚୟ ଅପଚୟ—ଧନ ଓ ଜନର ହାନି—ଧ୍ରୁବ।
Verse 55
अन्ततो दयितं घ्नन्ति केचिदप्यपरे जना: । तस्याज़् बलहीनस्य पुत्रान् भ्रातृनपश्यत:
ଶେଷରେ କେତେକ ଲୋକ ନିଜର ଅତି ପ୍ରିୟକୁ ମଧ୍ୟ ହତ୍ୟା କରନ୍ତି; ଅନ୍ୟମାନେ ମଧ୍ୟ ତେଣୁହିଁ କରନ୍ତି। ଏବଂ ସେ ବଳହୀନ ପୁରୁଷ—ପୁତ୍ର ଓ ଭ୍ରାତାଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରିପାରିନଥିବାରୁ—କେବଳ ଦେଖି ରହିଯାଏ।
Verse 56
ये होव धीरा ह्वीमन्त आर्या: करुणवेदिन:,जो लोग धीर-वीर, लज्जाशील, श्रेष्ठ और दयालु हैं, वे ही प्राय: युद्धमें मारे जाते हैं और अधम श्रेणीके मनुष्य जीवित बच जाते हैं। जनार्दन! शत्रुओंको मारनेपर भी उनके लिये सदा मनमें पश्चात्ताप बना रहता है
ଯେମାନେ ଧୀର, ଲଜ୍ଜାଶୀଳ, ଆର୍ଯ୍ୟ ଓ କରୁଣାବେଦୀ, ସେମାନେ ହିଁ ପ୍ରାୟଃ ଯୁଦ୍ଧରେ ନିହତ ହୁଅନ୍ତି; ନୀଚ ପ୍ରକୃତିର ଲୋକେ ବଞ୍ଚିଯାନ୍ତି। ହେ ଜନାର୍ଦନ! ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ମାରିଦେଲା ପରେ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ପାଇଁ ହୃଦୟରେ ସଦା ପଶ୍ଚାତ୍ତାପ ରହିଯାଏ।
Verse 57
त एव युद्धे हन्यन्ते यवीयान् मुच्यते जन: । हत्वाप्यनुशयो नित्यं परानपि जनार्दन,जो लोग धीर-वीर, लज्जाशील, श्रेष्ठ और दयालु हैं, वे ही प्राय: युद्धमें मारे जाते हैं और अधम श्रेणीके मनुष्य जीवित बच जाते हैं। जनार्दन! शत्रुओंको मारनेपर भी उनके लिये सदा मनमें पश्चात्ताप बना रहता है
ସେମାନେ ହିଁ ଯୁଦ୍ଧରେ ନିହତ ହୁଅନ୍ତି; ନୀଚ ପ୍ରକୃତିର ଲୋକ ବଞ୍ଚିଯାଏ। ହେ ଜନାର୍ଦନ! ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ମାରିଦେଲା ପରେ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ପାଇଁ ହୃଦୟରେ ନିତ୍ୟ ଅନୁତାପ ରହେ।
Verse 58
अनुबन्धश्न पापोजअत्र शेषश्चाप्यवशिष्यते | शेषो हि बलमासाद्य न शेषमनुशेषयेत्
ଏଥିରେ ପରବର୍ତ୍ତୀ ପରିଣାମ ମଧ୍ୟ ପାପମୟ, ଏବଂ କିଛି ଅବଶେଷ ରହିଯାଏ। କାରଣ ଯେ ଅବଶିଷ୍ଟ ରହେ, ସେ ବଳ ପାଇଲେ ଅବଶେଷକୁ ମଧ୍ୟ ଅବଶେଷ ରହିବାକୁ ଦେଉନାହିଁ—ଯାହା ରହିଛି ତାହାକୁ ମଧ୍ୟ ନିଶ୍ଶେଷ କରେ।
Verse 59
जयो वैरं प्रसृजति दुःखमास्ते पराजित:
ଜୟ ବୈରକୁ ଜନ୍ମ ଦିଏ; ପରାଜିତ ଦୁଃଖରେ ରହେ।
Verse 60
सुखं प्रशान्त: स्वपिति हित्वा जयपराजयौ । विजयकी प्राप्ति भी चिरस्थायी शत्रुताकी सृष्टि करती है। पराजित पक्ष बड़े दुःखसे समय बिताता है। जो किसीसे शत्रुता न रखकर शान्तिका आश्रय लेता है, वह जय- पराजयकी चिन्ता छोड़कर सुखसे सोता है ।। ५९ ह |। जातवैरश्न पुरुषो दुःखं स्वपिति नित्यदा
ଯେ ଶାନ୍ତ, ସେ ଜୟ-ପରାଜୟ ଦୁହିଁକୁ ତ୍ୟାଗ କରି ସୁଖରେ ଶୁଏ। କିନ୍ତୁ ଯେ ବୈର ସୃଷ୍ଟି କରିଛି, ସେ ପୁରୁଷ ସଦା ଦୁଃଖରେ ଶୁଏ।
Verse 61
अनिवृत्तेन मनसा ससर्प इव वेश्मनि | किसीसे वैर बाँधनेवाला पुरुष सर्पयुक्त गृहमें रहनेवालेकी भाँति उद्विग्नचित्त होकर सदा दुःखकी नींद सोता है || ६० ह ।। उत्सादयति य: सर्व यशसा स विमुच्यते
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଯାହାର ମନ ସେଇ ଆସକ୍ତିରୁ ଫେରିପାରେ ନାହିଁ, ଯେ ଶତ୍ରୁତା ବାନ୍ଧି ରଖେ, ସେ ସର୍ପଭରା ଘରେ ରହୁଥିବା ଲୋକ ପରି ସଦା ଉଦ୍ବିଗ୍ନଚିତ୍ତ ହୋଇ ଦୁଃଖର ନିଦ୍ରା ଶୋଇଥାଏ। କିନ୍ତୁ ଯେ ସତ୍ୟ ଯଶ ଓ ସତ୍କୀର୍ତ୍ତି ଦ୍ୱାରା ଶତ୍ରୁତାର ମୂଳକୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଉଚ୍ଛେଦ କରେ, ସେ ମୁକ୍ତ ହୁଏ।
Verse 62
अकीर्ति सर्वभूतेषु शाश्वतीं सोडधिगच्छति । जो शत्रुके कुलमें आबालवृद्ध सभी पुरुषोंका उच्छेद कर डालता है, वह वीरोचित यशसे वंचित हो जाता है। वह समस्त प्राणियोंमें सदा बनी रहनेवाली अपकीर्ति (निन्दा)-का भागी होता है || ६१ है || न हि वैराणि शाम्यन्ति दीर्घकालधृतान्यपि
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ସେ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶାଶ୍ୱତ ଅପକୀର୍ତ୍ତି ଲାଭ କରେ। ଯେ ଶତ୍ରୁକୁଳରେ ଶିଶୁଠାରୁ ବୃଦ୍ଧ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସମସ୍ତ ପୁରୁଷଙ୍କୁ ଉଚ୍ଛେଦ କରେ, ସେ ବୀରୋଚିତ ଯଶ ହରାଏ ଏବଂ ସଦା ନିନ୍ଦାର ପାତ୍ର ହୁଏ।
Verse 63
आखयातारश्न विद्यन्ते पुमांश्चेद् विद्यते कुले दीर्घकालतक मनमें दबाये रखनेपर भी वैरकी आग सर्वथा बुझ नहीं पाती; क्योंकि यदि कोई उस कुलमें विद्यमान है, तो उससे पूर्वघटित वैर बढ़ानेवाली घटनाओंको बतानेवाले बहुत-से लोग मिल जाते हैं ।। न चापि वैरं वैरेण केशव व्युपशाम्यति
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ କୌଣସି କୁଳରେ ଗୋଟିଏ ପୁରୁଷ ମଧ୍ୟ ଅଛି, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପୁରୁଣା କଥା କହିବା ଲୋକ ମିଳିଯାନ୍ତି। ଦୀର୍ଘକାଳ ମନରେ ଦବାଇ ରଖିଲେ ମଧ୍ୟ ବୈର ଶାନ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ; କାରଣ ସେ କୁଳର କେହି ଅବଶିଷ୍ଟ ରହିଲେ, ପୂର୍ବ ଘଟଣା କହି ବୈର ବଢ଼ାଇବା ଲୋକ ଅନେକ ମିଳନ୍ତି। ଏବଂ ହେ କେଶବ, ବୈର ଦ୍ୱାରା ବୈର କେବେ ଶାନ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ।
Verse 64
हविषाग्निर्यथा कृष्ण भूय एवाभिवर्धते | केशव! जैसे घी डालनेपर आग बुझनेके बजाय और अधिक प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार वैर करनेसे वैरकी आग शान्त नहीं होती, अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है।। ६३ ई || अतोडन्यथा नास्ति शान्तिर्नित्यमन्तरमन्ततः
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ କହିଲେ—ହେ କେଶବ! ଯେପରି ହବିଷ, ବିଶେଷକରି ଘିଅ, ଦେଲେ ଅଗ୍ନି ନିବେ ନାହିଁ; ଅଧିକ ଭାବେ ଜ୍ୱଳିଉଠେ, ସେପରି ବୈର ଦ୍ୱାରା ବୈରର ଅଗ୍ନି ଶାନ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ; ଅଧିକାଧିକ ବଢ଼େ। ତେଣୁ ସେଇ ପଥରେ ଶାନ୍ତି ନାହିଁ; ଶାନ୍ତି ଅନ୍ତର୍ମୁଖ ହୋଇ—ବିଚାର, ସଂଯମ ଓ ପରାମର୍ଶରେ—ଲଭ୍ୟ, ପ୍ରତିଶୋଧରେ ନୁହେଁ।
Verse 65
अन्तरं लिप्समानानामयं दोषो निरन्तर: । (क्योंकि दोनों पक्षोंमें सदा कोई-न-कोई छिद्र मिलनेकी सम्भावना रहती है) इसलिये दोनों पक्षोंमेंसे एकका सर्वथा नाश हुए बिना पूर्णतः शान्ति नहीं प्राप्त होती है। जो लोग छिद्र ढूँढ़ते रहते हैं, उनके सामने यह दोष निरन्तर प्रस्तुत रहता है ।। ६४ इ ।। पौरुषे यो हि बलवानाधि्हंदयबाधन: । तस्य त्यागेन वा शान्तिर्मरणेनापि वा भवेत्
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଯେମାନେ ଛିଦ୍ର ଖୋଜିବାରେ ଲାଗି ରହନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଏହି ଦୋଷ ନିରନ୍ତର ରହେ। ଯେଉଁଠାରେ ପୌରୁଷଜନିତ ପ୍ରବଳ କ୍ଲେଶ ହୃଦୟକୁ ଦବାଇ ଯନ୍ତ୍ରଣା ଦିଏ, ସେଠାରେ ଶାନ୍ତି ସେଇ କାରଣକୁ ତ୍ୟାଗ କଲେ ଆସେ, କିମ୍ବା ମୃତ୍ୟୁରେ ମଧ୍ୟ। ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଦୁଇ ପକ୍ଷ ଅଛନ୍ତି, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପରସ୍ପର ଛିଦ୍ର ଖୋଜିବା ଚାଲିଥାଏ; ତେଣୁ ଗୋଟିଏ ପକ୍ଷ ସର୍ବଥା ନଶିନାହିଁ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଶାନ୍ତି ମିଳେ ନାହିଁ।
Verse 66
यदि अपनेमें पुरुषार्थ है, तो पूर्ववैरको याद करके जो हृदयको पीड़ा देनेवाली प्रबल चिन्ता सदा बनी रहती है, उसे वैराग्यपूर्वक त्याग देनेसे ही शान्ति मिल सकती है; अथवा मर जानेसे ही उस चिन्ताका निवारण हो सकता है ।। अथवा मूलघातेन द्विषतां मधुसूदन । फलनिर्व त्तिरिद्धा स्यात् तन्नृशंसतरं भवेत्,अथवा शत्रुओंको समूल नष्ट कर देनेसे ही अभीष्ट फलकी सिद्धि हो सकती है। परंतु मधुसूदन! यह बड़ी क्रूरताका कार्य होगा
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ଯଦି ନିଜ ମନରେ ସତ୍ୟ ପୁରୁଷାର୍ଥ ରହିଥାଏ, ତେବେ ପୂର୍ବ ବୈରକୁ ସ୍ମରଣ କରି ହୃଦୟକୁ ପୀଡା ଦେଉଥିବା ଯେ ପ୍ରବଳ ଚିନ୍ତା ସଦା ରହେ, ତାହାକୁ ବୈରାଗ୍ୟପୂର୍ବକ ତ୍ୟାଗ କଲେ ମାତ୍ର ଶାନ୍ତି ମିଳେ; ନଚେତ୍ ସେ ଚିନ୍ତାର ନିବାରଣ କେବଳ ମୃତ୍ୟୁରେ। କିମ୍ବା, ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ମୂଳରୁ ଆଘାତ କରି ସମୂଳ ନାଶ କଲେ ମାତ୍ର ଇଚ୍ଛିତ ଫଳ ସିଦ୍ଧ ହେବ; କିନ୍ତୁ ସେ ପଥ ଅଧିକ ନୃଶଂସ ଓ କ୍ରୁର।
Verse 67
या तु त्यागेन शान्ति: स्थात् तदृते वध एव सः । संशयाच्च समुच्छेदाद् द्विषतामात्मनस्तथा,राज्यको त्याग देनेसे उसके बिना जो शान्ति मिलती है, वह भी वधके ही समान है। क्योंकि उस दशामें शत्रुओंसे सदा यह संदेह बना रहता है कि ये अवसर देखकर प्रहार करेंगे और धन-सम्पत्तिसे वंचित होनेके कारण अपने विनाशकी सम्भावना भी रहती ही है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ଅନ୍ୟ କୌଣସି ଉପାୟ ନଥିବାବେଳେ ରାଜ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରି ଯେ ଶାନ୍ତି ମିଳେ, ସେ ଶାନ୍ତି ମଧ୍ୟ ବଧ ସମାନ। କାରଣ ସେ ଅବସ୍ଥାରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ସଦା ସନ୍ଦେହ ରହେ— ‘ସୁଯୋଗ ଦେଖିଲେ ପ୍ରହାର କରିବେ’। ଏବଂ ଧନ-ସମ୍ପଦ ଓ ସାଧନ ହରାଇବାରୁ ନିଜ ବିନାଶର ସମ୍ଭାବନା ମଧ୍ୟ ରହିଥାଏ।
Verse 68
नच त्यक्तुं तदिच्छामो न चेच्छाम: कुलक्षयम् | अत्र या प्रणिपातेन शान्ति: सैव गरीयसी
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ଆମେ ସେ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଅଧିକାର ତ୍ୟାଗ କରିବାକୁ ଚାହୁଁନାହିଁ, ନାହିଁ କୁଳନାଶର ଇଚ୍ଛା। ଏହି ବିଷୟରେ ବିନୟପୂର୍ବକ ପ୍ରଣିପାତ ଓ ସମ୍ମାନଜନକ ସମାଧାନରେ ଯେ ଶାନ୍ତି ମିଳେ, ସେଇ ଶ୍ରେଷ୍ଠ।
Verse 69
अत: हमलोग न तो राज्य त्यागना चाहते हैं और न कुलके विनाशकी ही इच्छा रखते हैं। यदि नग्रता दिखानेसे भी शान्ति हो जाय तो वही सबसे बढ़कर है ।। सर्वथा यतमानानामयुद्धमभिकाड्क्षताम् । सान्त्वे प्रतिहते युद्ध प्रसिद्ध नापराक्रम:,यद्यपि हम युद्धकी इच्छा न रखकर साम, दान और भेद सभी उपायोंसे राज्यकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न कर रहे हैं, तथापि यदि हमारी सामनीति असफल हुई तो युद्ध ही हमारा प्रधान कर्तव्य होगा, हम पराक्रम छोड़कर बैठ नहीं सकते
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ତେଣୁ ଆମେ ନ ରାଜ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରିବାକୁ ଚାହୁଁ, ନ ନିଜ କୁଳର ବିନାଶ ଚାହୁଁ। ଯଦି ନମ୍ରତା ଦେଖାଇଲେ ମଧ୍ୟ ଶାନ୍ତି ହୋଇଯାଏ, ସେଇ ସର୍ବୋତ୍ତମ। ଆମେ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାରେ ଯତ୍ନ କରୁଛୁ, ଯୁଦ୍ଧ ଏଡ଼ାଇବାକୁ ଚାହୁଁ; ସାମ, ଦାନ ଓ ଭେଦ—ସବୁ ଉପାୟରେ ରାଜ୍ୟପ୍ରାପ୍ତି ପାଇଁ ପ୍ରୟାସ କରୁଛୁ। ତଥାପି ଯଦି ଆମ ସାନ୍ତ୍ୱନା-ନୀତି ପ୍ରତିହତ ହୁଏ, ତେବେ ଯୁଦ୍ଧ ହିଁ ପ୍ରସିଦ୍ଧ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ; ପରାକ୍ରମ ଓ ଦାୟିତ୍ୱ ଛାଡ଼ି କେହି ବସି ରହିପାରେ ନାହିଁ।
Verse 70
प्रतिघातेन सान्त्वस्य दारुणं सम्प्रवर्तते । तच्छुनामिव सम्पाते पण्डितैरुपलक्षितम्,जब शान्तिके प्रयत्नोंमें बाधा आती है, तब भयंकर युद्ध स्वतः आरम्भ हो जाता है। पण्डितोंने इस युद्धकी उपमा कुत्तोंक कलहसे दी है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— ଶାନ୍ତି-ପ୍ରୟାସ ପ୍ରତିହତ ହେଲେ ଭୟଙ୍କର ଯୁଦ୍ଧ ସ୍ୱତଃ ଆରମ୍ଭ ହୋଇଯାଏ। ପଣ୍ଡିତମାନେ ଏହାକୁ କୁକୁରମାନଙ୍କ ହଠାତ୍ ଝଗଡ଼ା-ସଂଘାତ ପରି ଉପମା ଦେଇ ଚିହ୍ନଟ କରିଛନ୍ତି।
Verse 71
इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक इकह्तत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ,लाड्गूलचालन क्ष्वेडा प्रतिवाचो विवर्तनम् । दन्तदर्शनमारावस्ततो युद्ध प्रवर्तते कुत्ते पहले पूँछ हिलाते हैं, फिर गुर्राते और गर्जते हैं। तत्पश्चात् एक-दूसरेके निकट पहुँचते हैं। फिर दाँत दिखाना और भूकना आरम्भ करते हैं। तत्पश्चात् उनमें युद्ध होने लगता है
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଯାନସନ୍ଧିପର୍ବରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରବାକ୍ୟବିଷୟକ ଏକସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା। ଯେପରି କୁକୁର ପ୍ରଥମେ ପୁଛ ହଲାଏ, ପରେ ଗର୍ଜନ କରି ଚ୍ୟାଲେଞ୍ଜ ଦିଏ; ନିକଟକୁ ଆସି ଦାନ୍ତ ଦେଖାଇ ଭଉଁକେ—ତାପରେ ଯୁଦ୍ଧ ଆରମ୍ଭ ହୁଏ। ସେପରି ସଂଯମ ଓ ସଦୁପଦେଶ ଭଙ୍ଗ ହେଲେ ବିରୋଧ ଛୋଟ ସଙ୍କେତରୁ ବଢ଼ି ଖୋଲା ସଂଗ୍ରାମ ହୋଇଯାଏ।
Verse 72
तत्र यो बलवान् कृष्ण जित्वा सो>त्ति तदामिषम् | एवमेव मनुष्येषु विशेषो नास्ति कश्चन,श्रीकृष्ण! उनमें जो बलवान होता है, वही उस मांसको खाता है, जिसके लिये कि उनमें लड़ाई हुई थी। यही दशा मनुष्योंकी है। इनमें कोई विशेषता नहीं है- इति श्रीमहाभारते उलद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि युधिष्ठिरकृतकृष्णप्रेरणे द्विसप्ततितमो&5ध्याय:
ହେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ସେଠାରେ ଯେ ବଳବାନ, ସେଇ ଜିତି ସେହି ମାଂସ ଖାଏ ଯାହା ପାଇଁ ସେମାନେ ଲଢ଼ିଥିଲେ। ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ଏହିପରି; କୌଣସି ବିଶେଷ ଭେଦ ନାହିଁ।
Verse 73
सर्वथा त्वेतदुचितं दुर्बलेषु बलीयसाम् । अनादरोडविरोधश्व प्रणिपाती हि दुर्बल:,यह सर्वथा उचित है कि बलवानोंकी दुर्बलोंके प्रति आदरबुद्धि न हो। वे उसका विरोध भी नहीं करते। दुर्बल वही है, जो सदा झुकनेके लिये तैयार रहे
ବଳବାନମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଦୁର୍ବଳମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଅନାଦର ରଖିବାକୁ ହିଁ ସର୍ବଥା ‘ଉଚିତ’ ବୋଲି ଧରାଯାଏ; ଦୁର୍ବଳମାନେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରତିରୋଧ କରନ୍ତି ନାହିଁ। ପ୍ରକୃତରେ ଦୁର୍ବଳ ସେଇ, ଯେ ସଦା ନମିବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ।
Verse 74
पिता राजा च वृद्धश्न सर्वथा मानमर्हति | तस्मान्मान्यश्व पूज्यश्न धृतराष्ट्रो जनार्दन,जनार्दन! पिता, राजा और वृद्ध सर्वथा समादरके ही योग्य हैं। अतः धृतराष्ट्र हमारे लिये सदा माननीय एवं पूजनीय हैं
ହେ ଜନାର୍ଦନ! ପିତା, ରାଜା ଓ ବୃଦ୍ଧ—ସର୍ବଥା ସମ୍ମାନର ଯୋଗ୍ୟ। ତେଣୁ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଆମ ପାଇଁ ସଦା ମାନ୍ୟ ଓ ପୂଜ୍ୟ।
Verse 75
पुत्रस्नेहश्च बलवान् धृतराष्ट्रस्य माधव । स पुत्रवशमापन्न: प्रणिपातं प्रहास्यति,माधव! धृतराष्ट्रमें अपने पुत्रके प्रति प्रबल आसक्ति है। वे पुत्रके वशमें होनेके कारण कभी झुकना नहीं स्वीकार करेंगे
ହେ ମାଧବ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କର ପୁତ୍ରସ୍ନେହ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରବଳ। ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ବଶରେ ପଡ଼ିଥିବାରୁ ସେ ନମି ମିଳନ-ବିନୟ ଗ୍ରହଣ କରିବେ ନାହିଁ।
Verse 76
तत्र कि मन्यसे कृष्ण प्राप्तकालमनन्तरम् | कथमर्थाच्च धर्माच्च न हीयेमहि माधव,माधव श्रीकृष्ण! ऐसे समयमें आप क्या उचित समझते हैं? हम कैसा बर्ताव करें, जिससे हमें अर्थ और धर्मसे भी वंचित न होना पड़े?
ହେ କୃଷ୍ଣ! ଏବେ ନିର୍ଣ୍ଣାୟକ କ୍ଷଣ ଆସିପହଞ୍ଚିଛି; ଏହି ପରିସ୍ଥିତିରେ ଆପଣ କ’ଣ ଯଥୋଚିତ ଭାବୁଛନ୍ତି? ହେ ମାଧବ! ଅର୍ଥ ଓ ଧର୍ମ—ଦୁହେଁରୁ ବଞ୍ଚିତ ନ ହେବା ପାଇଁ ଆମେ କିପରି ଆଚରଣ କରିବା ଉଚିତ?
Verse 77
ईदृशे>त्यर्थकृच्छे5स्मिन् कमन्यं मधुसूदन । उपसम्प्रष्टमर्हामि त्वामृते पुरुषोत्तम
ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଏପରି ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ଦ୍ଦଶାମୟ ସଙ୍କଟରେ, ହେ ପୁରୁଷୋତ୍ତମ! ଆପଣଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ମୁଁ ଯଥୋଚିତ ଭାବେ ଆଉ କାହାକୁ ଯାଇ ପ୍ରଶ୍ନ କରିପାରିବି?
Verse 78
पुरुषोत्तम मधुसूदन! ऐसे महान् संकटके समय हम आपको छोड़कर और किससे सलाह ले सकते हैं ।। प्रियश्न प्रियकामश्न गतिज्ञ: सर्वकर्मणाम् | को हि कृष्णास्ति नस्त्वादृक् सर्वनिश्चयवित् सुहत्,श्रीकृष्ण! आपके समान हमारा प्रिय, हितैषी, समस्त कर्मोंके परिणामको जाननेवाला और सभी बातोंमें एक निश्चित सिद्धान्त रखनेवाला सुहृद् कौन है?
ହେ ପୁରୁଷୋତ୍ତମ, ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଏପରି ମହାସଙ୍କଟରେ ଆପଣଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ଆମେ ଆଉ କାହାର ପରାମର୍ଶ ନେବୁ? ହେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ଆମ ପାଇଁ ଆପଣଙ୍କ ପରି ପ୍ରିୟ, ହିତେଷୀ, ସମସ୍ତ କର୍ମର ଗତି-ପରିଣାମ ଜାଣୁଥିବା, ଏବଂ ପ୍ରତ୍ୟେକ ବିଷୟରେ ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟବାନ ସୁହୃଦ୍ ଆଉ କିଏ ଅଛି?
Verse 79
वैशम्पायन उवाच एवमुक्तः प्रत्युवाच धर्मराज॑ं जनार्दन: । उभयोरेव वामर्थ यास्यामि कुरुसंसदम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने उनसे कहा--'राजन! मैं दोनों पक्षोंके हितके लिये कौरवोंकी सभामें जाऊँगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏପରି କହିବା ପରେ ଜନାର୍ଦନ ଧର୍ମରାଜଙ୍କୁ ପ୍ରତିଉତ୍ତର ଦେଲେ—“ରାଜନ୍! ଉଭୟ ପକ୍ଷର ହିତ ପାଇଁ ମୁଁ କୁରୁସଭାକୁ ଯିବି।”
Verse 80
शमं तत्र लभेयं चेद् युष्मदर्थमहापयन् । पुण्यं मे सुमहद् राजंश्वरितं स्पान्महाफलम्,“वहाँ जाकर आपके लाभमें किसी प्रकारकी बाधा न पहुँचाते हुए यदि मैं दोनों पक्षोंमें संधि करा सका, तो समझूँगा कि मेरे द्वारा यह महान् फलदायक एवं बहुत बड़ा पुण्यकर्म सम्पन्न हो गया
“ରାଜନ୍! ସେଠାକୁ ଯାଇ, ଆପଣମାନଙ୍କ ହିତରେ କୌଣସି ହାନି ନ ହେବା ପରି ଦେଖି, ଯଦି ମୁଁ ଉଭୟ ପକ୍ଷରେ ସନ୍ଧି କରାଇପାରିବି, ତେବେ ମୁଁ ଭାବିବି—ମୋ ଦ୍ୱାରା ମହାଫଳଦାୟକ ଏକ ଅତିମହାନ ପୁଣ୍ୟକର୍ମ ସମ୍ପନ୍ନ ହେଲା।”
Verse 81
मोचयेयं मृत्युपाशात् संरब्धान् कुरुसृंजयान् । पाण्डवान् धार्तराष्ट्रांक्ष सर्वां च पृथिवीमिमाम्,'ऐसा होनेपर एक-दूसरेके प्रति रोषमें भरे हुए इन कौरवों, सूंजयों, पाण्डवों और धृतराष्ट्रपुत्रोंको तथा इस सारी पृथ्वीको भी मानो मैं मौतके फंदेसे छुड़ा लूँगा'
ଏମିତି ହେଲେ, ପରସ୍ପର ରୋଷରେ ଦଗ୍ଧ ଏହି କୁରୁ ଓ ସୃଞ୍ଜୟମାନଙ୍କୁ, ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଓ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ—ଏବଂ ଏହି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ମଧ୍ୟ—ମୁଁ ଯେନ ମୃତ୍ୟୁପାଶରୁ ମୁକ୍ତ କରିଦେବି।
Verse 82
युधिछिर उवाच न ममैतन्मतं कृष्ण यत् त्वं याया: कुरून् प्रति । सुयोधन: सूक्तमपि न करिष्यति ते वच:,युधिष्ठिर बोले--श्रीकृष्ण! मेरा यह विचार नहीं है कि आप कौरवोंके यहाँ जायूँ; क्योंकि आपकी कही हुई अच्छी बातोंको भी दुर्योधन नहीं मानेगा
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ କୃଷ୍ଣ! ତୁମେ କୁରୁମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଯିବା ଉଚିତ ବୋଲି ମୋର ମତ ନୁହେଁ; କାରଣ ସୁୟୋଧନ ତୁମର ସୁକଥାକୁ ମଧ୍ୟ ମାନିବ ନାହିଁ।
Verse 83
समेत पार्थिव क्षत्र॑ दुर्योधनवशानुगम् । तेषां मध्यावतरणं तव कृष्ण न रोचये,इसके सिवा इस समय दुर्योधनके वशमें रहनेवाले भूमण्डलके सभी क्षत्रिय वहाँ एकत्र हुए हैं। उनके बीचमें आपका जाना मुझे अच्छा नहीं लगता
ତଦୁପରି, ଏ ସମୟରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନର ବଶାନୁଗତ ଭୂମଣ୍ଡଳର ସମସ୍ତ କ୍ଷତ୍ରିୟ ରାଜା ସେଠାରେ ସମବେତ। ହେ କୃଷ୍ଣ, ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ତୁମ ଯିବାକୁ ମୁଁ ଭଲ ଭାବୁନି।
Verse 84
नहि नः प्रीणयेद् द्रव्यं न देवत्वं कुत: सुखम् । न च स्मिरैश्वर्य तव द्रोहेण माधव,माधव! यदि दुर्योधनने द्रोहवश आपके साथ कोई अनुचित बर्ताव किया, तो धन, सुख, देवत्व तथा सम्पूर्ण देवताओंका ऐश्वर्य भी हमें प्रसन्न नहीं कर सकेगा
ହେ ମାଧବ! ଯଦି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଦ୍ରୋହବଶତଃ ତୁମ ସହ କିଛି ଅନୁଚିତ ବ୍ୟବହାର କରେ, ତେବେ ଧନ, ସୁଖ, ଦେବତ୍ୱ ଏବଂ ଦେବମାନଙ୍କ ସମଗ୍ର ଐଶ୍ୱର୍ୟ ମଧ୍ୟ ଆମକୁ ପ୍ରସନ୍ନ କରିପାରିବ ନାହିଁ।
Verse 85
श्रीभगवानुवाच जानाम्येतां महाराज धार्तराष्ट्रस्य पापताम् । अवाच्यास्तु भविष्याम: सर्वलोके महीक्षिताम्,श्रीभगवानने कहा--महाराज! धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन कितना पापाचारी है, यह मैं जानता हूँ, तथापि वहाँ जाकर संधिके लिये प्रयत्न करनेपर हम सब लोग सम्पूर्ण जगत्के राजाओंकी दृष्टिमें निन््दाके पात्र न होंगे
ଶ୍ରୀଭଗବାନ କହିଲେ—ହେ ମହାରାଜ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରର ପାପତାକୁ ମୁଁ ଜାଣେ; ତଥାପି, ଯଦି ଆମେ ସେଠାକୁ ଯାଇ ସନ୍ଧି ପାଇଁ ପ୍ରୟାସ ନ କରିବା, ତେବେ ସମସ୍ତ ଲୋକର ରାଜାମାନଙ୍କ ଦୃଷ୍ଟିରେ ଆମେ ନିନ୍ଦାର ପାତ୍ର ହେବୁ।
Verse 86
न चापि मम पर्याप्ता: सहिता: सर्वपार्थिवा: । क्रुद्धस्य संयुगे स्थातुं सिंहस्येवेतरे मृगा:,(मेरे तिरस्कारके भयसे भी आप चिन्तित न हों, क्योंकि) जैसे क्रोधमें भरे हुए सिंहके सामने दूसरे पशु नहीं ठहर सकते हैं, उसी प्रकार यदि मैं कोप करूँ, तो संसारके सारे भूपाल मिलकर भी युद्धमें मेरे सामने खड़े नहीं हो सकते हैं
ମୋର ତିରସ୍କାରର ଭୟରେ ମଧ୍ୟ ଆପଣ ଚିନ୍ତିତ ହେବେ ନାହିଁ; କାରଣ କ୍ରୋଧରେ ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ ସିଂହର ସମ୍ମୁଖରେ ଯେପରି ଅନ୍ୟ ପଶୁମାନେ ଟିକି ପାରନ୍ତି ନାହିଁ, ସେପରି ମୁଁ କୋପ କଲେ ପୃଥିବୀର ସମସ୍ତ ରାଜା ଏକତ୍ର ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଯୁଦ୍ଧରେ ମୋ ସମ୍ମୁଖରେ ଦଢ଼ି ରହି ପାରିବେ ନାହିଁ।
Verse 87
अथ चेत् ते प्रवर्तन्ते मयि किज्चिदसाम्प्रतम् । निर्दहेयं कुरून् सर्वानिति मे धीयते मति:,यदि वे मेरे साथ थोड़ा-सा भी अनुचित बर्ताव करेंगे, तो मैं उन समस्त कौरवोंको जलाकर भस्म कर डालूँगा; यह मेरा निश्चित विचार है
ଯଦି ସେମାନେ ମୋ ପ୍ରତି ଅଳ୍ପମାତ୍ରେ ମଧ୍ୟ ଅନୁଚିତ ଆଚରଣ କରନ୍ତି, ତେବେ ମୁଁ ସେ ସମସ୍ତ କୌରବଙ୍କୁ ଦହି ଭସ୍ମ କରିଦେବି—ଏହି ଦୃଢ଼ ସଙ୍କଳ୍ପ ମୋ ମନରେ ଉଦିତ ହୋଇଛି।
Verse 88
न जातु गमनं पार्थ भवेत् तत्र निरर्थकम् । अर्थप्राप्ति: कदाचित् स्यादन्ततो वाप्यवाच्यता,अतः कुन्तीनन्दन! मेरा वहाँ जाना कदापि निरर्थक नहीं होगा। सम्भव है, वहाँ अपने अभीष्ट अर्थकी सिद्धि हो जाय और यदि काम न बना, तो भी हम निन्दासे तो बच ही जायँगे
ହେ ପାର୍ଥ! ମୋର ସେଠାକୁ ଯିବା କେବେ ନିରର୍ଥକ ହେବ ନାହିଁ। ସମ୍ଭବ ଯେ ଆଭିଷ୍ଟ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହେବ; ଏବଂ କାର୍ଯ୍ୟ ସଫଳ ନ ହେଲେ ମଧ୍ୟ, ଅନ୍ତତଃ ଆମେ ନିନ୍ଦାରୁ ତ ରକ୍ଷା ପାଇବୁ।
Verse 89
युधिछिर उवाच यत् तुभ्यं रोचते कृष्ण स्वस्ति प्राप्तुहि कौरवान् । कृतार्थ स्वस्तिमन्तं त्वां द्रक्ष्यामि पुनरागतम्,युधिष्ठिर बोले--श्रीकृष्ण! आपकी जैसी रुचि हो, वही कीजिये। आपका कल्याण हो। आप प्रसन्नतापूर्वक कौरवोंके पास जाइये। आशा है, मैं पुन: आपको अपने कार्यमें सफल होकर यहाँ सकुशल लौटा हुआ देखूँगा
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ କୃଷ୍ଣ! ତୁମକୁ ଯାହା ରୋଚେ ସେହି କର। ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ପ୍ରସନ୍ନଚିତ୍ତରେ କୌରବମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଅ। ମୁଁ ଆଶା କରୁଛି—କାର୍ଯ୍ୟସିଦ୍ଧି କରି ତୁମେ ପୁନଃ ଏଠାକୁ କୁଶଳରେ ଫେରିବ।
Verse 90
विष्वक्सेन कुरून् गत्वा भरताञउ्छमय प्रभो । यथा सर्वे सुमनस: सह स्याम सुचेतस:,विष्वकूसेन प्रभो! आप कुरुदेशमें जाकर भरत-वंशियोंको शान्त कीजिये, जिससे हम सब लोग शुद्ध हृदयसे प्रसन्नचित्त होकर एक साथ रह सकें
ହେ ପ୍ରଭୁ ବିଷ୍ୱକ୍ସେନ! ଆପଣ କୁରୁଦେଶକୁ ଯାଇ ଭରତବଂଶୀମାନଙ୍କୁ ଶାନ୍ତ କରନ୍ତୁ, ଯେପରି ଆମେ ସମସ୍ତେ ଶୁଦ୍ଧ ହୃଦୟ ଓ ସ୍ଥିର ଚେତନା ସହ ଏକତ୍ର ପ୍ରସନ୍ନଚିତ୍ତରେ ରହିପାରିବୁ।
Verse 91
भ्राता चासि सखा चासि बीभत्सोर्मम च प्रिय: । सौहृदेनाविशड्क्यो<सि स्वस्ति प्राप्तुह्िि भूतये,आप हमलोगोंके भाई और मित्र हैं। अर्जुनके तथा मेरे भी प्रीतिभाजन हैं। आपके सौहार्दके विषयमें हमारे मनमें कोई शंका नहीं है। अतः आप उभय पक्षोंकी भलाईके लिये वहाँ जाइये। आपका कल्याण हो
ତୁମେ ଆମର ଭ୍ରାତା ଓ ସଖା; ବୀଭତ୍ସୁ ଅର୍ଜୁନଙ୍କର ଓ ମୋର ମଧ୍ୟ ପ୍ରିୟ। ତୁମ ସୌହାର୍ଦ୍ୟ ବିଷୟରେ ଆମ ମନରେ କିଛିମାତ୍ର ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। ତେଣୁ ଉଭୟ ପକ୍ଷର ମଙ୍ଗଳାର୍ଥେ ତୁମେ ସେଠାକୁ ଯାଅ। ତୁମର କଲ୍ୟାଣ ହେଉ; ସଫଳତା ଲଭ କର।
Verse 92
अस्मान् वेत्थ परान् वेत्थ वेत्थार्थान् वेत्थ भाषितुम् । यद् यदस्मद्धितं कृष्ण तत् तद् वाच्य: सुयोधन:,श्रीकृष्ण! आप हमको जानते हैं, कौरवोंको भी जानते हैं, हम दोनोंके स्वार्थोंसे भी आप अपरिचित नहीं हैं और बातचीत कैसे करनी चाहिये, यह भी आपको अच्छी तरह ज्ञात है। अतः जिस-जिस बातसे हमारा हित हो, वह सब आप दुर्योधनको बतावें
ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ଆପଣ ଆମକୁ ଜାଣନ୍ତି, ପରପକ୍ଷକୁ (କୌରବମାନଙ୍କୁ) ମଧ୍ୟ ଜାଣନ୍ତି; ଉଭୟଙ୍କ ସ୍ୱାର୍ଥକୁ ଆପଣ ବୁଝନ୍ତି ଏବଂ ପରାମର୍ଶରେ କିପରି କଥା କହିବା ଉଚିତ ତାହା ମଧ୍ୟ ଜାଣନ୍ତି। ତେଣୁ, ହେ କୃଷ୍ଣ, ଯାହା ଯାହା ଆମ ହିତକର, ସେ ସବୁ ସୁୟୋଧନ (ଦୁର୍ୟୋଧନ) କୁ କହନ୍ତୁ।
Verse 93
यद् यद् धर्मेण संयुक्तमुपपद्येद्धितं वच: । तत् तत् केशव भाषेथा: सान्त्वं वा यदि वेतरत्,केशव! जो-जो बात धर्मसंगत, युक्तियुक्त और हितकर हो, वह सब कोमल हो या कठोर, आप अवश्य कहें
କେଶବ! ଧର୍ମସଙ୍ଗତ, ଯୁକ୍ତିଯୁକ୍ତ ଓ ହିତକର ଯେଉଁ ବଚନ ଯେଉଁ ଅଛି, ସେ ସବୁ ଆପଣ କହନ୍ତୁ—ସାନ୍ତ୍ୱନାର କୋମଳ ବାଣୀ ହେଉ କି ଆବଶ୍ୟକ ହେଲେ ତାହାର ବିପରୀତ, ଦୃଢ଼ ଓ କଠୋର ବାଣୀ।
Verse 556
निर्वेदो जीविते कृष्ण सर्वतश्नोपजायते । युद्ध समाप्त होनेतक कितने ही विपक्षी सैनिक विजयी योद्धाके अनेक प्रियजनोंको मार डालते हैं। जो विजय पाता है, वह भी (कुटुम्ब और धनसम्बन्धी) बलसे शून्य हो जाता है और कृष्ण! जब वह युद्धमें मारे गये अपने पुत्रों और भाइयोंको नहीं देखता है, तो वह सब ओरसे विरक्त हो जाता है; उसे अपने जीवनसे भी वैराग्य हो जाता है
ହେ କୃଷ୍ଣ! ଜୀବନ ପ୍ରତି ନିର୍ବେଦ ସବୁ ଦିଗରୁ ଉପଜେ। ଯୁଦ୍ଧ ସମାପ୍ତ ହେବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଅସଂଖ୍ୟ ବିପକ୍ଷ ସୈନିକ ବିଜୟୀ ବୀରଙ୍କର ମଧ୍ୟ ଅନେକ ପ୍ରିୟଜନଙ୍କୁ ହତ୍ୟା କରିଦିଅନ୍ତି। ଯେ ଜିତେ, ସେ ମଧ୍ୟ କୁଟୁମ୍ବ ଓ ଧନବଳରୁ ଶୂନ୍ୟ ହୋଇଯାଏ। ହେ କୃଷ୍ଣ! ଯେତେବେଳେ ସେ ଯୁଦ୍ଧରେ ନିହତ ନିଜ ପୁତ୍ର ଓ ଭ୍ରାତାମାନଙ୍କୁ ଆଉ ଦେଖେ ନାହିଁ, ସେ ସବୁ ଦିଗରୁ ବିରକ୍ତ ହୋଇଯାଏ; ନିଜ ଜୀବନ ପ୍ରତି ମଧ୍ୟ ତାହାର କ୍ଲାନ୍ତି ଜନ୍ମେ।
Verse 586
सर्वोच्छेदे च यतते वैरस्यान्तविधित्सया । भागे हुए शत्रुका पीछा करना अनुबन्ध कहलाता है, यह भी पापपूर्ण कार्य है। मारे जानेवाले शत्रुओंमेंसे कोई-कोई बचा रह जाता है। वह अवशिष्ट शत्रु शक्तिका संचय करके विजेताके पक्षमें जो लोग बचे हैं, उनमेंसे किसीको जीवित नहीं छोड़ना चाहता। वह शत्रुका अन्त कर डालनेकी इच्छासे विरोधी दलको सम्पूर्णरूपसे नष्ट कर देनेका प्रयत्न करता है
ଏବଂ ବୈରର ଅନ୍ତ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ ମନୁଷ୍ୟ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଉଚ୍ଛେଦ ପାଇଁ ଯତ୍ନ କରେ। କିନ୍ତୁ ପଳାଇଥିବା ଶତ୍ରୁକୁ ପଛୁଆ କରିବା—ଯାହାକୁ ‘ଅନୁବନ୍ଧ’ କୁହାଯାଏ—ଏହା ମଧ୍ୟ ପାପକର୍ମ। କାରଣ ଯେମାନଙ୍କର ମୃତ୍ୟୁ ନିଶ୍ଚିତ ବୋଲି ଧରାଯାଏ, ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କେହି କେହି ବଞ୍ଚିଯାନ୍ତି; ଏବଂ ସେଇ ଅବଶିଷ୍ଟ ଶତ୍ରୁ ପୁଣି ଶକ୍ତି ସଞ୍ଚୟ କରି, ବିଜେତା ପକ୍ଷରେ ବଞ୍ଚିଥିବା ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଏକଜଣକୁ ମଧ୍ୟ ଜୀବିତ ରଖିବାକୁ ଚାହେ ନାହିଁ। ଏହିପରି ଶତ୍ରୁର ଅନ୍ତ କରିବା ଆକାଂକ୍ଷାରେ ସେ ପ୍ରତିପକ୍ଷ ଦଳକୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଧ୍ୱଂସ କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରେ।
The dilemma is whether dharma-oriented restraint should continue when the counterpart repeatedly acts in bad faith—forcing a choice between peace-seeking compromise and duty-bound assertion of lawful sovereignty through organized confrontation.
The chapter teaches that dharma includes context-sensitive firmness: compassion and humility are virtues, but for a ruler they must be integrated with responsibility to protect order, prevent further injustice, and act decisively when persuasion fails.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is archival and justificatory—recording ethical reasoning, public judgment, and preparedness logic that frame later events within the epic’s broader inquiry into dharma and accountability.