Udyoga-parva Adhyāya 71 — Kṣatra-dharma Counsel, Public Legitimacy, and Mobilization
ह्वीरहता बाधते धर्म धर्मो हन्ति हत: श्रियम् श्रीहता पुरुषं हन्ति पुरुषस्याधनं वध:,नष्ट हुई लज्जा धर्मको नष्ट कर देती है। नष्ट हुआ धर्म मनुष्यकी सम्पत्तिका नाश कर देता है और नष्ट हुई सम्पत्ति उस मनुष्यका विनाश कर देती है, क्योंकि धनका अभाव ही मनुष्यका वध है
ଲଜ୍ଜା ନଷ୍ଟ ହେଲେ ଧର୍ମ ନଷ୍ଟ ହୁଏ; ଧର୍ମ ନଷ୍ଟ ହେଲେ ଶ୍ରୀ-ସମ୍ପଦ ନଷ୍ଟ ହୁଏ; ସମ୍ପଦ ନଷ୍ଟ ହେଲେ ମନୁଷ୍ୟ ନିଜେ ନଷ୍ଟ ହୁଏ—କାରଣ ଧନହୀନତା ହିଁ ମନୁଷ୍ୟର ବଧ।
युधिछिर उवाच