Udyoga-parva Adhyāya 71 — Kṣatra-dharma Counsel, Public Legitimacy, and Mobilization
युधिछिर उवाच यत् तुभ्यं रोचते कृष्ण स्वस्ति प्राप्तुहि कौरवान् । कृतार्थ स्वस्तिमन्तं त्वां द्रक्ष्यामि पुनरागतम्,युधिष्ठिर बोले--श्रीकृष्ण! आपकी जैसी रुचि हो, वही कीजिये। आपका कल्याण हो। आप प्रसन्नतापूर्वक कौरवोंके पास जाइये। आशा है, मैं पुन: आपको अपने कार्यमें सफल होकर यहाँ सकुशल लौटा हुआ देखूँगा
yudhiṣṭhira uvāca | yat tubhyaṃ rocate kṛṣṇa svasti prāptu hi kauravān | kṛtārthaṃ svastimantaṃ tvāṃ drakṣyāmi punarāgatam ||
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ କୃଷ୍ଣ! ତୁମକୁ ଯାହା ରୋଚେ ସେହି କର। ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ପ୍ରସନ୍ନଚିତ୍ତରେ କୌରବମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଅ। ମୁଁ ଆଶା କରୁଛି—କାର୍ଯ୍ୟସିଦ୍ଧି କରି ତୁମେ ପୁନଃ ଏଠାକୁ କୁଶଳରେ ଫେରିବ।
युधिछिर उवाच