
Udyoga Parva, Adhyāya 55 — Sañjaya’s Report on Pāṇḍava Readiness and Arjuna’s Dhvaja
Upa-parva: Sañjaya–Duryodhana Saṃvāda (War Readiness and the Pāṇḍava Chariots) — within Udyoga Parva
Duryodhana queries Sañjaya about Yudhiṣṭhira’s intentions after obtaining seven akṣauhiṇīs, framing the issue as imminent strategic engagement. Sañjaya reports high Pāṇḍava morale: Yudhiṣṭhira is portrayed as pleased and war-ready, with Bhīma, Arjuna, and the twins unafraid. The account then concentrates on Arjuna’s exceptional chariot and the construction and visual properties of its dhvaja: crafted through divine or superhuman artistry (Bhauvana with Śakra/Indra; Tvaṣṭṛ with Dhātṛ), the banner displays many forms, appears expansive in all directions, and is described through similes (rainbow, smoke ascending to the sky) to convey multi-colored radiance and non-obstructive vastness. The chapter concludes by cataloging the divine-quality horse teams: Arjuna’s fast white horses granted by Citraratha; Bhīma’s powerful, wind-speed mounts; Sahadeva’s distinctive horses; Nakula’s Indra-gifted steeds; and similarly excellent horses for Subhadrā’s son and the Draupadeya princes. The thematic thrust is a combined military inventory and symbolic assertion of preparedness, intended to inform policy and influence perception at the Kuru court.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को बताता है कि युधिष्ठिर युद्ध के लिए भीतर-ही-भीतर अत्यन्त उद्यत हैं; भीम, अर्जुन और दोनों यमज भी निर्भय हैं—मानो शान्ति-प्रयासों के पीछे एक प्रचण्ड संकल्प धधक रहा हो। → अर्जुन अपने दिव्य रथ को दिशाओं को प्रकाशित करते हुए अस्त्र-मन्त्रों की परीक्षा हेतु सज्ज करता है; उधर दुर्योधन संजय से पाण्डवों की ‘जूए में हारी हुई’ स्थिति का उपहास करते हुए अर्जुन के रथ, अश्वों और ध्वज की भव्यता का विवरण पूछता है—ईर्ष्या और जिज्ञासा साथ-साथ बढ़ती है। → संजय के वर्णन में अर्जुन का ध्वज एक योजन तक दिशाओं को तिर्यक्-ऊर्ध्व रोकता-सा प्रतीत होता है; वृक्षों से घिरा होने पर भी न अटकने वाली, बहुरंगी इन्द्रधनुष-सी, विश्वरूप-सी माया—भौम (विश्वकर्मा/दैवी शिल्प) द्वारा रचित ध्वज की अलौकिकता अध्याय का शिखर बनती है। → संजय पाण्डव-पक्ष की तैयारी, रथ-ध्वज-रथवाहक-घोड़ों की दिव्यता और योद्धाओं की निर्भीकता का चित्र पूरा करता है; दुर्योधन के प्रश्नों का उत्तर उसे यह संकेत देता है कि सामने केवल मनुष्य-बल नहीं, देव-समर्थित तेज भी खड़ा है। → दुर्योधन की ईर्ष्या-भरी दृष्टि और पाण्डवों की बढ़ती युद्ध-तत्परता अगले संवाद/निर्णय की ओर धकेलती है—क्या यह वैभव उसे शान्ति की ओर मोड़ेगा या हठ को और कठोर करेगा?
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें दुर्योधनवाक्यविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ५५ ॥। अपन प्रात बछ। अफड-्-क्ज षट्पज्चाशत्तमो< ध्याय: संजयद्वारा अर्जुनके ध्वज एवं अश्वोंका तथा युधिष्ठिर आदिढके घोड़ोंका वर्णन दुर्योधन उवाच अक्षौहिणी: सप्त लब्ध्वा राजभि: सह संजय । किंस्विदिच्छति कौन्तेयो युद्धप्रेप्सुर्युधिछ्िर:,दुर्योधनने पूछा--संजय! यह तो बताओ, सात अक्षौहिणी सेना पाकर राजाओंसहित कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर युद्धकी इच्छासे अब कौन-सा कार्य करना चाहते हैं?
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ସଞ୍ଜୟ! ରାଜାମାନଙ୍କ ସହିତ ସାତ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ପାଇ, ଯୁଦ୍ଧେଚ୍ଛୁ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏବେ କ’ଣ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛନ୍ତି?
Verse 2
संजय उवाच अतीव मुदितो राजन युद्धप्रेप्सुर्युधिष्ठिर: । भीमसेनार्जुनौी चोभौ यमावपि न बिभ्यत:,संजयने कहा--राजन! युधिष्छिर युद्धकी अभिलाषा लेकर मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न हो रहे हैं। भीमसेन, अर्जुन तथा दोनों भाई नकुल-सहदेव भी भयभीत नहीं हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ରାଜନ! ଯୁଦ୍ଧେଚ୍ଛୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଅନ୍ତରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ। ଭୀମସେନ ଓ ଅର୍ଜୁନ—ଉଭୟ—ଏବଂ ଯମଜ ଭ୍ରାତା (ନକୁଳ-ସହଦେବ) ମଧ୍ୟ ଭୟ କରୁନାହାନ୍ତି।
Verse 3
रथं तु दिव्यं कौन्तेय: सर्वा विभ्राजयन् दिश: । मन्त्र जिज्ञासमान: सन् बीभत्सु: समयोजयत्
ତାପରେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ବୀଭତ୍ସୁ (ଅର୍ଜୁନ) ମନ୍ତ୍ରର ମର୍ମ ଜାଣିବାକୁ ଆଗ୍ରହୀ ହୋଇ, ସମସ୍ତ ଦିଗକୁ ଦୀପ୍ତ କରୁଥିବା ସେଇ ଦିବ୍ୟ ରଥକୁ ଯଥାବିଧି ସଜାଇଲେ।
Verse 4
कुन्तीकुमार अर्जुनने तो अस्त्रप्रयोगसम्बन्धी मन्त्रकी परीक्षाके लिये अपने दिव्य रथकी प्रभासे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए उसे जोत रखा था ।। तमपश्याम संनद्ध मेघं विद्युद्युतं यथा । समन्तात् समभिध्याय हृष्पमाणो5भ्यभाषत
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କବଚଧାରୀ, ଭୟଙ୍କର, ବିଦ୍ୟୁତ୍ଦ୍ୟୁତିରେ ଦୀପ୍ତ ମେଘ ପରି ଦେଖିଲି। ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ଭଲଭାବେ ନିହାରି, ହର୍ଷରେ ପୁଲକିତ ହୋଇ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କଲି।
Verse 5
उस समय स्वर्णमय कवच धारण किये अर्जुन हमें बिजलीके प्रकाशसे सुशोभित मेघके समान दिखायी दे रहे थे। उन्होंने सब ओरसे उन मन्त्रोंका सम्यक् चिन्तन करके हर्षसे उल्लसित होकर मुझसे कहा-- ।। पूर्वरूपमिदं पश्य वयं जेष्याम संजय । बीभत्सुर्मा यथोवाच तथावैम्यहमप्युत,“संजय! हमलोग युद्धमें अवश्य विजयी होंगे। उस विजयका यह पूर्वचिह्न अभीसे प्रकट हो रहा है। तुम भी देख लो।” राजन! अर्जुनने मुझसे जैसा कहा था, वैसा ही मैं भी समझता हूँ
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଅର୍ଜୁନ ମୋତେ କହିଲେ, “ସଞ୍ଜୟ! ଏହି ପୂର୍ବଚିହ୍ନକୁ ଦେଖ; ଆମେ ନିଶ୍ଚୟ ଜୟୀ ହେବୁ।” ବୀଭତ୍ସୁ ଯେପରି କହିଥିଲେ, ମୁଁ ମଧ୍ୟ ସେପରି ହିଁ ବୁଝୁଛି।
Verse 6
दुर्योधन उवाच प्रशंसस्यभिनन्दंस्तान् पार्थानक्षपराजितान् । अर्जुनस्य रथे ब्रूहि कथमश्चा: कथं ध्वजा:,दुर्योधन बोला--संजय! तुम तो जूएमें हारे हुए कुन्तीपुत्रोंका अभिनन्दन करते हुए उनकी बड़ी प्रशंसा करने लगे। बताओ तो सही, अर्जुनके रथमें कैसे घोड़े और कैसे ध्वज हैं?
ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଲା—ସଞ୍ଜୟ! ପାଶାରେ ପରାଜିତ ସେହି ପାର୍ଥମାନଙ୍କୁ ତୁମେ ପ୍ରଶଂସା କରି ଅଭିନନ୍ଦନ କରୁଛ। କହ, ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ରଥରେ କେମିତି ଘୋଡ଼ା? କେମିତି ଧ୍ୱଜ?
Verse 7
संजय उवाच भौमन: सह शक्रेण बहुचित्रं विशाम्पते । रूपाणि कल्पयामास त्वष्टा धाता सदा विभो,संजयने कहा--प्रजानाथ! विश्वकर्मा त्वष्टा तथा प्रजापतिने इन्द्रके साथ मिलकर अर्जुनके रथकी ध्वजामें अनेक प्रकारके रूपोंकी रचना की है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ପ୍ରଜାନାଥ! ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ସହ ମିଶି ତ୍ୱଷ୍ଟା ଓ ଧାତା ଅନେକ ବିଚିତ୍ର ରୂପ କଳ୍ପନା କରି ଗଢ଼ିଛନ୍ତି।
Verse 8
ध्वजे हि तस्मिन् रूपाणि चक्ुस्ते देवमायया । महाधनानि दिव्यानि महान्ति च लघूनि च,उन तीनोंने देवमायाके द्वारा उस ध्वजमें छोटी-बड़ी अनेक प्रकारकी बहुमूल्य एवं दिव्य मूर्तियोंका निर्माण किया है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଦେବମାୟାର ପ୍ରଭାବରେ ସେହି ଧ୍ୱଜରେ ସେମାନେ ଅନେକ ଦିବ୍ୟ ଓ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମୂଲ୍ୟବାନ ରୂପ ପ୍ରକଟ କରିଥିଲେ—କିଛି ବଡ଼, କିଛି ଛୋଟ।
Verse 9
भीमसेनानुरोधाय हनूमान् मारुतात्मज: । आत्मप्रतिकृतिं तस्मिन् ध्वज आरोपयिष्यति,भीमसेनके अनुरोधकी रक्षाके लिये पवननन्दन हनुमानजी उस ध्वजमें युद्धके समय अपने स्वरूपको स्थापित करेंगे
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ଭୀମସେନଙ୍କ ଅନୁରୋଧକୁ ସମ୍ମାନ ଦେଇ ତାଙ୍କର ରକ୍ଷାର୍ଥେ ପବନପୁତ୍ର ହନୁମାନ ଯୁଦ୍ଧକାଳେ ସେଇ ଧ୍ୱଜରେ ଆରୋହଣ କରି ସେଠାରେ ନିଜ ସ୍ୱରୂପର ଏକ ପ୍ରତିକୃତି ସ୍ଥାପନ କରିବେ।
Verse 10
सर्वा दिशो योजनमात्रमन्तरं स तिर्यगूर्ध्व च रुरोध वै ध्वज: । न सज्जते5सौ तरुभि: संवृतो5पि तथा हि माया विहिता भौमनेन,उस ध्वजने एक योजनतक सम्पूर्ण दिशाओं तथा अगल-बगल एवं ऊपरके अवकाशको व्याप्त कर रखा था। विश्वकर्माने ऐसी माया रच रखी है कि वह ध्वज वृक्षोंसे आवृत अथवा अवरुद्ध होनेपर भी कहीं अटकता नहीं है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ସେଇ ଧ୍ୱଜ ଏକ ଯୋଜନ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସମସ୍ତ ଦିଗରେ, ପାର୍ଶ୍ୱ ଓ ଉର୍ଦ୍ଧ୍ୱ ଦିଗରେ ମଧ୍ୟ, ମନେ ହେଉଥିଲା ଯେ ଆକାଶକୁ ଅଟକାଇ ରଖିଛି। ତଥାପି ଗଛମାନେ ଘେରିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ କେଉଁଠି ଅଟକୁନଥିଲା— ଏହିପରି ଭୌମନଙ୍କ ରଚିତ ମାୟା ଥିଲା।
Verse 11
यथा55काशे शक्रधनु: प्रकाशते न चैकवर्ण न च वेझि कि नु तत् । तथा ध्वजो विहितो भौमनेन बह्दाकारं दृश्यते रूपमस्य
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ଯେପରି ଆକାଶରେ ଇନ୍ଦ୍ରଧନୁ ପ୍ରକାଶିତ ହୁଏ— ସେ ଏକ ରଙ୍ଗର ନୁହେଁ, ଏବଂ ସେଟି ଆସଲେ କ’ଣ ତାହା ନିଶ୍ଚିତ ହୁଏ ନାହିଁ— ସେପରି ଭୌମନଙ୍କ ନିର୍ମିତ ଧ୍ୱଜ ଅନେକ ଆକାରରେ ଦିଶେ।
Verse 12
जैसे आकाशमें बहुरंगा इन्द्रधनुष प्रकाशित होता है और यह समझमें नहीं आता कि वह क्या है? ठीक ऐसा ही विश्वकर्माका बनाया हुआ वह रंग-बिरंगा ध्वज है। उसका रूप अनेक प्रकारका दिखायी देता है ।। यथाग्निधूमो दिवमेति रुद्ध्वा वर्णान् बिश्रत् तैजसांश्रित्ररूपान् । तथा ध्वजो विहितो भौमनेन न चेद् भारो भविता नोत रोध:,जैसे अग्निसहित धूम विचित्र तेजोमय आकार और रंग धारण करके सब ओर फैलकर ऊपर आकाशकी ओर बढ़ता जाता है, उसी प्रकार विश्वकर्माने उस ध्वजका निर्माण किया है। उसके कारण रथपर कोई भार नहीं बढ़ता है और न उसकी गतिमें कहीं कोई रुकावट ही पैदा होती है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ଯେପରି ଆକାଶରେ ବହୁରଙ୍ଗା ଇନ୍ଦ୍ରଧନୁ ପ୍ରକାଶିତ ହୁଏ ଓ ସେଟି ଆସଲେ କ’ଣ ତାହା ସହଜେ ବୁଝାଯାଏ ନାହିଁ, ସେପରି ବିଶ୍ୱକର୍ମାଙ୍କ ନିର୍ମିତ ସେଇ ବର୍ଣ୍ଣବିଚିତ୍ର ଧ୍ୱଜ ଅନେକ ରୂପରେ ଦିଶେ। ଆଉ ଯେପରି ଅଗ୍ନିସହିତ ଧୂଆଁ ବିଚିତ୍ର ତେଜୋମୟ ଆକାର ଓ ବର୍ଣ୍ଣ ଧାରଣ କରି ସମସ୍ତ ଦିଗରେ ବ୍ୟାପି ଉପରକୁ ଆକାଶ ଦିଗେ ବଢ଼ିଯାଏ, ସେପରି ଭୌମନ ସେଇ ଧ୍ୱଜକୁ ରଚିଛନ୍ତି; ତାହାରେ ରଥର ଭାର ବଢ଼େ ନାହିଁ, ଗତିରେ ମଧ୍ୟ କୌଣସି ରୋଧ ହୁଏ ନାହିଁ।
Verse 13
श्वेतास्तस्मिन् वातवेगा: सदश्चा दिव्या युक्त श्रित्ररथेन दत्ता: । भुव्यन्तरिक्षे दिवि वा नरेन्द्र येषां गतिहीयते नात्र सर्वा | शतं यत् तत् पूर्यते नित्यकालं हतं हतं दत्तवरं पुरस्तात्,अर्जुनके उस रथमें वायुके समान वेगशाली दिव्य एवं उत्तम जातिके श्वेत अश्व जुते हुए हैं, जिन्हें गन्धर्वराज चित्ररथने दिया था। नरेन्द्र! पृथ्वी, आकाश तथा स्वर्ग आदि किसी भी स्थानमें उन अश्वोंकी पूर्ण गति क्षीण या अवरुद्ध नहीं होती है। उस रथमें पूरे सौ घोड़े सदा जुते रहते हैं। उनमेंसे यदि कोई मारा जाता है तो पहलेके दिये हुए वरके प्रभावसे नया घोड़ा उत्पन्न होकर उसके स्थानकी पूर्ति कर देता है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ନରେନ୍ଦ୍ର! ସେଇ ରଥରେ ପବନସମ ବେଗଶାଳୀ, ଦିବ୍ୟ ଓ ଉତ୍ତମ ଜାତିର ଶ୍ୱେତ ଅଶ୍ୱମାନେ ଯୁକ୍ତ ଅଛନ୍ତି; ସେମାନେ ଗନ୍ଧର୍ବରାଜ ଚିତ୍ରରଥଙ୍କ ଦାନ। ପୃଥିବୀ, ଅନ୍ତରିକ୍ଷ କିମ୍ବା ସ୍ୱର୍ଗ— କେଉଁଠି ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କର ପୂର୍ଣ୍ଣ ଗତି କ୍ଷୀଣ ହୁଏ ନାହିଁ, ଅବରୁଦ୍ଧ ମଧ୍ୟ ହୁଏ ନାହିଁ। ସେଇ ରଥରେ ସଦା ଶତ ଅଶ୍ୱ ପୂର୍ଣ୍ଣ ରହନ୍ତି; ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କେହି ହତ ହେଲେ ମଧ୍ୟ, ପୂର୍ବଦତ୍ତ ବରର ପ୍ରଭାବରେ ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ଅନ୍ୟ ଅଶ୍ୱ ପ୍ରାଦୁର୍ଭୂତ ହୋଇ ସ୍ଥାନ ପୂରଣ କରେ।
Verse 14
तथा राज्ञो दन्तवर्णा बृहन्तो रथे युक्ता भान्ति ठद्दीर्यतुल्या: । ऋक्षप्रख्या भीमसेनस्य वाहा रथे वायोस्तुल्यवेगा बभूवु:,राजा युधिष्ठिरके रथमें भी वैसे ही शक्तिशाली श्वेतवर्णके विशाल अश्व जुते हुए हैं, जो अत्यन्त सुशोभित होते हैं। भीमसेनके घोड़ोंका रंग रीछके समान काला है। वे उनके रथरमें जोते जानेपर वायुके समान तीव्र वेगसे चलते हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ରାଜାଙ୍କ ରଥରେ ଦନ୍ତବର୍ଣ୍ଣ (ହାତୀଦାନ୍ତ ସଦୃଶ ଧଳା) ବୃହତ୍ ଅଶ୍ୱମାନେ ଯୁକ୍ତ ହୋଇ ଅପୂର୍ବ ଶୋଭା ଓ ଅଦ୍ୱିତୀୟ ସ୍ଥିରତାରେ ଦୀପ୍ତିମାନ ହୁଅନ୍ତି। ଭୀମସେନଙ୍କ ଘୋଡ଼ାମାନେ ଋକ୍ଷ ସଦୃଶ କଳା; ରଥରେ ଯୋତାଯାଉଥିବା ସହିତେ ସେମାନେ ବାୟୁ ସମ ବେଗରେ ଧାଉଥାନ୍ତି।
Verse 15
कल्माषाज्जस्तित्तिरिचित्रपृष्ठा भ्रात्रा दत्ता: प्रीयता फाल्गुनेन । भ्रातुर्वीरस्य स्वैस्तुरज़ैविशिष्टा मुदा युक्ता: सहदेवं वहन्ति,अर्जुनने प्रसन्न होकर अपने छोटे भाई सहदेवको जो अश्व प्रदान किये थे, जिनके सम्पूर्ण अंग विचित्र रंगके हैं और पृष्ठभाग भी तीतर पक्षीके समान चितकबरे प्रतीत होते हैं तथा जो वीर भाई अर्जुनके अपने अभश्वोंकी अपेक्षा भी उत्कृष्ट हैं, ऐसे सुन्दर अश्व बड़ी प्रसन्नताके साथ सहदेवके रथका भार वहन करते हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଫାଲ୍ଗୁନ (ଅର୍ଜୁନ) ଆନନ୍ଦିତ ହୋଇ ଛୋଟ ଭାଇ ସହଦେବଙ୍କୁ କଲ୍ମାଷ ଜାତିର ଅଶ୍ୱ ଦାନ କଲେ; ସେମାନଙ୍କ ଦେହ ସମଗ୍ରେ ବିଚିତ୍ର ବର୍ଣ୍ଣ ମିଶିଥାଏ ଏବଂ ପିଠ ତିତ୍ତିରି ପକ୍ଷୀ ପରି ଚିତ୍ରିତ ଦିଶେ। ବୀର ଭ୍ରାତାଙ୍କ ନିଜ ଅଶ୍ୱମାନଙ୍କଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେଇ ସୁନ୍ଦର ଅଶ୍ୱମାନେ ଆନନ୍ଦରେ ଯୁକ୍ତ ହୋଇ ସହଦେବଙ୍କ ରଥଭାର ବହନ କରନ୍ତି।
Verse 16
माद्रीपुत्रं नकुलं त्वाजमीढ महेन्द्रदत्ता हरयो वाजिमुख्या: । समा वायोर्बलवन्तस्तरस्विनो वहन्ति वीर वृत्रशत्रुं यथेन्द्रम्,अजमीढकुलनन्दन! देवराज इन्द्रके दिये हुए हरे रंगके उत्तम घोड़े, जो वायुके समान बलवान तथा वेगवान् हैं, माद्रीकुमार वीर नकुलके रथका भार वहन करते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे पहले वे वृत्रशत्रु देवेन्द्रका भार वहन किया करते थे
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ଅଜମୀଢବଂଶନନ୍ଦନ! ମହେନ୍ଦ୍ର ଦତ୍ତ ହରିତବର୍ଣ୍ଣ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଅଶ୍ୱମାନେ ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର ବୀର ନକୁଳଙ୍କ ରଥଭାର ବହନ କରୁଛନ୍ତି। ସେମାନେ ବାୟୁ ସମ ବଳବାନ ଓ ବେଗବାନ; ଯେପରି ପୂର୍ବେ ବୃତ୍ରଶତ୍ରୁ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ବହନ କରୁଥିଲେ, ସେପରି ଏବେ ନକୁଳଙ୍କୁ ବହନ କରୁଛନ୍ତି।
Verse 17
तुल्याश्वैभिवयसा विक्रमेण महाजवाश्षित्ररूपा: सदश्चा: | सौभद्रादीन् द्रौपदेयान् कुमारान् वहन्त्यश्वा देवदत्ता बृहन्त:,अवस्था और बल-पराक्रममें पूर्वोक्त अश्वोंके ही समान महान् वेगशाली, विचित्र रूप- रंगवाले उत्तम जातिके अश्व सुभद्रानन्दन अभिमन्युसहित द्रौपदीके पुत्रोंका भार वहन करते हैं। वे विशाल अश्व भी देवताओंके दिये हुए हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ପୂର୍ବେ ବର୍ଣ୍ଣିତ ଅଶ୍ୱମାନଙ୍କ ସମାନ ବୟସ ଓ ପରାକ୍ରମ ଥିବା, ମହାବେଗୀ ଏବଂ ବିଚିତ୍ର ରୂପ-ବର୍ଣ୍ଣଯୁକ୍ତ ଉତ୍ତମ ଜାତିର ଅଶ୍ୱମାନେ ସୁଭଦ୍ରାନନ୍ଦନ ଅଭିମନ୍ୟୁ ସହିତ ଦ୍ରୌପଦୀପୁତ୍ର କୁମାରମାନଙ୍କ ଭାର ବହନ କରୁଛନ୍ତି। ସେଇ ବୃହତ୍ ଅଶ୍ୱମାନେ ମଧ୍ୟ ଦେବଦତ୍ତ।
Verse 56
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि संजयवाक्ये षट्पञ्चाशत्तमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଯାନସନ୍ଧିପର୍ବରେ ସଞ୍ଜୟବାକ୍ୟ ଅନୁସାରେ ଛପନତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The tension lies between political prudence and escalation: Duryodhana seeks actionable intelligence to choose strategy, while Sañjaya’s report underscores that the opposing side interprets readiness as justified response—raising the question of when preparedness becomes moral inevitability.
The chapter uses material symbols (dhvaja, horses, chariot) to teach that power is both logistical and perceptual: morale, legitimacy, and the management of signs can shape strategic reality alongside troop counts.
No explicit phalaśruti is stated in the provided verses; the meta-function is archival and diagnostic—preserving a court report that frames preparedness and symbolic capital as determinants in state decision-making.