
Sanatsujāta-Āhvāna (Summoning Sanatsujāta) — Vidura’s Invocation and Dhṛtarāṣṭra’s Doubt
Upa-parva: Sanatsujātīya Parva (Prelude: Summoning Sanatsujāta)
Chapter 41.0 opens with Dhṛtarāṣṭra requesting any remaining, unspoken counsel from Vidura, acknowledging the unusual depth of Vidura’s speech. Vidura responds by pointing to the “ancient, eternal” Kumāra—Sanatsujāta—who has taught that death is not ultimate, and who can articulate both esoteric and accessible teachings grounded in the heart. Dhṛtarāṣṭra presses Vidura to speak directly; Vidura demurs, citing his birth in a śūdra womb and claiming he is not fit to expand beyond what he has already conveyed, while affirming the permanence of the Kumāra’s wisdom. Dhṛtarāṣṭra then asks for the means of meeting that ancient teacher “here and now” in the body. Vaiśaṃpāyana narrates that Vidura meditates upon the sage; the sage, discerning the thought, appears and is received with proper rites. Vidura then petitions Sanatsujāta to resolve Dhṛtarāṣṭra’s mental doubt—one Vidura cannot answer—so that the king may become transcendent to pleasure and pain, and endure opposites such as gain/loss, fear/anger, hunger/thirst, lethargy/restlessness, and desire/anger.
Chapter Arc: विदुर के वचनों से उद्विग्न धृतराष्ट्र, राजसभा में सनत्सुजात को बुलाकर एक ही प्रश्न को पकड़ लेते हैं—यदि ‘मृत्यु नहीं’ तो देव-दानव तप करके ‘अमृतत्व’ क्यों चाहते रहे? → सनत्सुजात ‘मृत्यु’ के अर्थ को उलट देते हैं: कोई उसे कर्म-फल की अनिवार्यता मानता है, कोई अज्ञानजन्य भ्रान्ति। धृतराष्ट्र की जिज्ञासा बढ़ती है—कर्म, भोग, और देह-बंधन कैसे मनुष्य को मृत्यु के चक्र में घुमाते हैं? → उपदेश का शिखर तब आता है जब सनत्सुजात स्पष्ट करते हैं कि ‘मृत्यु’ का मूल अज्ञान है; कर्म-फल में आसक्ति और भोग-योग देही को बाँधते हैं, और विवेक-योग/सदर्थ-ज्ञान के अभाव में वह उससे ‘तर’ नहीं पाता। → सनत्सुजात क्षत्रिय-धर्म के भीतर ब्रह्म-प्राप्ति का मार्ग दिखाते हैं—संयम, सत्य, आर्जव, ह्री, दम, शौच, विद्या जैसे द्वारों से दुर्लभ ‘ब्राह्मी श्री’ (आध्यात्मिक समृद्धि) मिलती है; मान (अहंकार/प्रतिष्ठा) और मौन (अन्तर्मुख साधना) का सहवास कठिन है—इसलिए भीतर की साधना को प्रधान करो। → धृतराष्ट्र के भीतर ज्ञान की झलक तो पड़ती है, पर प्रश्न शेष रहता है—क्या वह इस उपदेश को अपने पुत्र-मोह और राज्य-आसक्ति पर लागू कर पाएँगे?
Verse 1
अत द्विचत्वारिशोड् ध्याय: सनत्सुजातजीके द्वारा धृतराष्ट्रके विविध प्रश्नोंका उत्तर वैशम्पायन उवाच ततो राजा धृतराष्ट्रो मनीषी सम्पूज्य वाक्यं विदुरेरितं तत् सनत्सुजातं रहिते महात्मा पप्रच्छ बुद्धि परमां बुभूषन्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर बुद्धिमान एवं महामना राजा धुृतराष्ट्रने विदुरके कहे हुए उस वचनका भलीभाँति आदर करके उत्कृष्ट ज्ञानकी इच्छासे एकान्तमें सनत्सुजात मुनिसे प्रश्न किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ବୁଦ୍ଧିମାନ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ବିଦୁର କହିଥିବା ଉପଦେଶକୁ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ସମ୍ମାନ କରି, ପରମ ବୁଦ୍ଧି ଜାଣିବା ଇଚ୍ଛାରେ, ଏକାନ୍ତରେ ମହାତ୍ମା ସନତ୍ସୁଜାତଙ୍କୁ ପ୍ରଶ୍ନ କଲେ।
Verse 2
धृतराष्ट उवाच सनत्सुजात यदिदं शृणोमि न मृत्युरस्तीति तव प्रवादम् । देवासुरा ह्याचरन् ब्रह्मचर्य- ममृत्यवे तत् कतरन्नु सत्यम्,धृतराष्ट्र बोले--सनत्सुजातजी! मैं यह सुना करता हूँ कि मृत्यु है ही नहीं, ऐसा आपका सिद्धान्त है। साथ ही यह भी सुना है कि देवता और असुरोंने मृत्युसे बचनेके लिये ब्रह्मचर्यका पालन किया था। इन दोनोंमें कौन-सी बात यथार्थ है?
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ହେ ସନତ୍ସୁଜାତ! ମୁଁ ଶୁଣୁଛି ଯେ ଆପଣଙ୍କ ମତ ହେଉଛି—ମୃତ୍ୟୁ ସତ୍ୟରେ ନାହିଁ। ଆଉ ଏହା ମଧ୍ୟ ଶୁଣୁଛି ଯେ ଦେବତା ଓ ଅସୁରମାନେ ଅମୃତ୍ୟୁତ୍ୱ ପାଇଁ ବ୍ରହ୍ମଚର୍ୟ ଆଚରଣ କରିଥିଲେ। ଏହି ଦୁଇଟି ମଧ୍ୟରୁ ସତ୍ୟ କେଉଁଟି?
Verse 3
सनत्युजात उवाच अमृत्यु: कर्मणा केचिन्मृत्युर्नास्तीति चापरे । शृणु मे ब्रुवतो राजन् यथैतन्मा विशड्किथा:,सनत्सुजातने कहा--राजन्! (इस विषयमें दो पक्ष हैं) मृत्यु है और वह (ब्रह्मचर्ययालनरूप) कर्मसे दूर होती है--यह एक पक्ष है और "मृत्यु है ही नहीं--यह दूसरा पक्ष है। परंतु यह बात जैसी है, वह मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो और मेरे कथनमें संदेह न करना
ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଏହି ବିଷୟରେ ଦୁଇଟି ମତ ଅଛି। କେହି କହନ୍ତି ମୃତ୍ୟୁ ଅଛି, କିନ୍ତୁ ନିୟମିତ ସାଧନାରେ ତାହାକୁ ଜୟ କରାଯାଏ; ଅନ୍ୟେ କହନ୍ତି ମୃତ୍ୟୁ ନାହିଁ। ଏବେ ଯଥାର୍ଥ ଯେପରି, ସେପରି ମୁଁ ତୁମକୁ କହୁଛି—ଶୁଣ, ଏବଂ ମୋ କଥାରେ ସନ୍ଦେହ କରନି।
Verse 4
उभे सत्ये क्षत्रियैतस्य विद्धि मोहान्मृत्यु: सम्मतो5यं कवीनाम् । प्रमाद॑ वै मृत्युमहं ब्रवीमि तथाप्रमादममृतत्वं ब्रवीमि,क्षत्रिय! इस प्रश्नके उक्त दोनों ही पहलुओंको सत्य समझो। कुछ विद्वानोंने मोहवश इस मृत्युकी सत्ता स्वीकार की है; किंतु मेरा कहना तो यह है कि प्रमाद ही मृत्यु है और अप्रमाद ही अमृत है
ହେ କ୍ଷତ୍ରିୟ! ଏହି ବିଷୟର ଉଭୟ ପକ୍ଷକୁ ସତ୍ୟ ବୋଲି ଜାଣ। କେତେକ କବି ଓ ଋଷି ମୋହବଶେ ମୃତ୍ୟୁକୁ ଏକ ପ୍ରକୃତ ଓ ଶେଷ ଶକ୍ତି ଭାବେ ମାନିଛନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ମୋର କଥା—ପ୍ରମାଦ ହିଁ ମୃତ୍ୟୁ, ଅପ୍ରମାଦ ହିଁ ଅମୃତତ୍ୱ।
Verse 5
प्रमादाद् वै असुरा: पराभव- न्नप्रमादाद् ब्रह्मभूता: सुराश्ष । नैव मृत्युर्व्याघ्र इवात्ति जन्तून् न हास्य रूपमुपलभ्यते हि,प्रमादके ही कारण असुरगण (आसुरी सम्पत्तिवाले) मृत्युसे पराजित हुए और अप्रमादसे ही देवगण (दैवी सम्पत्तिवाले) ब्रह्मस्वरूप हुए। यह निश्चय है कि मृत्यु व्याप्रके समान प्राणियोंका भक्षण नहीं करती, क्योंकि उसका कोई रूप देखनेमें नहीं आता
ପ୍ରମାଦରୁ ଆସୁରୀ ପ୍ରବୃତ୍ତି ପରାଜିତ ହୁଏ; ଅପ୍ରମାଦରୁ ଦେବୀ ପ୍ରବୃତ୍ତି ବ୍ରହ୍ମଭାବକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ। ମୃତ୍ୟୁ ବ୍ୟାଘ୍ର ପରି ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଜୀବମାନଙ୍କୁ ଭକ୍ଷଣ କରେ ନାହିଁ, କାରଣ ତାହାର କୌଣସି ଦୃଶ୍ୟ ରୂପ ମିଳେ ନାହିଁ।
Verse 6
यम॑ त्वेके मृत्युमतो<न्यमाहु- रात्मावसन्नममृतं ब्रह्मचर्यम् । पितृलोके राज्यमनुशास्ति देव: शिव: शिवानामशिवो5शिवानाम्,कुछ लोग इस प्रमादसे भिन्न “यम” को मृत्यु कहते हैं और हृदयसे दृढ़तापूर्वक पालन किये हुए ब्रह्मचर्यको ही अमृत मानते हैं। यमदेव पितृलोकमें राज्य-शासन करते हैं। वे पुण्यात्माओंके लिये मंगलमय और पापियोंके लिये अमंगलमय हैं
କେହି କହନ୍ତି, ପ୍ରମାଦରୁ ଭିନ୍ନ ‘ଯମ’ ହିଁ ମୃତ୍ୟୁ; ଆଉ କେହି କହନ୍ତି, ହୃଦୟରେ ଦୃଢ଼ଭାବେ ପାଳିତ ବ୍ରହ୍ମଚର୍ୟ ହିଁ ଅମୃତ। ଯମଦେବ ପିତୃଲୋକରେ ରାଜ୍ୟଶାସନ କରନ୍ତି—ପୁଣ୍ୟବାନଙ୍କ ପାଇଁ ଶୁଭ, ପାପୀଙ୍କ ପାଇଁ ଅଶୁଭ।
Verse 7
अस्यादेशान्रि:सरते नराणां क्रोध: प्रमादो लोभरूपश्न मृत्यु: । अहंगतेनैव चरन् विमार्गान् न चात्मनो योगमुपैति कश्चित्,इन यमकी आज्ञासे ही क्रोध, प्रमाद और लोभरूपी मृत्यु मनुष्योंके विनाशमें प्रवृत्त होती है। अहंकारके वशीभूत होकर विपरीत मार्गपर चलता हुआ कोई भी मनुष्य परमात्माका साक्षात्कार नहीं कर पाता
ଏହାର ଆଦେଶରୁ ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କ୍ରୋଧ, ପ୍ରମାଦ ଓ ଲୋଭ—ମୃତ୍ୟୁର ଏହି ରୂପଗୁଡ଼ିକ—ନିଷ୍କ୍ରମଣ କରି ବିନାଶ ପଥେ ଠେଲିଦିଏ। ଯେ ଅହଂକାରବଶେ କୁପଥରେ ଚାଲେ, ସେ ଆତ୍ମାସହ ଯୋଗ ପାଏ ନାହିଁ; ଏମିତି କେହି ପରମ ସାକ୍ଷାତ୍କାରକୁ ପହଞ୍ଚେ ନାହିଁ।
Verse 8
ते मोहितास्तद्वशे वर्तमाना इतः प्रेतास्तत्र पुन: पतन्ति । ततस्तान् देवा अनुविप्लवन्ते अतो मृत्युर्मरणाख्यामुपैति,मनुष्य (क्रोध, प्रमाद और लोभसे) मोहित होकर अहंकारके अधीन हो इस लोकसे जाकर पुनः-पुनः जन्म-मरणके चक्क्करमें पड़ते हैं। मरनेके बाद उनके मन, इन्द्रिय और प्राण भी साथ जाते हैं। शरीरसे प्राणरूपी इन्द्रियोंका वियोग होनेके कारण मृत्यु 'मरण' संज्ञाको प्राप्त होती है
ସନତ୍ସୁଜାତ କହନ୍ତି—ମୋହର ବଶରେ ରହିଥିବା ଲୋକେ ଏହି ଲୋକ ଛାଡ଼ି ଯାଇ ପୁଣି ପୁଣି ଅନ୍ୟ ଅବସ୍ଥାରେ ପଡ଼ନ୍ତି। ସେଠାରେ ଦେବଶକ୍ତିମାନେ ତାଙ୍କୁ ଅସ୍ଥିର କରି ଆଗକୁ ଠେଲି ନେଇଯାନ୍ତି; ତେଣୁ ଦେହଧାରଣର ପୁନଃପୁନଃ ଭଙ୍ଗକୁ ‘ମରଣ’ ବୋଲି କୁହାଯାଏ। କ୍ରୋଧ, ପ୍ରମାଦ ଓ ଲୋଭରେ ମୋହିତ ହେଲେ ଅହଂକାର ଓ ବନ୍ଧନ ଜନ୍ମେ, ଏବଂ ଜନ୍ମ-ମୃତ୍ୟୁର ଚକ୍ର ଚାଲିଥାଏ।
Verse 9
कर्मोदये कर्मफलानुरागा- स्तत्रानुयान्ति न तरन्ति मृत्युम् । सदर्थयोगानवगमात् समन्तात् प्रवर्तते भोगयोगेन देही,प्रारब्ध कर्मका उदय होनेपर कर्मके फलमें आसक्ति रखनेवाले लोग (देहत्यागके पश्चात) परलोकका अनुगमन करते हैं; इसीलिये वे मृत्युकी पार नहीं कर पाते। देहाभिमानी जीव परमात्मसाक्षात्कारके उपायको न जाननेसे विषयोंके उपभोगके कारण सब ओर (नाना प्रकारकी योनियोंमें) भटकता रहता है
ସନତ୍ସୁଜାତ କହନ୍ତି—ପ୍ରାରବ୍ଧ କର୍ମ ଉଦୟ ହେଲେ କର୍ମଫଳରେ ଆସକ୍ତ ଲୋକେ ଦେହତ୍ୟାଗ ପରେ ପରଲୋକର ଗତିକୁ ଅନୁସରଣ କରନ୍ତି; ତେଣୁ ସେମାନେ ମୃତ୍ୟୁକୁ ଅତିକ୍ରମ କରିପାରନ୍ତି ନାହିଁ। ପରମ ଶ୍ରେୟସ୍ର ଯୋଗ—ଆତ୍ମସାକ୍ଷାତ୍କାରର ଉପାୟ—ନ ଜାଣିବାରୁ ଦେହାଭିମାନୀ ଜୀବ ବିଷୟଭୋଗରେ ସବୁଦିଗରେ ଭ୍ରମଣ କରି ନାନା ଯୋନିରେ ଘୁରିବାକୁ ଲାଗେ।
Verse 10
तद् वै महामोहनमिन्द्रियाणां मिथ्यार्थयोगस्य गतिर्हि नित्या । मिथ्यार्थयोगाभिहतान्तरात्मा स्मरन्नुपास्ते विषयान् समन्तात्,इस प्रकार विषयोंका जो भोग है, वह अवश्य ही इन्द्रियोंको महान् मोहमें डालनेवाला है और इन झूठे विषयोंमें राग रखनेवाले मनुष्यकी उनकी ओर प्रवृत्ति होनी स्वाभाविक है। मिथ्याभोगोंमें आसक्ति होनेसे जिसके अन्त:करणकी ज्ञानशक्ति नष्ट हो गयी है, वह सब ओर विषयोंका ही चिन्तन करता हुआ मन-ही-मन उनका आस्वादन करता है
ନିଶ୍ଚୟ ଭାବେ ବିଷୟଭୋଗ ଇନ୍ଦ୍ରିୟମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମହାମୋହ; ଏବଂ ଯେ ମିଥ୍ୟା ଲକ୍ଷ୍ୟରେ ରାଗ ରଖେ, ତାହାର ଗତି ସେହିଦିଗକୁ ନିତ୍ୟ ହୋଇଯାଏ। ମିଥ୍ୟାଭୋଗାସକ୍ତିରେ ଅନ୍ତଃକରଣ ଆହତ ହୋଇ ବିବେକଶକ୍ତି ନଷ୍ଟପ୍ରାୟ ହେଲେ, ସେ ସବୁଦିଗରେ ବିଷୟକୁ ମନେ ପକାଇ ମନମଧ୍ୟରେ ତାହାକୁ ଉପାସନା କରେ।
Verse 11
अभिध्या वै प्रथमं हन्ति लोकान् कामक्रोधावनुगृहाशु पश्चात् । एते बालान् मृत्यवे प्रापयन्ति धीरास्तु धैर्येण तरन्ति मृत्युम्,पहले तो विषयोंका चिन्तन ही लोगोंको मारे डालता है। इसके बाद वह काम और क्रोधको साथ लेकर पुनः जल्दी ही प्रहार करता है। इस प्रकार ये विषय-चिन्तन (काम और क्रोध) ही विवेकहीन मनुष्यों-को मृत्युके निकट पहुँचाते हैं; परंतु जो स्थिर बुद्धिवाले पुरुष हैं, वे धैर्यसे मृत्युके पार हो जाते हैं
ସନତ୍ସୁଜାତ କହନ୍ତି—ପ୍ରଥମେ ବିଷୟଚିନ୍ତନ (ଅଭିଧ୍ୟା) ଲୋକଙ୍କୁ ନିହତ କରେ; ପରେ କାମ ଓ କ୍ରୋଧକୁ ସହଚର କରି ଶୀଘ୍ର ପୁଣି ପ୍ରହାର କରେ। ଏଭଳି ଏହି ଅଭିଧ୍ୟା—କାମ-କ୍ରୋଧ ସହିତ—ଅବିବେକୀମାନଙ୍କୁ ମୃତ୍ୟୁ ନିକଟକୁ ନେଇଯାଏ; କିନ୍ତୁ ଧୀରମାନେ ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଓ ସଂଯମରେ ମୃତ୍ୟୁକୁ ଅତିକ୍ରମ କରନ୍ତି।
Verse 12
सोभिध्यायन्नुत्पतितान् निहन्या- दनादरेणाप्रतिबुध्यमान: । नैनं मृत्युर्मुत्युरिवात्ति भूत्वा एवं विद्वान यो विनिहन्ति कामान्,(अत: जो मृत्युको जीतनेकी इच्छा रखता है,) उसे चाहिये कि परमात्माका ध्यान करके विषयोंको तुच्छ मानकर उन्हें कुछ भी न गिनते हुए उनकी कामनाओंको उत्पन्न होते ही नष्ट कर डाले। इस प्रकार जो विद्वान विषयोंकी इच्छाको मिटा देता है, उसको [साधारण प्राणियोंकी] मृत्युकी भाँति मृत्यु नहीं मारती (अर्थात् वह जन्म-मरणसे मुक्त हो जाता है)
ଏହେତୁ ଯେ ମୃତ୍ୟୁକୁ ଜିତିବାକୁ ଚାହେ, ସେ ପରମାତ୍ମାରେ ମନ ନିଶ୍ଚଳ କରି, ବିଷୟମାନଙ୍କୁ ତୁଚ୍ଛ ଭାବି, ସେମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଅନାଦର ରଖି, କାମନା ଉଦ୍ଭବ ହେବା ସହିତେ ତାହାକୁ ନଶ୍ଟ କରିଦେଉ। ଯେ ଜ୍ଞାନୀ ଏଭଳି ଭାବେ ଇଚ୍ଛାମାନଙ୍କୁ ବିନାଶ କରେ, ତାହାକୁ ମୃତ୍ୟୁ ସାଧାରଣ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କ ପରି ଗ୍ରାସ କରିପାରେ ନାହିଁ; ସେ ଜନ୍ମ-ମୃତ୍ୟୁର ଚକ୍ରକୁ ଅତିକ୍ରମ କରେ।
Verse 13
कामानुसारी पुरुष: कामाननु विनश्यति । कामान् व्युदस्य धुनुते यत् किंचित् पुरुषो रज:,कामनाओंके पीछे चलनेवाला मनुष्य कामनाओंके साथ ही नष्ट हो जाता है; परंतु ज्ञानी पुरुष कामनाओंका त्याग कर देनेपर जो कुछ भी जन्म-मरणरूप दुःख है, उन सबको वह नष्ट कर देता है
ଯେ ପୁରୁଷ କାମନାଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଚାଲେ, ସେ ସେହି କାମନା ସହିତେ ନଶ୍ଟ ହୁଏ; କିନ୍ତୁ ଜ୍ଞାନୀ ପୁରୁଷ କାମନା ତ୍ୟାଗ କରି ଅନ୍ତରରେ ଯେ କିଛି ରଜଃ-ମଳ ଅବଶିଷ୍ଟ ରହେ, ତାହାକୁ ଝାଡ଼ି ଦେଇ ଜନ୍ମ–ମୃତ୍ୟୁସଂବନ୍ଧୀୟ ଦୁଃଖକୁ ଜୟ କରେ।
Verse 14
तमो<प्रकाशो भूतानां नरको<यं प्रदृश्यते । मुहान्त इव धावन्ति गच्छन्त: श्वभ्रवत् सुखम्,काम ही समस्त प्राणियोंके लिये मोहक होनेके कारण तमोमय और अज्ञानरूप है तथा नरकके समान दुःखदायी देखा जाता है। जैसे मद्यपानसे मोहित हुए पुरुष चलते-चलते गड्ढडेकी ओर दौड़ पड़ते हैं, वैसे ही कामी पुरुष भागोंमें सुख मानकर उनकी ओर दौड़ते हैं
କାମ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କୁ ମୋହିତ କରେ; ତେଣୁ ଏହା ପ୍ରକାଶହୀନ ତମୋମୟ ଅଜ୍ଞାନସ୍ୱରୂପ ଏବଂ ଦୁଃଖଦାୟୀ ହେବାରୁ ନରକସଦୃଶ ଦେଖାଯାଏ। ଯେପରି ମଦ୍ୟପାନରେ ମୋହିତ ଲୋକ ଚାଲିଚାଲି ଦୌଡ଼ି ପଡ଼ି ଗଡ଼ଢାକୁ ଧାଉଁଥାଏ, ସେପରି କାମାସକ୍ତ ଲୋକ ବିଷୟକୁ ସୁଖ ଭାବି ସେଥିପାଇଁ ଧାଉଁଥାନ୍ତି—ଏବଂ ଅନର୍ଥରେ ପଡ଼ନ୍ତି।
Verse 15
अमूढवत्ते: पुरुषस्येह कुर्यात् कि वै मृत्युस्तार्ण इवास्य व्याघ्र: । अमन्यमान: क्षत्रिय किंचिदन्य- न्नाधीयीत निर्णुदन्निवास्य चायु:,जिसके चित्तकी वृत्तियाँ विषयभोगोंसे मोहित नहीं हुई हैं, उस ज्ञानी पुरुषका इस लोकमें तिनकोंके बनाये हुए व्याप्रके समान मृत्यु क्या बिगाड़ सकती है? इसलिये राजन! विषयभोगोंके मूल कारणरूप अज्ञानको नष्ट करनेकी इच्छासे दूसरे किसी भी सांसारिक पदार्थको कुछ भी न गिनकर उसका चिन्तन त्याग देना चाहिये
ଯାହାର ଚିତ୍ତବୃତ୍ତି ବିଷୟଭୋଗରେ ମୋହିତ ହୋଇନାହିଁ, ସେହି ଜ୍ଞାନୀ ପୁରୁଷ ପାଇଁ ଏହି ଲୋକରେ ମୃତ୍ୟୁ ତୃଣରେ ତିଆରି ବାଘ ପରି—କ’ଣ କରିପାରିବ? ତେଣୁ, ହେ କ୍ଷତ୍ରିୟ, ଭୋଗର ମୂଳ କାରଣ ଅଜ୍ଞାନକୁ ଉପାଡ଼ି ଫେଙ୍କିବା ଇଚ୍ଛାରେ, ଅନ୍ୟ କୌଣସି ସାଂସାରିକ ବସ୍ତୁକୁ ଗଣନାରେ ନ ଧରି, ତାହା ପ୍ରତି ଚିନ୍ତନ ତ୍ୟାଗ କର—ଯେନେ ଜୀବନର ଭୟ-ବନ୍ଧନକୁ ହଟାଇଦେଲୁ।
Verse 16
स क्रोधलो भौ मोहवानन्तरात्मा स वै मृत्युस्त्वच्छरीरे य एष: । एवं मृत्युं जायमानं विदित्वा ज्ञाने तिष्ठन् न बिभेतीह मृत्यो: । विनश्यते विषये तस्य मृत्यु- मृत्योर्यथा विषयं प्राप्य मर्त्य:,यह जो तुम्हारे शरीरके भीतर अन्तरात्मा है, मोहके वशीभूत होकर यही क्रोध, लोभ (प्रमाद) और मृत्युरूप हो जाता है। इस प्रकार मोहसे होनेवाली मृत्युकों जानकर जो ज्ञाननिष्ठ हो जाता है, वह इस लोकमें मृत्युसे कभी नहीं डरता। उसके समीप आकर मृत्यु उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे मृत्युके अधिकारमें आया हुआ मरणथधर्मा मनुष्य
ତୁମ ଶରୀର ଭିତରେ ଥିବା ଅନ୍ତରାତ୍ମା ମୋହର ବଶୀଭୂତ ହେଲେ କ୍ରୋଧ ଓ ଲୋଭ ହୋଇଯାଏ—ଏବଂ ସେହି ମୃତ୍ୟୁରୂପ ହୋଇଯାଏ। ଏଭଳି ମୋହରୁ ଜନ୍ମ ନେଉଥିବା ମୃତ୍ୟୁକୁ ଜାଣି ଯେ ଜ୍ଞାନରେ ଦୃଢ଼ ହୁଏ, ସେ ଏହି ଲୋକରେ ମୃତ୍ୟୁକୁ ଭୟ କରେ ନାହିଁ। ତାହାର ନିକଟକୁ ଆସିଲେ ମୃତ୍ୟୁ ମଧ୍ୟ ସେହିପରି ନଶ୍ଟ ହୁଏ, ଯେପରି ମୃତ୍ୟୁର ଅଧିକାରରେ ପଡ଼ିଥିବା ମର୍ତ୍ୟ ନଶ୍ଟ ହୁଏ।
Verse 17
धृतराष्ट्र रवाच यानेवाहुरिज्यया साधुलोकान् द्विजातीनां पुण्यतमान् सनातनान् | तेषां परार्थ कथयन्तीह वेदा एतद् विद्वान नोपैति कथं नु कर्म,धृतराष्ट्र बोले--द्विजातियोंके लिये यज्ञोंद्वारा जिन पवित्रतम सनातन एवं श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति बतायी गयी है, यहाँ वेद उन्हींको परम पुरुषार्थ कहते हैं। इस बातको जाननेवाला दविद्दान् उत्तम कर्मोंका आश्रय क्यों न ले
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ଦ୍ୱିଜାତିମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଯଜ୍ଞଦ୍ୱାରା ଯେ ସନାତନ, ସର୍ବାଧିକ ପୁଣ୍ୟମୟ ଓ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଲୋକପ୍ରାପ୍ତି କୁହାଯାଇଛି, ବେଦ ଏଠାରେ ସେହିକୁ ହିଁ ପରମ ପୁରୁଷାର୍ଥ ବୋଲି କହୁଛି। ଏହା ଜାଣିଥିବା ବିଦ୍ୱାନ୍ କାହିଁକି ଧର୍ମକର୍ମର ଆଶ୍ରୟ ନେବେ ନାହିଁ? ତେବେ କର୍ମକୁ ସେ କିପରି ତ୍ୟାଗ କରିପାରିବ?
Verse 18
सनत्युजात उवाच एवं ह्ुविद्वानुपयाति तत्र तत्रार्थजातं च वदन्ति वेदा: । अनीह आयाति परं परात्मा प्रयाति मार्गेण निहत्य मार्गान्,सनत्सुजातने कहा--राजन्! अज्ञानी पुरुष इस प्रकार भिन्न-भिन्न लोकोंमें गमन करता है तथा वेद कर्मके बहुत-से प्रयोजन भी बताते हैं; परंतु जो निष्काम पुरुष है, वह ज्ञानमार्गके द्वारा अन्य सभी मार्गोंका बाध करके परमात्मस्वरूप होता हुआ ही परमात्माको प्राप्त होता है
ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଅଜ୍ଞାନୀ ଏଭଳି ଏକ ଅବସ୍ଥାରୁ ଅନ୍ୟ ଅବସ୍ଥାକୁ ଯାଏ, ଏବଂ ବେଦମାନେ କର୍ମସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ଅନେକ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ କହନ୍ତି। କିନ୍ତୁ ନିଷ୍କାମ ପୁରୁଷ ଜ୍ଞାନମାର୍ଗରେ ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ମାର୍ଗକୁ ଦମନ କରି, ପରମାତ୍ମସ୍ୱରୂପରେ ଅବସ୍ଥିତ ହୋଇ ପରମକୁ ପ୍ରାପ୍ତ କରେ।
Verse 19
धृतराष्ट्र रवाच को5सौ नियुद्धक्ते तमजं पुराणं स चेदिदं सर्वमनुक्रमेण । कि वास्य कार्यमथवा सुखं च तन्मे विद्वन् ब्रूहि सर्व यथावत्,धृतराष्ट्र बोले--विद्वन! यदि वह परमात्मा ही क्रमश: इस सम्पूर्ण जगतके रूपमें प्रकट होता है तो उस अजन्मा और पुरातन पुरुषपर कौन शासन करता है? अथवा उसे इस रूपमें आनेकी क्या आवश्यकता है और क्या सुख मिलता है?--यह सब मुझे ठीक-ठीक बताइये
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ହେ ବିଦ୍ୱନ୍! ଯଦି ସେଇ ଅଜନ୍ମା ଓ ପୁରାତନ ପରମପୁରୁଷ କ୍ରମକ୍ରମେ ଏହି ସମଗ୍ର ଜଗତ୍ରୂପେ ପ୍ରକଟ ହୁଅନ୍ତି, ତେବେ ତାଙ୍କୁ କିଏ ଶାସନ କରିପାରିବ? ଏହି ରୂପେ ପ୍ରକଟ ହେବାରେ ତାଙ୍କର କ’ଣ କାର୍ଯ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହୁଏ, କିମ୍ବା କ’ଣ ସୁଖ ଲଭେ? ଏ ସବୁ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କହନ୍ତୁ।
Verse 20
सनत्युजात उवाच दोषो महानत्र विभेदयोगे हानादियोगेन भवन्ति नित्या: । तथास्य नाधिक्यमपैति किंचि- दनादियोगेन भवन्ति पुंस:,सनत्सुजातने कहा--तुम्हारे इस प्रश्नके अनुसार जीव और ब्रह्मका विशेष भेद प्राप्त होता है, जिसे स्वीकार कर लेनेपर वेदविरोधरूप महान् दोषकी प्राप्ति होती है। अतएव अनादि मायाके सम्बन्धसे जीवोंका कामसुख आदिसे सम्बन्ध होता रहता है। ऐसा होनेपर भी जीवकी महत्ता नष्ट नहीं होती; क्योंकि मायाके सम्बन्धसे जीवके देहादि पुनः उत्पन्न होते रहते हैं
ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ଏଠାରେ ଯଦି ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭେଦବାଦକୁ ଧରି ରହାଯାଏ, ତେବେ ମହାଦୋଷ ଉତ୍ପନ୍ନ ହୁଏ; କାରଣ ହାନି ଆଦି ସହ ସଂଯୋଗରୁ ସେହି ଅବସ୍ଥାମାନେ ନିତ୍ୟ ଭଳି ପ୍ରତୀତ ହୁଅନ୍ତି। ତଥାପି ପୁରୁଷର ସତ୍ୟ ମହତ୍ତ୍ୱ କିଛିମାତ୍ରେ ହ୍ରାସ ପାଉନାହିଁ; କାରଣ ଦେହଧାରୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଏହି ଅବସ୍ଥାମାନେ କେବଳ ଅନାଦି ସମ୍ବନ୍ଧରୁ ହିଁ ଉଦ୍ଭବ ହୁଅନ୍ତି।
Verse 21
य एतद् वा भगवान् स नित्यो विकारयोगेन करोति विश्वम् । तथा च तच्छक्तिरिति सम मन्यते तथार्थयोगे च भवन्ति वेदा:,जो नित्यस्वरूप भगवान् हैं, वे ही परब्रह्म मायाके सहयोगसे इस विश्वत्रह्माण्डकी सृष्टि करते हैं। वह माया उन्हीं परब्रह्मकी शक्ति है। महात्मा पुरुष इसे मानते हैं। इस प्रकारके अर्थके प्रतिपादनमें वेद भी प्रमाण हैं
ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ଯେ ନିତ୍ୟସ୍ୱରୂପ ଭଗବାନ୍, ସେଇ ବିକାରଶକ୍ତି (ମାୟା)ର ସଂଯୋଗରେ ଏହି ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱକୁ ସୃଷ୍ଟି କରନ୍ତି। ସେହି ଶକ୍ତି ତାଙ୍କର ନିଜ ଶକ୍ତି—ଏହିପରି ଜ୍ଞାନୀମାନେ ମାନନ୍ତି; ଏବଂ ଏହି ଅର୍ଥ ସ୍ଥାପନାରେ ବେଦମାନେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରମାଣ।
Verse 22
धघतयद्र उवाच ये5स्मिन् धर्मान् नाचरन्तीह केचित् तथा धर्मान् केचिदिहाचरन्ति । धर्म: पापेन प्रतिहन्यते स्वि- दुताहो धर्म: प्रतिहन्ति पापम्,धृतराष्ट्र बोले--इस जगत्में कुछ लोग ऐसे हैं, जो धर्मका आचरण नहीं करते तथा कुछ लोग उसका आचरण करते हैं, अतः धर्म पापके द्वारा नष्ट होता है या धर्म ही पापको नष्ट कर देता है?
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ଏହି ଜଗତରେ କେତେକ ଲୋକ ଧର୍ମ ଆଚରଣ କରନ୍ତି ନାହିଁ, ଆଉ କେତେକ ଲୋକ ଧର୍ମ ଆଚରଣ କରନ୍ତି। ତେବେ କହନ୍ତୁ—ପାପ ଦ୍ୱାରା ଧର୍ମ ନଷ୍ଟ ହୁଏ କି, ନା ଧର୍ମ ନିଜେ ପାପକୁ ନଷ୍ଟ କରେ?
Verse 23
सनत्सुजात उवाच उभयमेव तत्रोपयुज्यते फलं धर्मस्यैवेतरस्य च,सनत्सुजातने कहा--राजन! धर्म और पाप दोनोंके पृथक्-पृथक् फल होते हैं और उन दोनोंका ही उपभोग करना पड़ता है
ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ, ସେ ବିଷୟରେ ଉଭୟ ଫଳ ଭୋଗ ହୁଏ—ଧର୍ମର ଫଳ ଓ ଅଧର୍ମର ଫଳ। ଦୁହିଁର ଫଳ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍, ଏବଂ ଦୁହିଁରୁ ଜନିତ ସୁଖ-ଦୁଃଖ ଅବଶ୍ୟ ଅନୁଭବ କରିବାକୁ ପଡ଼େ।
Verse 24
तस्मिन् स्थितो वाप्युभयं हि नित्यं ज्ञानेन विद्वान् प्रतिहन्ति सिद्धम् | तथान्यथा पुण्यमुपैति देही तथागतं पापमुपैति सिद्धम्,किंतु परमात्मामें स्थित होनेपर विद्वान् पुरुष उस (परमात्माके) ज्ञानके द्वारा अपने पूर्वकृत पाप और पुण्य दोनोंका नाश कर देता है; यह बात सदा प्रसिद्ध है। यदि ऐसी स्थिति नहीं हुई तो देहाभिमानी मनुष्य कभी पुण्यफलको प्राप्त करता है और कभी क्रमशः प्राप्त हुए पूर्वोपार्जित पापके फलका अनुभव करता है
ପରମାତ୍ମାରେ ସ୍ଥିତ ଜ୍ଞାନୀ ଆତ୍ମଜ୍ଞାନଦ୍ୱାରା ପୁଣ୍ୟ ଓ ପାପ—ଉଭୟକୁ ନିତ୍ୟ ନାଶ କରେ; ଏହା ସଦା ସିଦ୍ଧ ଓ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ସତ୍ୟ। ନହେଲେ ଦେହାଭିମାନୀ ଜୀବ କେବେ ପୁଣ୍ୟଫଳ ପାଏ, କେବେ ପୂର୍ବାର୍ଜିତ ପାପର ପରିପକ୍ୱ ଫଳ ଅନିବାର୍ୟ ଭାବେ ଭୋଗ କରେ।
Verse 25
गत्वोभयं कर्मणा युज्यते<स्थिरं शुभस्य पापस्य स चापि कर्मणा । धर्मेण पापं प्रणुदतीह विद्वान् धर्मो बलीयानिति तस्य सिद्धि:,इस प्रकार पुण्य और पापके जो स्वर्ग-नरकरूप दो अस्थिर फल हैं, उनका भोग करके वह (इस जगत्में जन्म ले) पुनः तदनुसार कर्मोमें लग जाता है; किंतु कर्मोंके तत्त्वको जाननेवाला पुरुष निष्कामधर्मरूप कर्मके द्वारा अपने पूर्वपापका यहाँ ही नाश कर देता है। इस प्रकार धर्म ही अत्यन्त बलवान् है। इसलिये निष्कामभावसे धर्माचरण करनेवालोंको समयानुसार अवश्य सिद्धि प्राप्त होती है
ଏହିପରି ପୁଣ୍ୟ ଓ ପାପର ସ୍ୱର୍ଗ-ନରକରୂପ ଦୁଇଟି ଅନିତ୍ୟ ଫଳ ଭୋଗ କରି ସେ ପୁଣି ଏହି ଲୋକରେ ଜନ୍ମ ନେଇ, ସେହି ଫଳାନୁସାରେ ପୁନର୍ବାର କର୍ମରେ ଲିପ୍ତ ହୁଏ। କିନ୍ତୁ କର୍ମତତ୍ତ୍ୱଜ୍ଞ ଜ୍ଞାନୀ ନିଷ୍କାମ ଧର୍ମକର୍ମ ଦ୍ୱାରା ପୂର୍ବପାପକୁ ଏଠିଏ ନାଶ କରେ। ତେଣୁ ଧର୍ମ ଅଧିକ ବଳବାନ; ଏହିହେତୁ ଯେମାନେ ନିଷ୍କାମଭାବେ ଧର୍ମାଚରଣ କରନ୍ତି, ସେମାନେ କାଳକ୍ରମେ ନିଶ୍ଚୟ ସିଦ୍ଧି ପାଆନ୍ତି।
Verse 26
धघतयाट्र उवाच यानिहाहुः स्वस्य धर्मस्य लोकान् द्विजातीनां पुण्यकृतां सनातनान् । तेषां क्रमान् कथय ततो<पि चान्यान् नैतद् विद्वन् वेत्तुमिच्छामि कर्म,धृतराष्ट्र बोले-विद्वन! पुण्यकर्म करनेवाले द्विजातियोंको अपने-अपने धर्मके फलस्वरूप जिन सनातन लोकोंकी प्राप्ति बतायी गयी है, उनका क्रम बतलाइये तथा उनसे भिन्न जो अन्यान्य लोक हैं, उनका भी निरूपण कीजिये। अब मैं सकाम कर्मकी बात नहीं जानना चाहता
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ହେ ବିଦ୍ୱନ, ପୁଣ୍ୟକର୍ମ କରୁଥିବା ଦ୍ୱିଜାତିମାନେ ନିଜ-ନିଜ ଧର୍ମଫଳରୂପେ ଯେ ସନାତନ ଲୋକ ପ୍ରାପ୍ତ କରନ୍ତି ବୋଲି କୁହାଯାଏ, ସେମାନଙ୍କର କ୍ରମ କହନ୍ତୁ; ଏବଂ ସେମାନଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ଅନ୍ୟ ଭିନ୍ନ ଲୋକମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ ନିରୂପଣ କରନ୍ତୁ। ମୁଁ ସକାମ କର୍ମର କଥା ଜାଣିବାକୁ ଚାହୁଁନି।
Verse 27
सनत्युजात उवाच येषां व्रतेडथ विस्पर्धा बले बलवतामिव । ते ब्राह्मणा इतः प्रेत्य ब्रह्मलोकप्रकाशका:,सनत्सुजातने कहा--जैसे दो बलवान वीरोंमें अपना बल बढ़ानेके निमित्त एक- दूसरेसे स्पर्धा रहती है, उसी प्रकार जो निष्कामभावसे यम-नियमादिके पालनमें दूसरोंसे बढ़नेका प्रयास करते हैं, वे ब्राह्मण यहाँसे मरकर जानेके बाद ब्रह्मलोकमें अपना प्रकाश फैलाते हैं
ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ଯେପରି ଦୁଇଜଣ ବଳବାନ ଯୋଦ୍ଧା ନିଜ ବଳ ବଢ଼ାଇବା ପାଇଁ ପରସ୍ପର ସ୍ପର୍ଧା କରନ୍ତି, ସେପରି ଯେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ବ୍ରତ ଓ ସଂଯମରେ ନିଷ୍କାମଭାବେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ହେବାକୁ ପ୍ରୟାସ କରନ୍ତି, ସେମାନେ ଏଠାରୁ ପ୍ରୟାଣ କରି ବ୍ରହ୍ମଲୋକରେ ନିଜ ପ୍ରଭା ପ୍ରସାର କରନ୍ତି।
Verse 28
येषां धर्मे च विस्पर्धा तेषां तज्ज्ञानसाधनम् | ते ब्राह्मणा इतो मुक्ता: स्वर्ग यान्ति त्रिविष्टपम्,जिनकी धर्मके पालनमें स्पर्धा है, उनके लिये वह ज्ञानका साधन है; किंतु वे ब्राह्मण (यदि सकाम-भावसे उसका अनुष्ठान करें) तो मृत्युके पश्चात् यहाँसे देवताओंके निवासस्थान स्वर्गमें जाते हैं
ଯେମାନେ ଧର୍ମାଚରଣରେ ସ୍ପର୍ଧାସହିତ ପ୍ରୟାସ କରନ୍ତି, ସେହି ପ୍ରୟାସ ତାଙ୍କ ପାଇଁ ଜ୍ଞାନର ସାଧନ ହୁଏ। ଏବଂ ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଦେହତ୍ୟାଗ ପରେ ଏଠାରୁ ମୁକ୍ତ ହୋଇ ଦେବମଣ୍ଡଳର ନିବାସ ତ୍ରିବିଷ୍ଟପ ସ୍ୱର୍ଗକୁ ଯାଆନ୍ତି।
Verse 29
तस्य सम्यक् समाचारमाहुर्वेदविदो जना: । नैनं मन्येत भूयिष्ठं बाह्माभ्यन्तरं जनम्,ब्राह्मणके सम्यक् आचारकी वेदवेत्ता पुरुष प्रशंसा करते हैं, किंतु जो धर्मपालनमें बहिर्मुख है, उसे अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिये। जो (निष्कामभावपूर्वक) धर्मका पालन करनेसे अन्तर्मुख हो गया है, ऐसे पुरुषको श्रेष्ठ समझना चाहिये। जैसे वर्षा-ऋतुमें तृण- घास आदिकी बहुतायत होती है, उसी प्रकार जहाँ ब्राह्मणके योग्य अन्न-पान आदिकी अधिकता मालूम पड़े, उसी देशमें रहकर वह जीवननिर्वाह करे। भूख-प्याससे अपनेको वष्ट नहीं पहुँचावे
ବେଦବିଦ୍ ଲୋକେ ତାହାର ସମ୍ୟକ୍ ଆଚାରକୁ ପ୍ରଶଂସା କରନ୍ତି। କିନ୍ତୁ ଯେ ଧର୍ମାଚରଣରୁ ବିମୁଖ, ତାକୁ କେବଳ ବାହ୍ୟ କିମ୍ବା ଆଭ୍ୟନ୍ତର ଚିହ୍ନ ଦେଖି ଅଧିକ ମୂଲ୍ୟ ଦେବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।
Verse 30
यत्र मन्येत भूयिष्ठं प्रावषीव तृणोपलम् । अन्नं पान॑ ब्राह्मणस्य तज्जीवेन्नानुसंज्वरेत्,ब्राह्मणके सम्यक् आचारकी वेदवेत्ता पुरुष प्रशंसा करते हैं, किंतु जो धर्मपालनमें बहिर्मुख है, उसे अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिये। जो (निष्कामभावपूर्वक) धर्मका पालन करनेसे अन्तर्मुख हो गया है, ऐसे पुरुषको श्रेष्ठ समझना चाहिये। जैसे वर्षा-ऋतुमें तृण- घास आदिकी बहुतायत होती है, उसी प्रकार जहाँ ब्राह्मणके योग्य अन्न-पान आदिकी अधिकता मालूम पड़े, उसी देशमें रहकर वह जीवननिर्वाह करे। भूख-प्याससे अपनेको वष्ट नहीं पहुँचावे
ଯେଉଁଠାରେ ବର୍ଷାଋତୁରେ ତୃଣ-ଉଦ୍ଭିଦ ପରି ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଯୋଗ୍ୟ ଅନ୍ନ-ପାନର ପ୍ରଚୁରତା ଦେଖାଯାଏ, ସେଠାରେ ରହି ସେ ଜୀବନ ଧାରଣ କରୁ; ଏବଂ ଭୁଖ-ତୃଷ୍ଣାରେ ନିଜକୁ କଷ୍ଟ ନ ଦିଅ।
Verse 31
यत्राकथयमानस्य प्रयच्छत्यशिवं भयम् | अतिरिक्तमिवाकुर्वन् स श्रेयान् नेतरो जन:,किंतु जहाँ अपना माहात्म्य प्रकाशित न करनेपर भय और अमंगल प्राप्त हो, वहाँ रहकर भी जो अपनी विशेषता प्रकट नहीं करता, वही श्रेष्ठ पुरुष है; दूसरा नहीं
ଯେଉଁଠାରେ ନିଜ ମହିମା କହିନଥିଲେ ଭୟ ଓ ଅମଙ୍ଗଳ ଆସେ, ସେଠାରେ ମଧ୍ୟ ଯେ ‘ମୁଁ ଅତିରିକ୍ତ’ ବୋଲି ଦେଖାଇ ନିଜ ବିଶେଷତା ପ୍ରକାଶ କରେ ନାହିଁ, ସେଇ ଶ୍ରେଷ୍ଠ; ଅନ୍ୟ ନୁହେଁ।
Verse 32
यो वा कथयमानस्य हाात्मानं नानुसंज्वरेत् । ब्रह्मास्वं नोपभुज्जीत तदन्न॑ सम्मतं सताम्,जो किसीको आत्मप्रशंसा करते देख जलता नहीं तथा ब्राह्मणके स्वत्वका उपभोग नहीं करता, उसके अन्नको स्वीकार करनेमें सत्पुरुषोंकी सम्मति है
ଅନ୍ୟେ ଆତ୍ମପ୍ରଶଂସା କରୁଥିବାକୁ ଦେଖି ଯେ ଈର୍ଷ୍ୟାରେ ଜଳେ ନାହିଁ, ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ସ୍ୱତ୍ୱକୁ ଉପଭୋଗ କରେ ନାହିଁ—ତାହାର ଅନ୍ନ ଗ୍ରହଣ କରିବାକୁ ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ସମ୍ମତି ଅଛି।
Verse 33
यथा स्वं वान्तमश्नाति शवा वै नित्यमभूतये । एवं ते वान्तमश्रन्ति स्ववीर्यस्योपसेवनात्,जैसे कुत्ता अपना वमन किया हुआ भी खा लेता है, उसी प्रकार जो अपने (ब्राह्मणत्वके) प्रभावका प्रदर्शन करके जीविका चलाते हैं, वे ब्राह्मण वमनका भोजन करनेवाले हैं और इससे उनकी सदा ही अवनति होती है
ଯେପରି କୁକୁର ନିଜର ହିଁ ବାନ୍ତି ଖାଇ ସଦା ନାଶକୁ ଯାଏ, ସେପରି ଯେମାନେ ନିଜ ‘ତେଜ’ ଓ ପ୍ରତିଷ୍ଠାକୁ ଦେଖାଇ ଜୀବିକା ଚାଲାନ୍ତି, ସେମାନେ ଯେନେ ବାନ୍ତି-ଭୋଜନ କରନ୍ତି; ଏହି ସ୍ୱ-ପ୍ରଦର୍ଶନର ଆସକ୍ତିରୁ ସେମାନଙ୍କର ନିରନ୍ତର ଅବନତି ହୁଏ।
Verse 34
नित्यमज्ञातचर्या मे इति मन्येत ब्राह्मण: । ज्ञातीनां तु वसन् मध्ये तं विदुर्ब्राह्मणं बुधा:,जो कुटुम्बीजनोंके बीचमें रहकर भी अपनी साधनाको उनसे सदा गुप्त रखनेका प्रयत्न करता है, ऐसे ब्राह्मणोंको ही विद्वान पुरुष ब्राह्मण मानते हैं
ବ୍ରାହ୍ମଣ ନିତ୍ୟ ଏହିଭାବେ ଭାବିବା ଉଚିତ—‘ମୋର ଆଚରଣ ଅଜଣା ରହୁ।’ ନିଜ ଜ୍ଞାତିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବସିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଯେ ନିଜ ସାଧନା ଓ ତପକୁ ସେମାନଙ୍କୁ ଗୋପନ ରଖିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରେ, ଜ୍ଞାନୀମାନେ ତାହାକୁ ହିଁ ବ୍ରାହ୍ମଣ ବୋଲି ଜାଣନ୍ତି।
Verse 35
को हानन्तरमात्मानं ब्राह्मणो हन्तुमरहति । निर्लिड्रमचलं शुद्ध सर्वद्वैतविवर्जितम्,इस प्रकार जो भेदशून्य, चिह्लरहित, अविचल, शुद्ध एवं सब प्रकारके द्वैतसे रहित आत्मा है, उसके स्वरूपको जाननेवाला कौन ब्रह्मवेत्ता पुछ्ण उसका हनन (अधःपतन) करना चाहेगा?
ଯେ ଆତ୍ମା ଭେଦଶୂନ୍ୟ, ଲକ୍ଷଣଶୂନ୍ୟ, ଅଚଳ, ଶୁଦ୍ଧ ଏବଂ ସମସ୍ତ ଦ୍ୱୈତରୁ ମୁକ୍ତ—ତାହାର ସ୍ୱରୂପ ଜାଣିଥିବା କେଉଁ ବ୍ରହ୍ମବେତ୍ତା ବ୍ରାହ୍ମଣ ନିଜ ଆତ୍ମାର ହନନ (ଅଧଃପତନ) କରିବାକୁ ଚାହିବ? ହାନି କରିବାର ପ୍ରବୃତ୍ତି ତାହାରେ କିପରି ଉଠିବ?
Verse 36
तस्माद्धि क्षत्रियस्यापि ब्रह्मावसति पश्यति,इसलिये उपर्युक्तरूपसे जीवन बितानेवाला क्षत्रिय भी ब्रह्मके स््वरूपका अनुभव करता है तथा ब्रह्मको प्राप्त होता है
ଏହିହେତୁ, ଉପରେ କହିଥିବା ସଂୟମିତ ଆଚରଣରେ ଜୀବନ ଯାପନ କରୁଥିବା କ୍ଷତ୍ରିୟ ମଧ୍ୟ ନିଜ ଭିତରେ ବସିଥିବା ବ୍ରହ୍ମକୁ ଦେଖେ ଏବଂ ସେହି ବ୍ରହ୍ମକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ।
Verse 37
योअन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते । कि तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणा,जो उक्त प्रकारसे वर्तमान आत्माको उसके विपरीत रूपसे समझता है, आत्माका अपहरण करनेवाले उस चोरने कौन-सा पाप नहीं किया?
ଯେ ଯଥାର୍ଥରେ ଥିବା ଆତ୍ମାକୁ ତାହାର ବିପରୀତ ଭାବେ ବୁଝେ—ନିଜ ଆତ୍ମାକୁ ଅପହରଣ କରୁଥିବା ସେଇ ଚୋର କେଉଁ ପାପ କରିନାହିଁ?
Verse 38
अश्रान्त: स्यादनादाता सम्मतो निरुपद्रव: । शिष्टो न शिष्टवत् स स्याद् ब्राह्माणो ब्रह्मवित् कवि:,जो कर्तव्य-पालनमें कभी थकता नहीं, दान नहीं लेता, सत्पुरुषोंमें सम्मानित और उपद्रवरहित है तथा शिष्ट होकर भी शिष्टताका विज्ञापन नहीं करता, वही ब्राह्मण ब्रह्मवेत्ता एवं विद्वान् है
ଯେ କର୍ତ୍ତବ୍ୟପାଳନରେ କେବେ ଥକେ ନାହିଁ, ଦାନ ଗ୍ରହଣ କରେ ନାହିଁ, ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସମ୍ମାନିତ ଓ ଉପଦ୍ରବ-ରହିତ ରହେ, ଏବଂ ଶିଷ୍ଟ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ନିଜ ଶିଷ୍ଟତାର ପ୍ରଦର୍ଶନ କରେ ନାହିଁ—ସେହି ହେଉଛି ବ୍ରାହ୍ମଣ, ବ୍ରହ୍ମବେତ୍ତା ଓ କବି (ଋଷି-ଦ୍ରଷ୍ଟା) ବୋଲି ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ।
Verse 39
अनाढ्या मानुषे वित्ते आढ्या दैवे तथा क्रतौ । ते दुर्धर्षा दुष्प्र कम्प्पास्तान् विद्याद् ब्रह्मणस्तनुम्,जो लौकिक धनकी दृष्टिसे निर्धन होकर भी दैवी सम्पत्ति तथा यज्ञ-उपासना आदिसे सम्पन्न हैं, वे दुर्धर्ष हैं और किसी भी विषयसे चलायमान नहीं होते। उन्हें ब्रह्मकी साक्षात् मूर्ति समझना चाहिये
ଯେମାନେ ଲୌକିକ ଧନରେ ଦରିଦ୍ର ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଦୈବୀ ସମ୍ପଦ ଓ ଯଜ୍ଞ-ଉପାସନା ଆଦିରେ ସମୃଦ୍ଧ, ସେମାନେ ଅଦମ୍ୟ; କୌଣସି ପରିସ୍ଥିତିରେ ଡଗମଗାନ୍ତି ନାହିଁ। ସେମାନଙ୍କୁ ବ୍ରହ୍ମର ସାକ୍ଷାତ୍ ମୂର୍ତ୍ତି—ଜୀବନ୍ତ ରୂପ—ବୋଲି ଜାଣିବା ଉଚିତ।
Verse 40
सर्वान् स्विष्टकृतो देवान् विद्याद् य इह कश्नन । न समानो ब्राह्मणस्य तस्मिन् प्रयतते स्वयम्,यदि कोई इस लोकमें अभीष्ट सिद्ध करनेवाले सम्पूर्ण देवताओंको जान ले, तो भी वह ब्रह्मवेत्ताके समान नहीं होता; क्योंकि वह तो अभीष्ट फलकी सिद्धिके लिये ही प्रयत्न कर रहा है
ଏହି ଲୋକରେ ଯଦି କେହି ଇଷ୍ଟସିଦ୍ଧି ଦେଇଥିବା ସମସ୍ତ ଦେବତାଙ୍କୁ ଜାଣି ନେଉଥାଏ ମଧ୍ୟ, ସେ ବ୍ରହ୍ମବେତ୍ତା ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ସମାନ ନୁହେଁ; କାରଣ ସେ ତ ଇଚ୍ଛିତ ଫଳସିଦ୍ଧି ପାଇଁ ମାତ୍ର ପ୍ରୟାସ କରୁଛି।
Verse 41
यमप्रयतमानं तु मानयन्ति स मानित: । न मान्यमानो मन्येत न मान्यमभिसंज्वरेत्,जो दूसरोंसे सम्मान पाकर भी अभिमान न करे और सम्माननीय पुरुषको देखकर जले नहीं तथा प्रयत्न न करनेपर भी विद्वानलोग जिसे आदर दें, वही वास्तवमें सम्मानित है
ଯେ ମାନ ପାଇବାକୁ ପ୍ରୟାସ କରେ ନାହିଁ, ତଥାପି ଲୋକେ ଯାହାକୁ ମାନ ଦିଅନ୍ତି, ସେହି ହେଉଛି ସତ୍ୟରେ ମାନିତ। ମାନ ପାଇଲେ ମଧ୍ୟ ଅହଂକାର କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ; ମାନନୀୟଙ୍କୁ ଦେଖି ଇର୍ଷ୍ୟାରେ ଜଳିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।
Verse 42
लोक: स्वभाववृत्तिहिं निमेषोन्मेषवत् सदा । विद्वांसो मानयन्तीह इति मन्येत मानित:,जगत्में जब विद्वान् पुरुष आदर दें, तब सम्मानित व्यक्तिको ऐसा मानना चाहिये कि आँखोंको खोलने-मीचनेके समान अच्छे लोगोंकी यह स्वाभाविक वृत्ति है, जो आदर देते हैं इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सनत्सुजातपर्वणि द्विचत्वारिंशो5ध्याय:
ଲୋକରେ ସ୍ୱଭାବଜ ଆଚରଣ ସଦା ଆଖିର ନିମେଷ-ଉନ୍ମେଷ ପରି ଅବିରତ ଚାଲିଥାଏ। ତେଣୁ ଏଠାରେ ବିଦ୍ୱାନମାନେ ଯେତେବେଳେ ଆଦର କରନ୍ତି, ଆଦର ପାଉଥିବା ବ୍ୟକ୍ତି ଏହିପରି ଭାବିବା ଉଚିତ—“ସଜ୍ଜନମାନଙ୍କ ସ୍ୱଭାବ ହେଉଛି ଆଦର ଦେବା।”
Verse 43
अधर्मनिपुणा मूढा लोके मायाविशारदा: । न मान्यं मानयिष्यन्ति मान्यानामवमानिन:,किंतु इस संसारमें जो अधर्ममें निपुण, छल-कपटमें चतुर और माननीय पुरुषोंका अपमान करनेवाले मूढ़ मनुष्य हैं, वे आदरणीय व्यक्तियोंका भी आदर नहीं करते
ଏହି ଲୋକରେ ଯେମାନେ ଅଧର୍ମରେ ନିପୁଣ, ବୁଦ୍ଧିରେ ମୋହିତ ଏବଂ ଛଳ-କପଟରେ ପାରଙ୍ଗତ—ମାନ୍ୟଜନଙ୍କୁ ଅବମାନ କରିବାରେ ଅଭ୍ୟସ୍ତ ମୂଢ଼—ସେମାନେ ସତ୍ୟରେ ମାନ୍ୟକୁ ମଧ୍ୟ ମାନ ଦିଅନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 44
न वै मानं च मौनं च सहितौ वसत: सदा । अयं हि लोको मानस्य असौ मौनस्य तद् विदु:,यह निश्चित है कि मान और मौन सदा एक साथ नहीं रहते; क्योंकि मानसे इस लोकमें सुख मिलता है और मौनसे परलोकमें। ज्ञानीजन इस बातको जानते हैं
ନିଶ୍ଚୟ ମାନ ଓ ମୌନ ସଦା ଏକାସଙ୍ଗେ ରହେ ନାହିଁ; କାରଣ ଏହି ଲୋକ ମାନକୁ ଫଳ ଦିଏ, ଓ ପରଲୋକ ମୌନକୁ ଫଳ ଦିଏ—ଏହା ଜ୍ଞାନୀମାନେ ଜାଣନ୍ତି।
Verse 45
श्री: सुखस्येह संवास: सा चापि परिपन्थिनी । ब्राह्मी सुदुर्लभा श्रीहिं प्रज्ञाहीनेन क्षत्रिय,राजन्! लोकमें ऐश्वर्यरूपा लक्ष्मी सुखका घर मानी गयी है, पर वह भी (कल्याणमार्गमें) लुटेरोंकी भाँति विघ्न डालनेवाली है; किंतु ब्रह्मज्ञानमयी लक्ष्मी प्रज्ञाहीन मनुष्यके लिये सर्वथा दुर्लभ है
ହେ ରାଜନ୍! ଏହି ଲୋକରେ ଐଶ୍ୱର୍ୟରୂପା ଶ୍ରୀ ସୁଖର ନିବାସ ବୋଲି ଗଣ୍ୟ; କିନ୍ତୁ ସେଇ ଶ୍ରୀ ମଙ୍ଗଳମାର୍ଗରେ ପଥଲୁଟେରା ପରି ବାଧା ହୁଏ। ତଥାପି ବ୍ରହ୍ମଜ୍ଞାନମୟୀ ଶ୍ରୀ ପ୍ରଜ୍ଞାହୀନ କ୍ଷତ୍ରିୟ ପାଇଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ଲଭ।
Verse 46
द्वाराणि तस्येह वदन्ति सन््तो बहुप्रकाराणि दुराधराणि । सत्यार्जवे ह्वीर्दमशौचविद्या यथा न मोहप्रतिबोधनानि,संत पुरुष यहाँ उस बहाज्ञानमयी लक्ष्मीकी प्राप्तिके अनेकों द्वार बतलाते हैं, जो कि मोहको जगानेवाले नहीं हैं तथा जिनको कठिनतासे धारण किया जाता है। उनके नाम हैं-- सत्य, सरलता, लज्जा, दम, शौच और विद्या
ସଜ୍ଜନମାନେ କହନ୍ତି, ଏଠାରେ ସେଇ (ବ୍ରହ୍ମଜ୍ଞାନମୟୀ) ଶ୍ରୀ ପ୍ରାପ୍ତିର ଅନେକ ପ୍ରକାର ଦ୍ୱାର ଅଛି, ଯାହା ଧାରଣ କରିବା କଠିନ; ଏବଂ ଯାହା ମୋହକୁ ଜଗାଏ ନାହିଁ, ବରଂ ମୋହରୁ ଜଗାଏ—ସତ୍ୟ, ଆର୍ଜବ (ସରଳତା), ହ୍ରୀ (ଲଜ୍ଜା), ଦମ, ଶୌଚ ଓ ବିଦ୍ୟା।
Dhṛtarāṣṭra’s dilemma is epistemic and ethical: he senses that ordinary counsel is insufficient to dissolve his fear-driven uncertainty, and he seeks a teaching that can stabilize judgment beyond emotional and material opposites.
That the conquest of inner instability—especially fear of loss and mortality—precedes effective moral agency; hence a metaphysical clarification (via Sanatsujāta) is positioned as practical preparation for responsible rulership.
Rather than a formal phalaśruti, the chapter provides an explicit framing claim: hearing the forthcoming resolution will enable the king to move beyond sukha-duḥkha and endure paired opposites, indicating the intended transformative function of the instruction.