Sanatsujāta-Āhvāna (Summoning Sanatsujāta) — Vidura’s Invocation and Dhṛtarāṣṭra’s Doubt
धृतराष्ट्र रवाच यानेवाहुरिज्यया साधुलोकान् द्विजातीनां पुण्यतमान् सनातनान् | तेषां परार्थ कथयन्तीह वेदा एतद् विद्वान नोपैति कथं नु कर्म,धृतराष्ट्र बोले--द्विजातियोंके लिये यज्ञोंद्वारा जिन पवित्रतम सनातन एवं श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति बतायी गयी है, यहाँ वेद उन्हींको परम पुरुषार्थ कहते हैं। इस बातको जाननेवाला दविद्दान् उत्तम कर्मोंका आश्रय क्यों न ले
dhṛtarāṣṭra uvāca—yān evāhur ijyayā sādhulokān dvijātīnāṁ puṇyatamān sanātanān | teṣāṁ parārthaṁ kathayantīha vedā etad vidvān nopaiti kathaṁ nu karma ||
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ଦ୍ୱିଜାତିମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଯଜ୍ଞଦ୍ୱାରା ଯେ ସନାତନ, ସର୍ବାଧିକ ପୁଣ୍ୟମୟ ଓ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଲୋକପ୍ରାପ୍ତି କୁହାଯାଇଛି, ବେଦ ଏଠାରେ ସେହିକୁ ହିଁ ପରମ ପୁରୁଷାର୍ଥ ବୋଲି କହୁଛି। ଏହା ଜାଣିଥିବା ବିଦ୍ୱାନ୍ କାହିଁକି ଧର୍ମକର୍ମର ଆଶ୍ରୟ ନେବେ ନାହିଁ? ତେବେ କର୍ମକୁ ସେ କିପରି ତ୍ୟାଗ କରିପାରିବ?
सनत्युजात उवाच