Adhyaya 25
Udyoga ParvaAdhyaya 2531 Verses

Adhyaya 25

उद्योगपर्व — अध्याय २५: संजयदूतवाक्यम् (Sañjaya’s Envoy-Speech on Peace)

Upa-parva: Sanjaya–Pandava Sabha Dialogue (Dhritarashtra’s Peace Initiative Context)

Chapter 25 presents a diplomatic exchange framed as a public address. Yudhiṣṭhira prompts Sañjaya (Gāvalgaṇa) to report the message instructed by Dhṛtarāṣṭra. Sañjaya then formally acknowledges the gathered Pandavas and allied leaders (including Vāsudeva Kṛṣṇa, Sātyaki, Virāṭa, and the Pāñcāla leadership). He states that Dhṛtarāṣṭra approved śama (pacification) and dispatched him swiftly, expressing a preference that the Pandavas accept peace. Sañjaya praises the Pandavas’ ethical endowments—gentleness, straightforwardness, generosity, and decisiveness—arguing that any moral blemish would stand out against their character. He warns of total social loss and the parity of victory and defeat when kin are destroyed, emphasizing the futility of survival purchased by fratricide. The chapter also acknowledges the overwhelming military capacities on both sides, presenting pragmatic deterrence alongside moral reasoning. Sañjaya concludes by adopting a supplicatory posture, seeking welfare for Kurus and Sṛñjayas and asserting that Kṛṣṇa and Arjuna would not disregard the assembly’s reasonable counsel, aligning the envoy-speech with Bhīṣma-led opinion that peace is optimal.

Chapter Arc: इन्द्रप्रस्थ की सभा में संजय के सामने युधिष्ठिर का प्रश्न—क्या तुम मेरी वह वाणी सुनते हो जो युद्ध नहीं, शान्ति चाहती है; और क्या शान्ति का द्वार केवल इन्द्रप्रस्थ लौटाने से ही खुलेगा? → युधिष्ठिर कर्म और संकल्प पर विचार रखते हुए कहते हैं कि मनुष्य स्वभावतः सुख चाहता है; युद्ध कोई देव-शाप नहीं तो कौन उसे चुने? फिर भी धृतराष्ट्र-पुत्रों की आशा ‘असपत्न’ राज्य की है, इसलिए बिना न्याय-प्रतिपादन के शान्ति असम्भव दिखती है। वे कर्ण की दर्पपूर्ण गणना पर भी प्रहार करते हैं—अर्जुन को जीतना सहज समझना भ्रम है; पूर्व के महायुद्धों में कर्ण का ‘अपराजेय’ होना सिद्ध नहीं। → युधिष्ठिर का निर्णायक प्रस्ताव—‘अब भी सब कुछ पहले जैसा रहने दो; मैं उसी प्रकार शान्ति को जाऊँगा जैसा तुमने कहा: इन्द्रप्रस्थ मेरा राज्य हो, और सुयोधन भारतश्रेष्ठ होकर जो चाहे दे।’ यह शान्ति का अंतिम, स्पष्ट, न्यूनतम आधार बनकर उभरता है। → अध्याय का निष्कर्ष युधिष्ठिर की नीति-रेखा में है: युद्ध स्वभाव-विरुद्ध दुःख है; विषय-लालसा अग्नि में घृत की तरह बढ़ती है; इसलिए लोभ-आधारित साम्राज्य-स्वप्न को त्यागे बिना धृतराष्ट्र-पक्ष से शान्ति की आशा नहीं। संजय के माध्यम से यह संदेश हस्तिनापुर तक पहुँचाने का नैतिक दायित्व रेखांकित होता है। → संजय यह वाणी धृतराष्ट्र और दुर्योधन के सामने रखेगा—पर क्या वे इन्द्रप्रस्थ लौटाकर शान्ति स्वीकार करेंगे, या ‘असपत्न राज्य’ की तृष्णा युद्ध को अनिवार्य बना देगी?

Shlokas

Verse 1

2: बछ। अर षड्विशो<5ध्याय: युधिष्ठिरका संजयको इन्द्रप्रस्थ लौटानेसे ही शान्ति होना सम्भव बतलाना युधिष्ठिर उदाच कां नु वाचं संजय मे शृणोषि युद्धैषिणीं येन युद्धाद्‌ बिभेषि । अयुद्धं वै तात युद्धाद्‌ गरीय: कस्तल्लब्ध्वा जातु युद्धयेत सूत,युधिष्ठिर बोले--संजय! तुमने मेरी कौन-सी ऐसी बात सुनी है, जिससे मेरी युद्धकी इच्छा व्यक्त हुई है, जिसके कारण तुम युद्धसे भयभीत हो रहे हो? तात! युद्ध करनेकी अपेक्षा युद्ध न करना ही श्रेष्ठ है। सूत! युद्ध न करनेका अवसर पाकर भी कौन मनुष्य कभी युद्धमें प्रवृत्त होगा?

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ସଞ୍ଜୟ! ମୋର କେଉଁ କଥା ଶୁଣି ତୁମେ ମୋତେ ଯୁଦ୍ଧକାମୀ ଭାବିଲ, ଯେହেতୁ ଏବେ ମୋ ପାଇଁ ଯୁଦ୍ଧକୁ ଭୟ କରୁଛ? ପ୍ରିୟ, ଯୁଦ୍ଧ କରିବାଠାରୁ ଯୁଦ୍ଧ ଟାଳିବା ଅଧିକ ଶ୍ରେଷ୍ଠ। ହେ ସୂତ, ଯୁଦ୍ଧ ଏଡ଼ାଇବାର ସୁଯୋଗ ପାଇ ମଧ୍ୟ କିଏ କେବେ ଯୁଦ୍ଧରେ ପ୍ରବେଶ କରିବ?”

Verse 2

अकुर्वतश्चेत्‌ पुरुषस्य संजय सिद्धयेत्‌ संकल्पो मनसा यं यमिच्छेत्‌ । न कर्म कुर्याद्‌ विदितं ममैत- दन्यत्र युद्धादू बहु यल्‍लघीय:,संजय! यदि कर्म न करनेपर भी पुरुषका संकल्प सिद्ध हो जाता--वह मनसे जिस- जिस वस्तुको चाहता, वह-वह उसे मिल जाती तो कोई भी मनुष्य कर्म नहीं करता, यह बात मुझे अच्छी तरह मालूम है। युद्ध किये बिना यदि थोड़ा भी लाभ प्राप्त होता हो तो उसे बहुत समझना चाहिये

“ସଞ୍ଜୟ! ଯଦି କର୍ମ ନ କରିଲେ ମଧ୍ୟ ମନୁଷ୍ୟର ସଙ୍କଳ୍ପ ସିଦ୍ଧ ହୋଇଯାଏ—ମନରେ ଯାହା ଯାହା ଚାହେ ସେ ସବୁ ମିଳିଯାଏ—ତେବେ କେହି କର୍ମ କରିବ ନାହିଁ; ଏହା ମୋତେ ଭଲଭାବେ ଜଣା। ତେଣୁ ଯୁଦ୍ଧ ବିନା ଯଦି ଅଳ୍ପ ଲାଭ ମଧ୍ୟ ମିଳେ, ତାହାକୁ ମହାଲାଭ ଭାବିବା ଉଚିତ।”

Verse 3

कुतो युद्ध जातु नरो5वगच्छेत्‌ को देवशप्तो हि वृणीत युद्धम्‌ । सुखैषिण: कर्म कुर्वन्ति पार्था धर्मादहीनं यच्च लोकस्य पथ्यम्‌,मनुष्य कभी भी किसलिये युद्धका विचार करेगा? किसे देवताओंने शाप दे रखा है, जो जान-बूझकर युद्धका वरण करेगा? कुन्तीके पुत्र सुखकी इच्छा रखकर वही कर्म करते हैं, जो धर्मके विपरीत न हो तथा जिससे सब लोगोंका भला होता हो

“ମନୁଷ୍ୟ କାହିଁକି କେବେ ଯୁଦ୍ଧର ଚିନ୍ତା କରିବ? ଦେବତାଙ୍କ ଶାପ ପାଇଥିବା କିଏ, ଯେ ଜାଣିଶୁଣି ଯୁଦ୍ଧକୁ ବରଣ କରିବ? କୁନ୍ତୀପୁତ୍ରମାନେ କଳ୍ୟାଣ ଚାହିଁ, ଧର୍ମବିରୋଧୀ ନୁହେଁ ଏବଂ ଲୋକହିତକର-ପଥ୍ୟ ଯେଉଁ କର୍ମ, ସେହି କର୍ମ ହିଁ କରନ୍ତି।”

Verse 4

धर्मोदयं सुखमाशंसमाना: कृच्छोपायं तत्त्वतः कर्म दुःखम्‌ । सुखं प्रेप्सुर्विजिघांसु श्न दुःखं य इन्द्रियाणां प्रीतिरसानुगामी,हमलोग वही सुख चाहते हैं, जो धर्मकी प्राप्ति करानेवाला हो। जो इन्द्रियोंको प्रिय लगनेवाले विषय-रसका अनुगामी होता है, वह सुखको पाने और दुःखको नष्ट करनेकी इच्छासे कर्म करता है; परंतु वास्तवमें उसका सारा कर्म दुःखरूप ही है; क्योंकि वह कष्टदायक उपायोंसे ही साध्य है

“ଆମେ ସେହି ସୁଖକୁ ହିଁ ଆଶା କରୁ, ଯାହା ଧର୍ମୋଦୟ କରାଏ। ଯେ ଇନ୍ଦ୍ରିୟପ୍ରିୟ ବିଷୟ-ରସର ଅନୁଗାମୀ, ସେ ସୁଖ ପାଇବା ଓ ଦୁଃଖ ନାଶ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ କର୍ମ କରେ; କିନ୍ତୁ ତତ୍ତ୍ୱତଃ ତାହାର ସମସ୍ତ କର୍ମ ଦୁଃଖରୂପ ହୋଇଯାଏ, କାରଣ ସେ କଷ୍ଟଦାୟକ ଉପାୟରେ ହିଁ ସାଧ୍ୟ।”

Verse 5

कामाभि ध्या स्वशरीरं दुनोति यया प्रमुक्तो न करोति दुःखम्‌ | यथेध्यमानस्य समिद्धतेजसो भूयो बलं॑ वर्धते पावकस्य

“କାମବିଷୟର ଧ୍ୟାନ ନିଜ ଶରୀରକୁ ହିଁ କ୍ଷୟ କରେ; କିନ୍ତୁ ଯେ ଏହି ତୃଷ୍ଣାରୁ ମୁକ୍ତ, ସେ ପୁଣି ଦୁଃଖ ଗଢ଼େ ନାହିଁ। ଯେପରି ଇନ୍ଧନ ଦେଲେ ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ ତେଜସ୍ୱୀ ଅଗ୍ନି ଆହୁରି ବଳବାନ ହୁଏ, ସେପରି ଭୋଗରେ ପୋଷିତ କାମ ମଧ୍ୟ ଆହୁରି ବଢ଼ିଯାଏ।”

Verse 6

सम्पश्येम॑ भोगचयं महान्तं सहास्माभिर्धुतराष्ट्रस्थ राज्ञ:,हमलोगोंसहित राजा धृतराष्ट्रके पास यह भोगोंकी विशाल राशि संचित हो गयी है। परंतु देखो (इतनेपर भी उनकी तृप्ति नहीं होती)

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଦେଖ, ଆମ ସହିତ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପାଇଁ ଭୋଗସୁଖ ଓ ସମ୍ପଦର ଏକ ବିଶାଳ ଢେର ସଞ୍ଚିତ ହୋଇଛି; ତଥାପି ଏତେ ପ୍ରଚୁରତା ପରେ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କର ତୃପ୍ତି ଜନ୍ମ ନେଉନାହିଁ।

Verse 7

नाश्रेयानीश्वरो विग्रहाणां नाश्रेयान्‌ वै गीतशब्दं शृणोति । नाश्रेयान्‌ वै सेवते माल्यगन्धान्‌ न चाप्यश्रेयाननुलेपनानि,जो पुण्यात्मा नहीं है, वह संग्रामोंमें विजयी नहीं होता। जो पुण्यात्मा नहीं है, वह अपना यशोगान नहीं सुनता। जिसने पुण्य नहीं किया है, वह मालाएँ और गन्ध नहीं धारण कर सकता। जो पुण्यात्मा नहीं है, वह चन्द्र आदि अवलेपनका भी उपयोग नहीं कर सकता। जिसने पुण्य नहीं किया है, वह अच्छे कपड़े नहीं धारण करता। यदि राजा धुृतराष्ट्र पुण्यवान्‌ न होते, तो हमलोगोंको कुरुदेशसे दूर कैसे कर देते? तथापि यह भोगतृष्णा अज्ञानी दुर्योधन आदिके ही योग्य है, जो प्रायः (सभीके) शरीरोंके भीतर अन्त:करणको पीड़ा देती रहती है

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯାହାର ପୁଣ୍ୟବଳ ନାହିଁ, ସେ ସଂଘର୍ଷରେ ସତ୍ୟ ଅଧିପତି ହୁଏନାହିଁ; ନିଜ ଯଶୋଗୀତର ଶବ୍ଦ ମଧ୍ୟ ଶୁଣେନାହିଁ। ପୁଣ୍ୟସଞ୍ଚୟ ନଥିଲେ ମାଳା ଓ ସୁଗନ୍ଧ ଭୋଗ ହୁଏନାହିଁ, ନ ଉତ୍ତମ ଅନୁଲେପନର ଉପଯୋଗ। ଭୋଗ ଓ କୀର୍ତ୍ତି ପୂର୍ବପୁଣ୍ୟର ଫଳ; କିନ୍ତୁ ଅବିବେକୀ ଭୋଗତୃଷ୍ଣା ଅନ୍ତଃକରଣକୁ ସଦା କ୍ଲେଶ ଦିଏ।

Verse 8

नाश्रेयान्‌ वै प्रावारान्‌ संविवस्ते कथं त्वस्मान्‌ सम्प्रणुदेत्‌ कुरुभ्य: । अन्रैव स्यादबुधस्यैव काम: प्राय: शरीरे हृदयं दुनोति,जो पुण्यात्मा नहीं है, वह संग्रामोंमें विजयी नहीं होता। जो पुण्यात्मा नहीं है, वह अपना यशोगान नहीं सुनता। जिसने पुण्य नहीं किया है, वह मालाएँ और गन्ध नहीं धारण कर सकता। जो पुण्यात्मा नहीं है, वह चन्द्र आदि अवलेपनका भी उपयोग नहीं कर सकता। जिसने पुण्य नहीं किया है, वह अच्छे कपड़े नहीं धारण करता। यदि राजा धुृतराष्ट्र पुण्यवान्‌ न होते, तो हमलोगोंको कुरुदेशसे दूर कैसे कर देते? तथापि यह भोगतृष्णा अज्ञानी दुर्योधन आदिके ही योग्य है, जो प्रायः (सभीके) शरीरोंके भीतर अन्त:करणको पीड़ा देती रहती है

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯାହାର ପୁଣ୍ୟ ନାହିଁ, ସେ ଉତ୍ତମ ପ୍ରାବାର (ଭଲ ବସ୍ତ୍ର) ମଧ୍ୟ ପିନ୍ଧେନାହିଁ; ତେବେ ସେ ଆମକୁ କୁରୁଦେଶରୁ କିପରି ହଟାଇପାରିଥାନ୍ତା? ନିଶ୍ଚୟ କାମତୃଷ୍ଣା ଅବୁଧଙ୍କର ହିଁ; ଏହା ପ୍ରାୟଃ ଶରୀର ଭିତରେ ହୃଦୟକୁ ଦୁଃଖ ଦିଏ।

Verse 9

स्वयं राजा विषमस्थ: परेषु सामस्थ्यमन्विच्छति तन्न साधु । यथा<55त्मन: पश्यति वृत्तमेव तथा परेषामपि सो भ्युपैतु,राजा धृतराष्ट्र स्वयं तो विषम-बर्तावमें लगे हुए हैं; परंतु दूसरोंमें समतापूर्ण बर्ताव देखना चाहते हैं, यह अच्छी बात नहीं है। वे जैसा अपना बर्ताव देखते हैं, वैसा ही दूसरोंका भी देखें

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ରାଜା ନିଜେ ବିଷମ ଆଚରଣରେ ଥାଇ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କଠାରେ ସମତା ଖୋଜନ୍ତି; ଏହା ଭଲ ନୁହେଁ। ସେ ଯେପରି ନିଜ ଆଚରଣକୁ ଦେଖନ୍ତି, ସେପରି ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ଆଚରଣକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖନ୍ତୁ।

Verse 10

आसमज्नमन्निं तु निदाघकाले गम्भीरकक्षे गहने विसृज्य । यथा विवृद्ध॑ वायुवशेन शोचेत्‌ क्षेमं मुमुक्षु:ः शिशिरव्यपाये,संजय! जैसे कोई मनुष्य शिशिर-ऋतु बीतनेपर ग्रीष्म-ऋतुकी दोपहरीमें बहुत घास- फ़ूससे भरे हुए गहन वनमें आग लगा दे और जब हवा चलनेसे वह आग सब ओर फैलकर अपने निकट आ जाय, तब उसकी ज्वालासे अपने-आपको बचानेके लिये वह कुशल- क्षेमकी इच्छा रखकर बार-बार शोक करने लगे, उसी प्रकार आज राजा धुृतराष्ट्र सारा ऐश्वर्य अपने अधिकारमें करके खोटी बुद्धिवाले, उद्दण्ड, भाग्यहीन, मूर्ख और किसी अच्छे मन्त्रीकी सलाहके अनुसार न चलनेवाले अपने पुत्र दुर्योधनका पक्ष लेकर अब किसलिये (दीनकी भाँति) विलाप करते हैं?

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯେପରି କେହି ଗ୍ରୀଷ୍ମକାଳର ତପ୍ତ ଦୁପୁରେ ଗଭୀର ଝାଡ଼ଝଙ୍କାର ଓ ଘାସ-ଫୁସରେ ଭରିଥିବା ଘନ ଅରଣ୍ୟରେ ଅଗ୍ନି ଲଗାଇଦିଏ, ଏବଂ ପରେ ପବନବେଗରେ ସେଇ ଅଗ୍ନି ବଢ଼ି ସବୁଦିଗରେ ପ୍ରସାରିତ ହୋଇ ତାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସିପଡ଼େ; ତେବେ ଶିଶିର ଋତୁ ଚାଲିଗଲା ପରେ ନିଜ କୁଶଳ-କ୍ଷେମ ଚାହିଁ ସେ ପୁନଃପୁନଃ ବିଲାପ କରେ—ସେପରି ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ସମସ୍ତ ଐଶ୍ୱର୍ୟକୁ ନିଜ ହସ୍ତଗତ କରି ମଧ୍ୟ, କୁମନ୍ତ୍ରିତ, ଉଦ୍ଦଣ୍ଡ, ଦୁର୍ଭାଗ୍ୟଗ୍ରସ୍ତ, ମୂର୍ଖ ଏବଂ କୌଣସି ସୁମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ପରାମର୍ଶ ନ ମାନୁଥିବା ପୁତ୍ର ଦୁର୍ୟୋଧନଙ୍କ ପକ୍ଷ ନେଇ, ଏବେ ଦୀନ ଭଳି କାହିଁକି ବିଲାପ କରୁଛନ୍ତି? ଏବେ ସେ କେଉଁ ‘କ୍ଷେମ’ ଆଶା କରୁଛନ୍ତି?

Verse 11

प्राप्तैश्वर्यो धृतराष्ट्रोडद्य राजा लालप्यते संजय कस्य हेतो: । प्रगृहा दुर्बुद्धिमनार्जवे रतं पुत्र मनन्‍्दं मूढममन्त्रिणं तु,संजय! जैसे कोई मनुष्य शिशिर-ऋतु बीतनेपर ग्रीष्म-ऋतुकी दोपहरीमें बहुत घास- फ़ूससे भरे हुए गहन वनमें आग लगा दे और जब हवा चलनेसे वह आग सब ओर फैलकर अपने निकट आ जाय, तब उसकी ज्वालासे अपने-आपको बचानेके लिये वह कुशल- क्षेमकी इच्छा रखकर बार-बार शोक करने लगे, उसी प्रकार आज राजा धुृतराष्ट्र सारा ऐश्वर्य अपने अधिकारमें करके खोटी बुद्धिवाले, उद्दण्ड, भाग्यहीन, मूर्ख और किसी अच्छे मन्त्रीकी सलाहके अनुसार न चलनेवाले अपने पुत्र दुर्योधनका पक्ष लेकर अब किसलिये (दीनकी भाँति) विलाप करते हैं?

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ସଞ୍ଜୟ! ଆଜି ରାଜ୍ୟ-ଐଶ୍ୱର୍ୟ ପାଇ ଧାରଣ କରିଥିବା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କେଉଁ ହେତୁରେ ବିଲାପ କରୁଛନ୍ତି? ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧି, ଅନାର୍ଯ୍ୟ ଆଚରଣରେ ଆସକ୍ତ, ଉଦ୍ଦଣ୍ଡ, ମୂଢ଼ ଏବଂ ସୁମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ପରାମର୍ଶ ବିନା ଚାଲୁଥିବା ନିଜ ପୁତ୍ରଙ୍କ ପକ୍ଷ ଧରି, ଏବେ କୁଶଳ-କ୍ଷେମ ଚାହୁଁଥିବା ଲୋକ ପରି କାହିଁକି ପୁନଃପୁନଃ ଶୋକ କରୁଛନ୍ତି? ଯେପରି ଗ୍ରୀଷ୍ମ ଦୁପୁରେ ଶୁଖିଲା ଘାସ-କାଠରେ ଭରିଥିବା ଘନ ଜଙ୍ଗଲରେ କେହି ଆଗ ଲଗାଏ, ଏବଂ ପବନରେ ସେ ଆଗ ସବୁଦିଗକୁ ପସରି ଶେଷେ ତାହାର ନିକଟକୁ ଫେରିଆସେ, ତେବେ ସେ ନିଜ ରକ୍ଷା ପାଇଁ ଭୟରେ ପୁନଃପୁନଃ କାନ୍ଦେ—ସେପରି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ନାଶର କାରଣକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ଶୋକ କରୁଛନ୍ତି।

Verse 12

अनाप्तवच्चाप्ततमस्य वाच: सुयोधनो विदुरस्यावमत्य । सुतस्य राजा धृतराष्ट्र: प्रियेषी सम्बुध्यमानो विशते5धर्ममेव,अपने पुत्र दुर्योधनका प्रिय चाहनेवाले राजा धृतराष्ट्र अपने सबसे अधिक विश्वासपात्र विदुरजीके वचनोंको अविश्वसनीय-से समझकर उनकी अवहेलना करके जान-बूझकर अधर्मके ही पथका आश्रय ले रहे हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସବୁଠାରୁ ବିଶ୍ୱସନୀୟ ବିଦୁରଙ୍କ ବଚନକୁ ମଧ୍ୟ ଅବିଶ୍ୱସନୀୟ ଭାବି ସୁୟୋଧନ ଅବମାନନାରେ ତ୍ୟାଗ କରେ। ଏବଂ ପୁତ୍ରପ୍ରୀତିରେ ଆବଦ୍ଧ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଜାଣିଶୁଣି ଅଧର୍ମପଥକୁ ହିଁ ଅବଲମ୍ବନ କରୁଛନ୍ତି।

Verse 13

मेधाविन हार्थकामं कुरूणां बहुश्रुतं वाग्मिनं शीलवन्तम्‌ । स तं राजा धृतराष्ट्र: कुरुभ्यो न सस्मार विदुरं पुत्रकाम्यात्‌,बुद्धिमान, कौरवोंके अभीष्टकी सिद्धि चाहनेवाले, बहुश्रुत विद्वान, उत्तम वक्ता तथा शीलवान्‌ विदुरजीका भी राजा धृतराष्ट्रने कौरवोंके हितके लिये पुत्रस्नेहकी लालसासे आदर नहीं किया

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ବିଦୁର ବୁଦ୍ଧିମାନ, କୁରୁମାନଙ୍କ ସତ୍ୟ ହିତସାଧନ ଚାହୁଁଥିବା, ବହୁଶ୍ରୁତ, ବାକ୍ପଟୁ ଓ ଶୀଳବାନ ଥିଲେ। ତଥାପି ପୁତ୍ରଲାଲସାରେ ଆବଦ୍ଧ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କୁରୁକୁଳର ହିତ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ବିଦୁରଙ୍କୁ ସ୍ମରଣ କରି ସମ୍ମାନ ଦେଲେ ନାହିଁ।

Verse 14

मानध्नस्यासौ मानकामस्य चेर्षो: संरम्भिणक्षार्थधर्मातिगस्य । दुर्भाषिणो मन्युवशानुगस्य कामात्मनो दौहदैर्भावितस्य,संजय! दूसरोंका मान मिटाकर अपना मान चाहनेवाले, ईर्ष्यालु, क्रोधी, अर्थ और धर्मका उल्लंघन करनेवाले, कटुवचन बोलनेवाले, क्रोध और दीनताके वशवर्ती, कामात्मा (भोगासक्त), पापियोंसे प्रशंसित, शिक्षा देनेके अयोग्य, भाग्यहीन, अधिक क्रोधी, मित्रद्रोही तथा पापबुद्धि पुत्र दुर्योधनका प्रिय चाहनेवाले राजा धृतराष्ट्रने समझते हुए भी धर्म और कामका परित्याग किया है

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେ ଏମିତି ଜଣେ, ଯେ ଅନ୍ୟର ମାନ ନଷ୍ଟ କରି ନିଜ ମାନ ଚାହେ; ଈର୍ଷ୍ୟାଳୁ, କ୍ରୋଧୀ ଓ ଉଗ୍ର; ଅର୍ଥ ଓ ଧର୍ମ—ଦୁହିଁର ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଲଂଘନ କରେ; କଟୁବଚନ କହେ; କ୍ରୋଧର ବଶରେ ଚାଲେ; ଭୋଗାସକ୍ତ; ଏବଂ ସ୍ୱାର୍ଥପୂର୍ଣ୍ଣ କାମନାରେ ମନ ଗଢ଼ା। ଏମିତି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ପ୍ରିୟ ମାନି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଜାଣିଶୁଣି ଧର୍ମକୁ ତ୍ୟାଗ କରିଛନ୍ତି।

Verse 15

अनेयस्याश्रेयसो दीर्घमन्यो- मित्रद्रुह: संजय पापबुद्धे: । सुतस्य राजा धृतराष्ट्र: प्रियेषी प्रपश्यमान: प्राजहाद्‌ धर्मकामौ,संजय! दूसरोंका मान मिटाकर अपना मान चाहनेवाले, ईर्ष्यालु, क्रोधी, अर्थ और धर्मका उल्लंघन करनेवाले, कटुवचन बोलनेवाले, क्रोध और दीनताके वशवर्ती, कामात्मा (भोगासक्त), पापियोंसे प्रशंसित, शिक्षा देनेके अयोग्य, भाग्यहीन, अधिक क्रोधी, मित्रद्रोही तथा पापबुद्धि पुत्र दुर्योधनका प्रिय चाहनेवाले राजा धृतराष्ट्रने समझते हुए भी धर्म और कामका परित्याग किया है

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ସଞ୍ଜୟ! ପାପବୁଦ୍ଧି, ମିତ୍ରଦ୍ରୋହୀ, ଦୀର୍ଘକାଳ ଧରି ଅଶ୍ରେୟକୁ ହିଁ ଅନୁସରଣ କରୁଥିବା ନିଜ ପୁତ୍ରକୁ ପ୍ରିୟ ମାନୁଥିବା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ପରିଣାମ ସ୍ପଷ୍ଟ ଦେଖିଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ଧର୍ମ ଓ ନିୟମିତ କାମ—ଦୁହିଁକୁ ତ୍ୟାଗ କରିଛନ୍ତି।

Verse 16

तदैव मे संजय दीव्यतो< भू- न्मति: कुरूणामागत: स्यादभाव: । काव्यां वाचं विदुरो भाषमाणो न विन्दते यद्‌ धार्तराष्ट्रात्‌ प्रशंभाम्‌,संजय! जिस समय मैं जूआ खेल रहा था, उसी समयकी बात है, विदुरजी शुक्रनीतिके अनुसार युक्ति-युक्त वचन कह रहे थे, तो भी दुर्योधनकी ओरसे उन्हें प्रशंसा नहीं प्राप्त हुई। तभी मेरे मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ था कि सम्भवत: कौरवोंका विनाशकाल समीप आ गया है

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ମୁଁ ଯେତେବେଳେ ଦ୍ୟୁତକ୍ରୀଡାରେ ଲିପ୍ତ ଥିଲି, ସେତେବେଳେ ମୋ ମନରେ ଏହି ଭାବ ଉଦ୍ଭବ ହେଲା ଯେ କୌରବମାନଙ୍କର ବିନାଶକାଳ ନିକଟ ଆସିଛି। କାରଣ ବିଦୁର ରାଜନୀତିଅନୁସାରେ ଯୁକ୍ତିଯୁକ୍ତ ହିତବାକ୍ୟ କହୁଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରଙ୍କ ଠାରୁ ପ୍ରଶଂସା ପାଇଲେ ନାହିଁ। ଯେଉଁଠି ସଦୁପଦେଶ ଅସ୍ୱୀକୃତ ହୁଏ ଓ ଧର୍ମର ସ୍ୱାଗତ ନଥାଏ, ସେଠି ବିନାଶ ଦୂର ନୁହେଁ।

Verse 17

क्षत्तुर्यदा नान्ववर्तन्त बुद्धि कृच्छूं कुरून्‌ सूत तदाभ्याजगाम । यावत्‌ प्रज्ञामन्ववर्तन्त तस्य तावत्‌ तेषां राष्ट्रवृद्धिर्ब भूव,सूत! जबतक कौरव विदुरजीकी बुद्धिके अनुसार बर्ताव करते और चलते थे, तबतक सदा उनके राष्ट्रकी वृद्धि ही होती रही। जबसे उन्होंने विदुरजीसे सलाह लेना छोड़ दिया, तभीसे उनपर विपत्ति आ पड़ी है

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ସୂତ! କୌରବମାନେ ଯେତେବେଳେ କ୍ଷତ୍ତୃ (ବିଦୁର)ଙ୍କ ପ୍ରଜ୍ଞାକୁ ଅନୁସରଣ କରିବା ଛାଡ଼ିଦେଲେ, ସେତେବେଳେ ହିଁ କଷ୍ଟ ତାଙ୍କ ଉପରେ ଆସିପଡ଼ିଲା। ଯେତେଦିନ ସେମାନେ ତାଙ୍କ ବୁଦ୍ଧି ଅନୁସାରେ ଚାଲୁଥିଲେ, ସେତେଦିନ ତାଙ୍କ ରାଷ୍ଟ୍ରର ବୃଦ୍ଧି ହେଉଥିଲା; କିନ୍ତୁ ଯେମୁହୂର୍ତ୍ତରୁ ସେମାନେ ତାଙ୍କ ଉପଦେଶ ତ୍ୟାଗ କଲେ, ସେମୁହୂର୍ତ୍ତରୁ ବିପଦ ସେମାନଙ୍କୁ ଘେରିଲା।

Verse 18

तदर्थलुब्धस्य निबोध मेडद्य ये मन्त्रिणो धार्तराष्ट्रस्य सूत । दुःशासन: शकुनि:ः सूतपुत्रो गावल्गणे पश्य सम्मोहमस्य,गवल्गणपुत्र संजय! धनके लोभी दुर्योधनके जो-जो मन्त्री हैं, उनके नाम आज तुम मुझसे सुन लो। दुःशासन, शकुनि तथा सूतपुत्र कर्ण--ये ही उसके मन्त्री हैं। उसका मोह तो देखो

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ସୂତ! ନିବୋଧ କର: ଧନଲୋଭରେ ଆସକ୍ତ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରଙ୍କ ମନ୍ତ୍ରୀମାନେ ଏହିମାନେ। ଦୁଃଶାସନ, ଶକୁନି ଓ ସୂତପୁତ୍ର କର୍ଣ୍ଣ—ଏହିମାନେ ତାଙ୍କର ମନ୍ତ୍ରୀ। ହେ ଗାବଲ୍ଗଣ! ଦେଖ, ତାଙ୍କୁ କିପରି ମୋହ ଆବରଣ କରିଛି।

Verse 19

सो>तं न पश्यामि परीक्षमाण: कथं स्वस्ति स्यात्‌ कुरुसृंजयानाम्‌ । आत्िश्वर्यो धृतराष्ट्र: परेभ्य: प्रत्राजिते विदुरे दीर्घदृष्टो,मैं बहुत सोचने-विचारनेपर भी कोई ऐसा उपाय नहीं देखता, जिससे कुरु तथा सूंजयवंश दोनोंका कल्याण हो। धृतराष्ट्र हम शत्रुओंसे ऐश्वर्य छीनकर दूरदर्शी विदुरको देशसे निर्वासित करके अपने पुत्रोंसहित भूमण्डलका निष्कण्टक साम्राज्य प्राप्त करनेकी आशा लगाये बैठे हैं। ऐसे लोभी नरेशके साथ केवल संधि ही बनी रहेगी, (युद्ध आदिका अवसर नहीं आयेगा) यह सम्भव नहीं जान पड़ता; क्योंकि हमलोगोंके वन चले जानेपर वे हमारे सारे धनको अपना ही मानने लगे हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ପକ୍ଷରୁ ବିଚାର କରିଲେ ମଧ୍ୟ କୁରୁ ଓ ସୃଞ୍ଜୟ—ଦୁଇ ବଂଶର କଲ୍ୟାଣ କିପରି ହେବ, ମୁଁ ଦେଖୁନାହିଁ। ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଐଶ୍ୱର୍ୟମଦରେ ମତ୍ତ ହୋଇ ଦୂରଦର୍ଶୀ ବିଦୁରଙ୍କୁ ନିର୍ବାସିତ କରି, ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱୀମାନଙ୍କଠାରୁ ସାର୍ବଭୌମତ୍ୱ ଛିନିବାକୁ ଚାହୁଁଛନ୍ତି ଏବଂ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ ନିଷ୍କଣ୍ଟକ ସାମ୍ରାଜ୍ୟର ଆଶା ଧରିଛନ୍ତି। ଏମିତି ଲୋଭୀ ରାଜା ସହ କେବଳ ସନ୍ଧି ଦୀର୍ଘକାଳ ଟିକିବ—ଏହା ମୋତେ ସମ୍ଭବ ଲାଗୁନାହିଁ; କାରଣ ପାଣ୍ଡବମାନେ ବନକୁ ଯାଇଥିବା ପରେ ସେମାନେ ଆମ ସମସ୍ତ ଧନକୁ ନିଜର ବୋଲି ମନେ କରିବାକୁ ଲାଗିଛନ୍ତି।

Verse 20

आशंसते वै धृतराष्ट्र: सपुत्रो महाराज्यमसपत्नं॑ पृथिव्याम्‌ | तस्मिज्छम: केवल नोपलभ्य: सर्व स्वकं मद्गते मन्यते<र्थम्‌,मैं बहुत सोचने-विचारनेपर भी कोई ऐसा उपाय नहीं देखता, जिससे कुरु तथा सूंजयवंश दोनोंका कल्याण हो। धृतराष्ट्र हम शत्रुओंसे ऐश्वर्य छीनकर दूरदर्शी विदुरको देशसे निर्वासित करके अपने पुत्रोंसहित भूमण्डलका निष्कण्टक साम्राज्य प्राप्त करनेकी आशा लगाये बैठे हैं। ऐसे लोभी नरेशके साथ केवल संधि ही बनी रहेगी, (युद्ध आदिका अवसर नहीं आयेगा) यह सम्भव नहीं जान पड़ता; क्योंकि हमलोगोंके वन चले जानेपर वे हमारे सारे धनको अपना ही मानने लगे हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ ପୃଥିବୀରେ ଅସପତ୍ନ ମହାରାଜ୍ୟର ଆଶା ପୋଷଣ କରୁଛନ୍ତି। ଏମିତି ଲୋକ ସହ କେବଳ ଶାନ୍ତି ସତ୍ୟରେ ସୁନିଶ୍ଚିତ ହୁଏନାହିଁ; କାରଣ ଆମେ ହଟିଯିବା ପରେ ତାଙ୍କ ହାତକୁ ଆସିଥିବା ସମସ୍ତ ଧନ-ଲାଭକୁ ସେ ନିଜର ବୋଲି ମନେ କରୁଛନ୍ତି। ତେଣୁ ଅନେକ ଚିନ୍ତା କରିଲେ ମଧ୍ୟ କୁରୁବଂଶ ଓ ପାଣ୍ଡବବଂଶ—ଦୁହିଁଙ୍କ କଲ୍ୟାଣ ସଂଘର୍ଷର ଭୟ ବିନା ରହିବା ପାଇଁ କୌଣସି ଉପାୟ ମୋତେ ଦେଖାଯାଉନାହିଁ।

Verse 21

कर्ण जो ऐसा समझता है कि युद्धमें धनुष उठाये हुए अर्जुनको जीत लेना सहज है, वह उसकी भूल है। पहले भी तो बड़े-बड़े युद्ध हो चुके हैं। उनमें कर्ण इन कौरवोंका आश्रयदाता क्‍यों न हो सका?

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯୁଦ୍ଧରେ ଧନୁଷ ଉଠାଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଜିତିବା ସହଜ ବୋଲି କର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ, ତାହା ତାଙ୍କର ମୋହ। ପୂର୍ବରୁ ମଧ୍ୟ ମହାଯୁଦ୍ଧ ହୋଇଛି; ସେହି ସଙ୍କଟକାଳରେ କର୍ଣ୍ଣ ଏହି କୌରବମାନଙ୍କର ସତ୍ୟ ଆଶ୍ରୟ ଓ ରକ୍ଷକ କାହିଁକି ହୋଇପାରିଲେ ନାହିଁ?

Verse 22

कर्णश्र॒ जानाति सुयोधनश्च द्रोणक्ष जानाति पितामहश्न । अन्ये च ये कुरवस्तत्र सन्ति यथार्जुनान्नास्त्यपरो धनुर्धर:,अर्जुनसे बढ़कर दूसरा कोई धनुर्धर नहीं है--इस बातको कर्ण जानता है, दुर्योधन जानता है, आचार्य द्रोण और पितामह भीष्म जानते हैं तथा अन्य जो-जो कौरव वहाँ रहते हैं, वे सब भी जानते हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—କର୍ଣ୍ଣ ଜାଣେ, ସୁୟୋଧନ ମଧ୍ୟ ଜାଣେ; ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟ ଜାଣନ୍ତି, ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମ ମଧ୍ୟ ଜାଣନ୍ତି। ସେଠାରେ ଥିବା ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ କୁରୁମାନେ ମଧ୍ୟ ଜାଣନ୍ତି—ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସମାନ ଧନୁର୍ଧର ଆଉ କେହି ନାହିଁ।

Verse 23

जानन्त्येतत्‌ कुरव: सर्व एव ये चाप्यन्ये भूमिपाला: समेता: । दुर्योधने राज्यमिहाभवद्‌ यथा अरिंदमे फाल्गुने विद्यमाने,समस्त कौरव तथा वहाँ एकत्र हुए अन्य भूपाल भी इस बातको जानते हैं कि शत्रुदमन अर्जुनके उपस्थित रहते हुए दुर्योधनने किस उपायसे पाण्डवोंका राज्य प्राप्त किया (अर्थात्‌ उन्होंने अपनी वीरतासे नहीं, अपितु छलपूर्वक जूएके द्वारा ही हमारा राज्य लिया)

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସମସ୍ତ କୁରୁ ଏବଂ ସେଠାରେ ଏକତ୍ର ହୋଇଥିବା ଅନ୍ୟ ଭୂପାଳମାନେ ମଧ୍ୟ ଜାଣନ୍ତି—ଶତ୍ରୁଦମନ ଫାଲ୍ଗୁନ (ଅର୍ଜୁନ) ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଏଠାରେ ରାଜ୍ୟ କିପରି ପାଇଲା; ଶୌର୍ଯ୍ୟରେ ନୁହେଁ, ଦ୍ୟୂତର ଛଳରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ବଞ୍ଚିତ କରି।

Verse 24

तेनानुबन्ध॑ मन्यते धारतराष्ट्र: शक्यं हर्तु पाण्डवानां ममत्वम्‌ | किरीटिना तालमात्रायुधेन तद्वेदिना संयुगं तत्र गत्वा,राज्य आदिपर जो पाण्डवोंका ममत्व है, उसे हर लेना क्या दुर्योधन सरल समझता है? इसके लिये उसे उन किरीटथारी अर्जुनके साथ युद्धभूमिमें उतरना पड़ेगा, जो चार हाथ लंबा धनुष धारण करते हैं और धरनुर्वेदके प्रकाण्ड विद्वान्‌ हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର! ସେ ଭାବୁଛି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ରାଜ୍ୟ ଉପରେ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ମମତ୍ୱକୁ ଛିନିନେବା ସମ୍ଭବ। କିନ୍ତୁ ତାହା ପାଇଁ ତାକୁ ଯୁଦ୍ଧଭୂମିରେ କିରୀଟଧାରୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖୀନ ହେବାକୁ ପଡିବ—ଯିଏ ତାଳମାତ୍ର ଧନୁଷ ଧାରଣ କରନ୍ତି ଏବଂ ଧନୁର୍ବେଦର ପ୍ରକାଣ୍ଡ ବିଦ୍ୱାନ।

Verse 25

गाण्डीवविस्फारितशब्दमाजा- वशृण्वाना धार्तराष्ट्रा प्रियन्ते । क्रुद्धं न चेदीक्षते भीमसेन॑ सुयोधनो मन्यते सिद्धमर्थम्‌,धृतराष्ट्रके पुत्र तभीतक जीवित हैं, जबतक कि वे युद्धमें गाण्डीव धनुषका टंकारघोष नहीं सुन रहे हैं। दुर्योधन जबतक क्रोधमें भरे हुए भीमसेनको नहीं देख रहा है, तभीतक अपने राज्यप्राप्तिसम्बन्धी मनोरथको सिद्ध हुआ समझे

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଯୁଦ୍ଧଭୂମିରେ ଗାଣ୍ଡୀବର ଗର୍ଜନମୟ ଟଙ୍କାର ଶବ୍ଦ ଶୁଣୁନାହାନ୍ତି, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ନିଶ୍ଚିନ୍ତ ରହନ୍ତି। ଏବଂ ସୁୟୋଧନ ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧେ ଜ୍ୱଳିତ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ଦେଖୁନାହାଁନ୍ତି, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ରାଜ୍ୟଲାଭର ନିଜ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହୋଇଗଲା ବୋଲି ଭାବେ।

Verse 26

इन्द्रो5प्येतन्नोत्सहेत्‌ तात हर्तु- मैश्वर्य नो जीवति भीमसेने । धनंजये नकुले चैव सूत तथा वीरे सहदेवे सहिष्णौ,तात संजय! जबतक भीमसेन, अर्जुन, नकुल तथा सहनशील वीर सहदेव जीवित हैं, तबतक इन्द्र भी हमारे ऐश्वर्यका अपहरण नहीं कर सकता इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि युधिषिरवाक्ये षड्विंशो5ध्याय:

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ତାତ! ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଭୀମସେନ ଜୀବିତ, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଇନ୍ଦ୍ର ମଧ୍ୟ ଆମ ଐଶ୍ୱର୍ୟ ହରଣ କରିବାକୁ ସାହସ କରିପାରିବେ ନାହିଁ। ଏବଂ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ), ନକୁଳ ଓ ସହନଶୀଳ ବୀର ସହଦେବ ଜୀବିତ ଥିଲେ, ଆମ ରାଜଲକ୍ଷ୍ମୀ କେହି ଛିନିପାରିବେ ନାହିଁ।

Verse 27

स चेदेतां प्रतिपद्येत बुद्धि वृद्धो राजा सह पुत्रेण सूत । एवं रणे पाण्डवकोपदग्धा न नश्येयु: संजय धार्तराष्ट्रा:,सूत! यदि राजा धृतराष्ट्र अपने पुत्रोंक साथ यह अच्छी तरह समझ लेंगे कि पाण्डवोंको राज्य न देनेमें कुशल नहीं है तो धृतराष्ट्रके सभी पुत्र समरांगणमें पाण्डवोंकी क्रोधाग्निसे दग्ध होकर नष्ट होनेसे बच जायूँगे

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ସୂତ! ଯଦି ବୃଦ୍ଧ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ପୁତ୍ରସହ ଏହି ବୁଦ୍ଧିକୁ ସତ୍ୟସତ୍ୟ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତି, ତେବେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ କ୍ରୋଧାଗ୍ନିରେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇ ରଣଭୂମିରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ନଶିବେ ନାହିଁ।

Verse 28

जानासि त्वं क्लेशमस्मासु वृत्तं त्वां पूजयन्‌ संजयाहं क्षमेयम्‌ | यच्चास्माकं कौरवैर्भूतपूर्व या नो वृत्तिर्धार्तराष्ट्र तदा5डसीत्‌,संजय! हमलोगोंको कौरवोंके कारण पहले कितना क्लेश उठाना पड़ा है, यह तुम भलीभाँति जानते हो तथापि मैं तुम्हारा आदर करते हुए उनके सब अपराधोंको क्षमा कर सकता हूँ। दुर्योधन आदि कौरवोंने पहले हमारे साथ कैसा बर्ताव किया है और उस समय हमलोगोंका उनके साथ कैसा बर्ताव रहा है, यह भी तुमसे छिपा नहीं है

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—କୌରବମାନଙ୍କ କାରଣରେ ପୂର୍ବେ ଆମେ କେତେ କ୍ଲେଶ ଭୋଗିଛୁ, ତୁମେ ଭଲଭାବେ ଜାଣ। ତଥାପି, ସଞ୍ଜୟ, ତୁମକୁ ସମ୍ମାନ କରି ମୁଁ ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତ ଅପରାଧ କ୍ଷମା କରିପାରିବି। ଏବଂ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନେ ପୂର୍ବେ ଆମ ସହ କିପରି ବ୍ୟବହାର କରିଥିଲେ ଓ ସେତେବେଳେ ଆମର ସେମାନଙ୍କ ପ୍ରତି କିପରି ଆଚରଣ ଥିଲା—ଏହା ମଧ୍ୟ ତୁମଠାରୁ ଗୁପ୍ତ ନୁହେଁ।

Verse 29

अद्यापि तत्‌ तत्र तथैव वर्ततां शान्तिं गमिष्यामि यथा त्वमात्थ । इन्द्रप्रस्थे भवतु ममैव राज्यं सुयोधनो यच्छतु भारताग्रय:,अब भी वह सब कुछ पहलेके ही समान हो सकता है। जैसा तुम कह रहे हो, उसके अनुसार मैं शान्ति धारण कर लूँगा। परंतु इन्द्रप्रस्थमें पूर्ववत्‌ मेरा ही राज्य रहे और भरतवंशशिरोमणि सुयोधन मेरा वह राज्य मुझे लौटा दे

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଏବେ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ସବୁକିଛି ପୂର୍ବବତ୍ ତଥାହି ରହୁ; ତୁମେ ଯେପରି କହିଛ, ସେପରି ମୁଁ ଶାନ୍ତି ଗ୍ରହଣ କରିବି। କିନ୍ତୁ ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥରେ ପୂର୍ବବତ୍ ରାଜ୍ୟ ମୋର ହେଉ; ଭାରତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅଗ୍ରଗଣ୍ୟ ସୁୟୋଧନ ସେଇ ରାଜ୍ୟ ମୋତେ ପ୍ରତ୍ୟର୍ପଣ କରୁ।

Verse 56

कामार्थलाभेन तथैव भूयो न तृप्यते सर्पिषेवाग्निरिद्ध: । विषयोंका चिन्तन अपने शरीरको पीड़ा देता है। जो विषय-चिन्तनसे सर्वथा मुक्त है, वह कभी दुःखका अनुभव नहीं करता। जैसे प्रज्वलित अग्निमें ईंधन डालनेसे उसका बल बहुत अधिक बढ़ जाता है, उसी प्रकार विषयभोग और धनका लाभ होनेसे मनुष्यकी तृष्णा और अधिक बढ़ जाती है। घीसे शान्त न होनेवाली प्रज्वलित अग्निकी भाँति मानव कभी विषयभोग और धनसे तृप्त नहीं होता है

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—କାମ୍ୟବସ୍ତୁ ଓ ଧନଲାଭ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ମନୁଷ୍ୟ ତୃପ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ; ଘିଅ ପକାଇଲେ ଯେପରି ଜ୍ୱଳନ୍ତ ଅଗ୍ନି ଆଉ ଭଳି ଭଡ଼ିଉଠେ, ସେପରି ବିଷୟଭୋଗ ଓ ଧନଲାଭରେ ତୃଷ୍ଣା ଅଧିକ ବଢ଼େ, ଶାନ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ।

Verse 231

यत्‌ तत्‌ कर्णो मन्यते पारणीयं युद्धे गृहीतायुधमर्जुनं वै । आसंभश्न युद्धानि पुरा महान्ति कथं कर्णो नाभवद्‌ द्वीप एषाम्‌

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯଦି କର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଯେ ଅସ୍ତ୍ରଧାରୀ ଓ ଯୁଦ୍ଧପ୍ରସ୍ତୁତ ଅର୍ଜୁନକୁ ସେ ରଣରେ ପରାଜିତ କରିପାରିବ, ତେବେ ପୂର୍ବେ ଯେତେବେଳେ ମହାଯୁଦ୍ଧ ଭୟଙ୍କର ଭାବେ ଚାଲିଥିଲା ଏବଂ ଜଗତ କମ୍ପିଥିଲା, ସେହି ସଙ୍କଟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କର୍ଣ୍ଣ ‘ଦ୍ୱୀପ’—ଅର୍ଥାତ୍ ରକ୍ଷାକର ଆଶ୍ରୟ—କାହିଁକି ହେଲା ନାହିଁ?

Frequently Asked Questions

Whether political objectives and security can justify escalation when the foreseeable consequence is kin-destruction; the chapter frames such conflict as yielding “total loss,” where victory is morally equivalent to defeat due to social and familial ruin.

That śama (pacification) is both ethically superior and strategically rational: preserving lineage, social stability, and moral reputation outweighs gains achieved through internecine harm.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-level significance is implicit—understanding the chapter clarifies how the epic evaluates intention, counsel, and preventable harm within the broader dharma framework.