उद्योगपर्व — अध्याय २५: संजयदूतवाक्यम्
Sañjaya’s Envoy-Speech on Peace
प्राप्तैश्वर्यो धृतराष्ट्रोडद्य राजा लालप्यते संजय कस्य हेतो: । प्रगृहा दुर्बुद्धिमनार्जवे रतं पुत्र मनन््दं मूढममन्त्रिणं तु,संजय! जैसे कोई मनुष्य शिशिर-ऋतु बीतनेपर ग्रीष्म-ऋतुकी दोपहरीमें बहुत घास- फ़ूससे भरे हुए गहन वनमें आग लगा दे और जब हवा चलनेसे वह आग सब ओर फैलकर अपने निकट आ जाय, तब उसकी ज्वालासे अपने-आपको बचानेके लिये वह कुशल- क्षेमकी इच्छा रखकर बार-बार शोक करने लगे, उसी प्रकार आज राजा धुृतराष्ट्र सारा ऐश्वर्य अपने अधिकारमें करके खोटी बुद्धिवाले, उद्दण्ड, भाग्यहीन, मूर्ख और किसी अच्छे मन्त्रीकी सलाहके अनुसार न चलनेवाले अपने पुत्र दुर्योधनका पक्ष लेकर अब किसलिये (दीनकी भाँति) विलाप करते हैं?
sañjaya uvāca |
prāptaiśvaryo dhṛtarāṣṭro ’dyarājā lālapyate sañjaya kasya hetoḥ |
pragṛhya durbuddhim anārjave rataṃ putraṃ nṛśaṃsaṃ mūḍham amantriṇaṃ tu ||
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ସଞ୍ଜୟ! ଆଜି ରାଜ୍ୟ-ଐଶ୍ୱର୍ୟ ପାଇ ଧାରଣ କରିଥିବା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କେଉଁ ହେତୁରେ ବିଲାପ କରୁଛନ୍ତି? ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧି, ଅନାର୍ଯ୍ୟ ଆଚରଣରେ ଆସକ୍ତ, ଉଦ୍ଦଣ୍ଡ, ମୂଢ଼ ଏବଂ ସୁମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ପରାମର୍ଶ ବିନା ଚାଲୁଥିବା ନିଜ ପୁତ୍ରଙ୍କ ପକ୍ଷ ଧରି, ଏବେ କୁଶଳ-କ୍ଷେମ ଚାହୁଁଥିବା ଲୋକ ପରି କାହିଁକି ପୁନଃପୁନଃ ଶୋକ କରୁଛନ୍ତି? ଯେପରି ଗ୍ରୀଷ୍ମ ଦୁପୁରେ ଶୁଖିଲା ଘାସ-କାଠରେ ଭରିଥିବା ଘନ ଜଙ୍ଗଲରେ କେହି ଆଗ ଲଗାଏ, ଏବଂ ପବନରେ ସେ ଆଗ ସବୁଦିଗକୁ ପସରି ଶେଷେ ତାହାର ନିକଟକୁ ଫେରିଆସେ, ତେବେ ସେ ନିଜ ରକ୍ଷା ପାଇଁ ଭୟରେ ପୁନଃପୁନଃ କାନ୍ଦେ—ସେପରି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ନାଶର କାରଣକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ଶୋକ କରୁଛନ୍ତି।
संजय उवाच