Adhyaya 16
Udyoga ParvaAdhyaya 1634 Verses

Adhyaya 16

अग्निस्तुति, इन्द्रदर्शन, नहुष-भयवर्णन (Agni-hymn, discovery of Indra, and the Nahuṣa threat)

Upa-parva: Śakra–Nahuṣa-Upākhyāna (Indra’s concealment and Nahuṣa’s accession episode)

The chapter opens with Bṛhaspati’s formal stuti of Agni as the mouth of the gods, the hidden witness within beings, and the sustaining principle without which the world would collapse. Agni is praised as both carrier and substance of offering, linked to cosmic processes (creation, maturation/consumption, and re-establishment). Pleased, Agni promises to reveal Indra. Entering the waters, he reaches a lake and discovers Indra concealed in a lotus-fiber form, minute in body. Bṛhaspati and accompanying seers and gandharvas then praise Indra by recalling his prior victories (e.g., over Vṛtra and other adversaries) and urge him to protect the worlds; Indra gradually regains strength and resumes his form. Indra asks what duty remains, and Bṛhaspati reports the crisis: the human king Nahuṣa has obtained the devarājya and oppresses the devas; his gaze is described as dangerous, prompting the gods to move in concealment. Additional lokapālas (Kubera, Yama, Soma, Varuṇa) arrive, congratulate Indra, and request coordinated action. Indra seeks their support against Nahuṣa; Agni requests a ritual share for assistance, which Indra grants (a joint Indra–Agni portion in a great rite). Indra then honors and assigns jurisdictions—affirming Varuṇa’s authority over waters and Yama’s over the ancestors—thereby consolidating an administrative coalition for the impending resolution.

Chapter Arc: शल्य राजा धृतराष्ट्र को एक प्राचीन दैवी प्रसंग सुनाते हैं—जब इन्द्र अपने पद से विचलित हुए, तब देवताओं ने बृहस्पति के माध्यम से अग्नि का स्तवन कर के संकट-निवारण का उपाय खोजा। → अग्नि की सर्वव्यापकता और त्रिविध स्वरूप का वर्णन होता है—कवि उसे ‘एक’ भी कहते हैं और ‘तीन प्रकार’ का भी; उसके त्याग से जगत का त्वरित विनाश संभव है। देव-समाज में भय फैलता है कि यदि इन्द्र-पद रिक्त रहा तो व्यवस्था ढह जाएगी; नहुष जैसे प्रतिद्वन्द्वी का उभार भीषण छाया बनकर उपस्थित होता है। → इन्द्र अपने ‘स्वरूप’ को पुनः धारण कर बल-पराक्रम से सम्पन्न होते हैं और बृहस्पति के समक्ष स्थित होकर निर्णय लेते हैं: नहुष को पराजित करने हेतु देव-गण एकत्र हों, और साथ ही इन्द्र अपने अधिकारों का पुनर्विन्यास कर लोकपालों को उनके-उनके विभाग सौंपते हैं। → बृहस्पति देवताओं की व्याकुलता व्यक्त करते हैं और इन्द्र से कहते हैं कि नहुष-विजय के बाद ही देव-भाग सुरक्षित होंगे। इन्द्र सहमति देते हैं—अग्नि, वरुण, यम, कुबेर आदि को उनके-उनके अधिपत्य/भाग प्रदान कर के देव-व्यवस्था को स्थिर करते हैं और संयुक्त रूप से नहुष-वध/पराजय की ओर अग्रसर होते हैं। → नहुष ‘घोरदृष्टि’ शत्रु के रूप में सामने है—देव-गण संगठित तो हो गए, पर निर्णायक टकराव अभी शेष है।

Shlokas

Verse 1

अफ्-४-क+ घोडशो>< ध्याय: बृहस्पतिद्वारा अग्नि और इन्द्रका स्तवन तथा बृहस्पति एवं लोकपालोंकी इन्द्रसे बातचीत ब॒हस्पतिरुवाच त्वमग्ने सर्वदेवानां मुखं त्वमसि हव्यवाट्‌ । त्वमन्तः सर्वभूतानां गूढश्चवरसि साक्षिवत्‌,बृहस्पति बोले--अग्निदेव! आप सम्पूर्ण देवताओंके मुख हैं। आप ही देवताओंको हविष्य पहुँचानेवाले हैं। आप समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें साक्षीकी भाँति गूढ़भावसे विचरते हैं

ବୃହସ୍ପତି କହିଲେ— “ହେ ଅଗ୍ନିଦେବ! ତୁମେ ସମସ୍ତ ଦେବତାଙ୍କର ମୁଖ; ତୁମେ ହବିକୁ ଦେବମଣ୍ଡଳ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଞ୍ଚାଉଥିବା ବାହକ। ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ଅନ୍ତଃକରଣରେ ତୁମେ ଗୁପ୍ତଭାବେ ସାକ୍ଷୀ ପରି ବିଚର କର।”

Verse 2

त्वामाहुरेक॑ कवयस्त्वामाहुस्त्रिविध॑ पुनः । त्वया त्यक्तं जगच्चेदं सद्यो बात ही शन,विद्वान्‌ पुछष आपको एक बताते हैं। फिर वे ही आपको तीन प्रकारका कहते हैं। हुताशन! आपके त्याग देनेपर यह सम्पूर्ण जगत्‌ तत्काल नष्ट हो जायगा

“କବିମାନେ ତୁମକୁ ଏକ ବୋଲି କହନ୍ତି; ପୁଣି ତୁମକୁ ତ୍ରିବିଧ ବୋଲି ମଧ୍ୟ ବର୍ଣ୍ଣନା କରନ୍ତି। ହେ ହୁତାଶନ! ତୁମେ ଯଦି ଏହି ଜଗତକୁ ତ୍ୟାଗ କର, ତେବେ ଏ ସମଗ୍ର ସଂସାର ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ନଶିଯିବ।”

Verse 3

कृत्वा तुभ्यं नमो विप्रा: स्वकर्मविजितां गतिम्‌ । गच्छन्ति सह पत्नीभि: सुतैरपि च शाश्वतीम्‌,ब्राह्यगलोग आपकी पूजा और वन्दना करके अपनी पत्नियों तथा पुत्रोंक साथ अपने कर्माद्वारा प्राप्त चिरस्थायी स्वर्गीय सुख लाभ करते हैं

“ତୁମକୁ ନମସ୍କାର କରି ବିପ୍ରମାନେ ନିଜ ନିଜ କର୍ମଦ୍ୱାରା ଅର୍ଜିତ ଶାଶ୍ୱତ ଗତିକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଅନ୍ତି; ସେମାନେ ପତ୍ନୀମାନଙ୍କ ସହିତ ଏବଂ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ ମଧ୍ୟ ସେଇ ଚିରସ୍ଥାୟୀ ସୁଖଲୋକକୁ ଗମନ କରନ୍ତି।”

Verse 4

त्वमेवाग्ने हव्यवाहस्त्वमेव परमं हवि: । यजन्ति सज्रैस्त्वामेव यज्ैश्न परमाध्वरे,अग्ने! आप ही हविष्यको वहन करनेवाले देवता हैं। आप ही उत्कृष्ट हवि हैं। याज्ञिक विद्वान्‌ पुरुष बड़े-बड़े यज्ञोंमें अवान्तर सत्रों और यज्ञोंद्वारा आपकी ही आराधना करते हैं

ହେ ଅଗ୍ନି! ତୁମେ ହିଁ ହବ୍ୟବାହ, ତୁମେ ହିଁ ପରମ ହବି। ପରମ ଅଧ୍ୱରରେ ଯାଜ୍ଞିକ ବିଦ୍ୱାନମାନେ ସତ୍ର ଓ ଯଜ୍ଞ ଦ୍ୱାରା କେବଳ ତୁମର ହିଁ ଆରାଧନା କରନ୍ତି।

Verse 5

सृष्टवा लोकांस्त्रीनिमान्‌ हव्यवाह प्राप्त काले पचसि पुनः समिद्ध: । त्वं सर्वस्य भुवनस्य प्रसूति- स्त्वमेवाग्ने भवसि पुन: प्रतिष्ठा,हव्यवाहन! आप ही सृष्टिके समय इन तीनों लोकोंको उत्पन्न करके प्रलयकाल आनेपर पुनः प्रज्वलित हो इन सबका संहार करते हैं। अग्ने! आप ही सम्पूर्ण विश्वके उत्पत्तिस्थान हैं और आप ही पुनः इसके प्रलयकालमें आधार होते हैं

ହବ୍ୟବାହ! ସୃଷ୍ଟିକାଳରେ ତୁମେ ଏହି ତିନି ଲୋକକୁ ସୃଜନ କରି, ନିୟତ କାଳ ଆସିଲେ ପୁନଃ ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ ହୋଇ ସେମାନଙ୍କୁ ଦହନ କରି ଲୟ କର। ହେ ଅଗ୍ନି! ସମଗ୍ର ଭୁବନର ପ୍ରସୂତି ତୁମେ ହିଁ; ପ୍ରଳୟକାଳେ ପୁନଃ ତୁମେ ହିଁ ତାହାର ଆଧାର।

Verse 6

त्वामग्ने जलदानाहुर्विद्युतश्च मनीषिण: । दहन्ति सर्वभूतानि त्वत्तो निष्क्रम्य हेतय:,अग्निदेव! मनीषी पुरुष आपको ही मेघ और विद्युत्‌ कहते हैं। आपसे ही ज्वालाएँ निकलकर सम्पूर्ण भूतोंको दग्ध करती हैं

ହେ ଅଗ୍ନିଦେବ! ମନୀଷୀମାନେ ତୁମକୁ ହିଁ ଜଳଦ (ମେଘ) ଓ ବିଦ୍ୟୁତ୍ ବୋଲି କହନ୍ତି। ତୁମଠାରୁ ନିଷ୍କ୍ରମଣ କରିଥିବା ଜ୍ୱାଳାମାନେ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀକୁ ଦହନ କରନ୍ତି।

Verse 7

त्वय्यापो निहिता: सर्वास्त्वयि सर्वमिदं जगत्‌ । न ते>स्त्यविदितं किंचित्‌ त्रिषु लोकेषु पावक,पावक! आपमें ही सारा जल संचित है। आपमें ही यह सम्पूर्ण जगत्‌ प्रतिष्ठित है। तीनों लोकोंमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो

ହେ ପାବକ! ସମସ୍ତ ଜଳ ତୁମଠାରେ ହିଁ ନିହିତ; ଏହି ସମଗ୍ର ଜଗତ୍ ମଧ୍ୟ ତୁମଠାରେ ହିଁ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ। ତିନି ଲୋକରେ ତୁମକୁ ଅଜଣା ଏମିତି କିଛି ନାହିଁ।

Verse 8

स्वयोनिं भजते सर्वो विशस्वापो5विशड्कित: । अहं त्वां वर्धयिष्यामि ब्राहौर्मन्त्रै: सनातनै:,समस्त पदार्थ अपने-अपने कारणमें प्रवेश करते हैं। अतः आप भी नि:शंक होकर जलमें प्रवेश कीजिये। मैं सनातन वेदमन्त्रोंद्वारा आपको बढ़ाऊँगा

ସମସ୍ତ ପଦାର୍ଥ ନିଜ-ନିଜ କାରଣରେ ପ୍ରବେଶ କରନ୍ତି; ତେଣୁ ତୁମେ ନିଃଶଙ୍କ ହୋଇ ଜଳରେ ପ୍ରବେଶ କର। ମୁଁ ସନାତନ ବ୍ରାହ୍ମ (ବୈଦିକ) ମନ୍ତ୍ରଦ୍ୱାରା ତୁମକୁ ବର୍ଧିତ କରିବି।

Verse 9

एवं स्तुतो हव्यवाट्‌ स भगवान्‌ कविरुत्तम: । बृहस्पतिमथोवाच प्रीतिमान्‌ वाक्यमुत्तमम्‌ | दर्शयिष्यामि ते शक्रं सत्यमेतद्‌ ब्रवीमि ते,इस प्रकार स्तुति की जानेपर हविष्य वहन करनेवाले श्रेष्ठ एवं सर्वज्ञ भगवान्‌ अग्निदेव प्रसन्न होकर बृहस्पतिसे यह उत्तम वचन बोले--'ब्रह्मन! मैं आपको इन्द्रका दर्शन कराऊँगा, यह मैं आपसे सत्य कह रहा हूँ”

ଏଭଳି ସ୍ତୁତି ପାଇ ହବ୍ୟବାହନ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦର୍ଶୀ ଭଗବାନ୍ ଅଗ୍ନିଦେବ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ ବୃହସ୍ପତିଙ୍କୁ ଏହି ଉତ୍ତମ ବଚନ କହିଲେ— “ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ମୁଁ ତୁମକୁ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ଦର୍ଶନ କରାଇବି; ଏହା ମୁଁ ତୁମକୁ ସତ୍ୟ କହୁଛି।”

Verse 10

शल्य उवाच प्रविश्यापस्ततो वह्निः ससमुद्रा: सपल्वला: । आससाद सरस्तच्च गूढो यत्र शतक्रतु:,शल्य कहते हैं--युधिष्ठि!! तदनन्तर अग्निदेव छोटे गड़ढेसे लेकर बड़े-से-बड़े समुद्रतकके जलमें प्रवेश करके पता लगाते हुए क्रमश: उस सरोवरमें जा पहुँचे, जहाँ इन्द्र छिपे हुए थे

ଶଲ୍ୟ କହିଲେ— “ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ତା’ପରେ ଅଗ୍ନିଦେବ ଛୋଟ ଗଡ଼ିଆରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ମହାସମୁଦ୍ର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସମସ୍ତ ଜଳରେ ପ୍ରବେଶ କରି ଖୋଜି ଖୋଜି କ୍ରମେ ସେହି ସରୋବରକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ, ଯେଉଁଠାରେ ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ର ଗୁପ୍ତ ଥିଲେ।”

Verse 11

अथ तत्रापि पद्मानि विचिन्वन्‌ भरतर्षभ | अपश्यत्‌ स तु देवेन्द्र बिसमध्यगतं स्थितम्‌,भरतश्रेष्ठ! उसमें भी कमलोंके भीतर खोज करते हुए अग्निदेवने एक कमलके नालमें बैठे हुए देवेन्द्रकों देखा

ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସେଠାରେ ମଧ୍ୟ ପଦ୍ମମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଖୋଜି ଖୋଜି ଅଗ୍ନିଦେବ ଦେବେନ୍ଦ୍ର ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ପଦ୍ମନାଳର ମଧ୍ୟଭାଗରେ ଅବସ୍ଥିତ (ଗୁପ୍ତ) ଦେଖିଲେ।

Verse 12

आगत्य च ततस्तूर्ण तमाचष्ट बृहस्पते: । अणुमात्रेण वपुषा पद्मतन्त्वश्रितं प्रभुम्‌,वहाँसे तुरंत लौटकर अग्निदेवने बृहस्पतिको बताया कि भगवान्‌ इन्द्र सूक्ष्म शरीर धारण करके एक कमलनालका आश्रय लेकर रहते हैं

ସେଠାରୁ ତୁରନ୍ତ ଫେରି ଆସି ଅଗ୍ନିଦେବ ବୃହସ୍ପତିଙ୍କୁ କହିଲେ ଯେ ପ୍ରଭୁ ଇନ୍ଦ୍ର ଅଣୁମାତ୍ର (ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୂକ୍ଷ୍ମ) ଶରୀର ଧାରଣ କରି ପଦ୍ମନାଳର ତନ୍ତୁକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ଅଛନ୍ତି।

Verse 13

गत्वा देवर्षिंगन्धर्व: सहितो5थ बृहस्पति: । पुराणै: कर्मभियदेंवं तुष्टाव बलसूदनम्‌,तब बृहस्पतिजीने देवर्षियों और गन्धरवोंके साथ वहाँ जाकर बलसूदन इन्द्रके पुरातन कर्मोका वर्णन करते हुए उनकी स्तुति की--

ତା’ପରେ ବୃହସ୍ପତି ଦେବର୍ଷିମାନେ ଓ ଗନ୍ଧର୍ବମାନଙ୍କ ସହିତ ସେଠାକୁ ଯାଇ, ବଲସୂଦନ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପୁରାତନ କର୍ମମାନଙ୍କୁ ବର୍ଣ୍ଣନା କରି ତାଙ୍କର ସ୍ତୁତି କଲେ।

Verse 14

महासुरो हत: शक्र नमुचिर्दारुणस्त्वया | शम्बरश्न बलश्नैव तथोभौ घोरविक्रमौ,“इन्द्र! आपने अत्यन्त भयंकर नमुचि नामक महान्‌ असुरको मार गिराया है। शम्बर और बल दोनों भयंकर पराक्रमी दानव थे; परंतु उन्हें भी आपने मार डाला

ହେ ଶକ୍ର! ତୁମେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦାରୁଣ ଓ ଭୟଙ୍କର ନମୁଚି ନାମକ ମହାଅସୁରକୁ ବଧ କରିଛ। ଶମ୍ବର ଓ ବଳ—ଉଭୟେ ଘୋର ପରାକ୍ରମୀ—ସେମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ନିହତ କରିଛ।

Verse 15

इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोट्रोगपर्वरमें ब॒हस्पति-अग्निसंवादविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ,शतक्रतो विवर्धस्व सर्वाउ्छत्रून्‌ निषूदय । उत्तिष्ठ शक्र सम्पश्य देवर्षीक्ष समागतान्‌ “शतक्रतो! आप अपने तेजस्वी स्वरूपसे बढ़िये और समस्त शत्रुओंका संहार कीजिये। इन्द्रदेव! उठिये और यहाँ पधारे हुए देवर्षियोंका दर्शन कीजिये

ହେ ଶତକ୍ରତୁ! ତୁମ ଦୀପ୍ତିମାନ ଶକ୍ତିକୁ ବଢ଼ାଅ ଏବଂ ସମସ୍ତ ଶତ୍ରୁଙ୍କୁ ନିହତ କର। ହେ ଶକ୍ର! ଉଠି ଏଠାରେ ସମାଗତ ଦେବର୍ଷିମାନଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କର।

Verse 16

महेन्द्र दानवान्‌ हत्वा लोकास्त्रातास्त्वया विभो । अपां फेनं समासाद्य विष्णुतेजो5तिबूंहितम्‌ । त्वया वृत्रो हतः पूर्व देवराज जगत्पते,'प्रभो महेन्द्र! आपने कितने ही दानवोंका वध करके समस्त लोकोंकी रक्षा की है। जगदीश्वर देवराज! भगवान्‌ विष्णुके तेजसे अत्यन्त शक्तिशाली बने हुए समुद्रफेनको लेकर आपने पूर्वकालमें वृत्रासुरका वध किया इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि इन्द्रवरुणादिसंवादे षोडशो< ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोट्रोगपर्वमें इन्द्रवरुणादिसंवादविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ

ପ୍ରଭୁ ମହେନ୍ଦ୍ର! ଦାନବମାନଙ୍କୁ ବଧ କରି ତୁମେ ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରିଛ। ହେ ଦେବରାଜ, ଜଗତ୍ପତେ! ବିଷ୍ଣୁତେଜରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ହୋଇଥିବା ସମୁଦ୍ରଫେନକୁ ଗ୍ରହଣ କରି ତୁମେ ପୂର୍ବକାଳରେ ବୃତ୍ରକୁ ବଧ କରିଥିଲ।

Verse 17

त्वं सर्वभूतेषु शरण्य ईड्य- स्त्वया सम॑ विद्यते नेह भूतम्‌ त्वया धार्यन्ते सर्वभूतानि शक्र त्वं देवानां महिमानं चकर्थ,“आप सम्पूर्ण भूतोंमें स्त्वन करने योग्य और सबके शरणदाता हैं। आपकी समानता करनेवाला जगतमें दूसरा कोई प्राणी नहीं है। शक्र! आप ही सम्पूर्ण भूतोंको धारण करते हैं और आपने ही देवताओंकी महिमा बढ़ायी है

ତୁମେ ସମସ୍ତ ଭୂତମାନଙ୍କର ଶରଣ, ସ୍ତୁତ୍ୟ। ଏହି ଜଗତରେ ତୁମ ସମାନ ଅନ୍ୟ କେହି ନାହିଁ। ହେ ଶକ୍ର! ତୁମେ ସମସ୍ତ ଭୂତକୁ ଧାରଣ କର; ଦେବମାନଙ୍କର ମହିମା ତୁମେ ହିଁ ସ୍ଥାପିତ କରିଛ।

Verse 18

पाहि सर्वाश्व लोकांश्व महेन्द्र बलमाप्नुहि | एवं संस्तूयमानश्न सो<5वर्धत शनै: शनै:,“महेन्द्र! आप शक्ति प्राप्त कीजिये और सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा कीजिये।” इस प्रकार स्तुति की जानेपर देवराज इन्द्र धीरे-धीरे बढ़ने लगे

ହେ ମହେନ୍ଦ୍ର! ବଳ ପ୍ରାପ୍ତ କରି ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କର। ଏଭଳି ସ୍ତୁତି ହେବାରେ ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ର ଧୀରେ ଧୀରେ ବୃଦ୍ଧି ପାଇଲେ।

Verse 19

स्वं चैव वपुरास्थाय बभूव स बलान्वित: । अब्रवीच्च गुरुं देवो बृहस्पतिमवस्थितम्‌,अपने पूर्व शरीरको प्राप्त करके वे बल-पराक्रमसे सम्पन्न हो गये। तत्पश्चात्‌ इन्द्रने वहाँ खड़े हुए अपने गुरु बृहस्पतिसे कहा--

ନିଜ ପୂର୍ବ ଦେହକୁ ପୁନଃ ପ୍ରାପ୍ତ କରି ସେ ପୁଣି ବଳ ଓ ପରାକ୍ରମରେ ସମ୍ପନ୍ନ ହେଲେ। ତାପରେ ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ର ସେଠାରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ନିଜ ଗୁରୁ ବୃହସ୍ପତିଙ୍କୁ କହିଲେ—

Verse 20

कि कार्यमवशिष्टं वो हतस्त्वाष्टो महासुर: । वृत्रश्न सुमहाकायो यो वै लोकाननाशयत्‌,“ब्रह्मन्‌! त्वष्टाका पुत्र विशालकाय महासुर वृत्र, जो सम्पूर्ण लोकोंका विनाश कर रहा था, मेरे द्वारा मारा गया; अब आपलोगोंका कौन-सा बचा हुआ कार्य करूँ?”

“ବ୍ରାହ୍ମଣ! ତ୍ୱଷ୍ଟାଙ୍କ ପୁତ୍ର, ବିଶାଳକାୟ ମହାସୁର ବୃତ୍ର—ଯେ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ନାଶ କରୁଥିଲା—ମୋ ଦ୍ୱାରା ହତ ହୋଇଛି। ଏବେ ଆପଣମାନଙ୍କର କେଉଁ କାର୍ଯ୍ୟ ଅବଶିଷ୍ଟ ଅଛି, ଯାହା ମୁଁ କରିବି?”

Verse 21

ब॒हस्पतिर्वाच मानुषो नहुषो राजा देवर्षिगणतेजसा । देवराज्यमनुप्राप्त: सर्वान्‌ नो बाधते भृूशम्‌,बृहस्पति बोले--देवेन्द्र! मनुष्य-लोकका राजा नहुष देवर्षियोंके प्रभावसे देवताओंका राज्य पा गया है, जो हम सब लोगोंको बड़ा कष्ट दे रहा है

ବୃହସ୍ପତି କହିଲେ—“ଦେବେନ୍ଦ୍ର! ମନୁଷ୍ୟଲୋକର ରାଜା ନହୁଷ ଦେବର୍ଷିମାନଙ୍କ ତେଜରେ ସମର୍ଥ ହୋଇ ସ୍ୱର୍ଗରାଜ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତ କରିଛି; ଏବେ ସେ ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଭୟଙ୍କର ଭାବେ ପୀଡ଼ା ଦେଉଛି।”

Verse 22

इन्द्र उवाच कथं च नहुषो राज्यं देवानां प्राप दुर्लभम्‌ । तपसा केन वा युक्त: किंवीर्यो वा बृहस्पते,(तत्‌ सर्व कथयध्वं मे यथेन्द्रत्वमुपेयिवान्‌ ।) इन्द्र बोले--बृहस्पते! नहुषने देवताओंका दुर्लभ राज्य कैसे प्राप्त किया? वह किस तपस्यासे संयुक्त है? अथवा उसमें कितना बल और पराक्रम है? उसे किस प्रकार इन्द्रपदकी प्राप्ति हुई है? ये सारी बातें आप सब लोग मुझे बताइये

ଇନ୍ଦ୍ର କହିଲେ—“ବୃହସ୍ପତେ! ଦେବମାନଙ୍କର ଦୁର୍ଲଭ ରାଜ୍ୟ ନହୁଷ କିପରି ପ୍ରାପ୍ତ କଲା? ସେ କେଉଁ ତପସ୍ୟାରେ ଯୁକ୍ତ? କିମ୍ବା ତାହାର ବଳ ଓ ବୀର୍ଯ୍ୟ କେତେ? ସେ କିପରି ଇନ୍ଦ୍ରପଦକୁ ପହଞ୍ଚିଲା—ସବୁ ମୋତେ କୁହନ୍ତୁ।”

Verse 23

ब॒हस्पतिरु्वाच देवा भीता: शक्रमकामयन्त त्वया त्यक्तं महदैन्द्रं पद तत्‌ तदा देवा: पितरो<थर्षयश्न गन्धर्वमुख्याश्न समेत्य सर्वे,बृहस्पति बोले--शक्र! आपने जब उस महान्‌ इन्द्र-यदका परित्याग कर दिया, तब देवतालोग भयभीत होकर दूसरे किसी इन्द्रकी कामना करने लगे। तब देवता, पितर, ऋषि तथा मुख्य गन्धर्व--सब मिलकर राजा नहुषके पास गये। शक्र! वहाँ उन्होंने नहुषसे इस प्रकार कहा--“आप हमारे राजा होइये और सम्पूर्ण विश्वकी रक्षा कीजिये।” यह सुनकर नहुषने उनसे कहा--“मुझमें इन्द्र बननेकी शक्ति नहीं है, अतः आपलोग अपने तप और तेजसे मुझे आप्यायित (पुष्ट) कीजिये”

ବୃହସ୍ପତି କହିଲେ—“ଶକ୍ର! ଆପଣ ଯେତେବେଳେ ସେଇ ମହାନ ଇନ୍ଦ୍ରପଦକୁ ପରିତ୍ୟାଗ କଲେ, ସେତେବେଳେ ଭୟଭୀତ ଦେବମାନେ ଆପଣଙ୍କ ସ୍ଥାନରେ ଅନ୍ୟ ଜଣେ ଇନ୍ଦ୍ରକୁ ଆକାଙ୍କ୍ଷା କରିଲେ। ତାପରେ ଦେବ, ପିତୃ, ଋଷି ଓ ପ୍ରମୁଖ ଗନ୍ଧର୍ବ—ସମସ୍ତେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ରାଜା ନହୁଷଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲେ। ସେଠାରେ ସେମାନେ କହିଲେ—‘ଆପଣ ଆମର ରାଜା ହୁଅନ୍ତୁ ଏବଂ ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱକୁ ରକ୍ଷା କରନ୍ତୁ।’ ଏହା ଶୁଣି ନହୁଷ କହିଲେ—‘ମୋର ଇନ୍ଦ୍ର ହେବାର ଶକ୍ତି ନାହିଁ; ତେଣୁ ଆପଣମାନେ ନିଜ ତପ ଓ ତେଜରେ ମୋତେ ପୁଷ୍ଟ ଓ ସମର୍ଥ କରନ୍ତୁ।’”

Verse 24

गत्वाब्रुवन्‌ नहुषं तत्र शक्र त्वं नो राजा भव भुवनस्य गोप्ता । तानब्रवीन्नहुषो नास्मि शक्त आप्यायध्वं तपसा तेजसा माम्‌,बृहस्पति बोले--शक्र! आपने जब उस महान्‌ इन्द्र-यदका परित्याग कर दिया, तब देवतालोग भयभीत होकर दूसरे किसी इन्द्रकी कामना करने लगे। तब देवता, पितर, ऋषि तथा मुख्य गन्धर्व--सब मिलकर राजा नहुषके पास गये। शक्र! वहाँ उन्होंने नहुषसे इस प्रकार कहा--“आप हमारे राजा होइये और सम्पूर्ण विश्वकी रक्षा कीजिये।” यह सुनकर नहुषने उनसे कहा--“मुझमें इन्द्र बननेकी शक्ति नहीं है, अतः आपलोग अपने तप और तेजसे मुझे आप्यायित (पुष्ट) कीजिये”

ସେଠାକୁ ଯାଇ ଦେବମାନେ ନହୁଷଙ୍କୁ କହିଲେ—“ହେ ଶକ୍ର! ଆପଣ ଆମର ରାଜା ହୁଅନ୍ତୁ, ଜଗତର ରକ୍ଷକ ହୁଅନ୍ତୁ।” ଏହା ଶୁଣି ନହୁଷ କହିଲେ—“ମୁଁ (ଇନ୍ଦ୍ରପଦ ପାଇଁ) ସମର୍ଥ ନୁହେଁ; ଆପଣମାନଙ୍କ ତପ ଓ ତେଜରେ ମୋତେ ପୁଷ୍ଟ ଓ ସଶକ୍ତ କରନ୍ତୁ।”

Verse 25

एवमुक्तिर्वर्धितश्नापि देवै राजाभवन्नहुषो घोरवीर्य: । त्रैलोक्ये च प्राप्य राज्यं महर्षीन्‌ कृत्वा वाहान्‌ याति लोकान्‌ दुरात्मा,उसके ऐसा कहनेपर देवताओंने उसे तप और तेजसे बढ़ाया। फिर भयंकर पराक्रमी राजा नहुष स्वर्गका राजा बन गया। इस प्रकार त्रिलोकीका राज्य पाकर वह दुरात्मा नहुष महर्षियोंको अपना वाहन बनाकर सब लोकोंमें घूमता है

ଏପରି କହିବା ପରେ ଦେବମାନେ ତାଙ୍କୁ ତପ ଓ ତେଜରେ ଆହୁରି ବଢ଼ାଇଲେ। ତାପରେ ଭୟଙ୍କର ପରାକ୍ରମୀ ନହୁଷ ସ୍ୱର୍ଗର ରାଜା ହେଲେ। ତ୍ରିଲୋକର ରାଜ୍ୟ ପାଇ ସେ ଦୁରାତ୍ମା ମହର୍ଷିମାନଙ୍କୁ ବାହନ କରି ସମସ୍ତ ଲୋକରେ ବିଚରଣ କଲେ।

Verse 26

तेजोहरं दृष्टिविषं सुघोरं मा त्वं पश्येर्नहुषं वै कदाचित्‌ । देवाश्व सर्वे नहुष॑ भृशार्ता न पश्चन्ते गूढरूपा श्चरन्त:,वह देखनेमात्रसे सबका तेज हर लेता है। उसकी दृष्टिमें भयंकर विष है। वह अत्यन्त घोर स्वभावका हो गया है। तुम नहुषकी ओर कभी देखना नहीं। सब देवता भी अत्यन्त पीड़ित हो गूढरूपसे विचरते रहते हैं; परंतु नहुषकी ओर कभी देखते नहीं हैं

ଇନ୍ଦ୍ର କହିଲେ—“ନହୁଷ ଦେଖାମାତ୍ରେ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ତେଜ ହରଣ କରେ; ତାଙ୍କ ଦୃଷ୍ଟି ଭୟଙ୍କର ବିଷ ସମାନ, ଏବଂ ତାଙ୍କ ସ୍ୱଭାବ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଘୋର ହୋଇଯାଇଛି। ତେଣୁ ତୁମେ କେବେ ମଧ୍ୟ ନହୁଷଙ୍କୁ ଦେଖିବ ନାହିଁ। ସମସ୍ତ ଦେବତା ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଅତ୍ୟନ୍ତ ପୀଡ଼ିତ ହୋଇ ଗୁପ୍ତରୂପେ ବିଚରଣ କରୁଛନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ନହୁଷଙ୍କ ଦିଗକୁ ଚାହୁଁନାହାନ୍ତି।”

Verse 27

शल्य उवाच एवं वदत्यड्रिरसां वरिष्ठे बृहस्पती लोकपाल: कुबेर: । वैवस्वतश्चैव यम: पुराणो देवश्व सोमो वरुणश्वाजगाम,शल्य कहते हैं--राजन! अंगिराके पुत्रोंमें श्रेष्ठ बृहस्पति जब ऐसा कह रहे थे, उसी समय लोकपाल कुबेर, सूर्यपुत्र यम, पुरातन देवता चन्द्रमा तथा वरुण भी वहाँ आ पहुँचे

ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—“ରାଜନ୍! ଅଙ୍ଗିରାଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୃହସ୍ପତି ଏପରି କହୁଥିବା ସମୟରେ, ଲୋକପାଳ କୁବେର, ବୈବସ୍ୱତ ଯମ, ପୁରାତନ ଦେବ ସୋମ (ଚନ୍ଦ୍ର) ଏବଂ ବରୁଣ ମଧ୍ୟ ସେଠାକୁ ଆସିପହଞ୍ଚିଲେ।”

Verse 28

ते वै समागम्य महेन्द्रमूचु- दिष्ट्या त्वाष्टो निहतश्लैव वृत्र: । दिष्ट्या च त्वां कुशलिनमक्षतं च पश्यामो वै निहतारिं च शक्र,वे सब देवराज इन्द्रसे मिलकर बोले--'शक्र! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आपने त्वष्टाके पुत्र वृत्रासुरका वध किया। हमलोग आपको शत्रुका वध करनेके पश्चात्‌ सकुशल और अक्षत देखते हैं, यह भी बड़े आनन्दकी बात है”

ସେମାନେ ସମାଗମ କରି ମହେନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ କହିଲେ—“ହେ ଶକ୍ର! ସୁଭାଗ୍ୟବଶତଃ ତ୍ୱଷ୍ଟାଙ୍କ ପୁତ୍ର ବୃତ୍ର ନିହତ ହୋଇଛି। ଏବଂ ଶତ୍ରୁକୁ ବଧ କରି ଆପଣଙ୍କୁ କୁଶଳ ଓ ଅକ୍ଷତ ଦେଖୁଛୁ—ଏହା ମଧ୍ୟ ସୁଭାଗ୍ୟ।”

Verse 29

स तान्‌ यथावच्च हि लोकपालान्‌ समेत्य वै प्रीतमना महेन्द्र: । उवाच चैनान्‌ प्रतिभाष्य शक्रः संचोदयिष्यन्नहुषस्यान्तरेण,उन लोकपालोंसे यथायोग्य मिलकर महेन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने उन सबको सम्बोधित करके राजा नहुषके भीतर बुद्धिभेद उत्पन्न करनेके लिये प्रेरणा देते हुए कहा --

ଯଥାବିଧି ଲୋକପାଳମାନଙ୍କୁ ସାକ୍ଷାତ୍ କରି ମହେନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ହୃଦୟ ପ୍ରସନ୍ନତାରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେଲା। ତାପରେ ଶକ୍ର ସେମାନଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କରି, ରାଜା ନହୁଷଙ୍କ ଅନ୍ତରେ ମନୋଭ୍ରମ ସୃଷ୍ଟି କରିବା ଯୋଜନାକୁ ପ୍ରେରିତ କରି କହିଲେ—

Verse 30

राजा देवानां नहुषो घोररूप- स्तत्र साहां दीयतां मे भवद्धि: । ते चाब्रुवन्‌ नहुषो घोररूपो दृष्टीविषस्तस्य बिभीम ईश,“इन देवताओंका राजा नहुष बड़ा भयंकर हो रहा है। उसे स्वर्गसे हटानेके कार्यमें आपलोग मेरी सहायता करें।' यह सुनकर उन्होंने उत्तर दिया--*देवेश्वर! नहुष तो बड़ा भयंकर रूपवाला है। उसकी दृष्टिमें विष है। अत: हमलोग उससे डरते हैं

‘ଦେବମାନଙ୍କର ରାଜା ନହୁଷ ଭୟଙ୍କର ରୂପ ଧାରଣ କରିଛି। ତାକୁ ସ୍ୱର୍ଗରୁ ହଟାଇବା କାର୍ଯ୍ୟରେ ତୁମେମାନେ ମୋତେ ସାହାଯ୍ୟ ଦିଅ।’ ଏହା ଶୁଣି ସେମାନେ କହିଲେ—‘ହେ ଦେବେଶ୍ୱର! ନହୁଷ ସତ୍ୟେ ଘୋରରୂପୀ; ତାହାର ଦୃଷ୍ଟି ଵିଷସମ। ତେଣୁ ଆମେ ତାହାକୁ ଭୟ କରୁ।’

Verse 31

त्वं चेद्‌ राजानं नहुषं पराजये- स्ततो वयं भागमर्हाम शक्र । इन्द्रोडब्रवीद्‌ भवतु भवानपां पति- यम: कुबेरश्व मयाभिषेकम्‌

‘ଯଦି ତୁମେ ରାଜା ନହୁଷକୁ ପରାଜିତ କରିପାର, ହେ ଶକ୍ର, ତେବେ ଆମେ ମଧ୍ୟ ଭାଗର ଅର୍ହ ହେବୁ।’ ଇନ୍ଦ୍ର କହିଲେ—‘ତଥାସ୍ତୁ; ତୁମେ ଜଳର ଅଧିପତି ହେଉ, ଏବଂ ଯମ ଓ କୁବେର ମଧ୍ୟ ମୋ ହସ୍ତେ ନିଜ-ନିଜ ପଦରେ ଅଭିଷିକ୍ତ ହେଉନ୍ତୁ।’

Verse 32

सम्प्राप्तुवन्त्वद्य सहैव दैवतै रिपुं जयाम तं॑ नहुषं घोरदृष्टिम्‌ । तत: शक्रं ज्वलनो>प्याह भागं प्रयच्छ महां तव साहां करिष्ये । तमाह शक्रो भविताग्ने तवापि चेन्द्राग्न्योर्वैं भाग एको महाक्रतौ,“शक्र! यदि आप हमारी सहायतासे राजा नहुषको पराजित करनेके लिये उद्यत हैं तो हम भी यज्ञमें भाग पानेके अधिकारी हों।” इन्द्रने कहा--“वरुणदेव! आप जलके स्वामी हों, यमराज और कुबेर भी मेरे द्वारा अपने-अपने पदपर अभिषिक्त हों। देवताओंसहित हम सब लोग भयंकर दृष्टिवाले अपने शत्रु नहुषको परास्त करेंगे।! तब अग्निने भी इन्द्रसे कहा --'प्रभो! मुझे भी भाग दीजिये, मैं आपकी सहायता करूँगा।” तब इन्द्रने उनसे कहा --“अग्निदेव! महायज्ञमें इन्द्र और अग्निका एक सम्मिलित भाग होगा, जिसपर तुम्हारा भी अधिकार रहेगा”

‘ଆସ, ଆଜି ଦେବମାନଙ୍କ ସହିତ ଆମେ ସମସ୍ତେ ମିଶି ଘୋରଦୃଷ୍ଟି ଶତ୍ରୁ ନହୁଷକୁ ଜୟ କରିବା।’ ତାପରେ ଅଗ୍ନି ମଧ୍ୟ ଶକ୍ରଙ୍କୁ କହିଲେ—‘ମୋତେ ମଧ୍ୟ ଯଜ୍ଞରେ ଭାଗ ଦିଅ; ମୁଁ ତୁମକୁ ମହାସାହାଯ୍ୟ କରିବି।’ ଶକ୍ର କହିଲେ—‘ଅଗ୍ନେ, ତଥାସ୍ତୁ; ମହାକ୍ରତୁରେ ଇନ୍ଦ୍ର ଓ ଅଗ୍ନିଙ୍କର ଏକ ସଂଯୁକ୍ତ ଭାଗ ରହିବ—ସେଥିରେ ତୁମର ମଧ୍ୟ ଅଧିକାର ରହିବ।’

Verse 33

शल्य उवाच एवं संचिन्त्य भगवान्‌ महेन्द्र: पाकशासन: । कुबेरं सर्वयक्षाणां धनानां च प्रभुं तथा,शल्य कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार सोच-विचारकर पाकशासन भगवान्‌ महेन्द्रने कुबेरको सम्पूर्ण यक्षों तथा धनका अधिपति बना दिया

ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ରାଜନ୍! ଏଭଳି ଚିନ୍ତା କରି ପାକଶାସନ ଭଗବାନ୍ ମହେନ୍ଦ୍ର କୁବେରକୁ ସମସ୍ତ ଯକ୍ଷମାନଙ୍କର ଏବଂ ଧନର ମଧ୍ୟ ଅଧିପତି କରିଦେଲେ।

Verse 34

वैवस्वतं पितृणां च वरुण चाप्यपां तथा । आधिपत्यं ददौ शक्र: संचिन्त्य वरदस्तथा,इसी प्रकार वरदायक इन्द्रने खूब सोच-समझकर वैवस्वत यमको पितरोंका तथा वरुणको जलका स्वामित्व प्रदान किया

ତେବେ ବରଦାତା ଶକ୍ର ଇନ୍ଦ୍ର ଭଲଭାବେ ବିଚାର କରି ବୈବସ୍ୱତ ଯମଙ୍କୁ ପିତୃଲୋକର, ପିତୃଗଣଙ୍କୁ ପିତୃ-ବ୍ୟବସ୍ଥାର ଏବଂ ବରୁଣଙ୍କୁ ଜଳର ଅଧିପତ୍ୟ ଦାନ କଲେ।

Frequently Asked Questions

The chapter stages a legitimacy dilemma: a human king (Nahuṣa) holds devarājya through extraordinary empowerment, yet his conduct becomes oppressive, forcing the devas to choose between concealment, negotiated containment, or coordinated removal—raising questions of rightful rule versus acquired power.

Authority is sustained through aligned institutions and ethical restraint; when power detaches from self-control, it becomes socially corrosive. The stuti also teaches a cosmological ethic: Agni symbolizes the inner witness and the ritual-legal medium by which order is maintained.

No explicit phalaśruti is stated in this chapter. Its meta-function is exemplary: it models how hymn, counsel, and administrative redistribution restore stability, offering a narrative template for interpreting political crises within a dharmic framework.