अग्निस्तुति, इन्द्रदर्शन, नहुष-भयवर्णन
Agni-hymn, discovery of Indra, and the Nahuṣa threat
सृष्टवा लोकांस्त्रीनिमान् हव्यवाह प्राप्त काले पचसि पुनः समिद्ध: । त्वं सर्वस्य भुवनस्य प्रसूति- स्त्वमेवाग्ने भवसि पुन: प्रतिष्ठा,हव्यवाहन! आप ही सृष्टिके समय इन तीनों लोकोंको उत्पन्न करके प्रलयकाल आनेपर पुनः प्रज्वलित हो इन सबका संहार करते हैं। अग्ने! आप ही सम्पूर्ण विश्वके उत्पत्तिस्थान हैं और आप ही पुनः इसके प्रलयकालमें आधार होते हैं
sṛṣṭvā lokāṁs trīn imān havyavāha prāpta-kāle pacasi punaḥ samiddhaḥ | tvaṁ sarvasya bhuvanasya prasūtiḥ tvam evāgne bhavasi punaḥ pratiṣṭhā, havyavāhana ||
ହବ୍ୟବାହ! ସୃଷ୍ଟିକାଳରେ ତୁମେ ଏହି ତିନି ଲୋକକୁ ସୃଜନ କରି, ନିୟତ କାଳ ଆସିଲେ ପୁନଃ ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ ହୋଇ ସେମାନଙ୍କୁ ଦହନ କରି ଲୟ କର। ହେ ଅଗ୍ନି! ସମଗ୍ର ଭୁବନର ପ୍ରସୂତି ତୁମେ ହିଁ; ପ୍ରଳୟକାଳେ ପୁନଃ ତୁମେ ହିଁ ତାହାର ଆଧାର।
शल्य उवाच