Adhyaya 140
Udyoga ParvaAdhyaya 14058 Verses

Adhyaya 140

उद्योगपर्व — अध्याय १४० (कृष्णेन कर्णं प्रति पाण्डवबल-वैशिष्ट्यप्रदर्शनम्) / Udyoga Parva, Chapter 140 (Krishna’s appraisal of Pandava advantage and war portents)

Upa-parva: Karna–Krishna Saṁvāda (Counsel on War-Readiness and Portents)

Sañjaya reports that, after hearing Karṇa’s words, Keśava (Kṛṣṇa) responds with measured irony and a strategic warning. He questions whether Karṇa feels regret that he refuses to govern the earth allegedly “offered” by Kṛṣṇa, then asserts the certainty of Pāṇḍava victory. The argument proceeds through emblematic and sensory imagery: Arjuna’s victory-banner is described as crowned by the fierce Vānararāja (Hanumān), radiant like Indra’s standard, elevated beyond natural obstacles, and accompanied by fear-inducing, otherworldly manifestations—signaling auspicious advantage and psychological dominance. Kṛṣṇa then projects battlefield scenarios: Karṇa will witness Arjuna with white horses and Kṛṣṇa as charioteer deploying celestial weapons; he will hear the thunder-like resonance of Gāṇḍīva; he will see Yudhiṣṭhira performing protective rites while sustaining his host; Bhīmasena in a ferocious, vow-driven combat posture; and the Mādrī twins disrupting the Dhārtarāṣṭra formations. The speech culminates by imagining Kaurava leaders—Droṇa, Bhīṣma, Kṛpa, Duryodhana, Jayadratha—checked by Arjuna’s prowess. A calendrical note follows: Kṛṣṇa instructs Karṇa to tell the commanders that the month is favorable in supplies and conditions, and that an upcoming new-moon day is regarded as Indra-aligned for engagement. The chapter closes with a stark forecast that kings and princes adhering to Duryodhana’s policy will meet death by weapons and attain their “final course,” framing war as both strategic outcome and moral consequence.

Chapter Arc: कृष्ण के दूत-धर्म और हितवचन के सामने कर्ण स्वयं को खोलता है—वह स्वीकार करता है कि वह पाण्डु-पुत्र है, पर फिर भी दुर्योधन-पक्ष में रहने का निश्चय सुनाता है। → कर्ण अपने जन्म-रहस्य का क्रमवार उद्घाटन करता है—कुन्ती का सूर्य से गर्भ, लोकलज्जा में त्याग, अधिरथ-सूत द्वारा पालन और राधा का स्नेह। इस सत्य के साथ ही वह कृष्ण के उपदेश को ‘हितार्थ’ मानकर भी, अपने कृतज्ञता-बंधन और प्रतिज्ञा-धर्म को अधिक भारी बताता है। → कर्ण युद्ध को ‘समर-यज्ञ’ के रूपक में उठाकर घोषणा करता है कि अर्जुन के गाण्डीव, दिव्यास्त्र (ऐन्द्र, पाशुपत, ब्राह्म आदि) और सव्यसाची की मंत्र-प्रयुक्त शक्ति के बावजूद वह दुर्योधन के लिए ही खड़ा रहेगा; साथ ही वह स्वीकार करता है कि पाण्डवों के प्रति कटुवचन उसने दुर्योधन-प्रियार्थ कहे और उसी कर्म से तप रहा है। → कर्ण कृष्ण से निवेदन करता है कि यह मंत्रणा गुप्त रहे और कुन्ती-पुत्र (अर्जुन) को युद्ध के लिए प्रस्तुत किया जाए; वह युद्ध-कीर्ति की अक्षयता का भी उच्चारण करता है—जब तक पर्वत-सरिताएँ रहेंगी, महाभारत-युद्ध की कथा सभाओं में गाई जाएगी। → कर्ण का अडिग निश्चय संवाद को युद्ध की अनिवार्यता तक पहुँचा देता है—अब कृष्ण के दूत-प्रयास के बाद अगला कदम रण की ओर ही मुड़ता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माज बछ। अकाल एकचत्वारिंशर्दाधिकशततमो< ध्याय: कर्णका दुर्योधनके पक्षमें रहनेके निश्चित विचारका प्रतिपादन करते हुए समरयज्ञके रूपकका वर्णन करना कर्ण उवाच असंशयं सौहृदान्मे प्रणयाच्चात्थ केशव । सख्येन चैव वार्ष्णेय श्रेयय्कामतयैव च,कर्णने कहा--केशव! आपने सौहार्द, प्रेम, मैत्री और मेरे हितकी इच्छासे जो कुछ कहा है, वह नि:संदेह ठीक है

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ହେ କେଶବ! ସୌହାର୍ଦ୍ୟ, ସ୍ନେହ, ମିତ୍ରତା ଏବଂ ମୋର ସତ୍ୟ ହିତକୁ ଚାହିଁ ତୁମେ ଯାହା କହିଛ, ତାହା ନିଶ୍ଚୟ ଠିକ୍।

Verse 2

सर्व चैवाभिजानामि पाण्डो: पुत्रोडस्मि धर्मत: । निश्चयाद्‌ धर्मशास्त्राणां यथा त्वं कृष्ण मन्यसे,श्रीकृष्ण! जैसा कि आप मानते हैं, धर्मशास्त्रोंके निर्णयके अनुसार मैं धर्मतः पाण्डुका ही पुत्र हूँ। इन सब बातोंको मैं अच्छी तरह जानता और समझता हूँ

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ହେ କୃଷ୍ଣ! ମୁଁ ଏ ସବୁ ସ୍ପଷ୍ଟଭାବେ ଜାଣେ: ଧର୍ମନିୟମ ଅନୁସାରେ ମୁଁ ପାଣ୍ଡୁ ବଂଶର ପୁତ୍ର। ଧର୍ମଶାସ୍ତ୍ରର ସ୍ଥିର ନିଷ୍ପତ୍ତି ଅନୁସାରେ—ତୁମେ ଯେପରି ଭାବ—ମୁଁ ଏହାକୁ ହିଁ ଯଥାର୍ଥ ନିଷ୍କର୍ଷ ଭାବେ ମାନେ।

Verse 3

कन्या गर्भ समाधत्त भास्करान्मां जनार्दन । आदित्यवचनाच्चैव जात॑ मां सा व्यसर्जयत्‌

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ହେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ! କନ୍ୟାବସ୍ଥାରେ ହିଁ ସେ ଭାସ୍କର (ସୂର୍ଯ୍ୟଦେବ) ଦ୍ୱାରା ମୋତେ ଗର୍ଭରେ ଧାରଣ କଲା। ଏବଂ ଆଦିତ୍ୟଙ୍କ ବଚନ ଅନୁସାରେ, ମୋର ଜନ୍ମ ପରେ ସେ ମୋତେ ତ୍ୟାଗ କରି ଜଳରେ ଭସାଇଦେଲା।

Verse 4

जनार्दन! कुन्तीने कन्यावस्थामें भगवान्‌ सूर्यके संयोगसे मुझे गर्भमें धारण किया था और मेरा जन्म हो जानेपर उन सूर्यदेवकी आज्ञासे ही मुझे जलमें विसर्जित कर दिया था ।। सो<5स्मि कृष्ण तथा जात: पाण्डो: पुत्रो5स्मि धर्मतः । कुन्त्या त्वहमपाकीर्णो यथा न कुशलं तथा,श्रीकृष्ण! इस प्रकार मेरा जन्म हुआ है। अतः मैं धर्मतः पाण्डुका ही पुत्र हूँ; परंतु कुन्तीदेवीने मुझे इस तरह त्याग दिया, जिससे मैं सकुशल नहीं रह सकता था

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ହେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ! କୁନ୍ତୀ କନ୍ୟାବସ୍ଥାରେ ସୂର୍ଯ୍ୟଦେବଙ୍କ ସଂଯୋଗରେ ମୋତେ ଗର୍ଭରେ ଧାରଣ କରିଥିଲେ, ଏବଂ ମୋର ଜନ୍ମ ପରେ ସେହି ସୂର୍ଯ୍ୟଦେବଙ୍କ ଆଜ୍ଞାନୁସାରେ ମୋତେ ଜଳରେ ଭସାଇଦେଇଥିଲେ। ହେ କୃଷ୍ଣ! ଏହିପରି ମୋର ଜନ୍ମ; ତେଣୁ ଧର୍ମତଃ ମୁଁ ପାଣ୍ଡୁ ବଂଶର ପୁତ୍ର, କିନ୍ତୁ କୁନ୍ତୀ ମୋତେ ଏମିତି ତ୍ୟାଗ କଲେ ଯେ ମୋର କୁଶଳ-କ୍ଷେମ ଅରକ୍ଷିତ ରହିଗଲା।

Verse 5

सूतो हि मामधिरथो दृष्टवैवा भ्यानयद्‌ गृहान्‌ । राधायाश्रैव मां प्रादात्‌ सौहार्दान्मधुसूदन

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ହେ ମଧୁସୂଦନ! ସୂତ ଅଧିରଥ ମୋତେ ଦେଖିମାତ୍ରେ ଉଠାଇ ନିଜ ଘରକୁ ନେଇଗଲା। ଏବଂ ସ୍ନେହବଶେ ମୋତେ ରାଧାଙ୍କ ହାତରେ ସମର୍ପଣ କଲା—ମୁଁ ତାଙ୍କର ନିଜ ସନ୍ତାନ ଭଳି।

Verse 6

मधुसूदन! उसके बाद अधिरथ नामक सूत मुझे जलमें देखते ही निकालकर अपने घर ले आये और बड़े स्नेहसे मुझे अपनी पत्नी राधाकी गोदमें दे दिया ।। मत्स्नेहाच्चैव राधायां सद्यः क्षीरमवातरत्‌ | सा मे मूत्र पुरीषं च प्रतिजग्राह माधव,उस समय मेरे प्रति अधिक स्नेहके कारण राधाके स्तनोंमें तत्काल दूध उतर आया। माधव! उस अवस्थामें उसीने मेरा मल-मूत्र उठाना स्वीकार किया

ମଧୁସୂଦନ! ତାପରେ ଅଧିରଥ ନାମକ ସୂତ ମୋତେ ଜଳରେ ଦେଖିମାତ୍ରେ ଉଦ୍ଧାର କରି ନିଜ ଘରକୁ ଆଣିଲେ ଏବଂ ଅତ୍ୟନ୍ତ ସ୍ନେହରେ ମୋତେ ନିଜ ପତ୍ନୀ ରାଧାଙ୍କ କୋଳରେ ଦେଲେ। ମୋ ପ୍ରତି ଅଧିକ ସ୍ନେହରୁ ରାଧାଙ୍କ ସ୍ତନରେ ସହସା ଦୁଧ ଉତରିଲା। ମାଧବ! ସେଇ ନିର୍ବଳ ଶିଶୁବେଳେ ସେ ମୋର ମୂତ୍ର ଓ ମଳ ପରିଷ୍କାର କରିବାକୁ ମଧ୍ୟ ସ୍ୱୀକାର କଲେ।

Verse 7

तस्या: पिण्डव्यपनयं कुर्यादस्मद्विध: कथम्‌ | धर्मविद्‌ धर्मशास्त्राणां श्रवणे सततं रत:,अतः सदा धर्मशास्त्रोंके श्रवणमें तत्पर रहनेवाला मुझ-जैसा धर्मज्ञ पुरुष राधाके मुखका ग्रास कैसे छीन सकता है? (उसका पालन-पोषण न करके उसे त्याग देनेकी क्रूरता कैसे कर सकता है?)

ଧର୍ମଶାସ୍ତ୍ର ଶ୍ରବଣରେ ସଦା ରତ, ମୋ ପରି ଧର୍ମଜ୍ଞ ପୁରୁଷ ସେଇ ମାତାଙ୍କ ମୁଖର ଅନ୍ନଗ୍ରାସ କିପରି ଛିନିପାରିବ? (ଅର୍ଥାତ୍, ପାଳନ-ପୋଷଣ ନ କରି ତାଙ୍କୁ ତ୍ୟାଗ କରିବା ନିଷ୍ଠୁରତା ମୁଁ କିପରି କରିବି?)

Verse 8

तथा मामभिजानाति सूतश्चाधिरथ: सुतम्‌ । पितरं चाभिजानामि तमहं सौहृदात्‌ सदा,अधिरथ सूत भी मुझे अपना पुत्र ही समझते हैं और मैं भी सौहार्दवश उन्हें सदासे अपना पिता ही मानता आया हूँ

ସେହିପରି ସୂତ ଅଧିରଥ ମଧ୍ୟ ମୋତେ ନିଜ ପୁତ୍ର ଭାବେ ଜାଣନ୍ତି; ଏବଂ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ସୌହାର୍ଦ୍ୟ ଓ କୃତଜ୍ଞତାବଶେ ସଦା ତାଙ୍କୁ ନିଜ ପିତା ଭାବେ ମାନିଆସିଛି।

Verse 9

स हि मे जातकर्मादि कारयामास माधव । शास्त्रदृष्टेन विधिना पुत्रप्रीत्या जनार्दन

ମାଧବ! ପୁତ୍ରପ୍ରେମରୁ ସେ ଶାସ୍ତ୍ରଦୃଷ୍ଟ ବିଧିଅନୁସାରେ ମୋର ଜାତକର୍ମ ଆଦି ସଂସ୍କାର କରାଇଥିଲେ, ହେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ।

Verse 10

नाम वै वसुषेणेति कारयामास वै द्विजै: । माधव! उन्होंने मेरे जातकर्म आदि संस्कार करवाये तथा जनार्दन! उन्होंने ही पुत्रप्रेमवश शास्त्रीय विधिसे ब्राह्मणोंद्वारा मेरा “वसुषेण” नाम रखवाया ।। भार्याश्नोढा मम प्राप्ते यौवने तत्परिग्रहात्‌

ମାଧବ! ସେ ମୋର ଜାତକର୍ମ ଆଦି ସଂସ୍କାର କରାଇଥିଲେ; ଏବଂ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ! ପୁତ୍ରପ୍ରେମରୁ ଶାସ୍ତ୍ରୀୟ ବିଧିଅନୁସାରେ ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ମୋର ନାମ ‘ବସୁଷେଣ’ ରଖାଇଥିଲେ। ପରେ ଯୌବନ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲାପରେ ବିଧିପୂର୍ବକ ମୁଁ ପତ୍ନୀ ଗ୍ରହଣ କଲି।

Verse 11

तासु पुत्राश्न पौत्राश्न मम जाता जनार्दन | तासु मे हृदयं कृष्ण संजातं कामबन्धनम्‌

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲା—ହେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ! ସେହି ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ମୋର ପୁତ୍ର ଓ ପୌତ୍ର ଜନ୍ମିଛନ୍ତି। ହେ କୃଷ୍ଣ! ସେମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ମୋର ହୃଦୟ ସ୍ନେହ ଓ କାମାସକ୍ତିର ବନ୍ଧନରେ ଦୃଢ଼ ଭାବେ ବାନ୍ଧିଯାଇଛି।

Verse 12

श्रीकृष्ण! मेरी युवावस्था होनेपर अधिरथने सूत-जातिकी कई कन्याओंके साथ मेरा विवाह करवाया। अब उनसे मेरे पुत्र और पौत्र भी पैदा हो चुके हैं। जनार्दन! उन स्त्रियोंमें मेरा हृदय कामभावसे आसक्त रहा है ।। न पृथिव्या सकलया न सुवर्णस्य राशिभि: । हर्षाद्‌ भयाद्‌ वा गोविन्द मिथ्या कर्तु तदुत्सहे,गोविन्द! अब मैं सम्पूर्ण पृथिवीका राज्य पाकर, सुवर्णकी राशियाँ लेकर अथवा हर्ष या भयके कारण भी वह सब सम्बन्ध मिथ्या नहीं करना चाहता

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲା—ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ମୋ ଯୌବନକାଳରେ ଅଧିରଥ ସୂତ-ଜାତିର ଅନେକ କନ୍ୟାଙ୍କ ସହିତ ମୋର ବିବାହ କରାଇଥିଲେ। ସେମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଏବେ ମୋର ପୁତ୍ର ଓ ପୌତ୍ର ମଧ୍ୟ ହୋଇଛନ୍ତି। ହେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ! ସେହି ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ମୋର ହୃଦୟ କାମ ଓ ଆସକ୍ତିର ବଳରେ ବାନ୍ଧି ରହିଛି। ହେ ଗୋବିନ୍ଦ! ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀର ରାଜ୍ୟ ମିଳିଲେ ମଧ୍ୟ, ସୁବର୍ଣ୍ଣର ଢେର ମିଳିଲେ ମଧ୍ୟ, ହର୍ଷ କିମ୍ବା ଭୟର କାରଣରେ ମଧ୍ୟ—ମୁଁ ସେହି ବନ୍ଧନକୁ ମିଥ୍ୟା କରିପାରିବି ନାହିଁ, କରିବାକୁ ମଧ୍ୟ ଚାହେଁ ନାହିଁ। ଆଜି ମଧ୍ୟ ମୁଁ ସେହି ସମ୍ପର୍କକୁ ଅସ୍ୱୀକାର କିମ୍ବା ଅବୈଧ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରେ ନାହିଁ।

Verse 13

धृतराष्ट्रकुले कृष्ण दुर्योधनसमाश्रयात्‌ । मया त्रयोदश समा भुक्तं राज्यमकण्टकम्‌,श्रीकृष्ण! मैंने दुर्योधनका सहारा पाकर धुृतराष्ट्रके कुलमें रहते हुए तेरह वर्षोतक अकण्टक राज्यका उपभोग किया है

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲା—ହେ କୃଷ୍ଣ! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ଆଶ୍ରୟ ନେଇ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ କୁଳରେ ରହି, ମୁଁ ତେର ବର୍ଷ ଧରି ନିଷ୍କଣ୍ଟକ—ନିର୍ବିଘ୍ନ ଓ ନିର୍ବିରୋଧ—ରାଜ୍ୟଭୋଗ କରିଛି।

Verse 14

इष्टं च बहुभिय्यज्ञै: सह सूतैर्मयासकृत्‌ । आवाहाश्न विवाहाश्नव सह सूतैर्मया कृता:,वहाँ मैंने सूतोंके साथ मिलकर बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान किया है तथा उन्हींके साथ रहकर अनेकानेक कुलधर्म एवं वैवाहिक कार्य सम्पन्न किये हैं

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲା—ସୂତମାନଙ୍କ ସହିତ ମୁଁ ପୁନଃପୁନଃ ଅନେକ ଯଜ୍ଞ ଅନୁଷ୍ଠାନ କରିଛି; ଏବଂ ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ରହି ଆବାହ, ବିବାହ ଆଦି ଅନେକ କୁଳାଚାର ଓ ସଂସ୍କାର ମଧ୍ୟ ସମ୍ପନ୍ନ କରିଛି। ଏହିପରି ଧର୍ମକର୍ମ ଓ ସାମାଜିକ ଆଚରଣ—ଦୁହିଁରେ ମୋ ଜୀବନ ସେମାନଙ୍କ ସହିତ ଗଢ଼ିଯାଇଛି।

Verse 15

मां च कृष्ण समासाद्य कृत: शस्त्रसमुद्यम: । दुर्योधनेन वार्ष्णेय विग्रहश्चापि पाण्डवै:,वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! दुर्योधनने मेरे ही भरोसे हथियार उठाने तथा पाण्डवोंके साथ विग्रह करनेका साहस किया है

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲା—ହେ କୃଷ୍ଣ, ହେ ବାର୍ଷ୍ଣେୟ! ମୋତେ ଆଶ୍ରୟ କରି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଶସ୍ତ୍ର ଉଠାଇବାର ସାହସ କରିଛି; ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହିତ ବୈର-ବିଗ୍ରହକୁ ମଧ୍ୟ ଗ୍ରହଣ କରିଛି। ପ୍ରକୃତରେ, ମୋର ସମର୍ଥନ ଉପରେ ଥିବା ଭରସା ହିଁ ତାକୁ ଯୁଦ୍ଧପଥରେ ଦୃଢ଼ କରିଛି।

Verse 16

तस्माद्‌ रणे द्वैरथे मां प्रत्युद्यातारमच्युत । वृतवान्‌ परमं कृष्ण प्रतीपं सव्यसाचिन:,अतः अच्युत! मुझे द्वैरथ युद्धमें सव्यसाची अर्जुनके विरुद्ध लोहा लेने तथा उनका सामना करनेके लिये उसने चुन लिया है

ଏହେତୁ, ଅଚ୍ୟୁତ! ରଣର ଦ୍ୱୈରଥ ଯୁଦ୍ଧରେ ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ବିରୋଧରେ ଅଗ୍ରସର ହୋଇ ସାକ୍ଷାତ୍ ପ୍ରତିପକ୍ଷ ହେବା ପାଇଁ ସେ ମୋତେ—ହେ ପରମ କୃଷ୍ଣ—ବାଛିଛି।

Verse 17

वधाद्‌ बन्धाद्‌ भयाद्‌ वापि लोभाद्‌ वापि जनार्दन | अनृतं नोत्सहे कर्तु धार्तराष्ट्रस्य धीमत:,जनार्दन! इस समय मैं वध, बन्धन, भय अथवा लोभसे भी बुद्धिमान्‌ धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके साथ मिथ्या व्यवहार नहीं करना चाहता

ଜନାର୍ଦନ! ବଧ, ବନ୍ଧନ, ଭୟ କିମ୍ବା ଲୋଭ—ଯେ କାରଣ ହେଉ—ବୁଦ୍ଧିମାନ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ସହ ମିଥ୍ୟା ବ୍ୟବହାର କରିବାକୁ ମୁଁ ସାହସ କରେନି।

Verse 18

यदि हाद्य न गच्छेयं द्वैरथं सव्यसाचिना । अकीर्ति: स्याद्धूषीकेश मम पार्थस्य चो भयो:,हृषीकेश! अब यदि मैं अर्जुनके साथ द्वैरथ युद्ध न करूँ तो यह मेरे और अर्जुन दोनोंके लिये अपयशकी बात होगी

ହୃଷୀକେଶ! ଆଜି ଯଦି ମୁଁ ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସହ ଦ୍ୱୈରଥ ଯୁଦ୍ଧକୁ ନଯାଏ, ତେବେ ମୋର ଓ ପାର୍ଥଙ୍କ—ଉଭୟଙ୍କ—ଅପକୀର୍ତ୍ତି ହେବ।

Verse 19

असंशयं हितार्थाय ब्रूयास्त्वं मधुसूदन । सर्व च पाण्डवा: कुर्युस्त्वद्वशित्वान्न संशय:,मधुसूदन! इसमें संदेह नहीं कि आप मेरे हितके लिये ही ये सब बातें कहते हैं। पाण्डव आपके अधीन हैं; इसलिये आप उनसे जो कुछ भी कहेंगे, वह सब वे अवश्य ही कर सकते हैं

ମଧୁସୂଦନ! ନିଶ୍ଚୟ ଆପଣ ଏସବୁ କଥା ମୋ ହିତ ପାଇଁ ହିଁ କହୁଛନ୍ତି। ଏବଂ ପାଣ୍ଡବମାନେ ଆପଣଙ୍କ ଅଧୀନ; ତେଣୁ ଆପଣ ସେମାନଙ୍କୁ ଯାହା କହିବେ, ସେମାନେ ନିଶ୍ଚୟ କରିବେ—ଏଥିରେ ମଧ୍ୟ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।

Verse 20

मन्त्रस्थ नियम॑ कुर्यस्त्विमत्र मधुसूदन । एतदत्र हित॑ मन्ये सर्व यादवनन्दन,परंतु मधुसूदन! मेरे और आपके बीचमें जो यह गुप्त परामर्श हुआ है, उसे आप यहींतक सीमित रखें। यादवनन्दन! ऐसा करनेमें ही मैं यहाँ सब प्रकारसे हित समझता हूँ

କିନ୍ତୁ ମଧୁସୂଦନ! ମୋ ଓ ଆପଣଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଯେ ଗୁପ୍ତ ପରାମର୍ଶ ହୋଇଛି, ତାହାର ଗୋପନୀୟତାର ନିୟମ ଏଠି ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ହିଁ ରଖନ୍ତୁ। ଯାଦବନନ୍ଦନ! ଏଠାରେ ସମସ୍ତ ହିତ ମୁଁ ଏହିଥିରେ ଦେଖୁଛି—ଏ କଥା ପ୍ରକାଶ ନ ହେଉ।

Verse 21

यदि जानाति मां राजा धर्मात्मा संयतेन्द्रिय: । कुन्त्या: प्रथमजं पुत्र न स राज्यं ग्रहीष्यति

ଯଦି ଧର୍ମାତ୍ମା ଓ ଜିତେନ୍ଦ୍ରିୟ ରାଜା ଜାଣିବେ ଯେ ମୁଁ କୁନ୍ତୀଙ୍କ ପ୍ରଥମଜ ପୁତ୍ର, ତେବେ ସେ ରାଜ୍ୟ ଗ୍ରହଣ କରିବେ ନାହିଁ।

Verse 22

अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाले धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर यदि यह जान लेंगे कि मैं (कर्ण) कुन्तीका प्रथम पुत्र हूँ, तब वे राज्य ग्रहण नहीं करेंगे ।। प्राप्प चापि महद्‌ राज्यं तदहं मधुसूदन । स्फीतं दुर्योधनायैव सम्प्रदद्यामरिंदम,शत्रुदमन मधुसूदन! उस दशामें मैं उस समृद्धिशाली विशाल राज्यको पाकर भी दुर्योधनको ही सौंप दूँगा

ଯଦି ଧର୍ମାତ୍ମା ଓ ଜିତେନ୍ଦ୍ରିୟ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଜାଣିବେ ଯେ ମୁଁ କୁନ୍ତୀଙ୍କ ପ୍ରଥମଜ ପୁତ୍ର, ତେବେ ସେ ରାଜ୍ୟ ଗ୍ରହଣ କରିବେ ନାହିଁ। ଏବଂ ହେ ମଧୁସୂଦନ, ହେ ଶତ୍ରୁଦମନ! ସେଇ ବିଶାଳ ଓ ସମୃଦ୍ଧ ରାଜ୍ୟ ମୋତେ ମିଳିଲେ ମଧ୍ୟ, ମୁଁ ତାହା କେବଳ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ହସ୍ତାନ୍ତର କରିଦେବି।

Verse 23

स एव राजा थधर्मात्मा शाश्वतो<स्तु युधिष्ठिर: । नेता यस्य हृषीकेशो योद्धा यस्य धनंजय:,मैं भी यही चाहता हूँ कि जिनके नेता हृषीकेश और योद्धा अर्जुन हैं, वे धर्मात्मा युधिष्ठिर ही सर्वदा राजा बने रहें

ଯାହାଙ୍କ ନେତା ହୃଷୀକେଶ (କୃଷ୍ଣ) ଏବଂ ଯୋଦ୍ଧା ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ), ସେଇ ଧର୍ମାତ୍ମା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ହିଁ ସଦାକାଳ ରାଜା ରୁହନ୍ତୁ।

Verse 24

पृथिवी तस्य राष्ट्र च यस्य भीमो महारथ: । नकुल: सहदेवश्न द्रौपदेयाश्व माधव,माधव! जनार्दन! जिनके सहायक महारथी भीम, नकुल, सहदेव, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न, महारथी सात्यकि, उत्तमौजा, युधामन्यु, सोमक-वंशी सत्यधर्मा, चेदिराज धृष्टकेतु, चेकितान, अपराजित वीर शिखण्डी, इन्द्रगोपके समान वर्णवाले पाँचों भाई केकय-राजकुमार, इन्द्रधनुषके समान रंगवाले महामना कुन्तिभोज, भीमसेनके मामा महारथी श्येनजित्‌, विराटपुत्र शंख तथा अक्षयनिधिके समान आप हैं, उन्हीं युधिष्ठिरके अधिकारमें यह सारा भूमण्डल तथा कौरव-राज्य रहेगा

ହେ ମାଧବ! ଯାହାଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ମହାରଥୀ ଭୀମ, ନକୁଳ, ସହଦେବ ଓ ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ଅଛନ୍ତି, ପୃଥିବୀ ଓ ରାଜ୍ୟ ସେମାନଙ୍କର; ତେଣୁ କୁରୁ-ରାଜ୍ୟ ସହ ସମଗ୍ର ଭୂମଣ୍ଡଳ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଅଧିକାରରେ ରହିବ।

Verse 25

धृष्टय्युम्नश्ष॒ पाउ्चाल्य: सात्यकिश्न महारथ: । उत्तमौजा युधामन्यु: सत्यधर्मा च सौमकि:,माधव! जनार्दन! जिनके सहायक महारथी भीम, नकुल, सहदेव, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न, महारथी सात्यकि, उत्तमौजा, युधामन्यु, सोमक-वंशी सत्यधर्मा, चेदिराज धृष्टकेतु, चेकितान, अपराजित वीर शिखण्डी, इन्द्रगोपके समान वर्णवाले पाँचों भाई केकय-राजकुमार, इन्द्रधनुषके समान रंगवाले महामना कुन्तिभोज, भीमसेनके मामा महारथी श्येनजित्‌, विराटपुत्र शंख तथा अक्षयनिधिके समान आप हैं, उन्हीं युधिष्ठिरके अधिकारमें यह सारा भूमण्डल तथा कौरव-राज्य रहेगा

ହେ ମାଧବ, ହେ ଜନାର୍ଦନ! ପାଞ୍ଚାଳ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ, ମହାରଥୀ ସାତ୍ୟକି, ଉତ୍ତମୌଜା, ଯୁଧାମନ୍ୟୁ ଓ ସୋମକ-ବଂଶୀୟ ସତ୍ୟଧର୍ମା—ଏମାନେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଅଗ୍ରଗଣ୍ୟ ସହାୟ; ଏପରି ସହାୟ ଥିଲେ ସମଗ୍ର ଭୂମଣ୍ଡଳ ଓ କୁରୁ-ରାଜ୍ୟ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଅଧିକାରରେ ରହିବ।

Verse 26

चैद्यश्न चेकितानश्रु शिखण्डी चापराजित: । इन्द्रगोपकवर्णाश्व॒ केकया भ्रातरस्तथा । इन्द्रायुधसवर्णश्र॒ कुन्तिभोजो महामना:,माधव! जनार्दन! जिनके सहायक महारथी भीम, नकुल, सहदेव, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न, महारथी सात्यकि, उत्तमौजा, युधामन्यु, सोमक-वंशी सत्यधर्मा, चेदिराज धृष्टकेतु, चेकितान, अपराजित वीर शिखण्डी, इन्द्रगोपके समान वर्णवाले पाँचों भाई केकय-राजकुमार, इन्द्रधनुषके समान रंगवाले महामना कुन्तिभोज, भीमसेनके मामा महारथी श्येनजित्‌, विराटपुत्र शंख तथा अक्षयनिधिके समान आप हैं, उन्हीं युधिष्ठिरके अधिकारमें यह सारा भूमण्डल तथा कौरव-राज्य रहेगा

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ— “ସେମାନଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ଚେଦିରାଜ ଧୃଷ୍ଟକେତୁ ଓ ଚେକିତାନ ଅଛନ୍ତି; ଯୁଦ୍ଧରେ ଅପରାଜିତ ଶିଖଣ୍ଡୀ ମଧ୍ୟ ଅଛି। ଇନ୍ଦ୍ରଗୋପ କୀଟର ରଙ୍ଗ ପରି ଅଶ୍ୱ ଥିବା କେକୟ ଭ୍ରାତାମାନେ ଅଛନ୍ତି, ଏବଂ ଇନ୍ଦ୍ରଧନୁ ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ ମହାମନା କୁନ୍ତିଭୋଜ ମଧ୍ୟ ଅଛନ୍ତି। ଏପରି ମହାବଳୀ ସହାୟ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ଥିଲେ, ପୃଥିବୀ ଓ କୁରୁରାଜ୍ୟ ତାଙ୍କର ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଅଧିକାରରେ ପଡ଼ିବ ବୋଲି ଦିଶେ।”

Verse 27

मातुलो भीमसेनस्य श्येनजिच्च महारथ: । शड्ख: पुत्रो विराटस्य निधिस्त्वं च जनार्दन,माधव! जनार्दन! जिनके सहायक महारथी भीम, नकुल, सहदेव, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न, महारथी सात्यकि, उत्तमौजा, युधामन्यु, सोमक-वंशी सत्यधर्मा, चेदिराज धृष्टकेतु, चेकितान, अपराजित वीर शिखण्डी, इन्द्रगोपके समान वर्णवाले पाँचों भाई केकय-राजकुमार, इन्द्रधनुषके समान रंगवाले महामना कुन्तिभोज, भीमसेनके मामा महारथी श्येनजित्‌, विराटपुत्र शंख तथा अक्षयनिधिके समान आप हैं, उन्हीं युधिष्ठिरके अधिकारमें यह सारा भूमण्डल तथा कौरव-राज्य रहेगा

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ— “ଭୀମସେନଙ୍କ ମାତୁଳ ମହାରଥୀ ଶ୍ୟେନଜିତ୍; ବିରାଟଙ୍କ ପୁତ୍ର ଶଙ୍ଖ; ଏବଂ ଆପଣ ନିଜେ, ହେ ଜନାର୍ଦନ—ହେ ମାଧବ, ହେ ଜନାର୍ଦନ—ଅକ୍ଷୟ ନିଧି ସମାନ। ଏପରି ସହାୟ ଓ ଆଧାର ଥିଲେ, ସମଗ୍ର ଭୂମଣ୍ଡଳ ଓ କୁରୁ-ସାର୍ବଭୌମତ୍ୱ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଆଜ୍ଞାରେ ହିଁ ଅବସ୍ଥିତ ରହିବ।”

Verse 28

महानयं कृष्ण कृत: क्षत्रस्य समुदानय: । राज्यं प्राप्तमिदं दीप्तं प्रथितं सर्वराजसु,श्रीकृष्ण! दुर्योधनने यह क्षत्रियोंका बहुत बड़ा समुदाय एकत्र कर लिया है तथा समस्त राजाओंमें विख्यात एवं उज्ज्वल यह कुरुदेशका राज्य भी उसे प्राप्त हो गया है

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ— “ହେ କୃଷ୍ଣ! କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କ ଏହି ମହାସମୁଦାୟ ଏକତ୍ର ହୋଇଛି। ଏବଂ ସମସ୍ତ ରାଜାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରଥିତ ଓ ଦୀପ୍ତ ଏହି ରାଜ୍ୟ—କୁରୁଦେଶର—ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ହସ୍ତଗତ ହୋଇଛି।”

Verse 29

धार्तराष्ट्रस्य वार्ष्णेय शस्त्रयज्ञों भविष्यति । अस्य यज्ञस्य वेत्ता त्वं भविष्यसि जनार्दन,जनार्दन! वृष्णिनन्दन! अब दुर्योधनके यहाँ एक शस्त्र-यज्ञ होगा, जिसके साक्षी आप होंगे

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ— “ହେ ବାର୍ଷ୍ଣେୟ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରଙ୍କ ପାଇଁ ଶସ୍ତ୍ର-ଯଜ୍ଞ—ଅର୍ଥାତ୍ ଯୁଦ୍ଧ—ହେବ। ହେ ଜନାର୍ଦନ, ସେହି ଯଜ୍ଞର ଜ୍ଞାତା ଓ ସାକ୍ଷୀ ଆପଣ ହେବେ।”

Verse 30

आध्वर्यवं च ते कृष्ण क्रतावस्मिन्‌ भविष्यति । होता चैवात्र बीभत्सु: संनद्धः स कपिध्वज:,श्रीकृष्ण! इस यज्ञमें अध्वर्युका काम भी आपको ही करना होगा। कवच आदिसे सुसज्जित कपिध्वज अर्जुन इसमें होता बनेंगे

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ— “ହେ କୃଷ୍ଣ! ଏହି ଯଜ୍ଞରେ ଅଧ୍ୱର୍ୟୁର କାର୍ଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଆପଣଙ୍କୁ କରିବାକୁ ପଡ଼ିବ। ଏଠାରେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସନ୍ନଦ୍ଧ କପିଧ୍ୱଜ ବୀଭତ୍ସୁ (ଅର୍ଜୁନ) ହୋତା ହେବେ।”

Verse 31

गाण्डीवं ख्रुक्‌ तथा चाज्यं वीर्य पुंसां भविष्यति । ऐन्द्रं पाशुपतं ब्राह्मं स्थूणाकर्ण च माधव । मन्त्रास्तत्र भविष्यन्ति प्रयुक्ता: सव्यसाचिना

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ହେ ମାଧବ! ଗାଣ୍ଡୀବ ଧନୁ, ଖ୍ରୁକ୍ ଶସ୍ତ୍ର ଓ ହବନୀୟ ଘୃତ—ଏହି ସବୁ ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ପରାକ୍ରମର ପ୍ରମାଣ ହେବ। ସେଠାରେ ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନ ମନ୍ତ୍ରପ୍ରୟୋଗ କଲେ ଐନ୍ଦ୍ର, ପାଶୁପତ, ବ୍ରାହ୍ମ ଓ ସ୍ଥୂଣାକର୍ଣ୍ଣ ଆଦି ଦିବ୍ୟାସ୍ତ୍ର ପ୍ରବୃତ୍ତ ହେବ।

Verse 32

गाण्डीव धनुष सुवाका काम करेगा और विपक्षी वीरोंका पराक्रम ही हवनीय घृत होगा। माधव! सव्यसाची अर्जुनद्वारा प्रयुक्त होनेवाले ऐन्द्र, पाशुपत, ब्राह्म और स्थूणाकर्ण आदि अस्त्र ही वेद-मन्त्र होंगे ।। अनुयातश्न पितरमधिको वा पराक्रमे । गीत॑ स्तोत्र स सौभद्र: सम्यक्‌ तत्र भविष्यति,सुभद्राकुमार अभिमन्यु भी अस्त्रविद्यामें अपने पिताका ही अनुसरण करनेवाला अथवा पराक्रममें उनसे भी बढ़कर है। वह इस शस्त्रयञ्ञमें उत्तम स्तोत्रगान (उदगातृकर्म)-की पूर्ति करेगा

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ସୁଭଦ୍ରାପୁତ୍ର ଅଭିମନ୍ୟୁ ଶସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାରେ ପିତାଙ୍କ ପଥକୁ ଅନୁସରଣ କରେ, କିମ୍ବା ପରାକ୍ରମରେ ତାଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଅତିକ୍ରମ କରିପାରେ। ଏହି ରଣ-ଯଜ୍ଞରେ ସେ ସ୍ତୋତ୍ରଗାନ କରୁଥିବା ଉଦ୍ଗାତାର କାର୍ଯ୍ୟ ଯଥାଯଥ ଭାବେ ସମ୍ପନ୍ନ କରିବ।

Verse 33

उदगातात्र पुनर्भीम: प्रस्तोता सुमहाबल: । विनदन्‌ स नरव्याप्रो नागानीकान्तकूद्‌ रणे

ତାପରେ ସେଇ ସମୟରେ ମହାବଳୀ ଭୀମ ପୁନର୍ବାର ପ୍ରସ୍ତୋତା ହେବେ। ଗର୍ଜନ କରି ସେ ନରବ୍ୟାଘ୍ର ରଣରେ ଅଗ୍ରସର ହେବେ ଏବଂ ଶତ୍ରୁପକ୍ଷର ନାଗାନୀକକୁ ନାଶ କରିବେ।

Verse 34

अभिमन्यु ही उदगाता और महाबली नरश्रेष्ठ भीमसेन ही प्रस्तोता होंगे, जो रणभूमिमें गर्जना करते हुए शत्रुपक्षके हाथियोंकी सेनाका विनाश कर डालेंगे ।। स चैव तत्र धर्मात्मा शश्वद्‌ राजा युधिष्ठिर: । जपैहेमिश्न संयुक्तो ब्रह्म॒त्वं कारयिष्यति,वे धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर ही सदा जप और होममें संलग्न रहकर उस यज्ञमें ब्रह्माका कार्य सम्पन्न करेंगे

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ଅଭିମନ୍ୟୁ ଉଦ୍ଗାତା ହେବେ ଏବଂ ମହାବଳୀ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭୀମସେନ ପ୍ରସ୍ତୋତା; ରଣଭୂମିରେ ଗର୍ଜନ କରି ସେ ଶତ୍ରୁପକ୍ଷର ଗଜସେନାକୁ ଧ୍ୱଂସ କରିଦେବେ। ଏବଂ ସେଠାରେ ଧର୍ମାତ୍ମା ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସଦା ଜପ ଓ ହୋମରେ ନିମଗ୍ନ ରହି ସେଇ ଯଜ୍ଞରେ ବ୍ରହ୍ମା-ପୁରୋହିତର କାର୍ଯ୍ୟ ସମ୍ପନ୍ନ କରିବେ।

Verse 35

शड्खशब्दा: समुरजा भेर्यश्व मधुसूदन । उत्कृष्टसिंहनादश्न सुब्रह्मण्यो भविष्यति

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଶଙ୍ଖଧ୍ୱନି, ମୁରଜ-ଭେରୀର ଗର୍ଜନ ଓ ଅଶ୍ୱମାନଙ୍କ ହ୍ରେଷାଧ୍ୱନି ଏକାସାଥି ଉଠିବ; ଏବଂ ଏକ ଉତ୍କୃଷ୍ଟ ସିଂହନାଦ ଗୁଞ୍ଜିବ। ସେଠାରେ ‘ସୁବ୍ରହ୍ମଣ୍ୟ!’ ନାମକ ମଙ୍ଗଳ ଯୁଦ୍ଧଘୋଷ ମଧ୍ୟ ହେବ।

Verse 36

मधुसूदन! शंख, मुरज तथा भेरियोंके शब्द और उच्चस्वरसे किये हुए सिंहनाद ही सुब्रह्मण्यनाद होंगे ।। नकुल: सहदेवश्न माद्रीपुत्रौ यशस्विनौ । शामित्र तौ महावीर्यो सम्यक्‌ तत्र भविष्यत:,माद्रीके यशस्वी पुत्र महापराक्रमी नकुल-सहदेव उसमें भलीभाँति शामित्रकर्मका सम्पादन करेंगे

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—“ମଧୁସୂଦନ! ଶଙ୍ଖର ନାଦ, ମୁରଜର ତାଳ, ଭେରୀର ଗର୍ଜନ ଓ ଉଚ୍ଚସ୍ୱରର ସିଂହନାଦ—ଏହିମାନେ ହିଁ ସୁବ୍ରହ୍ମଣ୍ୟନାଦ ହେବ। ଏବଂ ମାଦ୍ରୀଙ୍କ ଯଶସ୍ବୀ ପୁତ୍ର, ମହାବୀର୍ୟବାନ୍ ନକୁଳ ଓ ସହଦେବ, ସେହି ସମୟରେ ଶାମିତ୍ରପଦ ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ କର୍ତ୍ତବ୍ୟଗୁଡ଼ିକୁ ବିଧିମତେ ସମ୍ପାଦନ କରିବେ।”

Verse 37

कल्माषदण्डा गोविन्द विमला रथपद्धक्तय: । यूपा: समुपकल्पन्तामस्मिन्‌ यज्ञे जनार्दन

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—“ଗୋବିନ୍ଦ, ଜନାର୍ଦ୍ଦନ! ଏହି ଯଜ୍ଞ ପାଇଁ କଳ୍ମଷରହିତ, ସୁସଜ୍ଜିତ ରଥପଥଗୁଡ଼ିକୁ ସୁବ୍ୟବସ୍ଥିତ କରାଯାଉ; ଏବଂ ଯୂପମାନେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହେଉନ୍ତୁ।”

Verse 38

गोविन्द! जनार्दन! विचित्र ध्वजदण्डोंसे सुशोभित निर्मल रथपंक्तियाँ ही इस रणयज्ञमें यूपोंका काम करेंगी ।। कर्णिनालीकनाराचा वत्सदन्तोपबृंहणा: । तोमरा: सोमकलशा: पवित्राणि धनूंषि च,कर्णि, नालीक, नाराच और वत्सदन्त आदि बाण उपबृंहण (सोमाहुतिके साधनभूत चमस आदि पात्र) होंगे। तोमर सोमकलशका और धनुष पवित्रीका काम करेंगे

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—“ଗୋବିନ୍ଦ, ଜନାର୍ଦ୍ଦନ! ବିଚିତ୍ର ଧ୍ୱଜଦଣ୍ଡରେ ସୁଶୋଭିତ ନିର୍ମଳ ରଥପଙ୍କ୍ତିମାନେ ହିଁ ଏହି ରଣଯଜ୍ଞରେ ଯୂପର କାମ କରିବେ। କର୍ଣ୍ଣି, ନାଳୀକ, ନାରାଚ ଓ ବତ୍ସଦନ୍ତ ଆଦି ବାଣ ଉପବୃଂହଣ (ସହାୟକ ପାତ୍ର) ହେବେ; ତୋମର ସୋମକଲଶ ହେବ; ଏବଂ ଧନୁ ପବିତ୍ର (ଛାଣନୀ) ହେବ।”

Verse 39

असयोअत्र कपालानि पुरोडाशा: शिरांसि च | हविस्तु रुधिरं कृष्ण तस्मिन्‌ यज्ञे भविष्यति,श्रीकृष्ण! उस यज्ञमें खड़ग ही कपाल, शत्रुओंके मस्तक ही पुरोडाश तथा रुधिर ही हविष्य होंगे

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—“କୃଷ୍ଣ! ସେହି ଯଜ୍ଞରେ ଖଡ୍ଗମାନେ କପାଳ ହେବେ, ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶିର ହିଁ ପୁରୋଡାଶ ହେବ, ଏବଂ ରୁଧିର ହିଁ ହବିଷ୍ୟ ହେବ।”

Verse 40

इध्मा: परिधयश्रैव शक्तयो विमला गदा: । सदस्या द्रोणशिष्याश्व॒ कृपस्य च शरद्वत:,निर्मल शक्तियाँ और गदाएँ सब ओर बिखरी हुई समिधाएँ होंगी। द्रोण और कृपाचार्यके शिष्य ही सदस्यका कार्य करेंगे

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—“ଇଧ୍ମ ଓ ପରିଧି ପରି ଚାରିଦିଗରେ ଛିଟିଯାଇଥିବା ନିର୍ମଳ ଶକ୍ତି ଓ ଗଦା ରହିବ। ଏବଂ ଦ୍ରୋଣଙ୍କ ଶିଷ୍ୟମାନେ ଓ ଶରଦ୍ୱତପୁତ୍ର କୃପଙ୍କ ଶିଷ୍ୟମାନେ ହିଁ ସେହି ଯଜ୍ଞର ସଦସ୍ୟ (ଋତ୍ୱିଜ) ହେବେ।”

Verse 41

इषवोत्र परिस्तोमा मुक्ता गाण्डीवधन्चना । महारथप्रयुक्ताश्च द्रोणद्रौणिप्रचोदिता:

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲା—ଏଠାରେ ଗାଣ୍ଡୀବଧାରୀ ଅର୍ଜୁନ ଘନ ଭାବେ, ଚାରିଦିଗରୁ ଘେରିବା ପରି ବିନ୍ୟାସରେ ବାଣବର୍ଷା ଛାଡ଼ିଛି। ଏଗୁଡ଼ିକ ମହାରଥୀଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରୟୁକ୍ତ ଅସ୍ତ୍ର; ଦ୍ରୋଣ ଓ ଦ୍ରୋଣପୁତ୍ର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମାଙ୍କ ପ୍ରେରଣାରେ ଏହାର ବେଗ ଆହୁରି ବଢ଼ୁଛି।

Verse 42

गाण्डीवधारी अर्जुनके छोड़े हुए तथा द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा एवं अन्य महारथियोंके चलाये हुए बाण यज्ञकुण्डके सब ओर बिछाये जानेवाले कुशोंका काम देंगे ।। प्रतिप्रास्थानिकं कर्म सात्यकिस्तु करिष्यति । दीक्षितों धार्तराष्ट्रोडत्र पत्नी चास्य महाचमू:,सात्यकि प्रतिस्थाता (अध्वर्युके दूसरे सहयोगी)-का कार्य करेंगे। धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन इस रणयज्ञकी दीक्षा लेगा और उसकी विशाल सेना ही यजमानपत्नीका काम करेगी

କର୍ଣ୍ଣ ଘୋଷଣା କଲା—ଗାଣ୍ଡୀବଧାରୀ ଅର୍ଜୁନ ଛାଡ଼ିଥିବା ଏବଂ ଦ୍ରୋଣ, ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା ଓ ଅନ୍ୟ ମହାରଥୀମାନେ ନିକ୍ଷେପ କରିଥିବା ବାଣଗୁଡ଼ିକ ଏହି ରଣ-ଯଜ୍ଞରେ ବେଦୀ ଚାରିପାଖେ ପଥାରାଯାଉଥିବା କୁଶଘାସର କାମ କରିବ। ସାତ୍ୟକି ପ୍ରତିପ୍ରସ୍ଥାତୃ (ସହାୟକ ଋତ୍ୱିଜ)ର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ କରିବ। ଏହି ଯୁଦ୍ଧ-ଯଜ୍ଞରେ ଧାର୍ତ୍ତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଦୀକ୍ଷା ଗ୍ରହଣ କରୁଥିବା ଯଜମାନ ହେବ, ଏବଂ ତାହାର ବିଶାଳ ସେନା ଯଜମାନପତ୍ନୀର ସ୍ଥାନ ନେବ।

Verse 43

घटोत्कचो<त्र शामित्र करिष्यति महाबल: । अतितरात्रे महाबाहो वितते यज्ञकर्मणि,महाबाहो! इस महायज्ञका अनुष्ठान आरम्भ हो जानेपर उसके अतिरात्रयागमें (अथवा आधी रातके समय) महाबली घटोत्कच शामित्रकर्म करेगा

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲା—ଏଠାରେ ମହାବଳୀ ଘଟୋତ୍କଚ ଶାମିତ୍ର କର୍ମ କରିବ। ହେ ମହାବାହୋ! ଏହି ମହାଯଜ୍ଞର କାର୍ଯ୍ୟ ଆରମ୍ଭ ହେଲେ ଅତିରାତ୍ର ଯାଗରେ—ଅର୍ଥାତ୍ ଗଭୀର ରାତିରେ—ସେ ଏହି ବିଧି ସମ୍ପାଦନ କରିବ।

Verse 44

दक्षिणा त्वस्य यज्ञस्य धृष्टद्युम्न: प्रतापवान्‌ | वैतानिके कर्ममुखे जातो यः कृष्ण पावकात्‌,श्रीकृष्ण! जो श्रौत यज्ञके आरम्भमें ही साक्षात्‌ अग्निकुण्डसे प्रकट हुआ था, वह प्रतापी वीर धृष्टद्युम्न इस यज्ञकी दक्षिणाका कार्य सम्पादन करेगा

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲା—ଏହି ଯଜ୍ଞର ଦକ୍ଷିଣା କାର୍ଯ୍ୟ ପ୍ରତାପବାନ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ କରିବ। ହେ କୃଷ୍ଣ! ଯେ ଶ୍ରୌତ (ବୈତାନିକ) କର୍ମର ଆରମ୍ଭରେ ହିଁ ପାବକ ଅଗ୍ନିରୁ ଜନ୍ମିଥିଲା, ସେଇ ଏହି ଦକ୍ଷିଣାକୁ ସମ୍ପାଦନ କରିବ।

Verse 45

यदब्रुवमहं कृष्ण कटुकानि सम पाण्डवान्‌ | प्रियार्थ धार्तराष्ट्रस्य तेन तप्ये हुकर्मणा,श्रीकृष्ण! मैंने जो धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनका प्रिय करनेके लिये पाण्डवोंको बहुत-से कटुवचन सुनाये हैं, उस अयोग्य कर्मके कारण आज मुझे बड़ा पश्चात्ताप हो रहा है

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲା—ହେ କୃଷ୍ଣ! ଧାର୍ତ୍ତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ପ୍ରିୟ କରିବା ପାଇଁ ମୁଁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଯେ କଟୁବଚନ କହିଥିଲି, ସେଇ ଅଯୋଗ୍ୟ କର୍ମରେ ଆଜି ମୁଁ ପଶ୍ଚାତ୍ତାପରେ ଦଗ୍ଧ ହେଉଛି।

Verse 46

यदा द्रक्ष्यसि मां कृष्ण निहतं सव्यसाचिना । पुनश्चितिस्तदा चास्य यज्ञस्थाथ भविष्यति

ହେ କୃଷ୍ଣ! ଯେତେବେଳେ ତୁମେ ମୋତେ ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ହାତରେ ନିହତ ଦେଖିବ, ସେତେବେଳେ ତାଙ୍କର ଚିତା ମଧ୍ୟ ପୁନର୍ବାର ଯଜ୍ଞବେଦୀ ପରି ହେବ।

Verse 47

श्रीकृष्ण! जब आप सव्यसाची अर्जुनके हाथसे मुझे मारा गया देखेंगे, उस समय इस यज्ञका पुनश्चिति-कर्म (यज्ञके अनन्तर किया जानेवाला चयनारम्भ) सम्पन्न होगा ।। दुःशासनस्य रुधिरं यदा पास्यति पाण्डव: । आनर्द नर्दत: सम्यक्‌ तदा सुत्यं भविष्यति,जब पाण्डुनन्दन भीमसेन सिंहनाद करते हुए दुःशासनका रक्त पान करेंगे, उस समय इस यज्ञका सुत्य (सोमाभिषव) कर्म पूरा होगा

ହେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ଯେତେବେଳେ ତୁମେ ମୋତେ ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ହାତରେ ନିହତ ଦେଖିବ, ସେତେବେଳେ ଏହି ଯଜ୍ଞର ପୁନଶ୍ଚିତି-କର୍ମ ସମ୍ପନ୍ନ ହେବ। ଏବଂ ଯେତେବେଳେ ପାଣ୍ଡବ ଭୀମସେନ ସିଂହନାଦ କରି ଦୁଃଶାସନର ରକ୍ତ ପାନ କରିବେ, ସେତେବେଳେ ଏହି ଯଜ୍ଞର ସୁତ୍ୟ (ସୋମାଭିଷବ) କର୍ମ ସମ୍ୟକ୍ ଭାବେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେବ।

Verse 48

यदा द्रोणं च भीष्म॑ च पाज्चाल्यौ पातयिष्यत: । तदा यज्ञावसानं तद्‌ भविष्यति जनार्दन,जनार्दन! जब दोनों पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्म और शिखण्डी द्रोणाचार्य और भीष्मको मार गिरायेंगे, उस समय इस रणयज्ञका अवसान (बीच-बीचमें होनेवाला विराम) कार्य सम्पन्न होगा

ହେ ଜନାର୍ଦନ! ଯେତେବେଳେ ପାଞ୍ଚାଳକୁମାର ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ଓ ଶିଖଣ୍ଡୀ ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟ ଏବଂ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ପତିତ କରିବେ, ସେତେବେଳେ ଏହି ରଣଯଜ୍ଞର ଅବସାନ-କାର୍ଯ୍ୟ ସମ୍ପନ୍ନ ହେବ।

Verse 49

दुर्योधनं यदा हनता भीमसेनो महाबल: । तदा समाप्स्यते यज्ञो धार्तराष्ट्स्य माधव,माधव! जब महाबली भीमसेन दुर्योधनका वध करेंगे, उस समय धूृतराष्ट्रपुत्रका प्रारम्भ किया हुआ यह यज्ञ समाप्त हो जायगा

ହେ ମାଧବ! ଯେତେବେଳେ ମହାବଳୀ ଭୀମସେନ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ବଧ କରିବେ, ସେତେବେଳେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଆରମ୍ଭ କରିଥିବା ଏହି ଯଜ୍ଞ ସମାପ୍ତ ହେବ।

Verse 50

स्‍्नुषाश्न प्रस्नुषाश्वैव धृतराष्ट्रस्य सड़ता: । हतेश्वरा नष्टपुत्रा हतनाथाश्व केशव

ହେ କେଶବ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସମସ୍ତ ପୁତ୍ରବଧୂ ଓ ପୌତ୍ରବଧୂ ସର୍ବଥା ଧ୍ୱଂସପ୍ରାୟ ହେବେ—ସ୍ୱାମୀମାନେ ନିହତ ହେବେ, ପୁତ୍ରମାନେ ନଷ୍ଟ ହେବେ, ରକ୍ଷକମାନେ ମଧ୍ୟ ହତ ହେବେ।

Verse 51

रुदत्य: सह गान्धार्या श्वगृध्रकुरराकुले । स यज्ञेडस्मिन्नवभूथो भविष्यति जनार्दन

ଗାନ୍ଧାରୀ କାନ୍ଦୁଥିବାବେଳେ, କୁକୁର, ଗିଧ ଓ କୁରର ପକ୍ଷୀରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଏହି କୋଳାହଳମୟ ରଣଭୂମିରେ—ହେ ଜନାର୍ଦନ—ଏହିଟି ହେବ ଏହି ଯଜ୍ଞର ଅବଭୃଥ-ସ୍ନାନ, ଶେଷ ଶୁଦ୍ଧିସ୍ନାନ।

Verse 52

केशव! जिनके पति, पुत्र और संरक्षक मार दिये गये होंगे, वे धृतराष्ट्रके पुत्रों और पौत्रोंकी बहुएँ जब गान्धारीके साथ एकत्र होकर कुत्तों, गीधों और कुरर पक्षियोंसे भरे हुए समरांगणमें रोती हुई विचरेंगी, जनार्दन! वही उस यज्ञका अवभृथस्नान होगा ।। विद्यावृद्धा वयोवृद्धा: क्षत्रिया: क्षत्रियर्षभ । वृथा मृत्युं न कुर्वीरिस्त्वत्कृते मधुसूदन,क्षत्रियशिरोमणि मधुसूदन! तुम्हारे इस शान्ति-स्थापनके प्रयत्नसे कहीं ऐसा न हो कि विद्यावृद्ध और वयोवृद्ध क्षत्रियगण व्यर्थ मृत्युको प्राप्त हों (युद्धमें शस्त्रोंसे होनेवाली मृत्युसे वंचित रह जायाँ)

କେଶବ! ଯେମାନଙ୍କର ପତି, ପୁତ୍ର ଓ ରକ୍ଷକ ନିହତ ହେବେ, ସେଇ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ର ଓ ପୌତ୍ରମାନଙ୍କର ବହୁମାନେ ଗାନ୍ଧାରୀଙ୍କ ସହ ଏକତ୍ର ହୋଇ, କୁକୁର, ଗିଧ ଓ କୁରର ପକ୍ଷୀରେ ଭରିଥିବା ରଣଭୂମିରେ କାନ୍ଦୁଥିବା ଅବସ୍ଥାରେ ଘୁରିବେ—ହେ ଜନାର୍ଦନ—ସେଇଟି ହେବ ସେଇ ଯଜ୍ଞର ଅବଭୃଥ-ସ୍ନାନ। ଆଉ, ହେ କ୍ଷତ୍ରିୟଶ୍ରେଷ୍ଠ, ମଧୁସୂଦନ—ତୁମ ହେତୁ ଜ୍ଞାନରେ ପ୍ରବୀଣ ଓ ବୟସରେ ବୃଦ୍ଧ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନେ ବ୍ୟର୍ଥ ମୃତ୍ୟୁକୁ ନ ପାଉନ୍ତୁ; ତୁମ ଶାନ୍ତି-ସ୍ଥାପନ ପ୍ରୟାସରେ ସେମାନେ ଯୁଦ୍ଧୋଚିତ ମୃତ୍ୟୁରୁ ବଞ୍ଚିତ ନ ହେଉନ୍ତୁ।

Verse 53

शस्त्रेण निधन गच्छेत्‌ समृद्ध क्षत्रमण्डलम्‌ | कुरुक्षेत्रे पुण्यतमे त्रैलोक्यस्थापि केशव,केशव! कुरुक्षेत्र तीनों लोकोंके लिये परम पुण्यतम तीर्थ है। यह समृद्धिशाली क्षत्रियसमुदाय वहीं जाकर शस्त्रोंक आघातसे मृत्युको प्राप्त हो

ହେ କେଶବ! ତ୍ରିଲୋକରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ପରମ ପୁଣ୍ୟତମ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରରେ ଏହି ସମୃଦ୍ଧ କ୍ଷତ୍ରିୟମଣ୍ଡଳ ଶସ୍ତ୍ରାଘାତରେ ମୃତ୍ୟୁକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଉ। କାରଣ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ର ତିନି ଲୋକ ପାଇଁ ସର୍ବୋଚ୍ଚ ପବିତ୍ର ତୀର୍ଥ।

Verse 54

तदत्र पुण्डरीकाक्ष निधत्स्व यदभीप्सितम्‌ । यथा कार्त्स्न्येन वार्ष्णेय क्षत्रं स्वर्गमवाप्रुयात्‌,कमलनयन वृष्णिनन्दन! आप भी इसकी सिद्धिके लिये ही ऐसा मनोवांछित प्रयत्न करें, जिससे यह सारा-का-सारा क्षत्रियसमूह स्वर्गलोकमें पहुँच जाय

ଏହେତୁ, ହେ ପୁଣ୍ଡରୀକାକ୍ଷ! ଏଠାରେ ତୁମେ ଯାହା ସତ୍ୟସତ୍ୟ ଇଚ୍ଛ କର, ସେଇ ନିଷ୍ପତ୍ତି କର। ହେ ୱାର୍ଷ୍ଣେୟ! ଏମିତି ଦୃଢ଼ ପ୍ରୟାସ କର, ଯେପରି ଏହି ସମଗ୍ର କ୍ଷତ୍ରିୟସମୂହ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ସ୍ୱର୍ଗକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଉ।

Verse 55

यावत्‌ स्थास्यन्ति गिरय: सरितश्न जनार्दन । तावत्‌ कीर्तिभव: शब्द: शाश्वतो5यं भविष्यति

ହେ ଜନାର୍ଦନ! ଯେତେଦିନ ପର୍ବତମାନେ ଦଢ଼ ହୋଇ ଦାଁଡ଼ିଥିବେ ଓ ନଦୀମାନେ ପ୍ରବାହିତ ହେଉଥିବେ, ସେତେଦିନ କୀର୍ତ୍ତିରୁ ଜନ୍ମିଥିବା ଏହି ଶବ୍ଦ—ଏହି ଶାଶ୍ୱତ ଯଶ—ଚିରଞ୍ଜୀବ ରହିବ।

Verse 56

जनार्दन! जबतक ये पर्वत और सरिताएँ रहेंगी, तबतक इस युद्धकी कीर्ति-कथा अक्षय बनी रहेगी ।। ब्राह्मणा: कथयिष्यन्ति महाभारतमाहवम्‌ । समागमेषु वार्ष्णेय क्षत्रियाणां यशोधनम्‌,वार्ष्णेय! ब्राह्मणलोग क्षत्रियोंक समाजमें इस महाभारतयुद्धका, जिसमें राजाओंके सुयशरूपी धनका संग्रह होनेवाला है, वर्णन करेंगे

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ହେ ଜନାର୍ଦନ! ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଏହି ପର୍ବତ ଓ ନଦୀମାନେ ରହିବେ, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଏହି ଯୁଦ୍ଧର କୀର୍ତ୍ତିକଥା ଅକ୍ଷୟ ରହିବ। ହେ ବାର୍ଷ୍ଣେୟ! ସମାଗମରେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କ ଯଶ-ଧନର ଭଣ୍ଡାର ସ୍ୱରୂପ ଏହି ମହାଭାରତ ଯୁଦ୍ଧକଥା ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବେ।

Verse 57

समुपानय कौन्तेयं युद्धाय मम केशव । मन्त्रसंवरणं कुर्वन्‌ नित्यमेव परंतप,शत्रुओंकोी संताप देनेवाले केशव! आप इस मन्त्रणाको सदा गुप्त रखते हुए ही कुन्तीकुमार अर्जुनको मेरे साथ युद्ध करनेके लिये ले आवें

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ହେ କେଶବ! କୌନ୍ତେୟ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ମୋ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବା ପାଇଁ ନେଇଆସ। ହେ ପରନ୍ତପ! ଏହି ମନ୍ତ୍ରଣାକୁ ସଦା ଗୁପ୍ତ ରଖି ଏହା କର।

Verse 141

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कर्णोपनिवादे एकचत्वारिंशदधिकशततमो<ध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ କର୍ଣ୍ଣୋପନିବାଦ-ପ୍ରସଙ୍ଗର ଏକଶେ ଏକଚାଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns loyalty versus ethical foresight: whether steadfast alignment with Duryodhana remains defensible when counsel predicts catastrophic loss and when participation would amplify harm despite the availability of reconsideration.

Symbolic legitimacy and moral momentum are presented as real forces in political life: signs, reputations, and alliances shape collective confidence, and ignoring such indicators is portrayed as both imprudent and ethically negligent.

Rather than an explicit phalāśruti, the chapter functions as consequential meta-commentary: it frames the discourse as predictive counsel whose comprehension is tied to recognizing how choices (policy and allegiance) generate outcomes (defeat, death, and posthumous destiny).