Adhyaya 129
Udyoga ParvaAdhyaya 12965 Verses

Adhyaya 129

उद्योगपर्व (अध्याय १२९) — केशवस्य वैभवप्रदर्शनम् / Krishna’s Theophanic Display in the Kuru Assembly

Upa-parva: Kṛṣṇa–Duryodhana Saṃvāda (Kuru-sabhā episode: Viśvarūpa-darśana and departure)

Vaiśaṃpāyana narrates that after Vidura’s remarks, Krishna addresses Duryodhana’s delusion that Krishna stands alone and can be forcibly taken. Krishna then manifests a formidable, cosmic form: divine beings and orders (Ādityas, Rudras, Vasus, Sādhyas, Aśvins, Maruts, Viśvedevas), along with yakṣa-gandharva-rākṣasa forms, appear as aspects within or around him. Brahmā is described at his forehead, Rudra at his chest, Lokapālas on his arms, and Agni from his mouth; luminous fire-like rays emerge from pores, eyes, and ears. Saṃkarṣaṇa (Balarāma) and Arjuna appear at his sides; Bhīma, Yudhiṣṭhira, and the Mādrī sons are positioned behind, with Andhakas and Vṛṣṇis led by Pradyumna. Krishna’s weapons are seen raised across many arms. Most kings, overwhelmed, close their eyes; Krishna grants divine sight to select witnesses (including Bhīṣma, Droṇa, Vidura, Saṃjaya, and ascetics) so the event can be apprehended. Celestial drums sound, flowers fall, and the earth and ocean are said to tremble, emphasizing the disclosure’s cosmic register. Krishna then withdraws the manifestation, departs with Sātyaki and Kṛtavarmā with sages’ permission, and is followed by prominent Kuru figures. Dhṛtarāṣṭra addresses Krishna, presenting himself as seeking peace and urging Krishna not to suspect him, while Krishna notes that the assembly has directly witnessed the destabilizing conduct. The chapter concludes with Krishna leaving in a resplendent chariot to meet Pṛthā (Kuntī).

Chapter Arc: सभा से निकलते ही दुर्योधन अपने भीतर की घबराहट को षड्यन्त्र का कवच पहनाता है—और शकुनि के साथ गुप्त मन्त्रणा आरम्भ करता है कि कृष्ण को कैसे ‘शीघ्र’ और ‘चतुराई’ से वश में किया जाए। → दुर्योधन, कर्ण, शकुनि और दुःशासन—चारों एक ही धुरी पर घूमते हैं: कृष्ण को पकड़कर पाण्डवों का मनोबल तोड़ देना, उन्हें ‘भग्नदंष्ट’ सर्पों-सा निरुत्साह कर देना। सभा के भीतर यह योजना धीरे-धीरे हवा पकड़ती है; धृतराष्ट्र के सामने भी संकेत उभरते हैं कि क्रोध और लोभ नीति का मुखौटा बन रहे हैं। → सात्यकि द्वारा षड्यन्त्र का भंडाफोड़ होते ही सभा का छद्म टूटता है; और श्रीकृष्ण सिंहगर्जना के साथ अपने तेज से कौरव-सभा को चेतावनी देते हैं—यह बताकर कि अधर्म की चालें धर्म के प्रकाश में टिक नहीं सकतीं। → विदुर दूरदर्शी वाणी में धृतराष्ट्र को स्पष्ट कहते हैं कि यह कर्म अशक्य और अयशस्कर है—सभा जिस दिशा में जा रही है, वह विनाश की ओर है। कृष्ण भी यह संकेत देते हैं कि वे क्रोधज, पापबुद्धिजन्य निन्दित कर्म का आरम्भ धृतराष्ट्र के सान्निध्य में नहीं करेंगे—पर अधर्म को सहना भी नहीं है। → षड्यन्त्र उजागर हो चुका है, पर दुर्योधन का हठ शान्त नहीं—सभा अब निर्णय के मुहाने पर खड़ी है: समझौता या युद्ध।

Shlokas

Verse 1

ऑपन-माज बछ। असि-छऋाल जा त्रेशर्दाधिकशततमो<्ध्याय: दुर्योधनके षड्यन्त्रका सात्यकिद्वारा भंडाफोड़, श्रीकृष्णकी सिंहगर्जना तथा धृतराष्ट्र और विदुरका दुर्योधनको पुन: समझाना वैशम्पायन उवाच तत्‌ तु वाक्यमनादृत्य सो<र्थवन्मातृभाषितम्‌ । पुन: प्रतस्थे संरम्भात्‌ सकाशमकृतात्मनाम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! माताके कहे हुए उस नीतियुक्त वचनका अनादर करके दुर्योधन पुनः क्रोधपूर्वक वहाँसे उठकर उन्हीं अजितात्मा मन्त्रियोंक पास चला गया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ମାତାଙ୍କର କହିଥିବା ଅର୍ଥବତୀ ନୀତିଯୁକ୍ତ ବଚନକୁ ଅବହେଳା କରି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କ୍ରୋଧରେ ପୁନଃ ଉଠି ଆତ୍ମସଂଯମହୀନ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲା।

Verse 2

ततः सभाया निर्गम्य मन्त्रयामास कौरव: । सौबलेन मताक्षेण राज्ञा शकुनिना सह,तत्पश्चात्‌ सभाभवनसे निकलकर दुर्योधनने द्यूतविद्याके जानकार सुबलपुत्र राजा शकुनिके साथ गुप्तरूपसे मन्त्रणा की

ତାପରେ କୌରବ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ସଭାଗୃହରୁ ବାହାରି ଦ୍ୟୂତବିଦ୍ୟାରେ ପାରଙ୍ଗତ ସୁବଳପୁତ୍ର ରାଜା ଶକୁନି ସହ ଗୁପ୍ତ ମନ୍ତ୍ରଣା କଲା।

Verse 3

दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुने: सौबलस्य च । दुःशासनचतुर्थानामिदमासीद्‌ विचेष्टितम्‌,उस समय दुर्योधन, कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि तथा दुःशासन--इन चारोंका निश्चय इस प्रकार हुआ

ସେ ସମୟରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, କର୍ଣ୍ଣ, ସୁବଳପୁତ୍ର ଶକୁନି ଏବଂ ଦୁଃଶାସନ—ଏହି ଚାରିଜଣଙ୍କର ନିଷ୍ପତ୍ତି ଏହିପରି ହେଲା।

Verse 4

पुरायमस्मान्‌ गृलह्नाति क्षिप्रकारी जनार्दन: । सहितो धृतराष्ट्रेण राज्ञा शान्तनवेन च,वे परस्पर कहने लगे--'शीघ्रतापूर्वक प्रत्येक कार्य करनेवाले श्रीकृष्ण राजा धृतराष्ट्र और भीष्मके साथ मिलकर जबतक हमें कैद करें, उसके पहले हमलोग ही बलपूर्वक इन पुरुषसिंह हृषीकेशको बन्दी बना लें। ठीक उसी तरह, जैसे इन्द्रने विरोचनपुत्र बलिको बाँध लिया था

ସେମାନେ କହିଲେ—“ଏହି ଶୀଘ୍ରକାରୀ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଓ ଶାନ୍ତନବ (ଭୀଷ୍ମ) ସହ ମିଶି ଶୀଘ୍ରେ ଆମକୁ ଧରିବ।”

Verse 5

वयमेव हृषीकेशं निगृह्लीम बलादिव । प्रसहा पुरुषव्याप्रमिन्द्रो वैरोचनिं यथा,वे परस्पर कहने लगे--'शीघ्रतापूर्वक प्रत्येक कार्य करनेवाले श्रीकृष्ण राजा धृतराष्ट्र और भीष्मके साथ मिलकर जबतक हमें कैद करें, उसके पहले हमलोग ही बलपूर्वक इन पुरुषसिंह हृषीकेशको बन्दी बना लें। ठीक उसी तरह, जैसे इन्द्रने विरोचनपुत्र बलिको बाँध लिया था

ସେମାନେ କହିଲେ—“ତେଣୁ ସେ ଆମକୁ ବନ୍ଦୀ କରିବା ପୂର୍ବରୁ, ଆମେ ନିଜେ ବଳପୂର୍ବକ ପୁରୁଷବ୍ୟାଘ୍ର ହୃଷୀକେଶଙ୍କୁ ଧରି ବନ୍ଦୀ କରିଦେବା—ଯେପରି ଇନ୍ଦ୍ର ବିରୋଚନପୁତ୍ର ବଳିକୁ ବାନ୍ଧିଥିଲେ।”

Verse 6

श्र॒त्वा गृहीतं वाष्णेयं पाण्डवा हतचेतस: । निरुत्साहा भविष्यन्ति भग्नदंष्टा इवोरगा:

ବାଷ୍ଣେୟ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ଧରାପଡ଼ିଛନ୍ତି ବୋଲି ଶୁଣି ପାଣ୍ଡବମାନେ ମନୋଭଙ୍ଗ ହେବେ; ଭଙ୍ଗା ଦଂଷ୍ଟା ଥିବା ସର୍ପମାନଙ୍କ ପରି ନିରୁତ୍ସାହ ହେବେ।

Verse 7

'श्रीकृष्णको कैद हुआ सुनकर पाण्डव दाँत तोड़े हुए सर्पोोके समान अचेत और हतोत्साह हो जायँगे ।। अयं ह्वोषां महाबाहु: सर्वेषां शर्म वर्म च | अस्मिन्‌ गृहीते वरदे ऋषभे सर्वसात्वताम्‌

ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ବନ୍ଦୀ ହୋଇଛନ୍ତି ବୋଲି ଶୁଣି ପାଣ୍ଡବମାନେ ଭଙ୍ଗା ଦଂଷ୍ଟା ଥିବା ସର୍ପ ପରି ସ୍ତବ୍ଧ, ଅସହାୟ ଓ ହତୋତ୍ସାହ ହେବେ। କାରଣ ସେଇ ମହାବାହୁ ତାଙ୍କର ଶରଣ ମଧ୍ୟ, କବଚ ମଧ୍ୟ—ସମସ୍ତଙ୍କ ନିରାପତ୍ତାର ମୂଳ। ସାତ୍ୱତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ବରଦ, ବୃଷଭସମ ତାଙ୍କୁ ଧରାଗଲେ, ତାଙ୍କର ଭରସା ଓ ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ଭାଙ୍ଗିପଡ଼ିବ।

Verse 8

तस्माद्‌ वयमिहैवैनं केशवं क्षिप्रकारिणम्‌,क्रोशतो धृतराष्ट्रस्य बद्ध्वा योत्स्यामहे रिपून्‌ । “इसलिये हम यहीं शीघ्रतापूर्वक कार्य करनेवाले केशवको राजा धृतराष्ट्रके चीखने- चिल्लानेपर भी कैद करके शत्रुओंके साथ युद्ध करें"

ତେଣୁ ଆମେ ଏଠାରେଇ ଶୀଘ୍ରକାରୀ କେଶବଙ୍କୁ ଧରିବୁ; ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଚିତ୍କାର କଲେ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କୁ ବାନ୍ଧି ତାପରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବୁ।

Verse 9

।। तेषां पापमभिप्रायं पापानां दुष्टचेतसाम्‌

ତେବେ ମୁଁ ସେହି ପାପୀ, ଦୁଷ୍ଟଚେତା ଲୋକମାନଙ୍କର ପାପମୟ ଅଭିପ୍ରାୟକୁ ଅନୁଭବ କଲି।

Verse 10

तदर्थमभिनिष्क्रम्य हार्दिक्येन सहास्थित:,फिर उसके प्रतीकारके लिये वे सभासे बाहर निकलकर कृतवर्मासे मिले और इस प्रकार बोले--“तुम शीघ्र ही अपनी सेनाको तैयार कर लो और स्वयं भी कवच धारण करके व्यूहाकार खड़ी हुई सेनाके साथ सभाभवनके द्वारपर डटे रहो

ସେହି କାର୍ଯ୍ୟ ପାଇଁ ସେ ସଭାରୁ ବାହାରି ହାର୍ଦ୍ଦିକ୍ୟ (କୃତବର୍ମା) ସହ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହୋଇ କହିଲା—“ତୁମ ସେନାକୁ ଶୀଘ୍ର ପ୍ରସ୍ତୁତ କର; ନିଜେ ମଧ୍ୟ କବଚ ଧାରଣ କର; ଏବଂ ବ୍ୟୂହବଦ୍ଧ ସେନା ସହ ସଭାଭବନର ଦ୍ୱାରେ ଦୃଢ଼ ଭାବେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ରୁହ।”

Verse 11

अब्रवीत्‌ कृतवर्माणि क्षिप्रं योजय वाहिनीम्‌ । व्यूढानीक: सभाद्वारमुपतिष्ठस्व दंशित:,फिर उसके प्रतीकारके लिये वे सभासे बाहर निकलकर कृतवर्मासे मिले और इस प्रकार बोले--“तुम शीघ्र ही अपनी सेनाको तैयार कर लो और स्वयं भी कवच धारण करके व्यूहाकार खड़ी हुई सेनाके साथ सभाभवनके द्वारपर डटे रहो

ତେବେ ପ୍ରତିକାର ପାଇଁ ସେମାନେ ସଭାରୁ ବାହାରି କୃତବର୍ମାଙ୍କୁ ଭେଟି କହିଲେ—“ଶୀଘ୍ରେ ନିଜ ସେନାକୁ ସଜାଅ। ତୁମେ ନିଜେ କବଚ ଧାରଣ କରି, ବ୍ୟୂହବଦ୍ଧ ସେନା ସହିତ ସଭାଭବନର ଦ୍ୱାରେ ଦୃଢ଼ଭାବେ ଦଢ଼ି ରୁହ।”

Verse 12

यावदाख्याम्यहं चैतत्‌ कृष्णायाक्लिष्टकारिणे । “तबतक मैं अनायास ही महान्‌ कर्म करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्णको कौरवोंके षड़यन्त्रकी सूचना दिये देता हूँ।' स प्रविश्य सभां वीर: सिंहो गिरिगुहामिव

“ଏହି ସବୁ କଥା କହି ସରିବା ପୂର୍ବରୁ ମୁଁ ଅନାୟାସେ ମହତ୍ କର୍ମ ସାଧନକାରୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ କୌରବମାନଙ୍କ ଷଡଯନ୍ତ୍ରର ସୂଚନା ଦେଇଦେବି।” ଏମିତି ନିଶ୍ଚୟ କରି ସେ ବୀର ସଭାକୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ—ଯେପରି ସିଂହ ପର୍ବତଗୁହାକୁ ପ୍ରବେଶ କରେ।

Verse 13

आचरष्ट तमभिप्रायं केशवाय महात्मने । धृतराष्ट्र ततश्वैव विदुरं चान्वभाषत

ଏଭଳି ମହାତ୍ମା କେଶବଙ୍କ ପ୍ରତି ନିଜ ନିଶ୍ଚୟକୁ କାର୍ଯ୍ୟରୂପ କରି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ପରେ ବିଦୁରଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସମ୍ବୋଧନ କଲେ।

Verse 14

ऐसा कहकर वीर सात्यकिने सभामें प्रवेश किया, मानो सिंह पर्वतकी कन्दरामें घुस रहा हो। वहाँ जाकर उन्होंने महात्मा केशवसे कौरवोंका अभिप्राय बताया। फिर धृतराष्टर और विदुरको भी इसकी सूचना दी ।। तेषामेतमभिप्रायमाचचक्षे स्मयन्निव | धर्मादर्थाच्च कामाच्च कर्म साधुविगर्हितम्‌

ସେ ମାନୋ ହାଲୁକା, ଅର୍ଥଗର୍ଭ ହସ ସହିତ ସେମାନଙ୍କୁ ସେଇ ଅଭିପ୍ରାୟ କହିଦେଲେ—ଯେଉଁ କର୍ମକୁ ସଜ୍ଜନମାନେ ନିନ୍ଦା କରନ୍ତି; ଯାହା ଧର୍ମ, ଅର୍ଥ ଓ କାମ—ତିନିଠାରୁ ମଧ୍ୟ ବିଚ୍ୟୁତ ଥିଲା।

Verse 15

पुरा विकुर्वते मूढा: पापात्मान: समागता:

ପୂର୍ବେ ପାପାତ୍ମା, ମୋହଗ୍ରସ୍ତ ଲୋକମାନେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ବିକୃତ ଭାବେ କର୍ମ କରିବାକୁ ଲାଗିଥିଲେ।

Verse 16

इमं हि पुण्डरीकाक्षं जिघृक्षन्त्यल्पचेतस:

ଏହି ଅଳ୍ପବୁଦ୍ଧି ଲୋକମାନେ ଏହି ପୁଣ୍ଡରୀକାକ୍ଷଙ୍କୁ ଧରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରୁଛନ୍ତି; ଏହା ତାଙ୍କର ମୂଢତା, କାରଣ ତାଙ୍କର ସତ୍ୟ ମହିମା ଓ ଏପରି ଆକ୍ରମଣର ଘୋର ଅଧର୍ମ-ଭୟକୁ ସେମାନେ ବୁଝୁନାହାନ୍ତି।

Verse 17

सात्यकेस्तद्‌ वच: श्रुत्वा विदुरो दीर्घदर्शिवान्‌,अशक्यमयशस्यं च कर्तु कर्म समुद्यता: । सात्यकिका यह वचन सुनकर दूरदर्शी विदुरने कौरवसभामें महाबाहु धृतराष्ट्रसे कहा --'परंतप नरेश! जान पड़ता है, आपके सभी पुत्र सर्वथा कालके अधीन हो गये हैं। इसीलिये वे यह अकीर्तिकारक और असम्भव कर्म करनेको उतारू हुए हैं

ସାତ୍ୟକିଙ୍କ ଉକ୍ତି ଶୁଣି ଦୀର୍ଘଦର୍ଶୀ ବିଦୁର କହିଲେ—କୌରବମାନେ ଏମିତି କର୍ମକୁ ଉଦ୍ୟତ, ଯାହା ସିଦ୍ଧ ହେବା ଅଶକ୍ୟ ଏବଂ ନିଶ୍ଚୟ ଅପଯଶ ଆଣିବ; ଯେତେବେଳେ ବୁଦ୍ଧି ଭାଗ୍ୟ, କ୍ରୋଧ ଓ ମୋହର ବଶ ହୁଏ, ସେତେବେଳେ ମନୁଷ୍ୟ ଧର୍ମବିରୋଧୀ କାର୍ଯ୍ୟ ବାଛେ ଏବଂ ସଫଳତା ନୁହେଁ—କେବଳ କୀର୍ତ୍ତିନାଶ ପାଏ।

Verse 18

धृतराष्ट्र महाबाहुमब्रवीत्‌ कुरुसंसदि । राजन्‌ परीतकालास्ते पुत्रा: सर्वे परंतप

କୁରୁସଭାରେ ସେ ମହାବାହୁ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ କହିଲେ—“ରାଜନ୍, କାଳ ତୁମ ପ୍ରତିକୂଳ ହୋଇଛି; ପରନ୍ତପ, ତୁମ ସମସ୍ତ ପୁତ୍ର ନିଜ ନିୟତ ଅନ୍ତର ସୀମାରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ।”

Verse 19

इमं हि पुण्डरीकाक्षमभिभूय प्रसहु च

କାରଣ ଏହି ପୁଣ୍ଡରୀକାକ୍ଷଙ୍କୁ ବଳପୂର୍ବକ ଦମନ କରି—ଜବରଦସ୍ତିରେ—ସେମାନେ ଏପରି କରିବାକୁ ଯାଉଛନ୍ତି; ଏଠାରେ ଧର୍ମସମ୍ମତ ପରାମର୍ଶ ନୁହେଁ, ଦମନକାରୀ ବଳର ଆଗ୍ରହ ଦେଖାଯାଏ।

Verse 20

निग्रहीतुं किलेच्छन्ति सहिता वासवानुजम्‌ | इमं पुरुषशार्दूलमप्रधृष्यं दुरासदम्‌

ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ବାସବାନୁଜଙ୍କୁ—ଏହି ପୁରୁଷଶାର୍ଦୂଳଙ୍କୁ, ଯିଏ ଅପରାଜେୟ ଓ ଯାହାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯିବା ଦୁରାସଦ—ନିଗ୍ରହ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛନ୍ତି।

Verse 21

आसाद्य न भविष्यन्ति पतड़ा इव पावकम्‌ | 'सुननेमें आया है कि वे सब संगठित होकर इन पुरुषसिंह कमलनयन श्रीकृष्णको तिरस्कृत करके हठपूर्वक कैद करना चाहते हैं। ये भगवान्‌ कृष्ण इन्द्रके छोटे भाई और दुर्धर्ष वीर हैं। इन्हें कोई भी पकड़ नहीं सकता। इनके पास आकर सभी विरोधी जलती आगमें गिरनेवाले फतिंगोंके समान नष्ट हो जायँगे ।। १९-२० है ।। अयमिच्छन्‌ हि तान्‌ सर्वान्‌ युध्यमानाज्जनार्दन:

ତାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ସେମାନେ ଟିକିପାରିବେ ନାହିଁ—ଯେପରି ପତଙ୍ଗ ଜ୍ୱଳନ୍ତ ଅଗ୍ନିରେ ପଡ଼ି ନଷ୍ଟ ହୁଏ। ଯୁଦ୍ଧରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସମ୍ମୁଖୀନ କରିପାରନ୍ତି; ହଠ ଓ ଅବମାନନାରେ ତାଙ୍କୁ ଧରିବାକୁ ଯାହା ଚେଷ୍ଟା କରିବେ, ସେମାନେ ନିଜ ନାଶକୁ ଶୀଘ୍ର ଡାକିବେ।

Verse 22

न त्वयं निन्दितं कर्म कुर्यात्‌ पापं कथंचन

ତୁମେ କେବେ ମଧ୍ୟ କୌଣସି ପରିସ୍ଥିତିରେ ନିନ୍ଦିତ କର୍ମ—କୌଣସି ପାପ—କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।

Verse 23

(यथा वाराणसी दग्धा साश्वा सरथकुंजरा । सानुबन्धस्तु कृष्णेन काशीनामृषभो हतः ।। तथा नागपुरं दग्ध्वा शड्खचक्रगदाधर: । स्वयं कालेश्वरो भूत्वा नाशयिष्यति कौरवान्‌ ।। श्रीकृष्णने जिस प्रकार घोड़े, रथ और हाथियोंसहित वाराणसी नगरी जला दी और काशिराजको उनके सगे-सम्बन्धियोंसहित मार डाला, उसी प्रकार ये शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्ण स्वयं कालेश्वर होकर हस्तिनापुरको दग्ध करके कौरवोंका नाश कर डालेंगे। पारिजातहरं होनमेक॑ यदुसुखावहम्‌ । नाभ्यवर्तत संरब्धो वृत्रहा वसुभि: सह ।। “यदुकुलको सुख पहुँचानेवाले श्रीकृष्ण जब अकेले पारिजातका अपहरण करने लगे, उस समय अत्यन्त कोपमें भरे हुए इन्द्रने इनके ऊपर वसुओंके साथ आक्रमण किया। परंतु वे भी इन्हें पराजित न कर सके। प्राप्प निर्मोचने पाशान्‌ षट्‌ सहस्रांस्तरस्विन: । हृतास्ते वासुदेवेन हुपसंक्रम्य मौरवान्‌ ।। “निर्मोचन नामक स्थानमें मुर दैत्यने छ: हजार शक्तिशाली पाश लगा रखे थे, जिन्हें इन वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने निकट जाकर काट डाला। द्वारमासाद्य सौभस्य विधूय गदया गिरिम्‌ । द्युमत्सेन: सहामात्य: कृष्णेन विनिपातित: ।। “इन्हीं श्रीकृष्णने सौभके द्वारपर पहुँचकर अपनी गदासे पर्वतको विदीर्ण करते हुए मन्त्रियोंसहित द्युमत्सेनको मार गिराया था। शेषवत्त्वात्‌ कुरूणां तु धमपिक्षी तथाच्युत: । क्षमते पुण्डरीकाक्ष: शक्त: सन्‌ पापकर्मणाम्‌ ।। एते हि यदि गोविन्दमिच्छन्ति सह राजशि: । अद्यैवातिथय: सर्वे भविष्यन्ति यमस्य ते ।। “अभी कौरवोंकी आयु शेष है, इसीलिये सदा धर्मपर ही दृष्टि रखनेवाले कमलनयन भगवान्‌ श्रीकृष्ण इन पापाचारियोंको दण्ड देनेमें समर्थ होकर भी अभी क्षमा करते जा रहे हैं। यदि ये कौरव अपने सहयोगी राजाओंके साथ गोविन्दको बन्दी बनाना चाहते हैं तो सब- के-सब आज ही यमराजके अतिथि हो जायँगे। यथा वायोस्तृणाग्राणि वशं यान्ति बलीयस: । तथा चक्रभृतः सर्वे वशमेष्यन्ति कौरवा: ।। ) 'जैसे तिनकोंके अग्रभाग सदा महाबलवान्‌ वायुके वशमें होते हैं, उसी प्रकार समस्त कौरव चक्रधारी श्रीकृष्णके अधीन हो जायाँगे'। विदुरेणैवमुक्ते तु केशवो वाक्यमब्रवीत्‌

ଯେପରି ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଘୋଡ଼ା, ରଥ ଓ ହାତୀ ସହିତ ବାରାଣସୀ ନଗରୀକୁ ଦଗ୍ଧ କରି, କାଶୀର ବୃଷଭସମ ରାଜାକୁ ତାଙ୍କ ଆତ୍ମୀୟ-ବନ୍ଧୁ ସହିତ ସଂହାର କରିଥିଲେ, ସେପରି ଶଂଖ-ଚକ୍ର-ଗଦାଧାରୀ ସେଇ ଭଗବାନ୍ ସ୍ୱୟଂ କାଲେଶ୍ୱର ହୋଇ ନାଗପୁର (ହସ୍ତିନାପୁର)କୁ ଦଗ୍ଧ କରି କୌରବମାନଙ୍କୁ ନାଶ କରିଦେବେ।

Verse 24

धृतराष्ट्रमभिप्रेक्ष्य सुह्दां शृण्वतां मिथ: । राजन्नेते यदि क्ुद्धा मां निगृह्लीयुरोजसा

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ଦେଖି, ସୁହୃଦମାନେ ପରସ୍ପର ଶୁଣୁଥିବାବେଳେ ସେ କହିଲେ—“ରାଜନ୍, ଯଦି ଏମାନେ କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ ବଳପୂର୍ବକ ମୋତେ ଧରି ରୋକିବାକୁ ଚାହାନ୍ତି…”

Verse 25

एते वा मामहं वैनाननुजानीहि पार्थिव । विदुरके ऐसा कहनेपर भगवान्‌ केशवने समस्त सुहृदोंके सुनते हुए राजा धुृतराष्ट्रकी ओर देखकर कहा--'राजन! ये दुष्ट कौरव यदि कुपित होकर मुझे बलपूर्वक पकड़ सकते हों तो आप इन्हें आज्ञा दे दीजिये। फिर देखिये, ये मुझे पकड़ पाते हैं या मैं इन्हें बन्दी बनाता हूँ || २३-२४ ह || एतान्‌ हि सर्वान्‌ संरब्धान्‌ नियन्तुमहमुत्सहे

“ପାର୍ଥିବ! ଯଦି ଏମାନେ ମୋତେ ଧରିପାରିବେ ବୋଲି ଭାବୁଛନ୍ତି, ତେବେ ଆପଣ ଏମାନଙ୍କୁ ଅନୁମତି ଦିଅନ୍ତୁ। କାରଣ କ୍ରୋଧରେ ଉତ୍ତେଜିତ ଏ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରିବାକୁ ମୁଁ ସମର୍ଥ।”

Verse 26

न त्वहं निन्दितं कर्म कुर्या पापं कथंचन । यद्यपि क्रोधमें भरे हुए इन समस्त कौरवोंको मैं बाँध लेनेकी शक्ति रखता हूँ, तथापि मैं किसी प्रकार भी कोई निन्दित कर्म अथवा पाप नहीं कर सकता ।। पाण्डवार्थ हि लुभ्यन्तः स्वार्थान्‌ हास्यन्ति ते सुता:

ମୁଁ କେବେ ନିନ୍ଦିତ କର୍ମ କରିବି ନାହିଁ, କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ପାପ କରିବି ନାହିଁ। କ୍ରୋଧରେ ଫୁଲିଉଠିଥିବା ଏହି ସମସ୍ତ କୌରବଙ୍କୁ ବାନ୍ଧି ରଖିବାର ଶକ୍ତି ମୋ ପାଖରେ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ମୁଁ କୌଣସି ନିନ୍ଦନୀୟ କିମ୍ବା ପାପମୟ କାର୍ଯ୍ୟ କରିପାରିବି ନାହିଁ। କାରଣ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଅଧିକାରକୁ ଲୋଭ କରି ସେହି ପୁତ୍ରମାନେ ନିଜ ନିଜ ସତ୍ୟ ହିତକୁ ହାରାଇବେ।

Verse 27

अद्यैव हाहमेनांश्व ये चैनाननु भारत

ଆଜିହିଁ—ହାୟ!—ଏହି ଦୁଇଜଣ ଓ ଯେମାନେ ଏମାନଙ୍କୁ ଅନୁସରଣ କରନ୍ତି, ହେ ଭାରତ…।

Verse 28

इदं तु न प्रवर्तेयं निन्दितं कर्म भारत

କିନ୍ତୁ, ହେ ଭାରତ, ମୁଁ ଏହାକୁ ଆରମ୍ଭ କରିବି ନାହିଁ; ଏହି କର୍ମ ନିନ୍ଦିତ ଓ ଦୋଷପୂର୍ଣ୍ଣ।

Verse 29

एष दुर्योधनो राजन्‌ यथेच्छति तथास्तु तत्‌

ହେ ରାଜନ, ଏହି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ; ସେ ଯେପରି ଇଚ୍ଛା କରେ ସେପରି ହେଉ।

Verse 30

अहं तु सर्वास्तनयाननुजानामि ते नृप । “नरेश्वर! यह दुर्योधन जैसा चाहता है, वैसा ही हो। मैं आपके सभी पुत्रोंको इसके लिये आज्ञा देता हूँ ।। एतच्छुत्वा तु विदुरं धृतराष्ट्रो3भ्यभाषत । क्षिप्रमानय तं पापं राज्यलुब्धं सुयोधनम्‌,यह सुनकर धृतराष्ट्रने विदुरसे कहा--“तुम उस पापात्मा राज्यलोभी दुर्योधनको उसके मित्रों, मन्त्रियों, भाइयों तथा अनुगामी सेवकोंसहित शीघ्र मेरे पास बुला लाओ। यदि पुनः उसे सन्मार्गपर उतार सकूँ तो अच्छा होगा”

ହେ ନୃପ, ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ସମସ୍ତ ପୁତ୍ରଙ୍କୁ ଏହା ପାଇଁ ଅନୁମତି ଦେଉଛି। ଏହା ଶୁଣି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ବିଦୁରଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଶୀଘ୍ର ସେହି ପାପୀ, ରାଜ୍ୟଲୋଭୀ ସୁୟୋଧନକୁ ଏଠାକୁ ଆଣ; ତାଙ୍କର ମିତ୍ର, ମନ୍ତ୍ରୀ, ଭାଇ ଓ ଅନୁଗାମୀ ସେବକମାନଙ୍କ ସହିତ। ଯଦି ମୁଁ ତାକୁ ପୁଣି ସନ୍ମାର୍ଗରେ ଫେରାଇ ପାରିବି, ତେବେ ତାହା ମଙ୍ଗଳ।”

Verse 31

सहमित्र॑ सहामात्यं ससोदर्य सहानुगम्‌ | शकनुयां यदि पन्‍्थानमवतारयितुं पुन:,यह सुनकर धृतराष्ट्रने विदुरसे कहा--“तुम उस पापात्मा राज्यलोभी दुर्योधनको उसके मित्रों, मन्त्रियों, भाइयों तथा अनुगामी सेवकोंसहित शीघ्र मेरे पास बुला लाओ। यदि पुनः उसे सन्मार्गपर उतार सकूँ तो अच्छा होगा”

ଏହା ଶୁଣି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ବିଦୁରଙ୍କୁ କହିଲେ—“ସେଇ ପାପାତ୍ମା ରାଜ୍ୟଲୋଭୀ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ତାହାର ମିତ୍ର, ମନ୍ତ୍ରୀ, ଭାଇ ଓ ସମସ୍ତ ଅନୁଗାମୀ ସହିତ ଶୀଘ୍ରେ ମୋ ପାଖକୁ ଆଣ। ଯଦି ମୁଁ ତାକୁ ପୁନର୍ବାର ସନ୍ମାର୍ଗରେ ଆଣିପାରିବି, ତେବେ ସେଇ ଶ୍ରେୟ।”

Verse 32

ततो दुर्योधन क्षत्ता पुनः प्रावेशयत्‌ सभाम्‌ | अकामं भ्रातृभि: सार्थ राजभि: परिवारितम्‌,तब विदुरजी राजाओंसे घिरे हुए दुर्योधनको उसकी इच्छा न होते हुए भी भाइयोंसहित पुनः सभामें ले आये

ତାପରେ କ୍ଷତ୍ତା ବିଦୁର ରାଜମାନଙ୍କ ଘେରାଉ ମଧ୍ୟରେ ଥିବା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ—ତାହାର ଇଚ୍ଛା ନଥିଲେ ମଧ୍ୟ—ଭାଇମାନଙ୍କ ସହିତ ପୁନର୍ବାର ସଭାକୁ ପ୍ରବେଶ କରାଇଲେ।

Verse 33

अथ दुर्योधन राजा धृतराष्ट्रो5भ्यभाषत । कर्णदु:शासनाभ्यां च राजभिश्चापि संवृतम्‌,उस समय कर्ण, दुःशासन तथा अन्य राजाओंसे भी घिरे हुए दुर्योधनसे राजा धृतराष्ट्रने कहा--

ତେବେ କର୍ଣ୍ଣ, ଦୁଃଶାସନ ଓ ଅନ୍ୟ ରାଜମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଘେରାଯାଇଥିବା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ସମ୍ବୋଧନ କଲେ।

Verse 34

नृशंस पापभूयिष्ठ क्षुद्रकर्मसहायवान्‌ । पापै: सहाये: संहत्य पाप॑ कर्म चिकीर्षसि,“नृशंस महापापी! नीच कर्म करनेवाले ही तेरे सहायक हैं। तू उन पापी सहायकोंसे मिलकर पापकर्म ही करना चाहता है

“ହେ ନୃଶଂସ, ପାପରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ! ନୀଚ କର୍ମ କରୁଥିବାମାନେ ହିଁ ତୋର ସହାୟ। ସେହି ପାପୀ ସହାୟମାନଙ୍କ ସହ ଏକତ୍ର ହୋଇ ତୁ ପାପକର୍ମ କରିବାକୁ ହିଁ ଚାହୁଁଛୁ।”

Verse 35

अशक्यमयशस्यं च सद्धिश्वापि विगर्हितम्‌ | यथा त्वादृशको मूढो व्यवस्थेत्‌ कुलपांसन:,“वह कर्म ऐसा है, जिसकी साधु पुरुषोंने सदा निन्‍्दा की है। वह अपयशकारक तो है ही, तू उसे कर भी नहीं सकता; परंतु तेरे-जैसा कुलांगार और मूर्ख मनुष्य उसे करनेकी चेष्टा करता है

“ସେ କର୍ମ ଅଶକ୍ୟ, ଅପଯଶକର, ଏବଂ ସଜ୍ଜନମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ମଧ୍ୟ ନିନ୍ଦିତ; ତଥାପି ତୋ ପରି କୁଳପାଂସନ, ମୂଢ ଲୋକ ତାହା କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରୁଛୁ।”

Verse 36

त्वमिमं पुण्डरीकाक्षमप्रधृष्यं दुरासदम्‌ । पापै: सहायै: संहत्य निग्रहीतुं किलेच्छसि,'सुनता हूँ, तू अपने पापी सहायकोंसे मिलकर इन दुर्धर्ष एवं दुर्जय वीर कमलनयन श्रीकृष्णको कैद करना चाहता है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଶୁଣୁଛି; ତୁମେ ପାପୀ ସହାୟମାନଙ୍କ ସହ ଏକତ୍ର ହୋଇ ଏହି ପଦ୍ମନୟନ, ଅପ୍ରଧର୍ଷ୍ୟ ଓ ଦୁରାସଦ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଧରି ନିଗ୍ରହ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ।

Verse 37

यो न शक्यो बलात्‌ कर्तु देवैरपि सवासवै: । त॑ त्वं प्रार्थयसे मन्द बालबश्रन्द्रमसं यथा,'ओ मूढ़! इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी जिन्हें बलपूर्वक अपने वशमें नहीं कर सकते, उन्हींको तू बंदी बनाना चाहता है। तेरी यह चेष्टा वैसी ही है, जैसे कोई बालक चन्द्रमाको पकड़ना चाहता हो

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ମୂଢ! ଇନ୍ଦ୍ରସହିତ ଦେବମାନେ ମଧ୍ୟ ଯାହାକୁ ବଳପୂର୍ବକ ବଶ କରିପାରନ୍ତି ନାହିଁ, ସେହି ଜଣକୁ ତୁମେ ବାନ୍ଧିବାକୁ ଚାହୁଁଛ। ତୁମ ଚେଷ୍ଟା ଶିଶୁ ଚନ୍ଦ୍ରକୁ ଧରିବା ପରି।

Verse 38

देवैर्मनुष्यैर्गन्धर्वैरसुरैरुरगैश्व यः । न सोढुं समरे शक्‍्यस्तं न बुद्धयसि केशवम्‌,“देवता, मनुष्य, गन्धर्व, असुर और नाग भी संग्रामभूमिमें जिनका वेग नहीं सह सकते, उन भगवान्‌ श्रीकृष्णको तू नहीं जानता

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଦେବ, ମନୁଷ୍ୟ, ଗନ୍ଧର୍ବ, ଅସୁର ଓ ନାଗମାନେ ମଧ୍ୟ ଯୁଦ୍ଧରେ ଯାହାଙ୍କ ବେଗ ସହିପାରନ୍ତି ନାହିଁ, ସେହି କେଶବଙ୍କୁ ତୁମେ ଜାଣ ନାହଁ।

Verse 39

दुर्ग्राह्माः पाणिना वायुर्दुःस्पर्श: पाणिना शशी । दुर्धरा पृथिवी मूर्ध्ना दु्ग्राह्मू: केशवो बलात्‌,“जैसे वायुको हाथसे पकड़ना दुष्कर है, चन्द्रमाको हाथसे छूना कठिन है और पृथ्वीको सिरपर धारण करना असम्भव है, उसी प्रकार भगवान्‌ श्रीकृष्णको बलपूर्वक पकड़ना दुष्कर है”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହାତରେ ବାୟୁକୁ ଧରିବା ଦୁର୍ଗ୍ରାହ୍ୟ, ହାତରେ ଚନ୍ଦ୍ରକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରିବା ଦୁଷ୍ସ୍ପର୍ଶ୍ୟ, ମୁଣ୍ଡରେ ପୃଥିବୀକୁ ଧାରଣ କରିବା ଦୁର୍ଧର; ସେପରି ବଳପୂର୍ବକ କେଶବଙ୍କୁ ଧରିବା ଦୁଷ୍କର।

Verse 40

इत्युक्ते धृतराष्ट्रेण क्षत्तापि विदुरो5ब्रवीत्‌ । दुर्योधनमभिप्रेत्य धार्तराष्ट्रममर्षणम्‌

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଏପରି କହିବା ପରେ, କ୍ଷତ୍ତା ବିଦୁର ମଧ୍ୟ ଉତ୍ତର ଦେଲେ—ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ମନେ ରଖି, ସେହି ଅମର୍ଷଣ ଧାର୍ତ୍ତରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ କରି।

Verse 41

धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर विदुरने भी अमर्षमें भरे हुए धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके पास जाकर इस प्रकार कहा ।। विदुर उवाच दुर्योधन निबोधेदं वचन मम साम्प्रतम्‌ । सौभद्वारे दानवेन्द्रो द्विविदो नाम नामतः । शिलावर्षेण महता छादयामास केशवम्‌,विदुर बोले--दुर्योधन! इस समय मेरी बातपर ध्यान दो। सौभद्वारमें द्विविद नामसे प्रसिद्ध एक वानरोंका राजा रहता था, जिसने एक दिन पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा करके भगवान्‌ श्रीकृष्णको आच्छादित कर दिया

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଏପରି କହିବା ପରେ ବିଦୁର ମଧ୍ୟ କ୍ରୋଧରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ କହିଲେ— “ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ! ଏବେ ମୋ କଥା ଶୁଣ। ସୌଭଦ୍ୱାରରେ ଦ୍ୱିବିଦ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଜଣେ ଦାନବେନ୍ଦ୍ର ଥିଲା। ସେ ଏକଦିନ ଭାରୀ ପଥରବର୍ଷା କରି କେଶବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କୁ ଆଛାଦିତ କରିଦେଇଥିଲା।”

Verse 42

ग्रहीतुकामो विक्रम्य सर्वयत्नेन माधवम्‌ । ग्रहीतुं नाशकच्चैन त॑ त्वं प्रार्थथसे बलात्‌,वह पराक्रम करके सभी उपायोंसे श्रीकृष्णको पकड़ना चाहता था, परंतु इन्हें कभी पकड़ न सका। उन्हीं श्रीकृष्णको तुम बलपूर्वक अपने वशमें करना चाहते हो!

ସେ ପରାକ୍ରମ କରି ସମସ୍ତ ଉପାୟରେ ମାଧବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କୁ ଧରିବାକୁ ଚାହିଲା; କିନ୍ତୁ ଧରିପାରିଲା ନାହିଁ। ଏବେ ତୁମେ ସେଇ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ବଳପୂର୍ବକ ନିଜ ବଶରେ ଆଣିବାକୁ ଚାହୁଁଛ!

Verse 43

प्राग्ज्योतिषगतं शौरिं नरक: सह दानवै: । ग्रहीतुं नाशकत तत्र त॑ त्वं प्रार्थथसे बलात्‌,पहलेकी बात है, प्राग्ज्योतिषपुरमें गये हुए श्रीकृष्णको दानवोंसहित नरकासुरने भी वहाँ बन्दी बनानेकी चेष्टा की; परंतु वह भी वहाँ सफल न हो सका। उन्हींको तुम बलपूर्वक अपने वशमें करना चाहते हो

ପୂର୍ବେ ପ୍ରାଗ୍ଜ୍ୟୋତିଷପୁରକୁ ଯାଇଥିବା ଶୌରି (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କୁ ନରକାସୁର ଦାନବମାନଙ୍କ ସହିତ ଧରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କଲା; କିନ୍ତୁ ସେଠାରେ ମଧ୍ୟ ସଫଳ ହୋଇପାରିଲା ନାହିଁ। ଏବେ ତୁମେ ସେଇ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ବଳପୂର୍ବକ ନିଜ ବଶରେ ଆଣିବାକୁ ଚାହୁଁଛ!

Verse 44

अनेकयुगवर्षायुर्निहत्य नरक॑ मृथे । नीत्वा कन्‍्यासहसत्राणि उपयेमे यथाविधि

ଯୁଦ୍ଧରେ ଅନେକ ଯୁଗ ଓ ଅସଂଖ୍ୟ ବର୍ଷର ଆୟୁ ଥିବା ନରକକୁ ବଧ କରି, ସେ ହଜାର ହଜାର କନ୍ୟାଙ୍କୁ ସହ ନେଇ ଯାଇ, ବିଧିଅନୁସାରେ ସେମାନଙ୍କୁ ବିବାହ କଲେ।

Verse 45

अनेक युगों तथा असंख्य वर्षोकी आयुवाले नरकासुरको युद्धमें मारकर श्रीकृष्ण उसके यहाँसे सहस्रों राजकन्याओंको (उद्धार करके) ले गये और उन सबके साथ उन्होंने विधिपूर्वक विवाह किया ।। निर्मोचने षट्‌ सहस्रा: पाशैर्बद्धा महासुरा: । ग्रहीतुं नाशकंश्रैनं त॑ त्वं प्रार्थथसे बलात्‌

ସେମାନଙ୍କ ମୁକ୍ତି ସମୟରେ ପାଶରେ ବନ୍ଧା ଛଅ ହଜାର ମହାସୁର ଥିଲେ; ତଥାପି ସେମାନେ ତାଙ୍କୁ ଧରିପାରିଲେ ନାହିଁ। ଏବେ ତୁମେ ସେଇ ତାଙ୍କୁ ବଳପୂର୍ବକ ଧରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ!

Verse 46

निर्मोचनमें छः हजार बड़े-बड़े असुरोंको भगवानने पाशोंमें बाँध लिया। वे असुर भी जिन्हें बंदी न बना सके, उन्हींको तुम बलपूर्वक वशमें करना चाहते हो ।। अनेन हि हता बाल्ये पूतना शकुनी तथा । गोवर्धनो धारितश्ष गवार्थे भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! इन्होंने ही बाल्यावस्थामें बकी पूतनाका वध किया था और गौओंकी रक्षाके लिये अपने हाथपर गोवर्धन पर्वतको धारण किया था

ନିର୍ମୋଚନରେ ଭଗବାନ ଛଅ ହଜାର ମହାବଳୀ ଅସୁରଙ୍କୁ ପାଶରେ ବାନ୍ଧିଥିଲେ। ଯାହାକୁ କେହି ବନ୍ଦୀ କରିପାରିଲେ ନାହିଁ, ସେମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସେଇ ନିଜେ ବଳପୂର୍ବକ ବଶ କରିଥିଲେ—ଏବଂ ସେଇ ମହାପୁରୁଷଙ୍କୁ ତୁମେ ଏବେ କେବଳ ବଳରେ ବଶ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ। ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସେଇ ଶିଶୁବୟସରେ ପୂତନା ଓ ଶକଟାସୁରକୁ ବଧ କରିଥିଲେ; ଗୋରକ୍ଷା ପାଇଁ ଗୋବର୍ଧନ ପର୍ବତକୁ ହାତରେ ଉଠାଇ ଧାରଣ କରିଥିଲେ।

Verse 47

अरिष्टो धेनुकश्चैव चाणूरश्व महाबल: । अश्वराजश्न निहत: कंसश्चारिष्टमाचरन्‌,अरिष्टासुर, धेनुक, महाबली चाणूर, अश्वराज केशी और कंस भी लोकहितके विरुद्ध आचरण करनेपर श्रीकृष्णके ही हाथसे मारे गये थे

ଅରିଷ୍ଟାସୁର, ଧେନୁକ, ମହାବଳୀ ଚାଣୂର, ଅଶ୍ୱମୁଖ କେଶୀ ଏବଂ କଂସ—ଲୋକହିତର ବିରୋଧରେ ଓ ଅଧର୍ମାଚରଣ କରିଥିବାରୁ ଏ ସମସ୍ତେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ହାତରେ ହିଁ ନିହତ ହୋଇଥିଲେ।

Verse 48

जरासंधश्च वक्रश्न शिशुपालश्न वीर्यवान्‌ । बाणश्न निहतः संख्ये राजानश्न निषूदिता:,जरासंध, दंतवक्र, पराक्रमी शिशुपाल और बाणासुर भी इन्हींके हाथसे मारे गये हैं तथा अन्य बहुत-से राजाओंका भी इन्होंने ही संहार किया है

ଜରାସନ୍ଧ, ଦନ୍ତବକ୍ର, ପରାକ୍ରମୀ ଶିଶୁପାଳ ଓ ବାଣ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ ଯୁଦ୍ଧରେ ତାଙ୍କ ହାତରେ ନିହତ ହୋଇଥିଲେ; ଏବଂ ଅନ୍ୟ ଅନେକ ରାଜାଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସେଇ ନିଜେ ସଂହାର କରିଛନ୍ତି।

Verse 49

वरुणो निर्जितो राजा पावकश्नामितौजसा । पारिजातं च हरता जित: साक्षाच्छचीपति:,अमित तेजस्वी श्रीकृष्णने राजा वरुणपर विजय पायी है। इन्होंने अग्निदेवको भी पराजित किया है और पारिजातहरण करते समय साक्षात्‌ शचीपति इन्द्रको भी जीता है

ଅମିତ ତେଜସ୍ବୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ରାଜା ବରୁଣଙ୍କୁ ଜୟ କରିଛନ୍ତି; ଅଗ୍ନିଦେବଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପରାଜିତ କରିଛନ୍ତି; ଏବଂ ପାରିଜାତ ବୃକ୍ଷ ହରଣ କରୁଥିବାବେଳେ ସାକ୍ଷାତ୍ ଶଚୀପତି ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଜିତିଛନ୍ତି।

Verse 50

एकार्णवे च स्वपता निहतौ मधुकैटभौ । जन्मान्तरमुपागम्य हयग्रीवस्तथा हत:

ଏକାର୍ଣ୍ଣବରେ ଯୋଗନିଦ୍ରାରେ ଶୟନ କରୁଥିବାବେଳେ ମଧୁ ଓ କୈଟଭ ନିହତ ହୋଇଥିଲେ; ଏବଂ ପରେ ଅନ୍ୟ ଜନ୍ମ ଧାରଣ କରି ହୟଗ୍ରୀବ ମଧ୍ୟ ସେହିପରି ହତ ହେଲା।

Verse 51

इन्होंने एकार्णवके जलमें सोते समय मधु और कैटभ नामक दैत्योंको मारा था और दूसरा शरीर धारण करके हयग्रीव नामक राक्षसका भी इन्होंने ही वध किया था ।। अयं कर्ता न क्रियते कारणं चापि पौरुषे । यद्‌ यदिच्छेदयं शौरिस्तत्‌ तत्‌ कुर्यादयत्नत:,ये ही सबके कर्ता हैं, इनका दूसरा कोई कर्ता नहीं है। सबके पुरुषार्थके कारण भी यही हैं। ये भगवान्‌ श्रीकृष्ण जो-जो इच्छा करें, वह सब अनायास ही कर सकते हैं

ଏହି ପ୍ରଭୁ ଏକାର୍ଣ୍ଣବର ଜଳରେ ଶୟନ କରୁଥିବାବେଳେ ମଧୁ ଓ କୈଟଭ ନାମକ ଦୈତ୍ୟଦ୍ୱୟଙ୍କୁ ବଧ କରିଥିଲେ; ପୁନଶ୍ଚ ଅନ୍ୟ ଦେହ ଧାରଣ କରି ହୟଗ୍ରୀବ ନାମକ ରାକ୍ଷସକୁ ମଧ୍ୟ ସେଇ ନିହତ କରିଥିଲେ। ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟର ସତ୍ୟ କର୍ତ୍ତା ସେଇ—ତାଙ୍କଠାରୁ ଉପରେ ଅନ୍ୟ କୌଣସି କର୍ତ୍ତା ନାହିଁ। ପୁରୁଷାର୍ଥ ଫଳଦାୟକ ହେବାର ଅନ୍ତଃକାରଣ ମଧ୍ୟ ସେଇ। ଶୌରି ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯାହା ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, ତାହା ସେ ଅନାୟାସେ ସାଧନ କରନ୍ତି।

Verse 52

तं न बुद्धयसि गोविन्द घोरविक्रममच्युतम्‌ । आशीविषमिव क्ुद्धं तेजोराशिमनिन्दितम्‌,अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले इन भगवान्‌ गोविन्दका पराक्रम भयंकर है। तुम इन्हें अच्छी तरह नहीं जानते। ये क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्पके समान भयानक हैं। ये सत्पुरुषोंद्वारा प्रशंसित एवं तेजकी राशि हैं

ତୁମେ ଗୋବିନ୍ଦ—ନିଜ ମହିମାରୁ କେବେ ଚ୍ୟୁତ ନ ହେଉଥିବା ଅଚ୍ୟୁତ—ଙ୍କୁ ଭଲଭାବେ ବୁଝୁନାହ। ତାଙ୍କର ପରାକ୍ରମ ଘୋର। କ୍ରୋଧରେ ସେ ବିଷଧର ସର୍ପ ପରି ଭୟଙ୍କର; ସେ ଅନିନ୍ଦ୍ୟ, ତେଜର ପୁଞ୍ଜ, ଏବଂ ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରଶଂସିତ।

Verse 53

प्रधर्षयन्‌ महाबाहुं कृष्णमक्लिष्टकारिणम्‌ | पतड्रोे5ग्निमिवासाद्य सामात्यो न भविष्यसि,अनायास ही महान्‌ पराक्रम करनेवाले महाबाहु भगवान्‌ श्रीकृष्णका तिरस्कार करनेपर तुम अपने मन्त्रियोंसहित उसी प्रकार नष्ट हो जाओगे, जैसे पतंग आगमें पड़कर भस्म हो जाता है

ଅନାୟାସେ ମହାପରାକ୍ରମ କରୁଥିବା ମହାବାହୁ କୃଷ୍ଣ—ଅକ୍ଲିଷ୍ଟକାରୀ—ଙ୍କୁ ଅପମାନ କଲେ, ତୁମେ ତୁମ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହିତ ସେଇପରି ନଷ୍ଟ ହେବ, ଯେପରି ପତଙ୍ଗ ଅଗ୍ନିରେ ପଡ଼ି ଭସ୍ମ ହୋଇଯାଏ।

Verse 76

निरुद्यमा भविष्यन्ति पाण्डवा: सोमकै: सह । “ये महाबाहु श्रीकृष्ण ही समस्त पाण्डवोंके कल्याणसाधक और कवचकी भाँति रक्षा करनेवाले हैं। सम्पूर्ण यदुवंशियोंके शिरोमणि तथा वरदायक इस श्रीकृष्णके बन्दी बना लिये जानेपर सोमकोंसहित सब पाण्डव उद्योगशून्य हो जायँगे

ମହାବାହୁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ—ଯିଏ ସମସ୍ତ ପାଣ୍ଡବଙ୍କ କଳ୍ୟାଣସାଧକ ଓ କବଚ ପରି ରକ୍ଷକ, ସମଗ୍ର ଯାଦବବଂଶର ଶିରୋମଣି ଏବଂ ବରଦାୟକ—ତାଙ୍କୁ ଯଦି ବନ୍ଦୀ କରାଯାଏ, ତେବେ ସୋମକମାନଙ୍କ ସହିତ ସମସ୍ତ ପାଣ୍ଡବ ନିରୁଦ୍ୟମ ହୋଇଯିବେ।

Verse 96

इज्वितज्ञ: कवि: क्षिप्रमन्वबुद्धयत सात्यकि: । विद्वान्‌ सात्यकि इशारेसे ही दूसरोंके मनकी बात समझ लेनेवाले थे। वे उन दुष्टचित पापियोंके उस पापपूर्ण अभिप्रायको शीघ्र ही ताड़ गये

ବିଦ୍ୱାନ ସାତ୍ୟକି ସଙ୍କେତମାତ୍ରରେ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ମନର କଥା ବୁଝିପାରୁଥିଲେ; ସେ ଦୁଷ୍ଟଚିତ୍ତ ପାପୀମାନଙ୍କର ସେଇ ପାପପୂର୍ଣ୍ଣ ଅଭିପ୍ରାୟକୁ ଶୀଘ୍ର ଧରିପାରିଲେ।

Verse 130

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि विदुरवाक्ये त्रिंशयवधिकशततमो<ध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବରେ, ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ‘ବିଦୁରବାକ୍ୟ’ ନାମକ ଏକଶ ତିରିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 146

मन्दा: कर्तुमिहेच्छन्ति न चावाप्यं कथंचन । सात्यकिने किंचित्‌ मुसकराते हुए-से उन कौरवोंके इस अभिप्रायको इस प्रकार बताया --'सभासदो! कुछ मूर्ख कौरव एक ऐसा नीच कर्म करना चाहते हैं, जो धर्म, अर्थ और काम सभी दृष्टियोंसे साधुपुरुषोंद्वारा निन्दित है। यद्यपि इस कार्यमें उन्हें किसी प्रकार सफलता नहीं प्राप्त हो सकती

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଏଠାରେ କେତେକ ମୂର୍ଖ ଲୋକ ଏକ ନୀଚ କର୍ମ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛନ୍ତି; କିନ୍ତୁ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ମଧ୍ୟ ସେଥିରେ ସେମାନେ ସଫଳ ହେବେ ନାହିଁ।

Verse 156

धर्षिता: काममन्युभ्यां क्रोधलो भवशानुगा: । “क्रोध और लोभके वशीभूत हो काम एवं रोषसे तिरस्कृत होकर कुछ पापात्मा एवं मूढ़ मानव यहाँ आकर भारी बखेड़ा पैदा करना चाहते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— କାମ ଓ ରୋଷରେ ତାଡିତ, କ୍ରୋଧ ଓ ଲୋଭର ବଶାନୁଗ, ପାପାତ୍ମା ଓ ମୂଢ ଲୋକେ ଏଠାକୁ ଆସି ଭୟଙ୍କର କଳହ ସୃଷ୍ଟି କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛନ୍ତି।

Verse 163

पटेनाग्निं प्रजवबलितं यथा बाला यथा जडा: । “जैसे बालक और जड बुद्धिवाले लोग जलती आगको कपड़ेमें बाँधना चाहें, उसी प्रकार ये मन्दबुद्धि कौरव इन कमलनयन भगवान्‌ श्रीकृष्णको यहाँ कैद करना चाहते हैं!

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯେପରି ଶିଶୁମାନେ କିମ୍ବା ଜଡବୁଦ୍ଧି ଲୋକେ ଜ୍ୱଳନ୍ତ ଅଗ୍ନିକୁ ବସ୍ତ୍ରରେ ବାନ୍ଧିବାକୁ ଚାହିବେ, ସେପରି ଏହି ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି କୌରବମାନେ କମଳନୟନ ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଏଠାରେ ବନ୍ଦୀ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛନ୍ତି।

Verse 186

अशक्यमयशस्यं च कर्तु कर्म समुद्यता: । सात्यकिका यह वचन सुनकर दूरदर्शी विदुरने कौरवसभामें महाबाहु धृतराष्ट्रसे कहा --'परंतप नरेश! जान पड़ता है, आपके सभी पुत्र सर्वथा कालके अधीन हो गये हैं। इसीलिये वे यह अकीर्तिकारक और असम्भव कर्म करनेको उतारू हुए हैं

ସେମାନେ ଏକ ଏମିତି କର୍ମ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ, ଯାହା ଅଶକ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଓ ଅପଯଶକର ମଧ୍ୟ। ସାତ୍ୟକିଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ଦୂରଦର୍ଶୀ ବିଦୁର କୌରବସଭାରେ ମହାବାହୁ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ କହିଲେ— “ପରନ୍ତପ ନରେଶ! ମୋତେ ପ୍ରତୀତ ହୁଏ ଆପଣଙ୍କ ସମସ୍ତ ପୁତ୍ର କାଳର ବଶରେ ପଡ଼ିଗଲେ; ସେହିକାରଣରୁ ଏହି ଅକୀର୍ତ୍ତିକର ଓ ଅଶକ୍ୟ କର୍ମ କରିବାକୁ ସେମାନେ ଉତ୍ସୁକ।”

Verse 216

सिंहो नागानिव क्रुद्धो गमयेद्‌ यमसादनम्‌ । 'जैसे क्रोधमें भरा हुआ सिंह हाथियोंको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार ये भगवान्‌ श्रीकृष्ण यदि चाहें तो क़्रुद्ध होनेपर समस्त विपक्षी योद्धाओंको यमलोक पहुँचा सकते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯେପରି କ୍ରୋଧେ ଉନ୍ମତ୍ତ ସିଂହ ହାତୀମାନଙ୍କୁ ଯମସଦନକୁ ଠେଲିଦେଇପାରେ, ସେପରି ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ମଧ୍ୟ ଯଦି ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, କ୍ରୋଧୋଦ୍ରେକରେ ସମସ୍ତ ପ୍ରତିପକ୍ଷ ଯୋଦ୍ଧାଙ୍କୁ ଯମଲୋକକୁ ପଠାଇବାକୁ ସମର୍ଥ।

Verse 226

न च धर्मादपक्रामेदच्युत: पुरुषोत्तम: । 'परंतु ये पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण किसी प्रकार भी निन्दित अथवा पापकर्म नहीं कर सकते और न कभी धर्मसे ही पीछे हट सकते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଅଚ୍ୟୁତ ପୁରୁଷୋତ୍ତମ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କେବେ ଧର୍ମରୁ ଅପସରଣ କରନ୍ତି ନାହିଁ। ସେ ନିନ୍ଦ୍ୟ କିମ୍ବା ପାପକର୍ମ କରିପାରନ୍ତି ନାହିଁ; ସଦା ଧର୍ମରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ।

Verse 266

एते चेदेवमिच्छन्ति कृतकार्यो युधिष्ठिर: । “आपके पुत्र पाण्डवोंका धन लेनेके लिये लुभाये हुए हैं, परंतु इन्हें अपने धनसे भी हाथ धोना पड़ेगा। यदि ये ऐसा ही चाहते हैं, तब तो युधिष्ठिरका काम बन गया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯଦି ସେମାନେ ସତ୍ୟସତ୍ୟ ଏଭଳି ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, ତେବେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ କାର୍ଯ୍ୟ ସିଦ୍ଧ। ଲୋଭରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଧନ ହରିବାକୁ ଯାଇ ସେମାନେ ନିଜ ଧନ ମଧ୍ୟ ହରାଇବେ—ଏବଂ ନିଜ ଚୟନରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଲକ୍ଷ୍ୟ ପାଇଁ ପଥ ପ୍ରଶସ୍ତ କରିଦେବେ।

Verse 276

निगृहा राजन्‌ पार्थेभ्यो दद्यां कि दुष्कृतं भवेत्‌ । भारत! मैं आज ही इन कौरवों तथा इनके अनुगामियोंको कैद करके यदि कुन्तीपुत्रोंके हाथमें सौंप दूँ तो क्या बुरा होगा?

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ରାଜନ୍! ଯଦି ମୁଁ ଆଜିହିଁ ଏହି କୌରବମାନଙ୍କୁ ତାଙ୍କ ଅନୁଗାମୀମାନଙ୍କ ସହିତ ଧରି କାରାଗାରେ ରଖି, କୁନ୍ତୀପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ହାତରେ ସମର୍ପଣ କରିଦେଉ, ତେବେ ଏଥିରେ କ’ଣ ଦୁଷ୍କୃତ୍ୟ ହେବ, ହେ ଭାରତବଂଶଜ?

Verse 286

संनिधौ ते महाराज क्रोधजं पापबुद्धिजम्‌ । 'परंतु भारत! महाराज! आपके समीप मैं क्रोध अथवा पापबुद्धिसे होनेवाला यह निन्दित कर्म नहीं प्रारम्भ करूँगा

ହେ ଭାରତ! ମହାରାଜ! ଆପଣଙ୍କ ସନ୍ନିଧିରେ କ୍ରୋଧ କିମ୍ବା ପାପବୁଦ୍ଧିରୁ ଜନ୍ମିଥିବା ଏହି ନିନ୍ଦ୍ୟ କର୍ମକୁ ମୁଁ ଆରମ୍ଭ କରିବି ନାହିଁ; ମୁଁ ଧର୍ମକୁ ହିଁ ଆଶ୍ରୟ କରିବି।

Frequently Asked Questions

The chapter dramatizes whether political power may override ethical norms of counsel and safe conduct: Duryodhana’s impulse to coerce a mediator collides with the expectation of restraint and lawful governance.

Human authority is shown as contingent within a larger moral-cosmic order; the display functions as a corrective to epistemic arrogance, suggesting that policy built on delusion and intimidation is inherently unstable.

No formal phalaśruti is stated; the meta-function is achieved narratively by restricting full perception to those granted divya-cakṣus, emphasizing disciplined witnessing as necessary for understanding extraordinary claims.