
Divodāsa–Mādhavī Saṃvāda: Pratardana-janma and Kanyā-niryātana (दिवोदास–माधवी संवादः / प्रतर्दन-जननम् / कन्या-निर्यातनम्)
Upa-parva: Gālavopākhyāna (Episode of Gālava and Mādhavī)
This chapter is framed by alternating speakers (Gālava, Nārada, and King Divodāsa of Kāśī). Gālava identifies Divodāsa as a renowned, self-controlled, truthful ruler and urges Mādhavī to proceed without anxiety. Nārada narrates the approach and proper reception of the sage, after which Gālava requests assistance for the purpose of progeny within the constraints of an existing arrangement. Divodāsa acknowledges prior knowledge of the matter, approves Gālava’s choice, and agrees to beget a single royal son through Mādhavī. Nārada formally gives the maiden to the king, who accepts her according to prescribed procedure. The text then employs a sustained series of similes comparing the couple’s harmonious union to paradigmatic divine and exemplary pairings, emphasizing concord and legitimacy. Mādhavī bears one son, Pratardana. When the agreed time arrives, Gālava returns and requests the release of the maiden while the horses remain; Divodāsa, steadfast in truth, returns her in accordance with the stipulated terms.
Chapter Arc: नारद के कथन से गालव-चरित आगे बढ़ता है: राजा हर्यश्व माधवी के विषय में गहन विचार करते हैं—संतान की इच्छा, वचन की मर्यादा, और दुर्लभ श्यामकर्ण अश्वों का दबाव एक साथ उपस्थित हो उठता है। → हर्यश्व गालव से कहते हैं कि वे माधवी से एक पुत्र उत्पन्न करेंगे, पर शर्तों का गणित कठोर है—चार राजाओं से दो-दो सौ अश्व मिलकर आठ सौ पूरे होंगे, और हर्यश्व को ‘शुल्क’ का चतुर्थांश देकर कन्या ग्रहण करनी है। परंतु शेष छह सौ श्यामकर्ण अश्वों की दुर्लभता राजा के संकल्प को परीक्षा में डाल देती है। → सत्यवचन पर दृढ़ हर्यश्व, पुरुषार्थ में समर्थ होते हुए भी, छह सौ श्यामकर्ण अश्व न जुट पाने के कारण माधवी को लौटा देते हैं—यह क्षण दिखाता है कि सामर्थ्य से अधिक निर्णायक है प्रतिज्ञा की शुद्धता और असंभव की स्वीकृति। → गालव प्रस्थान करते समय हर्यश्व से कहते हैं कि जो अश्व अभी उपलब्ध हैं वे वहीं रहें; फिर वे माधवी को साथ लेकर अगले राजा—दिवोदास—की ओर बढ़ते हैं, ताकि यज्ञ-शुल्क की शेष पूर्ति हो सके। → गालव और माधवी दिवोदास के द्वार पर—क्या अगला राजा शेष अश्व देगा, या फिर एक और नई शर्त कथा को और कठिन मोड़ देगी?
Verse 1
ऑपन-आक्रात बछ। अं क्ाञाज षोडशाधिकशततमोब<्ध्याय: हर्यश्वका दो सौ श्यामकर्ण घोड़े देकर ययातिकन्याके गर्भसे वसुमना नामक पुत्र उत्पन्न करना और गालवका इस कन्याके साथ वहाँसे प्रस्थान नारद उवाच हर्यश्वस्त्वब्रवीद् राजा विचिन्त्य बहुधा ततः । दीर्घमुष्णं च नि:श्वस्य प्रजाहेतोर्नपोत्तम:
ନାରଦ କହିଲେ—ତାପରେ ରାଜା ହର୍ୟଶ୍ୱ ବହୁ ପ୍ରକାରେ ବିଚାର କରି କହିଲେ। ସନ୍ତାନହେତୁ ଚିନ୍ତାରେ ଭାରାକ୍ରାନ୍ତ ସେ ନୃପଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦୀର୍ଘ ଓ ଉଷ୍ଣ ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡ଼ି କଥା ଆରମ୍ଭ କଲେ।
Verse 2
उन्नतेषूतन्नता षट्सु सूक्ष्मा सूक्ष्मेषु पडचसु । गम्भीरा त्रिषु गम्भीरेष्वियं रक्ता च पउचसु
ଏହା ଉନ୍ନତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଉନ୍ନତ ହୁଏ, ନତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ନତ ହୋଇଯାଏ; ଛଅରେ ସୂକ୍ଷ୍ମ, ସୂକ୍ଷ୍ମମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଆହୁରି ସୂକ୍ଷ୍ମ; ତିନିରେ ଗମ୍ଭୀର, ଗମ୍ଭୀରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଆହୁରି ଗମ୍ଭୀର; ଏବଂ ପାଞ୍ଚରେ ଏହା ରକ୍ତ (ଆସକ୍ତ/ରାଗରେ ରଞ୍ଜିତ) ମଧ୍ୟ ହୁଏ।
Verse 3
नारदजी कहते हैं--तदनन्तर नृपतिश्रेष्ठ राजा हर्यश्वने उस कनन््याके विषयमें बहुत सोच-विचारकर संतानोत्पादनकी इच्छासे गरम-गरम लम्बी साँस खींचकर मुनिसे इस प्रकार कहा--(द्विजश्रेष्ठ) इस कनन््याके छ: अंग जो ऊँचे होने चाहिये, ऊँचे हैं। पाँच अंग जो सूक्ष्म होने चाहिये, सूक्ष्म हैं। तीन अंग जो गम्भीर होने चाहिये, गम्भीर हैं तथा इसके पाँच अंग रक्तवर्णके हैं ।। (श्रोण्यौ ललाटमूरू च प्राणं चेति षद्ुन्नतम् । सूक्ष्माण्यड्गुलिपर्वाणि केशरोमनखत्वच: ।। स्वर: सत्त्वं च नाभिश्ष त्रिगम्भीरं प्रचक्षते । पाणिपादतले रक्ते नेत्रान्तौ च नखानि च ।। ) “दो नितम्ब, दो जाँघें, ललाट और नासिका-ये छः अंग ऊँचे हैं। अंगुलियोंके पर्व, केश, रोम, नख और त्वचा--ये पाँच अंग सूक्ष्म हैं। स्वर, अन्त:करण तथा नाभि--ये तीन गम्भीर कहे जा सकते हैं तथा हथेली, पैरोंके तलवे, दक्षिण नेत्रप्रान्त, वाम नेत्रप्रान्त तथा नख--ये पाँच अंग रक्तवर्णके हैं। बहुदेवासुरालोका बहुगन्धर्वदर्शना । बहुलक्षणसम्पन्ना बहुप्रसवधारिणी,“यह बहुत-से देवताओं तथा असुरोंके लिये भी दर्शनीय है। इसे गन्धर्वविद्या (संगीत)- का भी अच्छा ज्ञान है। यह बहुत-से शुभ लक्षणोंद्वारा सुशोभित तथा अनेक संतानोंको जन्म देनेमें समर्थ है
ନାରଦ କହିଲେ—ତା’ପରେ ନୃପଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାଜା ହର୍ୟଶ୍ୱ ସେଇ କନ୍ୟା ବିଷୟରେ ଗଭୀର ଭାବେ ଚିନ୍ତା କରି, ସନ୍ତାନକାମନାରେ ଉଷ୍ଣ ଦୀର୍ଘ ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡ଼ି ମୁନିଙ୍କୁ ଏପରି କହିଲେ—“ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏହି କନ୍ୟାର ଯେ ଛଅଟି ଅଙ୍ଗ ଉନ୍ନତ ହେବା ଉଚିତ, ସେଗୁଡ଼ିକ ଉନ୍ନତ; ଯେ ପାଞ୍ଚଟି ସୂକ୍ଷ୍ମ ହେବା ଉଚିତ, ସେଗୁଡ଼ିକ ସୂକ୍ଷ୍ମ; ଯେ ତିନିଟି ଗମ୍ଭୀର ହେବା ଉଚିତ, ସେଗୁଡ଼ିକ ଗମ୍ଭୀର; ଏବଂ ତା’ର ପାଞ୍ଚଟି ଅଙ୍ଗ ରକ୍ତିମ ବର୍ଣ୍ଣର। ନିତମ୍ବ, ଲଲାଟ, ଜଂଘା ଓ ପ୍ରାଣ—ଏଗୁଡ଼ିକ ଉନ୍ନତ; ଆଙ୍ଗୁଳିର ପର୍ବ, କେଶ, ରୋମ, ନଖ ଓ ତ୍ୱଚା—ଏଗୁଡ଼ିକ ସୂକ୍ଷ୍ମ; ସ୍ୱର, ଅନ୍ତଃକରଣ ଓ ନାଭି—ଏଗୁଡ଼ିକ ଗମ୍ଭୀର; ଏବଂ ହସ୍ତତଳ, ପାଦତଳ, ଚକ୍ଷୁକୋଣ ଓ ନଖ—ଏଗୁଡ଼ିକ ରକ୍ତିମ। ସେ ଅନେକ ଦେବ ଓ ଅସୁରଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଦର୍ଶନୀୟ, ଗନ୍ଧର୍ବମାନଙ୍କୁ ପ୍ରୀତିକର, ଅନେକ ଶୁଭଲକ୍ଷଣରେ ସମ୍ପନ୍ନ, ଏବଂ ବହୁ ସନ୍ତାନ ଧାରଣ କରିବାରେ ସମର୍ଥ।”
Verse 4
समर्थेयं जनयितुं चक्रवर्तिनमात्मजम् । ब्रृहि शुल्कं द्विजश्रेष्ठ समीक्ष्य विभवं मम,“विप्रवर! आपकी यह कन्या चक्रवर्ती पुत्र उत्पन्न करनेमें समर्थ है; अतः आप मेरे वैभवको देखते हुए इसके लिये समुचित शुल्क बताइये”
“ବିପ୍ରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଆପଣଙ୍କ ଏହି କନ୍ୟା ଚକ୍ରବର୍ତ୍ତୀ ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେବାରେ ସମର୍ଥ। ତେଣୁ ମୋର ବିଭବ ଓ ସାମର୍ଥ୍ୟ ବିଚାର କରି ତା’ପାଇଁ ଯଥୋଚିତ ଶୁଲ୍କ (ବଧୂମୂଲ୍ୟ) କହନ୍ତୁ।”
Verse 5
गालव उवाच एकत: श्यामकर्णानां शतान्यष्टौ प्रयच्छ मे । हयानां चन्द्रशु भ्राणां देशजानां वपुष्मताम्,गालवने कहा--राजन्! आप मुझे अच्छे देश और अच्छी जातिमें उत्पन्न हृष्ट-पुष्ट अंगोंवाले आठ सौ ऐसे घोड़े प्रदान कीजिये, जो चन्द्रमाके समान उज्ज्वल कान्तिसे विभूषित हों तथा उनके कान एक ओरसे श्यामवर्णके हों। यह शुल्क चुका देनेपर मेरी यह विशाल नेत्रोंवाली शुभलक्षणा कन्या अग्नियोंको प्रकट करनेवाली अरणीकी भाँति आपके तेजस्वी पुत्रोंकी जननी होगी
ଗାଲବ କହିଲେ—“ରାଜନ୍! ମୋତେ ଆଠଶେ ଘୋଡ଼ା ଦିଅନ୍ତୁ—ଉତ୍ତମ ଦେଶ ଓ ଉତ୍ତମ ଜାତିରେ ଜନ୍ମିତ, ହୃଷ୍ଟ-ପୁଷ୍ଟ ଓ ସବଳ, ଚନ୍ଦ୍ରମା ପରି ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ଶୁଭ୍ର କାନ୍ତିରେ ଦୀପ୍ତ; କିନ୍ତୁ ଯାହାଙ୍କ କାନ ଏକ ପାର୍ଶ୍ୱରେ ଶ୍ୟାମବର୍ଣ୍ଣର ହେବ।”
Verse 6
ततस्तव भवित्रीयं पुत्राणां जननी शुभा । अरणीव हुताशानां योनिरायतलोचना,गालवने कहा--राजन्! आप मुझे अच्छे देश और अच्छी जातिमें उत्पन्न हृष्ट-पुष्ट अंगोंवाले आठ सौ ऐसे घोड़े प्रदान कीजिये, जो चन्द्रमाके समान उज्ज्वल कान्तिसे विभूषित हों तथा उनके कान एक ओरसे श्यामवर्णके हों। यह शुल्क चुका देनेपर मेरी यह विशाल नेत्रोंवाली शुभलक्षणा कन्या अग्नियोंको प्रकट करनेवाली अरणीकी भाँति आपके तेजस्वी पुत्रोंकी जननी होगी
ଗାଲବ କହିଲେ—“ତା’ପରେ ଏହି ଶୁଭା, ବିଶାଳନୟନା କନ୍ୟା ଆପଣଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କର ଜନନୀ ହେବ। ଯେପରି ପବିତ୍ର ଅଗ୍ନିମାନଙ୍କୁ ପ୍ରକଟ କରିବାର ଯୋନି ଅରଣୀ, ସେପରି ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ଶୁଲ୍କ ଦେଇଦେଲେ ପରେ ସେ ଆପଣଙ୍କ ତେଜସ୍ୱୀ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ଉଦ୍ଭବର ମୂଳ ହେବ।”
Verse 7
नारद उवाच एतच्छुत्वा वचो राजा हर्यश्वः काममोहित: । उवाच गालवं दीनो राजर्षिऋषिसत्तमम्,नारदजी कहते हैं--यह वचन सुनकर काममोहित हुए राजर्षि महाराज हर्यश्व मुनिश्रेष्ठ गालवसे अत्यन्त दीन होकर बोले--
ନାରଦ କହିଲେ—ଏହି କଥା ଶୁଣି କାମମୋହିତ ରାଜର୍ଷି ହର୍ୟଶ୍ୱ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୀନ ହୋଇ ଋଷିଶ୍ରେଷ୍ଠ ଗାଲବଙ୍କୁ କହିଲେ।
Verse 8
द्वे मे शते संनिहिते हयानां यद्धिधास्तव । एष्टव्या: शतशस्त्वन्ये चरन्ति मम वाजिन:,“ब्रह्म! आपको जैसे घोड़े लेने अभीष्ट हैं, वैसे तो मेरे यहाँ इन दिनों दो ही सौ घोड़े मौजूद हैं; किंतु दूसरी जातिके कई सौ घोड़े यहाँ विचरते हैं
ନାରଦ କହିଲେ— “ବ୍ରହ୍ମନ୍! ଏବେ ତୁମେ ଯେପରି ଘୋଡ଼ା ଚାହୁଁଛ, ସେପରି ମୋ ପାଖରେ ପ୍ରସ୍ତୁତ ଥିବା ମାତ୍ର ଦୁଇଶେ; କିନ୍ତୁ ଏହାଛଡ଼ା ଭିନ୍ନ ଜାତିର ମୋର ଅନେକ ଶତ ଅଶ୍ୱ ଏଠାରେ ବିଚରଣ କରୁଛନ୍ତି।”
Verse 9
सो5हमेकमपत्यं वै जनयिष्यामि गालव । अस्यामेतं भवान् काम॑ सम्पादयतु मे वरम्
ନାରଦ କହିଲେ— “ଏହେତୁ, ହେ ଗାଲବ! ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ ଏକମାତ୍ର ସନ୍ତାନ ଜନ୍ମଦେବି। ଏହି ନାରୀ ମାଧ୍ୟମରେ ମୋର ଏହି କାମନା ପୂରଣ କର—ଏହା ମୋର ବର।”
Verse 10
“अत: गालव! मैं इस कन्यासे केवल एक संतान उत्पन्न करूँगा। आप मेरे इस श्रेष्ठ मनोरथको पूर्ण करें” ।। एतच्छुत्वा तु सा कन्या गालवं वाक्यमत्रवीत् । मम दत्तो वर: कश्रित् केनचिद् ब्रह्म॒वादिना,यह सुनकर उस कन्याने महर्षि गालवसे कहा--'मुने! मुझे किन्हीं वेदवादी महात्माने यह एक वर दिया था कि तुम प्रत्येक प्रसवके अन्तमें फिर कन्या ही हो जाओगी। अतः आप दो सौ उत्तम घोड़े लेकर मुझे राजाको सौंप दें
ନାରଦ କହିଲେ— “ଏହେତୁ, ହେ ଗାଲବ! ଏହି କନ୍ୟା ଦ୍ୱାରା ମୁଁ ମାତ୍ର ଏକ ସନ୍ତାନ ଜନ୍ମଦେବି। ମୋର ଏହି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସଙ୍କଳ୍ପ ପୂରଣ କର।” ଏହା ଶୁଣି ସେ କନ୍ୟା ଗାଲବଙ୍କୁ କହିଲା— “ମୁନେ! ଜଣେ ବେଦଜ୍ଞ ବ୍ରହ୍ମବାଦୀ ମୋତେ ଏହି ବର ଦେଇଥିଲେ—ପ୍ରତ୍ୟେକ ପ୍ରସବର ଶେଷରେ ମୁଁ ପୁଣି କନ୍ୟା ହୋଇଯିବି। ତେଣୁ ଦୁଇଶେ ଉତ୍ତମ ଅଶ୍ୱ ନେଇ ମୋତେ ରାଜାଙ୍କୁ ସମର୍ପଣ କର।”
Verse 11
प्रसूत्यन्ते प्रसूत्यन्ते कन्यैव त्वं भविष्यसि । स त्वं ददस्व मां राजे प्रतिगृह्म हयोत्तमान्,यह सुनकर उस कन्याने महर्षि गालवसे कहा--'मुने! मुझे किन्हीं वेदवादी महात्माने यह एक वर दिया था कि तुम प्रत्येक प्रसवके अन्तमें फिर कन्या ही हो जाओगी। अतः आप दो सौ उत्तम घोड़े लेकर मुझे राजाको सौंप दें
ସେ କହିଲା— “ପ୍ରତ୍ୟେକ ପ୍ରସବର ଶେଷରେ ମୁଁ ପୁଣି କନ୍ୟା ହୋଇଯିବି। ତେଣୁ ମୋତେ ରାଜାଙ୍କୁ ସମର୍ପଣ କର; ଏବଂ ସେ ଏହି ଉତ୍ତମ ଅଶ୍ୱଗୁଡ଼ିକୁ ଗ୍ରହଣ କରୁନ୍ତୁ।”
Verse 12
नृपेभ्यो हि चतुर्भ्यस्ते पूर्णान्यष्टी शतानि मे । भविष्यन्ति तथा पुत्रा मम चत्वार एव च,“इस प्रकार चार राजाओंसे दो-दो सौ घोड़े लेनेपर आपके आठ सौ घोड़े पूरे हो जायाँगे और मेरे भी चार ही पुत्र होंगे
ନାରଦ କହିଲେ— “ଚାରି ରାଜାଙ୍କଠାରୁ ଦୁଇଶେ କରି ଅଶ୍ୱ ନେଲେ ତୁମର ଆଠଶେ ଅଶ୍ୱ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେବ; ଏବଂ ମୋର ମଧ୍ୟ କେବଳ ଚାରି ପୁତ୍ର ହେବେ।”
Verse 13
क्रियतामुपसंहारो गुर्वर्थ द्विजसत्तम | एषा तावन्मम प्रज्ञा यथा वा मन्यसे द्विज,“विप्रवर! इसी तरह आप गुरुदक्षिणाके लिये धनका संग्रह करें, यही मेरी मान्यता है। फिर आप जैसा ठीक समझें, वैसा करें”
ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଗୁରୁଦକ୍ଷିଣାର ନିମିତ୍ତେ ଏବେ ଏହି କଥାର ଉପସଂହାର କରାଯାଉ। ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଏହି ମୋର ନିଶ୍ଚିତ ମତ; କିନ୍ତୁ ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ, ତୁମେ ଯାହା ଯଥାଯଥ ଭାବ, ସେହିପରି କର।
Verse 14
एवमुक्तस्तु स मुनि: कन््यया गालवस्तदा । हर्यश्नं पृथिवीपालमिदं वचनमत्रवीत्,कन्याके ऐसा कहनेपर उस समय गालव मुनिने भूपाल हर्यश्वसे यह बात कही --
କନ୍ୟା ଏପରି କହିବା ପରେ ସେ ସମୟରେ ମୁନି ଗାଲବ ପୃଥିବୀପାଳ ରାଜା ହର୍ୟଶ୍ୱଙ୍କୁ ଏହି ବଚନ କହିଲେ।
Verse 15
इयं कन्या नरश्रेष्ठ हर्यश्व॒ प्रतिगृह्मताम् चतुभगिेन शुल्कस्य जनयस्वैकमात्मजम्,“नरश्रेष्ठ हर्यश्व! नियत शुल्कका चौथाई भाग देकर आप इस कन्याको ग्रहण करें और इसके गर्भसे केवल एक पुत्र उत्पन्न कर लें”
ହେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ହର୍ୟଶ୍ୱ! ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ଶୁଲ୍କର ଚତୁର୍ଥାଂଶ ଦେଇ ଏହି କନ୍ୟାକୁ ଗ୍ରହଣ କର; ଏହାରୁ କେବଳ ଗୋଟିଏ ପୁତ୍ର ଜନ୍ମାଅ।
Verse 16
प्रतिगृह्म स तां कन्यां गालवं प्रतिनन्द्य च । समये देशकाले च लब्धवान् सुतमीप्सितम्,तब राजाने गालव मुनिका अभिनन्दन करके उस कन्याको ग्रहण किया और उचित देश-कालमें उसके-द्वारा एक मनोवांछित पुत्र प्राप्त किया
ତାପରେ ରାଜା ମୁନି ଗାଲବଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ କରି ସେହି କନ୍ୟାକୁ ଗ୍ରହଣ କଲେ ଏବଂ ଯଥୋଚିତ ଦେଶ-କାଳରେ ତାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଇପ୍ସିତ ପୁତ୍ର ଲାଭ କଲେ।
Verse 17
ततो वसुमना नाम वसुभ्यो वसुमत्तर: । वसुप्रख्यो नरपति: स बभूव वसुप्रद:,तदनन्तर उनका वह पुत्र वसुमनाके नामसे विख्यात हुआ। वह वसुओंके समान कान्तिमान् तथा उनकी अपेक्षा भी अधिक धन-रत्नोंसे सम्पन्न और धनका खुले हाथ दान करनेवाला नरेश हुआ
ତାପରେ ତାଙ୍କ ପୁତ୍ର ‘ବସୁମନା’ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ହେଲେ। ସେ ବସୁମାନଙ୍କ ପରି କାନ୍ତିମାନ, ସେମାନଙ୍କଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ ଧନ-ରତ୍ନରେ ସମ୍ପନ୍ନ ଏବଂ ମୁକ୍ତହସ୍ତେ ଧନ ଦାନ କରୁଥିବା ନରପତି ହେଲେ।
Verse 18
अथ काले पुनर्धीमान् गालव: प्रत्युपस्थित: । उपसंगम्य चोवाच हर्यश्च॑ं प्रीतमानसम्,तत्पश्चात् उचित समयपर बुद्धिमान् गालव पुनः वहाँ उपस्थित हुए और प्रसन्नचित्त राजा हर्यश्वसे मिलकर इस प्रकार बोले--
ତତ୍ପରେ ଯଥାସମୟରେ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଗାଲବ ପୁନର୍ବାର ସେଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ। ପ୍ରସନ୍ନଚିତ୍ତ ରାଜା ହର୍ୟଶ୍ୱଙ୍କୁ ସମୀପଗତ ହୋଇ ସମ୍ମାନପୂର୍ବକ ଏହିପରି କହିଲେ—
Verse 19
जातो नृप सुतस्ते5यं बालो भास्करसंनिभ:। कालो गन्तुं नरश्रेष्ठ भिक्षार्थमपरं नृपम्,“नरश्रेष्ठ नरेश! आपको यह सूर्यके समान तेजस्वी पुत्र प्राप्त हो गया। अब इस कनन््याके साथ घोड़ोंकी याचना करनेके लिये दूसरे राजाके यहाँ जानेका अवसर उपस्थित हुआ है!
ନାରଦ କହିଲେ—“ହେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାଜନ! ତୁମର ଏହି ପୁତ୍ର ଜନ୍ମିଛି—ଶିଶୁ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ସୂର୍ଯ୍ୟସମ ଦୀପ୍ତିମାନ। ଏବେ, ହେ ନରେଶ, ଅଶ୍ୱ ଯାଚନା ପାଇଁ ଅନ୍ୟ ରାଜାଙ୍କ ପାଖକୁ ଯିବାର ସମୟ ଆସିଛି।”
Verse 20
हर्यश्व: सत्यवचने स्थित: स्थित्वा च पौरुषे । दुर्लभत्वाद्धयानां च प्रददौ माधवीं पुन:
ନାରଦ କହିଲେ—ସତ୍ୟବଚନରେ ଅଟୁଟ ଓ ପୌରୁଷରେ ଦୃଢ଼ ହର୍ୟଶ୍ୱ ରାଜା, ଅଶ୍ୱମାନଙ୍କ ଦୁର୍ଲଭତା ଭାବି, ମାଧବୀଙ୍କୁ ପୁନର୍ବାର ଫେରାଇ ଦେଲେ।
Verse 21
राजा हर्यश्व॒ सत्य वचनपर दृढ़ रहनेवाले थे। उन्होंने पुरुषार्थमें समर्थ होकर भी छ: सौ श्यामकर्ण घोड़े दुर्लभ होनेके कारण माधवीको पुनः लौटा दिया ।। माधवी च पुनर्दीप्तां परित्यज्य नृपश्रियम् कुमारी कामतो भूत्वा गालवं पृष्ठतो5न्वयात्,माधवी पुनः इच्छानुसार कुमारी होकर अयोध्याकी उज्ज्वल राजलक्ष्मीका परित्याग करके गालव मुनिके पीछे-पीछे चली गयी
ନାରଦ କହିଲେ—ରାଜା ହର୍ୟଶ୍ୱ ସତ୍ୟବଚନରେ ଦୃଢ଼ ଥିଲେ। ପୌରୁଷରେ ସମର୍ଥ ହେଲେ ମଧ୍ୟ, ଛଅଶେ ଶ୍ୟାମକର୍ଣ୍ଣ ଅଶ୍ୱ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ଲଭ ଥିବାରୁ ସେ ମାଧବୀଙ୍କୁ ପୁନର୍ବାର ଫେରାଇ ଦେଲେ। ଏବଂ ମାଧବୀ ମଧ୍ୟ ଅଯୋଧ୍ୟାର ଦୀପ୍ତ ରାଜଲକ୍ଷ୍ମୀକୁ ତ୍ୟାଗ କରି, ନିଜ ଇଚ୍ଛାରେ ପୁନଃ କୁମାରୀ ହୋଇ, ଗାଲବ ମୁନିଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଚାଲିଗଲେ।
Verse 22
त्वय्येव तावत् तिष्ठन्तु हया इत्युक्तवान् द्विज: । प्रययौ कन्यया सार्ध दिवोदासं प्रजेश्वरम्,जाते समय ब्राह्मणने राजा हर्यश्वसे कहा--“महाराज! आपके दिये हुए दो सौ श्यामकर्ण घोड़े अभी आपके ही पास धरोहरके रूपमें रहें।! ऐसा कहकर गालव मुनि उस राजकन्याके साथ राजा दिवोदासके यहाँ गये
ନାରଦ କହିଲେ—ଦ୍ୱିଜ କହିଲେ, “ଏହି ଅଶ୍ୱମାନେ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ତୁମ ପାଖରେ ରହୁନ୍ତୁ।” ଏହା କହି ସେ କନ୍ୟା ସହିତ ପ୍ରଜେଶ୍ୱର ରାଜା ଦିବୋଦାସଙ୍କ ପାଖକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 116
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते षोडशाधिकशततमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ‘ଭଗବଦ୍ୟାନ’ ପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଗାଲବଚରିତରେ ଏକଶ ଷୋଳତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The ethical tension concerns how to fulfill a vow-bound objective (progeny and agreed exchange) without violating ritual propriety or personal integrity—resolved through consent, formal procedure, and strict adherence to the stipulated timeframe.
The chapter models governance and personal conduct grounded in satya: legitimacy arises when power and desire are constrained by promise-keeping, orderly rites, and reciprocal respect between social orders.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-significance is implicit—understanding this episode clarifies how dharma operates through contracts, timing, and social procedure, which the epic treats as causal forces shaping historical outcomes.