Adhyaya 110
Udyoga ParvaAdhyaya 11036 Verses

Adhyaya 110

Gālava’s Eastern Ascent with Garuḍa; Counsel on Kāla and Upāya (उद्योगपर्व, अध्याय ११०)

Upa-parva: Gālava–Garuḍa Saṃvāda (Episode within Udyoga Parva)

Adhyāya 110 stages a dialogue-led journey motif. Gālava petitions Garuḍa—described with epithets emphasizing his cosmic stature (suparṇa, vinatātmaja, pannagāśana)—to carry him eastward, where Gālava associates the region with the ‘eyes of dharma’ and with divine proximity. As the flight accelerates, Gālava reports perceptual distortions and sensory overload: the landscape appears dragged by wing-wind; ocean waters churn upward; aquatic beings and nāgas seem violently displaced; roaring sound dulls hearing; darkness obscures sun, directions, and sky; only Garuḍa’s gem-like eyes remain visible. Gālava then requests restraint and cessation, stating he cannot endure the velocity. He reveals his underlying anxiety: a pledged obligation to his guru—eight hundred horses of specific description—seems impossible, and he momentarily frames death as an escape route. Garuḍa responds with corrective instruction: self-abandonment is unintelligent; kāla is not fabricated but supreme (parameśvara); and a viable upāya exists that Gālava failed to request earlier. The chapter closes with a practical transition point: the sighting of Ṛṣabha mountain in the ocean, where they will rest and then return, shifting from overwhelming motion to planned action.

Chapter Arc: युपर्ण (गरुड़) गालव से कहता है कि अब वह उस दिशा का वर्णन करेगा जिसका नाम ही ‘उत्तर’ है—जो पाप से ‘उत्तार’ करती है और निःश्रेयस की ओर ले जाती है। → उत्तर दिशा को स्वर्ण-निधियों, श्रेष्ठ मार्गों और धर्म-निवास के रूप में चित्रित किया जाता है—जहाँ असौम्य, अविधेय और अधर्मी जन नहीं टिकते। वर्णन आगे बढ़ते-बढ़ते वहाँ की दिव्य भौगोलिकता (मन्दाकिनी, मन्दराचल, सौगन्धिक वन) और राक्षस-रक्षा जैसे विरोधी तत्त्वों को भी जोड़ देता है, जिससे यह दिशा केवल रमणीय नहीं, परीक्षा-स्थल भी बनती है। → ‘धामा’ नामक सत्यवादी महात्मा मुनियों का रहस्यपूर्ण उल्लेख—उनकी मूर्ति/आकृति तक ज्ञात नहीं, फिर भी वे गंगामहाद्वार की रक्षा करते हैं; साथ ही यह उद्घोष कि उत्तर दिशा ‘सर्वकर्मसु चोत्तरा’ है—समस्त शुभ कर्मों के लिए सर्वोत्तम। → वर्णन उत्तर दिशा की उत्कृष्टता पर ठहरता है—धन, तप, सत्य और रक्षण-व्यवस्था का संगम; और संकेत मिलता है कि यहाँ दिक्पाल प्रातः-सायं एकत्र होकर ‘किसका कार्य क्या है’ पूछते हैं—अर्थात् ब्रह्माण्डीय कर्तव्य-चक्र निरन्तर चलता है। → युपर्ण चारों दिशाओं का क्रमशः वर्णन पूरा कर गालव से निर्णायक प्रश्न करता है—‘अब बताओ, किस दिशा में जाना चाहते हो?’

Shlokas

Verse 1

अपन का छा 2 एकादरशाधिकशततमोड< ध्याय: उत्तर दिशाका वर्णन युपर्ण उवाच यस्मादुत्तार्यते पापाद्‌ यस्मान्नि:श्रेयसो 5 ्षुते । अस्मादुत्तारणबलादुत्तरेत्युच्यते द्विज,गरुड़ कहते हैं--गालव! इस मार्गसे जानेपर मनुष्यका पापसे उद्धार हो जाता है और वह कल्याणमय स्वर्गीय सुखोंका उपभोग करता है; अतः इस उत्तारण (संसारसागरसे पार उतारने)-के बलसे इस दिशाको उत्तरदिशा कहते हैं

ୟୁପର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ଗାଲବ! ଏହି ମାର୍ଗରେ ଯାଇଲେ ମନୁଷ୍ୟ ପାପରୁ ପାର ହୋଇଯାଏ ଏବଂ ପରମ ଶ୍ରେୟସ୍‌କୁ ପ୍ରାପ୍ତ କରି ତାହା ଉପଭୋଗ କରେ; ଏହି ‘ଉତ୍ତାରଣ’ର ବଳରୁ, ହେ ଦ୍ୱିଜ, ଏହି ଦିଗକୁ ‘ଉତ୍ତର’ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।

Verse 2

उत्तरस्य हिरण्यस्य परिवापश्ष गालव । मार्ग: पश्चिमपूर्वाभ्यां दिग्भ्यां वै मध्यम: स्मृत:,गालव! यह उत्तर दिशा उत्कृष्ट सुवर्ण आदि निधियोंकी अधिष्ठान है (इसलिये भी इसका नाम उत्तर है)। यह उत्तर मार्ग पश्चिम और पूर्व दिशाओंका मध्यवर्ती बताया गया है

ୟୁପର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ହେ ଗାଲବ! ଉତ୍ତର ଦିଗ ଉତ୍କୃଷ୍ଟ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଓ ଅନ୍ୟ ନିଧିମାନଙ୍କର ଆଶ୍ରୟ ଏବଂ ଉତ୍ସ ଭାବେ ପରିଗଣିତ। ‘ଉତ୍ତର ମାର୍ଗ’ ପଶ୍ଚିମ ଓ ପୂର୍ବ ଦିଗର ମଧ୍ୟବର୍ତ୍ତୀ ମଧ୍ୟମ ପଥ ବୋଲି ସ୍ମୃତ।

Verse 3

अस्यां दिशि वरिष्ठायामुत्तरायां द्विजर्षभ । नासौम्यो नाविधेयात्मा नाधर्मो वसते जन:,द्विजश्रेष्ठ) इस गौरवशालिनी दिशामें ऐसे लोगोंका वास नहीं है, जो सौम्य स्वभावके न हों, जिन्होंने अपने मनको वशमें न किया हो तथा जो धर्मका पालन न करते हों

ହେ ଦ୍ୱିଜର୍ଷଭ! ଏହି ସର୍ବଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଗୌରବଶାଳୀ ଉତ୍ତର ଦିଗରେ ଅସୌମ୍ୟ ସ୍ୱଭାବର, ମନକୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରିନଥିବା, କିମ୍ବା ଧର୍ମରେ ଅସ୍ଥିତ—ଏମିତି କୌଣସି ଜନ ବସେ ନାହିଁ।

Verse 4

अत्र नारायण: कृष्णो जिष्णुश्वैव नरोत्तम: । बदर्यामाश्रमपदे तथा ब्रह्मा च शाश्वत:,इसी दिशामें बदरिकाश्रमतीर्थ है, जहाँ सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायण, विजयशील नरश्रेष्ठ नर और सनातन ब्रह्माजी निवास करते हैं

ଏହି ଦିଗରେ ହିଁ ବଦରୀର ପବିତ୍ର ଆଶ୍ରମସ୍ଥାନ ଅଛି; ସେଠାରେ ନାରାୟଣ—ସ୍ୱୟଂ କୃଷ୍ଣ—ବିଜୟଶୀଳ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ‘ନର’ ଏବଂ ଶାଶ୍ୱତ ବ୍ରହ୍ମା ବସନ୍ତି।

Verse 5

अत्र वै हिमवत्पृष्ठे नित्यमास्ते महेश्वर: । प्रकृत्या पुरुष: सार्थ युगान्ताग्निसमप्रभ:,उत्तरमें ही हिमालयके शिखरपर प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी अन्तर्यामी भगवान्‌ महेश्वर भगवती उमाके साथ नित्य निवास करते हैं

ଏଠାରେ ହିମବତର ଉଚ୍ଚ ପୃଷ୍ଠଭାଗରେ ମହେଶ୍ୱର ନିତ୍ୟ ବସନ୍ତି—ସ୍ୱଭାବତଃ ଯୁଗାନ୍ତାଗ୍ନି ସମ ଦୀପ୍ତିମାନ ଅନ୍ତର୍ୟାମୀ; ଭଗବତୀ ଉମାଙ୍କ ସହିତ।

Verse 6

न स दृश्यो मुनिगणैस्तथा देवै: सवासवै: । गन्धर्वयक्षसिद्धिर्वा नरनारायणादूृते,वे भगवान्‌ नर और नारायणके सिवा और किसीकी दृष्टिमें नहीं आते। समस्त मुनिगण, गन्धर्व, यक्ष, सिद्ध अथवा देवताओंसहित इन्द्र भी उनका दर्शन नहीं कर पाते हैं

ନର-ନାରାୟଣ ବ୍ୟତୀତ ସେ କାହାର ଦୃଷ୍ଟିଗୋଚର ନୁହେଁ। ମୁନିଗଣ, ଗନ୍ଧର୍ବ, ଯକ୍ଷ, ସିଦ୍ଧ—ଏପରିକି ଇନ୍ଦ୍ର ସହିତ ଦେବମାନେ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ଦର୍ଶନ ପାଇପାରନ୍ତି ନାହିଁ।

Verse 7

अत्र विष्णु: सहस्राक्ष: सहस्नरचरणोडव्यय: । सहस्रशिरस: श्रीमानेक: पश्यति मायया

ଏଠାରେ ବିଷ୍ଣୁ—ସହସ୍ରନେତ୍ର, ସହସ୍ରପାଦ, ଅବ୍ୟୟ; ସହସ୍ରଶିର, ଶ୍ରୀମାନ୍, ତଥାପି ଏକ। ନିଜ ମାୟାଶକ୍ତିରେ ସେ ଏହି ବହୁରୂପ ଜଗତକୁ ଦେଖନ୍ତି ଓ ଶାସନ କରନ୍ତି—ଦୃଶ୍ୟମାନ ବହୁତ୍ୱର ପଛରେ ଏକ ଅବିନାଶୀ ପ୍ରଭୁ ଅଛନ୍ତି, ଯାହାଙ୍କ ଦୃଷ୍ଟି ସର୍ବତ୍ର ବ୍ୟାପ୍ତ, ଏହା ପ୍ରକାଶ କରି।

Verse 8

यहाँ सहस्ौ्रों नेत्रों, सहस्रों चरणों और सहस्रों मस्तकोंवाले एकमात्र अविनाशी श्रीमान्‌ भगवान्‌ विष्णु ही उन मायाविशिष्ट महेश्वरका साक्षात्कार करते हैं ।। अत्र राज्येन विप्राणां चन्द्रमा क्षाभ्यषिच्यत । अत्र गड़ां महादेव: पतन्तीं गगनाच्च्युताम्‌

ଏଠାରେ ସହସ୍ରନେତ୍ର, ସହସ୍ରପାଦ, ସହସ୍ରଶିର ଥିବା, ଏକମାତ୍ର ଅବ୍ୟୟ ଶ୍ରୀମାନ୍ ଭଗବାନ ବିଷ୍ଣୁ ମାୟାବିଶିଷ୍ଟ ମହେଶ୍ୱରଙ୍କୁ ସାକ୍ଷାତ୍କାର କରନ୍ତି। ଏଠାରେ ହିଁ ବିପ୍ରମାନଙ୍କ ରାଜ୍ୟାଭିଷେକରେ ଚନ୍ଦ୍ରମାଙ୍କ ଅଭିଷେକ ହୋଇଥିଲା। ଏଠାରେ ହିଁ ଆକାଶରୁ ପତିତ ଗଙ୍ଗାକୁ ମହାଦେବ ଧାରଣ କରିଥିଲେ।

Verse 9

प्रतिगृह्य ददौ लोके मानुषे ब्रह्म॒वित्तम । उत्तर दिशामें ही चन्द्रमाका द्विजराजके पदपर अभिषेक हुआ था। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गालव! यहीं आकाशसे गिरती हुई गंगाको महादेवजीने अपने मस्तकपर धारण किया और उन्हें मनुष्यलोकमें छोड़ दिया ।। अत्र देव्या तपस्तप्तं महेश्वरपरीप्सया

ତାହା গ্ৰହଣ କରି, ହେ ବ୍ରହ୍ମବିଦ୍ୟାରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ସେ ମନୁଷ୍ୟଲୋକରେ ଦାନ କଲେ। ଉତ୍ତର ଦିଗରେ ହିଁ ଦ୍ୱିଜରାଜ ଚନ୍ଦ୍ରମାଙ୍କ ନିଜ ପଦରେ ଅଭିଷେକ ହୋଇଥିଲା। ହେ ବେଦବିଦ୍ମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅଗ୍ରଗଣ୍ୟ ଗାଲବ! ଏଠାରେ ହିଁ ମହାଦେବ ଆକାଶରୁ ପତିତ ଗଙ୍ଗାକୁ ନିଜ ଶିରରେ ଧାରଣ କରି, ପରେ ମନୁଷ୍ୟଲୋକକୁ ପ୍ରବାହିତ କରିଦେଲେ। ଏଠାରେ ହିଁ ଦେବୀ ମହେଶ୍ୱରପ୍ରାପ୍ତି ପାଇଁ ତପ କରିଥିଲେ।

Verse 10

अत्र राक्षसयक्षाणां गन्धर्वाणां च गालव,गालव! इसी दिशामें कैलास पर्वतपर राक्षस, यक्ष और गन्धर्वोका आधिपत्य करनेके लिये धनदाता कुबेरका अभिषेक हुआ था। उत्तर दिशामें ही रमणीय चैत्ररथवन और वैखानस ऋषियोंका आश्रम है

ହେ ଗାଲବ! ଏହି ଅଞ୍ଚଳରେ ହିଁ, କୈଲାସ ପର୍ବତ ଉପରେ, ରାକ୍ଷସ, ଯକ୍ଷ ଓ ଗନ୍ଧର୍ବମାନଙ୍କ ଉପରେ ଆଧିପତ୍ୟ ପାଇଁ ଧନଦାତା କୁବେରଙ୍କ ଅଭିଷେକ ହୋଇଥିଲା। ଏବଂ ଉତ୍ତର ଦିଗରେ ହିଁ ରମଣୀୟ ଚୈତ୍ରରଥ ବନ ଓ ବୈଖାନସ ଋଷିମାନଙ୍କ ଆଶ୍ରମ ଅଛି।

Verse 11

आधिपत्येन कैलासे धनदो<प्यभिषेचित: । अत्र चैत्ररथं रम्यमत्र वैखानसाश्रम:,गालव! इसी दिशामें कैलास पर्वतपर राक्षस, यक्ष और गन्धर्वोका आधिपत्य करनेके लिये धनदाता कुबेरका अभिषेक हुआ था। उत्तर दिशामें ही रमणीय चैत्ररथवन और वैखानस ऋषियोंका आश्रम है

ୟୂପରାଣ କହିଲେ—“କୈଲାସରେ ଆଧିପତ୍ୟ ପାଇଁ ଧନଦାତା କୁବେରଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଅଭିଷେକ କରାଯାଇଥିଲା। ଏଠାରେ ହିଁ ରମଣୀୟ ଚୈତ୍ରରଥ ବନ; ଏଠାରେ ହିଁ ବୈଖାନସ ଋଷିମାନଙ୍କ ଆଶ୍ରମ ମଧ୍ୟ ଅଛି, ହେ ଗାଲବ!”

Verse 12

अत्र मन्दाकिनी चैव मन्दरक्ष द्विजर्षभ । अत्र सौगन्धिकवन नैर्ऋतैरभिरक्ष्यते,द्विजश्रेष्ठड. यहीं मन्दाकिनी नदी और मन्दराचल हैं। इसी दिशामें राक्षसगण सौगन्धिकवनकी रक्षा करते हैं

ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏଠାରେ ମନ୍ଦାକିନୀ ନଦୀ ଓ ମନ୍ଦର ପର୍ବତ ଅଛି। ଏହି ଅଞ୍ଚଳରେ ନୈଋତ (ରାକ୍ଷସ) ସୌଗନ୍ଧିକ ବନକୁ ରକ୍ଷା କରୁଛନ୍ତି।

Verse 13

शाद्वलं कदलीस्कन्धमत्र संतानका नगा: । अत्र संयमनित्यानां सिद्धानां स्वैरचारिणाम्‌

ୟୁପର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ଏଠାରେ ହରିତ ଶାଦ୍ୱଳ ଭୂମି ଅଛି; ଏଠାରେ କଦଳୀ ତଣ୍ଡର ଗୁଚ୍ଛ ଅଛି; ଏଠାରେ ସନ୍ତାନକ ବୃକ୍ଷମାନେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ। ଏହା ସେଇ ଅଞ୍ଚଳ, ଯେଉଁଠାରେ ସଂଯମରେ ନିତ୍ୟ ଅବସ୍ଥିତ ସିଦ୍ଧମାନେ ସ୍ୱଚ୍ଛନ୍ଦେ ବିଚରଣ କରନ୍ତି।

Verse 14

विमानान्यनुरूपाणि कामभोग्यानि गालव । यहीं हरी-हरी घासोंसे सुशोभित कदलीवन है और यहीं कल्पवृक्ष शोभा पाते हैं। गालव! इसी दिशामें सदा संयम-नियमका पालन करनेवाले स्वच्छन्दचारी सिद्धोंके इच्छानुसार भोगोंसे सम्पन्न एवं मनोनुकूल विमान विचरते हैं ।। १३ $ ।। अत्र ते ऋषय: सप्त देवी चारुन्धती तथा

ୟୁପର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ହେ ଗାଲବ! ଏଠାରେ ସ୍ୱଭାବାନୁରୂପ, ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ଭୋଗ ଦେଇଥିବା ବିମାନମାନେ ବିଚରଣ କରନ୍ତି। ଏଠାରେ ତାଜା ସବୁଜ ଘାସରେ ଶୋଭିତ କଦଳୀବନ ଅଛି ଏବଂ ଏଠାରେ କଳ୍ପବୃକ୍ଷମାନେ ଦୀପ୍ତିମାନ। ଏହି ଦିଗରେ ସଂଯମ-ନିୟମରେ ନିତ୍ୟ ଅବସ୍ଥିତ, ସ୍ୱଚ୍ଛନ୍ଦବିହାରୀ ସିଦ୍ଧମାନେ ମନୋହର ବିମାନରେ ଇଚ୍ଛାମତେ ବିଚରଣ କରି, ଅନ୍ତର୍ଇଚ୍ଛାନୁକୂଳ ସିଦ୍ଧି ଭୋଗ କରନ୍ତି। ଏଠାରେ ସପ୍ତର୍ଷି ଓ ଦେବୀ ଅରୁନ୍ଧତୀ ମଧ୍ୟ ଅଛନ୍ତି।

Verse 15

अत्र यज्ञं समासाद्य ध्रुवं स्थाता पितामह:

ଏଠାରେ ଏହି ଯଜ୍ଞକୁ ଆସି ପିତାମହ ନିଶ୍ଚୟ ଧ୍ରୁବପରି ଅଚଳ ଭାବେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହେବେ।

Verse 16

ज्योतींषि चन्द्रसूर्यों च परिवर्तन्ति नित्यश: । इसी दिशामें ब्रह्माजी यज्ञानुष्ठानमें प्रवृत्त होकर नियमितरूपसे निवास करते हैं। नक्षत्र, चन्द्रमा तथा सूर्य भी सदा इसीमें परिभ्रमण करते हैं ।। १५ ह ।। अत्र गड़ामहाद्ारं रक्षन्ति द्विजसत्तम

ୟୁପର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—ନକ୍ଷତ୍ର, ଚନ୍ଦ୍ର ଓ ସୂର୍ଯ୍ୟ ନିତ୍ୟ ତାଙ୍କର ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ପଥରେ ପରିଭ୍ରମଣ କରନ୍ତି। ହେ ଦ୍ୱିଜସତ୍ତମ! ଏଠାରେ ଏହି ମହାଦ୍ୱାରକୁ ସଚେତନ ପାଳକମାନେ ରକ୍ଷା କରୁଛନ୍ତି।

Verse 17

धामा नाम महात्मानो मुनय: सत्यवादिन: । न तेषां ज्ञायते मूर्तिनाकृतिर्न तपश्चितम्‌

ୟୁପର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—“ଧାମା ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ମହାତ୍ମା ମୁନିମାନେ ସତ୍ୟବାଦୀ; କିନ୍ତୁ ତାଙ୍କର ମୂର୍ତ୍ତି, ଆକୃତି ଓ ତପସ୍ୟାର ଦୃଶ୍ୟ ଚିହ୍ନ କାହାକୁ ଜଣା ନୁହେଁ।”

Verse 18

परिवर्तसहस्राणि कामभोज्यानि गालव । द्विजश्रेष्ठ! इसी दिशामें धाम नामसे प्रसिद्ध सत्यवादी महात्मा मुनि श्रीगंगामहाद्वारकी रक्षा करते हैं। उनकी मूर्ति, आकृति तथा संचित तपस्याका परिमाण किसीको ज्ञात नहीं होता है। गालव! वे सहस्रों युगान्‍्तकालतककी आयु इच्छानुसार भोगते हैं ।। यथा यथा प्रविशति तस्मात्‌ परतरं नर:,द्विजश्रेष्ठ! मनुष्य ज्यों-ज्यों गंगामहाद्वारसे आगे बढ़ता है, वैसे-ही-वैसे वहाँकी हिमराशिमें गलता जाता है। विप्रवर गालव! साक्षात्‌ भगवान्‌ नारायण तथा विजयशील अविनाशी महात्मा नरको छोड़कर दूसरा कोई मनुष्य पहले कभी गंगामहाद्वारसे आगे नहीं गया है। इसी दिशामें कैलासपर्वत है, जो कुबेरका स्थान बताया गया है

ୟୁପର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—“ହେ ଗାଲବ, ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏହି ଦିଗରେ ଧାମନ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ସତ୍ୟବାଦୀ ମହାତ୍ମା ମୁନି ଗଙ୍ଗାମହାଦ୍ୱାରକୁ ରକ୍ଷା କରନ୍ତି। ତାଙ୍କର ମୂର୍ତ୍ତି, ଆକୃତି ଓ ସଞ୍ଚିତ ତପସ୍ୟାର ପରିମାଣ କାହାକୁ ଜଣା ନୁହେଁ। ହେ ଗାଲବ, ସେ ସହସ୍ର ସହସ୍ର ଯୁଗାନ୍ତ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ଆୟୁ ଭୋଗ କରନ୍ତି। ଏବଂ, ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଯେ ମନୁଷ୍ୟ ସେହି ଗଙ୍ଗାମହାଦ୍ୱାରର ପରେ ଆଗେଇଯାଏ, ସେ ତେଁଠାର ହିମରାଶିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କ୍ରମେ କ୍ରମେ ଗଳିଯାଏ। ହେ ବିପ୍ରବର ଗାଲବ, ସାକ୍ଷାତ୍ ଭଗବାନ ନାରାୟଣ ଓ ବିଜୟଶୀଳ, ଅବିନାଶୀ ମହାତ୍ମା ନର ବ୍ୟତୀତ ଅନ୍ୟ କୌଣସି ମନୁଷ୍ୟ କେବେ ଗଙ୍ଗାମହାଦ୍ୱାରର ପରେ ଯାଇନାହିଁ। ଏହି ଦିଗରେ ହିଁ କୈଲାସ ପର୍ବତ—କୁବେରଙ୍କ ନିବାସସ୍ଥାନ ବୋଲି ପ୍ରସିଦ୍ଧ।”

Verse 19

तथा तथा द्विजश्रेष्ठ प्रविलियति गालव । नैतत्‌ केनचिदन्येन गतपूर्व द्विजर्षभ,द्विजश्रेष्ठ! मनुष्य ज्यों-ज्यों गंगामहाद्वारसे आगे बढ़ता है, वैसे-ही-वैसे वहाँकी हिमराशिमें गलता जाता है। विप्रवर गालव! साक्षात्‌ भगवान्‌ नारायण तथा विजयशील अविनाशी महात्मा नरको छोड़कर दूसरा कोई मनुष्य पहले कभी गंगामहाद्वारसे आगे नहीं गया है। इसी दिशामें कैलासपर्वत है, जो कुबेरका स्थान बताया गया है

ୟୁପର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—“ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣଶ୍ରେଷ୍ଠ, ହେ ଗାଲବ! ସେହିପରି ସେଠାରେ ହିମରାଶି କ୍ରମେ କ୍ରମେ ଗଳିଯାଏ। ହେ ଦ୍ୱିଜର୍ଷଭ, ଭଗବାନ ନାରାୟଣ ଓ ବିଜୟଶୀଳ, ଅବିନାଶୀ ମହାତ୍ମା ନର ବ୍ୟତୀତ ଅନ୍ୟ କେହି ପୂର୍ବେ ଗଙ୍ଗାମହାଦ୍ୱାରର ପରେ ଯାଇନାହିଁ। ଏହି ଦିଗରେ କୈଲାସ ପର୍ବତ—କୁବେରଙ୍କ ନିବାସ ବୋଲି ପ୍ରସିଦ୍ଧ।”

Verse 20

ऋते नारायण देवं नरं वा जिष्णुमव्ययम्‌ । अत्र कैलासमित्युक्त स्थानमैलविलस्य तत्‌,द्विजश्रेष्ठ! मनुष्य ज्यों-ज्यों गंगामहाद्वारसे आगे बढ़ता है, वैसे-ही-वैसे वहाँकी हिमराशिमें गलता जाता है। विप्रवर गालव! साक्षात्‌ भगवान्‌ नारायण तथा विजयशील अविनाशी महात्मा नरको छोड़कर दूसरा कोई मनुष्य पहले कभी गंगामहाद्वारसे आगे नहीं गया है। इसी दिशामें कैलासपर्वत है, जो कुबेरका स्थान बताया गया है

ୟୁପର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—“ଦିବ୍ୟ ନାରାୟଣଦେବ ଓ ଜିଷ୍ଣୁ, ଅବିନାଶୀ ନର ବ୍ୟତୀତ ପୂର୍ବେ କୌଣସି ମନୁଷ୍ୟ ଗଙ୍ଗାମହାଦ୍ୱାରର ପରେ ଯାଇନାହିଁ। ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଏହି ଦିଗରେ ‘କୈଲାସ’ ନାମକ ପର୍ବତ—ଏଇଲବିଲ (କୁବେର)ଙ୍କ ସ୍ଥାନ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।”

Verse 21

अत्र विद्युत्प्रभा नाम जज्ञिरेडप्सरसो दश । अत्र विष्णुपदं नाम क्रमता विष्णुना कृतम्‌,उशीरबीजे विप्रर्षे यत्र जाम्बूनदं सर: । यहीं विद्युत्प्रभा नामसे प्रसिद्ध दस अप्सराएँ उत्पन्न हुई थीं। ब्रह्मन्‌! त्रिलोकीको नापते समय भगवान्‌ विष्णुने इसी दिशामें अपना चरण रखा था। उत्तर दिशामें भगवान्‌ विष्णुका वह चरणचिह्न (हरिकी पैंड़ी) आज भी मौजूद है। द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मर्ष! उत्तर-दिशाके ही उशीरबीज नामक स्थानमें, जहाँ सुवर्णमय सरोवर है, राजा मरुत्तने यज्ञ किया था

ୟୁପର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—“ଏଠାରେ ‘ବିଦ୍ୟୁତ୍ପ୍ରଭା’ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଦଶ ଅପ୍ସରା ଜନ୍ମ ନେଇଥିଲେ। ଏଠାରେ ହିଁ ‘ବିଷ୍ଣୁପଦ’ ନାମକ ପଦଚିହ୍ନ—ତ୍ରିଲୋକ ମାପିବାକୁ ଯାଇ ଭଗବାନ ବିଷ୍ଣୁ ଯେଉଁଠି ପଦ ରଖିଥିଲେ। ହେ ବିପ୍ରର୍ଷି, ଉତ୍ତର ଦିଗର ଉଶୀରବୀଜ ନାମକ ସ୍ଥାନରେ—ଯେଉଁଠାରେ ଜାମ୍ବୂନଦ ସମ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ସରୋବର ଅଛି—ସେଠାରେ ମହାତ୍ମା ରାଜା ମରୁତ୍ତ ଯଜ୍ଞ କରିଥିଲେ।”

Verse 22

त्रिलोककिक्रमे ब्रह्मन्नुत्तरां दिशमाश्रितम्‌ । अत्र राज्ञा मरुत्तेन यज्ञेनेष्ट द्विजोत्तम

ୟୁପର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ— ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ, ଏହି ଦେଶ ଉତ୍ତର ଦିଗକୁ ଆଶ୍ରୟ କରିଛି ଏବଂ ‘ତ୍ରିଲୋକ-ବିକ୍ରମୀ’ ଭାବେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ। ହେ ଦ୍ୱିଜୋତ୍ତମ, ଏଠାରେ ରାଜା ମରୁତ୍ତ ମହାଯଜ୍ଞ କରିଥିଲେ।

Verse 23

जीमूतस्यात्र विप्रर्षेरुपतस्थे महात्मन:

ଏଠାରେ ସେ ମହାତ୍ମା ବ୍ରହ୍ମର୍ଷି ଜୀମୂତଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଉପସ୍ଥିତ ହୋଇ ଶ୍ରଦ୍ଧାସହିତ ସେବାଭାବେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହେଲେ।

Verse 24

साक्षाद्धमवत: पुण्यो विमल: कनकाकर: । इसी दिशामें ब्रह्मर्षि महात्मा जीमूतके समक्ष हिमालयकी पवित्र एवं निर्मल स्वर्णनिधि (सोनेकी खान) प्रकट हुई थी ।। २३ इ ।। ब्राह्मणेषु च यत्‌ कृत्स्नं स्वन्तं कृत्वा धनं महत्‌

ଧର୍ମବାନଙ୍କ ପାଇଁ ପୁଣ୍ୟମୟ ଓ ନିର୍ମଳ ସୁବର୍ଣ୍ଣ-ନିଧି ମନେ ହୁଏ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଭାବେ ପ୍ରକଟ ହୁଏ। ଏବଂ ଯେ ମହାଧନ ମନୁଷ୍ୟ ନିଜର କରି ଲାଭ କରେ, ସେ ସମସ୍ତ ଧନ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ହିତରେ ନିୟୋଜିତ କରିବା ଉଚିତ।

Verse 25

अत्र नित्यं दिशाम्पाला: सायम्प्रातर्द्धिजर्षभ

ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଏଠାରେ ଦିଗ୍ପାଳମାନେ ସଦା ଉପସ୍ଥିତ; ସନ୍ଧ୍ୟା ଓ ପ୍ରଭାତ—ଦୁଇ ସମୟରେ—ସେମାନେ ଏଠାରେ ପହରା ଦିଅନ୍ତି।

Verse 26

एवमेषा द्विजश्रेष्ठ गुणैरन्यैर्दिगुत्तरा

ଏହିପରି, ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଏହି ଦିଗ ନିଜର ଅନେକ ଗୁଣରେ ସମସ୍ତ ଦିଗଠାରୁ ଉତ୍ତମ।

Verse 27

उत्तरेति परिख्याता सर्वकर्मसु चोत्तरा । द्विजश्रेष्ठल इन सब कारणोंसे तथा अन्यान्य गुणोंके कारण यह दिशा उत्कृष्ट है और समस्त शुभ कर्मोके लिये भी यही उत्तम मानी गयी है। इसलिये इसे उत्तर कहते हैं ।। २६ # || एता विस्तरशस्तात तव संकीर्तिता दिश:

ଏହି ଦିଗ ‘ଉତ୍ତରା’ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଏବଂ ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୋଲି ଗଣ୍ୟ। ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏହି କାରଣଗୁଡ଼ିକ ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଗୁଣମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଏହି ଦିଗ ଉତ୍କୃଷ୍ଟ; ସମସ୍ତ ଶୁଭକର୍ମ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଏହିଁ ସର୍ବୋତ୍ତମ ବୋଲି ମନାଯାଏ। ତେଣୁ ଏହାକୁ ‘ଉତ୍ତର’ କୁହାଯାଏ।

Verse 28

उद्यतोडहं द्विजश्रेष्ठ तव दर्शयितुं दिश: । पृथिवीं चाखिलां ब्रह्मुंस्तस्मादारोह मां द्विज,द्विजश्रेष्ठ! मैं तुम्हें सम्पूर्ण पृथ्वी तथा समस्त दिशाओंका दर्शन करानेके लिये उद्यत हूँ; अतः तुम मेरी पीठपर बैठ जाओ

ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମୁଁ ତୁମକୁ ସମସ୍ତ ଦିଗ ଓ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ଦେଖାଇବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ। ତେଣୁ, ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ, ମୋ ପିଠି ଉପରେ ଆରୋହଣ କର।

Verse 96

अत्र कामश्न रोषश्व शैलश्लोमा च सम्बभु: | यहीं पार्वतीदेवीने भगवान्‌ महेश्वरको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये कठोर तपस्या की थी और इसी दिशामें महादेवजीको मोहित करनेके लिये काम प्रकट हुआ। फिर उसके ऊपर भगवान्‌ शंकरका क्रोध हुआ। उस अवसरपर गिरिराज हिमालय और उमा भी वहाँ विद्यमान थीं (इस प्रकार ये सब लोग वहाँ एक ही समयमें प्रकाशित हुए)

ଏଠାରେ କାମ ଓ ରୋଷ ପ୍ରକଟ ହେଲେ, ଏବଂ ଶୈଳଶ୍ଲୋମା ମଧ୍ୟ ଏଠାରେ ଉଦ୍ଭବ ହେଲା। ଏହି ସ୍ଥାନରେ ଦେବୀ ପାର୍ବତୀ ଭଗବାନ ମହେଶ୍ୱରଙ୍କୁ ପତିରୂପେ ପାଇବା ପାଇଁ ଘୋର ତପସ୍ୟା କରିଥିଲେ; ଏହି ଦିଗରେ ମହାଦେବଙ୍କୁ ମୋହିତ କରିବାକୁ କାମ ପ୍ରାଦୁର୍ଭୂତ ହେଲେ, ତାପରେ ଶଙ୍କରଙ୍କ କ୍ରୋଧ ତାଙ୍କ ଉପରେ ପଡ଼ିଲା। ସେ ସମୟରେ ପର୍ବତରାଜ ହିମାଳୟ ଓ ଉମା ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ—ଏଭଳି ଏକେ ଦୃଶ୍ୟରେ ସମସ୍ତେ ଏକାସାଥି ପ୍ରକଟ ହେଲେ।

Verse 110

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଗାଲବଚରିତ୍ରବିଷୟକ ଏକଶେ ଦଶମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 111

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते एकादशाधिकशततमो<ध्याय:

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତେ ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବଣି ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବଣି ଗାଲବଚରିତେ ଏକଶେ ଏଗାରତମ ଅଧ୍ୟାୟ।

Verse 146

अत्र तिष्ठति वै स्वातिरत्रास्या उदय: स्मृत: । इसी दिशामें अरुन्धतीदेवी और सप्तर्षि प्रकाशित होते हैं। इसीमें स्वाती नक्षत्रका निवास है और यहीं उसका उदय होता है

ୟୁପର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—“ଏଠି ନିଶ୍ଚୟ ସ୍ୱାତୀ ନକ୍ଷତ୍ର ବସେ; ଏଠି ତାହାର ଉଦୟ ହୁଏ ବୋଲି ଜଣାଯାଏ। ଏହି ଦିଗରେ ଅରୁନ୍ଧତୀ ଦେବୀ ଓ ସପ୍ତର୍ଷିମାନେ ମଧ୍ୟ ଦୀପ୍ତିମାନ ଦିଶନ୍ତି—ଯଥାର୍ଥ ବୁଝାମଣା ଓ ନିୟମିତ ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣ ପାଇଁ ଆକାଶୀୟ ଦିଗନିର୍ଣ୍ଣୟର ଚିହ୍ନ ଭାବେ।”

Verse 226

उशीरबीजे विप्रर्षे यत्र जाम्बूनदं सर: । यहीं विद्युत्प्रभा नामसे प्रसिद्ध दस अप्सराएँ उत्पन्न हुई थीं। ब्रह्मन्‌! त्रिलोकीको नापते समय भगवान्‌ विष्णुने इसी दिशामें अपना चरण रखा था। उत्तर दिशामें भगवान्‌ विष्णुका वह चरणचिह्न (हरिकी पैंड़ी) आज भी मौजूद है। द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मर्ष! उत्तर-दिशाके ही उशीरबीज नामक स्थानमें, जहाँ सुवर्णमय सरोवर है, राजा मरुत्तने यज्ञ किया था

ୟୁପର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—“ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣଶ୍ରେଷ୍ଠ, ହେ ଋଷି! ଉଶୀରବୀଜ ନାମକ ଦେଶରେ ଜାମ୍ବୂନଦ-ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ଏକ ସରୋବର ଅଛି। ସେଠାରେ ‘ବିଦ୍ୟୁତ୍ପ୍ରଭା’ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଦଶ ଅପ୍ସରା ଜନ୍ମିଥିଲେ। ବ୍ରହ୍ମନ୍! ତ୍ରିଲୋକକୁ ମାପିବାବେଳେ ଭଗବାନ ବିଷ୍ଣୁ ଏହି ଦିଗରେ ନିଜ ପାଦ ରଖିଥିଲେ। ଉତ୍ତର ଦିଗରେ ବିଷ୍ଣୁଙ୍କ ସେହି ପାଦଚିହ୍ନ ‘ହରିକୀ ପୈଣ୍ଡୀ’ ନାମରେ ଆଜି ମଧ୍ୟ ଅଛି। ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ, ହେ ବ୍ରହ୍ମର୍ଷି! ସେହି ଉତ୍ତରଦେଶର ଉଶୀରବୀଜରେ, ଯେଉଁଠି ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ସରୋବର ଅଛି, ରାଜା ମରୁତ୍ତ ମହାଯଜ୍ଞ କରିଥିଲେ।”

Verse 246

वव्रे धनं महर्षि: स जैमूतं तद्‌ धनं ततः । उस सम्पूर्ण विशाल धनराशिको उन्होंने ब्राह्मणोंमें बाँ.कठर उसका सदुपयोग किया और ब्राह्मणोंसे यह वर माँगा कि यह धन मेरे नामसे प्रसिद्ध हो। इस कारण वह धन 'जैमूत' नामसे प्रसिद्ध हुआ

ୟୁପର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—“ସେ ମହର୍ଷି ଧନ ଚାହିଲେ; ତାହାପରେ ସେହି ଧନ ‘ଜୈମୂତ’ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ହେଲା। ସେ ସମଗ୍ର ବିଶାଳ ଧନରାଶିକୁ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ବଣ୍ଟନ କରି, କଠୋର ନିୟମରେ ସଦୁପଯୋଗ କଲେ, ଏବଂ ଏହି ବର ମାଗିଲେ—‘ଏ ଧନ ମୋ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ହେଉ’; ତେଣୁ ଏହା ‘ଜୈମୂତ’ ଭାବେ ଖ୍ୟାତ ହେଲା।”

Verse 256

कस्य कार्य किमिति वै परिक्रोशन्ति गालव । विप्रवर गालव! यहाँ प्रतिदिन सबेरे और संध्याके समय सभी दिक्‌पाल एकत्र हो उच्च स्वरसे यह पूछते हैं कि किसको क्‍या काम है?

ୟୁପର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—“ହେ ଗାଲବ, ହେ ବିପ୍ରବର! ଏଠାରେ ପ୍ରତିଦିନ ପ୍ରଭାତେ ଓ ସନ୍ଧ୍ୟାବେଳେ ସମସ୍ତ ଦିକ୍ପାଳମାନେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ଉଚ୍ଚସ୍ୱରେ ପଚାରନ୍ତି—‘କାହାର କ’ଣ କାମ? କ’ଣ କରିବାକୁ ହେବ?’”

Verse 276

चतस्र: क्रमयोगेन कामाशां गन्तुमिच्छसि । तात! इस प्रकार मैंने क्रमश: चारों दिशाओंका तुम्हारे सामने विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। कहो, किस दिशामें चलना चाहते हो?

“ତାତ! ଏଭଳି ମୁଁ କ୍ରମକ୍ରମେ ଚାରି ଦିଗକୁ ତୋ ସାମ୍ନାରେ ବିସ୍ତାରରେ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିଦେଲି। ଏବେ କହ—ତୁ କେଉଁ ଦିଗକୁ ଯିବାକୁ ଚାହୁଁଛୁ?”

Frequently Asked Questions

Gālava confronts a dharma-sankat between sustaining life while facing an apparently impossible guru-obligation (the promised horses) and the temptation to treat self-abandonment as a solution; the text rejects despair as an ethical exit.

The chapter teaches that kāla (time) is an overriding reality rather than a convenient fiction, and that disciplined recourse to upāya—seeking and applying workable means—should replace panic, fatalism, or self-destructive impulses.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary is implicit through Garuḍa’s instruction that aligning action with kāla and upāya preserves dharma and keeps obligations within a solvable human horizon.