Adhyaya 61
Sabha ParvaAdhyaya 6133 Verses

Adhyaya 61

सभा-पर्व, अध्याय ६१ — द्रौपदी-प्रश्नः, सभाधर्मः, सत्यवचन-नियमः

Upa-parva: Dyūta-Parva (Dice Game Episode) — Draupadī-Dharma-Praśna Context

Chapter 61 stages an escalating ethical-legal crisis in the Kuru assembly. Bhīma addresses Yudhiṣṭhira, accepting material losses as subordinate to the deeper transgression of treating Draupadī as a stake; his speech frames the issue as an excess beyond acceptable contest. Arjuna counters by emphasizing restraint, elder-brother hierarchy, and a kṣātra-dharma rationale: the king was invited and participated under a code of honor, so the brothers should not violate order even under provocation. The narrative then shifts to Vikarṇa, who urges the assembled kings and elders to answer Draupadī’s question, warning that unexamined speech and non-judgment lead to collective moral ruin. Vikarṇa outlines royal vices (hunting, drinking, gambling, and over-attachment) and argues that a wager made after prior loss and involving a shared spouse is not valid, concluding that Draupadī was not legitimately won. Karṇa rebuts, asserting the wager’s validity and reclassifying Draupadī’s status to justify coercive treatment; Duḥśāsana then attempts to strip her garment, but an endless manifestation of cloth appears, producing public astonishment and shame. Bhīma makes a public vow of retribution, while Vidura condemns the assembly’s failure to respond and introduces an illustrative ancient dialogue (Prahlāda–Aṅgiras–Kaśyapa) on the duty to answer truthfully in a court: silence and falsehood incur moral consequences. Despite this, the kings remain largely mute, and Draupadī is forcibly dragged, underscoring institutional collapse.

Chapter Arc: सभा में द्यूत की अग्नि भड़क चुकी है; युधिष्ठिर स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे शकुनि के कैतव से दुरोदरे में पराजित हो रहे हैं, फिर भी दाँव पर दाँव रखने को उद्यत हैं। → हार की शृंखला टूटती नहीं—युधिष्ठिर अपने अपार वैभव का उद्घोष करते हैं: निष्क-सहस्रों से भरी पेटियाँ, अक्षय कोष, अनेक प्रकार का सुवर्ण, और असंख्य दासियाँ-सेविकाएँ; पर हर घोषणा के उत्तर में शकुनि का एक ही ठंडा वाक्य गूँजता है—“जितम्।” → युधिष्ठिर के धन-वैभव की अंतिम परतें भी दाँव पर चढ़ती जाती हैं और शकुनि, छल का आश्रय लेकर, हँसते-हँसते प्रत्येक दाँव को अपनी जीत घोषित करता है—सभा के सामने धर्मराज की विवशता सार्वजनिक अपमान बन जाती है। → अध्याय का अंत किसी न्याय-स्थापन में नहीं, बल्कि पराजय की निरंतरता के ‘स्थापन’ में होता है—शकुनि की जीतें क्रमशः पक्की होती जाती हैं और युधिष्ठिर का आत्म-स्वीकार (कैतव से हारा) भी उन्हें रुकने की शक्ति नहीं देता। → धन के बाद अब दाँव किस पर जाएगा—और धर्मराज की सीमा कहाँ टूटेगी?

Shlokas

Verse 1

/ भीकम (2 अमान एकषेष्टितमो< ध्याय: जूएमें शकुनिके छलसे प्रत्येक दाँवपर युधिष्ठिरकी हार युधिछिर उवाच मत्त: कैतवकेनैव यज्जितो<5स्मि दुरोदरे । शकुने हन्त दीव्यामो ग्लहमाना: परस्परम्‌,युधिष्ठिरने कहा--शकुने! तुमने छलसे इस दाँवमें मुझे हरा दिया, इसीपर तुम गर्वित हो उठे हो; आओ, हमलोग पुन: परस्पर पासे फेंककर जूआ खेलें

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଶକୁନି! ଏହି ଭୟଙ୍କର ଜୁଆରେ ତୁମେ ଛଳ କରି ମୋତେ ଜିତିଛ; ସେଇ ଜିତରେ ତୁମେ ଗର୍ବ କରୁଛ। ଆସ, ଆମେ ପୁଣି ପରସ୍ପର ଦାଉ ଲଗାଇ ପାଶା ଖେଳିବା।

Verse 2

सन्ति निष्कसहस्रस्थ भाण्डिन्यो भरिता: शुभा: । कोशो हिरण्यमक्षय्यं जातरूपमनेकश: । एतदू राजन्‌ मम धन तेन दीव्याम्यहं त्वया

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହଜାର ହଜାର ସୁବର୍ଣ୍ଣାଭୂଷଣରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଶୁଭ ପେଟିଗୁଡ଼ିକ ଅଛି; ସୁନାର ଅକ୍ଷୟ କୋଷ ଅଛି; ନାନା ପ୍ରକାର ଶୁଦ୍ଧ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ମଧ୍ୟ ଅଛି। ହେ ରାଜନ, ଏହି ମୋର ଧନ; ଏହି ଧନ ନେଇ ମୁଁ ତୁମ ସହ ପାଶା ଖେଳିବି।

Verse 3

मेरे पास हजारों निष्कोंसे- भरी हुई बहुत-सी सुन्दर पेटियाँ रखी हैं। इसके सिवा खजाना है, अक्षय धन है और अनेक प्रकारके सुवर्ण हैं। राजन! मेरा यह सब धन दाँवपर लगा दिया गया। मैं इसीके द्वारा तुम्हारे साथ खेलता हूँ ।। वैशम्पायन उवाच कौरवाणां कुलकरं ज्येष्ठं पाण्डवमच्युतम्‌ । इत्युक्त: शकुनि: प्राह जितमित्येव त॑ नृपम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले कौरवोंके वंशधर एवं पाण्डुके ज्येष्ठ पुत्र राजा युधिष्ठिससे शकुनिने फिर कहा--'लो, यह दाँव भी मैंने ही जीता”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କୁରୁବଂଶର ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଜ୍ୟେଷ୍ଠ, ମର୍ଯ୍ୟାଦାରୁ କେବେ ଚ୍ୟୁତ ନ ହେଉଥିବା ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏପରି କହିବା ସହିତ, ଶକୁନି ସେହି ନୃପଙ୍କୁ କେବଳ ଏତିକି କହିଲା—“ଜିତିଲି; ଏହା ମଧ୍ୟ ମୋର ଜୟ।”

Verse 4

युधिछिर उवाच अयं सहस्रसमितो वैयाघ्र: सुप्रतिषछ्ित: । सुचक्रोपस्कर: श्रीमान्‌ किडुकिणीजालमण्डित:

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ଏହା ବୈୟାଘ୍ର ରଥ; ସହସ୍ର-ସମିତ, ସୁପ୍ରତିଷ୍ଠିତ; ସୁଚକ୍ର ଓ ଉପସ୍କରରେ ସମ୍ପନ୍ନ, ଶ୍ରୀମାନ୍, କିଙ୍କିଣୀଜାଳରେ ମଣ୍ଡିତ।”

Verse 5

संह्ादनो राजरथो य इहास्मानुपावहत्‌ । जैत्रो रथवर: पुण्यो मेघसागरनि:स्वन: ।। अष्टौ यं कुररच्छाया: सदश्वा राष्ट्रसम्मता:

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ଯେ ରାଜରଥ ‘ସଂହାଦନ’ ଆମକୁ ଏଠାକୁ ଆଣିଛି, ସେହି ରଥଶ୍ରେଷ୍ଠ ‘ଜୈତ୍ର’, ପୁଣ୍ୟମୟ; ତାହାର ନାଦ ମେଘ ଓ ସାଗରର ଗର୍ଜନା ସମାନ। କୁରର ପକ୍ଷୀର ଛାୟା ପରି ବର୍ଣ୍ଣର, ରାଷ୍ଟ୍ରସମ୍ମତ ଆଠ ଉତ୍ତମ ଅଶ୍ୱ ଏହାକୁ ବହନ କରନ୍ତି।”

Verse 6

वहन्ति नैषां मुच्येत पदाद्‌ भूमिमुपस्पृशन्‌ । एतद्‌ राजन्‌ धन महां तेन दीव्याम्यहं त्वया

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ଏମାନେ ଏପରି ବେଗରେ ଧାଉଛନ୍ତି ଯେ ପାଦ ଭୂମିକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରିଲେ ମଧ୍ୟ ଛୁଟିବାକୁ ଅବକାଶ ନାହିଁ। ରାଜନ୍! ଏହା ମହାଧନ; ଏହି ଧନକୁ ଦାଉରେ ରଖି ମୁଁ ତୁମ ସହ ଦ୍ୟୂତ ଖେଳୁଛି।”

Verse 7

युधिष्ठिरने कहा--यह जो परमानन्ददायक राजरथ है, जो हमलोगोंको यहाँतक ले आया है, रथोंमें श्रेष्ठ जैत्र नामक पुण्यमय श्रेष्ठ रथ है। चलते समय इससे मेघ और समुद्रकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि होती रहती है। यह अकेला ही एक हजार रथोंके समान है। इसके ऊपर बाघका चमड़ा लगा हुआ है। यह अत्यन्त सुदृढ़ है। इसके पहिये तथा अन्य आवश्यक सामग्री बहुत सुन्दर है। यह परम शोभायमान रथ क्षुद्र घण्टिकाओंसे सजाया गया है। कुरर पक्षीकी-सी कान्तिवाले आठ अच्छे घोड़े, जो समूचे राष्ट्रमें सम्मानित हैं, इस रथको वहन करते हैं। भूमिका स्पर्श करनेवाला कोई भी प्राणी इन घोड़ोंके सामने पड़ जानेपर बच नहीं सकता। राजन! इन घोड़ोंसहित यह रथ मेरा धन है, जिसे दाँवपर रखकर मैं तुम्हारे साथ जूआ खेलता हूँ ।। वैशम्पायन उवाच एवं श्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रित: । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर छलका आश्रय लेनेवाले शकुनिने पुनः पासे फेंके और जीतका निश्चय करके युधिष्ठिस्से कहा--'लो, यह भी जीत लिया”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଏହା ଶୁଣି ଛଳକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି, ନିଶ୍ଚୟରେ ଦୃଢ଼ ଶକୁନି ପୁଣି ପାଶା ଛାଡ଼ିଲା; ଜୟ ନିଶ୍ଚିତ କରି ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ କହିଲା—“ଜିତିଲି; ଏହା ମଧ୍ୟ।”

Verse 8

युधिछिर उवाच शतं दासीसहस््राणि तरुण्यो हेमभद्रिका: । कम्बुकेयूरधारिण्यो निष्ककण्ठ्यः स्वलंकृता:,युधिष्ठिरने कहा--मेरे पास एक लाख तरुणी दासियाँ हैं, जो सुवर्णमय मांगलिक आभूषण धारण करती हैं। जिनके हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ, बाँहोंमें भुजबंद, कण्ठमें निष्कोंका हार तथा अन्य अंगोंमें भी सुन्दर आभूषण हैं। बहुमूल्य हार उनकी शोभा बढ़ाते हैं। उनके वस्त्र बहुत ही सुन्दर हैं। वे अपने शरीरमें चन्दनका लेप लगाती हैं, मणि और सुवर्ण धारण करती हैं तथा चौसठ कलाओंमें निपुण हैं। नृत्य और गानमें भी वे कुशल हैं। ये सब-की-सब मेरे आदेशसे स्नातकों, मन्त्रियों तथा राजाओंकी सेवा-परिचर्या करती हैं। राजन! यह मेरा धन है, जिसे दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ମୋ ପାଖରେ ଯୁବତୀ ଦାସୀମାନଙ୍କର ଶତସହସ୍ର ଅଛି; ସେମାନେ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ମଙ୍ଗଳ ଅଳଙ୍କାରରେ ଭୂଷିତ—ହାତରେ ଶଙ୍ଖ ଚୁଡ଼ି, ବାହୁରେ କେୟୂର, କଣ୍ଠରେ ନିଷ୍କହାର; ସର୍ବାଙ୍ଗ ସୁସଜ୍ଜିତ। ହେ ରାଜନ, ଏହି ମୋର ଧନ; ଏହାକୁ ଦାଉରେ ରଖି ମୁଁ ତୁମ ସହ ଖେଳୁଛି।

Verse 9

महाहमाल्याभरणा: सुवस्त्रा श्न्दनो क्षिता: । मणीन्‌ हेम च बिश्रत्यश्षतुःषष्टिविशारदा:,युधिष्ठिरने कहा--मेरे पास एक लाख तरुणी दासियाँ हैं, जो सुवर्णमय मांगलिक आभूषण धारण करती हैं। जिनके हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ, बाँहोंमें भुजबंद, कण्ठमें निष्कोंका हार तथा अन्य अंगोंमें भी सुन्दर आभूषण हैं। बहुमूल्य हार उनकी शोभा बढ़ाते हैं। उनके वस्त्र बहुत ही सुन्दर हैं। वे अपने शरीरमें चन्दनका लेप लगाती हैं, मणि और सुवर्ण धारण करती हैं तथा चौसठ कलाओंमें निपुण हैं। नृत्य और गानमें भी वे कुशल हैं। ये सब-की-सब मेरे आदेशसे स्नातकों, मन्त्रियों तथा राजाओंकी सेवा-परिचर्या करती हैं। राजन! यह मेरा धन है, जिसे दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ସେମାନେ ମହାହାର, ମାଳା ଓ ଅଳଙ୍କାରରେ ଭୂଷିତ; ସୁବସ୍ତ୍ରଧାରୀ ଏବଂ ଚନ୍ଦନଲେପିତ। ସେମାନେ ମଣି ଓ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଧାରଣ କରନ୍ତି ଏବଂ ଚୌଷଠି କଳାରେ ପାରଦର୍ଶୀ।

Verse 10

अनुसेवां चरन्तीमा: कुशला नृत्यसामसु । स्नातकानाममात्यानां राज्ञां च मम शासनात्‌ | एतद्‌ राजन्‌ मम धन तेन दीव्याम्यहं त्वया,युधिष्ठिरने कहा--मेरे पास एक लाख तरुणी दासियाँ हैं, जो सुवर्णमय मांगलिक आभूषण धारण करती हैं। जिनके हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ, बाँहोंमें भुजबंद, कण्ठमें निष्कोंका हार तथा अन्य अंगोंमें भी सुन्दर आभूषण हैं। बहुमूल्य हार उनकी शोभा बढ़ाते हैं। उनके वस्त्र बहुत ही सुन्दर हैं। वे अपने शरीरमें चन्दनका लेप लगाती हैं, मणि और सुवर्ण धारण करती हैं तथा चौसठ कलाओंमें निपुण हैं। नृत्य और गानमें भी वे कुशल हैं। ये सब-की-सब मेरे आदेशसे स्नातकों, मन्त्रियों तथा राजाओंकी सेवा-परिचर्या करती हैं। राजन! यह मेरा धन है, जिसे दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଏହି ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ସେବା-ପରିଚର୍ୟାରେ ନିୟୁକ୍ତ ଓ ନୃତ୍ୟ-ଗାନରେ କୁଶଳ। ମୋ ଆଦେଶରେ ସେମାନେ ସ୍ନାତକ, ମୋ ଅମାତ୍ୟ ଏବଂ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସେବା କରନ୍ତି। ହେ ରାଜନ, ଏହି ମୋର ଧନ; ଏହାକୁ ଦାଉରେ ରଖି ମୁଁ ତୁମ ସହ ଚୌପଡ଼ ଖେଳୁଛି।

Verse 11

वैशम्पायन उवाच एतच्छुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रित: । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर कपटी शकुनिने पुनः जीतका निश्चय करके पासे फेंके और युधिष्ठिरसे कहा--“यह दाँव भी मैंने ही जीता”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏହା ଶୁଣି, ଛଳର ଆଶ୍ରୟ ନେଇ ଜୟରେ ନିଶ୍ଚିତ ଶକୁନି ପୁଣି ପାଶା ଫେଙ୍ଗି ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ କହିଲା—“ଏହି ଦାଉ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଜିତିଲି।”

Verse 12

युधिछिर उवाच एतावन्ति च दासानां सहस्राण्युत सन्ति मे । प्रदक्षिणानुलोमाश्न प्रावारवसना: सदा,युधिष्ठिरने कहा--दासियोंकी तरह ही मेरे यहाँ एक लाख दास हैं। वे कार्यकुशल तथा अनुकूल रहनेवाले हैं। उनके शरीरपर सदा सुन्दर उत्तरीय वस्त्र सुशोभित होते हैं

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଦାସୀମାନଙ୍କ ପରି ମୋ ପାଖରେ ଦାସମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ ଏତେ ସହସ୍ର ଅଛି। ସେମାନେ କାର୍ଯ୍ୟକୁଶଳ, ଆଚରଣରେ ଅନୁକୂଳ, ଏବଂ ସଦା ସୁନ୍ଦର ଉତ୍ତରୀୟ ବସ୍ତ୍ରରେ ସୁଶୋଭିତ।

Verse 13

प्राज्ञा मेधाविनो दान्ता युवानो मृष्टकुण्डला: । पात्रीहस्ता दिवारात्रमतिथीन्‌ भोजयन्त्युत । एतद्‌ू राजन्‌ मम धन तेन दीव्याम्यहं त्वया,वे चतुर, बुद्धिमान, संयमी और तरुण अवस्थावाले हैं। उनके कानोंमें कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं। वे हाथोंमें भोजनपात्र लिये दिन-रात अतिथियोंको भोजन परोसते रहते हैं। राजन्‌! यह मेरा धन है, जिसे दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ମୋ ପାଖରେ ପ୍ରାଜ୍ଞ, ମେଧାବୀ, ସଂଯମୀ ଯୁବକମାନେ ଅଛନ୍ତି; ତାଙ୍କ କାନରେ ଝଲମଲ କୁଣ୍ଡଳ ଶୋଭା ପାଉଛି। ସେମାନେ ହାତରେ ଭୋଜନପାତ୍ର ଧରି ଦିନ-ରାତି ଅତିଥିମାନଙ୍କୁ ଭୋଜନ କରାନ୍ତି। ହେ ରାଜନ! ଏହି ମୋର ଧନ; ଏହାକୁ ଦାଉରେ ରଖି ମୁଁ ତୁମ ସହ ଖେଳୁଛି।

Verse 14

वैशम्पायन उवाच एतच्छुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रित: । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर पुनः शठताका आश्रय लेनेवाले शकुनिने अपनी ही जीतका निश्चय करके युधिष्ठिस्से कहा--“लो, यह दाँव भी मैंने जीत लिया”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଏହା ଶୁଣି, ନିଶ୍ଚୟ କରି ପୁଣି ଠକେଇର ଆଶ୍ରୟ ନେଇ, ଶକୁନି ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ କହିଲା—“ଜିତ ମୋର ହେଲା।”

Verse 15

युधिछिर उवाच सहस्रसंख्या नागा मे मत्तास्तिष्ठन्ति सौबल । हेमकक्षा: कृतापीडा: पद्मिनो हेममालिन:,युधिष्ठिरने कहा--सुबलकुमार! मेरे यहाँ एक हजार मतवाले हाथी हैं, जिनके बाँधनेके रस्से सुवर्णमय हैं। वे सदा आभूषणोंसे विभूषित रहते हैं। उनके कपोल और मस्तक आदि अंगोंपर कमलके चिह्न बने हुए हैं। उनके गलेमें सोनेके हार सुशोभित होते हैं

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ସୌବଲ! ମୋ ପାଖରେ ସହସ୍ର ସଂଖ୍ୟକ ମତ୍ତ ହାତୀ ସଜାଗ ହୋଇ ଦାଁଡ଼ିଛନ୍ତି। ସେମାନଙ୍କର ବାନ୍ଧିବା ଦୋରି ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ; ମସ୍ତକରେ ଗଢ଼ା ଶିରୋଭୂଷଣ; କପୋଳ ଓ ଲଲାଟରେ ପଦ୍ମଚିହ୍ନ; ଏବଂ ଗଳାରେ ସୁନାର ମାଳା ଶୋଭା ପାଉଛି।

Verse 16

वे अच्छी तरह वशमें किये हुए हैं और राजाओंकी सवारीके काममें आते हैं। युद्धमें वे सब प्रकारके शब्द सहन करनेवाले हैं। उनके दाँत हलदण्डके समान लंबे हैं और शरीर विशाल है। उनमेंसे प्रत्येकके आठ-आठ हथिनियाँ हैं

ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଭଲଭାବେ ବଶୀଭୂତ ଏବଂ ରାଜସବାରୀର ଯୋଗ୍ୟ। ଯୁଦ୍ଧରେ ସେମାନେ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର କୋଲାହଳ ସହିପାରନ୍ତି। ସେମାନଙ୍କ ଦାନ୍ତ ହଳଦଣ୍ଡ ପରି ଲମ୍ବା, ଦେହ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିଶାଳ। ପ୍ରତ୍ୟେକ ହାତୀଙ୍କ ସହ ଆଠ-ଆଠ ହାତିଣୀ ପରିଚାରିକା ରହନ୍ତି।

Verse 17

सर्वे च पुरभेत्तारो नवमेघनिभा गजा: । एतद्‌ राजन्‌ मम धन तेन दीव्याम्यहं त्वया,उनकी कान्ति नूतन मेघोंकी घटाके समान है। वे सब-के-सब बड़े-बड़े नगरोंको भी नाश कर देनेकी शक्ति रखते हैं। राजन! यह मेरा धन है, जिसे दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ

ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ପୁରଭେତ୍ତା; ତାଙ୍କର କାନ୍ତି ନୂତନ ମେଘଘଟା ପରି। ହେ ରାଜନ! ଏହି ମୋର ଧନ; ଏହାକୁ ଦାଉରେ ରଖି ମୁଁ ତୁମ ସହ ଖେଳୁଛି।

Verse 18

वैशम्पायन उवाच इत्येवंवादिनं पार्थ प्रहसन्निव सौबल: । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! ऐसी बातें कहते हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरसे शकुनिने हँसकर कहा--“इस दाँवको भी मैंने ही जीता”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଏପରି କହୁଥିବା କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ସୌବଳ ଶକୁନି ହସିବା ପରି କହିଲା—“ଜିତିଲି—ହଁ, ଏହି ଦାଉଟି ମଧ୍ୟ ମୁଁ ହିଁ ଜିତିଲି।”

Verse 19

युधिछिर उवाच रथास्तावन्त एवेमे हेमदण्डा: पताकिन: । हयैर्विनीतै: सम्पन्ना रथिभिश्ित्रयोधिभि:,युधिष्ठिरने कहा--मेरे पास उतने ही अर्थात्‌ एक हजार रथ हैं, जिनकी ध्वजाओंमें सोनेके डंडे लगे हैं। उन रथोंपर पताकाएँ फहराती रहती हैं। उनमें सधे हुए घोड़े जोते जाते हैं और विचित्र युद्ध करनेवाले रथी उनमें बैठते हैं। उन रथियोंमेंसे प्रत्येकको अधिक-से- अधिक एक सहस््र स्वर्णमुद्राएँतक वेतनमें मिलती हैं। वे युद्ध कर रहे हों या न कर रहे हों, प्रत्येक मासमें उन्हें यह वेतन प्राप्त होता रहता है। राजन! यह मेरा धन है, इसे दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ମୋ ପାଖରେ ଠିକ୍ ସେତେ, ଅର୍ଥାତ୍ ଏକ ହଜାର ରଥ ଅଛି—ସୁବର୍ଣ୍ଣଦଣ୍ଡଯୁକ୍ତ ପତାକା ସହିତ। ସେଗୁଡ଼ିକ ସୁଶିକ୍ଷିତ ଘୋଡ଼ାରେ ସମ୍ପନ୍ନ, ଏବଂ ନାନା ପ୍ରକାର ଯୁଦ୍ଧରେ ପାରଙ୍ଗତ ରଥୀମାନେ ତାହାରେ ବସନ୍ତି।”

Verse 20

एकैको ह्वात्र लभते सहस्रपरमां भृतिम्‌ । युध्यतो<्युध्यतो वापि वेतनं मासकालिकम्‌ । एतद्‌ राजन्‌ मम धन तेन दीव्याम्यहं त्वया,युधिष्ठिरने कहा--मेरे पास उतने ही अर्थात्‌ एक हजार रथ हैं, जिनकी ध्वजाओंमें सोनेके डंडे लगे हैं। उन रथोंपर पताकाएँ फहराती रहती हैं। उनमें सधे हुए घोड़े जोते जाते हैं और विचित्र युद्ध करनेवाले रथी उनमें बैठते हैं। उन रथियोंमेंसे प्रत्येकको अधिक-से- अधिक एक सहस््र स्वर्णमुद्राएँतक वेतनमें मिलती हैं। वे युद्ध कर रहे हों या न कर रहे हों, प्रत्येक मासमें उन्हें यह वेतन प्राप्त होता रहता है। राजन! यह मेरा धन है, इसे दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ଏଠାରେ ପ୍ରତ୍ୟେକେ ସର୍ବାଧିକ ଏକ ସହସ୍ର ଭୃତି (ବେତନ) ପାଉଛନ୍ତି। ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିବେ କି ନ କରୁଥିବେ, ମାସିକ ବେତନ ମିଳେ। ରାଜନ! ଏହି ମୋର ଧନ; ଏହାକୁ ଦାଉରେ ରଖି ମୁଁ ତୁମ ସହ ଖେଳୁଛି।”

Verse 21

वैशग्पायन उवाच इत्येवमुक्ते वचने कृतवैरो दुरात्मवान्‌ | जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! उनके ऐसा कहनेपर वैरी दुरात्मा शकुनिने युधिष्ठिरसे कहा--'लो, यह भी जीत लिया”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଏପରି କହିଦେବା ପରେ, ବୈର ଧରିଥିବା ଦୁରାତ୍ମା ଶକୁନି ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ କହିଲା—“ଜିତିଲି—ଏହା ମଧ୍ୟ ଜିତିଲି।”

Verse 22

युधिछिर उवाच अध्चांस्तित्तिरिकल्माषान्‌ गान्धर्वान्‌ हेममालिन: । ददौ चित्ररथस्तुष्टो यांस्तान्‌ गाण्डीवधन्चने

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ଗାଣ୍ଡୀବଧାରୀଙ୍କୁ ସେହି ତିତ୍ତିରି ଓ କଲ୍ମାଷ ଚିହ୍ନିତ ଗାନ୍ଧର୍ବ ଅଶ୍ୱ—ସୁବର୍ଣ୍ଣମାଳାରେ ଶୋଭିତ—ପ୍ରସନ୍ନ ଚିତ୍ରରଥ ଦାନ କରିଥିଲେ।”

Verse 23

युद्धे जित: पराभूत: प्रीतिपूर्वमरिंदम: । एतद्‌ राजन्‌ मम धन तेन दीव्याम्यहं त्वया

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଯୁଦ୍ଧରେ ମୁଁ ଜିତାଯାଇ, ପରାଜିତ ହୋଇ ନିମ୍ନ ହେଲି; ତଥାପି ଶତ୍ରୁଦମନ ସେ ବିରୋଧୀ ମୋ ପ୍ରତି ପ୍ରୀତିପୂର୍ବକ ସଦ୍ଭାବ ରଖିଲା। ହେ ରାଜନ! ଏହି ମୋର ଧନ; ଏହି ଦାଉରେ ରଖି ମୁଁ ତୁମ ସହ ଖେଳୁଛି।

Verse 24

युधिष्ठिरने कहा--मेरे यहाँ तीतर पक्षीके समान विचित्र वर्णवाले गन्धर्वदेशके घोड़े हैं, जो सोनेके हारसे विभूषित हैं। शत्रुदमन चित्ररथ गन्धर्वने युद्धमें पराजित एवं तिरस्कृत होनेके पश्चात्‌ संतुष्ट हो गाण्डीवधारी अर्जुनको प्रेमपूर्वक वे घोड़े भेंट किये थे। राजन्‌! यह मेरा धन है जिसे दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ ।। वैशम्पायन उवाच 48 अल निकृतिं समुपाश्रित: । शकुनिर्युधिष्ठटिरमभाषत

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ମୋ ପାଖରେ ଗନ୍ଧର୍ବଦେଶର ଘୋଡ଼ା ଅଛି; ତିତିର ପକ୍ଷୀ ପରି ବିଚିତ୍ର ବର୍ଣ୍ଣର, ସୁବର୍ଣ୍ଣ ହାରରେ ଭୂଷିତ। ଯୁଦ୍ଧରେ ପରାଜିତ ଓ ଅପମାନିତ ହେବା ପରେ ମଧ୍ୟ ଶତ୍ରୁଦମନ ଗନ୍ଧର୍ବ ଚିତ୍ରରଥ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ହୋଇ, ଗାଣ୍ଡୀବଧାରୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ପ୍ରେମପୂର୍ବକ ସେ ଘୋଡ଼ାଗୁଡ଼ିକ ଉପହାର ଦେଇଥିଲା। ହେ ରାଜନ! ଏହି ମୋର ଧନ; ଏହି ଦାଉରେ ରଖି ମୁଁ ତୁମ ସହ ଖେଳୁଛି।

Verse 25

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर छलका आश्रय लेनेवाले शकुनिने पुनः अपनी ही जीतका निश्चय करके युधिष्ठिरसे कहा--“यह दाँव भी मैंने ही जीता है” ।। युधिछिर उवाच रथानां शकटानां च श्रेष्ठानां चायुतानि मे । युक्तान्येव हि तिष्ठन्ति वाहैरुच्चावचैस्तथा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ଏହା ଶୁଣି ଛଳକୁ ଆଶ୍ରୟ କରିଥିବା ଶକୁନି ପୁଣି ନିଜ ଜୟକୁ ନିଶ୍ଚିତ କରି ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ କହିଲା—“ଏହି ଦାଉ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଜିତିଲି।” ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ମୋ ପାଖରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରଥ ଓ ଶକଟ ଦଶ-ଦଶ ହଜାର ଅଛି; ବିଭିନ୍ନ ପ୍ରକାର ଘୋଡ଼ା ସହ ସେଗୁଡ଼ିକ ପୂର୍ବରୁ ଯୋଡ଼ା ହୋଇ ସଜ୍ଜ ଅଛି।

Verse 26

सुदान्ता राजवहना: सर्वशब्दक्षमा युधि । ईषादन्ता महाकाया: सर्वे चाष्टकरेणव:,युधिष्ठिरने कहा--मेरे पास दस हजार श्रेष्ठ रथ और छकड़े हैं। जिनमें छोटे-बड़े वाहन सदा जुटे ही रहते हैं ।। एवं वर्णस्य वर्णस्य समुच्चीय सहस्रश: । यथा समुदिता वीरा: सर्वे वीरपराक्रमा: इसी प्रकार प्रत्येक वर्णके हजारों चुने हुए योद्धा मेरे यहाँ एक साथ रहते हैं। वे सब-के- सब वीरोचित पराक्रमसे सम्पन्न एवं शूरवीर हैं

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ମୋର ରାଜବାହନଗୁଡ଼ିକ ସୁଶିକ୍ଷିତ; ଯୁଦ୍ଧର ଭିଡ଼ରେ ସମସ୍ତ ଆଜ୍ଞା ସହିବାକୁ ସମର୍ଥ। ସେମାନଙ୍କ ଯୁଆ ଦୃଢ଼, ଦେହ ବିଶାଳ, ଏବଂ ସମସ୍ତେ ଅଷ୍ଟକ-ଦଳରେ (ଆଠ ଆଠ କରି) ଯୋଡ଼ାଯିବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ। ଏହିପରି ପ୍ରତ୍ୟେକ ବର୍ଣ୍ଣରୁ ହଜାର ହଜାର ଚୟିତ ଯୋଦ୍ଧା ମୋ ସେବାରେ ଏକତ୍ର ରହନ୍ତି—ସମସ୍ତେ ବୀରପରାକ୍ରମସମ୍ପନ୍ନ।

Verse 27

क्षीर॑ पिबन्तस्तिष्ठन्ति भुज्जाना: शालितण्डुलान्‌ | षष्टिस्तानि सहस््राणि सर्वे विपुलवक्षस: । एतद्‌ राजन्‌ मम धन तेन दीव्याम्यहं त्वया,उनकी संख्या साठ हजार है। वे दूध पीते और शालिके चावलका भात खाकर रहते हैं। उन सबकी छाती बहुत चौड़ी है। राजन! यह मेरा धन है, जिसे दाँवपर रखकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ସେମାନେ ଦୁଧ ପିଇ ଓ ଶାଳି ଧାନର ଚାଉଳର ଭାତ ଖାଇ ରହନ୍ତି। ସେମାନଙ୍କ ସଂଖ୍ୟା ସାଠି ହଜାର; ସମସ୍ତେ ବିଶାଳ ବକ୍ଷସ୍ଥଳୀ। ହେ ରାଜନ! ଏହି ମୋର ଧନ; ଏହି ଦାଉରେ ରଖି ମୁଁ ତୁମ ସହ ଖେଳୁଛି।

Verse 28

वैशम्पायन उवाच पी आर ९ निकृतिं समुपाश्रित: । शकुनिर्युधिष्ठटिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर शठताके उपासक शकुनिने पुनः युधिष्ठिरसे पूर्ण निश्चयके साथ कहा--“यह दाँव भी मैंने ही जीता है”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଛଳକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ଶକୁନି ଦୃଢ ନିଶ୍ଚୟରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ କହିଲା—“ଏହି ଦାଉ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଏକା ଜିତିଛି।”

Verse 29

युधिछिर उवाच ताम्रलोहै: परिवृता निधयो ये चतु:शता: । पज्चद्रौणिक एकैक: सुवर्णस्याहतस्य वै,युधिष्ठिरने कहा--मेरे पास ताँबे और लोहेकी चार सौ निधियाँ यानी खजानेसे भरी हुई पेटियाँ हैं। प्रत्येकमें पाँच-पाँच द्रोण विशुद्ध सोना भरा हुआ है, वह सारा सोना तपाकर शुद्ध किया हुआ है, उसकी कीमत आँकी नहीं जा सकती। भारत! यह मेरा धन है, जिसे दाँवपर रखकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ତାମ୍ର ଓ ଲୋହାରେ ବନ୍ଧା ମୋର ଚାରିଶେ ନିଧି (ଖଜାନା ପେଟି) ଅଛି। ପ୍ରତ୍ୟେକରେ ପାଞ୍ଚ-ପାଞ୍ଚ ଦ୍ରୋଣ ପରିମାଣର ତପାଇ ଶୁଦ୍ଧ କରା ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଭରିଛି। ହେ ଭାରତ! ଏହି ମୋର ଧନ; ଏହାକୁ ଦାଉରେ ରଖି ମୁଁ ତୋ ସହ ଖେଳୁଛି।

Verse 30

जातरूपस्य मुख्यस्य अनर्घेयस्थ भारत । एतद्‌ राजन्‌ मम धन तेन दीव्याम्यहं त्वया,युधिष्ठिरने कहा--मेरे पास ताँबे और लोहेकी चार सौ निधियाँ यानी खजानेसे भरी हुई पेटियाँ हैं। प्रत्येकमें पाँच-पाँच द्रोण विशुद्ध सोना भरा हुआ है, वह सारा सोना तपाकर शुद्ध किया हुआ है, उसकी कीमत आँकी नहीं जा सकती। भारत! यह मेरा धन है, जिसे दाँवपर रखकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ମୋ ପାଖରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଜାତରୂପ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଅଛି, ଯାହା ଅମୂଲ୍ୟ। ହେ ରାଜନ! ଏହି ମୋର ଧନ; ଏହାକୁ ଦାଉରେ ରଖି ମୁଁ ତୋ ସହ ଦ୍ୟୂତ ଖେଳୁଛି।

Verse 31

वैशम्पायन उवाच ४: 4 आट निकृतिं समुपाश्रित: । शकुनिर्युधिष्टिमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा सुनकर छलका आश्रय लेनेवाले शकुनिने पूर्ववत्‌ पूर्ण निश्चयके साथ युधिष्ठिससे कहा--“यह दाँव भी मैंने ही जीता”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏହା ଶୁଣି ଛଳକୁ ଆଶ୍ରୟ କରିଥିବା ଶକୁନି ପୂର୍ବବତ୍ ଦୃଢ ନିଶ୍ଚୟରେ ପୁଣି ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ କହିଲା—“ଏହି ଦାଉ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଜିତିଛି।”

Verse 60

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापवव॑के अन्तर्गत झ्टूतपर्वमें झूतारम्भविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଦ୍ୟୂତାରମ୍ଭବିଷୟକ ଷଷ୍ଟିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 61

इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि देवने एकषष्टितमो5ध्याय:

ଏହିପରି ପବିତ୍ର ମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବର ଦ୍ୟୂତପର୍ବ (ଦେବନ) ଅଂଶରେ ଏକଷଷ୍ଟିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା। ଏହି ସମାପନ-ଉକ୍ତି ଜୁଆକୁ କେନ୍ଦ୍ର କରିଥିବା କଥାଖଣ୍ଡର ପୂର୍ଣ୍ଣତା ସୂଚାଏ—ଯେଉଁଠାରେ କାମନା, ଗର୍ବ ଓ ରାଜନୈତିକ ଗଣନା ସଂଯମକୁ ଢାଙ୍କି ଦେଇ, ଆଗାମୀ ଗଭୀର ନୈତିକ ପତନ ଓ ତାହାର ପରିଣାମକୁ ପୂର୍ବାଭାସ ଦିଏ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether a public wager and its outcomes can be treated as binding when the bettor has already lost autonomy and when the stake involves another person’s status—raising the question of consent, authority, and the assembly’s duty to invalidate an ethically defective procedure.

The chapter teaches that dharma in institutions depends on truthful speech and timely adjudication: silence in the face of wrongdoing is not neutral, and rule-following without ethical scrutiny can become a vehicle for adharma.

There is no conventional phalaśruti; instead, the chapter offers meta-commentary through Vidura’s exemplum, asserting that failing to answer a dharma-question or answering falsely produces moral consequences, while truthful testimony preserves both dharma and social legitimacy.