सभा-पर्व, अध्याय ६१ — द्रौपदी-प्रश्नः, सभाधर्मः, सत्यवचन-नियमः
युधिछिर उवाच एतावन्ति च दासानां सहस्राण्युत सन्ति मे । प्रदक्षिणानुलोमाश्न प्रावारवसना: सदा,युधिष्ठिरने कहा--दासियोंकी तरह ही मेरे यहाँ एक लाख दास हैं। वे कार्यकुशल तथा अनुकूल रहनेवाले हैं। उनके शरीरपर सदा सुन्दर उत्तरीय वस्त्र सुशोभित होते हैं
yudhiṣṭhira uvāca | etāvanti ca dāsānāṃ sahasrāṇy uta santi me | pradakṣiṇānulomāś ca prāvāravasanāḥ sadā ||
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଦାସୀମାନଙ୍କ ପରି ମୋ ପାଖରେ ଦାସମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ ଏତେ ସହସ୍ର ଅଛି। ସେମାନେ କାର୍ଯ୍ୟକୁଶଳ, ଆଚରଣରେ ଅନୁକୂଳ, ଏବଂ ସଦା ସୁନ୍ଦର ଉତ୍ତରୀୟ ବସ୍ତ୍ରରେ ସୁଶୋଭିତ।
युधिछिर उवाच