
नारदेन दिव्यसभाः कथितुं प्रतिज्ञा (Nārada’s Prelude to Describing the Divine Assemblies)
Upa-parva: Sabhā-Varṇana / Deva-Sabhā-Kathana (Narration of Divine Assemblies)
Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira, having honored a sage’s counsel, responds in an ordered and deferential manner, emphasizing adherence to dharma according to capacity and proper procedure. Observing the appropriate moment, he approaches Nārada seated at ease amid the assembled kings and inquires about comparable or superior assemblies Nārada has witnessed across the many worlds he traverses. Nārada replies that among humans he has neither seen nor heard of an assembly like Yudhiṣṭhira’s jeweled hall, yet he offers to describe, in sequence, the divine sabhās of Yama (Pitṛrāja), Varuṇa, Indra, Kubera, Śiva (Kailāsa-dweller), and Brahmā, provided Yudhiṣṭhira wishes to listen. Yudhiṣṭhira, with brothers and attending rulers, requests comprehensive details: the substances, dimensions, and the principal figures who attend those courts. Nārada agrees to narrate the divine assemblies systematically, establishing the chapter as a formal prologue to a comparative cosmological account.
Chapter Arc: धर्मराज युधिष्ठिर, नारद के मुख से राजधर्म और धर्म-निश्चय की यथार्थता सुनकर, उससे भी आगे दिव्य लोकों की अद्भुत सभाओं का रहस्य जानने को उत्कंठित हो उठते हैं। → युधिष्ठिर प्रश्नों को क्रमशः तीक्ष्ण करते हैं—वे सभाएँ किस द्रव्य से बनीं, उनका विस्तार-आयाम क्या है, और उनमें किन-किन देवों तथा महापुरुषों का आसन-पर्युपासन होता है; पाण्डवों और उपस्थित ब्राह्मणों का कौतूहल सामूहिक रूप से बढ़ता जाता है। → नारद घोषणा करते हैं कि वे क्रम से पितृराज, वरुण, इन्द्र (कैलास-निलय सहित) आदि की दिव्य सभाओं का वर्णन करेंगे—और सभा-वैभव का द्वार खुलने ही वाला है। → युधिष्ठिर हाथ जोड़कर, भ्राताओं और द्विजोत्तमों सहित, विनयपूर्वक श्रवण-याचना करते हैं; नारद उत्तर देने को प्रस्तुत होकर वर्णन की रूपरेखा बाँध देते हैं। → नारद कहते हैं—“क्रमेण… दिव्यास्ता: सभा:”—अब अगली कड़ी में उन सभाओं का वास्तविक, विस्तृत चित्रण आरम्भ होगा।
Verse 1
शी मी, (9) भ्ीक्श्ना ता 3. परस्पर विरुद्ध प्रतीत होनेवाले वेदके वचनोंकी एकवाक्यता। ४. एकमें मिले हुए वचनोंको प्रयोगके अनुसार अलग-अलग करना। ५. यज्ञके अनेक कर्मोंके एक साथ उपस्थित होनेपर अधिकारके अनुसार यजमानके साथ कर्मका जो सम्बन्ध होता है, उसका नाम समवाय है। > दूसरेको किसी वस्तुका बोध करानेके लिये प्रवृत्त हुआ पुरुष जिस अनुमानवाक्यका प्रयोग करता है, उसमें पाँच अवयव होते हैं--प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन। जैसे किसीने कहा--'इस पर्वतपर आग है” यह वाक्य प्रतिज्ञा है। “क्योंकि वहाँ धूम है” यह हेतु है। 'जैसे रसोईघरमें धूआँ दीखनेपर वहाँ आग देखी जाती है” यह दृष्टान्त ही उदाहरण है। “चूँकि इस पर्वतपर धूआँ दिखायी देता है” हेतुकी इस उपलब्धिका नाम उपनय है। “इसलिये वहाँ आग है” यह निश्चय ही निगमन है। इस वाक्यमें अनुकूल तर्कका होना गुण है और प्रतिकूल तर्कका होना दोष है, जैसे “यदि वहाँ आग न होती, तो धूआँ भी नहीं उठता” यह अनुकूल तर्क है। जैसे कोई तालाबसे भाप उठती देखकर यह कहे कि इस तालाबमें आग है, तो उसका वह अनुमान आश्रयासिद्धरूप हेत्वाभाससे युक्त होगा। $. दक्षस्मृतिमें त्रिवर्ससेवनका काल-विभाग इस प्रकार बताया गया है-- पूर्वह्ने त्वाचरेद् धर्म मध्याह्लै&र्थमुपार्जयेत् | सायाह्लै चाचरेत् काममित्येषा वैदिकी श्रुति: ।। पूर्वाह्नकालमें धर्मका आचरण करे, मध्याह्नके समय धनोपार्जनका काम देखे और सायाह्न (रात्रि)-के समय कामका सेवन करे। यह वैदिक श्रुतिका आदेश है। (नीलकण्ठीसे उद्धृत) २. राजाओंमें छः गुण होने चाहिये--व्याख्यानशक्ति, प्रगल्भता, तर्ककुशलता, भूतकालकी स्मृति, भविष्यपर दृष्टि तथा नीतिनिपुणता। 3. सात उपाय ये हैं--मन्त्र, औषध, इन्द्रजाल, साम, दान, दण्ड और भेद। ४. परीक्षाके योग्य चौदह स्थान या व्यक्ति नीतिशास्त्रमें इस प्रकार बताये गये हैं-- देशो दुर्ग रथो हस्तिवाजियोधाधिकारिण: । अन्तः:पुरान्नगणनाशास्त्रलेख्यधनासव: ।। देश, दुर्ग, रथ, हाथी, घोड़े, शूर सैनिक, अधिकारी, अन्तःपुर, अन्न, गणना, शास्त्र, लेखय, धन और असु (बल), इनके जो चौदह अधिकारी हैं, राजाओंको उनकी परीक्षा करते रहना चाहिये। ५. राजाके कोष और धनकी वृद्धिके लिये आठ कर्म ये हैं-- कृषिर्वणिकृपथो दुर्ग सेतु: कुडजरबन्धनम् | खन््याकरकरादानं शून्यानां च निवेशनम् ।। अष्ट संधानकर्माणि प्रयुक्तानि मनीषिभि: ।। खेतीका विस्तार, व्यापारकी रक्षा, दुर्गकी रचना एवं रक्षा, पुलोंका निर्माण और उनकी रक्षा, हाथी बाँधना, सोने-हीरे आदिकी खानोंपर अधिकार करना, करकी वसूली और उजाड़ प्रान्तोंमें लोगोंको बसाना --मनीषी पुरुषोंद्वारा ये आठ संधानकर्म बताये गये हैं। <£. स्वामी, मन्त्री, मित्र, कोष, राष्ट्र, दुर्ग तथा सेना एवं पुरवासी--ये राज्यके सात अंग ही सात प्रकृतियाँ हैं। अथवा-दुर्गाध्यक्ष, बलाध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, सेनापति, पुरोहित, वैद्य और ज्योतिषी--ये भी सात प्रकृतियाँ कही गयी हैं। > स्मृतिमें कहा है कि--'ब्राहों मुहूर्त चोत्थाय चिन्तयेदात्मनो हितम् । अर्थात् ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर अपने हितका चिन्तन करे। (नीलकण्ठी टीकासे उद्धृत) $. शत्रुपक्षके मन््त्री, पुरोहित, युवराज, सेनापति, द्वारपाल, अन्तर्वेशिक (अन्तः:पुरका अध्यक्ष), कारागाराध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, यथायोग्य कार्योंमें धनको व्यय करनेवाला सचिव, प्रदेष्टा (पहरेदारोंको काम बतानेवाला), नगराध्यक्ष (कोतवाल), कार्यनिर्माणकर्ता (शिल्पियोंका परिचालक), धर्माध्यक्ष, सभाध्यक्ष, दण्डपाल, दुर्गपाल, राष्ट्रसीमापाल तथा वनरक्षक--ये अठारह तीर्थ हैं, जिनपर राजाको दृष्टि रखनी चाहिये। २. उपर्युक्त टिप्पणीमें अठारह तीर्थोमेंसे आदिके तीनको छोड़कर शेष पंद्रह तीर्थ अपने पक्षके भी सदा परीक्षणीय हैं। > विजयके इच्छुक राजाके आगे खड़े होनेवाले उसके शत्रुके शत्रु २, उन शत्रुओंके मित्र २, उन मित्रोंके मित्र २-ये छः व्यक्ति युद्धमें आगे खड़े होते हैं। विजिगीषुके पीछे पार्ण्णिग्राह (पृष्ठरक्षक) और आक्रन्द (उत्साह दिलानेवाला)--ये दो व्यक्ति खड़े होते हैं। इन दोनोंकी सहायता करनेवाले एक-एक व्यक्ति इनके पीछे खड़े होते हैं, जिनकी आसार संज्ञा है। ये क्रमशः पार्ष्णिग्राहासार और आक्रन्दासार कहे जाते हैं। इस प्रकार आगेके छः: और पीछेके चार मिलकर दस होते हैं। विजिगीषुके पार्श्रभागमें मध्यम और उसके भी पार्श्रभागमें उदासीन होता है। इन दोनोंको जोड़ लेनेसे इन सबकी संख्या बारह होती है। इन्हींको द्वादश राजमण्डल अथवा :पा्णिमूल' कहते हैं। अपने और शत्रुपक्षके इन व्यक्तियोंको जानना चाहिये। ३. नीतिशास्त्रके अनुसार विजयकी इच्छा रखनेवाले राजाको चाहिये कि वह शत्रुपक्षके सैनिकोंमेंसे जो लोभी हो, किंतु जिसे वेतन न मिला हो, जो मानी हो किंतु किसी तरह अपमानित हो गया हो, जो क्रोधी हो और उसे क्रोध दिलाया गया हो, जो स्वभावसे ही डरनेवाला हो और उसे पुन: डरा दिया गया हो--इन चार प्रकारके लोगोंको फोड़ ले और अपने पक्षमें ऐसे लोग हों, तो उन्हें उचित सम्मान देकर मिला ले। २. व्यसन दो प्रकारके हैं--दैव और मानुष। दैव व्यसन पाँच प्रकारके हैं--अग्नि, जल, व्याधि, दुर्भिक्ष और महामारी। मानुष व्यसन भी पाँच प्रकारका है-मूर्ख पुरुषोंसे, चोरोंसे, शत्रुओंसे, राजाके प्रिय व्यक्तिसे तथा राजाके लोभसे प्रजाको प्राप्त भय। (नीलकंठी टीकाके अनुसार) 3. आठ अंग और चार बल भारतकौमुदीटीकाके अनुसार लिये गये हैं। १. सीमावर्ती गाँवका अधिपति अपने यहाँका राजकीय कर एकत्र करके ग्रामाधिपतिको दे, ग्रामाधिपति नगराधिपतिको, वह देशाधिपतिको और देशाधिपति साक्षात् राजाको वह धन अर्पित करे। २. नाड़ी, मल, मूत्र, जिह्ना, नेत्र, रूप, शब्द तथा स्पर्श--ये आठ चिकित्साके प्रकार कहे जाते हैं। ३. लोहेकी बनी हुई उन मशीनोंको, जिनके द्वारा बारूदके बलसे शीशे, काँसे और पत्थरकी गोलियाँ चलायी जाती हैं--यन्त्र कहते हैं। उन यन्त्रोंके प्रयोगकी विधिके प्रतिपादक संक्षिप्त वाक्य ही यन्त्रसूत्र हैं। २. नगरकी रक्षा तथा उन्नतिके साधनोंको बतानेवाले संक्षिप्त वाक््योंको ही यहाँ नागरिक सूत्र कहा गया है। षष्ठो5 ध्याय: युधिष्ठिरकी दिव्य सभाओंके विषयमें जिज्ञासा वैशम्पायन उवाच सम्पूज्याथाभ्यनुज्ञातो महर्षेवचनात् परम् । प्रत्युवाचानुपूर्व्येण धर्मराजो युधिष्िर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! देवर्षि नारदका यह उपदेश पूर्ण होनेपर धर्मराज युधिष्ठिने भलीभाँति उनकी पूजा की; तदनन्तर उनसे आज्ञा लेकर उनके प्रश्नका उत्तर दिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ମହର୍ଷି (ଦେବର୍ଷି ନାରଦ)ଙ୍କ ଉପଦେଶ ସମାପ୍ତ ହେବା ପରେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ତାଙ୍କୁ ବିଧିପୂର୍ବକ ପୂଜା କଲେ। ପରେ ତାଙ୍କର ଅନୁମତି ପାଇ, ପଚାରାଯାଇଥିବା ବିଷୟର ଉତ୍ତର ସେ ଯଥାକ୍ରମେ, ବିଚାରପୂର୍ବକ ଓ ଆଦରସହିତ ଦେଲେ।
Verse 2
युधिछिर उवाच भगवन् न्याय्यमाहैतं यथावद् धर्मनिश्चयम् । यथाशक्ति यथान्यायं क्रियते5यं विधिर्मया,युधिष्ठिर बोले--भगवन्! आपने जो यह राजधर्मका यथार्थ सिद्धान्त बताया है, वह सर्वथा न्यायोचित है। मैं आपके इस न्यायानुकूल आदेशका यथाशक्ति पालन करता हूँ
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଭଗବନ୍! ଆପଣ ଯେ ରାଜଧର୍ମର ଯଥାର୍ଥ ନିଶ୍ଚୟ କହିଲେ, ସେ ସର୍ବଥା ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ। ଆପଣଙ୍କ ଏହି ନ୍ୟାୟାନୁକୂଳ ବିଧାନକୁ ମୁଁ ଯଥାଶକ୍ତି ପାଳନ କରୁଛି।
Verse 3
राजभिर्यद् यथा कार्य पुरा वै तन्न संशय: । यथान्यायोपनीतार्थ कृत॑ हेतुमदर्थवत्,इसमें संदेह नहीं कि प्राचीन कालके राजाओंने जो कार्य जैसे सम्पन्न किया, वह प्रत्येक न्यायोचित, सकारण और किसी विशेष प्रयोजनसे युक्त होता था
ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ ଯେ ପ୍ରାଚୀନ କାଳର ରାଜାମାନେ ଯେ କାର୍ଯ୍ୟ ଯେପରି କରୁଥିଲେ, ସେସବୁ ନ୍ୟାୟାଧାରିତ, ଯୁକ୍ତିସମ୍ମତ କାରଣରେ ସମର୍ଥିତ ଏବଂ ନିଶ୍ଚିତ ପ୍ରୟୋଜନସହିତ ଯୁକ୍ତ ଥିଲା।
Verse 4
वयं तु सत्पथथं तेषां यातुमिच्छामहे प्रभो । न तु शक््यं तथा गन्तुं यथा तैर्नियतात्मभि:,प्रभो! हम भी उन्हींके उत्तम मार्गसे चलना चाहते हैं, परंतु उस प्रकार (सर्वथा) चल नहीं पाते; जैसे वे नियतात्मा महापुरुष चला करते थे
ପ୍ରଭୋ! ଆମେ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କ ସତ୍ପଥରେ ଚାଲିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛୁ; କିନ୍ତୁ ଯେପରି ନିୟତାତ୍ମା ମହାପୁରୁଷମାନେ ଚାଲୁଥିଲେ, ସେପରି ଚାଲିବା ଆମ ପାଇଁ ସମ୍ଭବ ନୁହେଁ।
Verse 5
वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा स धर्मात्मा वाक््यं तदभिपूज्य च । मुहूर्तात् प्राप्तकालं च दृष्टवा लोकचरं मुनिम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर धर्मात्मा युधिष्ठिरने नारदजीके पूर्वोक्त प्रवचनकी बड़ी प्रशंसा की। फिर सम्पूर्ण लोकोंमें विचरनेवाले नारद मुनि जब शन्तिपूर्वक बैठ गये, तब दो घड़ीके बाद ठीक अवसर जानकर महातेजस्वी पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर भी उनके निकट आ बैठे और सम्पूर्ण राजाओंके बीच वहाँ उनसे इस प्रकार पूछने लगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଏପରି କହି ଧର୍ମାତ୍ମା ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ନାରଦଙ୍କ ବଚନକୁ ଯଥୋଚିତ ଭାବେ ସମ୍ମାନ କଲେ। ପରେ କିଛି ଖଣ୍ଡ ପରେ ଯଥାସମୟ ଆସିଛି ବୋଲି ଦେଖି, ସମସ୍ତ ଲୋକରେ ବିଚରଣ କରୁଥିବା ମୁନି ନାରଦଙ୍କୁ ନିରୀକ୍ଷଣ କରି, ସମବେତ ରାଜାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅଧିକ ପ୍ରଶ୍ନ କରିବାକୁ ଶ୍ରଦ୍ଧାସହିତ ତାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ହେଲେ।
Verse 6
नारदं सुस्थमासीनमुपासीनो युधिष्ठिर: । अपृच्छत् पाण्डवस्तत्र राजमध्ये महाद्युति:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर धर्मात्मा युधिष्ठिरने नारदजीके पूर्वोक्त प्रवचनकी बड़ी प्रशंसा की। फिर सम्पूर्ण लोकोंमें विचरनेवाले नारद मुनि जब शन्तिपूर्वक बैठ गये, तब दो घड़ीके बाद ठीक अवसर जानकर महातेजस्वी पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर भी उनके निकट आ बैठे और सम्पूर्ण राजाओंके बीच वहाँ उनसे इस प्रकार पूछने लगे इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि युधिष्ठिरसभाजिज्ञासायां षष्ठो5ध्याय:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ନାରଦ ମୁନି ଶାନ୍ତ ଓ ସୁଖପୂର୍ବକ ଆସନରେ ବସିଲେ, ତେବେ ମହାଦ୍ୟୁତି ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ନିକଟେ ଉପବେଶନ କଲେ। ପରେ ସେଠାରେ ସମବେତ ରାଜାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସେ ଶ୍ରଦ୍ଧାସହିତ ମୁନିବରଙ୍କୁ ପ୍ରଶ୍ନ କଲେ।
Verse 7
युधिछिर उवाच भवान् संचरते लोकान् सदा नानाविधान् बहून् । ब्रह्मणा निर्मितान् पूर्व प्रेक्षमाणो मनोजव:,युधिष्ठिरे पूछा--मुनिवर! आप मनके समान वेगशाली हैं, अतः ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिनका निर्माण किया है, उन अनेक प्रकारके बहुत-से लोकोंका दर्शन करते हुए आप उनमें सदा बेरोक-टोक विचरते रहते हैं
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ମୁନିବର! ଆପଣ ମନ ସମ ବେଗଶାଳୀ; ବ୍ରହ୍ମା ପୂର୍ବକାଳରେ ନିର୍ମାଣ କରିଥିବା ନାନାବିଧ ଅନେକ ଲୋକକୁ ଦର୍ଶନ କରି କରି ଆପଣ ସଦା ନିରୋଧ ବିନା ବିଚରଣ କରନ୍ତି।
Verse 8
ईदृशी भवता काचिद् दृष्टपूर्वा सभा क्वचित् | इतो वा श्रेयसी ब्रह्मंस्तन्ममाचक्ष्व पृच्छत:,ब्रह्मन! क्या आपने पहले कहीं ऐसी या इससे भी अच्छी कोई सभा देखी है? मैं जानना चाहता हूँ, अतः आप मुझसे यह बात बतावें
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ଆପଣ ପୂର୍ବେ କେଉଁଠି ଏପରି ଏକ ସଭା, କିମ୍ବା ଏହାଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସଭା ଦେଖିଛନ୍ତି କି? ମୁଁ ପଚାରୁଛି; ତେଣୁ ସତ୍ୟଭାବେ ମୋତେ କହନ୍ତୁ।
Verse 9
वैशम्पायन उवाच तच्छुत्वा नारदस्तस्य धर्मराजस्य भाषितम् | पाण्डवं प्रत्युवाचेदं स्मयन् मधुरया गिरा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरका यह प्रश्न सुनकर देवर्षि नारदजी मुसकराने लगे और उन पाण्डुकुमारको इसका उत्तर देते हुए मधुर वाणीमें बोले
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଏହି କଥା ଶୁଣି ଦେବର୍ଷି ନାରଦ ହସିଲେ ଏବଂ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରଙ୍କୁ ମଧୁର ବାଣୀରେ ଉତ୍ତର ଦେବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 10
नारद उवाच मानुषेषु न मे तात दृष्टपूर्वा न च श्रुता । सभा मणिमयी राजन् यथेयं तव भारत,नारदजीने कहा--तात! भरतवंशी नरेश! मणि एवं रत्नोंकी बनी हुई जैसी तुम्हारी यह सभा है, ऐसी सभा मैंने मनुष्यलोकमें न तो पहले कभी देखी है और न कानोंसे ही सुनी है
ନାରଦ କହିଲେ—ତାତ! ଭରତବଂଶୀ ରାଜନ! ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ତୁମର ଏହି ମଣିମୟ ସଭା ପରି ସଭା ମୁଁ ନ ପୂର୍ବେ ଦେଖିଛି, ନ ଶୁଣିଛି।
Verse 11
सभां तु पितराजस्य वरुणस्य च धीमतः । कथयिष्ये तथेन्द्रस्य कैलासनिलयस्य च,भरतश्रेष्ठ) यदि तुम्हारा मन दिव्य सभाओंका वर्णन सुननेको उत्सुक हो तो मैं तुम्हें पितृराज यम, बुद्धिमान् वरुण, स्वर्गवासी इन्द्र, कैलासनिवासी कुबेर तथा ब्रह्माजीकी दिव्य सभाका वर्णन सुनाऊँगा, जहाँ किसी प्रकारका क्लेश नहीं है एवं जो दिव्य और अदिव्य भोगोंसे सम्पन्न तथा संसारके अनेक रूपोंसे अलंकृत है। वह देवता, पितृगण, साध्यगण, याजक तथा मनको वशमें रखनेवाले शान्त मुनिगणोंसे सेवित है। वहाँ उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त वैदिक यज्ञोंका अनुष्ठान होता रहता है
ନାରଦ କହିଲେ—ମୁଁ ପିତୃରାଜ ଯମଙ୍କ ସଭା, ବୁଦ୍ଧିମାନ ବରୁଣଙ୍କ ସଭା, ତଥା ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ସଭା, ଏବଂ କୈଳାସ-ନିବାସୀ (କୁବେର)ଙ୍କ ସଭା ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବି।
Verse 12
ब्रहद्मणश्न सभां दिव्यां कथयिष्ये गतक्लमाम् । दिव्यादिव्यैरभिप्रायैरुपेतां विश्वरूपिणीम्,भरतश्रेष्ठ) यदि तुम्हारा मन दिव्य सभाओंका वर्णन सुननेको उत्सुक हो तो मैं तुम्हें पितृराज यम, बुद्धिमान् वरुण, स्वर्गवासी इन्द्र, कैलासनिवासी कुबेर तथा ब्रह्माजीकी दिव्य सभाका वर्णन सुनाऊँगा, जहाँ किसी प्रकारका क्लेश नहीं है एवं जो दिव्य और अदिव्य भोगोंसे सम्पन्न तथा संसारके अनेक रूपोंसे अलंकृत है। वह देवता, पितृगण, साध्यगण, याजक तथा मनको वशमें रखनेवाले शान्त मुनिगणोंसे सेवित है। वहाँ उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त वैदिक यज्ञोंका अनुष्ठान होता रहता है
ମୁଁ ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ଦିବ୍ୟ ସଭାର ବର୍ଣ୍ଣନା ମଧ୍ୟ କରିବି—ଯାହା ସମସ୍ତ କ୍ଲେଶରୁ ମୁକ୍ତ, ଦିବ୍ୟ ଓ ଅଦିବ୍ୟ ଅଭିପ୍ରାୟ-ଭୋଗରେ ସମ୍ପନ୍ନ, ଏବଂ ବିଶ୍ୱରୂପ ଅଲଙ୍କାରରେ ଶୋଭିତ।
Verse 13
देवैः पितृगणै: साध्यैर्यज्वभिर्नियतात्मभि: । जुष्टां मुनिगणै: शान्तैर्वेदयज्ञै: सदक्षिणै: । यदि ते श्रवणे बुद्धिर्वर्तते भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ) यदि तुम्हारा मन दिव्य सभाओंका वर्णन सुननेको उत्सुक हो तो मैं तुम्हें पितृराज यम, बुद्धिमान् वरुण, स्वर्गवासी इन्द्र, कैलासनिवासी कुबेर तथा ब्रह्माजीकी दिव्य सभाका वर्णन सुनाऊँगा, जहाँ किसी प्रकारका क्लेश नहीं है एवं जो दिव्य और अदिव्य भोगोंसे सम्पन्न तथा संसारके अनेक रूपोंसे अलंकृत है। वह देवता, पितृगण, साध्यगण, याजक तथा मनको वशमें रखनेवाले शान्त मुनिगणोंसे सेवित है। वहाँ उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त वैदिक यज्ञोंका अनुष्ठान होता रहता है
ସେହି ଦିବ୍ୟ ସଭା ଦେବମାନେ, ପିତୃଗଣ, ସାଧ୍ୟଗଣ; ଏବଂ ନିୟତାତ୍ମା ଯଜ୍ଞକର୍ତ୍ତାମାନେ ଓ ଶାନ୍ତ ମୁନିଗଣଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସେବିତ। ସେଠାରେ ଉତ୍ତମ ଦକ୍ଷିଣାସହିତ ବେଦିକ ଯଜ୍ଞ ସଦା ଅନୁଷ୍ଠିତ ହୁଏ। ଭରତର୍ଷଭ! ଯଦି ତୁମ ବୁଦ୍ଧି ଶ୍ରବଣରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ, ମୁଁ ତାହା ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବି।
Verse 14
नारदेनैवमुक्तस्तु धर्मराजो युधिष्ठिर: । प्राउ्जलि र्भ्रातृभि: सार्ध तैश्व सर्वेर्द्धिजोत्तमै:,नारदजीके ऐसा कहनेपर भाइयों तथा सम्पूर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ महामनस्वी धर्मराज युधिष्ठिरने हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार कहा--“महर्ष! हम सभी दिव्य सभाओंका वर्णन सुनना चाहते हैं। आप उनके विषयमें सब बातें बताइये
ନାରଦ ଏପରି କହିବା ପରେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ ଏବଂ ସମସ୍ତ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ସହ, କରଯୋଡ଼ି, ଋଷିଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କରି କହିଲେ।
Verse 15
नारदं प्रत्युवाचेदं धर्मराजो महामना: । सभा: कथय ता: सर्वा: श्रोतुमिच्छामहे वयम्,नारदजीके ऐसा कहनेपर भाइयों तथा सम्पूर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ महामनस्वी धर्मराज युधिष्ठिरने हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार कहा--“महर्ष! हम सभी दिव्य सभाओंका वर्णन सुनना चाहते हैं। आप उनके विषयमें सब बातें बताइये
ନାରଦଜୀ ଏପରି କହିବା ପରେ ମହାମନସ୍ବୀ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଭାଇମାନେ ଓ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ସହିତ ହାତ ଯୋଡ଼ି କହିଲେ— “ମହର୍ଷେ! ଆମେ ସମସ୍ତେ ଦିବ୍ୟ ସଭାମଣ୍ଡପମାନଙ୍କର ବର୍ଣ୍ଣନା ଶୁଣିବାକୁ ଚାହୁଁଛୁ। ଦୟାକରି ସେମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ସବୁ କଥା କହନ୍ତୁ।”
Verse 16
किंद्रव्यास्ता: सभा ब्रह्मन् किंविस्तारा: किमायता: । पितामहं च के तस्यां सभायां पर्युपासते,“ब्रह्म! उन सभाओंका निर्माण किस द्रव्यसे हुआ है? उनकी लंबाई-चौड़ाई कितनी है? ब्रह्माजीकी उस दिव्य-सभामें कौन-कौन सभासद् उन्हें चारों ओरसे घेरकर बैठते हैं?
“ହେ ବ୍ରହ୍ମନ୍! ସେହି ସଭାମଣ୍ଡପମାନେ କେଉଁ ଦ୍ରବ୍ୟରେ ନିର୍ମିତ? ସେମାନଙ୍କର ପ୍ରସ୍ଥ କେତେ, ଦୀର୍ଘତା କେତେ? ଏବଂ ପିତାମହ ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ଦିବ୍ୟ ସଭାରେ କେଉଁ କେଉଁ ସଭାସଦ ତାଙ୍କୁ ଚାରିଦିଗରୁ ଘେରି ବସି ସେବା କରନ୍ତି?”
Verse 17
वासवं देवराजं च यम॑ वैवस्वतं च के । वरुणं च कुबेरं च सभायां पर्युपासते,“इसी प्रकार देवराज इन्द्र, वैवस्वत यम, वरुण तथा कुबेरकी सभामें कौन-कौन लोग उनकी उपासना करते हैं?
“ଏହିପରି ଦେବରାଜ ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର), ବୈବସ୍ୱତ ଯମ, ବରୁଣ ଓ କୁବେରଙ୍କ ସଭାମାନେ କେଉଁ କେଉଁ ଲୋକ ତାଙ୍କର ଉପାସନା କରନ୍ତି?”
Verse 18
एतत् सर्व यथान्यायं ब्रद्मर्षे वदतस्तव । श्रोतुमिच्छाम सहिता: परं कौतूहलं हि नः,“ब्रह्मर्ष! हम सब लोग आपके मुखसे ये सब बातें यथोचित रीतिसे सुनना चाहते हैं। हमारे मनमें उसके लिये बड़ा कौतूहल है”
“ହେ ବ୍ରହ୍ମର୍ଷେ! ଆପଣ ଯାହା କହୁଛନ୍ତି, ସେ ସମସ୍ତ କଥା ଯଥୋଚିତ ରୀତି ଓ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ କ୍ରମରେ ଆପଣଙ୍କ ମୁଖରୁ ଆମେ ସମସ୍ତେ ଶୁଣିବାକୁ ଚାହୁଁଛୁ। ଏଥିପାଇଁ ଆମର ଅତ୍ୟଧିକ କୌତୁହଳ ଅଛି।”
Verse 19
एवमुक्त: पाण्डवेन नारद: प्रत्यभाषत । क्रमेण राजन् दिव्यास्ता: श्रूयन्तामिह न: सभा:,पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर नारदजीने उत्तर दिया--“राजन्! तुम हमसे यहाँ उन सभी दिव्य सभाओंका क्रमश: वर्णन सुनो”
ପାଣ୍ଡବ ଏପରି ପଚାରିବାରେ ନାରଦ କହିଲେ— “ହେ ରାଜନ୍! ଏଠାରେ ଆମଠାରୁ ସେହି ସମସ୍ତ ଦିବ୍ୟ ସଭାମଣ୍ଡପମାନଙ୍କର ବର୍ଣ୍ଣନା କ୍ରମକ୍ରମେ ଶୁଣ।”
A practical dharma tension: Yudhiṣṭhira expresses commitment to the ‘satpatha’ (righteous path) of earlier rulers while acknowledging constraints of capability and circumstance, prompting him to seek authoritative benchmarks.
Governance is strengthened by disciplined inquiry: a ruler should honor counsel, ask precise questions, and compare institutional ideals to lived practice, thereby aligning power with reflective ethical standards.
No explicit phalaśruti appears here; the meta-function is structural—establishing the listener’s readiness (śravaṇa-buddhi) and authorizing Nārada’s sequential narration as a knowledge framework within the parva.