Adhyaya 51
Sabha ParvaAdhyaya 5138 Verses

Adhyaya 51

Dyūta-āhvāna: Śakuni’s Proposal, Vidura’s Warning, and the Summons of Yudhiṣṭhira (Sabhā-parva 51)

Upa-parva: Dyūta-āhvāna (Summons to the Dice-Assembly) Episode

Chapter 51 presents a tightly sequenced court dialogue that operationalizes the dice-game plan. Śakuni declares his intent to remove Yudhiṣṭhira’s prosperity through gambling, portraying dice-play as a domain of assured expertise. Duryodhana endorses the proposal and urges Dhṛtarāṣṭra to consent, while simultaneously discrediting Vidura’s likely counsel as partial to the Pāṇḍavas. Dhṛtarāṣṭra expresses initial reluctance and acknowledges the risk of enmity, yet frames the unfolding as constrained by daiva (destiny). Vaiśaṃpāyana then narrates the king’s practical orders: an opulent assembly hall is prepared with artisans and materials, emphasizing the institutional staging of the event. Dhṛtarāṣṭra instructs Vidura to bring Yudhiṣṭhira with his brothers, presenting the gathering as “friendly” play. Vidura explicitly refuses to approve, warning of kula-nāśa (dynastic collapse) and inevitable conflict; Dhṛtarāṣṭra responds that the world acts under the disposer’s ordinance. The chapter ends with the direct command to Vidura to summon Yudhiṣṭhira, marking the procedural point-of-no-return.

Chapter Arc: दुर्योधन धृतराष्ट्र के सम्मुख पाण्डवों के वैभव का वृत्तान्त छेड़ता है—युधिष्ठिर को भेंट में मिली अपार वस्तुओं को याद कर उसका मन जल उठता है। → वह एक-एक कर दूर-दूर देशों से आए राजाओं, म्लेच्छाधिपतियों और जनपदों की भेंटों का वर्णन करता है—उत्तम ऊन, सुवर्ण-परिष्कृत वस्त्र, तीव्रगामी आजानेय अश्व, विविध रत्न, रस-गन्ध, और असंख्य दासियाँ; यह सूची जितनी बढ़ती है, उतनी ही उसकी हीनता और ईर्ष्या तीखी होती जाती है। → दुर्योधन स्वीकार करता है कि शत्रुओं का वह वैभव देखकर उसका मन ‘मूढ़-सा’ हो गया—समृद्धि का दृश्य उसके भीतर विवेक नहीं, दाह जगाता है; युधिष्ठिर के द्वार पर ‘बलि’ लेकर खड़े राजाओं की भीड़ उसके अहंकार को चीर देती है। → वर्णन का प्रवाह एक निष्कर्ष में ढलता है—पाण्डवों की प्रतिष्ठा और युधिष्ठिर के यज्ञ/सभा-वैभव की सार्वभौमिक स्वीकृति; दुर्योधन के भीतर संताप स्थिर हो जाता है, और वह इसे पिता के सामने शब्द देता है। → यह संताप आगे चलकर किस उपाय में बदलेगा—केवल जलन रहेगा या द्यूत-छल की योजना बनेगा—यह प्रश्न अध्याय के अंत में हवा में टँगा रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपनआ कराता बछ। 2 एकपज्चाशत्तमो< ध्याय: युधिष्ठिरको भेंटमें मिली हुई वस्तुओंका दुर्योधनद्वारा वर्णन दुर्योधन उवाच यन्मया पाण्डवेयानां दृष्टं तच्छूणु भारत | आह्तं भूमिपालैर्हि वसु मुख्यं ततस्ततः,दुर्योधन बोला--भारत! मैंने पाण्डवोंके यज्ञमें राजाओंके द्वारा भिन्न-भिन्न देशोंसे लाये हुए जो उत्तम धनरत्न देखे थे, उन्हें बताता हूँ, सुनिये

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ଭାରତ! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ନିକଟରେ ମୁଁ ଯାହା ଦେଖିଲି, ତାହା ଶୁଣ। ବିଭିନ୍ନ ଦେଶରୁ ରାଜାମାନେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧନରତ୍ନ ଆଣି ଉପହାର ଦେଇଥିଲେ।

Verse 2

नाविदं मूढमात्मानं दृष्टवाहं तदरेर्धनम्‌ । फलतो भूमितो वापि प्रतिपद्यस्व भारत,भरतकुलभूषण! आप सच मानिये, शत्रुओंका वह वैभव देखकर मेरा मन मूढ़-सा हो गया था। मैं इस बातको न जान सका कि यह धन कितना है और किस देशसे लाया गया है

ହେ ଭରତକୁଳଭୂଷଣ! ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କର ସେହି ବୈଭବ ଦେଖି ମୋ ମନ ମୂଢ଼ ହୋଇଗଲା। ଫଳରୁ ହେଉ କି ଭୂମିରୁ—ତାହାର ପରିମାଣ ଓ ଉତ୍ସ ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ କରିପାରିଲି ନାହିଁ; ହେ ଭାରତ, ତୁମେ ଏହା ବୁଝ।

Verse 3

ऑऔर्णान्‌ बैलान्‌ वार्षदंशान्‌ जातरूपपरिष्कृतान्‌ । प्रावाराजिनमुख्यांश्व॒ काम्बोज: प्रददौ बहून्‌,काम्बोजनरेशने भेड़के ऊन, बिलमें रहनेवाले चूहे आदिके रोएँ तथा बिल्लियोंकी रोमावलियोंसे तैयार किये हुए सुवर्णचित्रित बहुत-से सुन्दर वस्त्र और मृगचर्म भेंटमें दिये थे। तीतर पक्षीकी भाँति चितकबरे और तोतेके समान नाकवाले तीन सौ घोड़े दिये थे। इसके सिवा तीन-तीन सौ ऊँटनियाँ और खच्चरियाँ भी दी थीं, जो पीलु, शमी और इंगुद खाकर मोटी-ताजी हुई थीं

କାମ୍ବୋଜ ରାଜା ଭେଡ଼ାର ଉଲ୍‌ ଆଦିରୁ ତିଆରି, ସୁବର୍ଣ୍ଣରେ ସୁଶୋଭିତ ଓ ସୁସଂସ୍କୃତ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପ୍ରାବାର ଓ ଅଜିନ-ପ୍ରମୁଖ ଅନେକ ବସ୍ତ୍ର ଉପହାର ଦେଲେ।

Verse 4

अश्वांस्तित्तिरिकल्माषांस्त्रिशतं शुकनासिकान्‌ | उष्ट्रवामीस्त्रिशतं च पुष्टा: पीलुशमीज्रुदै:,काम्बोजनरेशने भेड़के ऊन, बिलमें रहनेवाले चूहे आदिके रोएँ तथा बिल्लियोंकी रोमावलियोंसे तैयार किये हुए सुवर्णचित्रित बहुत-से सुन्दर वस्त्र और मृगचर्म भेंटमें दिये थे। तीतर पक्षीकी भाँति चितकबरे और तोतेके समान नाकवाले तीन सौ घोड़े दिये थे। इसके सिवा तीन-तीन सौ ऊँटनियाँ और खच्चरियाँ भी दी थीं, जो पीलु, शमी और इंगुद खाकर मोटी-ताजी हुई थीं

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା— ତିତ୍ତିରି ପକ୍ଷୀ ପରି ଚିତ୍ରବର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ଶୁକ ପରି ନାସିକା ଥିବା ତିନିଶେ ଘୋଡ଼ା ସେମାନେ ଭେଟ ଦେଲେ। ଏହା ସହ ପୀଲୁ, ଶମୀ ଓ ଇଙ୍ଗୁଦ ଖାଇ ପୁଷ୍ଟ ଓ ସବଳ ହୋଇଥିବା ତିନିଶେ ଉଷ୍ଟ୍ରୀ ଏବଂ ଖଚ୍ଚରୀ ମଧ୍ୟ ଦେଲେ।

Verse 5

गोवासना ब्राह्मणाश्न दासनीयाश्ष सर्वश: । प्रीत्यर्थ ते महाराज धर्मराज्ञों महात्मन:,महाराज! ब्राह्मणलोग तथा गाय-बैलोंका पोषण करनेवाले वैश्य और दास-कर्मके योग्य शूद्र आदि सभी महात्मा धर्मराजकी प्रसन्नताके लिये तीन खर्बके लागतकी भेंट लेकर दरवाजेपर रोके हुए खड़े थे। ब्राह्मणलोग तथा हरी-भरी खेती उपजाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले और बहुत-से गाय-बैल रखनेवाले वैश्य सैकड़ों दलोंमें इकट्ठे होकर सोनेके बने हुए सुन्दर कलश एवं अन्य भेंट-सामग्री लेकर द्वारपर खड़े थे। परंतु भीतर प्रवेश नहीं कर पाते थे

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା— ମହାରାଜ! ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ, ଗୋ-ପାଳନରେ ଜୀବିକା ଚାଲାଉଥିବା ବୈଶ୍ୟମାନେ, ଏବଂ ସେବାକର୍ମକୁ ଯୋଗ୍ୟ ଶୂଦ୍ର ଆଦି—ସମସ୍ତେ ମହାତ୍ମା ଧର୍ମରାଜଙ୍କୁ ପ୍ରସନ୍ନ କରିବାକୁ ଭେଟ ନେଇ ଦ୍ୱାରରେ ଦାଁଡ଼ିଥିଲେ। ସେମାନେ ବଡ଼ ବଡ଼ ଦଳରେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ସୁନାର ସୁନ୍ଦର କଳଶ ଓ ଅନ୍ୟ ଉପହାର ନେଇ ଆସିଥିଲେ, କିନ୍ତୁ ଭିତରକୁ ପ୍ରବେଶ ପାଇଲେ ନାହିଁ।

Verse 6

त्रिखर्व बलिमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिता: । ब्रह्मणा वाटधानाश्न गोमन्त: शतसड्घश:,महाराज! ब्राह्मणलोग तथा गाय-बैलोंका पोषण करनेवाले वैश्य और दास-कर्मके योग्य शूद्र आदि सभी महात्मा धर्मराजकी प्रसन्नताके लिये तीन खर्बके लागतकी भेंट लेकर दरवाजेपर रोके हुए खड़े थे। ब्राह्मणलोग तथा हरी-भरी खेती उपजाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले और बहुत-से गाय-बैल रखनेवाले वैश्य सैकड़ों दलोंमें इकट्ठे होकर सोनेके बने हुए सुन्दर कलश एवं अन्य भेंट-सामग्री लेकर द्वारपर खड़े थे। परंतु भीतर प्रवेश नहीं कर पाते थे

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା— ତିନି ଖର୍ବ ମୂଲ୍ୟର ବଳି ନେଇ ସେମାନେ ଦ୍ୱାରରେ ଅଟକାଇ ରଖାଯାଇ ଦାଁଡ଼ିଛନ୍ତି; ପ୍ରବେଶ ମିଳୁନାହିଁ। ବ୍ରାହ୍ମଣ ଓ ସମୃଦ୍ଧ ଗୃହସ୍ଥ—ହରିତ ଖେତ ଓ ପ୍ରଚୁର ଗୋସମ୍ପଦ ଥିବା—ଶତଶତ ଦଳରେ ସୁନା କୁମ୍ଭ ଆଦି ନେଇ ଆସିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ବାହାରେ ରହିଗଲେ।

Verse 7

कमण्डलूनुपादाय जातरूपमयाउ्छुभान्‌ । एवं बलि समादाय प्रवेशं लेभिरे न च,महाराज! ब्राह्मणलोग तथा गाय-बैलोंका पोषण करनेवाले वैश्य और दास-कर्मके योग्य शूद्र आदि सभी महात्मा धर्मराजकी प्रसन्नताके लिये तीन खर्बके लागतकी भेंट लेकर दरवाजेपर रोके हुए खड़े थे। ब्राह्मणलोग तथा हरी-भरी खेती उपजाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले और बहुत-से गाय-बैल रखनेवाले वैश्य सैकड़ों दलोंमें इकट्ठे होकर सोनेके बने हुए सुन्दर कलश एवं अन्य भेंट-सामग्री लेकर द्वारपर खड़े थे। परंतु भीतर प्रवेश नहीं कर पाते थे

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା— ମହାରାଜ! ସୁନାର ଶୁଭ କମଣ୍ଡଳୁ ଉଠାଇ ଏବଂ ଭେଟସାମଗ୍ରୀ ନେଇ ଆସିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସେମାନେ ପ୍ରବେଶ ପାଇଲେ ନାହିଁ; ଦ୍ୱାରରେ ହିଁ ରହିଗଲେ।

Verse 8

(यश्व स द्विजमुख्येन राज्ञ: शड्खो निवेदित: । प्रीत्या दत्त: कुणिन्देन धर्मराजाय धीमते ।। द्विजोंमें प्रधान राजा कुणिन्दने परम बुद्धिमान्‌ धर्मराज युधिष्ठिरको बड़े प्रेमसे एक शंख निवेदन किया। त॑ सर्वे भ्रातरो भ्रात्रे ददु: शड्खं किरीटिने । त॑ प्रत्यगृह्नाद्‌ बीभत्सुस्तोयजं हेममालिनम्‌ ।। चितं निष्कसहस्रेण भ्राजमानं स्वतेजसा । उस शंखको सब भाइयोंने मिलकर किरीटधारी अर्जुनको दे दिया। उसमें सोनेका हार जड़ा हुआ था और एक हजार स्वर्णमुद्राएँ मढ़ी गयी थीं। अर्जुनने उसे सादर ग्रहण किया। वह शंख अपने तेजसे प्रकाशित हो रहा था। रुचिरं दर्शनीयं च भूषितं विश्वकर्मणा ।। अधारयच्च धर्मश्न त॑ं नमस्य पुनः पुनः । साक्षात्‌ विश्वकर्माने उसे रत्नोंद्वारा विभूषित किया था। वह बहुत ही सुन्दर और दर्शनीय था। साक्षात्‌ धर्मने उस शंखको बार-बार नमस्कार करके धारण किया था। यो अन्नदाने नदति स ननादाधिकं तदा ।। प्रणादाद्‌ भूमिपास्तस्य पेतुर्हीना: स्वतेजसा ।। अन्नदान करनेपर वह शंख अपने-आप बज उठता था। उस समय उस शंखने बड़े जोरसे अपनी ध्वनिका विस्तार किया। उसके गम्भीर नादसे समस्त भूमिपाल तेजोहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। धृष्टद्युम्न: पाण्डवाश्व॒ सात्यकि: केशवोडष्टम: । सत्त्वस्था: शौर्यसम्पन्ना अन्योन्यप्रियकारिण: ।। केवल धृष्टद्युम्न, पाँच पाण्डव, सात्यकि तथा आठवें श्रीकृष्ण धैर्यपूर्वक खड़े रहे। ये सब-के-सब एक-दूसरेका प्रिय करनेवाले तथा शौर्यसे सम्पन्न हैं। विसंज्ञान्‌ भूमिपान्‌ दृष्टवा मां च ते प्राहसंस्तदा ।। ततः प्रह्ृष्टो बीभत्सुरददाद्धेमशृद्धिण: । शतान्यनडुहां पञज्च द्विजमुख्याय भारत ।। इन्होंने मुझको तथा दूसरे भूमिपालोंको मूर्च्छित हुआ देख जोर-जोरसे हँसना आरम्भ किया। उस समय अर्जुनने अत्यन्त प्रसन्न होकर एक श्रेष्ठ ब्राह्मणको पाँच सौ हृष्ट-पुष्ट बैल दिये। वे बैल गाड़ीका बोझ ढोनेमें समर्थ थे और उनके सींगोंमें सोना मढ़ा गया था। सुमुखेन बलिम्ुख्य: प्रेषितो5जातशत्रवे । कुणिन्देन हिरण्यं च वासांसि विविधानि च ।। भारत! राजा सुमुखने अजातशत्रु युधिष्ठिरके पास भेंटकी प्रमुख वस्तुएँ भेजी थीं। कुणिन्दने भाँति-भाँतिके वस्त्र और सुवर्ण दिये थे। काश्मीरराजो मार्द्वीक॑ शुद्धं च रसवन्मधु । बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवायाभ्युपाहरत्‌ ।। काश्मीरनरेशने मीठे तथा रसीले शुद्ध अंगूरोंके गुच्छे भेंट किये थे। साथ ही सब प्रकारकी उपहार-सामग्री लेकर उन्होंने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी सेवामें उपस्थित की थी। यवना हयानुपादाय पर्वतीयान्‌ मनोजवान्‌ | आसनानि महाहणि कम्बलांश्व महाधनान्‌ ।। नवान्‌ विचित्रान्‌ सूक्ष्मांश्व॒ परार्घ्यान्‌ सुप्रदर्शनान्‌ । अन्यच्च विविध रत्नं द्वारि तिष्ठन्ति वारिता: ।। कितने ही यवन मनके समान वेगशाली पर्वतीय घोड़े, बहुमूल्य आसन, नूतन, सूक्ष्म, विचित्र दर्शनीय और कीमती कम्बल, भाँति-भाँतिके रत्न तथा अन्य वस्तुएँ लेकर राजद्वारपर खड़े थे, फिर भी अंदर नहीं जाने पाते थे। श्रुतायुरपि कालिज्री मणिरत्नमनुत्तमम्‌ | कलिंगनरेश श्रुतायुने उत्तम मणिरत्न भेंट किये। दक्षिणात्‌ सागराभ्याशात्‌ प्रावारांश्व पर:शतान्‌ ।। आऔदकानि सरत्नानि बलिं चादाय भारत । अन्येभ्यो भूमिपालेभ्य: पाण्डवाय न्यवेदयत्‌ ।। इसके सिवा, उन्होंने दूसरे भूपालोंसे दक्षिण समुद्रके निकटसे सैकड़ों उत्तरीय वस्त्र, शंख, रत्न तथा अन्य उपहार-सामग्री लेकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको समर्पित की। दार्दुरं चन्दनं मुख्यं भारान्‌ षण्णवतिं ध्रुवम्‌ । पाण्डवाय ददौ पाण्ड्य: शड्खांस्तावत एव च ।। पाण्ड्यनरेशने मलय और दर्दुरपर्वतके श्रेष्ठ चन्दनके छियानबे भार युधिष्ठिरको भेंट किये। फिर उतने ही शंख भी समर्पित किये। चन्दनागरु चानन्तं मुक्तावैदूर्यचित्रका: । चोलश्न केरलश्लोभौ ददतु: पाण्डवाय वै ।। चोल और केरलदेशके नरेशोंने असंख्य चन्दन, अगुरु तथा मोती, वैदूर्य तथा चित्रक नामक रत्न धर्मराज युधिष्ठिरको अर्पित किये। अश्मको हेमशटड्लीश्व दोग्ध्रीहेंमविभूषिता: । सवत्सा: कुम्भदोहाश्न गा: सहस्राण्यदाद्‌ दश ।। राजा अश्मकने बछड़ोंसहित दस हजार दुधारू गौएँ भेंट कीं, जिनके सींगोंमें सोना मढ़ा हुआ था और गलेमें सोनेके आभूषण पहनाये गये थे। उनके थन घड़ोंके समान दिखायी देते थे। सैन्धवानां सहस्राणि हयानां पञज्चविंशतिम्‌ । अददात्‌ सैन्धवो राजा हेममाल्यैरलंकृतान्‌ ।। सिन्धुनरेशने सुवर्णमालाओंसे अलंकृत पचीस हजार सिन्धुदेशीय घोड़े उपहारमें दिये थे। सौवीरो हस्तिभिरययक्तान्‌ रथांश्व त्रिशतावरान्‌ | जातरूपपरिष्कारान्‌ मणिरत्नविभूषितान्‌ ।। मध्यंदिनार्कप्रतिमांस्तेजसाप्रतिमानिव । बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवाय न्यवेदयत्‌ ।। सौवीरराजने हाथी जुते हुए रथ प्रदान किये, जो तीन सौसे कम न रहे होंगे। उन रथोंको सुवर्ण, मणि तथा रत्नोंसे सजाया गया था। वे दोपहरके सूर्यकी भाँति जगमगा रहे थे। उनसे जो प्रभा फैल रही थी, उसकी कहीं भी उपमा न थी। इन रथोंके सिवा, उन्होंने अन्य सब प्रकारकी भी उपहार-सामग्री युधिष्ठिरको भेंट की थी। अवन्‍न्तिराजो रत्नानि विविधानि सहस्रश: । हाराड्रदांश्व॒ मुख्यान्‌ वै विविधं च विभूषणम्‌ ।। दासीनामयुतं चैव बलिमादाय भारत । सभाद्धारि नरश्रेष्ठ दिदृक्षुरवतिष्ठते ।। नरश्रेष्ठ भरतनन्दन! अवन्तीनरेश नाना प्रकारके सहस्रों रत्न, हार, श्रेष्ठ अंगद (बाजूबंद), भाँति-भाँतिके अन्यान्य आभूषण, दस हजार दासियों तथा अन्यान्य उपहार- सामग्री साथ लेकर राजसभाके द्वारपर खड़े थे और भीतर जाकर युधिष्छिरका दर्शन पानेके लिये उत्सुक हो रहे थे। दशार्णश्रेदिराजश्न शूरसेनश्व वीर्यवान्‌ बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवाय न्यवेदयत्‌ ।। दशार्णनरेश, चेदिराज तथा पराक्रमी राजा शूरसेनने सब प्रकारकी उपहार-सामग्री लाकर युधिष्ठिरको समर्पित की। काशिराजेन हृष्टेन बली राजन्‌ निवेदित: ।। अशीतिगोसहस्राणि शतान्यष्टौ च दन्तिनाम्‌ । विविधानि च रत्नानि काशिराजो बलिं ददौ ।। राजन! काशीनरेशने भी बड़ी प्रसन्नताके साथ अस्सी हजार गौएँ, आठ सौ गजराज तथा नाना प्रकारके रत्न भेंट किये। कृतक्षणश्न वैदेह: कौसलश्न बृहद्धल: । ददतुर्वाजिमुख्यांश्न सहस्राणि चतुर्दश ।। विदेहराज कृतक्षण तथा कोसलनरेश बृहद्वधलने चौदह-चौदह हजार उत्तम घोड़े दिये थे। शैब्यो वसादिद्नि: सार्ध त्रिगर्तो मालवै: सह । तस्मै रत्नानि ददतुरेकैको भूमिपो5मितम्‌ ।। हारांस्तु मुक्तान्‌ मुख्यांश्व विविधं च विभूषणम्‌ ।) वस आदि नरेशोंसहित राजा शैब्य तथा मालवोंसहित त्रिगर्तराजने युधिष्ठिरको बहुत-से रत्न भेंट किये, उनमेंसे एक-एक भूपालने असंख्य हार, श्रेष्ठ मोती तथा भाँति-भाँतिके आभूषण समर्पित किये थे। शतं दासीसहस््राणां कार्पासिकनिवासिनाम्‌

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା— କୁଣିନ୍ଦ ରାଜା ପ୍ରେମପୂର୍ବକ, ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠଙ୍କ ମାଧ୍ୟମରେ, ଧୀମାନ ଧର୍ମରାଜଙ୍କୁ ଯେ ଶଙ୍ଖ ନିବେଦନ କରିଥିଲେ—ସେଇ ଶଙ୍ଖକୁ ସମସ୍ତ ଭାଇ ମିଶି କିରୀଟଧାରୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଦେଲେ। ବୀଭତ୍ସୁ ଅର୍ଜୁନ ତାହାକୁ ଆଦରରେ ଗ୍ରହଣ କଲେ। ସେ ଜଳଜ ଶଙ୍ଖ—ସୁବର୍ଣ୍ଣମାଳାରେ ଶୋଭିତ, ହଜାର ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣମୁଦ୍ରାରେ ଜଡିତ, ନିଜ ତେଜରେ ଦୀପ୍ତ, ରୁଚିର ଓ ଦର୍ଶନୀୟ; ଯେନ ସାକ୍ଷାତ୍ ବିଶ୍ୱକର୍ମା ଅଲଙ୍କୃତ କରିଛନ୍ତି। ଧର୍ମରାଜ ମଧ୍ୟ ତାହାକୁ ପୁନଃପୁନଃ ନମସ୍କାର କରି ଧାରଣ କରିଥିଲେ। ଅନ୍ନଦାନ ସମୟରେ ସେ ଶଙ୍ଖ ଆପେଆପେ ନାଦ କଲା; ପରେ ତାହାର ଧ୍ୱନି ଆହୁରି ପ୍ରଚଣ୍ଡ ହେଲା। ସେଇ ମହାପ୍ରଣାଦରେ ସମବେତ ରାଜାମାନଙ୍କର ତେଜ କ୍ଷୀଣ ହୋଇ ସେମାନେ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଗଲେ।

Verse 9

शूद्रा विप्रोत्तमार्हाणि राड़ुकवाण्यजिनानि च,महाराज! भरुकच्छ (भड़ौंच)-निवासी शाद्र श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके उपयोगमें आनेयोग्य रंकुमृगके चर्म तथा अन्य सब प्रकारकी भेंट-सामग्री लेकर उपस्थित हुए थे। वे अपने साथ गान्धारदेशके बहुत-से घोड़े भी लाये थे

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—“ମହାରାଜ! ଭରୁକଚ୍ଛ-ନିବାସୀ ଶୂଦ୍ରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଲୋକେ ଉତ୍ତମ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ଯୋଗ୍ୟ ଭେଟ—ରଙ୍କୁମୃଗର ଚର୍ମ ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ନାନା ପ୍ରକାର ଉପହାର-ସାମଗ୍ରୀ—ନେଇ ଉପସ୍ଥିତ ହୋଇଛନ୍ତି। ସେମାନେ ଗାନ୍ଧାରଦେଶର ଅନେକ ଘୋଡ଼ା ମଧ୍ୟ ଆଣିଛନ୍ତି।”

Verse 10

बलिं च कृत्स्नमादाय भरुकच्छनिवासिन: । उपनिन्युर्महाराज हयान्‌ गान्धारदेशजान्‌,महाराज! भरुकच्छ (भड़ौंच)-निवासी शाद्र श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके उपयोगमें आनेयोग्य रंकुमृगके चर्म तथा अन्य सब प्रकारकी भेंट-सामग्री लेकर उपस्थित हुए थे। वे अपने साथ गान्धारदेशके बहुत-से घोड़े भी लाये थे

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—“ମହାରାଜ! ଭରୁକଚ୍ଛ-ନିବାସୀମାନେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ବଲି—ସବୁ ପ୍ରକାର ଭେଟ ଓ ଉପହାର—ନେଇ ଆସିଛନ୍ତି; ଏବଂ ଗାନ୍ଧାରଦେଶରେ ପାଳିତ ଘୋଡ଼ାମାନେ ମଧ୍ୟ ଅର୍ପଣ କରିଛନ୍ତି।”

Verse 11

इन्द्रकृष्टरवर्तयन्ति धान्यैयें च नदीमुखै: । समुद्रनिष्कुटे जाता: पारेसिन्धु च मानवा:,जो समुद्रतटवर्ती गृहोद्यानमें तथा सिन्धुके उस पार रहते हैं, वर्षद्वारा इन्द्रके पैदा किये हुए तथा नदीके जलसे उत्पन्न हुए नाना प्रकारके धान्योंद्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं, वे वैराम, पारद, आभीर तथा कितव जातिके लोग नाना प्रकारके रत्न एवं भाँति-भाँतिकी भेंट-सामग्री--बकरी, भेड़, गाय, सुवर्ण, गधे, ऊँट, फलसे तैयार किया हुआ मधु तथा अनेक प्रकारके कम्बल लेकर राजद्वारपर रोक दिये जानेके कारण (बाहर ही) खड़े थे और भीतर नहीं जाने पाते थे

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—“ଯେମାନେ ସମୁଦ୍ରତଟ ସନ୍ନିହିତ ଅଞ୍ଚଳରେ ବସନ୍ତି ଓ ଯେମାନେ ସିନ୍ଧୁର ପାରେ ରହନ୍ତି—ସେମାନେ ନଦୀମୁଖର ଜଳରେ ଉତ୍ପନ୍ନ ଏବଂ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ବର୍ଷାରେ ଜନ୍ମିତ ନାନା ପ୍ରକାର ଧାନ୍ୟରେ ଜୀବନ ନିର୍ବାହ କରନ୍ତି।”

Verse 12

ते वैरामा: पारदाश्व आभीरा: कितवै: सह । विविधं बलिमादाय रत्नानि विविधानि च,जो समुद्रतटवर्ती गृहोद्यानमें तथा सिन्धुके उस पार रहते हैं, वर्षद्वारा इन्द्रके पैदा किये हुए तथा नदीके जलसे उत्पन्न हुए नाना प्रकारके धान्योंद्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं, वे वैराम, पारद, आभीर तथा कितव जातिके लोग नाना प्रकारके रत्न एवं भाँति-भाँतिकी भेंट-सामग्री--बकरी, भेड़, गाय, सुवर्ण, गधे, ऊँट, फलसे तैयार किया हुआ मधु तथा अनेक प्रकारके कम्बल लेकर राजद्वारपर रोक दिये जानेके कारण (बाहर ही) खड़े थे और भीतर नहीं जाने पाते थे

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—“ବୈରାମ, ପାରଦାଶ୍ୱ, ଆଭୀର—କିତବମାନଙ୍କ ସହ—ନାନା ପ୍ରକାର ବଲି ଓ ବିଭିନ୍ନ ରତ୍ନ ନେଇ ଆସିଛନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ରାଜଦ୍ୱାରରେ ଅଟକାଯାଇଥିବାରୁ ସେମାନେ ବାହାରେ ଦାଁଡ଼ି ରହିଛନ୍ତି, ଭିତରକୁ ପ୍ରବେଶ କରିପାରୁନାହାନ୍ତି।”

Verse 13

अजाविकं गोहिरण्यं खरोष्ट्र फलजं मधु । कम्बलान्‌ विविधांश्रैव द्वारि तिष्ठन्ति वारिता:,जो समुद्रतटवर्ती गृहोद्यानमें तथा सिन्धुके उस पार रहते हैं, वर्षद्वारा इन्द्रके पैदा किये हुए तथा नदीके जलसे उत्पन्न हुए नाना प्रकारके धान्योंद्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं, वे वैराम, पारद, आभीर तथा कितव जातिके लोग नाना प्रकारके रत्न एवं भाँति-भाँतिकी भेंट-सामग्री--बकरी, भेड़, गाय, सुवर्ण, गधे, ऊँट, फलसे तैयार किया हुआ मधु तथा अनेक प्रकारके कम्बल लेकर राजद्वारपर रोक दिये जानेके कारण (बाहर ही) खड़े थे और भीतर नहीं जाने पाते थे

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—“ଛେଳି-ଭେଡ଼ା, ଗାଈ ଓ ସୁବର୍ଣ୍ଣ, ଗଧା ଓ ଉଠ, ଫଳରୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ମଧୁ ଏବଂ ନାନା ପ୍ରକାର କମ୍ବଳ—ଏସବୁ ନେଇ ସେମାନେ ଆସିଛନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ରୋକାଯାଇଥିବାରୁ ସେମାନେ ଦ୍ୱାରରେ ହିଁ ଦାଁଡ଼ି ରହିଛନ୍ତି।”

Verse 14

प्राग्ज्योतिषाधिप: शूरो म्लेच्छानामधिपो बली । यवनै: सहितो राजा भगदत्तो महारथ:,प्राग्ज्योतिषपुरके अधिपति तथा म्लेच्छोंके स्वामी शूरवीर एवं बलवान्‌ महारथी राजा भगदत्त यवनोंके साथ पधारे थे और वायुके समान वेगवाले अच्छी जातिके शीघ्रगामी घोड़े तथा सब प्रकारकी भेंट-सामग्री लेकर राजद्दवारपर खड़े थे। (अधिक भीड़के कारण) उनका प्रवेश भी रोक दिया गया था

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା— ପ୍ରାଗ୍ଜ୍ୟୋତିଷର ଅଧିପତି, ଶୂର ଓ ବଳବାନ, ମ୍ଲେଚ୍ଛମାନଙ୍କର ଅଧିରାଜ ମହାରଥୀ ରାଜା ଭଗଦତ୍ତ ଯବନମାନଙ୍କ ସହ ଆସି ପହଞ୍ଚିଛନ୍ତି। ବାୟୁବେଗ ସମ ଶୀଘ୍ରଗାମୀ ଉତ୍ତମ ଜାତିର ଅଜାନେୟ ଘୋଡ଼ା ଓ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଭେଟ-ବଳି ନେଇ ସେ ରାଜଦ୍ୱାରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ; କିନ୍ତୁ ଭିଡ଼ ଅଧିକ ଥିବାରୁ ତାଙ୍କ ପ୍ରବେଶ ମଧ୍ୟ ରୋକାଯାଇଛି।

Verse 15

आजानेयान्‌ हयाज्छीघ्रानादायानिलरंहस: । बलिं च कृत्स्नमादाय द्वारि तिष्ठति वारित:,प्राग्ज्योतिषपुरके अधिपति तथा म्लेच्छोंके स्वामी शूरवीर एवं बलवान्‌ महारथी राजा भगदत्त यवनोंके साथ पधारे थे और वायुके समान वेगवाले अच्छी जातिके शीघ्रगामी घोड़े तथा सब प्रकारकी भेंट-सामग्री लेकर राजद्दवारपर खड़े थे। (अधिक भीड़के कारण) उनका प्रवेश भी रोक दिया गया था

ବାୟୁବେଗ ସମ ଶୀଘ୍ରଗାମୀ ଅଜାନେୟ ଘୋଡ଼ା ଓ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭେଟ-ବଳି ନେଇ ସେ ଦ୍ୱାରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ—(ପ୍ରବେଶରୁ) ରୋକାଯାଇଛି।

Verse 16

अश्मसारमयं भाण्डं शुद्धदन्तत्सरूनसीन्‌ । प्राग्ज्योतिषाधिपो दत्त्वा भगदत्तो5व्रजत्‌ तदा,उस समय प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्त हीरे और पद्मराग आदि मणियोंके आभूषण तथा विशुद्ध हाथी-दाँतकी मूँठवाले खड्ग देकर भीतर गये थे

ସେତେବେଳେ ପ୍ରାଗ୍ଜ୍ୟୋତିଷର ଅଧିପତି ଭଗଦତ୍ତ କଠିନ ପାଷାଣର ତିଆରି ପାତ୍ର ଓ ଶୁଦ୍ଧ ହାତୀଦାନ୍ତର ମୁଠିଯୁକ୍ତ ଖଡ଼୍ଗ ଦାନ କଲେ; ସେଗୁଡ଼ିକ ଦେଇ ସେ ତେବେ ପ୍ରତ୍ୟାହାର କଲେ।

Verse 17

द्ययक्षांस्त्रयक्षॉल्ललाटाक्षान्‌ नानादिग्भ्य: समागतान्‌ | औष्णीकानन्तवासांश्व॒ रोमकान्‌ पुरुषादकान्‌,द्रयक्ष, त््यक्ष, ललाटाक्ष, औष्णीक, अन्तवास, रोमक, पुरुषादक तथा एकपाद--इन देशोंके राजा नाना दिशाओंसे आकर राजद्वारपर रोक दिये जानेके कारण खड़े थे, यह मैंने अपनी आँखों देखा था। ये राजालोग भेंट-सामग्री लेकर आये थे और अपने साथ अनेक रंगवाले बहुत-से दूरगामी गधे (खच्चर) लाये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे। उनकी संख्या दस हजार थी। वे सभी रासभ सिखलाये हुए तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें विख्यात थे

ମୁଁ ନିଜେ ଦେଖିଥିଲି— ତ୍ରୟକ୍ଷ, ତ୍ୟକ୍ଷ, ଲଲାଟାକ୍ଷ, ଔଷ୍ଣୀକ, ଅନ୍ତବାସ, ରୋମକ ଓ ପୁରୁଷାଦକ—ଏହି ଦେଶମାନଙ୍କର ରାଜାମାନେ ନାନା ଦିଗରୁ ଆସି ରାଜଦ୍ୱାରେ ରୋକାଯାଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲେ। ସେମାନେ ଭେଟ-ବଳି ନେଇ ଆସିଥିଲେ ଏବଂ ସହିତ ଅନେକ ବର୍ଣ୍ଣର, ଦୂରଗାମୀ, କଳା ଗଳା ଓ ବିଶାଳ ଦେହବିଶିଷ୍ଟ, ଭଲଭାବେ ଶିକ୍ଷିତ ଭାରବାହୀ ଗଧା (ଖଚ୍ଚର) ମହାଦଳ ଆଣିଥିଲେ—ଯେମାନେ ସମସ୍ତ ଦିଗରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ।

Verse 18

एकपादांश्व॒ तत्राहमपश्यं द्वारि वारितान्‌ । राजानो बलिमादाय नानावर्णाननेकश:,द्रयक्ष, त््यक्ष, ललाटाक्ष, औष्णीक, अन्तवास, रोमक, पुरुषादक तथा एकपाद--इन देशोंके राजा नाना दिशाओंसे आकर राजद्वारपर रोक दिये जानेके कारण खड़े थे, यह मैंने अपनी आँखों देखा था। ये राजालोग भेंट-सामग्री लेकर आये थे और अपने साथ अनेक रंगवाले बहुत-से दूरगामी गधे (खच्चर) लाये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे। उनकी संख्या दस हजार थी। वे सभी रासभ सिखलाये हुए तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें विख्यात थे

ସେଠାରେ ମୁଁ ଏକପାଦ ଦେଶର ରାଜାମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦ୍ୱାରେ ରୋକାଯାଇଥିବା ଦେଖିଲି। ସେମାନେ ନାନା ପ୍ରକାର ଓ ନାନା ବର୍ଣ୍ଣର ଅନେକ ଭେଟ-ବଳି ନେଇ ଆସିଥିଲେ।

Verse 19

कृष्णग्रीवान्‌ महाकायान्‌ रासभान्‌ दूरपातिन: । आजहुर्दशसाहस्रान्‌ विनीतान्‌ दिक्षु विश्वुतान्‌,द्रयक्ष, त््यक्ष, ललाटाक्ष, औष्णीक, अन्तवास, रोमक, पुरुषादक तथा एकपाद--इन देशोंके राजा नाना दिशाओंसे आकर राजद्वारपर रोक दिये जानेके कारण खड़े थे, यह मैंने अपनी आँखों देखा था। ये राजालोग भेंट-सामग्री लेकर आये थे और अपने साथ अनेक रंगवाले बहुत-से दूरगामी गधे (खच्चर) लाये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे। उनकी संख्या दस हजार थी। वे सभी रासभ सिखलाये हुए तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें विख्यात थे

ସେମାନେ ଦଶହଜାର ଭଲଭାବେ ଶିକ୍ଷିତ ଖଚ୍ଚର ଆଣିଥିଲେ—କଳା ଗଳା, ବିଶାଳ ଦେହ, ଦୂରଯାତ୍ରାରେ ସମର୍ଥ; ସମସ୍ତ ଦିଗରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ।

Verse 20

प्रमाणरागसम्पन्नान्‌ वड्क्षुतीरसमुद्धवान्‌ । बल्‍्यर्थ ददतस्तस्मै हिरण्यं रजतं बहु

ସେମାନେ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଓ ସ୍ୱାମିଭକ୍ତିରେ ସମ୍ପନ୍ନ, ଭଡ୍କ୍ଷୁ ନଦୀତଟରେ ଜନ୍ମିତ; ଏବଂ ବଲି/କରାର୍ଥେ ତାହାକୁ ପ୍ରଚୁର ସୁନା ଓ ରୂପା ଦେଉଥିଲେ।

Verse 21

इन्द्रगोपकवर्णाभाउछुकवर्णान्‌ मनोजवान्‌

ସେମାନେ ଇନ୍ଦ୍ରଗୋପକ ପୋକ ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ ବର୍ଣ୍ଣର, ଉଚ୍ଚୁକ ପକ୍ଷୀ ପରି ବର୍ଣ୍ଣର, ଏବଂ ମନ ପରି ବେଗବାନ୍ ଥିଲେ।

Verse 22

तथैवेन्द्रायुधनिभान्‌ संध्याभ्रसदृशानपि । अनेकवर्णानारण्यान्‌ गृहीत्वाश्वान्‌ महाजवान्‌

ସେହିପରି ସେମାନେ ମହାବେଗୀ ଘୋଡ଼ାମାନେ ମଧ୍ୟ ଆଣିଥିଲେ—କିଛି ଇନ୍ଦ୍ରଧନୁ ପରି ଦୀପ୍ତ, କିଛି ସନ୍ଧ୍ୟାମେଘ ସଦୃଶ, ଆଉ କିଛି ଅନେକ ବର୍ଣ୍ଣର, ଅରଣ୍ୟଯୋଗ୍ୟ ଦୃଢ଼।

Verse 23

जातरूपमनर्घ्य च ददुस्तस्यैकपादका: । एकपाददेशीय राजाओंने इन्द्रगोप (बीरबहूटी)-के समान लाल, तोतेके समान हरे, मनके समान वेगशाली, इन्द्रधनुषके तुल्य बहुरंगे, संध्याकालके बादलोंके सदूश लाल और अनेक वर्णवाले महावेगशाली जंगली घोड़े एवं बहुमूल्य सुवर्ण उन्हें भेंटमें दिये || २१-२२ ३ || चीनाउ्छकांस्तथा चौड़ान्‌ बर्बरान्‌ वनवासिन:,चीन, शक, ओड्, वनवासी बर्बर, वार्ष्णेय, हार, हूण, कृष्ण, हिमालयप्रदेश, नीप और अनूप देशोंके नाना रूपधारी राजा वहाँ भेंट देनेके लिये आये थे, किंतु रोक दिये जानेके कारण दरवाजेपर ही खड़े थे। उन्होंने अनेक रूपवाले दस हजार गधे भेंटके लिये वहाँ प्रस्तुत किये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे, जो सौ कोसतक लगातार चल सकते थे। वे सभी सिखलाये हुए तथा सब दिशाओंमें विख्यात थे

ଏକପାଦକ ଦେଶୀୟମାନେ ତାହାକୁ ଅନର୍ଘ୍ୟ ଜାତରୂପ (ଅତ୍ୟମୂଲ୍ୟ ସୁନା) ଓ ଅନ୍ୟ ମହାମୂଲ୍ୟ ଉପହାର ଦେଲେ।

Verse 24

वार्ष्णेयान्‌ हारहूणांश्व कृष्णान्‌ हैमवर्तास्तथा । नीपानूपानधिगतान्‌ विविधान्‌ द्वारवारितान्‌,चीन, शक, ओड्, वनवासी बर्बर, वार्ष्णेय, हार, हूण, कृष्ण, हिमालयप्रदेश, नीप और अनूप देशोंके नाना रूपधारी राजा वहाँ भेंट देनेके लिये आये थे, किंतु रोक दिये जानेके कारण दरवाजेपर ही खड़े थे। उन्होंने अनेक रूपवाले दस हजार गधे भेंटके लिये वहाँ प्रस्तुत किये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे, जो सौ कोसतक लगातार चल सकते थे। वे सभी सिखलाये हुए तथा सब दिशाओंमें विख्यात थे

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ସେଠାରେ ବାର୍ଷ୍ଣେୟ, ହାର ଓ ହୂଣ, କୃଷ୍ଣ ଏବଂ ହିମାଳୟ-ପ୍ରଦେଶର ଲୋକ; ତଥା ନୀପ-ଅନୂପ ଦେଶର ନାନା ଜନପଦବାସୀମାନେ ମଧ୍ୟ ଥିଲେ। ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଭେଟ ନେଇ ଦ୍ୱାର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଆସିଥିଲେ, କିନ୍ତୁ ଦ୍ୱାରପାଳମାନେ ରୋକିଦେଲେ; ତେଣୁ ସେମାନେ ଦ୍ୱାରେଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ରହିଲେ।

Verse 25

बल्यर्थ ददतस्तस्य नानारूपाननेकश: । कृष्णग्रीवान्‌ महाकायान्‌ रासभाञठ्छतपातिन: । अहार्षुर्दशसाहस्रान्‌ विनीतान्‌ दिक्षु विश्रुतान्‌,चीन, शक, ओड्, वनवासी बर्बर, वार्ष्णेय, हार, हूण, कृष्ण, हिमालयप्रदेश, नीप और अनूप देशोंके नाना रूपधारी राजा वहाँ भेंट देनेके लिये आये थे, किंतु रोक दिये जानेके कारण दरवाजेपर ही खड़े थे। उन्होंने अनेक रूपवाले दस हजार गधे भेंटके लिये वहाँ प्रस्तुत किये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे, जो सौ कोसतक लगातार चल सकते थे। वे सभी सिखलाये हुए तथा सब दिशाओंमें विख्यात थे

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ତାଙ୍କୁ ନାନା ରୂପରେ ଅପାର ଭେଟ ଦିଆଯାଉଥିବାବେଳେ, କରରୂପେ ଦଶହଜାର ଗଧା ମଧ୍ୟ ଆଣାଗଲା—କଳା ଗର୍ଦ୍ଧନ, ମହାକାୟ, ଏବଂ ଅବିରତ ଶତ କ୍ରୋଶ ଚାଲିପାରୁଥିବା। ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଶିକ୍ଷିତ ଓ ସବୁ ଦିଗରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଥିଲେ।

Verse 26

प्रमाणरागस्पर्शाब्यं बाह्लीचीनसमुद्धवम्‌ । ऑऔर्ण च राड़कवं चैव कीटजं पट्टजं तथा

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଏହା ସହ ବାହ୍ଲୀକ ଓ ଚୀନ ଦେଶରୁ ଆସିଥିବା, ପରିମାଣ-ରଙ୍ଗ-ସ୍ପର୍ଶରେ ବିଶେଷ ଏମିତି ବସ୍ତ୍ର ମଧ୍ୟ ଥିଲା—ଊନ ବସ୍ତ୍ର, ‘ରାଡକବ’ ନାମକ ସୂକ୍ଷ୍ମ ବସ୍ତ୍ର, କୀଟଜ ରେଶମ ଏବଂ ପଟ୍ଟ (ପଟ) ବସ୍ତ୍ର।

Verse 27

कुटीकृतं तथैवात्र कमलाभं सहस्रश: । श्लक्षणं वस्त्रमकार्पासमाविकं मृदु चाजिनम्‌

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଏଠାରେ ମଧ୍ୟ ସହସ୍ର ସହସ୍ର ସୁନିର୍ମିତ ବସ୍ତୁ ଥିଲା, କମଳ ପରି ଶୋଭାମୟ; ଏବଂ ମସୃଣ ଉତ୍ତମ ବସ୍ତ୍ର—କିଛି କାର୍ପାସ (କପାସ) ନୁହେଁ, କିଛି ଊନର—ତଥା ମୃଦୁ ଚର୍ମ ମଧ୍ୟ ଥିଲା।

Verse 28

निशितांश्वैव दीर्घासीनृष्टिशक्तिपरश्वधान्‌ । अपरान्तसमुद्धूतांस्तथैव परशूज्छितान्‌

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ମୁଁ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଶସ୍ତ୍ର ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି—ଦୀର୍ଘ ଖଡ୍ଗ, ଭାଲ, ଶକ୍ତି ଓ ପରଶୁ; ପଶ୍ଚିମ ଦେଶରୁ ଆଣା ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଆୟୁଧ, ଏବଂ ବ୍ୟବହାର ପାଇଁ ପ୍ରସ୍ତୁତ କରାଯାଇଥିବା କୁହାଡ଼ିମାନେ ମଧ୍ୟ।

Verse 29

रसान्‌ गन्धांश्व विविधान्‌ रत्नानि च सहस्रश: । बलिं च कृत्स्नमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिता:

ନାନାପ୍ରକାର ରସ, ସୁଗନ୍ଧ ଓ ସହସ୍ର ସହସ୍ର ରତ୍ନ, ଏବଂ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ବଲି (କର-ଭେଟ) ନେଇ ସେମାନେ ଦ୍ୱାରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ରହିଲେ—ରୋକାଯାଇ, ପ୍ରବେଶାନୁମତି ନ ପାଇ।

Verse 30

शकास्तुषारा: कड़्काश्न रोमशा: शुद्धिणो नरा: । जिनकी लंबाई-चौड़ाई पूरी थी, जिनका रंग सुन्दर और स्पर्श सुखद था, ऐसे बाह्नीक चीनके बने हुए, ऊनी, हिरनके रोमसमूहसे बने हुए, रेशमी, पाटके, विचित्र गुच्छेदार तथा कमलके तुल्य कोमल सहस्रों चिकने वस्त्र, जिनमें कपासका नाम भी नहीं था तथा मुलायम मृगचर्म--ये सभी वस्तुएँ भेंटके लिये प्रस्तुत थीं। तीखी और लंबी तलवारें, ऋष्टि, शक्ति, फरसे, अपरान्त (पश्चिम) देशके बने हुए तीखे परशु, भाँति-भाँतिके रस और गन्ध, सहस्ौरों रत्न तथा सम्पूर्ण भेंट-सामग्री लेकर शक, तुषार, कंक, रोमश तथा शुंगीदेशके लोग राजद्वारपर रोके जाकर खड़े थे || २६--२९ $ || महागजान्‌ दूरगमान्‌ गणितानर्बुदान्‌ हयान्‌,दूरतक जानेवाले बड़े-बड़े हाथी, जिनकी संख्या एक अर्बुद थी एवं घोड़े, जिनकी संख्या कई सौ अर्बुद थी और सुवर्ण जो एक पद्मकी लागतका था--इन सबको तथा भाँति-भाँतिकी दूसरी उपहार-सामग्रीको साथ लेकर कितने ही नरेश राजद्वारपर रोके जाकर भेंट देनेके लिये खड़े थे

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଶକ, ତୁଷାର, କଙ୍କ, ରୋମଶ ଓ ଶୁଙ୍ଗିଦେଶୀୟ ଲୋକମାନେ ରାଜଦ୍ୱାରେ ରୋକାଯାଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲେ। ସେମାନେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କର-ଭେଟ ନେଇ ଆସିଥିଲେ—ଉନ, ମୃଗରୋମ, ରେଶମ, ପଟ ଆଦିର ସହସ୍ର ସହସ୍ର କୋମଳ ବସ୍ତ୍ର; ମୃଦୁ ଚର୍ମ; ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଦୀର୍ଘ ଖଡ୍ଗ, ଋଷ୍ଟି-ଶକ୍ତି, ଫରସା; ପଶ୍ଚିମଦେଶୀୟ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ପରଶୁ; ନାନାପ୍ରକାର ରସ ଓ ସୁଗନ୍ଧ; ଏବଂ ଅସଂଖ୍ୟ ରତ୍ନ। ଏହା ସହ ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନେ ମଧ୍ୟ ଦୂରଗାମୀ ମହାଗଜ, ଅପାର ଅଶ୍ୱସଂଖ୍ୟା, ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣ ଓ ଅନ୍ୟ ଉପହାର ନେଇ ଦ୍ୱାରେ ପ୍ରତୀକ୍ଷା କରୁଥିଲେ—ଭେଟ ଅର୍ପଣ ପାଇଁ।

Verse 31

शतशश्वचैव बहुश: सुवर्ण पद्मसम्मितम्‌ । बलिमादाय विविध द्वारि तिष्ठन्ति वारिता:,दूरतक जानेवाले बड़े-बड़े हाथी, जिनकी संख्या एक अर्बुद थी एवं घोड़े, जिनकी संख्या कई सौ अर्बुद थी और सुवर्ण जो एक पद्मकी लागतका था--इन सबको तथा भाँति-भाँतिकी दूसरी उपहार-सामग्रीको साथ लेकर कितने ही नरेश राजद्वारपर रोके जाकर भेंट देनेके लिये खड़े थे

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଶତଶତ ବାର, ବହୁ ପ୍ରକାରେ, ‘ପଦ୍ମ’ମୂଲ୍ୟ ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣ ଓ ବିଭିନ୍ନ ଉପହାରର ବଲି (କର-ଭେଟ) ନେଇ ରାଜାମାନେ ଦ୍ୱାରେ ରୋକାଯାଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ରହନ୍ତି।

Verse 32

आसनानि महाहाणि यानानि शयनानि च । मणिकाउ्चनचित्राणि गजदन्तमयानि च,बहुमूल्य आसन, वाहन, रत्न तथा सुवर्णसे जटित हाथीदाँतकी बनी हुए शय्याएँ, विचित्र कवच, भाँति-भाँतिके शस्त्र, सुवर्णभूषित, व्याप्रचर्मसे आच्छादित और सुशिक्षित घोड़ोंसे जुते हुए अनेक प्रकारके रथ, हाथियोंपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल, विभिन्न प्रकारके रत्न, नाराच, अर्धनाराच तथा अनेक तरहके शस्त्र--इन सब बहुमूल्य वस्तुओंको देकर पूर्वदेशके नरपतिगण महात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट हुए थे

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ମହାମୂଲ୍ୟ ଆସନ, ଯାନ ଓ ଶୟନ ମଧ୍ୟ ଥିଲା—କେତେକ ମଣି ଓ ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣରେ ବିଚିତ୍ର ଭାବେ ଶୋଭିତ, ଆଉ କେତେକ ଗଜଦନ୍ତରେ ନିର୍ମିତ।

Verse 33

कवचानि विचित्राणि शस्त्राणि विविधानि च । रथांश्व विविधाकाराज्जातरूपपरिष्कृतान्‌,बहुमूल्य आसन, वाहन, रत्न तथा सुवर्णसे जटित हाथीदाँतकी बनी हुए शय्याएँ, विचित्र कवच, भाँति-भाँतिके शस्त्र, सुवर्णभूषित, व्याप्रचर्मसे आच्छादित और सुशिक्षित घोड़ोंसे जुते हुए अनेक प्रकारके रथ, हाथियोंपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल, विभिन्न प्रकारके रत्न, नाराच, अर्धनाराच तथा अनेक तरहके शस्त्र--इन सब बहुमूल्य वस्तुओंको देकर पूर्वदेशके नरपतिगण महात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट हुए थे

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ସେମାନେ ବିଚିତ୍ର କବଚ, ବିଭିନ୍ନ ପ୍ରକାର ଶସ୍ତ୍ର, ଏବଂ ବିଭିନ୍ନ ଆକାରର ରଥ ମଧ୍ୟ ଆଣିଥିଲେ—ଯାହା ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣରେ ସୁଶୋଭିତ ଥିଲା।

Verse 34

हयैर्विनीतै: सम्पन्नान्‌ वैयाच्रपरिवारितान्‌ | विचित्रांश्न परिस्तोमान्‌ रत्नानि विविधानि च,बहुमूल्य आसन, वाहन, रत्न तथा सुवर्णसे जटित हाथीदाँतकी बनी हुए शय्याएँ, विचित्र कवच, भाँति-भाँतिके शस्त्र, सुवर्णभूषित, व्याप्रचर्मसे आच्छादित और सुशिक्षित घोड़ोंसे जुते हुए अनेक प्रकारके रथ, हाथियोंपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल, विभिन्न प्रकारके रत्न, नाराच, अर्धनाराच तथा अनेक तरहके शस्त्र--इन सब बहुमूल्य वस्तुओंको देकर पूर्वदेशके नरपतिगण महात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट हुए थे

ସେମାନେ ସୁଶିକ୍ଷିତ ଓ ସମୃଦ୍ଧ ଘୋଡ଼ା—ବ୍ୟାଘ୍ରଚର୍ମରେ ଆବୃତ—ଏବଂ ବିଚିତ୍ର ପରିସ୍ତର-ବିଛାନା ସହ ନାନାପ୍ରକାର ମୂଲ୍ୟବାନ ରତ୍ନ ଆଣି ଅର୍ପଣ କଲେ।

Verse 35

नाराचानर्धनाराचाऊछस्त्राणि विविधानि च । एतद्‌ दत्त्वा महद्‌ द्रव्यं पूर्वदेशाधिपा तृपा: ।। प्रविष्टा यज्ञलसदनं पाण्डवस्य महात्मन:,बहुमूल्य आसन, वाहन, रत्न तथा सुवर्णसे जटित हाथीदाँतकी बनी हुए शय्याएँ, विचित्र कवच, भाँति-भाँतिके शस्त्र, सुवर्णभूषित, व्याप्रचर्मसे आच्छादित और सुशिक्षित घोड़ोंसे जुते हुए अनेक प्रकारके रथ, हाथियोंपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल, विभिन्न प्रकारके रत्न, नाराच, अर्धनाराच तथा अनेक तरहके शस्त्र--इन सब बहुमूल्य वस्तुओंको देकर पूर्वदेशके नरपतिगण महात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट हुए थे

ନାରାଚ, ଅର୍ଧନାରାଚ ଓ ନାନାପ୍ରକାର ଶସ୍ତ୍ର—ଏହି ମହାଧନ ଦାନ କରି—ତୃପ୍ତ ପୂର୍ବଦେଶାଧିପତିମାନେ ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବଙ୍କ ଯଜ୍ଞସଦନକୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ।

Verse 51

इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे एकपञ्चाशत्तमो<ध्याय: ।। ५१ || इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ-ସନ୍ତାପବିଷୟକ ଏକାବନତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 83

श्यामास्तन्व्यो दीर्घकेश्यो हेमाभरणभूषिता: । कार्पासिक देशमें निवास करनेवाली एक लाख दासियाँ उस यज्ञमें सेवा कर रही थीं। वे सब-की-सब श्यामा तथा तन्‍्वंगी थीं। उन सबके केश बड़े-बड़े थे और वे सभी सोनेके आभूषणोंसे विभूषित थीं

କାର୍ପାସିକ ଦେଶରେ ବସୁଥିବା ଏକ ଲକ୍ଷ ଦାସୀ ସେହି ଯଜ୍ଞରେ ସେବା କରୁଥିଲେ; ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଶ୍ୟାମବର୍ଣ୍ଣା, ସୁକୁମାର କଟିବତୀ, ଦୀର୍ଘକେଶୀ ଏବଂ ସୁବର୍ଣ୍ଣାଭରଣରେ ଭୂଷିତ ଥିଲେ।

Verse 203

दत्त्वा प्रवेशं प्राप्तास्ते युधिष्ठिरनिवेशने । उनकी लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई जैसी होनी चाहिये, वैसी ही थी। उनका रंग भी अच्छा था। वे समस्त रासभ वंक्षु नदीके तटपर उत्पन्न हुए थे। उक्त राजालोग युधिष्ठिरको भेंटके लिये बहुत-सा सोना और चाँदी देते थे और देकर युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट होते थे

ଭେଟ ଦେଇ ପ୍ରବେଶାନୁମତି ପାଇ ସେମାନେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ନିବେଶନ (ଯଜ୍ଞମଣ୍ଡପ) ଭିତରକୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether a king should authorize an ostensibly lawful court event when credible counsel predicts it will function as coercive dispossession—testing responsibility, consent, and the ethics of state-sanctioned procedure.

The chapter illustrates how appeals to “custom” and “destiny” can mask agency and accountability; ethical governance requires discernment, not merely formal authorization or fatalistic resignation.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary functions narratively through Vaiśaṃpāyana’s framing and the causal emphasis that institutional decisions, once staged publicly, become difficult to reverse.