Dyūta-āhvāna: Śakuni’s Proposal, Vidura’s Warning, and the Summons of Yudhiṣṭhira
Sabhā-parva 51
नाराचानर्धनाराचाऊछस्त्राणि विविधानि च । एतद् दत्त्वा महद् द्रव्यं पूर्वदेशाधिपा तृपा: ।। प्रविष्टा यज्ञलसदनं पाण्डवस्य महात्मन:,बहुमूल्य आसन, वाहन, रत्न तथा सुवर्णसे जटित हाथीदाँतकी बनी हुए शय्याएँ, विचित्र कवच, भाँति-भाँतिके शस्त्र, सुवर्णभूषित, व्याप्रचर्मसे आच्छादित और सुशिक्षित घोड़ोंसे जुते हुए अनेक प्रकारके रथ, हाथियोंपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल, विभिन्न प्रकारके रत्न, नाराच, अर्धनाराच तथा अनेक तरहके शस्त्र--इन सब बहुमूल्य वस्तुओंको देकर पूर्वदेशके नरपतिगण महात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट हुए थे
nārācān ardhanārācāṁś ca astrāṇi vividhāni ca | etad dattvā mahad dravyaṁ pūrvadeśādhipās tṛpāḥ ||
ନାରାଚ, ଅର୍ଧନାରାଚ ଓ ନାନାପ୍ରକାର ଶସ୍ତ୍ର—ଏହି ମହାଧନ ଦାନ କରି—ତୃପ୍ତ ପୂର୍ବଦେଶାଧିପତିମାନେ ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବଙ୍କ ଯଜ୍ଞସଦନକୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ।
दुर्योधन उवाच