Adhyaya 5
Sabha ParvaAdhyaya 5129 Verses

Adhyaya 5

Nāradasya Rājadharma-praśnāḥ (Nārada’s Examination of Royal Ethics)

Upa-parva: Nārada–Yudhiṣṭhira Rājadharma-saṃvāda (Counsel on Kingship in the Assembly)

The chapter opens with Vaiśaṃpāyana’s court-scene description: the Pāṇḍavas are seated in the assembly when Nārada arrives with Gandharvas and ṛṣis. Yudhiṣṭhira rises, offers salutations, provides an appropriate seat, and performs hospitality. Nārada then conducts an extended, structured interrogation using repeated ‘kaccit’ prompts, testing whether the king’s mind delights in dharma while maintaining artha and regulating kāma; whether he preserves inherited standards of conduct; and whether he applies calibrated policy tools (conciliation, gifts, division, force) appropriately. The audit ranges across secrecy of counsel, selection and integrity of ministers, vigilance and time-discipline, intelligence awareness, fort readiness, troop payment and morale, judicial procedure against theft and corruption, fiscal accounting, agricultural and irrigation infrastructure, protection of women and vulnerable persons, disaster readiness (fire, disease, animals), and honoring of elders, Brahmins, and ritual obligations. A key doctrinal capsule defines ‘fruitfulness’ (saphalatā): Vedas bear fruit through agnihotra, wealth through giving and rightful enjoyment, marriage through affection and progeny, and learning through character and conduct. The chapter concludes with Yudhiṣṭhira’s acceptance of the guidance and Nārada’s commendation of kingship devoted to protection of the four varṇas.

Chapter Arc: इन्द्रसभा की दिव्य आभा के बीच देवर्षि नारद का आगमन होता है—वेद-उपनिषद्, इतिहास-पुराण और न्याय-धर्म के परम ज्ञाता के रूप में उनका तेज स्वयं सभा को अनुशासित कर देता है। → नारद युधिष्ठिर से राज्य-धर्म की कठोर कसौटियों पर ‘कच्चित्…’ प्रश्नों की शृंखला आरम्भ करते हैं—क्या अर्थ धर्मानुकूल अर्जित हो रहा है, क्या मन धर्म में रम रहा है, क्या इन्द्रियाँ वश में हैं, क्या प्रजा सुखी है, क्या अपराधी दण्ड से बच तो नहीं जाते। → सबसे तीखा बिन्दु तब आता है जब नारद आत्म-विजय को राज-विजय से ऊपर रखते हुए पूछते हैं—‘पहले अपने मन-इन्द्रियों को जीतकर ही क्या तुम दूसरों को जीतने की इच्छा रखते हो?’ और साथ ही न्याय-व्यवस्था की परीक्षा लेते हैं—‘द्रव्य-लोभ से चोर छूट तो नहीं जाता?’ → वैशम्पायन के कथनानुसार युधिष्ठिर नारद के चरणों में प्रणाम कर संतोषपूर्वक उनके उपदेश को ग्रहण करते हैं; नारद निष्कर्ष देते हैं कि जो राजा चातुर्वर्ण्य-रक्षा और धर्मानुसार शासन करता है, वह इस लोक में सुख भोगकर इन्द्रलोक को प्राप्त होता है। → नारद के प्रश्नों की यह कसौटी युधिष्ठिर के राज्य को आदर्श ठहराती है—पर उसी आदर्श के भीतर छिपी आगामी सभा-राजनीति की छाया (द्यूत-प्रसंग की भूमिका) अनकही-सी मंडराती रहती है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५३ “लोक मिलाकर कुल ४५३ श्लोक हैं) #द-3८5>> | अर । जम ३. संगीतमें नृत्य, गीत और वाद्यकी समताको लय अथवा साम्य कहते हैं; जैसा कि अमरकोषका वाक्य है--'लयः साम्यम्‌'। २. नृत्य या गीतमें उसके काल और क्रियाका परिमाण, जिसे बीच-बीचमें हाथपर हाथ मारकर सूचित करते जाते हैं, ताल कहलाता है; जैसा कि अमरकोषका वचन है--“'ताल: कालक्रियामानम्‌। (लोकपालसभाख्यानपर्व) पजञ्चमो< ध्याय: नारदजीका युधिछिरकी सभामें आगमन और प्रश्नके रूपमें युधिष्ठटिरको शिक्षा देना वैशम्पायन उवाच अथ तत्रोपविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु । महत्सु चोपविष्टेषु गन्धर्वेषु च भारत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! एक दिन उस सभामें महात्मा पाण्डव अन्यान्य महापुरुषों तथा गन्धर्वों आदिके साथ बैठे हुए थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ (ଜନମେଜୟ)! ସେତେବେଳେ ସେଇ ସଭାରେ ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବମାନେ ଆସୀନ ଥିଲେ; ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ମହାପୁରୁଷ ଓ ଗନ୍ଧର୍ବମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ବସିଥିଲେ। ସେଇ ରାଜସଭାରେ ଆଗକୁ ଉପଦେଶମୟ ପ୍ରସଙ୍ଗ ଘଟିବାର ଭୂମିକା ଗଢ଼ିଉଠିଲା।

Verse 2

वेदोपनिषदां वेत्ता ऋषि: सुरगणार्चित: । इतिहासपुराणज्ञ: पुराकल्पविशेषवित्‌

ସେ ଋଷି ବେଦ ଓ ଉପନିଷଦର ବିଦ୍ୱାନ, ଦେବଗଣଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପୂଜିତ ଥିଲେ। ଇତିହାସ-ପୁରାଣରେ ପାରଙ୍ଗତ ଏବଂ ପ୍ରାଚୀନ କଳ୍ପମାନଙ୍କର ବିଶେଷ ବୃତ୍ତାନ୍ତ ଜାଣିବାରେ ମଧ୍ୟ ନିପୁଣ ଥିଲେ।

Verse 3

न्यायविद्‌ धर्मतत्त्वज्ञ: षडज्भविदनुत्तम: । ऐक्यसंयोगनानात्वसमवायविशारद:

ସେ ନ୍ୟାୟବିଦ୍ ଓ ଧର୍ମତତ୍ତ୍ୱର ମର୍ମଜ୍ଞ ଥିଲେ; ଷଡ଼ଙ୍ଗ ବିଦ୍ୟାରେ ଅନୁତ୍ତମ। ଏକତ୍ୱ ଓ ସଂଯୋଗ, ନାନାତ୍ୱ ଏବଂ ସମବାୟ—ଏହି ସମ୍ବନ୍ଧମାନଙ୍କର ବିଚାର-ବିଶ୍ଳେଷଣରେ ସେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିଶାରଦ ଥିଲେ।

Verse 4

वक्ता प्रगल्भो मेधावी स्मृतिमान्‌ नयवित्‌ कवि: । परापरविभागज्ञ: प्रमाणकृतनिश्चय:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ ବକ୍ତୃତ୍ୱରେ ପ୍ରଗଲ୍ଭ, ଅଭିବ୍ୟକ୍ତିରେ ନିର୍ଭୀକ, ବୁଦ୍ଧିମାନ ଓ ଦୃଢ଼ ସ୍ମୃତିଶକ୍ତିସମ୍ପନ୍ନ; ନୀତି ଓ ଆଚରଣରେ ନିପୁଣ, ସତ୍ୟ କବି; ଉଚ୍ଚ-ନୀଚର ଯଥାର୍ଥ ଭେଦଜ୍ଞ ଏବଂ ପ୍ରମାଣାଧାରିତ ନିଷ୍କର୍ଷରେ ଅଟଳ।

Verse 5

पज्चावयवयुक्तस्य वाक्यस्य गुणदोषवित्‌ । उत्तरोत्तरवक्ता च वदतो5पि बृहस्पते:,इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि नारदप्रश्नमुखेन राजधर्मानुशासने पञ्चमो<5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापवके अन्तर्गत लोकपालयभाख्यानपर्वमें नारदजीके द्वारा प्रश्नके व्याजसे राजधर्मका उपदेशविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ପଞ୍ଚାବୟବଯୁକ୍ତ ସୁସଂଗଠିତ ବାକ୍ୟର ଗୁଣ-ଦୋଷ ଜାଣୁଥିବା ସେ; ଏବଂ ବକ୍ତା ସ୍ୱୟଂ ବୃହସ୍ପତି ହେଲେ ମଧ୍ୟ, ସେ ଉତ୍ତରୋତ୍ତର ଅଧିକ ଯଥୋଚିତ ଓ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପ୍ରତିଉତ୍ତର ଦେଇପାରୁଥିଲା।

Verse 6

धर्मकामार्थमो क्षेषु यथावत्‌ कृतनिश्चय: । तथा भुवनकोशस्य सर्वस्यास्थ महामति:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଧର୍ମ, କାମ, ଅର୍ଥ ଓ ମୋକ୍ଷ ବିଷୟରେ ସେ ଯଥାବତ୍ ଓ ସମ୍ୟକ୍ ନିଶ୍ଚୟକୁ ପହଞ୍ଚିଥିଲା; ଏବଂ ସେହିପରି ସେ ମହାମତି ସମଗ୍ର ଭୁବନକୋଶ—ଜଗତର ବ୍ୟବସ୍ଥା ଓ ବିସ୍ତାର—କୁ ଦୃଢ଼ଭାବେ ଜାଣୁଥିଲା।

Verse 7

प्रत्यक्षदर्शी लोकस्य तिर्यगूर्ध्यमधस्तथा । सांख्ययोगविभागज्ञो निर्विवित्सु: सुरासुरान्‌ू

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ ଲୋକକୁ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦେଖୁଥିଲା—ତିର୍ୟକ୍, ଊର୍ଧ୍ୱ ଓ ଅଧଃ, ସମସ୍ତ ଦିଗରେ। ସାଂଖ୍ୟ ଓ ଯୋଗର ଭେଦ ଜାଣି, ସେ ଦେବ-ଅସୁରଙ୍କ ସହ ସ୍ପର୍ଧା କରିବା ଆକାଂକ୍ଷାରୁ ମୁକ୍ତ ଥିଲା।

Verse 8

संधिविग्रहतत्त्वज्ञस्त्वनुमानवि भागवित्‌ । षाडुण्यविधियुक्तश्न सर्वशास्त्रविशारद:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ ସନ୍ଧି ଓ ବିଗ୍ରହର ତତ୍ତ୍ୱଜ୍ଞ, ଅନୁମାନଦ୍ୱାରା ନିଷ୍କର୍ଷଭେଦ ବିଚାରେ ନିପୁଣ; ଷାଡ୍ଗୁଣ୍ୟ-ନୀତିରେ ପ୍ରଶିକ୍ଷିତ ଏବଂ ସମସ୍ତ ଶାସ୍ତ୍ରରେ ବିଶାରଦ ଥିଲା।

Verse 9

युद्धगान्धर्वसेवी च सर्वत्राप्रतिघस्तथा । एतैश्वान्यैश्व बहुभिरययुक्तो गुणगणैर्मुनि:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ଯୁଦ୍ଧକଳା ଓ ଗାନ୍ଧର୍ବବିଦ୍ୟା (ସଙ୍ଗୀତାଦି)ର ସେବକ ଥିଲେ, ଏବଂ ସର୍ବତ୍ର ଅପ୍ରତିହତ—କେଉଁଠି ମଧ୍ୟ ବିରୋଧରେ ରୋକାଯାଉନଥିଲେ। ହେ ମୁନି, ଏହିପରି ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଅନେକ ଗୁଣସମୂହରେ ସେ ଯୁକ୍ତ ଥିଲେ।

Verse 10

लोकाननुचरन्‌ सर्वानागमत्‌ तां सभां नृप । नारद: सुमहातेजा ऋषिभि: सहितस्तदा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ନୃପ, ସମସ୍ତ ଲୋକମାନେ ଭ୍ରମଣ କରି ଅତି ମହାତେଜସ୍ବୀ ନାରଦ ସେତେବେଳେ ଅନ୍ୟ ଋଷିମାନଙ୍କ ସହିତ ସେହି ସଭାକୁ ଆସି ପହଞ୍ଚିଲେ।

Verse 11

पारिजातेन राजेन्द्र पर्वतेन च धीमता । सुमुखेन च सौम्येन देवर्षिरमितद्युति:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର, ଅମିତଦ୍ୟୁତି ଦେବର୍ଷି ନାରଦ ପାରିଜାତ, ଧୀମାନ ପର୍ବତ ଓ ସୌମ୍ୟ ସୁମୁଖଙ୍କ ସହିତ ଆସିଲେ।

Verse 12

सभास्थान्‌ पाण्डवान द्र॒ष्टं प्रीयमाणो मनोजव: । जयाशीलभिंस्तु त॑ं विप्रो धर्मराजानमार्चयत्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମନୋବେଗୀ ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ସଭାରେ ଅବସ୍ଥିତ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଦେଖି ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ ଏବଂ ଜୟସୂଚକ ଆଶୀର୍ବାଦବାକ୍ୟରେ ଧର୍ମରାଜଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ କଲେ।

Verse 13

उसी समय वेद और उपनिषदोंके ज्ञाता, ऋषि, देवताओंद्वारा पूजित, इतिहास-पुराणके मर्मज्ञ, पूर्वकल्पकी बातोंके विशेषज्ञ, न्यायके विद्वान, धर्मके तत्त्वको जाननेवाले, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्‍्द और ज्यौतिष--इन छहों अंगोंके पण्डितोंमें शिरोमणि, ऐक्यर, संयोगनानात्व“४ँ और समवाय केः० ज्ञानमें विशारद, प्रगल्भ वक्ता, मेधावी, स्मरणशक्तिसम्पन्न, नीतिज्ञ, त्रिकालदर्शी, अपर ब्रह्म और परब्रह्मको विभागपूर्वक जाननेवाले, प्रमाणोंद्वारा एक निश्चित सिद्धान्तपर पहुँचे हुए, पंचावयवयुक्त- वाक्यके गुण- दोषको जाननेवाले, बृहस्पति-जैसे वक्ताके साथ भी उत्तर-प्रत्युत्तर करनेमें समर्थ, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष--चारों पुरुषार्थोंके सम्बन्धमें यथार्थ निश्चय रखनेवाले तथा इन सम्पूर्ण चौदहों भुवनोंको ऊपर, नीचे और तिरछे सब ओरसे प्रत्यक्ष देखनेवाले, महाबुद्धिमान, सांख्य और योगके विभागपूर्वक ज्ञाता, देवताओं और असुरोंमें भी निर्वेद (वैराग्य) उत्पन्न करनेके इच्छुक, संधि और विग्रहके तत्त्वको समझनेवाले, अपने और शत्रुपक्षके बलाबलका अनुमानसे निश्चय करके शत्रुपक्षके मन्त्रियों आदिको फोड़नेके लिये धन आदि बाँटनेके उपयुक्त अवसरका ज्ञान रखनेवाले, संधि (सुलह), विग्रह (कलह), यान (चढ़ाई करना), आसन (अपने स्थानपर ही चुप्पी मारकर बैठे रहना), द्वैधीभाव (शत्रुओंमें फूट डालना) और समाश्रय (किसी बलवान्‌ राजाका आश्रय ग्रहण करना)--राजनीतिके इन छहों अंगोंके उपयोगके जानकार, समस्त शास्त्रोंके निपुण विद्वान, युद्ध और संगीतकी कलामें कुशल, सर्वत्र क्रोधरहित, इन उपर्युक्त गुणोंके सिवा और भी असंख्य सदगुणोंसे सम्पन्न, मननशील, परम कान्तिमान्‌ महातेजस्वी देवर्षि नारद लोक-लोकान्तरोंमें घूमते- फिरते पारिजात, बुद्धिमान्‌ पर्वत तथा सौम्य, सुमुख आदि अन्य अनेक ऋषियोंके साथ सभामें स्थित पाण्डवोंसे प्रेमपूर्वक मिलनेके लिये मनके समान वेगसे वहाँ आये और उन ब्रह्मर्षिनी जयसूचक आशीर्वादोंद्वारा धर्मराज युधिष्ठिरका अत्यन्त सम्मान किया ॥| २-- १२ || तमागतमृषिं दृष्टवा नारदं सर्वधर्मवित्‌ । सहसा पाण्डवश्रेष्ठ: प्रत्युत्थायानुजैः सह,सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता पाण्डवश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने देवर्षि नारदको आया देख भाइयोंसहित सहसा उठकर उन्हें प्रेम, विनय और नम्रतापूर्वक उस समय नमस्कार किया और उन्हें उनके योग्य आसन देकर धर्मज्ञ नरेशने गौ, मधुपर्क तथा अर्घ्य आदि उपचार अर्पण करते हुए रत्नोंसे उनका विधिपूर्वक पूजन किया तथा उनकी सब इच्छाओंकी पूर्ति करके उन्हें संतुष्ट किया

ସେହି ସମୟରେ ପରମ କାନ୍ତିମାନ୍, ମହାତେଜସ୍ବୀ ଦେବର୍ଷି ନାରଦ—ଯିଏ ବେଦ-ଉପନିଷଦର ଜ୍ଞାତା, ଦେବତାମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପୂଜିତ, ଇତିହାସ-ପୁରାଣର ମର୍ମଜ୍ଞ, ନ୍ୟାୟ ଓ ଧର୍ମତତ୍ତ୍ୱର ବିଦ୍ୱାନ, ଷଡଙ୍ଗବିଦ୍ୟାରେ ନିଷ୍ଣାତ, ବାକ୍ପଟୁ, ମେଧାବୀ, ସ୍ମୃତିଶକ୍ତିସମ୍ପନ୍ନ, ତ୍ରିକାଳଦର୍ଶୀ, ସାଂଖ୍ୟ-ଯୋଗର ବିଭାଗଜ୍ଞ, ସନ୍ଧି-ବିଗ୍ରହାଦି ରାଜନୀତିତତ୍ତ୍ୱର ପାରଙ୍ଗତ, ଯୁଦ୍ଧ ଓ ସଙ୍ଗୀତକଳାରେ କୁଶଳ ଏବଂ କ୍ରୋଧରହିତ—ଲୋକ-ଲୋକାନ୍ତରରେ ବିଚରଣ କରି ପାରିଜାତ, ଧୀମାନ ପର୍ବତ, ସୌମ୍ୟ ସୁମୁଖ ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଅନେକ ଋଷିଙ୍କ ସହ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ପ୍ରେମପୂର୍ବକ ଦେଖିବାକୁ ମନୋବେଗରେ ସଭାକୁ ଆସିଲେ। ସେ ଜୟସୂଚକ ଆଶୀର୍ବାଦବାକ୍ୟରେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ସମ୍ମାନ କଲେ। ସର୍ବଧର୍ମବିଦ ନାରଦଙ୍କୁ ଆସୁଥିବା ଦେଖି ପାଣ୍ଡବଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଅନୁଜମାନଙ୍କ ସହ ସହସା ଉଠି ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହେଲେ। ପ୍ରେମ, ବିନୟ ଓ ନମ୍ରତାରେ ପ୍ରଣାମ କରି ଯୋଗ୍ୟ ଆସନ ଦେଲେ, ଏବଂ ବିଧିପୂର୍ବକ ଗୋ, ମଧୁପର୍କ, ଅର୍ଘ୍ୟ ଆଦି ଅତିଥି-ସତ୍କାର ଉପଚାର ଅର୍ପଣ କଲେ। ପରେ ରତ୍ନାଦି ଦ୍ୱାରା ନିୟମାନୁସାରେ ପୂଜା କରି, ଋଷିଙ୍କ ଇଚ୍ଛା ପୂରଣ କରି ତାଙ୍କୁ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କଲେ।

Verse 14

अभ्यवादयत प्रीत्या विनयावनतस्तदा । तदर्हमासनं तस्मै सम्प्रदाय यथाविधि,सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता पाण्डवश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने देवर्षि नारदको आया देख भाइयोंसहित सहसा उठकर उन्हें प्रेम, विनय और नम्रतापूर्वक उस समय नमस्कार किया और उन्हें उनके योग्य आसन देकर धर्मज्ञ नरेशने गौ, मधुपर्क तथा अर्घ्य आदि उपचार अर्पण करते हुए रत्नोंसे उनका विधिपूर्वक पूजन किया तथा उनकी सब इच्छाओंकी पूर्ति करके उन्हें संतुष्ट किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତେବେ ବିନୟରେ ନମି, ସେ ପ୍ରୀତିସହିତ ତାଙ୍କୁ ଅଭିବାଦନ କଲେ। ତାଙ୍କ ଯୋଗ୍ୟତାନୁସାରେ ବିଧିପୂର୍ବକ ଆସନ ଦେଇ, ଧର୍ମମର୍ଯ୍ୟାଦା ରକ୍ଷା କରି ଦେବର୍ଷିଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ଆତିଥ୍ୟ ଓ ସେବାରେ ସମ୍ମାନ କଲେ।

Verse 15

गां चैव मधुपर्क च सम्प्रदायार्घ्यमेव च । अर्चयामास रल्नैश्व सर्वकामैश्न धर्मवित्‌,सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता पाण्डवश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने देवर्षि नारदको आया देख भाइयोंसहित सहसा उठकर उन्हें प्रेम, विनय और नम्रतापूर्वक उस समय नमस्कार किया और उन्हें उनके योग्य आसन देकर धर्मज्ञ नरेशने गौ, मधुपर्क तथा अर्घ्य आदि उपचार अर्पण करते हुए रत्नोंसे उनका विधिपूर्वक पूजन किया तथा उनकी सब इच्छाओंकी पूर्ति करके उन्हें संतुष्ट किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଧର୍ମଜ୍ଞ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦେବର୍ଷି ନାରଦଙ୍କ ଆଗମନ ଦେଖି ବିଧିପୂର୍ବକ ଗୋ, ମଧୁପର୍କ ଓ ଅର୍ଘ୍ୟ ଅର୍ପଣ କଲେ। ପରେ ଶାସ୍ତ୍ରବିଧି ଅନୁସାରେ ରତ୍ନାଦି ଦାନରେ ପୂଜା କରି, ତାଙ୍କ ଇଚ୍ଛା ପୂରଣ କରି ମହର୍ଷିଙ୍କୁ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କଲେ।

Verse 16

तुतोष च यथावच्च पूजां प्राप्प युधिष्ठिरात्‌ । सोडर्चित: पाण्डवै: सर्वैर्महर्षिवेदपारग: । धर्मकामार्थसंयुक्तं पप्रच्छेदं युधिष्ठिरम्‌,राजा युधिष्ठिससे यथोचित पूजा पाकर नारदजी भी बहुत प्रसन्न हुए। इस प्रकार सम्पूर्ण पाण्डवोंसे पूजित होकर उन वेददवेत्ता महर्षिने युधिष्ठिससे धर्म, काम और अर्थ तीनोंके उपदेशपूर्वक ये बातें पूछीं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଠାରୁ ଯଥୋଚିତ ପୂଜା ପାଇ ବେଦପାରଗ ମହର୍ଷି ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ। ସମସ୍ତ ପାଣ୍ଡବଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସମ୍ମାନିତ ହୋଇ ସେ ଧର୍ମ-କାମ-ଅର୍ଥ ସଂଯୁକ୍ତ ବିଷୟରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ପ୍ରଶ୍ନ କଲେ।

Verse 17

नारद उवाच कच्चिदर्थाक्ष कल्पन्ते धर्मे च रमते मन: । सुखानि चानुभूयन्ते मनश्न न विहन्यते,नारदजी बोले--राजन्‌! क्या तुम्हारा धन तुम्हारे (यज्ञ, दान तथा कुटुम्बरक्षा आदि आवश्यक कार्योंके) निर्वाहके लिये पूरा पड़ जाता है? क्या धर्ममें तुम्हारा मन प्रसन्नतापूर्वक लगता है? क्या तुम्हें इच्छानुसार सुख-भोग प्राप्त होते हैं? (भावच्चिन्तनमें लगे हुए) तुम्हारे मनको (किन्‍्हीं दूसरी वृत्तियोंद्वारा) आघात या विक्षेप तो नहीं पहुँचता है?

ନାରଦ କହିଲେ—ରାଜନ୍, ଯଜ୍ଞ, ଦାନ ଓ କୁଟୁମ୍ବରକ୍ଷା ଆଦି ଆବଶ୍ୟକ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ପାଇଁ ତୁମ ଧନ ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ କି? ତୁମ ମନ ଧର୍ମରେ ରମେ କି? ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ସୁଖ ଲଭୁଛ କି? ଏବଂ କୌଣସି ବିକ୍ଷେପ ହେତୁ ମନ ଆହତ ହେଉନାହିଁ ତ?

Verse 18

पाण्डवोंद्वारा देवर्षि नारदका पूजन कच्चिदाचरितं पूर्वर्नरदेव पितामहै: । वर्तसे वृत्तिमक्षुद्रां धर्मार्थसहितां त्रिषु,नरदेव! क्या तुम ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र--इन तीनों वर्णोकी प्रजाओंके प्रति अपने पिता-पितामहोंद्वारा व्यवहारमें लायी हुई धर्मार्थयुक्त उत्तम एवं उदार वृत्तिका व्यवहार करते हो?

ନାରଦ କହିଲେ—ନରଦେବ, ବ୍ରାହ୍ମଣ, ବୈଶ୍ୟ ଓ ଶୂଦ୍ର—ଏଇ ତିନି ବର୍ଣ୍ଣର ପ୍ରଜାଙ୍କ ପ୍ରତି, ପୂର୍ବେ ତୁମ ପିତା-ପିତାମହମାନେ ଯେ ଧର୍ମ-ଅର୍ଥଯୁକ୍ତ ଉଦାର ଓ ଉତ୍ତମ ନୀତି ଆଚରଣ କରୁଥିଲେ, ସେହିପରି ତୁମେ ଚାଲୁଛ କି?

Verse 19

कच्चिदर्थेन वा धर्म धर्मेणार्थमथापि वा । उभौ वा प्रीतिसारेण न कामेन प्रबाधसे,तुम धनके लोभमें पड़कर धर्मको, केवल धर्ममें ही संलग्न रहकर धनको अथवा आसक्ति ही जिसका बल है, उस कामभोगके सेवनद्वारा धर्म और अर्थ दोनोंको ही हानि तो नहीं पहुँचाते?

ନାରଦ କହିଲେ—ଧନର ଆସକ୍ତିରେ ଲାଭ ପାଇଁ ତୁମେ ଧର୍ମକୁ କ୍ଷତି କରୁନାହଁ ତ? କିମ୍ବା କେବଳ ଧର୍ମରେ ଲୀନ ହୋଇ ଯଥୋଚିତ ଅର୍ଥସାଧନକୁ ଅବହେଳା କରୁନାହଁ ତ? ଅଥବା ମୋହବଳରେ କାମଭୋଗରେ ଲିପ୍ତ ହୋଇ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥ—ଦୁହେଁକୁ ହାନି କରୁନାହଁ ତ?

Verse 20

कच्चिदर्थ च धर्म च काम च जयतां वर । विभज्य काले कालज्ञ: सदा वरद सेवसे,विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ एवं वरदायक नरेश! तुम त्रिवर्गसेवनके उपयुक्त समयका ज्ञान रखते हो; अतः कालका विभाग करके नियत और उचित समयपर सदा धर्म, अर्थ एवं कामका सेवन करते हो न?

ନାରଦ କହିଲେ—ବିଜୟୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ବରଦାୟକ ରାଜନ! କାଳର ମର୍ମ ଜାଣି ସମୟକୁ ବିଭାଜନ କରି, ଯଥାଯଥ ସମୟରେ ସଦା ଧର୍ମ, ଅର୍ଥ ଓ କାମ—ଏହି ତ୍ରିବର୍ଗକୁ ସେବନ କରୁଛ କି, ଯେପରି ଏକଟି ଅନ୍ୟଟିକୁ ବାଧା ନ ଦେଉ?

Verse 21

+ कच्चिद्‌ राजगुणै: षड्भि: सप्तोपायांस्तथानघ । बलाबलं तथा सम्यक्‌ चतुर्दश परीक्षसे,निष्पाप युधिष्ठिर! क्या तुम राजोचित छ:* गुणोंके द्वारा सात उपायोंकी, अपने और शत्रुके बलाबलकी तथा देशपाल, दुर्गपाल आदि चौदहः व्यक्तियोंकी भलीभाँति परख करते रहते हो?

ନାରଦ କହିଲେ—ନିଷ୍ପାପ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ରାଜୋଚିତ ଛଅ ଗୁଣ ଦ୍ୱାରା ତୁମେ ସାତ ଉପାୟକୁ, ନିଜ ଓ ଶତ୍ରୁର ବଳାବଳକୁ, ଏବଂ ଦେଶପାଳ, ଦୁର୍ଗପାଳ ଆଦି ଚୌଦ୍ଦ ମୁଖ୍ୟ କର୍ମଚାରୀଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଭଲଭାବେ ଓ ନିରନ୍ତର ପରୀକ୍ଷା କରୁଛ କି?

Verse 22

कच्चिदात्मानमन्वीक्ष्य परांश्व जयतां वर | तथा संधाय कर्माणि अष्टौ भारत सेवसे,विजेताओंमें श्रेष्ठ भरतवंशी युधिष्ठिर! क्या तुम अपनी और शत्रुकी शक्तिको अच्छी तरह समझकर यदि शत्रु प्रबल हुआ तो उसके साथ संधि बनाये रखकर अपने धन और कोषकी वृद्धिके लिये आठ* कर्मोका सेवन करते हो?

ନାରଦ କହିଲେ—ବିଜୟୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ହେ ଭାରତ! ନିଜ ଓ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶକ୍ତିକୁ ଭଲଭାବେ ବିଚାର କରି, ଶତ୍ରୁ ପ୍ରବଳ ହେଲେ ତାଙ୍କ ସହ ସନ୍ଧି ରଖି, ଧନ ଓ ରାଜକୋଷ ବୃଦ୍ଧି ପାଇଁ ରାଜନୀତିର ଆଠ କର୍ମକୁ ଯଥୋଚିତ ଭାବେ ସେବନ କରୁଛ କି?

Verse 23

कच्चित्‌ प्रकृतय: सप्त न लुप्ता भरतर्षभ । आद्यास्तथा व्यसनिन: स्वनुरक्ताश्व सर्वश:,भरतश्रेष्ठ! तुम्हारी मन्‍्त्री आदि सातः प्रकृतियाँ कहीं शत्रुओंमें मिल तो नहीं गयी हैं? तुम्हारे राज्यके धनीलोग बुरे व्यसनोंसे बचे रहकर सर्वथा तुमसे प्रेम करते हैं न?

ନାରଦ କହିଲେ—ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ରାଜ୍ୟର ସାତ ପ୍ରକୃତି—ମନ୍ତ୍ରୀ ଆଦି—ଅକ୍ଷୁଣ୍ଣ ଅଛି କି; ଶତ୍ରୁମାନେ ସେଗୁଡ଼ିକୁ କ୍ଷୟ କରି ନିଜ ପକ୍ଷକୁ ଟାଣିନେଇନାହାନ୍ତି ତ? ଏବଂ ତୁମର ଅଗ୍ରଗଣ୍ୟ ଲୋକ—ମନ୍ତ୍ରୀ ଓ ପ୍ରମୁଖ ପ୍ରଜା—ଦୁଷ୍ଟ ବ୍ୟସନରୁ ବଞ୍ଚି ସର୍ବଥା ତୁମ ପ୍ରତି ଅନୁରକ୍ତ ଅଛନ୍ତି କି?

Verse 24

कच्चिन्न कृतकैर्दूतैयें चाप्पपरिशड्किता: । त्वत्तो वा तव चामात्यैभियथ्यते मन्त्रितं तथा,जिनपर तुम्हें संदेह नहीं होता, ऐसे शत्रुके गुप्तचर कृत्रिम मित्र बनकर तुम्हारे मन्त्रियोंद्वारा तुम्हारी गुप्त मन्त्रणाको जानकर उसे प्रकाशित तो नहीं कर देते?

ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମେ କି ସତର୍କ ଅଛ, ଯେ ଶତ୍ରୁର ଗୁପ୍ତଚରମାନେ କୃତ୍ରିମ ମିତ୍ରର ଛଦ୍ମବେଶ ଧରି—ଯାହାଙ୍କୁ ସନ୍ଦେହ ହୁଏ ନାହିଁ—ତୁମ ଠାରୁ କିମ୍ବା ତୁମ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ଠାରୁ ଗୋପନ ମନ୍ତ୍ରଣାକୁ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ଜାଣି ପରେ ତାହା ପ୍ରକାଶ କରି ନଦିଅନ୍ତି?

Verse 25

मित्रोदासीनशत्रूणां कच्चिद्‌ वेत्सि चिकीर्षितम्‌ | कच्चित्‌ संधिं यथाकाल विग्रहं चोपसेवसे,क्या तुम मित्र, शत्रु और उदासीन लोगोंके सम्बन्धमें यह ज्ञान रखते हो कि वे कब क्या करना चाहते हैं? उपयुक्त समयका विचार करके ही संधि और विग्रहकी नीतिका सेवन करते हो न?

ନାରଦ କହିଲେ—ମିତ୍ର, ଉଦାସୀନ ଓ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ—ସେମାନେ କେବେ କ’ଣ କରିବାକୁ ଚାହାନ୍ତି—ତୁମେ କି ଯଥାକାଳ ଜାଣୁଛ? ଏବଂ ଯଥୋଚିତ ସମୟ ବିଚାର କରି ସନ୍ଧି ଓ ବିଗ୍ରହ ନୀତିକୁ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ଭାବେ ଅବଲମ୍ବନ କରୁଛ କି?

Verse 26

कच्चिद्‌ वृत्तिमुदासीने मध्यमे चानुमन्यसे । कच्चिदात्मसमा वृद्धा: शुद्धा: सम्बोधनक्षमा:,क्या तुम्हें इस बातका अनुमान है कि उदासीन एवं मध्यम व्यक्तियोंके प्रति कैसा बर्ताव करना चाहिये? वीर! तुमने अपने स्वयंके समान विश्वसनीय वृद्ध, शुद्ध हृदयवाले, किसी बातको अच्छी तरह समझानेमें समर्थ, उत्तम कुलमें उत्पन्न और अपने प्रति अत्यन्त अनुराग रखनेवाले पुरुषोंको ही मन्त्री बना रखा है न? क्योंकि भारत! राजाकी विजयप्राप्तिका मूल कारण अच्छी मन्त्रणा (सलाह) और उसकी सुरक्षा ही है, (जो सुयोग्य मन्त्रीके अधीन है)

ନାରଦ କହିଲେ—ଉଦାସୀନ ଓ ମଧ୍ୟମ ପଥ ଧରୁଥିବାମାନଙ୍କ ପ୍ରତି କେମିତି ବ୍ୟବହାର ହେବା ଉଚିତ, ତୁମେ କି ଠିକ୍ ଭାବେ ନିର୍ଣ୍ଣୟ କରି ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରୁଛ? ଏବଂ ନିଜ ସମାନ ନିଷ୍ଠାବାନ, ବୃଦ୍ଧ, ଶୁଦ୍ଧହୃଦୟ, ସୁସ୍ପଷ୍ଟ ପରାମର୍ଶ ଦେଇପାରୁଥିବା ପୁରୁଷମାନଙ୍କୁ ମନ୍ତ୍ରୀ କରି ନିଯୁକ୍ତ କରିଛ କି?

Verse 27

कुलीनाश्षानुरक्ताश्न कृतास्ते वीर मन्त्रिण: | विजयो मन्त्रमूलो हि राज्ञो भवति भारत,क्या तुम्हें इस बातका अनुमान है कि उदासीन एवं मध्यम व्यक्तियोंके प्रति कैसा बर्ताव करना चाहिये? वीर! तुमने अपने स्वयंके समान विश्वसनीय वृद्ध, शुद्ध हृदयवाले, किसी बातको अच्छी तरह समझानेमें समर्थ, उत्तम कुलमें उत्पन्न और अपने प्रति अत्यन्त अनुराग रखनेवाले पुरुषोंको ही मन्त्री बना रखा है न? क्योंकि भारत! राजाकी विजयप्राप्तिका मूल कारण अच्छी मन्त्रणा (सलाह) और उसकी सुरक्षा ही है, (जो सुयोग्य मन्त्रीके अधीन है)

ହେ ବୀର! ତୁମେ କୁଳୀନ ଓ ତୁମ ପ୍ରତି ଗାଢ଼ ଅନୁରାଗୀ ପୁରୁଷମାନଙ୍କୁ ମନ୍ତ୍ରୀ କରିଛ। କାରଣ, ହେ ଭାରତ, ରାଜାଙ୍କ ବିଜୟର ମୂଳ ହେଉଛି ମନ୍ତ୍ରଣା।

Verse 28

कच्चित्‌ संवृतमन्त्रैस्तैरमात्यै: शास्त्रकोविदै: । राष्ट्र सुरक्षितं तात शत्रुभिर्न विलुप्यते,तात! मन्त्रको गुप्त रखनेवाले उन शास्त्रज्ञ सचिवोंद्वारा तुम्हारा राष्ट्र सुरक्षित तो है न? शत्रुओंद्वारा उसका नाश तो नहीं हो रहा है?

ନାରଦ କହିଲେ—ତାତ! ମନ୍ତ୍ରକୁ ଗୋପନ ରଖୁଥିବା, ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞ ସେହି ଅମାତ୍ୟମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ତୁମ ରାଷ୍ଟ୍ର ସୁରକ୍ଷିତ ତ? ଶତ୍ରୁମାନେ ତାହାକୁ ଲୁଟି କିମ୍ବା ନଷ୍ଟ କରୁନାହାନ୍ତି ତ?

Verse 29

कच्चिन्निद्रावशं नैषि कच्चित्‌ काले विबुद्धयसे । कच्चिच्चापररात्रेषु चिन्तयस्यर्थमर्थवित्‌,तुम असमयमें ही निद्राके वशीभूत तो नहीं होते? समयपर जग जाते हो न? अर्थशास्त्रके जानकार तो तुम हो ही। रात्रिके पिछले भागमें जगकर अपने अर्थ (आवश्यक कर्तव्य एवं हित)-के विषयमें विचार तो करते हो न?-

ନାରଦ କହିଲେ— ତୁମେ କି ଅସମୟରେ ନିଦ୍ରାର ବଶ ହେଉନାହଁ? ଯଥାସମୟରେ କି ଜାଗୁଛ? ରାଜନୀତି-ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞ ହୋଇ, ରାତିର ଶେଷ ପ୍ରହରରେ ଜାଗି ସତ୍ୟ ହିତ ଓ କରଣୀୟ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ବିଷୟରେ କି ଚିନ୍ତା କରୁଛ?

Verse 30

कच्चिन्मन्त्रयसे नैक: कच्चिन्न बहुभि: सह । कच्चित्‌ ते मन्सत्रितो मन्त्रो न राष्ट्र परिधावति,(कोई भी गुप्त मन्त्रणा दोसे चार कानोंतक ही गुप्त रहती है, छः कानोंमें जाते ही वह फूट जाती है, अतः मैं पूछता हूँ.) तुम किसी गूढ़ विषयपर अकेले ही तो विचार नहीं करते अथवा बहुत लोगोंके साथ बैठकर तो मन्त्रणा नहीं करते? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारी निश्चित की हुई गुप्त मन्त्रणा फ़ूटकर शत्रुके राज्यतक फैल जाती हो?

ନାରଦ କହିଲେ— ତୁମେ କି ଗୁଢ଼ ବିଷୟରେ ଏକାକୀ ମନ୍ତ୍ରଣା କରୁନାହଁ? ଏବଂ ଅତ୍ୟଧିକ ଲୋକଙ୍କ ସହ ବସି ମନ୍ତ୍ରଣା କରୁନାହଁ? ତୁମ ନିଶ୍ଚିତ ଗୁପ୍ତ ପରାମର୍ଶ କି ଫୁଟି ଅନ୍ୟ ରାଷ୍ଟ୍ରମାନଙ୍କୁ ଦୌଡ଼ିଯାଏ ନାହିଁ?

Verse 31

कच्चिदर्थान्‌ विनिश्चित्य लघुमूलान्‌ महोदयान्‌ । क्षिप्रमारभसे कर्तु न विघ्नयसि तादृशान्‌,धनकी वृद्धिके ऐसे उपायोंका निश्चय करके, जिनमें मूलधन तो कम लगाना पड़ता हो, किंतु वृद्धि अधिक होती हो, उनका शीघ्रतापूर्वक आरम्भ कर देते हो न? वैसे कार्योंमें अथवा वैसा कार्य करनेवाले लोगोंके मार्गमें तुम विघ्न तो नहीं डालते?

ନାରଦ କହିଲେ— ଅଳ୍ପ ମୂଳଧନରେ ମହା ଲାଭ ଦେଇଥିବା କାର୍ଯ୍ୟମାନଙ୍କୁ ଭଲଭାବେ ନିଶ୍ଚୟ କରି, ତୁମେ କି ସେଗୁଡ଼ିକୁ ଶୀଘ୍ର ଆରମ୍ଭ କରୁଛ? ଏବଂ ଏପରି ଉଦ୍ୟମ କିମ୍ବା ସେଗୁଡ଼ିକୁ କରୁଥିବା ଲୋକଙ୍କ ପଥରେ କି ବାଧା ଦେଉନାହଁ?

Verse 32

कच्चिन्न सर्वे कर्मान्ता: परोक्षास्ते विशड्किता: । सर्वे वा पुनरुत्सृष्टा: संसृष्टं चात्र कारणम्‌,तुम्हारे राज्यके किसान--मजदूर आदि श्रमजीवी मनुष्य तुमसे अज्ञात तो नहीं हैं? उनके कार्य और गतिविधिपर तुम्हारी दृष्टि है न? वे तुम्हारे अविश्वासके पात्र तो नहीं हैं अथवा तुम उन्हें बार-बार छोड़ते और पुन: कामपर लेते तो नहीं रहते? क्‍योंकि महान्‌ अभ्युदय या उन्नतिमें उन सबका स्नेहपूर्ण सहयोग ही कारण है। (क्योंकि चिरकालसे अनुगृहीत होनेपर ही वे ज्ञात, विश्वासपात्र और स्वामीके प्रति अनुरक्त होते हैं)

ନାରଦ କହିଲେ— ତୁମ ରାଜ୍ୟର ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟସମାପ୍ତି ତୁମ ଦୃଷ୍ଟିରୁ ପରୋକ୍ଷ ରହି ସନ୍ଦେହର ପାତ୍ର ହେଉନାହିଁ ତ? କିମ୍ବା ତୁମେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପୁନଃପୁନଃ ଛାଡ଼ି ଆଉଥରେ ନିଯୁକ୍ତ କରୁନାହଁ ତ? କାରଣ ଏଠାରେ ମହା ସମୃଦ୍ଧିର ହେତୁ ହେଉଛି ସୁସଂଯୁକ୍ତ, ସ୍ନେହପୂର୍ଣ୍ଣ ସହଯୋଗ।

Verse 33

आप्तैरलुब्धै: क्रमिकैस्ते च कच्चिदनुषछिता: । कच्चिद्‌ राजन्‌ कृतान्येव कृतप्रायाणि वा पुन:

ନାରଦ କହିଲେ— ହେ ରାଜନ୍, ତୁମ କାର୍ଯ୍ୟବ୍ୟବହାର କି ବିଶ୍ୱାସଯୋଗ୍ୟ, ଅଲୋଭୀ ଓ କ୍ରମବଦ୍ଧ ଅଧିକାରୀମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଯଥାଯଥ ଭାବେ ସଂଚାଳିତ ହେଉଛି? ଏବଂ ହେ ରାଜା, ତୁମେ ଯେ କାର୍ଯ୍ୟ ଆରମ୍ଭ କରିଛ, ସେଗୁଡ଼ିକ ସତ୍ୟସତ୍ୟ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଛି କି—ନାହିଁଲେ ଅତି କମରେ ପୂର୍ଣ୍ଣତାର ନିକଟକୁ ପହଞ୍ଚିଛି କି?

Verse 34

विदुस्ते वीर कर्माणि नानवाप्तानि कानिचित्‌ । कृषि आदिके कार्य विश्वसनीय, लोभरहित और बड़े-बूढ़ोंके समयसे चले आनेवाले कार्यकर्ताओंद्वारा ही कराते हो न? राजन्‌! वीरशिरोमणे! क्‍या तुम्हारे कार्योंके सिद्ध हो जानेपर या सिद्धिके निकट पहुँच जानेपर ही लोग जान पाते हैं? सिद्ध होनेसे पहले ही तुम्हारे किन्हीं कार्योको लोग जान तो नहीं लेते ।। ३३ डक कच्चित्‌ कारणिका धर्मे सर्वशास्त्रेषु कोविदा: । कारयन्ति कुमारांश्न योधमुख्यांश्ष सर्वश:,तुम्हारे यहाँ जो शिक्षा देनेका काम करते हैं, वे धर्म एवं सम्पूर्ण शास्त्रोंके मर्मज्ञ विद्वान होकर ही राजकुमारों तथा मुख्य-मुख्य योद्धाओंको सब प्रकारकी आवश्यक शिक्षाएँ देते हैं न?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଯେମାନେ ଶିକ୍ଷା ଓ ପ୍ରଶିକ୍ଷଣର ଭାର ନେଇଛନ୍ତି, ସେମାନେ କି ଧର୍ମରେ ନିଷ୍ଠାବାନ୍ ଏବଂ ସମସ୍ତ ଶାସ୍ତ୍ରରେ ପାରଙ୍ଗତ? ଏବଂ ସେମାନେ କି ରାଜକୁମାରମାନଙ୍କୁ ଓ ପ୍ରଧାନ ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତ ଆବଶ୍ୟକ ଶିକ୍ଷା-ଶାସନ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଦେଉଛନ୍ତି?

Verse 35

कच्चित्‌ सहसैमूर्खाणामेकं क्रीणासि पण्डितम्‌ | पण्डितो हार्थकृच्छेषु कुर्यान्नि:श्रेयसं परम्‌,तुम हजारों मूर्खोके बदले एक पण्डितको ही तो खरीदते हो न? अर्थात्‌ आदरपूर्वक स्वीकार करते हो न? क्योंकि विद्वान्‌ पुरुष ही अर्थसंकटके समय महान्‌ कल्याण कर सकता है

ହଜାର ମୂର୍ଖଙ୍କ ପରିବର୍ତ୍ତେ ତୁମେ କି ଗୋଟିଏ ପଣ୍ଡିତଙ୍କୁ ଆଦରରେ ଗ୍ରହଣ କର? କାରଣ ଅର୍ଥସଙ୍କଟ ସମୟରେ ଜ୍ଞାନୀ ପୁରୁଷ ହିଁ ପରମ କଲ୍ୟାଣ କରିପାରେ।

Verse 36

कच्चिद्‌ दुर्गाणि सर्वाणि धनधान्यायुधोदकै: । यन्त्रैश्न परिपूर्णानि तथा शिल्पिधनुर्धरै:,क्या तुम्हारे सभी दुर्ग (किले) धन-धान्य, अस्त्र-शस्त्र, जल, यन्त्र (मशीन), शिल्पी और धनुर्धर सैनिकोंसे भरे-पूरे रहते हैं?

ତୁମର ସମସ୍ତ ଦୁର୍ଗ କି ଧନ-ଧାନ୍ୟ, ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର, ଜଳ ଓ ଯନ୍ତ୍ରଦ୍ୱାରା ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ? ଏବଂ ସେଠାରେ ଶିଲ୍ପୀ ଓ ଧନୁର୍ଧର ସେନା ମଧ୍ୟ ପ୍ରଚୁର ଅଛନ୍ତି କି?

Verse 37

एकोअप्यमात्यो मेधावी शूरो दान्तो विचक्षण: । राजानं राजपुत्रं वा प्रापयेन्महतीं श्रियम्‌,यदि एक भी मन्त्री मेधावी, शौर्यसम्पन्न, संयमी और चतुर हो तो राजा अथवा राजकुमारको विपुल सम्पत्तिकी प्राप्ति करा देता है

ଯଦି ଗୋଟିଏ ମନ୍ତ୍ରୀ ମାତ୍ର ମେଧାବୀ, ଶୂର, ସଂୟମୀ ଓ ବିଚକ୍ଷଣ ହୁଏ, ତେବେ ସେ ରାଜା କିମ୍ବା ରାଜକୁମାରକୁ ମହାନ୍ ସମୃଦ୍ଧିରେ ପହଞ୍ଚାଇଦେଇପାରେ।

Verse 38

कच्चिदष्टादशान्येषु स्वपक्षे दश पठच च । त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैर्वेत्सि तीर्थानि चारकै:,क्या तुम शत्रुपक्षेके अठारह5 और अपने पक्षके पंद्रह: तीर्थोंकी तीन-तीन अज्ञात गुप्तचरोंद्वारा देख-भाल या जाँच-पड़ताल करते रहते हो?

ଶତ୍ରୁପକ୍ଷର ଅଠାରଟି ଏବଂ ସ୍ୱପକ୍ଷର ପନ୍ଦରଟି ‘ତୀର୍ଥ’ (ମୁଖ୍ୟ କେନ୍ଦ୍ର/ସ୍ଥାନ) ଉପରେ ତୁମେ କି ତିନି-ତିନି ଅପରିଚିତ ଗୁପ୍ତଚର ଦ୍ୱାରା ନିରନ୍ତର ନଜର ରଖୁଛ?

Verse 39

कच्चिद्‌ द्विषामविदित: प्रतिपन्नश्न सर्वदा । नित्ययुक्तो रिपून्‌ सर्वान्‌ वीक्षसे रिपुसूदन,शत्रुसूदन! तुम शत्रुओंसे अज्ञात, सतत सावधान और नित्य प्रयत्नशील रहकर अपने सम्पूर्ण शत्रुओंकी गतिविधिपर दृष्टि रखते हो न?

ହେ ରିପୁସୂଦନ, ଶତ୍ରୁସୂଦନ! ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ଅଜଣା ରହି, ସଦା ସତର୍କ ଓ ନିତ୍ୟ ପ୍ରୟତ୍ନଶୀଳ ହୋଇ, ତୁମ ସମସ୍ତ ଶତ୍ରୁଙ୍କ ଗତିବିଧି ଉପରେ ଦୃଷ୍ଟି ରଖୁଛ କି?

Verse 40

कच्चिद्‌ विनयसम्पन्न: कुलपुत्रो बहुश्रुतः । अनसूयुरनुप्रष्टा सत्कृतस्ते पुरोहित:,क्या तुम्हारे पुरोहित विनयशील, कुलीन, बहुज्ञ, विद्वान, दोषदृष्टिसे रहित तथा शास्त्रचर्चामें कुशल हैं? क्या तुम उनका पूर्ण सत्कार करते हो?

ତୁମ ପୁରୋହିତ କି ବିନୟସମ୍ପନ୍ନ, କୁଳୀନ, ବହୁଶ୍ରୁତ, ଦୋଷଦୃଷ୍ଟିରହିତ ଓ ଶାସ୍ତ୍ରବିଚାରରେ କୁଶଳ? ଏବଂ ତୁମେ କି ତାଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ସତ୍କାର କରୁଛ?

Verse 41

कच्चिदग्निषु ते युक्तो विधिज्ञो मतिमानृजु: । हुतं च होष्यमाणं च काले वेदयते सदा,तुमने अग्निहोत्रके लिये विधिज्ञ, बुद्धिमान्‌ और सरल स्वभावके ब्राह्मणको नियुक्त किया है न? वह सदा किये हुए और किये जानेवाले हवनको तुम्हें ठीक समयपर सूचित कर देता है न?

ତୁମ ପବିତ୍ର ଅଗ୍ନିମାନଙ୍କ ପାଇଁ ବିଧିଜ୍ଞ, ବୁଦ୍ଧିମାନ ଓ ସରଳ ସ୍ୱଭାବର ବ୍ରାହ୍ମଣକୁ କି ନିଯୁକ୍ତ କରିଛ? ଏବଂ ସେ କି ସଦା କରାଯାଇଥିବା ଓ କରିବାକୁ ଥିବା ହୋମ ବିଷୟରେ ଯଥାସମୟରେ ତୁମକୁ ଜଣାଏ?

Verse 42

कच्चिदज्गभेषु निष्णातो ज्योतिष: प्रतिपादक: । उत्पातेषु च सर्वेषु दैवज्ञ: कुशलस्तव,क्या तुम्हारे यहाँ हस्त-पादादि अंगोंकी परीक्षामें निपुण, ग्रहोंकी वक्र तथा अतिचार आदि गतियों एवं उनके शुभाशुभ परिणाम आदिको बतानेवाला तथा दिव्य, भौम एवं शरीरसम्बन्धी सब प्रकारके उत्पातोंको पहलेसे ही जान लेनेमें कुशल ज्योतिषी है?

ତୁମ ପାଖରେ କି ଅଙ୍ଗଲକ୍ଷଣ ପରୀକ୍ଷାରେ ନିପୁଣ, ଗ୍ରହଗତି ବ୍ୟାଖ୍ୟା କରି ଶୁଭାଶୁଭ ଫଳ କହିପାରୁଥିବା, ଏବଂ ଦିବ୍ୟ, ଭୌମ ଓ ଶାରୀରିକ—ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଉତ୍ପାତକୁ ପୂର୍ବରୁ ଜାଣିବାରେ କୁଶଳ ଦୈବଜ୍ଞ ଜ୍ୟୋତିଷୀ ଅଛି କି?

Verse 43

कच्चिन्मुख्या महत्स्वेव मध्यमेषु च मध्यमा: । जघन्याश्न जघन्येषु भृत्या: कर्मसु योजिता:,तुमने प्रधान-प्रधान व्यक्तियोंको उनके योग्य महान्‌ कार्योमें, मध्यम श्रेणीके कार्यकर्ताओंको मध्यम कार्योंमें तथा निम्न श्रेणीके सेवकोंको उनकी योग्यताके अनुसार छोटे कामोंमें ही लगा रखा है न?

ତୁମେ କି ଯୋଗ୍ୟତାନୁସାରେ ଭୃତ୍ୟମାନଙ୍କୁ କାର୍ଯ୍ୟରେ ନିଯୁକ୍ତ କରିଛ—ମୁଖ୍ୟମାନଙ୍କୁ ମହତ୍ କାର୍ଯ୍ୟରେ, ମଧ୍ୟମମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟମ କାର୍ଯ୍ୟରେ, ଏବଂ ନିମ୍ନମାନଙ୍କୁ ଛୋଟ କାମରେ?

Verse 44

अमात्यानुपधातीतान्‌ पितृपैतामहाञ्छुचीन्‌ । श्रेष्ठाउ्छेछ्वेषु कच्चित्‌ त्वं नियोजयसि कर्मसु,क्या तुम निश्छल, बाप-दादोंके क्रमसे चले आये हुए और पवित्र आचार- विचारवाले श्रेष्ठ मन्त्रियोंको सदा श्रेष्ठ कर्मोमें लगाये रखते हो?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍, ତୁମେ କି ଏମିତି ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ—ଯେମାନେ ଦୁର୍ନୀତି ଓ ଷଡଯନ୍ତ୍ରରୁ ମୁକ୍ତ, ପିତୃ‑ପୈତାମହ ପରମ୍ପରାରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ଏବଂ ଆଚରଣରେ ଶୁଚି—ତାଙ୍କର ଯୋଗ୍ୟ କର୍ତ୍ତବ୍ୟରେ ନିଯୁକ୍ତ କରୁଛ? ଯେପରି ତାଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ ସଦା ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଓ ଯଥୋଚିତ କାର୍ଯ୍ୟରେ ଲାଗି ରହନ୍ତି?

Verse 45

कच्चिन्नोग्रेण दण्डेन भृशमुद्धिजसे प्रजा: । राष्ट्र तवानुशासन्ति मन्त्रिणो भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ कठोर दण्डके द्वारा तुम प्रजाजनोंको अत्यन्त उद्धेगमें तो नहीं डाल देते? मन्त्रीलोग तुम्हारे राज्यका न्यायपूर्वक पालन करते हैं न?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, କଠୋର ଦଣ୍ଡଦ୍ୱାରା ତୁମେ ପ୍ରଜାମାନଙ୍କୁ ଅତ୍ୟଧିକ ଉଦ୍ବେଗରେ ପକାଉଛ କି? ଏବଂ ତୁମର ମନ୍ତ୍ରୀମାନେ ନ୍ୟାୟ ଓ ଶାସନଶୃଙ୍ଖଳା ଅନୁସାରେ ତୁମ ରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ପାଳନ କରୁଛନ୍ତି କି?

Verse 46

कच्चित्‌ त्वां नावजानन्ति याजका: पतितं यथा । उग्रप्रतिग्रहीतारं कामयानमिव स्त्रिय:,जैसे पवित्र याजक पतित यजमानका और स्त्रियाँ कामचारी पुरुषका तिरस्कार कर देती हैं, उसी प्रकार प्रजा कठोरतापूर्वक अधिक कर लेनेके कारण तुम्हारा अनादर तो नहीं करती?

ନାରଦ କହିଲେ—ପ୍ରଜାମାନେ ତୁମକୁ ଅବଜ୍ଞା କରୁନାହାନ୍ତି ତ? ଯେପରି ଶୁଚି ଯାଜକ ପତିତ ଯଜମାନକୁ, ଏବଂ ସ୍ତ୍ରୀମାନେ କାମାତୁର ପୁରୁଷକୁ ତିରସ୍କାର କରନ୍ତି—ସେପରି ତୁମେ କଠୋରଭାବେ ଅତ୍ୟଧିକ କର/ଦାନ ଗ୍ରହଣ କରୁଥିବା ‘ଉଗ୍ର ପ୍ରତିଗ୍ରାହୀ’ ବୋଲି ପରିଚିତ ଥିବାରୁ ସେମାନେ ତୁମକୁ ଅନାଦର କରୁନାହାନ୍ତି ତ?

Verse 47

कच्चिद्धष्टश्न श्रश्व मतिमान्‌ धृतिमाञछुचि: । कुलीनश्चानुरक्तश्व दक्ष: सेनापतिस्तथा,क्या तुम्हारा सेनापति हर्ष और उत्साहसे सम्पन्न, शूरवीर, बुद्धिमान, धैर्यवान्‌ू, पवित्र, कुलीन, स्वामिभक्त तथा अपने कार्यमें कुशल है?

ନାରଦ ପଚାରିଲେ—ତୁମର ସେନାପତି କି ଧୃଷ୍ଟ ଓ ଶୂର, ବୁଦ୍ଧିମାନ, ଧୈର୍ୟବାନ ଏବଂ ଆଚରଣରେ ଶୁଚି? ସେ କି କୁଲୀନ, ସ୍ୱାମିଭକ୍ତ ଓ ନିଜ କାର୍ଯ୍ୟରେ ଦକ୍ଷ?

Verse 48

कच्चिद्‌ बलस्य ते मुख्या: सर्वयुद्धविशारदा: । धृष्टावदाता विक्रान्तास्त्वया सत्कृत्य मानिता:,तुम्हारी सेनाके मुख्य-मुख्य दलपति सब प्रकारके युद्धोंमें चतुर, धृष्ट (निर्भय), निष्कपट और पराक्रमी हैं न? तुम उनका यथोचित सत्कार एवं सम्मान करते हो न?

ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମ ସେନାର ମୁଖ୍ୟ ନାୟକମାନେ କି ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଯୁଦ୍ଧରେ ପାରଦର୍ଶୀ, ନିର୍ଭୟ, ସରଳ ଓ ନିର୍ମଳ ଆଚରଣବାନ, ଏବଂ ପରାକ୍ରମୀ? ଏବଂ ତୁମେ କି ସେମାନଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ସତ୍କାର କରି ସମ୍ମାନିତ କରୁଛ?

Verse 49

कच्चिद्‌ बलस्य भक्त च वेतनं च यथोचितम्‌ । सम्प्राप्तकाले दातव्यं ददासि न विकर्षसि,अपनी सेनाके लिये यथोचित भोजन और वेतन ठीक समयपर दे देते हो न? जो उन्हें दिया जाना चाहिये, उसमें कमी या विलम्ब तो नहीं कर देते?

ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମେ ନିଜ ସେନାକୁ ଯଥୋଚିତ ଭକ୍ତ (ଆହାର) ଓ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ବେତନ ସମୟରେ ଦେଉଛ କି? ଯାହା ଦେବା ଉଚିତ, ତାହାକୁ କମାଇବା, ଅଟକାଇବା କିମ୍ବା ବିଳମ୍ବ କରୁନାହ କି?

Verse 50

कालातिक्रमणादेते भक्तवेतनयोर्भूता: । भर्तुः कुप्यन्ति यद्भृत्या: सोडनर्थ: सुमहान्‌ स्मृत:,भोजन और वेतनमें अधिक विलम्ब होनेपर भृत्यगण अपने स्वामीपर कुपित हो जाते हैं और उनका वह कोप महान्‌ अनर्थका कारण बताया गया है

ନାରଦ କହିଲେ—ଭକ୍ତ (ଆହାର) ଓ ବେତନ ଦେବାରେ ଅତ୍ୟଧିକ ବିଳମ୍ବ ହେଲେ ଭୃତ୍ୟମାନେ ନିଜ ଭର୍ତ୍ତା ଉପରେ କ୍ରୋଧିତ ହୁଅନ୍ତି; ଏହି କ୍ରୋଧ ସ୍ମୃତିରେ ମହା ଅନର୍ଥର କାରଣ ବୋଲି କୁହାଯାଇଛି।

Verse 51

कच्चित्‌ सर्वेडनुरक्तास्त्वां कुलपुत्रा: प्रधानत: । कच्चित्‌ प्राणांस्तवार्थेषु संत्यजन्ति सदा युधि,क्या उत्तम कुलमें उत्पन्न मन्‍्त्री आदि सभी प्रधान अधिकारी तुमसे प्रेम रखते हैं? क्या वे युद्धमें तुम्हारे हितके लिये अपने प्राणोंतकका त्याग करनेको सदा तैयार रहते हैं?

ନାରଦ କହିଲେ—ଉତ୍ତମ କୁଳରେ ଜନ୍ମିତ ତୁମର ସମସ୍ତ ପ୍ରଧାନ ପୁରୁଷ କି ସତ୍ୟସାରେ ତୁମ ପ୍ରତି ଅନୁରକ୍ତ? ଏବଂ ଯୁଦ୍ଧରେ ତୁମ ହିତ ପାଇଁ ସେମାନେ ସଦା ପ୍ରାଣ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ତ୍ୟାଗ କରିବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ କି?

Verse 52

कच्चिनैको बहूनर्थान्‌ सर्वशः साम्परायिकान्‌ । अनुशास्ति यथाकामं कामात्मा शासनातिग:,तुम्हारे कर्मचारियोंमें कोई ऐसा तो नहीं है, जो अपनी इच्छाके अनुसार चलनेवाला और तुम्हारे शासनका उल्लंघन करनेवाला हो तथा युद्धके सारे साधनों एवं कार्योंकोी अकेला ही अपनी रुचिके अनुसार चला रहा हो?

ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମ ଅଧିକାରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କେହି ଏକଜଣ, କାମନାବଶ ହୋଇ ଓ ତୁମ ଶାସନକୁ ଅତିକ୍ରମ କରି, ରାଜ୍ୟର ଅନେକ କାର୍ଯ୍ୟ—ଯୁଦ୍ଧ ଓ ରାଜ୍ୟର ସର୍ବୋଚ୍ଚ ସୁରକ୍ଷା ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ବିଷୟ ସହିତ—ନିଜ ଇଚ୍ଛାମତେ ଏକାକୀ ଚଳାଉନାହିଁ ତ?

Verse 53

कच्चित्‌ पुरुषकारेण पुरुष: कर्म शोभयन्‌ । लभते मानमधिकं भूयो वा भक्तवेतनम्‌,(तुम्हारे यहाँ काम करनेवाला) कोई पुरुष अपने पुरुषार्थसे जब किसी कार्यको अच्छे ढंगसे सम्पन्न करता है, तब वह आपसे अधिक सम्मान अथवा अधिक भत्ता और वेतन पाता है न?

ନାରଦ କହିଲେ—ଏଠାରେ କେହି ପୁରୁଷ ନିଜ ପୁରୁଷକାରରେ କୌଣସି କାର୍ଯ୍ୟ ସୁନ୍ଦର ଭାବେ ସମ୍ପନ୍ନ କଲେ, ସେ ଅଧିକ ସମ୍ମାନ କିମ୍ବା ଅଧିକ ଭକ୍ତ-ବେତନ (ଭତ୍ତା ଓ ବେତନ) ପାଉଛି କି?

Verse 54

कच्चिद्‌ विद्याविनीतांश्व नराउज्ञानविशारदान्‌ | यथाहँ गुणतश्वैव दानेनाभ्युपपद्यसे,क्या तुम विद्यासे विनयशील एवं ज्ञाननिपुण मनुष्योंको उनके गुणोंके अनुसार यथायोग्य धन आदि देकर उनका सम्मान करते हो?

ନାରଦ କହିଲେ—ବିଦ୍ୟାରେ ବିନୀତ ଓ ଜ୍ଞାନରେ ପାରଙ୍ଗତ ପୁରୁଷମାନଙ୍କୁ ତାଙ୍କର ଗୁଣ-ଯୋଗ୍ୟତା ଅନୁସାରେ ଯଥୋଚିତ ଦାନ-ମାନ ଦେଇ ତୁମେ ସମ୍ମାନ କରୁଛ କି?

Verse 55

कच्चिद्‌ दारान्मनुष्याणां तवार्थ मृत्युमीयुषाम्‌ । व्यसन चाभ्युपेतानां बिभर्षि भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ) जो लोग तुम्हारे हितके लिये सहर्ष मृत्युका वरण कर लेते हैं अथवा भारी संकटमें पड़ जाते हैं, उनके बाल-बच्चोंकी रक्षा तुम करते हो न?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯେମାନେ ତୁମ ହିତ ପାଇଁ ମୃତ୍ୟୁବରଣ କରିଛନ୍ତି କିମ୍ବା ଭୟଙ୍କର ବିପଦରେ ପଡ଼ିଛନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କର ସ୍ତ୍ରୀ ଓ ପରିବାରକୁ ତୁମେ ପାଳନ-ରକ୍ଷଣ କରୁଛ କି?

Verse 56

कच्चिद्‌ भयादुपगतं क्षीणं वा रिपुमागतम्‌ । युद्धे वा विजितं पार्थ पुत्रवत्‌ परिरक्षसि,कुन्तीनन्दन! जो भयसे अथवा अपनी धन-सम्पत्तिका नाश होनेसे तुम्हारी शरणमें आया हो या युद्धमें तुमसे परास्त हो गया हो, ऐसे शत्रुका तुम पुत्रके समान पालन करते हो या नहीं?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ପାର୍ଥ! ଭୟରେ ଶରଣ ନେଇ ଆସିଥିବା, କିମ୍ବା ସମ୍ପତ୍ତି ନଷ୍ଟ ହୋଇ କ୍ଷୀଣ ହୋଇଥିବା, ଅଥବା ଯୁଦ୍ଧରେ ତୁମେ ଯାହାକୁ ଜିତିଛ—ସେହି ଶତ୍ରୁକୁ ତୁମେ ପୁତ୍ରବତ୍ ରକ୍ଷା କରୁଛ କି?

Verse 57

कच्चित्‌ त्वमेव सर्वस्या: पृथिव्या: पृथिवीपते । समश्नानभिशड्क्यश्न यथा माता यथा पिता,पृथ्वीपते! क्या समस्त भूमण्डलकी प्रजा तुम्हें ही समदर्शी एवं माता- पिताके समान विश्वसनीय मानती है?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ପୃଥିବୀପତି! ସମଗ୍ର ରାଜ୍ୟର ପ୍ରଜା ତୁମକୁ ଏକମାତ୍ର ନିଷ୍ପକ୍ଷ ଓ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ବିଶ୍ୱସନୀୟ—ମାତା ଓ ପିତା ପରି—ମାନି, ଭୟ ଓ ସନ୍ଦେହ ବିନା ବସୁଛନ୍ତି କି?

Verse 58

कच्चिद्‌ व्यसनिन शत्रुं निशम्य भरतर्षभ । अभियासि जवेनैव समीक्ष्य त्रिविधं बलम्‌,भरतकुलभूषण! क्या तुम अपने शत्रुको (स्त्री-द्यूत आदि) दुर्व्यसनोंमें फँसा हुआ सुनकर उसके त्रिविध बल (मन्त्र, कोष एवं भृत्य-बल अथवा प्रभुशक्ति, मन्त्रशक्ति एवं उत्साहशक्ति)-पर विचार करके यदि वह दुर्बल हो तो उसके ऊपर बड़े वेगसे आक्रमण कर देते हो?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଶତ୍ରୁ ଦୁର୍ବ୍ୟସନରେ ଫସିଛି ବୋଲି ଶୁଣି, ତାହାର ତ୍ରିବିଧ ବଳ (ମନ୍ତ୍ର, କୋଷ, ସେନା) ବିଚାର କରି, ସେ ଦୁର୍ବଳ ବୋଲି ଦେଖିଲେ, ତୁମେ ଶୀଘ୍ର ଗତିରେ ତା’ଉପରେ ଆକ୍ରମଣ କରୁଛ କି?

Verse 59

यात्रामारभसे दिष्ट्या प्राप्तकालमरिंदम । पार्ष्णिमूलं च विज्ञाय व्यवसायं पराजयम्‌ | बलस्य च महाराज दत्त्वा वेतनमग्रत:,शत्रुदमन! क्या तुम पार्ष्णिग्राह आदि बारह- व्यक्तियोंके मण्डल (समुदाय)- को जानकर अपने कर्तव्यका5 निश्चय करके और पराजयमूलक व्यसनोंकाः अपने पक्षमें अभाव तथा शत्रुपक्षमें आधिक्य देखकर उचित अवसर आनेपर दैवका भरोसा करके अपने सैनिकोंको अग्रिम वेतन देकर शत्रुपर चढ़ाई कर देते हो?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ଶତ୍ରୁଦମନ! ଯଥାକାଳେ ତୁମେ ଯାତ୍ରା ଆରମ୍ଭ କରୁଛ, ଏହା ଶୁଭ। ପଛଦିଗର ବିପଦର ମୂଳ ଜାଣି, ପରାଜୟକାରୀ ଦୁର୍ବ୍ୟସନ ତ୍ୟାଗ କରି, ବିଜୟଦାୟକ ନିଶ୍ଚୟ ଦୃଢ଼ କରି; ହେ ମହାରାଜ, ସେନାକୁ ଅଗ୍ରିମ ବେତନ ଦେଇ ତୁମେ ଶତ୍ରୁ ଉପରେ ଅଭିଯାନ କରୁଛ।

Verse 60

कच्चिच्च बलमुख्ये भ्य: परराष्टे परंतप । उपच्छन्नानि रत्नानि प्रयच्छसि यथाहत:,परंतप! शत्रुके राज्यमें जो प्रधान-प्रधान योद्धा हैं, उन्हें छिपे-छिपे यथायोग्य रत्न आदि भेंट करते रहते हो या नहीं?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ପରନ୍ତପ! ଶତ୍ରୁର ରାଜ୍ୟରେ ସେନାର ପ୍ରଧାନ ପ୍ରଧାନ ନାୟକମାନଙ୍କୁ ତୁମେ ଗୁପ୍ତଭାବେ, ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ଓ ଯଥାମାତ୍ରା ରତ୍ନ ଆଦି ଉପହାର ଦେଉଛ କି?

Verse 61

कच्चिदात्मानमेवाग्रे विजित्य विजितेन्द्रिय: । परान्‌ जिगीषसे पार्थ प्रमत्तानजितेन्द्रियान्‌,कुन्तीनन्दन! क्‍या तुम पहले अपनी इन्द्रियों और मनको जीतकर ही प्रमादमें पड़े हुए अजितेन्द्रिय शत्रुओंको जीतनेकी इच्छा करते हो?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ପାର୍ଥ! ତୁମେ କି ପ୍ରଥମେ ନିଜକୁ ଜୟ କରି, ଇନ୍ଦ୍ରିୟଜୟୀ ହୋଇ, ତା’ପରେ ମାତ୍ର ପ୍ରମାଦରେ ପଡ଼ିଥିବା ଅଜିତେନ୍ଦ୍ରିୟ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ଜୟ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛ?

Verse 62

कच्चित्‌ ते यास्यतः शत्रून पूर्व यान्ति स्वनुछिता: । साम दानं च भेदश्न दण्डश्व॒ विधिवद्‌ गुणा:,शत्रुओंपर तुम्हारे आक्रमण करनेसे पहले अच्छी तरह प्रयोगमें लाये हुए तुम्हारे साम, दान, भेद और दण्ड--ये चार गुण विधिपूर्वक उन शत्रुओंतक पहुँच जाते हैं न? (क्योंकि शत्रुओंको वशमें करनेके लिये इनका प्रयोग आवश्यक है।)

ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଉପରେ ଯାତ୍ରା କରିବା ପୂର୍ବରୁ, ବିଧିପୂର୍ବକ ସୁପ୍ରୟୋଗିତ ସାମ, ଦାନ, ଭେଦ ଓ ଦଣ୍ଡ—ଏହି ଚାରି ଉପାୟ—ପ୍ରଥମେ ହିଁ ସେମାନଙ୍କ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଞ୍ଚୁଛି କି?

Verse 63

कच्चिन्मूलं दृढं कृत्वा परान्‌ यासि विशाम्पते । तांश्व॒ विक्रमसे जेतुं जित्वा च परिरक्षसि,महाराज! तुम अपने राज्यकी नींवको दृढ़ करके शत्रुओंपर धावा करते हो न? उन शत्रुओंको जीतनेके लिये पूरा पराक्रम प्रकट करते हो न? और उन्हें जीतकर उनकी पूर्णरूपसे रक्षा तो करते रहते हो न?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ବିଶାମ୍ପତେ, ମହାରାଜ! ତୁମେ କି ପ୍ରଥମେ ନିଜ ରାଜ୍ୟର ମୂଳଭିତ୍ତିକୁ ଦୃଢ଼ କରି, ତା’ପରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଉପରେ ଯାଉଛ? ସେମାନଙ୍କୁ ଜୟ କରିବା ପାଇଁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ପରାକ୍ରମ ପ୍ରକାଶ କରୁଛ? ଏବଂ ଜୟ କରି ସାରିଲେ ସେମାନଙ୍କୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ରକ୍ଷା କରୁଛ?

Verse 64

कच्चिदष्टाड्रसंयुक्ता चतुर्विधबला चमू: । बलमुख्यै: सुनीता ते द्विषतां प्रतिवर्धिनी

ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମ ସେନା କି ଅଷ୍ଟାଦଶ ଅଙ୍ଗରେ ସଂଯୁକ୍ତ ଏବଂ ଚତୁର୍ବିଧ ବଳରେ ସମ୍ପନ୍ନ? ତୁମ ମୁଖ୍ୟ ସେନାପତିମାନେ କି ତାହାକୁ ସୁନୀତ ଭାବେ ଚାଳନା କରି ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ବିରୋଧରେ ଶକ୍ତିବର୍ଦ୍ଧନ କରୁଛନ୍ତି?

Verse 65

क्या धनरक्षक, द्रव्यसंग्राहक, चिकित्सक, गुप्तचर, पाचक, सेवक, लेखक और प्रहरी--इन आठ अंगों और हाथी, घोड़े, रथ एवं पैदल--इन चारः॑ प्रकारके बलोंसे युक्त तुम्हारी सेना सुयोग्य सेनापतियोंद्वारा अच्छी तरह संचालित होकर शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ होती है? ।। कच्चिल्लवं च मुष्टिं च परराष्ट्रे परंतप । अविहाय महाराज निहंसि समरे रिपून्‌,शत्रुओंको संतप्त करनेवाले महाराज! तुम शत्रुओंके राज्यमें अनाज काटने और दुर्भिक्षेके समयकी उपेक्षा न करके रणभूमिमें शत्रुओंको मारते हो न?

ନାରଦ କହିଲେ—ଧନରକ୍ଷକ, ଦ୍ରବ୍ୟସଂଗ୍ରାହକ, ଚିକିତ୍ସକ, ଗୁପ୍ତଚର, ପାଚକ, ସେବକ, ଲେଖକ ଓ ପ୍ରହରୀ—ଏଇ ଆଠ ବିଭାଗରେ ସୁସଂଗଠିତ ଏବଂ ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥ-ପଦାତି ଏଇ ଚତୁର୍ବିଧ ବଳରେ ସମ୍ପନ୍ନ ତୁମ ସେନା କି ଯୋଗ୍ୟ ସେନାପତିମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସୁଚାଳିତ ହୋଇ ଶତ୍ରୁଦମନରେ ସମର୍ଥ? ଆଉ ହେ ପରନ୍ତପ ମହାରାଜ, ଶତ୍ରୁରାଷ୍ଟ୍ରରେ ଧାନ୍ୟଛେଦ ଓ ଦୁର୍ଭିକ୍ଷକାଳର ସୁଯୋଗ ଗ୍ରହଣ—ଏହି ଉପାୟ ଅବହେଳା ନକରି, ତୁମେ କି ସମରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ନିହତ କରୁଛ?

Verse 66

कच्चित्‌ स्वपरराष्ट्रेषु बहवो5थधिकृतास्तव । अर्थान्‌ समधितिष्ठन्ति रक्षन्ति च परस्परम्‌,क्या अपने और शत्रुके राष्ट्रोमें तुम्हारे बहुत-से अधिकारी स्थान-स्थानमें घूम-फिरकर प्रजाको वशमें करने एवं कर लेने आदि प्रयोजनोंको सिद्ध करते हैं और परस्पर मिलकर राष्ट्र एवं अपने पक्षके लोगोंकी रक्षामें लगे रहते हैं?

ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମ ନିଜ ରାଷ୍ଟ୍ରରେ ଓ ପରରାଷ୍ଟ୍ରରେ ମଧ୍ୟ ତୁମର ଅନେକ ନିଯୁକ୍ତ ଅଧିକାରୀ କି ସ୍ଥାନେ ସ୍ଥାନେ ଘୁରି ଲୋକମାନଙ୍କୁ ବଶରେ ରଖିବା, କର ସଂଗ୍ରହ ଇତ୍ୟାଦି ରାଜ୍ୟୋଦ୍ଦେଶ୍ୟ ସାଧନ କରୁଛନ୍ତି, ଏବଂ ପରସ୍ପର ସମନ୍ୱୟରେ ରାଜ୍ୟ ଓ ତୁମ ପକ୍ଷର ରକ୍ଷାରେ ଲାଗି ରହୁଛନ୍ତି?

Verse 67

कच्चिदशभ्यवहार्याणि गात्रसंस्पर्शनानि च | प्रेयाणि च महाराज रक्षन्त्यनुमतास्तव,महाराज! तुम्हारे खाद्य पदार्थ, शरीरमें धारण करनेके वस्त्र आदि तथा सूँघनेके उपयोगमें आनेवाले सुगन्धित द्रव्योंकी रक्षा विश्वस्त पुरुष ही करते हैं न?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ମହାରାଜ, ତୁମ ଭୋଜନ-ପାନ, ଦେହକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରୁଥିବା ବସ୍ତ୍ରାଦି, ଏବଂ ପ୍ରିୟ ସୁଗନ୍ଧ ଦ୍ରବ୍ୟ—ଏସବୁର ରକ୍ଷା କି ତୁମେ ଅନୁମୋଦିତ କରିଥିବା ବିଶ୍ୱସ୍ତ ଲୋକମାନେ ମାତ୍ର କରୁଛନ୍ତି?

Verse 68

कच्चित्‌ कोषश्न कोष्ठं च वाहनं द्वारमायुधम्‌ । आयश्व कृतकल्याणैस्तव भक्तैरनुछित:,तुम्हारे कल्याणके लिये सदा प्रयत्नशील रहनेवाले, स्वामिभक्त मनुष्योंद्वारा ही तुम्हारे धन-भण्डार, अन्न-भण्डार, वाहन, प्रधान द्वार, अस्त्र-शस्त्र तथा आयके साधनोंकी रक्षा एवं देख-भाल की जाती है न?

ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମ ମଙ୍ଗଳ ପାଇଁ ସଦା ପ୍ରୟତ୍ନଶୀଳ, ସ୍ୱାମିଭକ୍ତ ଲୋକମାନେ ମାତ୍ର କି ତୁମ କୋଷ, କୋଷ୍ଠ (ଅନ୍ନଭଣ୍ଡାର), ବାହନ, ପ୍ରଧାନ ଦ୍ୱାର, ଆୟୁଧ ଏବଂ ଆୟର ସାଧନଗୁଡ଼ିକର ନିରନ୍ତର ରକ୍ଷା ଓ ଦେଖଭାଳ କରୁଛନ୍ତି?

Verse 69

कच्चिदा भ्यन्तरेभ्यश्ष बाहो भ्यश्ष विशाम्पते । रक्षस्यात्मानमेवाग्रे तांश्व॒ स्वेभ्यो मिथश्व॒ तान्‌,प्रजापालक नरेश! क्‍या तुम रसोइये आदि भीतरी सेवकों तथा सेनापति आदि बाह्य सेवकोंद्वारा भी पहले अपनी ही रक्षा करते हो, फिर आत्मीयजनोंद्वारा एवं परस्पर एक-दूसरेसे उन सबकी रक्षापर भी ध्यान देते हो?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ପ୍ରଜାଧିପ! ଅନ୍ତଃସେବକ ଓ ବାହ୍ୟ କର୍ମଚାରୀମାନଙ୍କ ଠାରୁ ଉଦ୍ଭବିତ ହେବାକୁ ପାରୁଥିବା ଆପଦା ବିରୁଦ୍ଧରେ ପ୍ରଥମେ କି ତୁମେ ନିଜ ସୁରକ୍ଷା ନିଶ୍ଚିତ କର? ପରେ ବିଶ୍ୱସ୍ତ ଆତ୍ମୀୟମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଓ ପରସ୍ପର ନିରୀକ୍ଷଣର ବ୍ୟବସ୍ଥା କରି ସେହି ସେବକମାନଙ୍କର ରକ୍ଷା‑ଶାସନ ପ୍ରତି ମଧ୍ୟ ସଚେତନ ରୁହ? ହେ ପ୍ରଜାପାଳକ ରାଜା, ତୁମ ଗୃହ ଓ ପ୍ରଶାସନ କି ସୁରକ୍ଷିତ, ଶୃଙ୍ଖଳିତ ଓ ଦ୍ରୋହରହିତ ରହେ?

Verse 70

कच्चिन्न पाने द्यूते वा क्रीडासु प्रमदासु च । प्रतिजानन्ति पूर्वाह्नि व्ययं व्यसनजं तव,तुम्हारे सेवक पूर्वाह्नकालमें (जो कि धर्माचरणका समय है) तुमसे मद्यपान, द्यूत, क्रीड़ा और युवती स्त्री आदि दुर्व्यसनोंमें तुम्हारा समय और धनको व्यर्थ नष्ट करनेके लिये प्रस्ताव तो नहीं करते?

ନାରଦ କହିଲେ—ଧର୍ମକର୍ମ ପାଇଁ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ପୂର୍ବାହ୍ନକାଳରେ ତୁମ ସେବକମାନେ ମଦ୍ୟପାନ, ଦ୍ୟୁତ, କ୍ରୀଡା‑ବିନୋଦ ଓ ସ୍ତ୍ରୀସଙ୍ଗ ଭଳି ଦୁର୍ବ୍ୟସନରେ ତୁମ ସମୟ ଓ ଧନ ନଷ୍ଟ କରିବାକୁ ପ୍ରସ୍ତାବ ଦେଇ ପ୍ରେରିତ କରୁନାହାନ୍ତି ତ?

Verse 71

कच्चिदायस्य चार्थेन चतुर्भागेन वा पुनः । पादभागैस्त्रिभिवापि व्यय: संशुद्धयते तव,क्या तुम्हारी आयके एक चौथाई या आधे अथवा तीन चौथाई भागसे तुम्हारा सारा खर्च चल जाता है?

ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମ ଆୟର ଚତୁର୍ଥାଂଶ, କିମ୍ବା ଅର୍ଧ, କିମ୍ବା ତିନି-ଚତୁର୍ଥାଂଶ ଭାଗରୁ ହିଁ କି ତୁମ ସମସ୍ତ ବ୍ୟୟ ସୁଚାରୁ ଭାବେ ପୂରଣ ହୋଇଯାଏ—ଅପବ୍ୟୟ ଓ ଋଣ ବିନା?

Verse 72

कच्चिज्ज्ञातीन्‌ गुरून्‌ वृद्धान्‌ वणिज: शिल्पिन: श्रितान्‌ अभीक्षणमनुगृह्नासि धनधान्येन दुर्गतान्‌,तुम अपने आश्रित कुटुम्बके लोगों, गुरुजनों, बड़े-बूढ़ों, व्यापारियों, शिल्पियों तथा दीन-दुखियोंको धन-धान्य देकर उनपर सदा अनुग्रह करते रहते हो न?

ନାରଦ କହିଲେ—ଆଶ୍ରିତ ଜ୍ଞାତି, ଗୁରୁ, ବୃଦ୍ଧ, ବଣିକ, ଶିଳ୍ପୀ ଏବଂ ଦୁର୍ଗତ ଦୀନଜନ—ଏମାନଙ୍କୁ ଧନ‑ଧାନ୍ୟ ଦେଇ କି ତୁମେ ନିରନ୍ତର ଅନୁଗ୍ରହ କରୁଛ?

Verse 73

कच्चिच्चायव्यये युक्ता: सर्वे गणकलेखका: । अनुतिष्ठ न्ति पूर्वाह्नि नित्यमायं व्ययं तव,तुम्हारी आमदनी और खर्चको लिखने और जोड़नेके काममें लगाये हुए सभी लेखक और गणक प्रतिदिन पूर्वाह्निकालमें तुम्हारे सामने अपना हिसाब पेश करते हैं न?

ନାରଦ କହିଲେ—ଆୟ‑ବ୍ୟୟ ଲେଖିବା ଓ ଗଣନା କରିବାରେ ନିଯୁକ୍ତ ସମସ୍ତ ଲେଖକ ଓ ଗଣକ କି ପ୍ରତିଦିନ ପୂର୍ବାହ୍ନରେ ତୁମ ସମ୍ମୁଖରେ ରାଜସ୍ୱ ଓ ବ୍ୟୟର ନିୟମିତ ହିସାବ ପେଶ କରନ୍ତି?

Verse 74

कच्चिदर्थेषु सम्प्रौढान्‌ हितकामाननुप्रियान्‌ । नापकर्षसि कर्मभ्य: पूर्वमप्राप्प किल्बिषम्‌,किन्हीं कार्योमें नियुक्त किये हुए प्रौढ़, हितैषी एवं प्रिय कर्मचारियोंको पहले उनके किसी अपराधको जाँच किये बिना तुम कामसे अलग तो नहीं कर देते हो?

ନାରଦ କହିଲେ—ରାଜ୍ୟ ଓ ଧନସମ୍ବନ୍ଧୀୟ କାର୍ଯ୍ୟରେ ନିଯୁକ୍ତ ପ୍ରୌଢ, ଅନୁଭବୀ, ହିତେଷୀ ଓ ତୁମ ପ୍ରିୟ ସେବକମାନଙ୍କୁ, ପ୍ରଥମେ ତାଙ୍କ ଦୋଷ ସ୍ଥିର ନ କରି, କାମରୁ ଅପସାରଣ କରୁନାହଁ ତ?

Verse 75

कच्चिद्‌ विदित्वा पुरुषानुत्तमाधममध्यमान्‌ | त्वं कर्मस्वनुरूपेषु नियोजयसि भारत,भारत! तुम उत्तम, मध्यम और अधम श्रेणीके मनुष्योंको पहचानकर उन्हें उनके अनुरूप कार्योंमें ही लगाते हो न?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ଉତ୍ତମ, ମଧ୍ୟମ ଓ ଅଧମ ପୁରୁଷମାନଙ୍କୁ ଚିହ୍ନି, ତୁମେ ତାଙ୍କ ସାମର୍ଥ୍ୟ ଓ ସ୍ୱଭାବ ଅନୁଯାୟୀ କାର୍ଯ୍ୟରେ ମାତ୍ର ନିଯୁକ୍ତ କରୁଛ କି?

Verse 76

कच्चिन्न लुब्धा श्लौरा वा वैरिणो वा विशाम्पते । अप्राप्तव्यवहारा वा तव कर्मस्वनुछिता:,राजन! तुमने ऐसे लोगोंको तो अपने कामोंपर नहीं लगा रखा है? जो लोभी, चोर, शत्रु अथवा व्यावहारिक अनुभवसे सर्वथा शून्य हों?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ପ୍ରଜାପତେ! ତୁମ କାର୍ଯ୍ୟରେ ଅନୁଚିତ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ତୁମେ ନିଯୁକ୍ତ କରିନାହଁ ତ—ଯେମାନେ ଲୋଭୀ, ଧୂର୍ତ୍ତ, ଶତ୍ରୁ, କିମ୍ବା ବ୍ୟବହାରିକ ଅନୁଭବରୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଶୂନ୍ୟ?

Verse 77

कच्चिन्न चौरैरलुब्धैर्वा कुमारै: स्त्रीबलेन वा । त्वया वा पीड्यते राष्ट्र कच्चित्‌ तुष्टाः कृषीवला:,चोरों, लोभियों, राजकुमारों या राजकुलकी स्त्रियोंद्वारा अथवा स्वयं तुमसे ही तुम्हारे राष्ट्रको पीड़ा तो नहीं पहुँच रही है? क्या तुम्हारे राज्यके किसान संतुष्ट हैं?

ନାରଦ ପଚାରିଲେ—ଚୋର, ଲୋଭୀ, ରାଜକୁମାର, ରାଜକୁଳର ନାରୀମାନଙ୍କ ପ୍ରଭାବରୁ, କିମ୍ବା ତୁମ ନିଜ କାରଣରୁ, ତୁମ ରାଷ୍ଟ୍ର ପୀଡିତ ହେଉନାହିଁ ତ? ତୁମ ରାଜ୍ୟର କୃଷକମାନେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କି?

Verse 78

कच्चिद्‌ राष्ट्र तडागानि पूर्णानि च बृहन्ति च । भागशो विनिविष्टानि न कृषिर्देवमातृका,क्या तुम्हारे राज्यके सभी भागोंमें जलसे भरे हुए बड़े-बड़े तालाब बनवाये गये हैं? केवल वर्षाके पानीके भरोसे ही तो खेती नहीं होती है?

ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମ ରାଷ୍ଟ୍ରରେ ବଡ଼ ବଡ଼ ତଡାଗ ଓ ଜଳାଶୟ ଜଳରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଅଛି କି, ଏବଂ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାଗରେ ଯଥାଯଥ ଭାବେ ବିନ୍ୟସ୍ତ କରାଯାଇଛି କି? କାରଣ କୃଷି କେବଳ ବର୍ଷାଦେବଙ୍କ ଭରସାରେ ନୁହେଁ।

Verse 79

कच्चिन्न भक्त बीजं च कर्षकस्यावसीदति । प्रत्येक च शतं वृद्धया ददास्यृणमनुग्रहम्‌,तुम्हारे राज्यके किसानका अन्न या बीज तो नष्ट नहीं होता? क्या तुम प्रत्येक किसानपर अनुग्रह करके उसे एक रुपया सैकड़े ब्याजपर ऋण देते हो?

ତୁମ ରାଜ୍ୟରେ କୃଷକଙ୍କ ଧାନ୍ୟ ଓ ବୀଜ କି ନଷ୍ଟ ହୁଏ ନାହିଁ? ଏବଂ ରାଜାନୁଗ୍ରହରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ କୃଷକଙ୍କୁ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ସର୍ତ୍ତରେ ଋଣ ଦେଇ କୃଷିକୁ ଧାରଣ କରୁଛ କି?

Verse 80

कच्चित्‌ स्वनुछिता तात वार्ता ते साधुभिर्जनै: । वार्तायां संश्रितस्तात लोको5यं सुखमेधते,तात! तुम्हारे राष्ट्रमें अच्छे पुरुषोंद्वारा वार्ता--कृषि, गोरक्षा तथा व्यापारका काम अच्छी तरह किया जाता है न? क्‍योंकि उपर्युक्त वातवित्तिपर अवलम्बित रहनेवाले लोग ही सुखपूर्वक उन्नति करते हैं

ତାତ! ତୁମ ରାଜ୍ୟରେ ସଜ୍ଜନମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ‘ବାର୍ତ୍ତା’—କୃଷି, ଗୋରକ୍ଷା ଓ ବାଣିଜ୍ୟ—ଭଲଭାବେ ଚାଲୁଛି କି? କାରଣ ଏହି ଉପଜୀବିକା ଉପରେ ଆଶ୍ରିତ ପ୍ରଜା ସୁଖରେ ଉନ୍ନତି କରେ।

Verse 81

कच्चिच्छूरा: कृतप्रज्ञा: पजच पज्च स्वनुछिता: । क्षेमं कुर्वन्ति संहत्य राजज्जनपदे तव,राजन! क्‍या तुम्हारे जनपदके प्रत्येक गाँवमें शूरवीर, बुद्धिमान्‌ू और कार्यकुशल पाँच-पाँच पंच मिलकर सुचारुरूपसे जनहितके कार्य करते हुए सबका कल्याण करते हैं?

ରାଜନ! ତୁମ ଜନପଦର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଗାଁରେ ପାଞ୍ଚ-ପାଞ୍ଚ ଶୂର, ସ୍ଥିରବୁଦ୍ଧି ଓ କାର୍ଯ୍ୟକୁଶଳ ପଞ୍ଚମାନେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ଜନହିତ କାର୍ଯ୍ୟ କରି ସମସ୍ତଙ୍କ କ୍ଷେମ ସାଧନ କରୁଛନ୍ତି କି?

Verse 82

कच्चिन्नगरगुप्त्यर्थ ग्रामा नगरवत्‌ कृता: । ग्रामवच्च कृता: प्रान्तास्ते च सर्वे त्वदर्पणा:,क्या नगरोंकी रक्षाके लिये गाँवोंको भी नगरके ही समान बहुत-से शूरवीरोंद्वारा सुरक्षित कर दिया गया है? सीमावर्ती गाँवोंको भी अन्य गाँवोंकी भाँति सभी सुविधाएँ दी गयी हैं? तथा क्या वे सभी प्रान्त, ग्राम और नगर तुम्हें (कर-रूपमें एकत्र किया हुआ) धन समर्पित करते हैं?“

ନଗରର ସୁରକ୍ଷା ପାଇଁ ଗାଁଗୁଡ଼ିକୁ ମଧ୍ୟ ନଗର ପରି ସୁସଂଗଠିତ ଓ ସୁରକ୍ଷିତ କରାଯାଇଛି କି? ସୀମାନ୍ତ ପ୍ରାନ୍ତଗୁଡ଼ିକୁ ମଧ୍ୟ ଭିତର ଗାଁମାନଙ୍କ ପରି ସମୁଚିତ ବ୍ୟବସ୍ଥା ଓ ସହାୟତା ମିଳୁଛି କି? ଏବଂ ସେ ସମସ୍ତ ପ୍ରାନ୍ତ, ଗାଁ ଓ ନଗର ନିୟମାନୁସାରେ ରାଜସ୍ୱ ତୁମକୁ ଅର୍ପଣ କରୁଛନ୍ତି କି?

Verse 83

कच्चिद्‌ बलेनानुगता: समानि विषमाणि च | पुराणि चौरान्‌ निध्नन्तश्नरन्ति विषये तव,क्या तुम्हारे राज्यमें कुछ रक्षक पुरुष सेना साथ लेकर चोर-डाकुओंका दमन करते हुए सुगम एवं दुर्गम नगरोंमें विचरते रहते हैं?

ତୁମ ରାଜ୍ୟରେ ରକ୍ଷକମାନେ ସେନାବଳ ସହିତ ସୁଗମ ଓ ଦୁର୍ଗମ ଅଞ୍ଚଳମାନେ ସବୁଠାରେ ବିଚରଣ କରି, ପୁରୁଣା ଚୋର-ଡାକୁମାନଙ୍କୁ ଦମନ କରୁଛନ୍ତି କି—ଯାହାଦ୍ୱାରା ପ୍ରଜା ନିର୍ଭୟ ରହେ?

Verse 84

कच्चित्‌ स्त्रिय: सान्त्वयसि कच्चित्‌ ताश्च सुरक्षिता: । कच्चिन्न श्रद्दधास्यासां कच्चिद्‌ गुह्ूं न भाषसे,तुम स्त्रियोंको सान्त्वना देकर संतुष्ट रखते हो न? क्‍या वे तुम्हारे यहाँ पूर्णरूपसे सुरक्षित हैं? तुम उनपर पूरा विश्वास तो नहीं करते? और विश्वास करके उन्हें कोई गुप्त बात तो नहीं बता देते?

ନାରଦ କହିଲେ— ତୁମେ କି ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଓ ମୃଦୁବାଣୀରେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ରଖୁଛ? ସେମାନେ କି ତୁମ ରାଜ୍ୟରେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସୁରକ୍ଷିତ? ଏବଂ ତୁମେ କି ସେମାନଙ୍କ ଉପରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ବିଶ୍ୱାସ ନ ରଖି, କୌଣସି ଗୁପ୍ତ କଥା ସେମାନଙ୍କୁ କହୁନାହ?

Verse 85

कच्चिदात्ययिकं श्रुत्वा तदर्थमनुचिन्त्य च । प्रियाण्यनुभवउ्छेषे न त्वमन्तःपुरे नृप,राजन! तुम कोई अमंगलसूचक समाचार सुनकर और उसके विषयमें बार- बार विचार करके भी प्रिय भोग-विलासोंका आनन्द लेते हुए अन्तःपुरमें ही सोते तो नहीं रह जाते?

ନାରଦ କହିଲେ— ରାଜନ୍! ଅମଙ୍ଗଳସୂଚକ ସମ୍ବାଦ ଶୁଣି ଏବଂ ତାହାର ଅର୍ଥକୁ ପୁନଃପୁନଃ ଚିନ୍ତା କରି ସୁଦ୍ଧା, ପ୍ରିୟ ଭୋଗବିଲାସରେ ମଗ୍ନ ହୋଇ ତୁମେ ଅନ୍ତଃପୁରରେ ହିଁ ପଡ଼ି ରହୁନାହ କି?

Verse 86

कच्चिद्‌ द्वौ प्रथमौ यामौ रात्रे: सुप्त्वा विशाम्पते । संचिन्तयसि धर्मार्थो याम उत्थाय पकश्षिमे,प्रजानाथ! क्या तुम रात्रिके (पहले पहरके बाद) जो प्रथम दो (दूसरे-तीसरे) याम हैं, उन्हींमें सोकर अन्तिम पहरमें उठकर बैठ जाते और धर्म एवं अर्थका चिन्तन करते हो?

ନାରଦ କହିଲେ— ପ୍ରଜାନାଥ! ତୁମେ କି ରାତିର ପ୍ରଥମ ଦୁଇ ଯାମରେ ଶୋଇ, ପଶ୍ଚିମ (ଶେଷ) ଯାମରେ ଉଠି ବସି ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥର ଚିନ୍ତନ କରୁଛ?

Verse 87

कच्चिदर्थयसे नित्यं मनुष्यान्‌ समलंकृत: । उत्थाय काले कालनज्ञै: सह पाण्डव मन्त्रिभि:,पाण्डुनन्दन! तुम प्रतिदिन समयपर उठकर स्नान आदिके पश्चात्‌ वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो देश-कालके ज्ञाता मन्त्रियोंके साथ बैठकर (प्रार्थी या दर्शनार्थी) मनुष्योंकी इच्छा पूर्ण करते हो न?

ନାରଦ କହିଲେ— ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ! ତୁମେ କି ପ୍ରତିଦିନ ସମୟରେ ଉଠି, ସ୍ନାନାଦି ସମାପ୍ତ କରି, ବସ୍ତ୍ର-ଆଭୂଷଣରେ ଅଲଙ୍କୃତ ହୋଇ, ଦେଶ-କାଳଜ୍ଞ ପାଣ୍ଡବ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହ ବସି, ନିୟମିତ ଭାବେ ପ୍ରଜାଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ ଦେଇ ଯାଚକମାନଙ୍କ ଇଚ୍ଛା ପୂରଣ କରୁଛ?

Verse 88

कच्चिद्‌ रक्ताम्बरधरा: खड्गहस्ता: स्वलंकृता: । उपासते त्वामभितो रक्षणार्थमरिंदम,शत्रुदमन! कया लाल वस्त्र धारण करके अलंकारोंसे अलंकृत हुए योद्धा अपने हाथोंमें तलवार लेकर तुम्हारी रक्षाके लिये सब ओरसे सेवामें उपस्थित रहते हैं?

ନାରଦ କହିଲେ— ଶତ୍ରୁଦମନ! ଲାଲ ବସ୍ତ୍ର ପିନ୍ଧି, ଆଭୂଷଣରେ ଅଲଙ୍କୃତ, ହାତରେ ଖଡ୍ଗ ଧରିଥିବା ଯୋଦ୍ଧାମାନେ କି ତୁମ ରକ୍ଷା ପାଇଁ ସବୁଦିଗରୁ ସେବାରେ ଉପସ୍ଥିତ ରହୁଛନ୍ତି?

Verse 89

कच्चिद्‌ दण्ड्येषु यमवत्पूज्येषु च विशाम्पते । परीक्ष्य वर्तसे सम्यगप्रियेषु प्रियेषु च,महाराज! क्‍या तुम दण्डनीय अपराधियोंके प्रति यमराज और पूजनीय पुरुषोंके प्रति धर्मराजका-सा बर्ताव करते हो? प्रिय एवं अप्रिय व्यक्तियोंकी भलीभाँति परीक्षा करके ही व्यवहार करते हो न?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ପ୍ରଜାପତି ରାଜନ! ଦଣ୍ଡଯୋଗ୍ୟମାନଙ୍କ ପ୍ରତି କି ତୁମେ ଯମଙ୍କ ପରି, ଏବଂ ପୂଜ୍ୟମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ପରି ଆଚରଣ କରୁଛ? ପ୍ରିୟ ଓ ଅପ୍ରିୟ—ଉଭୟଙ୍କ ପ୍ରତି ଭଲଭାବେ ପରୀକ୍ଷା କରି ତାପରେ ଯଥାଯଥ ବ୍ୟବହାର କରୁଛ କି?

Verse 90

कच्चिच्छारीरमाबाधमौषधैर्नियमेन वा । मानसं वृद्धसेवाभि: सदा पार्थापकर्षसि,कुन्तीकुमार! क्या तुम ओषधिसेवन या पथ्य-भोजन आदि नियमोंके पालनद्वारा अपने शारीरिक कष्टको तथा वृद्ध पुरुषोंकी सेवारूप सत्संगद्वारा मानसिक संतापको सदा दूर करते रहते हो?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ କୁନ୍ତୀକୁମାର! ଔଷଧ ସେବନ କିମ୍ବା ନିୟମିତ ପଥ୍ୟାଚରଣ ଦ୍ୱାରା ଶାରୀରିକ କଷ୍ଟକୁ କି ତୁମେ ସଦା ଦୂରେ ରଖୁଛ? ଏବଂ ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ ସେବା-ରୂପ ସତ୍ସଙ୍ଗ ଦ୍ୱାରା ମାନସିକ ସନ୍ତାପକୁ ମଧ୍ୟ ସଦା ହଟାଉଛ କି?

Verse 91

कच्चिद्‌ वैद्याश्रविकित्सायामष्टाज्ञायां विशारदा: । सुहृदश्चानुरक्ताश्व शरीरे ते हिता: सदा,तुम्हारे वैद्य अष्टांगचिकित्सामें- कुशल, हितैषी, प्रेमी एवं तुम्हारे शरीरको स्वस्थ रखनेके प्रयत्नमें सदा संलग्न रहनेवाले हैं न?

ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମର ବୈଦ୍ୟମାନେ କି ଅଷ୍ଟାଙ୍ଗ-ଚିକିତ୍ସା ଜ୍ଞାନରେ ପାରଙ୍ଗତ, ହିତେଷୀ ଓ ସ୍ନେହୀ ସୁହୃଦ, ଏବଂ ତୁମ ଶରୀରହିତ ପାଇଁ ସଦା ନିବିଡ଼ ଭାବେ ଲାଗି ରହୁଛନ୍ତି?

Verse 92

कच्चिन्न लोभान्मोहाद्‌ वा मानादू्‌ वापि विशाम्पते । अर्थिप्रित्यर्थिन: प्राप्तानू न पश्यसि कथंचन,नरेश्वर! कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम अपने यहाँ आये हुए अर्थी (याचक) और प्रत्यर्थी (राजाकी ओरसे मिली हुई वृत्ति बंद हो जानेसे दुःखी हो पुनः उसीको पानेके लिये प्रार्थी)-की ओर लोभ, मोह अथवा अभिमानवश किसी प्रकार आँख उठाकर देखतेतक नहीं?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ପ୍ରଜାପତି ନରେଶ୍ୱର! ଲୋଭ, ମୋହ କିମ୍ବା ଅଭିମାନବଶତଃ ତୁମ ପାଖକୁ ଆସିଥିବା ଅର୍ଥୀ (ଯାଚକ) ଓ ପ୍ରତ୍ୟର୍ଥୀ (ପୂର୍ବରୁ ଦିଆଯାଇଥିବା ଜୀବିକା ବନ୍ଦ ହେବାରୁ ପୁନଃ ଅନୁରୋଧ କରୁଥିବା)ଙ୍କୁ କି ତୁମେ କେବେ ଦୃଷ୍ଟି ମଧ୍ୟ ନ ଦେଉଛ?

Verse 93

कच्चिन्न लोभान्मोहाद्‌ वा विश्रम्भात्‌ प्रणयेन वा । अश्रितानां मनुष्याणां वृत्तिं त्वं संरुणत्सि वै,कहीं अपने आश्रितजनोंकी जीविकावृत्तिको तुम लोभ, मोह, आत्मविश्वास अथवा आसत्तिसे बंद तो नहीं कर देते?

ନାରଦ କହିଲେ—ଲୋଭ, ମୋହ, ଅତି-ବିଶ୍ୱାସ କିମ୍ବା ଅନୁଚିତ ସ୍ନେହାସକ୍ତିରୁ କି ତୁମେ ତୁମ ଆଶ୍ରିତ ଲୋକମାନଙ୍କର ଜୀବିକା-ବୃତ୍ତିକୁ କେବେ ଅଟକାଉଛ?

Verse 94

कच्चित्‌ पौरा न सहिता ये च ते राष्ट्रवासिन । त्वया सह विरुध्यन्ते परै: क्रीता: कथंचन,तुम्हारे नगर तथा राष्ट्रके निवासी मनुष्य संगठित होकर तुम्हारे साथ विरोध तो नहीं करते? शत्रुओंने उन्हें किसी तरह घूस देकर खरीद तो नहीं लिया है?

ନାରଦ କହିଲେ—ନଗରବାସୀ ଓ ରାଜ୍ୟବାସୀମାନେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ତୁମ ବିରୋଧରେ ତ ନାହାନ୍ତି? ଶତ୍ରୁମାନେ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ଘୁଷ ଦେଇ ସେମାନଙ୍କୁ କିଣି ତୁମ ବିରୋଧୀ କରିନାହାନ୍ତି ତ?

Verse 95

कच्चिन्न दुर्बल: शत्रुर्बलेन परिपीडित: । मन्त्रेण बलवान्‌ कश्चिदुभाभ्यां च कथंचन,कोई दुर्बल शत्रु जो तुम्हारे द्वारा पहले बलपूर्वक पीड़ित किया गया (किंतु मारा नहीं गया), अब मन्त्रणाशक्तिसे अथवा मन्त्रणा और सेना दोनों ही शक्तियोंसे किसी तरह बलवान होकर सिर तो नहीं उठा रहा है?

ନାରଦ କହିଲେ—ଯେ ଶତ୍ରୁ ପୂର୍ବେ ଦୁର୍ବଳ ଥିଲା ଏବଂ ତୁମେ ବଳଦ୍ୱାରା ତାକୁ ଦମନ କରିଥିଲ (କିନ୍ତୁ ହତ୍ୟା କରିନଥିଲ), ସେ କି ଏବେ ମନ୍ତ୍ରଣା-ଶକ୍ତିରେ, କିମ୍ବା ମନ୍ତ୍ରଣା ଓ ସେନାବଳ—ଦୁହିଁରେ—କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ବଳବାନ ହୋଇ ପୁଣି ମୁଣ୍ଡ ଉଠାଉନାହିଁ ତ?

Verse 96

कच्चित्‌ सर्वेडनुरक्तास्त्वां भूमिपाला: प्रधानत: । कच्चित्‌ प्राणांस्त्वदर्थेषु संत्यजन्ति त्वया55दृता:,क्या सभी मुख्य-मुख्य भूपाल तुमसे प्रेम रखते हैं? कया वे तुम्हारे द्वारा सम्मान पाकर तुम्हारे लिये अपने प्राणोंकी बलि दे सकते हैं?

ନାରଦ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ଭୂପାଳ, ବିଶେଷକରି ପ୍ରଧାନମାନେ, ତୁମ ପ୍ରତି ଅନୁରକ୍ତ ତ? ଏବଂ ତୁମେ ସତ୍କୃତ କରିଥିବାରୁ, ତୁମ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ପାଇଁ ସେମାନେ ପ୍ରାଣ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ତ୍ୟାଗ କରିବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ତ?

Verse 97

कच्चित्‌ ते सर्वविद्यासु गुणतोअ्डर्चा प्रवर्तते । ब्राह्मणानां च साधूनां तव नैःश्रेयसी शुभा । दक्षिणास्त्वं ददास्येषां नित्यं स्वर्गापवर्गदा:,क्या तुम्हारे मनमें सभी विद्याओंके प्रति गुणके अनुसार आदरका भाव है? क्या तुम ब्राह्मणों तथा साधु-संतोंकी सेवा-पूजा करते हो? जो तुम्हारे लिये शुभ एवं कल्याणकारिणी है। इन ब्राह्मणोंको तुम सदा दक्षिणा तो देते रहते हो न? क्योंकि वह स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली है

ନାରଦ ପଚାରିଲେ—ତୁମ ହୃଦୟରେ ସମସ୍ତ ବିଦ୍ୟା ପ୍ରତି ତାହାର ଗୁଣାନୁସାରେ ଯଥୋଚିତ ଆଦର ରହୁଛି ତ? ତୁମେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଓ ସାଧୁ-ସଜ୍ଜନଙ୍କର ସେବା-ପୂଜା କରୁଛ କି—ଯାହା ତୁମ ପାଇଁ ଶୁଭ ଓ ପରମ କଲ୍ୟାଣକାରୀ? ଏବଂ ତୁମେ ସେମାନଙ୍କୁ ନିତ୍ୟ ଯଥୋଚିତ ଦକ୍ଷିଣା ଦେଉଛ କି? କାରଣ ଏହି ଦାନ ସ୍ୱର୍ଗ ଓ ମୋକ୍ଷ ଦେଇଥାଏ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।

Verse 98

कच्चिद्‌ धर्मे त्रयीमूले पूर्वराचरिते जनै: । यतमानस्तथा कर्तु तस्मिन्‌ कर्मणि वर्तसे,तीनों वेद ही जिसके मूल हैं और पूर्वपुरुषोंने जिसका आचरण किया है, उस धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये तुम अपने पूर्वजोंकी ही भाँति प्रयत्नशील तो रहते हो? धर्मानुकूल कर्ममें ही तुम्हारी प्रवृत्ति तो रहती है?

ନାରଦ କହିଲେ—ଯେ ଧର୍ମର ମୂଳ ତ୍ରୟୀ (ତିନି ବେଦ) ଏବଂ ଯାହା ପୂର୍ବତନ ଲୋକମାନେ ଆଚରଣ କରିଛନ୍ତି, ସେହି ଧର୍ମକୁ ଅନୁଷ୍ଠାନ କରିବା ପାଇଁ ତୁମେ ସେହିପରି ଯତ୍ନଶୀଳ ତ? ପୂର୍ବଜମାନଙ୍କ ପରି ଧର୍ମାନୁକୂଳ କର୍ମରେ ହିଁ ତୁମର ପ୍ରବୃତ୍ତି ରହୁଛି ତ?

Verse 99

कच्चित्तव गृहेन्नानि स्वादून्यश्रन्ति वै द्विजा: । गुणवन्ति गुणोपेतास्तवाध्यक्ष॑ं सदक्षिणम्‌,क्या तुम्हारे महलमें तुम्हारी आँखोंके सामने गुणवान्‌ ब्राह्मण स्वादिष्ठ और गुणकारक अन्न भोजन करते हैं? और भोजनके पश्चात्‌ उन्हें दक्षिणा दी जाती है?

ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମ ଗୃହରେ ତୁମ ଚକ୍ଷୁ ସମ୍ମୁଖରେ ଗୁଣବାନ୍ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ସୁସ୍ୱାଦୁ ଓ ହିତକର ଅନ୍ନ ଭୋଜନ କରୁଛନ୍ତି କି? ଏବଂ ଭୋଜନ ପରେ ତୁମ ନିରୀକ୍ଷଣରେ ସେମାନଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ଦକ୍ଷିଣା ଦେଇ ସମ୍ମାନ କରାଯାଉଛି କି?

Verse 100

कच्चित्‌ क्रतूनेकचित्तों वाजपेयांश्व सर्वश: । पुण्डरीकांश्व कार्त्स्येन यतसे कर्तुमात्मवान्‌,अपने मनको वशमें करके एकाग्रचित्त हो वाजपेय और पुण्डरीक आदि सभी यज्ञ-यागोंका तुम पूर्णरूपसे अनुष्ठान करनेका प्रयत्न तो करते हो न?

ନାରଦ କହିଲେ—ମନକୁ ବଶରେ ରଖି ଏକାଗ୍ରଚିତ୍ତ ହୋଇ ବାଜପେୟ ଓ ପୁଣ୍ଡରୀକ ଆଦି ସମସ୍ତ ଯଜ୍ଞକୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ବିଧିରେ କରିବାକୁ ତୁମେ ଦୃଢ଼ ପ୍ରୟାସ କରୁଛ କି?

Verse 101

कच्चिज्ज्ञातीन्‌ गुरून्‌ वृद्धान्‌ दैवतांस्तापसानपि । चैत्यांश्व॒ वृक्षान्‌ कल्याणान्‌ ब्राह्मणांश्न नमस्यसि,जाति-भाई, गुरुजन, वृद्ध पुरुष, देवता, तपस्वी, चैत्यवृक्ष (पीपल) आदि तथा कल्याणकारी ब्राह्मणोंको नमस्कार तो करते हो न?

ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମେ ନିଜ ଜ୍ଞାତିଜନ, ଗୁରୁ, ବୃଦ୍ଧମାନେ, ଦେବତା ଓ ତପସ୍ବୀମାନଙ୍କୁ; ଏବଂ ଚୈତ୍ୟସ୍ଥାନ, ପବିତ୍ର ବୃକ୍ଷ ଓ କଲ୍ୟାଣକାରୀ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ନମସ୍କାର କରୁଛ କି?

Verse 102

कच्चिच्छोको न मन्युर्वा त्वया प्रोत्पाद्यतेडनघ । अपि मड़लहस्तश्न जनः पाश्वे नु तिष्ठति,निष्पाप नरेश! तुम किसीके मनमें शोक या क्रोध तो नहीं पैदा करते? तुम्हारे पास कोई मनुष्य हाथमें मंगलसामग्री लेकर सदा उपस्थित रहता है न?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ନିଷ୍ପାପ ରାଜା! ତୁମେ କାହାର ହୃଦୟରେ ଶୋକ କିମ୍ବା କ୍ରୋଧ ଉତ୍ପନ୍ନ କରୁନାହଁ କି? ଏବଂ ତୁମ ପାଖରେ ମଙ୍ଗଳସାମଗ୍ରୀ ହାତରେ ଧରି ସଦା ପ୍ରସ୍ତୁତ ଥିବା ଜଣେ ଲୋକ ଅଛି କି?

Verse 103

कच्चिदेषा च ते बुद्धिर्वत्तिरेषा च तेडनघ । आयुष्या च यशस्या च धर्मकामार्थदर्शिनी,पापरहित युधिष्ठिर![ अबतक जैसा बतलाया गया है, उसके अनुसार ही तुम्हारी बुद्धि और वृत्ति (विचार और आचार) हैं न? ऐसी धर्मानुकूल बुद्धि और वृत्ति आयु तथा यशको बढ़ानेवाली एवं धर्म, अर्थ तथा कामको पूर्ण करनेवाली है

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ପାପରହିତ! ତୁମ ବୁଦ୍ଧି କି ଏହିପରି, ଏବଂ ତୁମ ଆଚରଣ ମଧ୍ୟ କି ସେହିପରି? କାରଣ ଧର୍ମାନୁକୂଳ ବୁଦ୍ଧି ଓ ବୃତ୍ତି ଆୟୁ ଓ ଯଶ ବଢ଼ାଏ; ଏବଂ ଧର୍ମ, ଅର୍ଥ, କାମ—ଏହି ପୁରୁଷାର୍ଥମାନଙ୍କର ଯଥାର୍ଥ ଦର୍ଶନ କରାଇ ସେମାନଙ୍କୁ ସିଦ୍ଧ କରେ।

Verse 104

एतया वर्तमानस्य बुद्धया राष्ट्र न सीदति । विजित्य च महीं राजा सो>त्यन्तसुखमेधते,जो ऐसी बुद्धिके अनुसार बर्ताव करता है, उसका राष्ट्र कभी संकटमें नहीं पड़ता। वह राजा सारी पृथ्वीको जीतकर बड़े सुखसे दिनोदिन उन्नति करता है

ଏପରି ବିବେକମୟ ବୁଦ୍ଧି ଅନୁସାରେ ଯେ ରାଜା ଆଚରଣ କରେ, ତାହାର ରାଷ୍ଟ୍ର କେବେ ବିପଦରେ ପଡ଼େ ନାହିଁ। ସେ ରାଜା ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ଜୟ କରି ପରମ ସୁଖରେ ଦିନକୁ ଦିନ ଉନ୍ନତି କରେ।

Verse 105

कच्चिदार्यों विशुद्धात्मा क्षारितश्नौरकर्मणि । अदृष्टशास्त्रकुशलैर्न लोभाद्‌ वध्यते शुचि:,कहीं ऐसा तो नहीं होता कि शास्त्रकुशल विद्वानोंका संग न करनेवाले तुम्हारे मूर्ख मन्त्रियोंने किसी विशुद्ध हृदयवाले श्रेष्ठ एवं पवित्र पुरुषपर चोरीका अपराध लगाकर उसका सारा धन हड़प लिया हो? और फिर अधिक धनके लोभसे वे उसे प्राणदण्ड देते हों?

କେଉଁଠି ଏପରି ତ ହେଉନାହିଁ—ଶାସ୍ତ୍ରକୁଶଳ ପଣ୍ଡିତମାନଙ୍କ ସଙ୍ଗ ନ କରୁଥିବା ତୁମ ଅଜ୍ଞ ଅଧିକାରୀମାନେ କୌଣସି ବିଶୁଦ୍ଧହୃଦୟ ଆର୍ଯ୍ୟ ପୁରୁଷଙ୍କ ଉପରେ ଚୋରିର ମିଥ୍ୟା ଅଭିଯୋଗ ଲଗାଇ ତାଙ୍କ ଧନ ହଡ଼ପ କରୁଛନ୍ତି, ଏବଂ ଅଧିକ ଧନଲୋଭରେ ସେହି ନିର୍ଦୋଷ, ପବିତ୍ର ପୁରୁଷଙ୍କୁ ପ୍ରାଣଦଣ୍ଡ ଦେଉଛନ୍ତି?

Verse 106

दुष्टो गृहीतस्तत्कारी तज्ज्ैर्दृष्ट: सकारण: । कच्चिन्न मुच्यते स्तेनो द्रव्यलोभान्नरर्षभ,नरश्रेष्ठ) कोई ऐसा दुष्ट चोर जो चोरी करते समय गृहरक्षकोंद्वारा देख लिया गया और चोरीके मालसहित पकड़ लिया गया हो, धनके लोभसे छोड़ तो नहीं दिया जाता?

ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯେ ଦୁଷ୍ଟ ଚୋର ଚୋରି କରୁଥିବାବେଳେ ଜାଣକାରମାନେ କାରଣସହିତ ଦେଖିଛନ୍ତି ଏବଂ ଚୋରା ମାଲ ସହିତ ଧରାପଡ଼ିଛି—ଧନଲୋଭରେ କେଉଁଠି ତାକୁ ଛାଡ଼ି ଦିଆଯାଉନାହିଁ ତ?

Verse 107

उत्पन्नान्‌ कच्चिदाढ्यस्य दरिद्रस्य च भारत | अर्थान्‌ न मिथ्या पश्यन्ति तवामात्या हृता जनै:,भारत! तुम्हारे मन्त्री चुगली करनेवाले लोगोंके बहकावेमें आकर विवेकशून्य हो किसी धनीके या दरिद्रके थोड़े समयमें ही अचानक पैदा हुए अधिक धनको मिथ्यादृष्टिसे तो नहीं देखते? या उनके बढ़े हुए धनको चोरी आदिसे लाया हुआ तो नहीं मान लेते?

ହେ ଭାରତ! ଚୁଗୁଲିକାରୀ ଲୋକମାନଙ୍କ ପ୍ରଲୋଭନରେ ପଡ଼ି ତୁମ ମନ୍ତ୍ରୀମାନେ କୌଣସି ଧନୀ କିମ୍ବା ଦରିଦ୍ରଙ୍କ ଅଳ୍ପ ସମୟରେ ହଠାତ୍ ଉତ୍ପନ୍ନ ଧନକୁ ମିଥ୍ୟା ଦୃଷ୍ଟିରେ ଦେଖୁଛନ୍ତି କି—କିମ୍ବା ବଢ଼ିଥିବା ଧନକୁ ଚୋରି ଆଦିରୁ ଆଣା ବୋଲି ଧରିନେଉଛନ୍ତି କି?

Verse 108

नास्तिक्यमनृतं क्रोध॑ प्रमादं दीर्घसूत्रताम्‌ । अदर्शनं ज्ञानवतामालस्यं पज्चवृत्तिताम्‌ । एकचिन्तनमर्थानामनर्थजैश्व चिन्तनम्‌,युधिछिर! तुम नास्तिकता, झूठ, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानियोंका संग न करना, आलस्य, पाँचों इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्ति, प्रजाजनोंपर अकेले ही विचार करना, अर्थशास्त्रको न जाननेवाले मू्खोके साथ विचार-विमर्श, निश्चित कार्योंके आरम्भ करनेमें विलम्ब या टालमटोल, गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित न रखना, मांगलिक उत्सव आदि न करना तथा एक साथ ही सभी शत्रुओंपर चढ़ाई कर देना--इन राजसम्बन्धी चौदह दोषोंका त्याग तो करते हो न? क्योंकि जिनके राज्यकी जड़ जम गयी है, ऐसे राजा भी इन दोषोंके कारण नष्ट हो जाते हैं

ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ରାଜଧର୍ମକୁ ନାଶ କରୁଥିବା ଏହି ଦୋଷଗୁଡ଼ିକୁ ତୁମେ ପରିତ୍ୟାଗ କରୁଛ କି—ନାସ୍ତିକ୍ୟ, ଅନୃତ (ମିଥ୍ୟା), କ୍ରୋଧ, ପ୍ରମାଦ, ଦୀର୍ଘସୂତ୍ରତା, ଜ୍ଞାନୀମାନଙ୍କ ଦର୍ଶନ-ସଙ୍ଗ ନ କରିବା, ଆଳସ୍ୟ, ପଞ୍ଚେନ୍ଦ୍ରିୟ ବିଷୟାସକ୍ତି, ରାଜ୍ୟକାର୍ଯ୍ୟ ଉପରେ ଏକାକୀ ଚିନ୍ତନ, ଏବଂ ନୀତି-ଅନୀତି ନ ଜାଣୁଥିବା ମୂର୍ଖମାନଙ୍କ ସହ ମନ୍ତ୍ରଣା? ଏହି ଦୋଷରେ ଦୃଢ଼ମୂଳ ରାଜ୍ୟ ଥିବା ରାଜାମାନେ ମଧ୍ୟ ନଶ୍ଟ ହୁଅନ୍ତି।

Verse 109

निश्चितानामनारम्भं मन्त्रस्यापरिरक्षणम्‌ | मड़लाद्यप्रयोगं च प्रत्युत्थानं च सर्वतः,युधिछिर! तुम नास्तिकता, झूठ, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानियोंका संग न करना, आलस्य, पाँचों इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्ति, प्रजाजनोंपर अकेले ही विचार करना, अर्थशास्त्रको न जाननेवाले मू्खोके साथ विचार-विमर्श, निश्चित कार्योंके आरम्भ करनेमें विलम्ब या टालमटोल, गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित न रखना, मांगलिक उत्सव आदि न करना तथा एक साथ ही सभी शत्रुओंपर चढ़ाई कर देना--इन राजसम्बन्धी चौदह दोषोंका त्याग तो करते हो न? क्योंकि जिनके राज्यकी जड़ जम गयी है, ऐसे राजा भी इन दोषोंके कारण नष्ट हो जाते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ରାଜଧର୍ମର ଏହି ଦୋଷଗୁଡ଼ିକୁ ତୁମେ ପରିହାର କରୁଛ କି—ନିଶ୍ଚିତ କରାଯାଇଥିବା କାର୍ଯ୍ୟର ଆରମ୍ଭ ନ କରିବା, ଗୁପ୍ତ ମନ୍ତ୍ରଣାକୁ ସୁରକ୍ଷିତ ନ ରଖିବା, ପ୍ରଜାର ଉତ୍ସାହ ଓ ରାଜ୍ୟର ପ୍ରତିଷ୍ଠା ଧାରଣ କରୁଥିବା ମଙ୍ଗଳୋତ୍ସବ ଓ ସାର୍ବଜନୀନ ବିଧିକୁ ଅବହେଳା କରିବା, ଏବଂ ଏକାସାଥିରେ ସମସ୍ତ ମୋର୍ଚ୍ଚାରେ ଉଠି ପଡ଼ିବା? ଏହି ଦୋଷରେ ଗଭୀରମୂଳ ରାଜ୍ୟ ମଧ୍ୟ ନଶ୍ଟ ହୁଏ; କାରଣ ନିଶ୍ଚୟ ଦୁର୍ବଳ ହୁଏ, ନୀତି ଖୋଲା ପଡ଼େ, ଲୋକବିଶ୍ୱାସ କମେ, ଶକ୍ତି ଛିଟିଯାଏ।

Verse 110

कच्चित्व॑ं वर्जयस्येतान्‌ राजदोषांश्षतुर्दश । प्रायशो यैर्विनश्यन्ति कृतमूलापि पार्थिवा:,युधिछिर! तुम नास्तिकता, झूठ, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानियोंका संग न करना, आलस्य, पाँचों इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्ति, प्रजाजनोंपर अकेले ही विचार करना, अर्थशास्त्रको न जाननेवाले मू्खोके साथ विचार-विमर्श, निश्चित कार्योंके आरम्भ करनेमें विलम्ब या टालमटोल, गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित न रखना, मांगलिक उत्सव आदि न करना तथा एक साथ ही सभी शत्रुओंपर चढ़ाई कर देना--इन राजसम्बन्धी चौदह दोषोंका त्याग तो करते हो न? क्योंकि जिनके राज्यकी जड़ जम गयी है, ऐसे राजा भी इन दोषोंके कारण नष्ट हो जाते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଯେଉଁ ରାଜଧର୍ମର ଚୌଦ ଦୋଷ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରାୟଃ ଗଭୀରମୂଳ ରାଜାମାନେ ମଧ୍ୟ ନଶ୍ଟ ହୁଅନ୍ତି, ସେଗୁଡ଼ିକୁ ତୁମେ ସତ୍ୟସତ୍ୟ ପରିହାର କରୁଛ କି?

Verse 111

कच्चित्‌ ते सफला वेदा: कच्चित्‌ ते सफलं धनम्‌ । कच्चित्‌ ते सफला दारा: कच्चित्‌ ते सफलं श्रुतम्‌,क्या तुम्हारे वेद सफल हैं? कया तुम्हारा धन सफल है? क्या तुम्हारी स्त्री सफल है? और क्या तुम्हारा शास्त्रज्ञान सफल है?

ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମ ବେଦ ଫଳଦାୟକ ହେଉଛି କି? ତୁମ ଧନ ସାର୍ଥକ ଭାବେ ବ୍ୟବହୃତ ହେଉଛି କି? ତୁମ ଦାମ୍ପତ୍ୟ-ଗୃହସ୍ଥଜୀବନ ଫଳପ୍ରଦ କି? ଏବଂ ତୁମ ‘ଶ୍ରୁତ’—ଅର୍ଥାତ୍ ଶାସ୍ତ୍ରଶ୍ରବଣ ଓ ଅଧ୍ୟୟନ—ଫଳ ଦେଉଛି କି?

Verse 112

युधिछिर उवाच कथं वै सफला वेदा: कथं वै सफलं धनम्‌ | कथं वै सफला दारा: कथं वै सफल श्रुतम्‌,युधिष्ठटिरने पूछा--देवर्षे! वेद कैसे सफल होते हैं, धनकी सफलता कैसे होती है? स्त्रीकी सफलता कैसे मानी गयी है तथा शास्त्रज्ञान कैसे सफल होता है?

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଦେବର୍ଷେ! ବେଦ କିପରି ଫଳଦାୟକ ହୁଏ? ଧନ କିପରି ସାର୍ଥକ ହୁଏ? ସ୍ତ୍ରୀ ଓ ଦାମ୍ପତ୍ୟ-ଗୃହସ୍ଥଜୀବନ କିପରି ଫଳବତୀ ବୋଲି ଗଣାଯାଏ? ଏବଂ ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞାନ—ଶୁଣିଥିବା ଓ ପଢ଼ିଥିବା—କିପରି ସଫଳ ହୁଏ?

Verse 113

नारद उवाच अग्निहोत्रफला वेदा दत्तभुक्तफलं धनम्‌ | रतिपुत्रफला दारा: शीलवृत्तफलं श्रुतम्‌,नारदजीने कहा--राजन्‌! वेदोंकी सफलता अग्निहोत्रसे होती है, दान और भोगसे ही धन सफल होता है, स्त्रीका फल है--रति और पुत्रकी प्राप्ति तथा शास्त्रज्ञाकका फल है, शील और सदाचार

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ବେଦର ଫଳ ଅଗ୍ନିହୋତ୍ର ଅନୁଷ୍ଠାନରେ। ଧନର ଫଳ ଦାନ ଓ ଧର୍ମସମ୍ମତ ଭୋଗରେ। ସ୍ତ୍ରୀ ଓ ଦାମ୍ପତ୍ୟ-ଗୃହସ୍ଥଜୀବନର ଫଳ ରତି ଓ ପୁତ୍ରପ୍ରାପ୍ତିରେ। ଏବଂ ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞାନର ଫଳ ଶୀଳ ଓ ସଦାଚାରରେ।

Verse 114

वैशम्पायन उवाच एतदाख्याय स मुनिर्नारदो वै महातपा: । पप्रच्छानन्तरमिदं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! यह कहकर महातपस्वी नारद मुनिने धर्मात्मा युधिष्ठिरसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାଜନ୍! ଏହା କହି ସାରି ମହାତପସ୍ବୀ ନାରଦ ମୁନି ଧର୍ମାତ୍ମା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ପୁନଃ ଏହିପରି ପ୍ରଶ୍ନ କଲେ।

Verse 115

नारद उवाच कच्चिदभ्यागता दूराद्‌ वणिजो लाभकारणात्‌ । यथोक्तमवहार्यन्ते शुल्क शुल्कोपजीविभि:,नारदजीने पूछा--राजन्‌! कर वसूलनेका काम करनेवाले तुम्हारे कर्मचारीलोग दूरसे लाभ उठानेके लिये आये हुए व्यापारियोंसे ठीक-ठीक कर वसूल करते हैं न? (अधिक तो नहीं लेते?)

ନାରଦ କହିଲେ—ରାଜନ୍! ଲାଭ ପାଇଁ ଦୂରଦେଶରୁ ବଣିକମାନେ ଆସୁଛନ୍ତି କି? ଏବଂ ଶୁଳ୍କ ଆଦାୟ କରି ଜୀବିକା କରୁଥିବା ତୁମ କର୍ମଚାରୀମାନେ ନିୟମାନୁସାରେ ଠିକ୍ ଠିକ୍ ଶୁଳ୍କ ନେଉଛନ୍ତି କି—ଅଧିକ ନୁହେଁ তো?

Verse 116

कच्चित्‌ ते पुरुषा राजन पुरे राष्ट्रे च मानिता: । उपानयन्ति पण्यानि उपधाभिरवज्चिता:,महाराज! वे व्यापारीालोग आपके नगर और राष्ट्रमें सम्मानित हो विक्रीके लिये उपयोगी सामान लाते हैं न! उन्हें तुम्हारे कर्मचारी छलसे ठगते तो नहीं?

ନାରଦ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ତୁମ ନଗର ଓ ରାଷ୍ଟ୍ରରେ ପ୍ରଜା—ବିଶେଷକରି ବଣିକମାନେ—ସମ୍ମାନିତ କି? ଏବଂ ସେମାନେ ବିକ୍ରୟଯୋଗ୍ୟ ପଣ୍ୟ ଆଣୁଛନ୍ତି କି? ତୁମ କର୍ମଚାରୀମାନେ କୌଣସି ଛଳ-କପଟରେ ସେମାନଙ୍କୁ ଠକୁନାହାନ୍ତି তো?

Verse 117

कच्चिच्छृूणोषि वृद्धानां धर्मार्थसहिता गिर: । नित्यमर्थविदां तात यथाधर्मार्थदर्शिनाम्‌,तात! तुम सदा धर्म और अर्थके ज्ञाता एवं अर्थशास्त्रके पूरे पण्डित बड़े-बूढ़े लोगोंकी धर्म और अर्थसे युक्त बातें सुनते रहते हो न?

ନାରଦ କହିଲେ—ତାତ! ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥ ସହିତ ଯୁକ୍ତ ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ ବାଣୀ—ଧର୍ମାର୍ଥକୁ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ଦେଖୁଥିବା ଅର୍ଥଜ୍ଞମାନଙ୍କ ଉପଦେଶ—ତୁମେ ନିତ୍ୟ ଶୁଣୁଛ କି?

Verse 118

कच्चित्‌ ते कृषितन्त्रेषु गोषु पुष्पफलेषु च । धर्मार्थ च द्विजातिभ्यो दीयेते मधुसर्पिषी,क्या तुम्हारे यहाँ खेतीसे उत्पन्न होनेवाले अन्न तथा फल-फूल एवं गौओंसे प्राप्त होनेवाले दूध, घी आदिमेंसे मधु (अन्न) और घृत आदि धर्मके लिये ब्राह्मणोंको दिये जाते हैं?

ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମ ରାଜ୍ୟରେ କୃଷିଉତ୍ପାଦ, ଗୋମାତାଠାରୁ ମିଳୁଥିବା ଦ୍ରବ୍ୟ, ଏବଂ ପୁଷ୍ପ-ଫଳ ଆଦିର ସଦୁପଯୋଗ ହେଉଛି କି? ଏବଂ ଧର୍ମାର୍ଥେ ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କୁ (ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ) ମଧୁ ଓ ଘୃତ ଆଦି ଯଥୋଚିତ ଭାବେ ଦାନ ଦିଆଯାଉଛି କି?

Verse 119

द्रव्योपकरणं किंचित्‌ सर्वदा सर्वशिल्पिनाम्‌ । चातुर्मास्यावरं सम्यड नियतं सम्प्रयच्छसि,नरेश्वर! क्या तुम सदा नियमसे सभी शिल्पियोंको व्यवस्थापूर्वक एक साथ इतनी वस्तु-निर्माणकी सामग्री दे देते हो, जो कम-से-कम चौमासे भर चल सके

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ନରେଶ୍ୱର! ତୁମେ କି ସଦା ନିୟମାନୁସାରେ ଓ ସୁଶୃଙ୍ଖଳ ଭାବେ ସମସ୍ତ ଶିଳ୍ପୀଙ୍କୁ ଉପକରଣ ଓ ସାମଗ୍ରୀର ଏମିତି ନିଶ୍ଚିତ ଯୋଗାଣ ଦେଉଛ, ଯାହା କମେ କମେ ଚାତୁର୍ମାସ୍ୟ କାଳ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ ହୁଏ, ଯେପରି ତାଙ୍କ କାମ ଅବିରତ ଚାଲିପାରେ?

Verse 120

कच्चित्‌ कृतं विजानीषे कर्तारें च प्रशंससि । सतां मध्ये महाराज सत्करोषि च पूजयन्‌,महाराज! क्या तुम्हें किसीके किये हुए उपकारका पता चलता है? क्या तुम उस उपकारीकी प्रशंसा करते हो और साधु पुरुषोंसे भरी हुई सभाके बीच उस उपकारीके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए उसका आदर-सत्कार करते हो?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ମହାରାଜ! କେହି ତୁମ ପାଇଁ କରିଥିବା ଉପକାରକୁ ତୁମେ କି ଚିହ୍ନିପାର? ଉପକାରକର୍ତ୍ତାଙ୍କୁ କି ପ୍ରଶଂସା କର? ସତ୍ପୁରୁଷମାନେ ଭରିଥିବା ସଭାମଧ୍ୟରେ କୃତଜ୍ଞତା ପ୍ରକାଶ କରି ତାଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ-ସତ୍କାର ଓ ପୂଜା ଦେଉଛ କି?

Verse 121

कच्चित्‌ सूत्राणि सर्वाणि गृह्नासि भरतर्षभ । हस्तिसूत्रा श्वसूत्राणि रथसूत्राणि वा विभो,भरतश्रेष्ठ! क्‍या तुम संक्षेपसे सिद्धान्तका प्रति-पादन करनेवाले सभी सूत्रग्रन्थ--हस्तिसूत्र, अश्वसूत्र एवं रथसूत्र आदिका संग्रह (पठन एवं अभ्यास) करते रहते हो?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ଭରତବୃଷଭ! ସଂକ୍ଷେପରେ ସିଦ୍ଧାନ୍ତ ପ୍ରତିପାଦନ କରୁଥିବା ସମସ୍ତ ସୂତ୍ରଗ୍ରନ୍ଥ—ହସ୍ତିସୂତ୍ର, ଅଶ୍ୱସୂତ୍ର, ରଥସୂତ୍ର ଆଦି—ତୁମେ କି ଅଧ୍ୟୟନ କରି ଧାରଣ କରୁଛ? ହେ ବିଭୋ, ତାହାର ନିତ୍ୟ ଅଭ୍ୟାସ ରଖୁଛ କି?

Verse 122

कच्चिदशभ्यस्यते सम्यग गृहे ते भरतर्षभ । धनुर्वेदस्य सूत्र वै यन्त्रसूत्रं च नागरम्‌,भरतकुलभूषण! क्‍या तुम्हारे घरपर धरनुर्वेदसूत्र, यन्त्रसूत्रन और नागरिक सूत्रका अच्छी तरह अभ्यास किया जाता है?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ଭରତକୁଳଭୂଷଣ! ତୁମ ଘରେ ଧନୁର୍ବେଦସୂତ୍ର, ଯନ୍ତ୍ରସୂତ୍ର ଓ ନାଗରିକସୂତ୍ର—ଏ ସବୁର ଶିଷ୍ଟ ଶାସନ ସହିତ ସମ୍ୟକ୍ ଅଭ୍ୟାସ ଭଲଭାବେ ହେଉଛି କି?

Verse 123

कच्चिदस्त्राणि सर्वाणि ब्रह्मुदण्डश्व॒ तेडनघ । विषयोगास्तथा सर्वे विदिता: शत्रुनाशना:,निष्पाप नरेश! तुम्हें सब प्रकारके अस्त्र (जो मन्त्रबलसे प्रयुक्त होते हैं), वेदोक्त दण्ड-विधान तथा शत्रुओंका नाश करनेवाले सब प्रकारके विषप्रयोग ज्ञात हैं न?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ନିଷ୍ପାପ ନରେଶ! ମନ୍ତ୍ରବଳରେ ପ୍ରୟୋଗ ହେଉଥିବା ସମସ୍ତ ଅସ୍ତ୍ର, ବେଦୋକ୍ତ ଦଣ୍ଡବିଧାନ, ଏବଂ ଶତ୍ରୁନାଶକ ବିଷପ୍ରୟୋଗର ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଉପାୟ—ଏ ସବୁ କି ତୁମେ ଜାଣ?

Verse 124

कच्चिदग्निभयाच्चैव सर्व व्यालभयात्‌ तथा । रोगरक्षो भयाच्चैव राष्ट्र स्‍वं परिरक्षसि,क्या तुम अग्नि, सर्प, रोग तथा राक्षसोंके भयसे अपने सम्पूर्ण राष्ट्रकी रक्षा करते हो?

ନାରଦ କହିଲେ—ତୁମେ କି ଅଗ୍ନିଭୟରୁ, ସମସ୍ତ ବିଷାକ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ଭୟରୁ, ଏବଂ ରୋଗ ଓ ରାକ୍ଷସଭୟରୁ ନିଜ ରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ଯଥାଯଥ ରକ୍ଷା କରୁଛ?

Verse 125

कच्चिदन्धांश्व मूकां श्व पड्डून्‌ व्यज्ञानबान्धवान्‌ । पितेव पासि धर्मज्ञ तथा प्रव्रजितानपि,धर्मज्ञ! क्‍या तुम अंधों, गूँगों, पंगुओं, अंगहीनों और बन्धु-बान्धवोंसे रहित अनाथों तथा संन्यासियोंका भी पिताकी भाँति पालन करते हो?

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ଧର୍ମଜ୍ଞ! ତୁମେ କି ପିତା ପରି ଅନ୍ଧ, ମୂକ, ପଙ୍ଗୁ, ଅଙ୍ଗବିକଳ ଏବଂ ବନ୍ଧୁବାନ୍ଧବହୀନ ଅନାଥମାନଙ୍କୁ—ଏପରିକି ପ୍ରବ୍ରଜିତ ସନ୍ନ୍ୟାସୀମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ—ପୋଷଣ ଓ ରକ୍ଷା କରୁଛ?

Verse 126

षडनर्था महाराज कच्चित्‌ ते पृष्ठतः कृता: । निद्रा55लस्यं भयं क्रोधोमार्दवं दीर्घसूत्रता,महाराज! क्या तुमने निद्रा, आलस्य, भय, क्रोध, कठोरता और दीर्घसूत्रता --इन छ: दोषोंको पीछे कर दिया (त्याग दिया) है?

ନାରଦ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ବିନାଶର ଏହି ଛଅ କାରଣକୁ ତୁମେ କି ପଛେଇ ଦେଇଛ—ଅବିବେକଜନିତ ନିଦ୍ରା, ଆଳସ୍ୟ, ଭୟ, କ୍ରୋଧ, ଯେଉଁଠି ଦୃଢତା ଦରକାର ସେଠି ମାର୍ଦ୍ଦବ, ଏବଂ ଦୀର୍ଘସୂତ୍ରତା?

Verse 127

वैशम्पायन उवाच ततः कुरूणामृषभो महात्मा श्र॒ुत्वा गिरो ब्राह्मणसत्तमस्य । प्रणम्य पादावभिवाद्य तुष्टो राजाब्रवीन्नारदं देवरूपम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ କୁରୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମହାତ୍ମା ରାଜା ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣୋତ୍ତମଙ୍କ ବାକ୍ୟ ଶୁଣି, ତାଙ୍କ ପାଦରେ ପ୍ରଣାମ କରି ଅଭିବାଦନ କଲେ; ଏବଂ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ ଦେବରୂପ ନାରଦଙ୍କୁ କହିଲେ।

Verse 128

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! कुरुश्रेष्ठ महात्मा राजा युधिष्ठिरने ब्रह्माके पुत्रोंमें श्रेष्ठ नारदजीका यह वचन सुनकर उनके दोनों चरणोंमें प्रणाम एवं अभिवादन किया और अत्यन्त संतुष्ट हो देवस्वरूप नारदजीसे कहा ।। युधिछिर उवाच एवं करिष्यामि यथा त्वयोक्तं प्रज्ञा हि मे भूय एवाभिवृद्धा । उक्त्वा तथा चैव चकार राजा लेभे महीं सागरमेखलां च,युधिछिर बोले-देवर्षे! आपने जैसा उपदेश दिया है, वैसा ही करूँगा। आपके इस प्रवचनसे मेरी प्रज्ञा और भी बढ़ गयी है। ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिरने वैला ही आचरण किया और इसीसे समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राज्य पा लिया

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ଦେବର୍ଷେ! ଆପଣ ଯେପରି କହିଛନ୍ତି, ସେପରି ମୁଁ କରିବି; ଆପଣଙ୍କ ଉପଦେଶରେ ମୋ ପ୍ରଜ୍ଞା ଆହୁରି ବୃଦ୍ଧି ପାଇଛି। ଏହିପରି କହି ରାଜା ସେହିପରି ଆଚରଣ କଲେ ଏବଂ ସମୁଦ୍ରବେଷ୍ଟିତ ପୃଥିବୀର ରାଜ୍ୟ ଲାଭ କଲେ।

Verse 129

नारद उवाच एवं यो वर्तते राजा चातुर्वर्ण्यस्य रक्षणे । स विहृत्येह सुसुखी शक्रस्यैति सलोकताम्‌,नारदजीने कहा--जो राजा इस प्रकार चारों वर्णों (और वर्णाश्रमधर्म)-की रक्षामें संलग्न रहता है, वह इस लोकमें अत्यन्त सुखपूर्वक विहार करके अन्तमें देवराज इन्द्रके लोकमें जाता है

ନାରଦ କହିଲେ—ଯେ ରାଜା ଏହିପରି ଚାତୁର୍ବର୍ଣ୍ୟ ଓ ବର୍ଣାଶ୍ରମଧର୍ମର ରକ୍ଷାରେ ଅଟୁଟ ରହେ, ସେ ଏହି ଲୋକରେ ମହାସୁଖରେ ବିହାର କରି ଶେଷରେ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ଲୋକକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ।

Frequently Asked Questions

The central dharma-sankat is governance balance: how a ruler can pursue artha (state prosperity and power) without violating dharma, and how kāma (personal desire) must not distort policy, justice, secrecy, or public welfare.

Kingship is framed as accountable stewardship: victory and stability arise from disciplined counsel, ethical administration, timely obligations, and protection of subjects; ‘knowledge’ and ‘wealth’ are validated by right practice—ritual duty, giving, and character.

A concluding evaluative statement functions as meta-commentary: a ruler who protects the cāturvarṇya order and governs by these norms enjoys well-being here and attains an exalted posthumous state (Śakra’s realm), marking ethical governance as spiritually consequential.