Nāradasya Rājadharma-praśnāḥ
Nārada’s Examination of Royal Ethics
उत्पन्नान् कच्चिदाढ्यस्य दरिद्रस्य च भारत | अर्थान् न मिथ्या पश्यन्ति तवामात्या हृता जनै:,भारत! तुम्हारे मन्त्री चुगली करनेवाले लोगोंके बहकावेमें आकर विवेकशून्य हो किसी धनीके या दरिद्रके थोड़े समयमें ही अचानक पैदा हुए अधिक धनको मिथ्यादृष्टिसे तो नहीं देखते? या उनके बढ़े हुए धनको चोरी आदिसे लाया हुआ तो नहीं मान लेते?
ହେ ଭାରତ! ଚୁଗୁଲିକାରୀ ଲୋକମାନଙ୍କ ପ୍ରଲୋଭନରେ ପଡ଼ି ତୁମ ମନ୍ତ୍ରୀମାନେ କୌଣସି ଧନୀ କିମ୍ବା ଦରିଦ୍ରଙ୍କ ଅଳ୍ପ ସମୟରେ ହଠାତ୍ ଉତ୍ପନ୍ନ ଧନକୁ ମିଥ୍ୟା ଦୃଷ୍ଟିରେ ଦେଖୁଛନ୍ତି କି—କିମ୍ବା ବଢ଼ିଥିବା ଧନକୁ ଚୋରି ଆଦିରୁ ଆଣା ବୋଲି ଧରିନେଉଛନ୍ତି କି?
नारद उवाच