
Śakuni–Duryodhana-saṃvāda: Dyūta-yojanā (Śakuni and Duryodhana on Planning the Dice-Game)
Upa-parva: Dyūta-prastāva (Prelude to the Dice-Game)
Chapter 44 records a strategic dialogue in which Śakuni addresses Duryodhana’s agitation toward Yudhiṣṭhira. Śakuni first normalizes the Pāṇḍavas’ prosperity as their rightful share and notes the concrete sources of their strength: alliances (Draupadī and Drupada with sons), support networks, and the prestige of a well-built sabhā associated with Maya and extraordinary attendants. He then corrects Duryodhana’s claim of Pāṇḍava ‘lack of support’ by listing Kaurava-side champions, yet immediately cautions that the Pāṇḍavas and their allies are not readily defeatable by force. The chapter’s pivot is Śakuni’s proposal of an alternative victory-condition: exploit Yudhiṣṭhira’s fondness for dyūta and his inability to refuse a formal challenge, coupled with Śakuni’s own expertise in play. Duryodhana accepts the plan, foreseeing total political gain (land, kings, and the sabhā’s wealth), and urges Śakuni to present the proposal to Dhṛtarāṣṭra according to courtly propriety.
Chapter Arc: राजसूय-यज्ञ की सभा में शिशुपाल, भीष्म के कृष्ण-स्तवन से चिढ़कर कटु वचन बरसाता है और सभा की मर्यादा को चुनौती देता है। → वह भीष्म को अपमानित करता, कृष्ण की प्रशंसा को ‘अतिशयोक्ति’ बताकर अनेक राजाओं (द्रोण, अश्वत्थामा, जयद्रथ, दन्तवक्र, भगदत्त आदि) के पराक्रम गिनाता है और प्रश्न उठाता है कि केशव को सर्वोच्च क्यों माना जाए। भीमसेन सहित पाण्डव-पक्ष में रोष उमड़ता है; राजाओं के बीच भी उथल-पुथल फैलती है। → शिशुपाल उन्मत्त होकर राजाओं को उकसाता है—‘भीष्म को पशुवत् मारो या आग में जला दो’—और अंततः कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारता है, ‘चक्र-गदा-धारी गोविन्द को आज रण में लाओ।’ → भीष्म शिशुपाल की बुद्धि-भ्रष्टता को ‘काल-ग्रस्त’ कहकर उसकी उग्रता का अर्थ खोलते हैं और संकेत देते हैं कि शिशुपाल का तेज स्वयं हरि का अंश होकर भी अब विनाश की ओर दौड़ रहा है; सभा का नैतिक केंद्र कृष्ण की ओर स्थिर हो जाता है। → कृष्ण को खुले युद्ध-आह्वान के बाद सभा श्वास रोके है—क्या अब यज्ञ-सभा ही रणभूमि बनेगी और शिशुपाल का अंत यहीं होगा?
Verse 1
ऑपन-माज बक। ्-ज:डिडिअ चतुश्नत्वारिशो< ध्याय: भीष्मकी बातोंसे चिढ़े हुए शिशुपालका उन्हें फटकारना तथा भीष्मका श्रीकृष्णसे युद्ध करनेके लिये समस्त राजाओंको चुनौती देना भीष्म उवाच नैषा चेदिपते्ुद्धिर्यया त्वा55ह्दयतेड्च्युतम् । नूनमेष जगद्धरतुः कृष्णस्यैव विनिश्चय:,भीष्मजी कहते हैं--भीमसेन यह चेदिराज शिशुपालकी बुद्धि नहीं है, जिसके द्वारा वह युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले तुम-जैसे महावीरको ललकार रहा है, अवश्य ही सम्पूर्ण जगतके स्वामी भगवान् श्रीकृष्णका ही यह निश्चित विधान है
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ଚେଦିରାଜ! ଯେ ବୁଦ୍ଧିରେ ତୁମେ ଅଚ୍ୟୁତ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଉତ୍ତେଜିତ କରୁଛ, ସେ ତୁମର ନିଜ ବୁଦ୍ଧି ନୁହେଁ। ନିଶ୍ଚୟ ଏହା ଜଗଦ୍ଧର କୃଷ୍ଣଙ୍କର ହିଁ ନିର୍ଣ୍ଣୟ।
Verse 2
को हि मां भीमसेनाद्य क्षितावहति पार्थिव: | क्षेप्तुं कालपरीतात्मा यथैष कुलपांसन:,भीमसेन! कालने ही इसके मन और बुद्धिको ग्रस लिया है, अन्यथा इस भूमण्डलमें कौन ऐसा राजा होगा, जो मुझपर इस तरह आक्षेप कर सके, जैसे यह कुलकलंक शिशुपाल कर रहा है
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ଭୀମସେନ! ଆଜି ଏହି ପୃଥିବୀରେ କେଉଁ ରାଜା ମୋପରେ ଏପରି ଆକ୍ଷେପ କରିପାରିବ? କାଳ (ବିଧି) ଯାହାର ମନକୁ ଗ୍ରସିଛି ସେଇ—ଏହି କୁଳକଳଙ୍କ ଶିଶୁପାଳ ପରି।
Verse 3
एष हास्य महाबाहुस्तेजों5शश्न हरेर्धुवम् । तमेव पुनरादातुमिच्छत्युत तथा विभु:,यह महाबाहु चेदिराज निश्चय ही भगवान् श्रीकृष्णके तेजका अंश है। ये सर्वव्यापी भगवान् अपने उस अंशको पुनः समेट लेना चाहते हैं
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଏହି ମହାବାହୁ ଚେଦିରାଜ ନିଶ୍ଚୟ ହରିଙ୍କ ତେଜର ଏକ ଅଂଶ। ଏବେ ସେଇ ସର୍ବବ୍ୟାପୀ ପ୍ରଭୁ ସେହି ଅଂଶକୁ ପୁନଃ ଆହରଣ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛନ୍ତି।
Verse 4
येनैष कुरुशार्दूल शार्दूल इव चेदिराट् गर्जत्यतीव दुर्बुद्धि: सर्वानस्मानचिन्तयन्,कुरुसिंह भीम! यही कारण है कि यह दुर्बुद्धि शिशुपाल हम सबको कुछ न समझकर आज सिंहके समान गरज रहा है
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ କୁରୁଶାର୍ଦୂଳ ଭୀମ! ଏହି କାରଣରୁ ଏହି ଚେଦିରାଜ ଶିଶୁପାଳ, ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧି ହୋଇ, ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଅଗଣା କରି ଆଜି ସିଂହ ପରି ଭୟଙ୍କର ଗର୍ଜନ କରୁଛି।
Verse 5
वैशम्पायन उवाच ततो न ममृषे चैद्यस्तद् भीष्मवचनं तदा । उवाच चैन संक्रुद्धः पुनर्भीष्ममथोत्तरम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीष्मकी यह बात शिशुपाल न सह सका। वह पुनः अत्यन्त क्रोधमें भरकर भीष्मको उनकी बातोंका उत्तर देते हुए बोला
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତେବେ ଚେଦିରାଜ ଶିଶୁପାଳ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ସେହି ବଚନ ସହି ପାରିଲା ନାହିଁ। କ୍ରୋଧେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇ ସେ ପୁଣି ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ପ୍ରତିଉତ୍ତର ଦେଲା।
Verse 6
शिशुपाल उवाच द्विषतां नोअस्तु भीष्मैष प्रभाव: केशवस्थ यः । यस्य संस्तववक्ता त्वं वन्दिवत् सततोत्थित:,शिशुपालने कहा--भीष्म! तुम सदा भाटकी तरह खड़े होकर जिसकी स्तुति गाया करते हो, उस कृष्णका जो प्रभाव है, वह हमारे शत्रुओंके पास ही रहे
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ହେ ଭୀଷ୍ମ! ଯାହାଙ୍କ (କେଶବଙ୍କ) ସ୍ତୁତି ତୁମେ ଭାଟ ପରି ସଦା ଉଠି ଦାଁଡି କରୁଛ, ସେହି ପ୍ରଭାବ ଆମ ପାଇଁ ନୁହେଁ; ତାହା ଆମ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ପାଖରେ ରହୁ।
Verse 7
संस्तवे च मनो भीष्म परेषां रमते यदि । तदा संस्तौषि राज्ञस्त्वमिमं हित्वा जनार्दनम्,भीष्म! यदि तुम्हारा मन सदा दूसरोंकी स्तुतिमें ही लगता है तो इस जनार्दनको छोड़कर इन राजाओंकी ही स्तुति करो
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ହେ ଭୀଷ୍ମ! ଯଦି ତୁମ ମନ ସତ୍ୟସତ୍ୟ ପରଙ୍କ ସ୍ତୁତିରେ ରମେ, ତେବେ ଏହି ଜନାର୍ଦନଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ଏହି ରାଜାମାନଙ୍କୁ ହିଁ ସ୍ତୁତି କର।
Verse 8
दरदं स्तुहि बाह्लीकमिमं पार्थिवसत्तमम् | जायमानेन येनेयमभवद् दारिता मही,ये दरददेशके राजा हैं, इनकी स्तुति करो। ये भूमिपालोंमें श्रेष्ठ बाह्नीक बैठे हैं, इनके गुण गाओ। इन्होंने जन्म लेते ही अपने शरीरके भारसे इस पृथ्वीको विदीर्ण कर दिया था
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ଦରଦଙ୍କୁ ସ୍ତୁତି କର; ଏହି ପାର୍ଥିବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଏହି ବାହ୍ଲୀକଙ୍କୁ ପ୍ରଶଂସା କର। ତାଙ୍କ ଗୁଣଗାନ କର—ଯାହାଙ୍କ ଜନ୍ମମାତ୍ରେ ତାଙ୍କ ଭାରରେ ପୃଥିବୀ ବିଦୀର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଥିଲା ବୋଲି କୁହାଯାଏ।
Verse 9
वड़ाड्रविषयाध्यक्षं सहस्राक्षसमं बले | स्तुहि कर्णमिमं भीष्म महाचापविकर्षणम्,भीष्म! ये जो वंग और अंग दोनों देशोंके राजा हैं, इन्द्रके समान बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं तथा महान् धनुषकी प्रत्यंचा खींचनेवाले हैं, इन वीरवर कर्णकी कीर्तिका गान करो
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ହେ ଭୀଷ୍ମ! ବଙ୍ଗ ଓ ଅଙ୍ଗ ବିଷୟର ଅଧ୍ୟକ୍ଷ, ବଳରେ ସହସ୍ରାକ୍ଷ ଇନ୍ଦ୍ର ସମ, ଏବଂ ମହାଧନୁଷର ପ୍ରତ୍ୟଞ୍ଚା ଟାଣିପାରୁଥିବା ଏହି କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ କୀର୍ତ୍ତି ସ୍ତୁତି କର।
Verse 10
यस्येमे कुण्डले दिव्ये सहजे देवनिर्मिते । कवचं च महाबाहो बालार्कसदृशप्रभम्,महाबाहो! इन कर्णके ये दोनों दिव्य कुण्डल जन्मके साथ ही प्रकट हुए हैं। किसी देवताने ही इन कुण्डलोंका निर्माण किया है। कुण्डलोंके साथ-साथ इनके शरीरपर यह दिव्य कवच भी जन्मसे ही पैदा हुआ है, जो प्रातःकालके सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा है
ମହାବାହୋ! କର୍ଣ୍ଣଙ୍କର ଏହି ଦୁଇଟି ଦିବ୍ୟ କୁଣ୍ଡଳ ଜନ୍ମସହିତ ହିଁ ପ୍ରକଟ, ଦେବନିର୍ମିତ; ଏବଂ ସେମାନଙ୍କ ସହ ଜନ୍ମଜାତ ଏହି ଦିବ୍ୟ କବଚ ମଧ୍ୟ ଅଛି, ଯାହା ପ୍ରଭାତ ସୂର୍ଯ୍ୟ ସମ ଦୀପ୍ତିମାନ।
Verse 11
वासवप्रतिमो येन जरासंधो$तिदुर्जय: । विजितो बाहुयुद्धेन देहभेदं च लम्भित:,जिन्होंने इन्द्रके तुल्य पराक्रमी तथा अत्यन्त दुर्जय जरासंधको बाहुयुद्धके द्वारा केवल परास्त ही नहीं किया, उनके शरीरको चीर भी डाला, उन भीमसेनकी स्तुति करो
ଯିଏ ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର) ସମ ପରାକ୍ରମୀ ଏବଂ ଅତିଦୁର୍ଜୟ ଜରାସନ୍ଧକୁ ବାହୁଯୁଦ୍ଧରେ ଜୟ କରି, ତାହାର ଦେହକୁ ମଧ୍ୟ ଚିରିଦେଲେ—ସେଇ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ସ୍ତୁତି କର।
Verse 12
द्रोणं द्रौर्णिं च साधु त्वं पितापुत्रौ महारथौ । स्तुहि स्तुत्यावुभी भीष्म सततं द्विजसत्तमौ,द्रोणाचार्य और अभश्वत्थामा दोनों पिता-पुत्र महारथी हैं तथा ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ हैं, अतएव स्तुत्य भी हैं। भीष्म! तुम उन दोनोंकी अच्छी तरह स्तुति करो
ଦ୍ରୋଣ ଓ ଦ୍ରୋଣପୁତ୍ର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା—ଏହି ପିତାପୁତ୍ର ଦୁହେଁ ମହାରଥୀ ଏବଂ ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ; ତେଣୁ ସ୍ତୁତ୍ୟ। ଭୀଷ୍ମ! ତୁମେ ସେମାନଙ୍କୁ ଭଲଭାବେ ସ୍ତୁତି କର।
Verse 13
ययोरन्यतरो भीष्म संक़ुद्ध: सचराचराम् | इमां वसुमतीं कुर्यान्नि:शेषामिति मे मति:,भीष्म! इन दोनों पिता-पुत्रोंमेंसे यदि एक भी अत्यन्त क्रोधमें भर जाय, तो चराचर प्राणियोंसहित इस सारी पृथ्वीको नष्ट कर सकता है, ऐसा मेरा विश्वास है
ଭୀଷ୍ମ! ସେହି ପିତାପୁତ୍ର ଦୁହେଁ ମଧ୍ୟରୁ ଯଦି ଜଣେ ମଧ୍ୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧରେ ଆବିଷ୍ଟ ହୁଅନ୍ତି, ତେବେ ଚରାଚର ପ୍ରାଣୀ ସହିତ ଏହି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ନିଃଶେଷ କରିଦେବେ—ଏହା ମୋର ମତ।
Verse 14
द्रोणस्य हि सम॑ युद्धे न पश्यामि नराधिपम् । नाश्वृत्थाम्न: समं भीष्म न च तौ स्तोतुमिच्छसि,भीष्म! मुझे तो कोई भी ऐसा राजा नहीं दिखायी देता, जो युद्धमें द्रोण अथवा अश्वत्थामाकी बराबरी कर सके। तो भी तुम इन दोनोंकी स्तुति करना नहीं चाहते
ଭୀଷ୍ମ! ଯୁଦ୍ଧରେ ଦ୍ରୋଣଙ୍କ ସମାନ କୌଣସି ନରାଧିପକୁ ମୁଁ ଦେଖୁନାହିଁ; ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମାଙ୍କ ସମାନକୁ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ। ତଥାପି ତୁମେ ସେଇ ଦୁଇଜଣଙ୍କୁ ସ୍ତୁତି କରିବାକୁ ଚାହୁଁନାହ।
Verse 15
पृथिव्यां सागरान्तायां यो वै प्रतिसमो भवेत् | दुर्योधन त्वं राजेन्द्रमतिक्रम्य महाभुजम्,इस समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीपर जो अद्वितीय अनुपम वीर हैं, उन राजाधिराज महाबाहु दुर्योधनको, अस्त्रविद्यामें निपुण और सुदृढ़पराक्रमी राजा जयद्रथको और विश्वविख्यात विक्रमशाली महाबली किम्पुरुषा-चार्य ट्रमको छोड़कर तुम कृष्णकी प्रशंसा क्यों करते हो?
ସମୁଦ୍ରପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଏହି ପୃଥିବୀରେ ଯଦି କେହି ସମକକ୍ଷ ହୋଇପାରେ, ତେବେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର ମହାବାହୁ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ଅତିକ୍ରମ କରି ତୁମେ କେଶବଙ୍କ ପ୍ରଶଂସା କାହିଁକି କରୁଛ?
Verse 16
जयद्रथं च राजानं कृतास्त्रं दृढविक्रमम् । द्रुमं किम्पुरुषाचार्य लोके प्रथितविक्रमम् । अतिक्रम्य महावीर्य कि प्रशंससि केशवम्,इस समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीपर जो अद्वितीय अनुपम वीर हैं, उन राजाधिराज महाबाहु दुर्योधनको, अस्त्रविद्यामें निपुण और सुदृढ़पराक्रमी राजा जयद्रथको और विश्वविख्यात विक्रमशाली महाबली किम्पुरुषा-चार्य ट्रमको छोड़कर तुम कृष्णकी प्रशंसा क्यों करते हो?
ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାରେ ପାରଙ୍ଗତ ଓ ଦୃଢ଼ବିକ୍ରମୀ ରାଜା ଜୟଦ୍ରଥଙ୍କୁ, ଏବଂ ଲୋକପ୍ରସିଦ୍ଧ ବିକ୍ରମଶାଳୀ କିମ୍ପୁରୁଷାଚାର୍ଯ୍ୟ ଦ୍ରୁମଙ୍କୁ ଅତିକ୍ରମ କରି, ହେ ମହାବୀର୍ଯ୍ୟ, ତୁମେ କେଶବଙ୍କ ପ୍ରଶଂସା କାହିଁକି କରୁଛ?
Verse 17
वृद्धं च भारताचार्य तथा शारद्वतं कृपम् । अतिक्रम्य महावीर्य कि प्रशंससि केशवम्,शरद्वान् मुनिके पुत्र महापराक्रमी कृप भरतवंशके वृद्ध आचार्य हैं। इनका उल्लंघन करके तुम कृष्णका गुण क्यों गाते हो?
ଭାରତମାନଙ୍କ ବୃଦ୍ଧ ଆଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କୁ ଏବଂ ଶାରଦ୍ୱତ କୃପଙ୍କୁ ଅତିକ୍ରମ କରି, ହେ ମହାବୀର୍ଯ୍ୟ, ତୁମେ କେଶବଙ୍କ ପ୍ରଶଂସା କାହିଁକି କରୁଛ?
Verse 18
धनुर्धराणां प्रवरं रुक्मिणं पुरुषोत्तमम् अतिक्रम्य महावीरय॑ कि प्रशंससि केशवम्,धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ पुरुषरत्न महाबली रुक्मीकी अवहेलना करके तुम केशवकी प्रशंसाके गीत क्यों गाते हो?
ଧନୁର୍ଧରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ପୁରୁଷୋତ୍ତମ ମହାବଳୀ ରୁକ୍ମୀଙ୍କୁ ଅତିକ୍ରମ କରି, ହେ ମହାବୀର୍ଯ୍ୟ, ତୁମେ କେଶବଙ୍କ ପ୍ରଶଂସା କାହିଁକି କରୁଛ?
Verse 19
भीष्मकं च महावीर्य दन््तवक्रं च भूमिपम् । भगदत्तं यूपकेतुं जयत्सेनं च मागधम्
ମହାବୀର୍ଯ୍ୟ ଭୀଷ୍ମକଙ୍କୁ, ଭୂମିପ ଦନ୍ତବକ୍ରଙ୍କୁ, ଭଗଦତ୍ତଙ୍କୁ, ଯୂପକେତୁଙ୍କୁ, ଏବଂ ମଗଧର ଜୟତ୍ସେନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ (କିପରି ଅବହେଳା କରିବ)?
Verse 20
विराटद्रुपदौ चोभौ शकुनिं च बृहद्धलम् । विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पाण्ड्यं श्वेतमथोत्तरम्
ବିରାଟ ଓ ଦ୍ରୁପଦ—ଉଭୟ; ଏବଂ ଶକୁନି ଓ ବୃହଦ୍ଧଲ; ଅବନ୍ତୀର ବିନ୍ଦ ଓ ଅନୁବିନ୍ଦ; ପାଣ୍ଡ୍ୟନରେଶ, ଶ୍ୱେତ ଏବଂ ପରେ ଉତ୍ତର—(ଏମାନେ ମଧ୍ୟ)।
Verse 21
शड़्खं च सुमहाभागं वृषसेनं च मानिनम् । एकलव्यं च विक्रान्तं कालिडूं च महारथम्
ଏବଂ ମହାଭାଗ ଶଙ୍ଖ; ଅଭିମାନୀ ବୃଷସେନ; ପରାକ୍ରମୀ ଏକଲବ୍ୟ; ତଥା ମହାରଥୀ କାଲିଡୂ—(ଏମାନେ ମଧ୍ୟ)।
Verse 22
अतिक्रम्य महावीर कि प्रशंससि केशवम् । महापराक्रमी भीष्मक, भूमिपाल दन्तवक्र, भगदत्त, यूपकेतु, जयत्सेन, मगधराज सहदेव, विराट, द्रुपद, शकुनि, बृहद्धल, अवन्तीके राजकुमार विन्द-अनुविन्द, पाण्ड्यनरेश, श्वेत, उत्तर, महाभाग शंख, अभिमानी वृषसेन, पराक्रमी एकलव्य तथा महारथी एवं महाबली कलिंगनरेशकी अवहेलना करके कृष्णकी प्रशंसा क्यों कर रहे हो? ।। १९--२१ $ || शल्यादीनपि कस्मात् त्वं न सतौषि वसुधाधिपान् । स्तवाय यदि ते बुद्धिर्वर्तते भीष्म सर्वदा,भीष्म! यदि तुम्हारा मन सदा दूसरोंकी स्तुति करनेमें ही लगता है तो इन शल्य आदि श्रेष्ठ राजाओंकी स्तुति क्यों नहीं करते?
ହେ ମହାବୀର! ଏତେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ଅତିକ୍ରମ କରି ତୁମେ କାହିଁକି କେଶବଙ୍କୁ ପ୍ରଶଂସା କରୁଛ? ଭୀଷ୍ମକ, ଦନ୍ତବକ୍ର, ଭଗଦତ୍ତ, ଯୂପକେତୁ, ଜୟତ୍ସେନ, ମଗଧରାଜ ସହଦେବ, ବିରାଟ, ଦ୍ରୁପଦ, ଶକୁନି, ବୃହଦ୍ଧଲ, ଅବନ୍ତୀର ରାଜକୁମାର ବିନ୍ଦ–ଅନୁବିନ୍ଦ, ପାଣ୍ଡ୍ୟନରେଶ, ଶ୍ୱେତ, ଉତ୍ତର, ମହାଭାଗ ଶଙ୍ଖ, ଅଭିମାନୀ ବୃଷସେନ, ପରାକ୍ରମୀ ଏକଲବ୍ୟ ଏବଂ ମହାବଳୀ କଲିଙ୍ଗରାଜ—ମହାରଥୀ—ଏମାନଙ୍କୁ ଅବହେଳା କରି ତୁମେ ମଧୁସୂଦନଙ୍କୁ ସ୍ତୁତି କାହିଁକି କରୁଛ? ଏବଂ ଭୀଷ୍ମ! ଯଦି ତୁମ ବୁଦ୍ଧି ସଦା ସ୍ତୁତିରେ ଲାଗି ରହେ, ତେବେ ଶଲ୍ୟ ଆଦି ଅନ୍ୟ ବସୁଧାଧିପମାନଙ୍କୁ କାହିଁକି ସ୍ତୁତି କରୁନାହ?
Verse 23
कि हि शक्यं मया कर्तु यद् वृद्धानां त्वया नृप । पुरा कथयतां नून॑ न श्रुतं धर्मवादिनाम्,भीष्म! तुमने पहले बड़े-बूढ़े धर्मोपदेशकोंके मुखसे यदि यह धर्मसंगत बात, जिसे मैं अभी बताऊँगा नहीं सुनी, तो मैं क्या कर सकता हूँ?
ହେ ନୃପ! ଯଦି ତୁମେ ପୂର୍ବେ ବୃଦ୍ଧ ଧର୍ମବାଦୀମାନଙ୍କ ମୁଖରୁ ଏହି କଥା ନିଶ୍ଚୟ ଶୁଣିନାହ, ତେବେ ମୁଁ କ’ଣ କରିପାରିବି?
Verse 24
आत्मनिन्दा55त्मपूजा च परनिन्दा परस्तव: । अनाचरितमार्याणां वृत्तमेतच्चतुर्विधम्,भीष्म! अपनी निन्दा, अपनी प्रशंसा, दूसरेकी निन््दा और दूसरेकी स्तुति--ये चार प्रकारके कार्य पहलेके श्रेष्ठ पुरुषोंने कभी नहीं किये हैं
ଆତ୍ମନିନ୍ଦା, ଆତ୍ମପ୍ରଶଂସା, ପରନିନ୍ଦା ଓ ପରସ୍ତୁତି—ଏହି ଚାରି ପ୍ରକାର ଆଚରଣ ଆର୍ୟମାନେ କେବେ ଅନୁଷ୍ଠାନ କରିନାହାନ୍ତି।
Verse 25
यदस्तव्यमिमं शश्वन्मोहात् संस्तौषि भक्तित: | केशवं तच्च ते भीष्म न कश्चिदनुमन्यते,भीष्म! जो स्तुतिके सर्वथा अयोग्य है, उसी केशवकी तुम मोहवश सदा भक्तिभावसे जो स्तुति करते रहते हो, उसका कोई अनुमोदन नहीं करता
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ଭୀଷ୍ମ! ମୋହବଶତଃ ଭକ୍ତିଭାବରେ ତୁମେ ଯାହାକୁ ପୁନଃପୁନଃ ସ୍ତୁତି କରୁଛ, ସେ କେଶବ ପ୍ରକୃତରେ ସ୍ତୁତିଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ। ତୁମ ଏହି ସ୍ତୁତିକୁ କେହି ମଧ୍ୟ ଅନୁମୋଦନ କରେନାହିଁ।
Verse 26
कथं भोजस्य पुरुषे वर्गपाले दुरात्मनि । समावेशयसे सर्व जगत् केवलकाम्यया,दुरात्मा कृष्ण तो राजा कंसका सेवक है, उनकी गौओंका चरवाहा रहा है। तुम केवल स्वार्थवश इसमें सारे जगत्का समावेश कर रहे हो
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ଭୋଜବଂଶଜ ସେଇ ଦୁରାତ୍ମା, ନୀଚ ପୁରୁଷରେ ତୁମେ କେବଳ ସ୍ୱାର୍ଥକାମନାରେ କିପରି ସମଗ୍ର ଜଗତର ସମ୍ମାନ ଭରିଦେଉଛ? ସେ ତ ମାତ୍ର ଗୋପାଳ—ତୁଚ୍ଛ ପଶୁପାଳକ ମାତ୍ର!
Verse 27
अथ चैषा न ते बुद्धि: प्रकृतिं याति भारत । मयैव कथित पूर्व भूलिड्रशकुनिर्यथा,भारत! तुम्हारी बुद्धि ठिकानेपर नहीं आ रही है। मैं यह बात पहले ही बता चुका हूँ कि तुम भूलिंग पक्षीके समान कहते कुछ और करते कुछ हो
ତଥାପି, ହେ ଭାରତ! ତୁମ ବୁଦ୍ଧି ନିଜ ସ୍ୱଭାବକୁ ଫେରୁନାହିଁ। ମୁଁ ପୂର୍ବରୁ କହିଛି—ତୁମେ ଭୂଲିଙ୍ଗ ପକ୍ଷୀ ପରି; କହ ଏକ, କର ଅନ୍ୟ।
Verse 28
भूलिड्शशकुनिर्नाम पाश्वे हिमवतः परे । भीष्म तस्या: सदा वाच: श्रूयन्ते<र्थविगर्हिता:,भीष्म! हिमालयके दूसरे भागमें भूलिंग नामसे प्रसिद्ध एक चिड़िया रहती है। उसके मुखसे सदा ऐसी बात सुनायी पड़ती है, जो उसके कार्यके विपरीत भावकी सूचक होनेके कारण अत्यन्त निन्दनीय जान पड़ती है
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ଭୀଷ୍ମ! ହିମବତର ପାର ପାର୍ଶ୍ୱରେ ‘ଭୂଲିଙ୍ଗ’ ନାମରେ ଗୋଟିଏ ପକ୍ଷୀ ରହେ। ତାହାର ମୁଖରୁ ସଦା ଅର୍ଥରେ ନିନ୍ଦନୀୟ ବାଣୀ ଶୁଣାଯାଏ।
Verse 29
मा साहसमितीदं सा सततं वाशते किल । साहसं चात्मनातीव चरन्ती नावबुध्यते,वह चिड़िया सदा यही बोला करती है--“मा साहसम' (अर्थात् साहसका काम न करो), परंतु वह स्वयं ही भारी साहसका काम करती हुई भी यह नहीं समझ पाती
ସେ ସଦା ‘ସାହସ କରନି!’ ବୋଲି ଚିତ୍କାର କରୁଥାଏ। କିନ୍ତୁ ନିଜେ ଅତ୍ୟଧିକ ଦୁସ୍ସାହସ କରିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ତାହା ବୁଝିପାରେନାହିଁ।
Verse 30
सा हि मांसार्गलं भीष्म मुखात् सिंहस्य खादत: । दन्तान्तरविलग्नं यत् तदादत्तेडल्पचेतना,भीष्म! वह मूर्ख चिड़िया मांस खाते हुए सिंहके दाँतोंमें लगे हुए मांसके टुकड़ेको अपनी चोंचसे चुगती रहती है
ହେ ଭୀଷ୍ମ! ‘ମାଂସାର୍ଗଲା’ ନାମକ ସେ ଅଳ୍ପବୁଦ୍ଧି ପକ୍ଷୀଟି ସିଂହ ମାଂସ ଖାଉଥିବାବେଳେ ତାହାର ଦାନ୍ତମଧ୍ୟରେ ଲାଗିଥିବା ମାଂସ ଟୁକୁଡ଼ାକୁ ଠୁଣ୍ଠିରେ ଚୁଗୁଚୁଗୁ କରି ନେଇଥାଏ।
Verse 31
इच्छत: सा हि सिंहस्य भीष्म जीवत्यसंशयम् | तद्वत् त्वमप्यधर्मिष्ठ सदा वाच: प्रभाषसे,निःसंदेह सिंहकी इच्छासे ही वह अबतक जी रही है। पापी भीष्म! इसी प्रकार तुम भी सदा बढ़-बढ़कर बातें करते हो
ହେ ଭୀଷ୍ମ! ନିଃସନ୍ଦେହ ସେ ସିଂହର ଇଚ୍ଛାରେ ହିଁ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ବଞ୍ଚିଛି; ସେହିପରି, ହେ ଅଧର୍ମିଷ୍ଠ, ତୁମେ ମଧ୍ୟ ସଦା ଗର୍ବିତ ଭାବରେ ବଡ଼ ବଡ଼ କଥା କହୁଛ।
Verse 32
इच्छतां भूमिपालानां भीष्म जीवस्यसंशयम् | लोकविद्धिष्टकर्मा हि नान्यो5स्ति भवता सम:,भीष्म! निःसंदेह तुम्हारा जीवन इन राजाओंकी इच्छासे ही बचा हुआ है; क्योंकि तुम्हारे समान दूसरा कोई राजा ऐसा नहीं है, जिसके कर्म सम्पूर्ण जगतसे द्वेष करनेवाले हों
ହେ ଭୀଷ୍ମ! ନିଃସନ୍ଦେହ ଏହି ଭୂପାଳମାନଙ୍କ ଇଚ୍ଛାରେ ହିଁ ତୁମ ଜୀବନ ରହିଛି; କାରଣ ତୁମ ସମାନ ଅନ୍ୟ କୌଣସି ରାଜା ନାହିଁ—ଯାହାର କର୍ମ ସମଗ୍ର ଲୋକରେ ଦ୍ୱେଷାସ୍ପଦ ଭାବେ କୁଖ୍ୟାତ।
Verse 33
वैशम्पायन उवाच ततश्रेदिपते: श्रुत्वा भीष्म: स कटुकं वच: । उवाचेदं वचो राजंश्रेदिराजस्य शृण्वत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शिशुपालका यह कटु वचन सुनकर भीष्मजीने शिशुपालके सुनते हुए यह बात कही--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ଶ୍ରେଦିପତି ଶିଶୁପାଳଙ୍କ ସେଇ କଟୁବଚନ ଶୁଣି, ଭୀଷ୍ମ ଶ୍ରେଦିରାଜ ଶୁଣୁଥିବାବେଳେ ରାଜାଙ୍କୁ ଏହି କଥା କହିଲେ।
Verse 34
इच्छतां किल नामाहं जीवाम्येषां महीक्षिताम् । सो<5हं न गणयाम्येतांस्तृणेनापि नराधिपान्,“अहो! शिशुपालके कथनानुसार मैं इन राजाओंकी इच्छापर जी रहा हूँ; परंतु मैं तो इन समस्त भूपालोंको तिनके-बराबर भी नहीं समझता”
“ଆହା! ଶିଶୁପାଳଙ୍କ କଥାନୁସାରେ ମୁଁ ଏହି ରାଜାମାନଙ୍କ ଇଚ୍ଛାରେ ବଞ୍ଚୁଛି; କିନ୍ତୁ ମୁଁ ଏହି ନରାଧିପମାନଙ୍କୁ ତୃଣ ସମାନ ମଧ୍ୟ ଗଣନା କରେନି।”
Verse 35
एवमुक्ते तु भीष्मेण ततः संचुक्रुशुर्न॒पा: । केचिज्जह्ृषिरे तत्र केचिद् भीष्मं॑ जगहिरे,भीष्मके ऐसा कहनेपर बहुत-से राजा कुपित हो उठे। कुछ लोगोंको हर्ष हुआ तथा कुछ भीष्मजीकी निन्दा करने लगे
ଭୀଷ୍ମ ଏପରି କହିବା ସହିତ ଅନେକ ରାଜା ଉତ୍ତେଜିତ ହୋଇ ଚିତ୍କାର କଲେ। କେହି କେହି ଆନନ୍ଦିତ ହେଲେ, ଆଉ କେହି ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ନିନ୍ଦା କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 36
केचिदूचुर्महेष्वासा: श्रुत्वा भीष्मस्य तद् वच: । पापो5वलिप्तो वृद्धश्न नायं भीष्मो$्हति क्षमाम्,कुछ महान् धनुर्धर नरेश भीष्मकी वह बात सुनकर कहने लगे--“यह बूढ़ा भीष्म पापी और घमण्डी है; अत: क्षमाके योग्य नहीं है
ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ସେହି କଥା ଶୁଣି କେତେକ ମହାଧନୁର୍ଧର ରାଜା କହିଲେ—“ଏହି ବୃଦ୍ଧ ଭୀଷ୍ମ ପାପୀ ଓ ଅହଂକାରୀ; ତେଣୁ କ୍ଷମାର ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ।”
Verse 37
हन्यतां दुर्मतिर्भीष्म: पशुवत् साध्वयं नृपा: । सर्वे: समेत्य संरब्धैर्दहुतां वा कटाग्निना,“राजाओ! क्रोधमें भरे हुए हम सब लोग मिलकर इस खोटी बुद्धिवाले भीष्मको पशुकी भाँति गला दबाकर मार डालें अथवा घास-फूसकी आगमें इसे जीते-जी जला दें”
“ହେ ରାଜାମାନେ! କ୍ରୋଧରେ ଉତ୍ତେଜିତ ଆମେ ସମସ୍ତେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ଏହି ଦୁର୍ମତି ଭୀଷ୍ମକୁ ପଶୁ ପରି ଗଳା ଦବାଇ ମାରିଦେବା; କିମ୍ବା ଶୁଖିଲା ଘାସର ଅଗ୍ନିରେ ଏହାକୁ ଜୀବନ୍ତ ଦହିଦେବା।”
Verse 38
इति तेषां वच: श्रुत्वा ततः कुरुपितामह: । उवाच मतिमान् भीष्मस्तानेव वसुधाधिपान्,उन राजाओंकी ये बातें सुनकर कुरुकुलके पितामह बुद्धिमान् भीष्मजी फिर उन्हीं नरेशोंसे बोले--
ସେମାନଙ୍କ ରାଜାମାନଙ୍କ କଥା ଶୁଣି କୁରୁବଂଶର ପିତାମହ, ମତିମାନ ଭୀଷ୍ମ, ପୁଣି ସେହି ଭୂପତିମାନଙ୍କୁ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ କରି କହିଲେ।
Verse 39
उक्तस्योक्तस्य नेहान्तमहं समुपलक्षये । यत् तु वक्ष्यामि तत् सर्व शृणुध्वं वसुधाधिपा:,“राजाओ! यदि मैं सबकी बातका अलग-अलग उत्तर दूँ तो यहाँ उसकी समाप्ति होती नहीं दिखायी देती। अतः मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वह सब ध्यान देकर सुनो
“ହେ ବସୁଧାଧିପମାନେ! କହାଯାଇଥିବା ପ୍ରତ୍ୟେକ କଥାର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଉତ୍ତର ଦେବାକୁ ଯାଇଲେ ଏଠାରେ ତାହାର ଶେଷ ମୁଁ ଦେଖୁନାହିଁ। ତେଣୁ ମୁଁ ଯାହା କହିବି, ସେ ସବୁ ଧ୍ୟାନଦେଇ ଶୁଣ।”
Verse 40
पशुवद् घातनं वा मे दहनं वा कटाग्निना | क्रियतां मूर्थ्नि वो न्यस्तं मयेदं सकल॑ पदम्,“तुमलोगोंमें साहस या शक्ति हो, तो पशुकी भाँति मेरी हत्या कर दो अथवा घास- फ़ूसकी आगमें मुझे जला दो। मैंने तो तुमलोगोंके मस्तकपर अपना यह पूरा पैर रख दिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯଦି ତୁମମାନଙ୍କର ସାହସ କିମ୍ବା ବଳ ଅଛି, ତେବେ ପଶୁ ପରି ମୋତେ ହତ୍ୟା କର, କିମ୍ବା ଶୁଖିଲା ଘାସର ଅଗ୍ନିରେ ମୋତେ ଦହନ କର; କାରଣ ମୁଁ ତୁମମାନଙ୍କ ମସ୍ତକ ଉପରେ ମୋର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ପାଦ ରଖିଛି।
Verse 41
एष तिष्ठति गोविन्द: पूजितो<स्माभिरच्युत: । यस्य वस्त्वरते बुद्धिर्मरणाय स माधवम्,“हमने जिनकी पूजा की है, अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले वे भगवान् गोविन्द तुमलोगोंके सामने मौजूद हैं। तुमलोगोंमेंसे जिसकी बुद्धि मृत्युका आलिंगन करनेके लिये उतावली हो रही हो, वह इन्हीं यदुकुल-तिलक चक्रगदाधर श्रीकृष्णको आज युद्धके लिये ललकारे और इनके हाथों मारा जाकर इन्हीं भगवानके शरीरमें प्रविष्ट हो जाय”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏଠାରେ ଆମେ ପୂଜା କରିଥିବା, ନିଜ ମହିମାରୁ କେବେ ଚ୍ୟୁତ ନ ହେଉଥିବା ଅଚ୍ୟୁତ ଗୋବିନ୍ଦ ଦଣ୍ଡାୟମାନ। ତୁମମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଯାହାର ବୁଦ୍ଧି ମୃତ୍ୟୁକୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କରିବାକୁ ଆତୁର, ସେ ଆଜି ମାଧବଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଆହ୍ୱାନ କରୁ; ତାଙ୍କ ହାତରେ ହତ ହୋଇ ସେ ସେଇ ପ୍ରଭୁଙ୍କ ଦେହରେ ପ୍ରବେଶ କରୁ।
Verse 42
कृष्णमाह्दनयतामद्य युद्धे चक्रगदाधरम् । यादवस्यैव देवस्य देहं विशतु पातित:,“हमने जिनकी पूजा की है, अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले वे भगवान् गोविन्द तुमलोगोंके सामने मौजूद हैं। तुमलोगोंमेंसे जिसकी बुद्धि मृत्युका आलिंगन करनेके लिये उतावली हो रही हो, वह इन्हीं यदुकुल-तिलक चक्रगदाधर श्रीकृष्णको आज युद्धके लिये ललकारे और इनके हाथों मारा जाकर इन्हीं भगवानके शरीरमें प्रविष्ट हो जाय”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯେ ଆଜି ମୃତ୍ୟୁକୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରେ, ସେ ଚକ୍ର-ଗଦାଧାରୀ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଆହ୍ୱାନ କରୁ। ତାଙ୍କ ହାତରେ ପାତିତ ହୋଇ ସେ ସେଇ ଯାଦବଦେବଙ୍କ ଦେହରେ ପ୍ରବେଶ କରୁ।
Verse 44
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि भीष्मवाक्ये चतुश्नत्वारिंशो5ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବର ଶିଶୁପାଳବଧପର୍ବରେ ଭୀଷ୍ମବାକ୍ୟ-ପ୍ରସଙ୍ଗର ଚୁଆଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Whether a politically engineered contest can be treated as ethically valid merely because it appears voluntary and rule-governed—especially when one party’s known vulnerability (attachment to gaming and reluctance to refuse summons) is deliberately targeted.
The chapter warns that dharma can be undermined not only by overt force but also by procedural manipulation; ethical evaluation must consider intent, power asymmetry, and engineered compulsion, not only formal consent.
No explicit phalaśruti appears here; the chapter functions as causal scaffolding, clarifying how strategic counsel and institutional procedure initiate the later crisis central to the Sabhā Parva.