
Jarāsandha–Bhīma Niyuddha-prastāvaḥ (Commencement of the Regulated Duel)
Upa-parva: Jarāsandha-vadha (The Magadha Episode within Sabhā-parva)
Vaiśaṃpāyana narrates how Kṛṣṇa addresses Jarāsandha, inviting him to choose a single opponent from among three (Kṛṣṇa, Bhīma, Arjuna) for a duel. Jarāsandha elects Bhīma, and preparations follow in accordance with royal custom: the purohita approaches with ritual supports, auspicious rites (svastyayana) are completed, and Jarāsandha readies himself as a kṣatriya committed to martial duty. The combat begins as a close-quarters niyuddha (wrestling/hand-to-hand engagement): the two powerful fighters grapple, strike, and attempt leverage through pulls, pushes, knee blows, and heavy impacts, compared to collisions of mountains or mythic adversaries. The duel extends continuously across days and nights, with temporal markers in the month of Kārttika. Observing Jarāsandha’s fatigue, Kṛṣṇa advises Bhīma not to press a weakened opponent in a manner that could be read as improper; instead, he instructs Bhīma to fight on equal terms. Bhīma, understanding Jarāsandha’s vulnerability (randhra), forms an intention toward decisive resolution.
Chapter Arc: श्रीकृष्ण पाण्डवों को मगध की राजधानी गिरिव्रज की अद्भुत प्रशंसा सुनाते हैं—पाँच महाशृंग पर्वतों से घिरी, शीतल वृक्षों से शोभित, उत्सवों से स्फीत और अजेय-सी प्रतीत होती नगरी। → कृष्ण, भीम और अर्जुन नगर-परिसर के पर्वत-शिखरों, चैत्यक-प्रदेश और वनराजियों को देखते हुए आगे बढ़ते हैं; गिरिव्रज की दुर्गमता और जरासंध की प्रतिष्ठा उनके उद्देश्य को और भी जोखिमपूर्ण बनाती जाती है। → तीनों वीर रात्रि के समय नगर एवं राजभवन में प्रवेश करते हैं—द्वार-रक्षा, पर्वतीय अवरोध और नगर-व्यवस्था को भेदते हुए सिंहों की भाँति भीतर जा पहुँचते हैं, और जरासंध के अहंकार को उसके ही घर पर हर लेने का संकल्प मुखर होता है। → वे यज्ञ-परिसर/ब्राह्मण-वेष की मर्यादा के सहारे राजभवन तक पहुँचकर जरासंध के सामने उपस्थित होने की स्थिति बना लेते हैं—अब संवाद और चुनौती का क्षण निकट है। → जरासंध के सम्मुख पहुँचते ही वे क्या मांगेंगे—अतिथि-धर्म की शरण में दान, या सीधे युद्ध-आह्वान?
Verse 1
अत---#क्र+ एकविशो< ध्याय: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाडोंको तोड़-फोड़-कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद वायुदेव उवाच एष पार्थ महान् भाति पशुमान् नित्यमम्बुमान् | निरामय: सुवेश्माढ्यो निवेशो मागध: शुभ:,श्रीकृष्ण बोले--कुन्तीनन्दन! देखो, यह मगध-देशकी सुन्दर एवं विशाल राजधानी कैसी शोभा पा रही है। यहाँ पशुओंकी अधिकता है। जलकी भी सदा पूर्ण सुविधा रहती है। यहाँ रोग-व्याधिका प्रकोप नहीं होता। सुन्दर महलोंसे भरा-पूरा यह नगर बड़ा मनोहर प्रतीत होता है
ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ ପାର୍ଥ! ଦେଖ, ମଗଧର ଏହି ମହାନଗର କିପରି ଦୀପ୍ତିମାନ—ପଶୁଧନରେ ସମୃଦ୍ଧ, ସଦା ଜଳସମ୍ପନ୍ନ, ରୋଗରହିତ ଓ ସୁନ୍ଦର ଭବନରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ। ଏହି ମଗଧ-ନିବାସ ଶୁଭ ଓ ମନୋହର।
Verse 2
वैहारो विपुल: शैलो वराहो वृषभस्तथा । तथा ऋषिगिरिस्तात शुभाश्वैव्यकपञ्चमा:,तात! यहाँ विहारोपयोगी विपुल, वराह, वृषभ (ऋषभ), ऋषिगिरि (मातंग) तथा पाँचवाँ चैत्यक नामक पर्वत है। बड़े-बड़े शिखरोंवाले ये पाँचों सुन्दर पर्वत शीतल छायावाले वृक्षोंसे सुशोभित हैं और एक साथ मिलकर एक-दूसरेके शरीरका स्पर्श करते हुए मानो गिरिव्रज नगरकी रक्षा कर रहे हैं
ବାୟୁ କହିଲେ—ତାତ! ଏଠାରେ ବିହାର ନାମକ ବିପୁଳ ପର୍ବତ ଅଛି, ଏବଂ ବରାହ ଓ ବୃଷଭ ମଧ୍ୟ ଅଛନ୍ତି; ତଥା ଋଷିଗିରି ଅଛି—ଏମାନଙ୍କ ସହ ଶୁଭାଶ୍ୱ ଓ ଐବ୍ୟକ ପଞ୍ଚମ (ପର୍ବତ) ଅଟେ।
Verse 3
एते पञ्च महाशज्भा: पर्वता: शीतलद्रुमा: । रक्षन्तीवाभिसंहत्य संहताड़ा गिरिव्रजम्,तात! यहाँ विहारोपयोगी विपुल, वराह, वृषभ (ऋषभ), ऋषिगिरि (मातंग) तथा पाँचवाँ चैत्यक नामक पर्वत है। बड़े-बड़े शिखरोंवाले ये पाँचों सुन्दर पर्वत शीतल छायावाले वृक्षोंसे सुशोभित हैं और एक साथ मिलकर एक-दूसरेके शरीरका स्पर्श करते हुए मानो गिरिव्रज नगरकी रक्षा कर रहे हैं
ଏହି ପାଞ୍ଚଟି ପର୍ବତ ଉଚ୍ଚ ଶିଖରବିଶିଷ୍ଟ ଓ ଶୀତଳ ଛାୟାଦାୟକ ବୃକ୍ଷରେ ଶୋଭିତ। ଏକତ୍ର ହୋଇ, ଅଙ୍ଗ ଅଙ୍ଗ ସଂଲଗ୍ନ କରି, ମନେ ହୁଏ ଯେ ସେମାନେ ଗିରିବ୍ରଜ ନଗରକୁ ରକ୍ଷା କରୁଛନ୍ତି।
Verse 4
पुष्पवेष्टितशाखाग्रैर्गन्धवद्धिर्मनोहरै: । निगूढा इव लोध्राणां वनै: कामिजनप्रियै:,वहाँ लोध नामक वृक्षोंके कई मनोहर वन हैं, जिनसे वे पाँचों पर्वत ढके हुए-से जान पड़ते हैं। उनकी शाखाओंके अग्रभागमें फ़ूल-ही-फूल दिखायी देते हैं। लोधोंके ये सुगन्धित वन कामीजनोंको बहुत प्रिय हैं
ବାୟୁ କହିଲେ—ମନୋହର ଓ ସୁଗନ୍ଧିତ ଲୋଧ୍ର-ବନ ଦ୍ୱାରା ସେ ପର୍ବତମାନେ ଯେନ ଢାକା ପଡ଼ି ଗୁପ୍ତ ହୋଇଥିବା ପରି ଦିଶନ୍ତି। ଶାଖାଗ୍ରଗୁଡ଼ିକ ପୁଷ୍ପମାଳାରେ ବେଷ୍ଟିତ; ଏହି ମଧୁର ସୁଗନ୍ଧି ବନ ଭୋଗପ୍ରିୟ ଲୋକଙ୍କୁ ବିଶେଷ ପ୍ରିୟ।
Verse 5
शूद्रायां गौतमो यत्र महात्मा संशितव्रत:ः । औशीनर्यामजनयत् काक्षीवाद्यान् सुतान् मुनि:,यहीं अत्यन्त कठोर व्रतका पालन करनेवाले महामना गौतमने उशीनरदेशकी शूद्रजातीय कन्याके गर्भसे काक्षीवान् आदि पुत्रोंको उत्पन्न किया था
ବାୟୁ କହିଲେ—ସେହି ସ୍ଥାନରେ ମହାତ୍ମା, କଠୋର ବ୍ରତରେ ଦୃଢ଼ ମୁନି ଗୌତମ ଔଶୀନର ଦେଶର ଏକ ଶୂଦ୍ରା କନ୍ୟାର ଗର୍ଭରୁ କାକ୍ଷୀବାନ୍ ଆଦି ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଜନ୍ମ ଦେଇଥିଲେ।
Verse 6
गौतम: प्रणयात् तस्माद् यथासौ तत्र सझनि । भजते मागधं वंशं स नृपाणामनुग्रहात्,इसी कारण वह गौतम मुनि राजाओंके प्रेमसे वहाँ आश्रममें रहता तथा मगधदेशीय राजवंशकी सेवा करता है
ଏହି କାରଣରୁ ସ୍ନେହବଶତଃ, ସେ ପୂର୍ବପରି ଅଭ୍ୟସ୍ତ ଥିବା ଭଳି ସେଠାରେ ଆଶ୍ରମରେ ବସନ୍ତି; ଏବଂ ରାଜମାନଙ୍କ ଅନୁଗ୍ରହରେ ମଗଧର ରାଜବଂଶକୁ ସେବା କରନ୍ତି।
Verse 7
अड़वज्भादयश्चैव राजान: सुमहाबला: । गौतमक्षयमभ्येत्य रमन्ते सम पुरार्जुन,अर्जुन! पूर्वकालमें अंग-वंग आदि महाबली राजा भी गौतमके घरमें आकर आनन्दपूर्वक रहते थे
ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ ଅର୍ଜୁନ! ପୂର୍ବକାଳରେ ଅଙ୍ଗ-ବଙ୍ଗ ଆଦି ମହାବଳୀ ରାଜାମାନେ ଗୌତମଙ୍କ ଅକ୍ଷୟ ନିବାସକୁ ଆସି ସନ୍ତୋଷରେ ବସୁଥିଲେ।
Verse 8
वनराजीस्तु पश्येमा: पिप्पलानां मनोरमा: । लोध्राणां च शुभा: पार्थ गौतमौक: समीपजा:,पार्थ! गौतमके आश्रमके निकट लहलहाती हुई पीपल और लोधोंकी इन सुन्दर एवं मनोरम वन-पंक्तियोंको तो देखो
ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ ପାର୍ଥ! ଗୌତମଙ୍କ ଆଶ୍ରମ ସମୀପରେ ଉଗିଥିବା ଏହି ମନୋହର ପିପ୍ପଳ ବନପଙ୍କ୍ତିମାନେ ଓ ଏହି ଶୁଭ ଲୋଧ୍ର ବୃକ୍ଷପଙ୍କ୍ତିମାନେ ଦେଖ।
Verse 9
अर्बुदः शक्रवापी च पन्नगौ शत्रुतापनौ । स्वस्तिकस्यालयश्नात्र मणिनागस्य चोत्तम:,यहाँ अर्बुद और शक्रवापी नामवाले दो नाग रहते हैं, जो अपने शत्रुओंको संतप्त करनेवाले हैं। यहीं स्वस्तिक नाग और मणि नागके भी उत्तम भवन हैं
ବାୟୁ କହିଲେ—ଏଠାରେ ଅର୍ବୁଦ ଓ ଶକ୍ରବାପୀ ନାମକ ଦୁଇ ନାଗରାଜ ବସନ୍ତି; ସେମାନେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ସନ୍ତପ୍ତ କରିବାରେ ଭୟଙ୍କର। ଏଠାରେ ହିଁ ସ୍ୱସ୍ତିକ ନାଗ ଓ ମଣିନାଗଙ୍କ ଉତ୍ତମ ନିବାସ ମଧ୍ୟ ଅଛି।
Verse 10
अपरिहार्या मेघानां मागधा मनुना कृता: । कौशिको मणिमांश्वैव चक्राते चाप्यनुग्रहम्,मनुने मगधदेशके निवासियोंको मेघोंके लिये अपरिहार्य (अनुग्राह्म) कर दिया है; (अत: वहाँ सदा ही बादल समयपर यशथेष्ट वर्षा करते हैं।) चण्डकौशिक मुनि और मणिमान् नाग भी मगधदेशपर अनुग्रह कर चुके हैं
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ମନୁ ମଗଧବାସୀମାନଙ୍କୁ ମେଘମାନଙ୍କ ପାଇଁ ‘ଅପରିହାର୍ଯ୍ୟ’ (ବିଶେଷ ଅନୁଗ୍ରହପାତ୍ର) କରିଦେଇଛନ୍ତି; ତେଣୁ ସେ ଦେଶରେ ମେଘମାନେ ସମୟମତେ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ବର୍ଷା କରନ୍ତି। ଚଣ୍ଡକୌଶିକ ଋଷି ଓ ମଣିମାନ୍ ନାଗ ମଧ୍ୟ ମଗଧଦେଶ ଉପରେ ଅନୁଗ୍ରହ କରିଛନ୍ତି।
Verse 11
(पाण्डरे विपुले चैव तथा वाराहकेडपि च । चैत्यके च गिरिश्रेष्ठे मातड़े च शिलोच्चये ।। एतेषु पर्वतेन्द्रेषु सर्वसिद्धमहालया: । यतीनामाश्रमाच्चैव मुनीनां च महात्मनाम् ।। श्वैतवर्णके वृषभ, विपुल, वाराह, गिरिश्रेष्ठ चैत्यक तथा मातंग गिरि--इन सभी श्रेष्ठ पर्वतोंपर सम्पूर्ण सिद्धोंक विशाल भवन हैं तथा यतियों, मुनियों और महात्माओंके बहुत-से आश्रम हैं। वृषभस्य तमालस्य महावीर्यस्य वै तथा । गन्धर्वरक्षसां चैव नागानां च तथा5डलया: ।।) वृषभ, महापराक्रमी तमाल, गन्धर्वों, राक्षमों तथा नागोंके भी निवासस्थान उन पर्वतोंकी शोभा बढ़ाते हैं। एवं प्राप्य पुरं रम्यं दुराधर्ष समन्तत: । अर्थसिद्धि त्वनुपमां जरासंधोडभिमन्यते,इस प्रकार चारों ओरसे दुर्धर्ष उस रमणीय नगरको पाकर जरासंधको यह अभिमान बना रहता है कि मुझे अनुपम अर्थसिद्धि प्राप्त होगी
ବାୟୁ କହିଲେ—ପାଣ୍ଡର ଓ ବିପୁଳ ପର୍ବତରେ, ତଥା ବାରାହକରେ; ଚୈତ୍ୟକରେ, ‘ଗିରିଶ୍ରେଷ୍ଠ’ ନାମକ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶିଖରରେ, ଏବଂ ମାତଙ୍ଗ ନାମକ ଉଚ୍ଚ ଶିଳୋଚ୍ଚୟରେ—ଏହି ସମସ୍ତ ପର୍ବତେନ୍ଦ୍ରମାନଙ୍କ ଉପରେ ସିଦ୍ଧମାନଙ୍କ ବିଶାଳ ନିବାସ ଅଛି, ଏବଂ ଯତି, ମୁନି ଓ ମହାତ୍ମାମାନଙ୍କ ଅନେକ ଆଶ୍ରମ ମଧ୍ୟ ଅଛି। ସେଠାରେ ବୃଷଭ, ମହାବୀର୍ଯ୍ୟବାନ୍ ତମାଳ, ଏବଂ ଗନ୍ଧର୍ବ, ରାକ୍ଷସ ଓ ନାଗମାନଙ୍କ ନିବାସସ୍ଥଳୀ ମଧ୍ୟ ସେଇ ପର୍ବତଶ୍ରେଣୀର ଶୋଭା ବଢ଼ାଏ। ଏଭଳି ଭାବେ ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ଦୁରାଧର୍ଷ ସେଇ ରମଣୀୟ ନଗରକୁ ପାଇ ଜରାସନ୍ଧ ଭାବେ—‘ମୋତେ ଅନୁପମ ଅର୍ଥସିଦ୍ଧି ମିଳିବ।’
Verse 12
वैशम्पायन उवाच एवमुक्क्त्वा तत: सर्वे भ्रातरो विपुलीजस:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसी बातें करते हुए वे सभी महातेजस्वी भाई श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीमसेन मगधकी राजधानीमें प्रवेश करनेके लिये चल पड़े। वह नगर चारों वर्णोके लोगोंसे भरा-पूरा था। उसमें रहनेवाले सभी लोग हृष्ट-पुष्ट दिखायी देते थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଏପରି କହି ସେ ସମସ୍ତ ମହାତେଜସ୍ବୀ ଭ୍ରାତାମାନେ ମଗଧର ରାଜଧାନୀରେ ପ୍ରବେଶ କରିବାକୁ ଚାଲିଲେ। ସେ ନଗରୀ ଚାରି ବର୍ଣ୍ଣର ଲୋକମାନେ ଭରିଥିଲେ; ସେଠାର ନିବାସୀମାନେ ହୃଷ୍ଟପୁଷ୍ଟ, ପ୍ରସନ୍ନ ଓ ସମୃଦ୍ଧ ଦେଖାଯାଉଥିଲେ।
Verse 13
वार्ष्णेय: पाण्डवौ चैव प्रतस्थुर्मागधं पुरम् । हृष्टपुष्टजनोपेतं चातुर्वर्ण्यसमाकुलम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसी बातें करते हुए वे सभी महातेजस्वी भाई श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीमसेन मगधकी राजधानीमें प्रवेश करनेके लिये चल पड़े। वह नगर चारों वर्णोके लोगोंसे भरा-पूरा था। उसमें रहनेवाले सभी लोग हृष्ट-पुष्ट दिखायी देते थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବାର୍ଷ୍ଣେୟ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଓ ସେଇ ଦୁଇ ପାଣ୍ଡବ ମଗଧ-ନଗରକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ। ସେ ରାଜଧାନୀ ହୃଷ୍ଟପୁଷ୍ଟ ଲୋକମାନେ ଭରିଥିଲେ ଏବଂ ଚାରି ବର୍ଣ୍ଣର ଜନସମାଗମରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା।
Verse 14
स्फीतोत्सवमनाधुष्यमासेदुश्न गिरिव्रजम् । ततो द्वारमनासाद्य पुरस्य गिरिमुच्छितम्,वहाँ अधिकाधिक उत्सव होते रहते थे। कोई भी उसको जीत नहीं सकता था। ऐसे गिरिव्रजके निकट वे तीनों जा पहुँचे। वे मुख्य फाटकपर न जाकर नगरके चैत्यक नामक ऊँचे पर्वतपर चले गये। उस नगरमें निवास करनेवाले मनुष्य तथा बृहद्रथ-परिवारके लोग उस पर्वतकी पूजा किया करते थे। मगधदेशकी प्रजाको यह चैत्यक पर्वत बहुत ही प्रिय था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ନିତ୍ୟ ଉତ୍ସବରେ ସମୃଦ୍ଧ ଓ ଅଜେୟ ବୋଲି ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଗିରିବ୍ରଜକୁ ସେଇ ତିନିଜଣ ପହଞ୍ଚିଲେ। ପରେ ମୁଖ୍ୟ ଦ୍ୱାରକୁ ନ ଯାଇ, ନଗର ପାଖରେ ଉଚ୍ଚ ଉଠିଥିବା ‘ଚୈତ୍ୟକ’ ନାମକ ପର୍ବତକୁ ଗଲେ; ଯାହାକୁ ନଗରବାସୀ ଓ ବୃହଦ୍ରଥ-ବଂଶଜମାନେ ପୂଜୁଥିଲେ, ଏବଂ ମଗଧଜନଙ୍କୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରିୟ ଥିଲା।
Verse 15
बाद्रथै: पूज्यमानं तथा नगरवासिभि: | मगधानां सुरुचिरं चैत्यकान्तं समाद्रवन्,वहाँ अधिकाधिक उत्सव होते रहते थे। कोई भी उसको जीत नहीं सकता था। ऐसे गिरिव्रजके निकट वे तीनों जा पहुँचे। वे मुख्य फाटकपर न जाकर नगरके चैत्यक नामक ऊँचे पर्वतपर चले गये। उस नगरमें निवास करनेवाले मनुष्य तथा बृहद्रथ-परिवारके लोग उस पर्वतकी पूजा किया करते थे। मगधदेशकी प्रजाको यह चैत्यक पर्वत बहुत ही प्रिय था
ବୃହଦ୍ରଥ-ବଂଶଜ ଓ ନଗରବାସୀମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପୂଜିତ, ମଗଧଜନଙ୍କୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରିୟ ଓ ସୁନ୍ଦର ‘ଚୈତ୍ୟକ’ ପର୍ବତକୁ ସେମାନେ ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ସମୀପ କଲେ।
Verse 16
यत्र मांसादमृषभमाससाद बृहद्रथ: । तं॑ हत्वा मासतालाभिस्तिस्रो भेरीरकारयत्,उस स्थानपर राजा बृहद्रथने (वृषभरूपधारी) ऋषभ नामक एक मांसभक्षी राक्षससे युद्ध किया और उसे मारकर उसकी खालसे तीन बड़े-बड़े नगाड़े तैयार कराये, जिनपर चोट करनेसे महीनेभरतक आवाज होती रहती थी
ଯେଉଁଠାରେ ବୃହଦ୍ରଥ ‘ଋଷଭ’ ନାମକ ମାଂସଭୋଜୀ ରାକ୍ଷସକୁ ସମ୍ମୁଖୀନ କଲେ; ତାକୁ ବଧ କରି ତାହାର ଚର୍ମରୁ ସେ ତିନୋଟି ଭେରୀ (ନଗାଡ଼ା) ତିଆରି କରାଇଲେ, ଯାହାର ନାଦ ମାସଭରି ଗୁଞ୍ଜୁଥିଲା।
Verse 17
स्वपुरे स्थापयामास तेन चानहा चर्मणा । यत्र ता: प्राणदन् भेयों दिव्यपुष्पावचूर्णिता:,राजाने उन नगाड़ोंको उस राक्षसके चमड़ेसे मढ़ाकर अपने नगरमें रखवा दिया। जहाँ वे नगाड़े बजते थे, वहाँ दिव्य फूलोंकी वर्षा होने लगती थी
ରାଜା ସେଇ ରାକ୍ଷସର ଚର୍ମରେ ମୁଡ଼ି ସେ ଭେରୀଗୁଡ଼ିକୁ ନିଜ ନଗରରେ ସ୍ଥାପନ କରାଇଲେ। ଯେଉଁଠାରେ ସେ ଭେରୀମାନେ ନିନାଦ କରୁଥିଲେ, ସେଠାରେ ଦିବ୍ୟ ପୁଷ୍ପବର୍ଷା ହେଉଥିଲା।
Verse 18
भड्व्त्वा भेरीत्रयं तेडपि चैत्यप्राकारमाद्रवन् । द्वारतोडभिमुखा: सर्वे ययुर्नाना55युधास्तदा,इन तीनों वीरोंने उपर्युक्त तीनों नगाड़ोंको फोड़कर चैत्यक पर्वतके परकोटेपर आक्रमण किया। उन सबने अनेक प्रकारके आयुध लेकर द्वारके सामने मगध-निवासियोंके परम प्रिय उस चैत्यक पर्वतपर धावा किया था। जरासंधको मारनेकी इच्छा रखकर मानो वे उसके मस्तकपर आघात कर रहे थे
ସେଇ ବୀରମାନେ ତିନୋଟି ଭେରୀକୁ ଭାଙ୍ଗି ଚୈତ୍ୟକର ପ୍ରାକାର ଉପରେ ଧାଇଲେ। ସେତେବେଳେ ସମସ୍ତେ ନାନା ପ୍ରକାର ଆୟୁଧ ଧରି, ଦ୍ୱାର ଦିଗକୁ ମୁହଁ କରି ଆଗେଇଲେ।
Verse 19
मागधानां सुरुचिरं चैत्यकं त॑ समाद्रवन् । शिरसीव समाध्नन्तो जरासंधं जिघांसव:,इन तीनों वीरोंने उपर्युक्त तीनों नगाड़ोंको फोड़कर चैत्यक पर्वतके परकोटेपर आक्रमण किया। उन सबने अनेक प्रकारके आयुध लेकर द्वारके सामने मगध-निवासियोंके परम प्रिय उस चैत्यक पर्वतपर धावा किया था। जरासंधको मारनेकी इच्छा रखकर मानो वे उसके मस्तकपर आघात कर रहे थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଜରାସନ୍ଧଙ୍କୁ ବଧ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ ସେମାନେ ମଗଧବାସୀଙ୍କ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରିୟ ସେଇ ସୁନ୍ଦର ଚୈତ୍ୟକ ଉପରେ ଧାଇ ପଡ଼ିଲେ; ଯେନେ ଜରାସନ୍ଧଙ୍କ ମସ୍ତକରେ ହିଁ ଆଘାତ କରୁଛନ୍ତି।
Verse 20
इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत जरासंधवधपर्वमें कृष्ण, अर्जुन एवं भीमसेनकी मगधयात्राविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,स्थिरं सुविपुलं शृज़ं सुमहत् तत् पुरातनम् । अर्चितं गन्धमाल्यैश्न सततं सुप्रतिष्ठितम् उस चैत्यकका विशाल शिखर बहुत पुराना, किंतु सुदृढ़ था। मगधदेशमें उसकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। गन्ध और पुष्पकी मालाओंसे उसकी सदा पूजा की जाती थी। श्रीकृष्ण आदि तीनों वीरोंने अपनी विशाल भुजाओंसे टक्कर मारकर उस चैत्यक पर्वतके शिखरको गिरा दिया। तदनन्तर वे अत्यन्त प्रसन्न होकर मगधकी राजधानी गिरिव्रजके भीतर घुसे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେଇ ଚୈତ୍ୟକର ଶିଖର ଦୃଢ଼, ଅତିବିଶାଳ, ଅତ୍ୟନ୍ତ ମହାନ ଓ ପୁରାତନ ଥିଲା। ସୁଗନ୍ଧ ଓ ପୁଷ୍ପମାଳାରେ ତାହା ସଦା ଅର୍ଚ୍ଚିତ ହୋଇ ଉଚ୍ଚ ପ୍ରତିଷ୍ଠାରେ ଅବସ୍ଥିତ ଥିଲା।
Verse 21
विपुलैर्बाहुभिवीरास्ते5भिहत्याभ्यपातयन् । ततस्ते मागध॑ हृष्टा: पुरं प्रविविशुस्तदा,उस चैत्यकका विशाल शिखर बहुत पुराना, किंतु सुदृढ़ था। मगधदेशमें उसकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। गन्ध और पुष्पकी मालाओंसे उसकी सदा पूजा की जाती थी। श्रीकृष्ण आदि तीनों वीरोंने अपनी विशाल भुजाओंसे टक्कर मारकर उस चैत्यक पर्वतके शिखरको गिरा दिया। तदनन्तर वे अत्यन्त प्रसन्न होकर मगधकी राजधानी गिरिव्रजके भीतर घुसे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେଇ ବୀରମାନେ ନିଜ ବିଶାଳ ବାହୁବଳରେ ପ୍ରହାର କରି ତାହାକୁ ଭାଙ୍ଗି ଭୂମିସାତ କରିଦେଲେ। ତାପରେ ମଗଧବାସୀମାନେ ହର୍ଷିତ ହୋଇ ସେଇ ସମୟରେ ନଗରରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ।
Verse 22
एतस्मिन्नेव काले तु ब्राह्मणा वेदपारगा: । दृष्टवा तु दुर्निमित्तानि जरासंधमदर्शयन्,इसी समय वेदोंके पारगामी दिद्वान् ब्राह्मणोंने अनेक अपशकुन देखकर राजा जरासंधको उनके विषयमें सूचित किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଏହି ସମୟରେ ବେଦପାରଗ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଦୁର୍ନିମିତ୍ତ ଦେଖି ଜରାସନ୍ଧଙ୍କୁ ଯାଇ ସୂଚନା ଦେଲେ।
Verse 23
पर्यग्न्यकुर्वश्च नृपं द्विरदस्थं पुरोहिता: । ततस्तच्छान्तये राजा जरासंध: प्रतापवान् | दीक्षितो नियमस्थोडसावुपवासपरो5भवत्,पुरोहितोंने राजाको हाथीपर बिठाकर उसके चारों ओर प्रज्वलित आग घुमायी। प्रतापी राजा जरासंधने अनिष्टकी शान्तिके लिये व्रतकी दीक्षा ले नियमोंका पालन करते हुए उपवास किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ପୁରୋହିତମାନେ ହାତୀ ଉପରେ ବସିଥିବା ରାଜାଙ୍କୁ ଘେରି ପବିତ୍ର ଅଗ୍ନି ସହ ପରିକ୍ରମା-ବିଧି କଲେ। ତାପରେ ସେଇ ଅନିଷ୍ଟର ଶାନ୍ତି ପାଇଁ ପ୍ରତାପବାନ ରାଜା ଜରାସନ୍ଧ ଦୀକ୍ଷା ଗ୍ରହଣ କରି, ନିୟମରେ ସ୍ଥିତ ହୋଇ, ଉପବାସରେ ଲୀନ ହେଲେ।
Verse 24
स्नातकव्रतिनस्ते तु बाहुशस्त्रा निरायुधा: । युयुत्सव: प्रविविशुर्जरासंधेन भारत,भारत! इधर भगवान् श्रीकृष्ण, भीमसेन और अर्जुन स्नातक-व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणोंके वेषमें अस्त्र-शस्त्रोंका परित्याग करके अपनी भुजाओंसे ही आयुधोंका काम लेते हुए जरासंधके साथ युद्ध करनेकी इच्छा रखकर नगरमें प्रविष्ट हुए
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ଭାରତ! ସ୍ନାତକବ୍ରତ ପାଳନକାରୀ ସେମାନେ ନିରାୟୁଧ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ନିଜ ଭୁଜକୁ ଶସ୍ତ୍ର କରି, ଜରାସନ୍ଧ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ ନଗରକୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ।
Verse 25
भक्ष्यमाल्यापणानां च ददृशु: श्रियमुत्तमाम् । स्फीतां सर्वगुणोपेतां सर्वकामसमृद्धिनीम्,उन्होंने खाने-पीनेकी वस्तुओं, फ़ूल-मालाओं तथा अन्य आवश्यक पदार्थोंकी दूकानोंसे सजे हुए हाट-बाटकी अपूर्व शोभा और सम्पदा देखी। नगरका वह वैभव बहुत बढ़ा-चढ़ा, सर्वगुणसम्पन्न तथा समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला था। उस गलीकी अद्भुत समृद्धिको देखकर वे महाबली नरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन एक मालीसे बलपूर्वक बहुत-सी मालाएँ लेकर नगरकी प्रधान सड़कसे चलने लगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେମାନେ ଭକ୍ଷ୍ୟବସ୍ତୁ ଓ ପୁଷ୍ପମାଳାର ଦୋକାନରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହାଟବଜାରର ଉତ୍ତମ ଶୋଭା ଦେଖିଲେ—ଅତି ସମୃଦ୍ଧ, ସର୍ବଗୁଣୋପେତ ଏବଂ ସର୍ବକାମ ପୂରଣକାରୀ।
Verse 26
तां तु दृष्टवा समृद्धि ते वीथ्यां तस्यां नरोत्तमा: । राजमार्गेण गच्छन्त: कृष्णभीमधनंजया: । बलादू गृहीत्वा माल्यानि मालाकारान्महाबला:,उन्होंने खाने-पीनेकी वस्तुओं, फ़ूल-मालाओं तथा अन्य आवश्यक पदार्थोंकी दूकानोंसे सजे हुए हाट-बाटकी अपूर्व शोभा और सम्पदा देखी। नगरका वह वैभव बहुत बढ़ा-चढ़ा, सर्वगुणसम्पन्न तथा समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला था। उस गलीकी अद्भुत समृद्धिको देखकर वे महाबली नरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन एक मालीसे बलपूर्वक बहुत-सी मालाएँ लेकर नगरकी प्रधान सड़कसे चलने लगे
ସେହି ଗଲିର ଅଦ୍ଭୁତ ସମୃଦ୍ଧି ଦେଖି ନରୋତ୍ତମ କୃଷ୍ଣ, ଭୀମ ଓ ଧନଞ୍ଜୟ ରାଜମାର୍ଗ ଧରି ଅଗ୍ରସର ହେଲେ; ମହାବଳରେ ସେମାନେ ମାଳାକାରମାନଙ୍କଠାରୁ ବଳପୂର୍ବକ ଅନେକ ମାଳା ନେଲେ।
Verse 27
विरागवसना: सर्वे स्रग्विणो मृष्टकुण्डला: । निवेशनमथाजम्मुर्जरासंधस्य धीमत:,उन सबके वस्त्र अनेक रंगके थे। उन्होंने गलेमें हार और कानोंमें चमकीले कुण्डल पहन रखे थे। वे क्रमश: बुद्धिमान् राजा जरासंधके महलके समीप जा पहुँचे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ବିଭିନ୍ନ ବର୍ଣ୍ଣର ବସ୍ତ୍ର ପିନ୍ଧି, ଗଳାରେ ମାଳା ଓ କାନରେ ଚମକୁଥିବା ମୃଷ୍ଟ କୁଣ୍ଡଳ ଧାରଣ କରି, କ୍ରମେ ବୁଦ୍ଧିମାନ ରାଜା ଜରାସନ୍ଧଙ୍କ ନିବାସ ସମୀପକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।
Verse 28
गोवासमिव वीक्षन्त: सिंहा हैमवता यथा । शालस्तम्भनिभास्तेषां चन्दनागुरुरूषिता:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେମାନେ ଏମିତି ଦୃଷ୍ଟିରେ ନିହାରୁଥିଲେ, ଯେପରି ହିମବତର ସିଂହ ଗୋବାସକୁ ଦେଖେ। ସେମାନଙ୍କ ଦେହ ଶାଳସ୍ତମ୍ଭ ପରି ଉଚ୍ଚ ଓ ଦୃଢ଼ ଥିଲା; ଚନ୍ଦନ ଓ ଅଗୁରୁର ଲେପରେ ସୁଗନ୍ଧିତ ଥିଲା।
Verse 29
तान् दृष्टवा द्विरदप्रख्याज्शालस्कन्धानिवोदगतान् । व्यूढोरस्कान् मागधानां विस्मय: समपद्यत,शालवृक्षके तनेके समान ऊँचे डील और चौड़ी छातीवाले गजराजसदृश उन बलवान वीरोंको देखकर मगधनिवासियोंको बड़ा आश्वर्य हुआ
ଶାଳବୃକ୍ଷର ଉଚ୍ଚ କାଣ୍ଡ ପରି ଉଦ୍ଗତ, ଗଜସଦୃଶ ଦେହଧାରୀ, ପ୍ରଶସ୍ତ ଓ ସୁସଂଘଟିତ ବକ୍ଷସ୍ଥଳ ଥିବା ସେହି ବୀରମାନଙ୍କୁ ଦେଖି ମଗଧବାସୀମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିସ୍ମିତ ହେଲେ।
Verse 30
ते त्वतीत्य जनाकीर्णा: कक्षास्तिस््रो नरर्षभा: । अहंकारेण राजानमुपतस्थुर्गतव्यथा:,वे नरश्रेष्ठ लोगोंसे भरी हुई तीन ड्योढ़ियोंको पार करके निर्भय एवं निश्चिन्त हो बड़े अभिमानके साथ राजा जरासंधके निकट गये
ଲୋକେ ଭିଡ଼ିଥିବା ତିନୋଟି ଡ୍ୟୋଢ଼ି ଅତିକ୍ରମ କରି, ସେହି ନରଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ ଭୟ ଓ ବ୍ୟଥାରହିତ ହୋଇ, ଅଭିମାନସହିତ ରାଜା ଜରାସନ୍ଧଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲେ।
Verse 31
तान् पाद्यमधुपकाह्िन् गवार्हान् सत्कृतिं गतान् | प्रत्युत्थाय जरासंध उपतस्थे यथाविधि,वे पाद्य, मधुपर्क और गोदान पानेके योग्य थे। उनका सर्वत्र सत्कार होता था। उन्हें आया देख जरासंध उठकर खड़ा हो गया और उसने विधिपूर्वक उनका आतिथ्य-सत्कार किया
ସେମାନେ ପାଦ୍ୟ, ମଧୁପର୍କ ଓ ଗୋଦାନ ପାଇବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ; ସର୍ବତ୍ର ସତ୍କୃତ ଥିଲେ। ସେମାନଙ୍କୁ ଆସୁଥିବା ଦେଖି ଜରାସନ୍ଧ ଉଠି ଦାଁଡ଼ାଇଲେ ଏବଂ ବିଧିମତେ ଆତିଥ୍ୟ-ସତ୍କାର କଲେ।
Verse 32
उवाच चैतान् राजासौ स्वागतं वो<स्त्विति प्रभु: । मौनमासीत् तदा पार्थभीमयोर्जनमेजय
ତେବେ ସେହି ପ୍ରଭୁ ରାଜା ସେମାନଙ୍କୁ କହିଲେ—“ତୁମମାନଙ୍କୁ ସ୍ୱାଗତ; ତୁମମାନଙ୍କର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ।” କିନ୍ତୁ ସେ ସମୟରେ, ହେ ଜନମେଜୟ, ପାର୍ଥ ଓ ଭୀମ ମୌନ ରହିଲେ।
Verse 33
तेषां मध्ये महाबुद्धि: कृष्णो वचनमत्रवीत् । वक्तुं नायाति राजेन्द्र एतयोर्नियमस्थयो:
ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମହାବୁଦ୍ଧି କୃଷ୍ଣ କହିଲେ—“ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ନିଜ-ନିଜ ନିୟମରେ ଅବସ୍ଥିତ ଏହି ଦୁଇଜଣଙ୍କ ମୁଖରୁ ଏବେ ବାକ୍ୟ ବାହାରୁନାହିଁ।”
Verse 34
अर्वाड्निशीथात् परतस्त्वया सार्ध वदिष्यत: । तदनन्तर शक्तिशाली राजाने इन तीनों अतिथियोंसे कहा--“आपलोगोंका स्वागत है।' जनमेजय! उस समय अर्जुन और भीमसेन तो मौन थे। उनमेंसे महाबुद्धिमान् श्रीकृष्णने यह बात कही--'राजेन्द्र! ये दोनों एक नियम ले चुके हैं; अतः आधी रातसे पहले नहीं बोलते। आधी रातके बाद ये दोनों आपसे बात करेंगे” || ३२-३३ $ || यज्ञागारे स्थापयित्वा राजा राजगृहं गत:,तब राजा उन्हें यज्ञशालामें ठहराकर स्वयं राजभवनमें चला गया। फिर आधी रात होनेपर जहाँ वे ब्राह्मण ठहरे थे, वहाँ वह गया। राजन! उसका यह नियम भूमण्डलमें विख्यात था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ଅର୍ଧରାତ୍ରି ପରେ ଏମାନେ ଆପଣଙ୍କ ସହ କଥା କହିବେ।” ତାପରେ ସେ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ରାଜା ସେଇ ତିନି ଅତିଥିଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଆପଣମାନଙ୍କୁ ସ୍ୱାଗତ।” ହେ ଜନମେଜୟ! ସେ ସମୟରେ ଅର୍ଜୁନ ଓ ଭୀମସେନ ମୌନ ରହିଲେ। ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ମହାବୁଦ୍ଧିମାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ—“ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ଏହି ଦୁଇଜଣ ବ୍ରତ ଗ୍ରହଣ କରିଛନ୍ତି; ତେଣୁ ଅର୍ଧରାତ୍ରି ପୂର୍ବରୁ କଥା କହନ୍ତି ନାହିଁ। ଅର୍ଧରାତ୍ରି ପରେ ଆପଣଙ୍କ ସହ ସମ୍ବାଦ କରିବେ।” ସେମାନଙ୍କୁ ଯଜ୍ଞଶାଳାରେ ରଖି ରାଜା ନିଜ ରାଜଭବନକୁ ଗଲେ। ପରେ ଅର୍ଧରାତ୍ରି ହେଲାବେଳେ ଯେଉଁଠାରେ ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ରହିଥିଲେ ସେଠାକୁ ପୁଣି ଗଲେ। ହେ ରାଜନ, ତାଙ୍କର ଏହି ନିୟମ ପୃଥିବୀରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଥିଲା।
Verse 35
ततोअर्धरात्रे सम्प्राप्ते यातो यत्र स्थिता द्विजा: । तस्य होतद् व्रतं राजन् बभूव भुवि विश्रुतम्,तब राजा उन्हें यज्ञशालामें ठहराकर स्वयं राजभवनमें चला गया। फिर आधी रात होनेपर जहाँ वे ब्राह्मण ठहरे थे, वहाँ वह गया। राजन! उसका यह नियम भूमण्डलमें विख्यात था
ତାପରେ ଅର୍ଧରାତ୍ରି ଆସିଲାବେଳେ ଯେଉଁଠାରେ ସେ ଦ୍ୱିଜମାନେ ଥିଲେ ସେଠାକୁ ରାଜା ଗଲେ। ହେ ରାଜନ, ତାଙ୍କର ଏହି ବ୍ରତ ପୃଥିବୀରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଥିଲା।
Verse 36
सस््नातकान ब्राह्मणान् प्राप्ताछछुत्वा स समितिंजय: । अत्यर्धीत्रे नृपति: प्रत्युदूग॒च्छति भारत,भारत! युद्धविजयी राजा जरासंध स्नातक ब्राह्मणोंका आगमन सुनकर आधी रातके समय भी उनकी आवभगतके लिये उनके पास चला जाता था
ହେ ଭାରତ! ସ୍ନାତକ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଆସିଛନ୍ତି ବୋଲି ଶୁଣି, ସମିତିଂଜୟ (ଜରାସନ୍ଧ) ସେ ନୃପତି ଅତ୍ୟନ୍ତ ଅର୍ଧରାତ୍ରିରେ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କୁ ପ୍ରତ୍ୟୁଦ୍ଗତ ହୋଇ ସ୍ୱାଗତ କରିବାକୁ ଯାଉଥିଲେ।
Verse 37
तांस्त्वपूर्वेण वेषेण दृष्टवा स नृपसत्तम: । उपतस्थे जरासंधो विस्मितश्चाभवत् तदा,उन तीनोंको अपूर्व वेषमें देखकर नृपश्रेष्ठ जरासंधको बड़ा विस्मय हुआ। वह उनके पास गया
ସେ ତିନିଜଣଙ୍କୁ ଅପୂର୍ବ ବେଶରେ ଦେଖି ନୃପଶ୍ରେଷ୍ଠ ଜରାସନ୍ଧ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିସ୍ମିତ ହେଲେ। ସେ ସେମାନଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲେ ଏବଂ ସେତେବେଳେ ଆଶ୍ଚର୍ୟାକୁଳ ରହିଲେ।
Verse 38
ते तु दृष्टवैव राजानं जरासंध॑ नर्षभा: । इदमूचुरमित्रघ्ना: सर्वे भरतसत्तम,भरतवंशशिरोमणे! शत्रुओंका नाश करनेवाले वे सभी नरश्रेष्ठ राजा जरासंधको देखते ही इस प्रकार बोले--“महाराज! आपका कल्याण हो।” जनमेजय! ऐसा कहकर वे तीनों खड़े हो गये तथा कभी राजा जरासंधको और कभी आपसमें एक दूसरेको देखने लगे
ହେ ଭରତସତ୍ତମ, ଭରତବଂଶଶିରୋମଣି! ଶତ୍ରୁନାଶକ ସେ ସମସ୍ତ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ଜରାସନ୍ଧ ରାଜାଙ୍କୁ ଦେଖିମାତ୍ରେ ଏହିପରି କହିଲେ—“ମହାରାଜ! ଆପଣଙ୍କୁ ମଙ୍ଗଳ ହେଉ।” ହେ ଜନମେଜୟ! ଏହା କହି ସେ ତିନିଜଣ ଉଠି ଦାଁଡ଼ାଇଲେ ଏବଂ କେବେ ଜରାସନ୍ଧଙ୍କୁ, କେବେ ପରସ୍ପର ଏକାପରକୁ ଦେଖିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 39
स्वस्त्यस्तु कुशलं राजन्निति तत्र व्यवस्थिता: । त॑ नृप॑ नृपशार्दूल प्रेक्षमाणा: परस्परम्,भरतवंशशिरोमणे! शत्रुओंका नाश करनेवाले वे सभी नरश्रेष्ठ राजा जरासंधको देखते ही इस प्रकार बोले--“महाराज! आपका कल्याण हो।” जनमेजय! ऐसा कहकर वे तीनों खड़े हो गये तथा कभी राजा जरासंधको और कभी आपसमें एक दूसरेको देखने लगे
ସେଠାରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହୋଇ ସେମାନେ ରାଜାଙ୍କୁ ଶିଷ୍ଟ ଆଶୀର୍ବାଦ ସହ କହିଲେ—“ମହାରାଜ, ଆପଣଙ୍କ କୁଶଳ ହେଉ।” ତାପରେ ସେଇ ତିନି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷ ଉଠି ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହେଲେ; ହେ ନୃପଶାର୍ଦୂଳ, ଭରତବଂଶ-ଶିରୋମଣି! ସେମାନେ କେବେ ଜରାସନ୍ଧଙ୍କୁ, କେବେ ପରସ୍ପରକୁ ଦେଖୁଥିଲେ—ଯେନ ମୌନରେ ପରବର୍ତ୍ତୀ ପଦକ୍ଷେପ ମାପୁଥିଲେ।
Verse 40
तानब्रवीज्जरासंधस्तथा पाण्डवयादवान् | आस्यतामिति राजेन्द्र ब्राह्मणच्छग्मसंवृतान्,राजेन्द्र! ब्राह्मणोंके छद्मवेषमें छिपे हुए उन पाण्डव तथा यादव वीरोंको लक्ष्य करके जरासंधने कहा--“आपलोग बैठ जायाँ'
ତେବେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଛଦ୍ମବେଷରେ ଲୁଚିଥିବା ସେଇ ପାଣ୍ଡବ ଓ ଯାଦବ ବୀରମାନଙ୍କୁ ଲକ୍ଷ୍ୟ କରି ଜରାସନ୍ଧ କହିଲେ—“ରାଜେନ୍ଦ୍ର, ଆସନ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତୁ।”
Verse 41
अथोपविविशु: सर्वे त्रयस्ते पुरुषर्षभा: । सम्प्रदीप्तास्त्रयो लक्ष्म्या महाध्वर इवाग्नय:,फिर वे सभी बैठ गये। वे तीनों पुरुषसिंह महान् यज्ञमें प्रजज्लित तीन अग्नियोंकी भाँति अपनी अपूर्व शोभासे उद्धासित हो रहे थे
ତାପରେ ସେଇ ତିନି ପୁରୁଷର୍ଷଭ ଆସନ ଗ୍ରହଣ କଲେ। ନିଜ ଅପୂର୍ବ ତେଜରେ ସେମାନେ ମହାଯଜ୍ଞରେ ପ୍ରଜ୍ୱଲିତ ତିନି ଅଗ୍ନି ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଉଥିଲେ।
Verse 42
तानुवाच जरासंध: सत्यसंधो नराधिप: । विगर्हमाण: कौरव्य वेषग्रहणवैकृतान् । न स्नातकव्रता विप्रा बहिर्मालल््यानुलेपना:,कुरुनन्दन! उस समय सत्यप्रतिज्ञ राजा जरासंधने वेषग्रहणके विपरीत आचरणवाले उन तीनोंकी निन््दा करते हुए कहा--“ब्राह्मणो! इस मानव-जगतमें सर्वत्र प्रसिद्ध है कि स्नातक-व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण समावर्तन आदि विशेष निमित्तके बिना माला और चन्दन नहीं धारण करते। मुझे भी यह अच्छी तरह मालूम है। आपलोग कौन हैं? आपके गलेमें फ़ूलोंकी माला है और भुजाओंमें धनुषकी प्रत्यंचाकी रगड़का चिह्न स्पष्ट दिखायी देता है
ତେବେ ସତ୍ୟସଙ୍କଳ୍ପ ନରାଧିପ ଜରାସନ୍ଧ, ହେ କୌରବ୍ୟ, ଧରିଥିବା ବେଷକୁ ବିରୋଧ କରୁଥିବା ଆଚରଣ ଦେଖି ସେଇ ତିନିଜଣଙ୍କୁ ଗର୍ହା କରି କହିଲେ—“ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ! ସ୍ନାତକବ୍ରତ ପାଳନ କରୁଥିବା ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ସମାବର୍ତ୍ତନ ଆଦି ବିଶେଷ ନିମିତ୍ତ ବିନା ମାଳା ଓ ଚନ୍ଦନଲେପ ଧାରଣ କରନ୍ତି ନାହିଁ—ଏହା ଲୋକପ୍ରସିଦ୍ଧ, ଏବଂ ମୋତେ ମଧ୍ୟ ଭଲଭାବେ ଜଣା। ତେବେ ତୁମେ କିଏ? ତୁମ ଗଳାରେ ପୁଷ୍ପମାଳା, ଏବଂ ତୁମ ଭୁଜାରେ ଧନୁର୍ଜ୍ୟାର ଘଷା ଚିହ୍ନ ସ୍ପଷ୍ଟ ଦିଶୁଛି।”
Verse 43
भवन्तीति नृलोके5स्मिन् विदितं मम सर्वश: । के यूयं पुष्पवन्तश्न भुजैज्याकृतलक्षणै:,कुरुनन्दन! उस समय सत्यप्रतिज्ञ राजा जरासंधने वेषग्रहणके विपरीत आचरणवाले उन तीनोंकी निन््दा करते हुए कहा--“ब्राह्मणो! इस मानव-जगतमें सर्वत्र प्रसिद्ध है कि स्नातक-व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण समावर्तन आदि विशेष निमित्तके बिना माला और चन्दन नहीं धारण करते। मुझे भी यह अच्छी तरह मालूम है। आपलोग कौन हैं? आपके गलेमें फ़ूलोंकी माला है और भुजाओंमें धनुषकी प्रत्यंचाकी रगड़का चिह्न स्पष्ट दिखायी देता है
“ଏହି ଆଚରଣ ଏହି ମନୁଷ୍ୟଲୋକରେ ସର୍ବତ୍ର ପ୍ରସିଦ୍ଧ, ଏବଂ ମୋତେ ମଧ୍ୟ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଜଣା। ତେବେ ତୁମେ କିଏ—ପୁଷ୍ପମାଳାଧାରୀ ଏବଂ ଭୁଜାରେ ଧନୁର୍ଜ୍ୟା-ଘଷା ଚିହ୍ନ ଥିବା?”
Verse 44
महाभारत-- जरासंधके भवनमें श्रीकृष्ण, भीमसेन और अर्जुन भीमसेन और जरासंधका युद्ध बिश्रत: क्षात्रमोज श्ष ब्राह्मण्यं प्रतिजानथ । एवं विरागवसना बहि्माल्यानुलेपना: । सत्यं वदत के यूयं सत्यं राजसु शोभते,“आपलोग क्षत्रियोचित तेज धारण करते हैं, परंतु ब्राह्मण होनेका परिचय दे रहे हैं। इस प्रकार भाँति-भाँतिके रंगीन कपड़े पहने और अकारण माला तथा चन्दन लगाये हुए आप कौन हैं? सच बताइये। राजाओंमें सत्यकी ही शोभा होती है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ତୁମମାନଙ୍କର କ୍ଷାତ୍ରତେଜ ଯେନେ ଲୁପ୍ତ ହୋଇଯାଇଛି, ତଥାପି ତୁମେ ବ୍ରାହ୍ମଣତ୍ୱ ଦାବି କରୁଛ। ଏମିତି ବିଚିତ୍ର ବର୍ଣ୍ଣର ବସ୍ତ୍ର ପିନ୍ଧି, ଅକାରଣେ ମାଳା ଓ ଚନ୍ଦନ ଲଗାଇ—ତୁମେ କିଏ? ସତ୍ୟ କହ। ରାଜମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସତ୍ୟ ହିଁ ଶୋଭା ପାଏ।”
Verse 45
चैत्यकस्य गिरे: शृज्ूं भित्ता किमिह छद्मना । अद्वारेण प्रविष्टा: स्थ निर्भया राजकिल्बिषात्,'चैत्यक पर्वतके शिखरको तोड़कर राजाका अपराध करके भी उससे भयभीत न हो छटद्गावेष धारण किये द्वारके बिना ही इस नगरमें जो आपलोग घुस आये हैं, इसका क्या कारण है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଚୈତ୍ୟକ ପର୍ବତର ଶିଖର ଭାଙ୍ଗି, ଛଦ୍ମବେଶରେ ତୁମେ ଏଠାକୁ କାହିଁକି ଆସିଛ? ଏବଂ ଦ୍ୱାର ବିନା ନଗରରେ ପ୍ରବେଶ କରି, ରାଜାଙ୍କ ବିରୋଧରେ ଅପରାଧ କରିଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ତୁମେ କିପରି ନିର୍ଭୟ ହୋଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ?”
Verse 46
वदध्वं वाचि वीर्य च ब्राह्मणस्य विशेषत: । कर्म चैतद् विलिड्रस्थं कि वोउ्द्य प्रसमीक्षितम्,“बताइये, ब्राह्मणके तो प्रायः वचनमें ही वीरता होती है, उसकी क्रियामें नहीं। आपलोगोंने जो यह पर्वतशिखर तोड़नेका काम किया है, यह आपके वर्ण तथा वेषके सर्वथा विपरीत है, बताइये आपने आज क्या सोच रखा है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “କହ। ବ୍ରାହ୍ମଣର ବୀର୍ୟ ବିଶେଷତଃ ବାକ୍ୟରେ ଥାଏ, କର୍ମରେ ନୁହେଁ। ତୁମେ ଯେ କାମ କରିଛ—ପର୍ବତଶିଖର ଭାଙ୍ଗିବା—ତା ତୁମର ବର୍ଣ୍ଣ ଓ ବେଶର ସର୍ବଥା ବିପରୀତ। ଆଜି ତୁମେ କ’ଣ ନିଶ୍ଚୟ କରିଛ?”
Verse 47
एवं च मामुपास्थाय कस्माच्च विधिनाहणाम् | प्रतीतां नानुगृह्नीत कार्य कि वास्मदागमे,“इस प्रकार मेरे यहाँ उपस्थित हो मेरे द्वारा विधिपूर्वक अर्पित की हुई इस पूजाको आपलोग ग्रहण क्यों नहीं करते हैं? फिर मेरे यहाँ आनेका प्रयोजन ही क्या है?”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଏଭଳି ମୋ ସମ୍ମୁଖରେ ଉପସ୍ଥିତ ହୋଇ, ବିଧିପୂର୍ବକ ଅର୍ପିତ ଏହି ପୂଜାକୁ ତୁମେ କାହିଁକି ଗ୍ରହଣ କରୁନାହ? ଯଦି ଗ୍ରହଣ କରିବ ନାହିଁ, ତେବେ ମୋ ଘରକୁ ଆସିବାର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ କ’ଣ?”
Verse 48
एवमुक्ते ततः कृष्ण: प्रत्युवाच महामना: । स्निग्धगम्भीरया वाचा वाक्यं वाक्यविशारद:,जरासंधके ऐसा कहनेपर बोलनेमें चतुर महामना श्रीकृष्ण स्निग्ध एवं गम्भीर वाणीमें इस प्रकार बोले
ଏହିପରି କୁହାଯାଇଥିବାବେଳେ, ମହାମନା ଓ ବାକ୍ୟନିପୁଣ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ସ୍ନିଗ୍ଧ ଓ ଗମ୍ଭୀର ବାଣୀରେ ପ୍ରତ୍ୟୁତ୍ତର ଦେଲେ।
Verse 49
श्रीकृष्ण उवाच स्नातकान ब्राह्मणान् राजन् विद्धयस्मांस्त्वं नराधिप । स्नातकव्रतिनो राजन ब्राह्मुणा: क्षत्रिया विश:,श्रीकृष्णने कहा--राजन्! तुम हमें (वेषके अनुसार) स्नातक ब्राह्मण समझ सकते हो। वैसे तो स्नातक व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों वर्णोके लोग होते हैं
ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍, ନରାଧିପ! ଆମର ବାହ୍ୟ ଚିହ୍ନ ଓ ନିୟମାଚାର ଦେଖି ତୁମେ ଆମକୁ ସ୍ନାତକ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଭାବିପାର। କିନ୍ତୁ ହେ ରାଜନ୍, ସ୍ନାତକବ୍ରତ ପାଳନକାରୀ ବ୍ରାହ୍ମଣ, କ୍ଷତ୍ରିୟ ଓ ବୈଶ୍ୟ—ଏଇ ତିନି ଦ୍ୱିଜବର୍ଣ୍ଣରେ ମିଳନ୍ତି।
Verse 50
विशेषनियमाश्रैषामविशेषाश्च सन्त्युत । विशेषवांश्व सतत क्षत्रिय: श्रियमृच्छति,इन स्नातकोंमें कुछ विशेष नियमका पालन करनेवाले होते हैं और कुछ साधारण। विशेष नियमका पालन करनेवाला क्षत्रिय सदा लक्ष्मीको प्राप्त करता है
ଏହି ସ୍ନାତକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କେହି ବିଶେଷ ନିୟମ ପାଳନ କରନ୍ତି, କେହି ସାଧାରଣ ନିୟମରେ ରହନ୍ତି। ଯେ କ୍ଷତ୍ରିୟ ସଦା ବିଶେଷ ନିୟମ ଅନୁସରେ, ସେ ନିଶ୍ଚୟ ଶ୍ରୀ-ଲକ୍ଷ୍ମୀ ଓ ରାଜସମୃଦ୍ଧି ପାଏ।
Verse 51
पुष्पवत्सु ध्रुवा श्रीक्ष पुष्पवन्तस्ततो वयम् । क्षत्रियो बाहुवीर्यस्तु न तथा वाक्यवीर्यवान् | अप्रगल्भं वचस्तस्य तस्माद् बार्हद्रथेरितम्,जो पुष्प धारण करनेवाले हैं, उनमें लक्ष्मीका निवास ध्रुव है, इसीलिये हमलोग पुष्पमालाधारी हैं। क्षत्रियका बल और पराक्रम उसकी भुजाओंमें होता है, वह बोलनेमें वैसा वीर नहीं होता। बृहद्रथनन्दन! इसीलिये क्षत्रियका वचन धृष्टतारहित (विनययुक्त) बताया गया है
ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ—ଯେଉଁଠି ପୁଷ୍ପ ଅଛି, ସେଠି ଶ୍ରୀ-ଲକ୍ଷ୍ମୀଙ୍କ ନିବାସ ଧ୍ରୁବ ବୋଲି କୁହାଯାଏ; ତେଣୁ ଆମେ ପୁଷ୍ପମାଳାଧାରୀ। କ୍ଷତ୍ରିୟର ବୀର୍ୟ ଭୁଜବଳରେ, ବାକ୍ଦର୍ପରେ ନୁହେଁ। ଏହିକାରଣରୁ, ହେ ବୃହଦ୍ରଥନନ୍ଦନ, କ୍ଷତ୍ରିୟର ବଚନ ଧୃଷ୍ଟତାରହିତ—ସଂଯତ ଓ ବିନୟଯୁକ୍ତ—ବୋଲି ବର୍ଣ୍ଣିତ।
Verse 52
स्ववीर्य क्षत्रियाणां तु बाह्वोर्धाता न्यवेशयत् । तद् दिदृक्षसि चेद् राजन द्रष्टास्यद्य न संशय:,विधाताने क्षत्रियोंका अपना बल उनकी भुजाओंमें ही भर दिया है। राजन! यदि आज उसे देखना चाहते हो तो निश्चय ही देख लोगे
ବିଧାତା କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କ ସ୍ୱବୀର୍ୟକୁ ତାଙ୍କର ଭୁଜାରେ ହିଁ ସ୍ଥାପିତ କରିଛନ୍ତି। ହେ ରାଜନ୍, ଯଦି ଆଜି ତୁମେ ତାହା ଦେଖିବାକୁ ଚାହ, ନିଶ୍ଚୟ ଦେଖିବ—ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 53
अद्वारेण रिपोर्गेह द्वारेण सुहृदो गुहान् । प्रविशन्ति नरा धीरा द्वाराण्येतानि धर्मत:,धीर मनुष्य शत्रुके घरमें बिना दरवाजेके और मित्रके घरमें दरवाजेसे जाते हैं। शत्रु और मित्रके लिये ये धर्मत: द्वार बतलाये गये हैं
ଧୀର ପୁରୁଷ ଶତ୍ରୁର ଘରେ ଦ୍ୱାର ଦେଇ ନୁହେଁ, ଗୁପ୍ତ ପଥରେ ପ୍ରବେଶ କରନ୍ତି; ମିତ୍ରର ଗୃହରେ ତ ଯଥାଯଥ ଦ୍ୱାର ଦେଇ ପ୍ରବେଶ କରନ୍ତି। ଶତ୍ରୁ ଓ ମିତ୍ର ସହ ବ୍ୟବହାରରେ ଧର୍ମସମ୍ମତ ‘ଦ୍ୱାର’ ଏହିମାନେ ହିଁ।
Verse 54
कार्यवन्तो गृहानेत्य शत्रुतो नारहणां वयम् । प्रतिगृहल्लीम तद् विद्धि एतन्न: शाश्व॒तं व्रतम्,हम अपने कार्यसे तुम्हारे घर आये हैं; अतः शत्रुसे पूजा नहीं ग्रहण कर सकते। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो। यह हमारा सनातन व्रत है
ଆମେ କାର୍ଯ୍ୟନିମିତ୍ତେ ତୁମ ଘରକୁ ଆସିଛୁ; ତେଣୁ ଶତ୍ରୁଠାରୁ ସତ୍କାର କିମ୍ବା ଆତିଥ୍ୟ ଗ୍ରହଣ କରିପାରିବୁ ନାହିଁ। ଏହା ଭଲଭାବେ ଜାଣ—ଏହି ଆମର ଶାଶ୍ୱତ ବ୍ରତ।
Verse 113
आज हमलोग उसके घरपर ही चलकर उसका सारा घमंड हर लेंगे
ଆଜି ଆମେ ସିଧା ତାହାର ଘରକୁ ଯାଇ ତାହାର ସମସ୍ତ ଦର୍ପକୁ ଭଙ୍ଗ କରିଦେବୁ।
Verse 231
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि जरासंधवधपर्वणि कृष्णजरासंधसंवादे एकविंशो5ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବରେ, ଜରାସନ୍ଧବଧପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ କୃଷ୍ଣ-ଜରାସନ୍ଧ ସଂବାଦର ଏକବିଂଶ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 283
अशोभन्त महाराज बाहवो युद्धशालिनाम् | जैसे हिमालयकी गुफाओंमें रहनेवाले सिंह गौओंका स्थान ढूँढ़ते हुए आगे बढ़ते हों, उसी प्रकार वे तीनों वीर राजभवनकी तलाश करते हुए वहाँ पहुँचे थे। महाराज! युद्धमें विशेष शोभा पानेवाले उन तीनों वीरोंकी भुजाएँ साखूके लट्ठे-जैसी सुशोभित हो रही थीं। उनपर चन्दन और अगुरुका लेप किया गया था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ମହାରାଜ! ଯୁଦ୍ଧରେ ବିଶେଷ ଶୋଭା ପାଉଥିବା ସେହି ବୀରମାନଙ୍କର ବାହୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୀପ୍ତିମାନ ଦିଶୁଥିଲା। ଯେପରି ହିମାଳୟର ଗୁହାରେ ବସୁଥିବା ସିଂହମାନେ ଗାଈମାନଙ୍କ ଆଶ୍ରୟସ୍ଥାନ ଖୋଜି ଆଗେଇଯାଆନ୍ତି, ସେପରି ସେ ତିନିଜଣ ବୀର ରାଜଭବନକୁ ଖୋଜି ତାହାଁକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ। ତାଙ୍କର ବାହୁ ସାଳକାଠର ଦଣ୍ଡ ପରି ଦୃଢ଼ ଥିଲା ଏବଂ ତାହାରେ ଚନ୍ଦନ ଓ ଅଗୁରୁର ଲେପ ଥିଲା।
The episode raises a dharmic question about how to treat an exhausted opponent: whether advantage-taking is permissible, or whether kṣatra-dharma requires maintaining parity and avoiding conduct that could be judged as improper coercion.
Strength is framed as accountable to norms: strategic success should remain aligned with regulated conduct, and counsel (nīti) functions to keep power within ethical boundaries even in high-stakes contests.
No explicit phalaśruti appears in this chapter’s cited verses; its significance is primarily narrative-ethical, establishing the duel’s normative frame and preparing for a later decisive outcome within the episode.