Adhyaya 88
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 8848 Verses

Adhyaya 88

राजपूजाविधानम् / Royal Reception Protocols during Āśvamedha Preparations

Upa-parva: Āśvamedha-saṃbhāra (Reception of Kings and Preparations for the Horse Sacrifice)

Vaiśaṃpāyana describes the assembly of Vedic-knowing sages and earth-ruling kings at Yudhiṣṭhira’s court. Observing the gathered dignitaries, Yudhiṣṭhira instructs Bhīmasena to perform appropriate worship and honors for the arriving rulers. Bhīma, with the twins (the Yamau), executes high ceremonial reception, and the guests are lodged in richly appointed residences. Kṛṣṇa (Govinda), preceded by Balarāma and accompanied by leading Vṛṣṇis (including Sātyaki, Pradyumna, Gada, Sāmba, and Kṛtavarman), arrives and is similarly honored. Near Yudhiṣṭhira, Kṛṣṇa reports on Arjuna—described as wearied by many strategic engagements—and conveys a message: many kings will continue to arrive and should be honored individually to prevent political resentment and avoid administrative delay in procuring offerings. Kṛṣṇa further communicates that Babhruvāhana, the ruler of Maṇipūra and connected to Arjuna’s family line, will attend the sacrifice and should be received with special propriety out of regard for Kṛṣṇa. Yudhiṣṭhira approves the counsel, framing reception as both dharmic duty and pragmatic statecraft.

Chapter Arc: जनमेजय के समक्ष वैशम्पायन कहते हैं—पाण्डवों के महल में महाबाहु बभ्रुवाहन का प्रवेश होता है, और वह मधुर वाणी से अपनी दादी कुन्ती के चरणों में प्रणाम कर कुरुवंश के हृदय में अपना स्थान पुनः स्थापित करता है। → कुन्ती, सुभद्रा और अन्य कुरु-स्त्रियाँ तथा पाण्डव-वीर उसे आलिंगन, मान और बहुमूल्य रत्न-आभूषणों से सत्कारते हैं; साथ ही अश्वमेध-यज्ञ के आरम्भ की तैयारी में दान-दक्षिणा, यज्ञ-व्यवस्था और ब्राह्मणों की तृप्ति का प्रश्न उभरता है—यज्ञ की महिमा के अनुरूप ‘कितना’ और ‘कैसे’ दिया जाए। → महर्षि व्यास का निर्णायक उपदेश—‘यज्ञ के प्रधान कारण ब्राह्मण हैं; अतः दक्षिणा त्रिगुण करो’—और धर्मात्मा युधिष्ठिर का उसी क्षण दीक्षा में प्रवेश, जिससे अश्वमेध का विधिवत् आरम्भ सुनिश्चित हो जाता है। → श्रीकृष्ण द्वारा बभ्रुवाहन को दिव्य, स्वर्ण-सज्जित रथ का दान; पाण्डवों द्वारा पृथक्-पृथक् मान-सम्मान; और युधिष्ठिर का व्यास-वचन मानकर दीक्षा ग्रहण करना—इन सब से अतिथि-सत्कार और यज्ञ-आरम्भ दोनों की मर्यादा पूर्ण होती है। → तीसरे दिन वाग्मी सत्यवतीनन्दन व्यास युधिष्ठिर के पास आकर आगे का विधान/निर्देश देने हेतु वचन आरम्भ करते हैं—आगामी अध्याय में यज्ञ-क्रम का निर्णायक विस्तार होने वाला है।

Shlokas

Verse 1

अपना बछ। अंक अष्टाशीतितमो<् ध्याय: उलूपी और चित्राड़दाके सहित बभ्रुवाहनका रत्न-आभूषण आदिसे सत्कार तथा अभ्रमेध-यज्ञका आरम्भ वैशम्पायन उवाच स प्रविश्य महाबाहु: पाण्डवानां निवेशनम्‌ | पितामहीमभ्यवन्दत्‌ साम्ना परमवल्गुना

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାବାହୁ ବଭ୍ରୁବାହନ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ନିବାସରେ ପ୍ରବେଶ କରି, ପରମ ମଧୁର ବାଣୀରେ ନିଜ ପିତାମହୀଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କଲେ।

Verse 2

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पाण्डवोंके महलमें प्रवेश करके महाबाहु बभ्रुवाहनने अत्यन्त मधुर वचन बोलकर अपनी दादी कुन्तीके चरणोंमें प्रणाम किया ।। तततद्रित्राड़दा देवी कौरव्यस्यात्मजापि च । पृथां कृष्णां च सहिते विनयेनोपजग्मतु:,इसके बाद देवी चित्रांगदा और कौरव्यनागकी पुत्री उलूपीने भी एक साथ ही विनीत भावसे कुन्ती और द्रौपदीके चरण छुए

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ମହଳରେ ପ୍ରବେଶ କରି ମହାବାହୁ ବଭ୍ରୁବାହନ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମଧୁର ବାକ୍ୟ କହି ନିଜ ପିତାମହୀ କୁନ୍ତୀଙ୍କ ପାଦରେ ପ୍ରଣାମ କଲେ। ତାପରେ ଦେବୀ ଚିତ୍ରାଙ୍ଗଦା ଓ କୌରବ୍ୟ ନାଗଙ୍କ କନ୍ୟା ଉଲୂପୀ—ଦୁହେଁ ଏକାସାଥି ନମ୍ରଭାବେ ପୃଥା (କୁନ୍ତୀ) ଓ କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ)ଙ୍କ ପାଦ ସ୍ପର୍ଶ କଲେ।

Verse 3

सुभद्रां च यथान्यायं याशभ्चान्या: कुरुयोषित: । ददौ कुन्ती ततस्ताभ्यां रत्नानि विविधानि च,फिर सुभद्रा तथा कुरूकुलकी अन्य स्त्रियोंसे भी वे यथायोग्य मिलीं। उस समय कुन्तीने उन दोनोंको नाना प्रकारके रत्न भेंटमें दिये

ତାପରେ ସୁଭଦ୍ରା ଓ କୁରୁକୁଳର ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ନାରୀମାନଙ୍କ ସହିତ ମଧ୍ୟ ସେମାନେ ଯଥାନ୍ୟାୟ ମିଶିଲେ। ସେତେବେଳେ କୁନ୍ତୀ ସେଇ ଦୁଇଜଣଙ୍କୁ ନାନାପ୍ରକାର ରତ୍ନ ଉପହାର ଦେଲେ।

Verse 4

द्रौपदी च सुभद्रा च याश्षाप्यन्याडददु: स्त्रिय: । ऊपषतुस्तत्र ते देव्यौ महाहशयनासने,द्रौपदी, सुभद्रा तथा अन्य स्त्रियोंने भी अपनी ओरसे नाना प्रकारके उपहार दिये। तत्पश्चात्‌ वे दोनों देवियाँ बहुमूल्य शय्याओंपर विराजमान हुईं

ଦ୍ରୌପଦୀ ଓ ସୁଭଦ୍ରା, ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ମଧ୍ୟ ନିଜ ପକ୍ଷରୁ ନାନା ପ୍ରକାର ଉପହାର ଅର୍ପଣ କଲେ। ତାପରେ ସେଇ ଦୁଇ ମହାନ ଦେବୀ ସେଠାରେ ବହୁମୂଲ୍ୟ ଶୟ୍ୟାସନରେ ଆସୀନ ହେଲେ।

Verse 5

सुपूजिते स्वयं कुन्त्या पार्थस्य हितकाम्यया । सच राजा महातेजा: पूजितो बशभ्रुवाहन:

ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ)ଙ୍କ ହିତକାମନା କରୁଥିବା କୁନ୍ତୀ ସ୍ୱୟଂ ତାଙ୍କୁ ବିଧିପୂର୍ବକ ସତ୍କାର କଲେ। ସେହିପରି ମହାତେଜସ୍ବୀ ରାଜା ବୃଷଭ୍ରୂବାହନ ମଧ୍ୟ ସମ୍ମାନରେ ପୂଜିତ ହେଲେ।

Verse 6

युधिष्ठिरं च राजानं भीमादींश्वापि पाण्डवान्‌

ଏବଂ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ, ଭୀମ ଆଦି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ।

Verse 7

स तैः प्रेम्णा परिष्वक्त: पूजितश्न॒ यथाविधि

ସେମାନେ ପ୍ରେମରେ ତାଙ୍କୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି, ବିଧିଅନୁସାରେ ଯଥୋଚିତ ସତ୍କାର କଲେ।

Verse 8

धनं चास्मै ददुर्भूरि प्रीयमाणा महारथा: । उन सब लोगोंने प्रेमवश उसे छातीसे लगा लिया और उसका यथोचित सत्कार किया। इतना ही नहीं, बश्रुवाहनपर प्रसन्न हुए उन पाण्डव महारथियोंने उसे बहुत धन दिया ।। ७३६ || तथैव च महीपाल: कृष्णं चक्रगदाधरम्‌

ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ ସେଇ ମହାରଥୀମାନେ ତାଙ୍କୁ ପ୍ରଚୁର ଧନ ଦେଲେ। ଏବଂ ସେହିପରି ସେଇ ମହୀପାଳ ଚକ୍ର-ଗଦାଧାରୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ କଲେ।

Verse 9

तस्मै कृष्णो ददौ राज्ञे महाहमतिपूजितम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତେବେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ସେହି ରାଜାଙ୍କୁ ମହାମନୀଷୀମାନେ ଯାହାକୁ ସର୍ବୋଚ୍ଚ ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଦେଇ ପୂଜନ୍ତି, ସେହି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦାନ ପ୍ରଦାନ କଲେ।

Verse 10

धर्मराजश्न भीमश्च फाल्गुनश्व॒ यमौ तथा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଭୀମ, ଫାଲ୍ଗୁନ (ଅର୍ଜୁନ) ଏବଂ ଯମଜ ଭ୍ରାତାଦ୍ୱୟ (ନକୁଳ-ସହଦେବ) ମଧ୍ୟ—ଏଭଳି ସମସ୍ତଙ୍କ ନାମ ଏକାସାଥି ଉଚ୍ଚାରିତ ହେଲା।

Verse 11

ततस्तृतीये दिवसे सत्यवत्यात्मजो मुनि:

ତାପରେ ତୃତୀୟ ଦିନ ସତ୍ୟବତୀଙ୍କ ପୁତ୍ର ମୁନି (ବ୍ୟାସ) ପ୍ରକଟ ହେଲେ।

Verse 12

अद्यप्रभृति कौन्तेय यजस्व समयो हि ते । मुहूर्तो यज्ञिय: प्राप्तश्नीदयन्तीह याजका:,“कुन्तीनन्दन! तुम आजसे यज्ञ आरम्भ कर दो। उसका समय आ गया है। यज्ञका शुभ मुहूर्त उपस्थित है और याजकगण तुम्हें बुला रहे हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“କୌନ୍ତେୟ! ଆଜିଠାରୁ ଯଜ୍ଞ ଆରମ୍ଭ କର; ତୋର ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ସମୟ ଆସିପହଞ୍ଚିଛି। ଯଜ୍ଞର ଶୁଭ ମୁହୂର୍ତ୍ତ ପ୍ରାପ୍ତ; ଏଠାରେ ଯାଜକମାନେ ତୋତେ ଡାକୁଛନ୍ତି।”

Verse 13

अहीनो नाम राजेन्द्र क्रतुस्तेडयं च कल्पताम्‌ । बहुत्वात्‌ काज्चनाख्यस्य ख्यातो बहुसुवर्णक:,“राजेन्द्र! तुम्हारे इस यज्ञमें किसी बातकी कमी नहीं रहेगी। इसलिये यह किसी भी अंगसे हीन न होनेके कारण अहीन (सर्वांगपूर्ण) कहलायेगा। इसमें सुवर्ण नामक द्रव्यकी अधिकता होगी; इसलिये यह बहुसुवर्णक नामसे विख्यात होगा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ତୋର ଏହି କ୍ରତୁ କୌଣସି ଅଙ୍ଗରେ ହୀନ ନ ହେଉ; ତେଣୁ ଏହା ‘ଅହୀନ’ (ସର୍ବାଙ୍ଗପୂର୍ଣ୍ଣ) ବୋଲି କୁହାଯିବ। ଏବଂ କାଞ୍ଚନ (ସୁବର୍ଣ୍ଣ)ର ପ୍ରଚୁରତା ହେତୁ ଏହା ‘ବହୁସୁବର୍ଣ୍ଣକ’ ନାମରେ ଖ୍ୟାତ ହେବ।”

Verse 14

एवमत्र महाराज दक्षिणां त्रिगुणां कुरु । त्रित्वं ब्रजतु ते राजन्‌ ब्राह्मणा ह्वात्र कारणम्‌,“महाराज! यज्ञके प्रधान कारण ब्राह्मण ही हैं; इसलिये तुम उन्हें तिगुनी दक्षिणा देना। ऐसा करनेसे तुम्हारा यह एक ही यज्ञ तीन यज्ञोंके समान हो जायगा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାରାଜ, ଏଠାରେ ତ୍ରିଗୁଣ ଦକ୍ଷିଣା ଦିଅ। ହେ ରାଜନ, ଏହି ଯଜ୍ଞର ପ୍ରଧାନ କାରଣ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ; ତେଣୁ ତୁମର ଏହି ଏକ ଯଜ୍ଞ ତିନି ଯଜ୍ଞ ସମାନ ହେବ।

Verse 15

त्रीनश्वमेधानत्र त्वं सम्प्राप्प बहुदक्षिणान्‌ । ज्ञातिवध्याकृतं पापं प्रहास्यसि नराधिप,“नरेश्वर! यहाँ बहुत-सी दक्षिणावाले तीन अश्वमेध-यज्ञोंका फल पाकर तुम ज्ञातिवधके पापसे मुक्त हो जाओगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ନରାଧିପ, ଏଠାରେ ବହୁ ଦକ୍ଷିଣାସମ୍ପନ୍ନ ତିନି ଅଶ୍ୱମେଧର ଫଳ ତୁମେ ପାଇବ; ଜ୍ଞାତିବଧରୁ ହୋଇଥିବା ପାପରୁ ମୁକ୍ତ ହେବ।

Verse 16

पवित्र परमं चैतत्‌ पावन चैतदुत्तमम्‌ | यदाश्वमेधावभृथं प्राप्स्यसे कुरुनन्दन,“कुरुनन्दन! तुम्हें जो अश्वमेध-यज्ञका अवभृथ-स्नान प्राप्त होगा, वह परम पवित्र, पावन और उत्तम है!

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ, ତୁମେ ପାଇବାକୁ ଯାଉଥିବା ଅଶ୍ୱମେଧ-ଯଜ୍ଞର ଅବଭୃଥ-ସ୍ନାନ ପରମ ପବିତ୍ର, ଅତ୍ୟୁତ୍ତମ ପାବନ।

Verse 17

इत्युक्तः स तु तेजस्वी व्यासेनामितबुद्धिना । दीक्षां विवेश धर्मात्मा वाजिमेधाप्तये तत:,परम बुद्धिमान्‌ व्यासजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा एवं तेजस्वी राजा युधिष्ठिरने अश्वमेध-यज्ञकी सिद्धिके लिये उसी दिन दीक्षा ग्रहण की

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଅମିତବୁଦ୍ଧି ବ୍ୟାସ ଏପରି କହିବା ପରେ, ଧର୍ମାତ୍ମା ଓ ତେଜସ୍ବୀ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଅଶ୍ୱମେଧ-ସିଦ୍ଧି ପାଇଁ ଦୀକ୍ଷାରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ।

Verse 18

ततो यज्ञ महाबाहुवजिमेध॑ महाक्रतुम्‌ । बद्धन्नदक्षिणं राजा सर्वकामगुणान्वितम्‌,फिर उन महाबाहु नरेशने बहुत-से अन्नकी दक्षिणासे युक्त तथा सम्पूर्ण कामना और गुणोंसे सम्पन्न उस अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान आरम्भ कर दिया

ତାପରେ ସେଇ ମହାବାହୁ ରାଜା ବହୁ ଦକ୍ଷିଣାର ବ୍ୟବସ୍ଥା କରି, ସମସ୍ତ କାମନା ଓ ଗୁଣରେ ସମ୍ପନ୍ନ ଅଶ୍ୱମେଧ ନାମକ ମହାକ୍ରତୁର ଅନୁଷ୍ଠାନ ଆରମ୍ଭ କଲେ।

Verse 19

तत्र वेदविदो राजंश्नक्रु: कर्माणि याजका: । परिक्रमन्त: सर्वज्ञा विधिवत्‌ साधुशिक्षितम्‌,उसमें वेदोंके ज्ञाता और सर्वज्ञ याजकोंने सम्पूर्ण कर्म किये-कराये। वे सब ओर घूम- घूमकर सत्पुरुषों-द्वारा शिक्षित कर्मका सम्पादन करते-कराते थे

ସେଠାରେ, ହେ ରାଜନ, ବେଦବିଦ୍ ଏବଂ ସମଗ୍ର ବିଧିରେ ନିପୁଣ ଯାଜକମାନେ ଯଜ୍ଞର ସମସ୍ତ କର୍ମ ପୂର୍ଣ୍ଣରୂପେ କରାଇଲେ। ସେମାନେ ସବୁଦିଗରେ ପରିକ୍ରମା କରି, ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ସୁଶିକ୍ଷିତ ପରମ୍ପରା ଅନୁସାରେ, ବିଧିମତେ ଯଜ୍ଞକର୍ମ ସମ୍ପାଦନ ଓ ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣ କରୁଥିଲେ।

Verse 20

न तेषां स्खलितं किंचिदासीच्चाप्यकृतं तथा | क्रममुक्तं च युक्त च चक्रुस्तत्र द्विजर्षभा:,उनके द्वारा उस यज्ञमें कहीं भी कोई भूल या त्रुटि नहीं होने पायी। कोई भी कर्म न तो छूटा और न अधूरा रहा। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने प्रत्येक कार्यको क्रमके अनुसार उचित रीतिसे पूरा किया

ସେମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସେହି ଯଜ୍ଞରେ କେଉଁଠିମଧ୍ୟ ଭୁଲ କିମ୍ବା ତ୍ରୁଟି ମିଳିଲା ନାହିଁ; କୌଣସି କର୍ମ ଛୁଟିଲା ନାହିଁ, କୌଣସିଟି ଅଧୂରା ରହିଲା ନାହିଁ। ସେହି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦ୍ୱିଜମାନେ ପ୍ରତ୍ୟେକ କାର୍ଯ୍ୟକୁ କ୍ରମାନୁସାରେ, ଯଥୋଚିତ ରୀତିରେ, ବିଧିମତେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କଲେ।

Verse 21

कृत्वा प्रवर्ग्य धर्माख्यं यथावद्‌ द्विजसत्तमा: । चक्करुस्ते विधिवद्‌ राज॑ंस्तथैवाभिषवं द्विजा:,राजन! वहाँ ब्राह्मणशिरोमणियोंने प्रवर्ग्य नामक धर्मानुकूल कर्मको यथोचित रीतिसे सम्पन्न करके विधिपूर्वक सोमाभिषव--सोमलताका रस निकालनेका कार्य किया

ହେ ରାଜନ, ସେଠାରେ ସେହି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଧର୍ମାନୁକୂଳ ‘ପ୍ରବର୍ଗ୍ୟ’ କର୍ମକୁ ଯଥାବିଧି ସମ୍ପନ୍ନ କରି, ପରେ ବିଧିମତେ ସୋମାଭିଷବ—ସୋମଲତାର ରସ ନିଷ୍କାଷଣ କରିବା କାର୍ଯ୍ୟ—କଲେ।

Verse 22

अभिषूय ततो राजन्‌ सोम॑ सोमपसत्तमा: । सवनान्यानुपूव्येण चक्रुः शास्त्रानुसारिण:,महाराज! सोमपान करनेवालोंमें श्रेष्ठ तथा शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले विद्वानोंने सोमरस निकालकर उसके द्वारा क्रमश: तीनों समयके सवन कर्म किये

ମହାରାଜ, ତାପରେ ଶାସ୍ତ୍ରାନୁସାରୀ ସୋମପାନୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବିଦ୍ୱାନମାନେ ସୋମରସ ନିଷ୍କାଷଣ କରି, ତାହାଦ୍ୱାରା କ୍ରମକ୍ରମେ ତିନି ସମୟର ସବନକର୍ମ ସମ୍ପନ୍ନ କଲେ।

Verse 23

न तत्र कृपण: वक्षिन्न दरिद्रो बभूव ह । क्षुधितो दुःखितो वापि प्राकृतो वापि मानव:,उस यज्ञमें आया हुआ कोई भी मनुष्य, चाहे वह निम्न-से-निम्न श्रेणीका क्‍यों न हो, दीन-दरिद्र, भूखा अथवा दुखिया नहीं रह गया था

ସେହି ଯଜ୍ଞସଭାରେ କେହି ଦୀନ କିମ୍ବା ଦରିଦ୍ର ରହିଲେ ନାହିଁ; କେହି ଭୁଖା ରହିଲେ ନାହିଁ, କେହି ଦୁଃଖିତ ମଧ୍ୟ ରହିଲେ ନାହିଁ—ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସବୁଠୁ ସାଧାରଣ ଓ ନିମ୍ନ ସ୍ଥିତିର ମଣିଷଟିଏ ମଧ୍ୟ ଅଭାବରେ ଛାଡ଼ା ହେଲା ନାହିଁ।

Verse 24

भोजन भोजनार्थिभ्यो दापयामास शत्रुहा | भीमसेनो महातेजा: सततं राजशासनात्‌,शत्रुसूदन महातेजस्वी भीमसेन महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे भोजनार्थियोंको भोजन दिलानेके कामपर सदा डटे रहते थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାଜାଙ୍କ ଆଜ୍ଞାନୁସାରେ ଶତ୍ରୁହା ମହାତେଜସ୍ବୀ ଭୀମସେନ ସଦା ଅନ୍ନାର୍ଥୀମାନଙ୍କୁ ଭୋଜନ ଦେବାର ବ୍ୟବସ୍ଥା କରୁଥିଲେ।

Verse 25

संस्तरे कुशलाश्चापि सर्वकार्याणि याजका: । दिवसे दिवसे चक्रुर्यथाशास्त्रानुदर्शनात्‌,यज्ञकी वेदी बनानेमें निपुण याजकगण प्रतिदिन शास्त्रोक्त विधिके अनुसार सब कार्य सम्पन्न किया करते थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯଜ୍ଞଭୂମିର ବିନ୍ୟାସରେ କୁଶଳ ଯାଜକମାନେ ଶାସ୍ତ୍ରୋକ୍ତ ନିର୍ଦ୍ଦେଶ ଅନୁସାରେ ଦିନକୁ ଦିନ ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟ ସମ୍ପାଦନ କରୁଥିଲେ।

Verse 26

नाषडडज्विदत्रासीत्‌ सदस्यस्तस्य धीमत: । नाव्रतो नानुपाध्यायो न च वादाविचक्षण:,बुद्धिमान्‌ राजा युधिष्ठिरके यज्ञका कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था जो छहों अंगोंका विद्वान, ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाला, अध्यापनकर्ममें कुशल तथा वाद-विवादमें प्रवीण न हो

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେହି ଧୀମାନ ରାଜାଙ୍କ ଯଜ୍ଞସଭାରେ ଷଡଙ୍ଗବେଦଜ୍ଞାନ ନଥିବା କୌଣସି ସଦସ୍ୟ ଥିଲେ ନାହିଁ; ବ୍ରତହୀନ କେହି ନଥିଲେ, ଅଧ୍ୟାପନରେ ଅକୁଶଳ କେହି ନଥିଲେ, ଓ ବାଦବିବାଦରେ ଅପ୍ରବୀଣ କେହି ନଥିଲେ।

Verse 27

ततो यूपोच्छये प्राप्ते षड्‌ बैल्चान्‌ भरतर्षभ । खादिरान्‌ बिल्वसमितांस्तावत: सर्ववर्णिन:,भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात्‌ जब यूपकी स्थापनाका समय आया, तब याजकोंने यज्ञभूमिमें बेलके छः, खैरके छः, पलाशके भी छ:, देवदारुके दो और लसोड़ेका एक--इस प्रकार इक्कीस यूप कुरुराज युधिष्ठिरके यज्ञमें खड़े किये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତବୃଷଭ! ଯେତେବେଳେ ଯୂପ ସ୍ଥାପନର ସମୟ ଆସିଲା, ସେତେବେଳେ ଯାଜକମାନେ ବିଧିଅନୁସାରେ ଛଅଟି ବିଲ୍ୱକାଠର ଓ ସେତେଇ ଖଦିରକାଠର—ନିର୍ଦ୍ଦିଷ୍ଟ ବର୍ଣ୍ଣ-ରୂପଯୁକ୍ତ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର—ଯୂପ ପ୍ରସ୍ତୁତ କଲେ।

Verse 28

देवदारुमयौ द्वौ तु यूपौ कुरुपतेर्मखे । श्लेष्मातकमयं चैक॑ याजका: समकल्पयन्‌,भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात्‌ जब यूपकी स्थापनाका समय आया, तब याजकोंने यज्ञभूमिमें बेलके छः, खैरके छः, पलाशके भी छ:, देवदारुके दो और लसोड़ेका एक--इस प्रकार इक्कीस यूप कुरुराज युधिष्ठिरके यज्ञमें खड़े किये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! କୁରୁପତିଙ୍କ ଯଜ୍ଞରେ ଯାଜକମାନେ ଦେବଦାରୁକାଠର ଦୁଇଟି ଯୂପ ଓ ଶ୍ଳେଷ୍ମାତକକାଠର ଗୋଟିଏ ଯୂପ ମଧ୍ୟ ବିଧିପୂର୍ବକ ପ୍ରସ୍ତୁତ କଲେ।

Verse 29

शोभार्थ चापरान्‌ यूपान्‌ काछ्चनान्‌ भरतर्षभ । स भीम: कारयामास धर्मराजस्य शासनात्‌,भरतभूषण! इनके सिवा धर्मराजकी आज्ञासे भीमसेनने यज्ञकी शोभाके लिये और भी बहुत-से सुवर्णमय यूप खड़े कराये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯଜ୍ଞର ଶୋଭା ବଢ଼ାଇବା ପାଇଁ ଧର୍ମରାଜ (ଯୁଧିଷ୍ଠିର)ଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ଭୀମ ଆଉ ଅନେକ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ଯୂପ ଉଭା କରାଇଲେ।

Verse 30

ते व्यराजन्त राजर्षेवासोभिरुपशोभिता: । महेन्द्रानुगता देवा यथा सप्तर्षिभिर्दिवि,ठस्त्रोंद्रारा अलंकृत किये गये वे राजर्षि युधिष्ठिरके यज्ञ सम्बन्धी यूप आकाशमें सप्तर्षियोंसे घिरे हुए इन्द्रके अनुगामी देवताओंके समान शोभा पाते थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଶୋଭାମୟ ବସ୍ତ୍ରରେ ଅଲଙ୍କୃତ ସେଇ ରାଜର୍ଷିମାନେ ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଲେ। ସେମାନେ ଦିବିରେ ସପ୍ତର୍ଷିମାନଙ୍କ ଘେରାଉରେ ମହେନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ଅନୁଗାମୀ ଦେବତାମାନଙ୍କ ପରି ଶୋଭା ପାଉଥିଲେ।

Verse 31

इष्टका: काज्चनीश्षात्र चयनार्थ कृता5भवन्‌ | शुशुभे चयन तच्च दक्षस्थेव प्रजापते:,यज्ञकी वेदी बनानेके लिये वहाँ सोनेकी ईटें तैयार करायी गयी थीं। उनके द्वारा जब वेदी बनकर तैयार हुई तब वह दक्षप्रजापतिकी यज्ञवेदीके समान शोभा पाने लगी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ବେଦୀ ନିର୍ମାଣ ପାଇଁ ସେଠାରେ ସୁବର୍ଣ୍ଣର ଇଟା ପ୍ରସ୍ତୁତ କରାଯାଇଥିଲା। ସେଇ ଇଟାଦ୍ୱାରା ବେଦୀ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେଲାପରେ ତାହା ପ୍ରଜାପତି ଦକ୍ଷଙ୍କ ଯଜ୍ଞବେଦୀ ପରି ଶୋଭା ପାଇଲା।

Verse 32

चतुश्नित्यश्न॒ तस्यासीदष्टादशकरात्मक: । स रुकक्‍्मपक्षो निचितस्त्रिकोणो गरुडाकृति:,उस यज्ञमण्डपमें अग्निचयनके लिये चार स्थान बने थे। उनमेंसे प्रत्येककी लम्बाई- चौड़ाई अठारह हाथकी थी। प्रत्येक वेदी सुवर्णमय पंखसे युक्त एवं गरुड़के समान आकारवाली थी। वह त्रिकोणाकार बनायी गयी थी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେଇ ଯଜ୍ଞମଣ୍ଡପରେ ଅଗ୍ନିଚୟନ ପାଇଁ ଚାରିଟି ନିଶ୍ଚିତ ସ୍ଥାନ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହୋଇଥିଲା। ପ୍ରତ୍ୟେକର ଲମ୍ବ-ପ୍ରସ୍ଥ ଅଠାର ହାତ ଥିଲା। ପ୍ରତ୍ୟେକ ବେଦୀ ତ୍ରିକୋଣାକାର, ଗରୁଡାକୃତି ଏବଂ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ପକ୍ଷଯୁକ୍ତ ଭାବେ ନିର୍ମିତ ଥିଲା।

Verse 33

ततो नियुक्ता: पशवो यथाशास्त्रं मनीषिभि: । तं तं देवं समुद्दिश्य पक्षिण: पशवश्च ये

ତାପରେ ମନୀଷୀମାନେ ଶାସ୍ତ୍ରବିଧି ଅନୁସାରେ ପଶୁମାନଙ୍କୁ ନିୟୋଜନ କଲେ। ଯେଯେ ପକ୍ଷୀ ଓ ପଶୁ ଥିଲେ, ପ୍ରତ୍ୟେକକୁ ତାଙ୍କ ତାଙ୍କ ଦେବତାଙ୍କ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ନିବେଦିତ କରାଗଲା।

Verse 34

ऋषभा: शास्त्रपठितास्तथा जलचराश्न ये । सर्वास्तानभ्ययुग्जंस्ते तत्राग्निचयकर्मणि

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଶାସ୍ତ୍ରପାଠରେ ପାରଙ୍ଗତ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ ଓ ଜଳଚର-ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ କାର୍ଯ୍ୟରେ ନିୟୁକ୍ତ ଲୋକମାନେ—ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସେଠାରେ ଅଗ୍ନିଚୟନ କର୍ମରେ ବିଧିପୂର୍ବକ ନିଯୁକ୍ତ କରାଗଲା। ଏଭଳି ଶାସ୍ତ୍ରୋକ୍ତ ନିୟମ ଓ କ୍ରମ ଅନୁସାରେ ଯଜ୍ଞକାର୍ଯ୍ୟରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୋଗ୍ୟ ବର୍ଗକୁ ତାହାର ଯଥାଯଥ ଭୂମିକା ଦିଆଗଲା।

Verse 35

तदनन्तर मनीषी पुरुषोंने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पशुओंको नियुक्त किया। भिन्न- भिन्न देवताओंके उद्देश्यसे पशु-पक्षी, शास्त्रकथित वृषभ और जलचर जन्तु--इन सबका अग्निस्थापन-कर्ममें याजकोंने उपयोग किया ।। यूपेषु नियता चासीत्‌ पशूनां त्रिशती तथा । अभश्चवरत्नोत्तरा यज्ञे कौन्तेयस्य महात्मन:,कुन्तीनन्दन महात्मा युधिष्ठिरके उस यज्ञमें जो यूप खड़े किये गये थे, उनमें तीन सौ पशु बाँधे गये थे। उन सबमें प्रधान वही अश्वरत्न था

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତା’ପରେ ମନୀଷୀ ଋତ୍ୱିଜ ଶାସ୍ତ୍ରୋକ୍ତ ବିଧି ଅନୁସାରେ ପଶୁମାନଙ୍କୁ ନିଯୁକ୍ତ କଲେ। ଭିନ୍ନ-ଭିନ୍ନ ଦେବତାଙ୍କ ନିମିତ୍ତେ ଯାଜକମାନେ ପଶୁ-ପକ୍ଷୀ, ଶାସ୍ତ୍ରବିହିତ ବୃଷଭ ଓ ଜଳଚର ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କୁ ଅଗ୍ନିସ୍ଥାପନ-ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ କର୍ମରେ ବ୍ୟବହାର କଲେ। ମହାତ୍ମା କୌନ୍ତେୟଙ୍କ ଯଜ୍ଞରେ ଯୂପମାନଙ୍କୁ ତିନିଶେ ପଶୁ ବିଧିପୂର୍ବକ ବାନ୍ଧାଯାଇଥିଲା; ଏବଂ ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସର୍ବପ୍ରଧାନ ଥିଲା ସେଇ ଅଶ୍ୱରତ୍ନ—ଯଜ୍ଞାଶ୍ୱ।

Verse 36

स यज्ञ: शुशुभे तस्य साक्षाद्‌ देवर्षिसंकुल: । गन्धर्वगणसंगीत: प्रनृत्तो5प्सरसां गणै:,साक्षात्‌ देवर्षियोंसे भरा हुआ युधिष्ठिरका वह यज्ञ बड़ी शोभा पा रहा था। गन्धर्वोंके मधुर संगीत और अप्सराओंके नृत्यसे उसकी शोभा और बढ़ गयी थी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାଙ୍କର ସେଇ ଯଜ୍ଞ ଦେବର୍ଷିମାନଙ୍କ ଦଳ ଯେନେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଭାବେ ଭରିଥିବା ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ ହୋଇ ଶୋଭିତ ହେଲା। ଗନ୍ଧର୍ବଗଣଙ୍କ ମଧୁର ସଙ୍ଗୀତ ଓ ଅପ୍ସରାମାନଙ୍କ ଦଳର ନୃତ୍ୟ ତାହାର ଶୋଭାକୁ ଆହୁରି ବଢ଼ାଇଦେଲା।

Verse 37

स किंपुरुषसंकीर्ण: किंनरैश्वनोपशोभित: । सिद्धविप्रनिवासैश्च समनन्‍्तादभिसंवृत:,वह यज्ञमण्डप किम्पुरुषोंसे भरा-पूरा था। किन्नर भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके चारों ओर सिद्धों और ब्राह्मणोंके निवासस्थान बने थे, जिनसे वह यज्ञ-मण्डप घिरा था

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେଇ ଯଜ୍ଞମଣ୍ଡପ କିମ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା, ଏବଂ କିନ୍ନରମାନେ ମଧ୍ୟ ତାହାର ଶୋଭା ବଢ଼ାଉଥିଲେ। ଚାରିପାଖେ ସିଦ୍ଧ ଓ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କର ନିବାସସ୍ଥାନ ଥିବାରୁ ସେ ଯଜ୍ଞମଣ୍ଡପ ସମନ୍ତରୁ ଘେରା ଥିଲା।

Verse 38

तस्मिन्‌ सदसि नित्यास्तु व्यासशिष्या द्विजर्षभा: । सर्वशास्त्रप्रणेतार: कुशला यज्ञसंस्तरे,व्यासजीके शिष्य श्रेष्ठ ब्राह्मण उस यज्ञसभामें सदा उपस्थित रहते थे। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके प्रणेता और यज्ञकर्ममें कुशल थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେଇ ଯଜ୍ଞସଭାରେ ବ୍ୟାସଙ୍କ ଶିଷ୍ୟ, ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ସଦା ଉପସ୍ଥିତ ଥାଆନ୍ତି। ସେମାନେ ସମସ୍ତ ଶାସ୍ତ୍ରର ପ୍ରାମାଣିକ ପ୍ରଣେତା-ବ୍ୟାଖ୍ୟାତା ଥିଲେ ଏବଂ ଯଜ୍ଞଭୂମିରେ କର୍ମବିନ୍ୟାସ ଓ ପରିଚାଳନାରେ କୁଶଳ ଥିଲେ।

Verse 39

नारदश्न बभूवात्र तुम्बुरुश्न महाद्युति: । विश्वावसश्रित्रसेनस्तथान्ये गीतकोविदा:,नारद, महातेजस्वी तुम्बुरु, विश्वावसु, चित्रसेन तथा अन्य संगीतकलाकोविद, गाननिपुण एवं नृत्यविशारद गन्धर्व प्रतिदिन यज्ञकार्यके बीच-बीचमें समय मिलनेपर अपनी नाच-गानकी कलाओंद्वारा उन ब्राह्मणोंका मनोरंजन करते थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେଠାରେ ନାରଦ, ମହାଦ୍ୟୁତି ତୁମ୍ବୁରୁ, ବିଶ୍ୱାବସୁ, ଚିତ୍ରସେନ ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଗୀତକୋବିଦ ଗନ୍ଧର୍ବମାନେ ମଧ୍ୟ ଥିଲେ। ଯଜ୍ଞକର୍ମର ମଧ୍ୟମଧ୍ୟେ ଅବକାଶ ପାଇ ସେମାନେ ନିଜ ଗାନ-ନୃତ୍ୟକଳାରେ ସମବେତ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ପୁନଃପୁନଃ ରମାଇଥିଲେ।

Verse 40

गन्धर्वा गीतकुशला नृत्येषु च विशारदा: । रमयन्ति सम तान्‌ विप्रान्‌ यज्ञकर्मान्तरेषु वै,नारद, महातेजस्वी तुम्बुरु, विश्वावसु, चित्रसेन तथा अन्य संगीतकलाकोविद, गाननिपुण एवं नृत्यविशारद गन्धर्व प्रतिदिन यज्ञकार्यके बीच-बीचमें समय मिलनेपर अपनी नाच-गानकी कलाओंद्वारा उन ब्राह्मणोंका मनोरंजन करते थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଗନ୍ଧର୍ବମାନେ ଗୀତରେ କୁଶଳ ଓ ନୃତ୍ୟରେ ବିଶାରଦ ଥିଲେ। ଯଜ୍ଞକର୍ମର ଅନ୍ତରାଳରେ ସେମାନେ ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ରମାଇଥିଲେ।

Verse 56

धृतराष्ट्र महीपालमुपतस्थे यथाविधि । अर्जुनके हितकी कामनासे कुन्तीदेवीने स्वयं ही उन दोनोंका बड़ा सत्कार किया। कुन्तीसे सत्कार पाकर महातेजस्वी राजा बश्रुवाहन महाराज धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित हुआ और उसने विधिपूर्वक उनका चरण-स्पर्श किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ବଭ୍ରୁବାହନ ଯଥାବିଧି ମହାରାଜ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ଶ୍ରଦ୍ଧାସହିତ ସେବାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ। ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ମଙ୍ଗଳକାମନାରେ କୁନ୍ତୀଦେବୀ ସ୍ୱୟଂ ସେମାନେ ଉଭୟଙ୍କୁ ମହାସତ୍କାର କଲେ। କୁନ୍ତୀଙ୍କ ସମ୍ମାନ ପାଇ ମହାତେଜସ୍ବୀ ରାଜା ବଭ୍ରୁବାହନ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସେବାରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହୋଇ, ବିଧିମତେ ତାଙ୍କ ଚରଣ ସ୍ପର୍ଶ କଲେ।

Verse 66

उपागम्य महातेजा विनयेना भ्यवादयत्‌ । इसके बाद राजा युधिष्ठिर और भीमसेन आदि सभी पाण्डवोंके पास जाकर उस महातेजस्वी नरेशने विनयपूर्वक उनका अभिवादन किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ମହାତେଜସ୍ବୀ ରାଜା ନିକଟକୁ ଆସି ବିନୟସହିତ ଅଭିବାଦନ କଲେ। ପରେ ସେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଭୀମସେନ ଓ ଅନ୍ୟ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ଯଥାବିଧି ନମସ୍କାର କଲେ।

Verse 83

प्रद्युम्न इव गोविन्द विनयेनोपतस्थिवान्‌ । इसी प्रकार वह भूपाल प्रद्युम्नकी भाँति विनीत भावसे शंख-चक्र-गदाधारी भगवान्‌ श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित हुआ

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ ଭୂପାଳ ପ୍ରଦ୍ୟୁମ୍ନଙ୍କ ପରି ବିନୟସହିତ ଗୋବିନ୍ଦଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ସେବାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ। ଶଙ୍ଖ-ଚକ୍ର-ଗଦାଧାରୀ ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ସେ ବିନୀତଭାବେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ରହିଲେ।

Verse 87

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपरववके अन्तर्गत अनुगीतापर्वरमें अजुनका प्रत्यागगनविषयक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ପବିତ୍ର ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବର ଅନ୍ତର୍ଗତ ଅନୁଗୀତା ପର୍ବରେ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ପ୍ରତ୍ୟାଗମନ-ବିଷୟକ ସତାଶୀତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 88

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधारम्भे अष्टाशीतितमो<ध्याय:

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବରେ, ଅନୁଗୀତା ପର୍ବରେ, ଅଶ୍ୱମେଧ ଯଜ୍ଞର ଆରମ୍ଭେ ଅଷ୍ଟାଶୀତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।

Verse 96

रथं हेमपरिष्कारं दिव्याश्वयुजमुत्तमम्‌ । श्रीकृष्णने इस राजाको एक बहुमूल्य रथ प्रदान किया जो सुनहरी साजोंसे सुसज्जित, सबके द्वारा अत्यन्त प्रशंसित और उत्तम था। उसमें दिव्य घोड़े जुते हुए थे

ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ସେଇ ରାଜାଙ୍କୁ ଏକ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମୂଲ୍ୟବାନ ରଥ ପ୍ରଦାନ କଲେ; ସେ ରଥ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଶୋଭା-ସଜ୍ଜାରେ ସୁସଜ୍ଜିତ, ସମସ୍ତଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଅତିଶୟ ପ୍ରଶଂସିତ ଓ ଉତ୍ତମ ଥିଲା; ତାହାରେ ଦିବ୍ୟ ଘୋଡ଼ା ଯୋଡ଼ାଯାଇଥିଲେ।

Verse 103

पृथक्‌ पृथक्‌ च ते चैनं मानार्थाभ्यामयोजयन्‌ । तत्पश्चात्‌ धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवने अलग-अलग बभ्रुवाहनका सत्कार करके उसे बहुत धन दिया

ତାପରେ ସେମାନେ ପ୍ରତ୍ୟେକେ ପ୍ରତ୍ୟେକେ କରି ମାନ ଓ ଦାନଦ୍ୱାରା ତାଙ୍କୁ ସମ୍ମାନିତ କଲେ। ତଦନନ୍ତରେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଭୀମସେନ, ଅର୍ଜୁନ, ନକୁଳ ଓ ସହଦେବଙ୍କ ସହ ବଭ୍ରୁବାହନଙ୍କୁ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ଯଥୋଚିତ ଆତିଥ୍ୟରେ ସତ୍କାର କରି ପ୍ରଚୁର ଧନ ପ୍ରଦାନ କଲେ।

Verse 116

युधिष्ठिरं समभ्येत्य वाग्मी वचनमत्रवीत्‌ | उसके तीसरे दिन सत्यवतीनन्दन प्रवचनकुशल महर्षि व्यास युधिष्ठिके पास आकर बोले--

ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ବାଗ୍ମୀ ମହର୍ଷି ଏହି ବଚନ କହିଲେ। ତୃତୀୟ ଦିନ ସତ୍ୟବତୀନନ୍ଦନ, ପ୍ରବଚନକୁଶଳ ମହର୍ଷି ବ୍ୟାସ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସମୀପକୁ ଆସି କହିଲେ—

Frequently Asked Questions

The chapter frames a governance dilemma: whether reception and honors can be treated as optional ceremony or must be executed meticulously to prevent status-based grievances that could destabilize the postwar political order.

Public order is sustained by visible fairness and timely respect; dharma operates through procedures—hospitality, recognition, and careful speech—that transform power into legitimate authority.

No explicit phalaśruti appears here; the meta-function is implicit: correct understanding of protocol and intention (bhāva) is presented as integral to yajña-success and to the ethical stabilization of kingship.