
Ulūpī–Citravāhinī Saṃvāda: Dhanaṃjaya-patana and Prāya-threat
Upa-parva: Āśvamedha-anuyāna (Sacrificial Horse Campaign) Episode
Vaiśaṃpāyana reports a sudden collapse: the lotus-eyed queen (Citravāhinī) laments intensely and faints from grief upon seeing Arjuna fallen on the battlefield. Regaining consciousness, she addresses Ulūpī, identifying Arjuna as slain ‘for your sake’ by her own young son, and challenges Ulūpī’s standing as dharma-knowing and devoted-wife (pativratā) given the outcome. She reframes the situation as a comprehensive fault that must be resolved through forgiveness and immediate restoration: she petitions Ulūpī to revive Dhanaṃjaya. The queen clarifies that her grief is not centered on the slain son but on the husband whose ‘hospitality’ (ātithya) has been repaid with death. Approaching Arjuna’s body, she urges him to rise and continue the Aśvamedha duty—pursuing the yajña-horse—since the Kurus’ lives depend upon him. She reiterates the accusation toward Ulūpī, yet also asserts that multiple wives are not inherently a male fault and urges Ulūpī not to hold a distorted view. She invokes an enduring, divinely-ordained bond of friendship, then issues an ultimatum: if Ulūpī does not show Arjuna alive that day, she will undertake prāya (fasting unto death). The chapter ends with her sitting in silent resolve, observed by others.
Chapter Arc: जनमेजय के समक्ष वैशम्पायन मणिपुर-राज्य का दृश्य रखते हैं: युधिष्ठिर के अश्वमेध का यज्ञीय अश्व लेकर अर्जुन सीमा पर आता है, और पुत्र बभ्रुवाहन ब्राह्मणों को आगे कर धन-दान सहित विनय से स्वागत करने निकल पड़ता है। → अर्जुन, क्षत्रधर्म का स्मरण कर, इस ‘सामनीति’ वाले स्वागत को अपमान मानता है। वह पुत्र को झिड़कता है—यज्ञीय अश्व की रक्षा करते हुए मैं युद्ध के लिए आया हूँ; अतिथि-सत्कार नहीं, रण-आह्वान चाहिए। पिता-पुत्र के बीच धर्म की परिभाषा पर टकराव तीखा होता जाता है और अंततः युद्ध अनिवार्य बन जाता है। → रण में अर्जुन दिव्य बाणों से बभ्रुवाहन के रथ का स्वर्ण-ध्वज काट गिराता है, पर प्रत्युत्तर में बभ्रुवाहन का घातक बाण अर्जुन के मर्म में प्रवेश कर उसे धराशायी कर देता है। विजयी पुत्र भी उसी क्षण मोह/मूर्च्छा में गिर पड़ता है। → अर्जुन के पतन का समाचार अंतःपुर तक पहुँचते ही शोक का विस्फोट होता है; चित्रांगदा (मणिपुर-नरेश की माता/अंतःपुर की प्रमुख) काँपती-रोती हुई निहत-से पड़े अर्जुन को देखती है। युद्ध-उत्साह का स्थान करुणा ले लेती है और सभा-भूमि शोक-भूमि बन जाती है। → अर्जुन अचेत/धराशायी है, बभ्रुवाहन भी मूर्च्छित—अब प्रश्न यह है कि यज्ञीय अश्व का मार्ग, पिता का प्राण, और पुत्र का धर्म—इन तीनों का समाधान किस उपाय से होगा?
Verse 1
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! मणिपुरनरेश बशभ्रुवाहनने जब सुना कि मेरे पिता आये हैं, तब वह ब्राह्मणोंको आगे करके बहुत-सा धन साथमें लेकर बड़ी विनयके साथ उनके दर्शनके लिये नगरसे बाहर निकला
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ମଣିପୁରର ରାଜା ବଭ୍ରୁବାହନ ଯେତେବେଳେ ଶୁଣିଲା ଯେ ମୋ ପିତା ଆସିଛନ୍ତି, ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଆଗରେ ରଖି, ପ୍ରଚୁର ଧନ ସହ ନେଇ, ମହା ବିନୟରେ ନଗରରୁ ବାହାରି ତାଙ୍କ ଦର୍ଶନ ପାଇଁ ଗଲା।
Verse 2
मणिपूरेश्वरं त्वेवमुपयातं धनंजय: । नाभ्यनन्दत् स मेधावी क्षत्रधर्ममनुस्मरन्,मणिपुर-नरेशको इस प्रकार आया देख परम बुद्धिमान् धनंजयने क्षत्रिय-धर्मका आश्रय लेकर उसका आदर नहीं किया
ମଣିପୁରର ଅଧିପତି ଏଭଳି ଆଗକୁ ଆସିଲେ ମଧ୍ୟ, ମେଧାବୀ ଧନଞ୍ଜୟ କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମ ସ୍ମରଣ କରି ତାଙ୍କୁ ଆଦର ସହ ସ୍ୱାଗତ କଲେ ନାହିଁ।
Verse 3
उवाच च स धर्मात्मा समन्यु: फाल्गुनस्तदा । प्रक्रियेयं न ते युक्ता बहिस्त्व॑ क्षत्रधर्मत:,उस समय धर्मात्मा अर्जुन कुछ कुपित होकर बोले--“बेटा! तेरा यह ढंग ठीक नहीं है। जान पड़ता है, तू क्षत्रिय-धर्मसे बहिष्कृत हो गया है
ତେବେ ଧର୍ମାତ୍ମା ଫାଲ୍ଗୁନ (ଅର୍ଜୁନ) କିଛି କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ କହିଲେ—“ପୁତ୍ର! ତୋର ଏହି ଆଚରଣ ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ। ଦେଖାଯାଉଛି ତୁ ଖତ୍ରିୟଧର୍ମରୁ ବାହାରକୁ ପଡ଼ିଗଲୁ।”
Verse 4
संरक्ष्यमाणं तुरगं यौधिष्ठिरमुपागतम् । यज्ञियं विषयान्ते मां नायौत्सी: कि नु पुत्रक,“पुत्र! मैं महाराज युधिष्ठिरके यज्ञ-सम्बन्धी अश्वकी रक्षा करता हुआ तेरे राज्यके भीतर आया हूँ। फिर भी तू मुझसे युद्ध क्यों नहीं करता?
“ପୁତ୍ର! ମହାରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଯଜ୍ଞ-ସମ୍ବନ୍ଧୀ ଅଶ୍ୱକୁ ସୁରକ୍ଷା କରି କରି ମୁଁ ତୋର ରାଜ୍ୟସୀମାରେ ପ୍ରବେଶ କରିଛି। ତଥାପି ତୁ ମୋ ସହିତ ଯୁଦ୍ଧ କାହିଁକି କରୁନାହୁଁ?”
Verse 5
धिक् त्वामस्तु सुद्दुर्बुद्धिं क्षत्रधर्मबहिष्कृतम् । यो मां युद्धाय सम्प्राप्तं साम्नैव प्रत्यगृह्नथा:
ଧିକ୍ ତୋ ସୁଦୁର୍ବୁଦ୍ଧିକୁ—ତୁ କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମରୁ ବହିଷ୍କୃତ; ମୁଁ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଆସିଥିଲି, ଆଉ ତୁ କେବଳ ସାମନୀତିର ମୃଦୁବାକ୍ୟରେ ମୋତେ ରୋକିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କଲୁ।
Verse 6
“तुझ दुर्बुद्धिको धिक्कार है, तू निश्चय ही क्षत्रियधर्मसे भ्रष्ट हो गया है, क्योंकि युद्धके लिये आये हुए मेरा स्वागत-सत्कार तू सामनीतिसे कर रहा है ।। न त्वया पुरुषार्थो हि कश्चिदस्तीह जीवता । यस्त्व॑ स्त्रीवद् यथाप्राप्तं मां साम्ना प्रत्यगृह्नथा:,“तूने संसारमें जीवित रहकर भी कोई पुरुषार्थ नहीं किया। तभी तो एक स्त्रीकी भाँति तू यहाँ युद्धके लिये आये हुए मुझे शान्तिपूर्वक साथ लेनेके लिये चेष्टा कर रहा है
ଧିକ୍ ତୋ ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧିକୁ! ତୁ ନିଶ୍ଚୟ କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମରୁ ଭ୍ରଷ୍ଟ; କାରଣ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଆସିଥିବା ମୋତେ ତୁ ସାମନୀତିରେ ବଶ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛୁ। ଏହି ସଂସାରରେ ବଞ୍ଚି ରହି ମଧ୍ୟ ତୁ କୌଣସି ପୁରୁଷାର୍ଥ କରିନାହ; ସେଇଥିପାଇଁ ସ୍ତ୍ରୀ ପରି, ମୁଁ ଯେପରି ଆସିଛି (ଯୁଦ୍ଧାର୍ଥ), ସେପରି ମୋତେ ଶାନ୍ତ ବାକ୍ୟରେ ଗ୍ରହଣ କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରୁଛୁ।
Verse 7
यद्य॒हं न््यस्तशस्त्रस्त्वामागच्छेयं सुदुर्मते । प्रक्रियेयं भवेद् युक्ता तावत् तव नराधम,“दुर्बद्धे! नराधम! यदि मैं हथियार रखकर खाली हाथ तेरे पास आता तो इस ढंगसे मिलना ठीक हो सकता था”
ହେ ସୁଦୁର୍ମତେ, ହେ ନରାଧମ! ଯଦି ମୁଁ ଶସ୍ତ୍ର ରଖି ନିରସ୍ତ୍ର ହୋଇ ତୋ ପାଖକୁ ଆସିଥାଆନ୍ତି, ତେବେ ତୋ ପାଇଁ ଏପରି ଆଚରଣ ଯୁକ୍ତିସଙ୍ଗତ ବୋଲି ଧରାଯାଇପାରିଥାନ୍ତା।
Verse 8
तमेवमुक्तं भर्त्रा तु विदित्वा पन्नगात्मजा | अमृष्यमाणा भिन्त्वोर्वीमुलूपी समुपागमत्,पतिदेव अर्जुन जब अपने पुत्र बभ्रुवाहनसे ऐसी बात कह रहे थे, उस समय नागकन्या उलूपी उस बातको सुनकर उनके अभिप्रायको जान गयी और उनके द्वारा किये गये पुत्रके तिरस्कारको सहन न कर सकनेके कारण वह धरती छेदकर वहाँ चली आयी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପତି ଏପରି କହିବା ସହିତ ନାଗକନ୍ୟା ଉଲୂପୀ ତାଙ୍କର ଅଭିପ୍ରାୟ ବୁଝିଗଲା। ପୁତ୍ରଙ୍କ ଅପମାନ ସହିନପାରି ସେ ଭୂମିକୁ ଭେଦି ତୁରନ୍ତ ସେଠାକୁ ଆସିଲା।
Verse 9
सा ददर्श ततः पुत्र विमृशन््तमधोमुखम् । संतर्ज्यमानमसकृत् पित्रा युद्धार्थिना प्रभो,प्रभो! उसने देखा कि पुत्र बभ्रुवाहन नीचे मुँह किये किसी सोच-विचारमें पड़ा हुआ है और युद्धार्थी पिता उसे बारंबार डाँट-फटकार रहे हैं। तब मनोहर अंगोंवाली नागकन्या उलूपी धर्म-निपुण बभ्रुवाहनके पास आकर यह धर्मसम्मत बात बोली--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ସେ ପୁତ୍ରକୁ ଦେଖିଲା; ସେ ମୁଣ୍ଡ ନମାଇ ଚିନ୍ତାରେ ଲୀନ ଥିଲା, ଏବଂ ଯୁଦ୍ଧକାମୀ ପିତା ତାକୁ ପୁନଃପୁନଃ ଧମକାଇ ତିରସ୍କାର କରୁଥିଲେ।
Verse 10
ततः सा चारुसर्वाज्री समुपेत्योरगात्मजा । उलूपी प्राह वचन धर्म्य धर्मविशारदम्,प्रभो! उसने देखा कि पुत्र बभ्रुवाहन नीचे मुँह किये किसी सोच-विचारमें पड़ा हुआ है और युद्धार्थी पिता उसे बारंबार डाँट-फटकार रहे हैं। तब मनोहर अंगोंवाली नागकन्या उलूपी धर्म-निपुण बभ्रुवाहनके पास आकर यह धर्मसम्मत बात बोली--
ତେବେ ସୁନ୍ଦର ଅଙ୍ଗଯୁକ୍ତ ନାଗକନ୍ୟା ଉଲୂପୀ ଆଗକୁ ଆସି ଧର୍ମରେ ପାରଙ୍ଗତ (ବଭ୍ରୁବାହନ)ଙ୍କୁ ଧର୍ମସମ୍ମତ ବଚନ କହିଲା।
Verse 11
उलूपीं मां निबोध त्वं मातरं पन्नगात्मजाम् | कुरुष्व वचन पुत्र धर्मस्ते भविता पर:,“बेटा! तुम्हें विदित होना चाहिये कि मैं तुम्हारी विमाता नागकन्या उलूपी हूँ। तुम मेरी आज्ञाका पालन करो। इससे तुम्हें महान् धर्मकी प्राप्ति होगी”
ପୁତ୍ର! ମୋତେ ଚିହ୍ନ—ମୁଁ ଉଲୂପୀ, ନାଗବଂଶଜା, ତୋର ମାତା। ବାଳକ! ମୋ କଥା ମାନ; ତେଣୁ ତୋତେ ଉଚ୍ଚ ଧର୍ମ ଲଭିବ।
Verse 12
युध्यस्वैनं कुरुश्रेष्ठ पितरं युद्धदुर्मदम् । एवमेष हि ते प्रीतो भविष्यति न संशय:,“तुम्हारे पिता कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर और युद्धके मदसे उन्मत्त रहनेवाले हैं। अतः इनके साथ अवश्य युद्ध करो। ऐसा करनेसे ये तुमपर प्रसन्न होंगे। इसमें संशय नहीं है”
ହେ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯୁଦ୍ଧର ମଦରେ ଉନ୍ମତ୍ତ ନିଜ ପିତାଙ୍କ ସହ ନିଶ୍ଚୟ ଯୁଦ୍ଧ କର। ଏମିତି କଲେ ସେ ତୋପରେ ପ୍ରସନ୍ନ ହେବେ—ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 13
एवं दुर्मर्षितो राजा स मात्रा बश्रुवाहन: । मनश्षक्रे महातेजा युद्धाय भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! माताके द्वारा इस प्रकार अमर्ष दिलाये जानेपर महातेजस्वी राजा बभ्रुवाहनने मन-ही-मन युद्ध करनेका निश्चय किया
ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମାତା ଏପରି ଭାବେ ଅମର୍ଷ ଜଗାଇଦେବାରୁ ମହାତେଜସ୍ବୀ ରାଜା ବଭ୍ରୁବାହନ ମନେମନେ ଯୁଦ୍ଧକୁ ନିଶ୍ଚୟ କଲେ।
Verse 14
संनहा काउ्चनं वर्म शिरस्त्राणं च भानुमत् । तूणीरशतसम्बाधमारुरोह रथोत्तमम्,सुवर्णमय कवच पहनकर तेजस्वी शिरस्त्राण (टोप) धारण करके वह सैकड़ों तरकसोंसे भरे हुए उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ
ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ କବଚ ବାନ୍ଧି ଓ ଦୀପ୍ତିମାନ ଶିରସ୍ତ୍ରାଣ ଧାରଣ କରି, ସେ ଶତଶତ ତୂଣୀରରେ ଭରିଥିବା ଉତ୍ତମ ରଥରେ ଆରୋହଣ କଲା।
Verse 15
सर्वोपकरणोपेतं युक्तमश्वचिर्मनोजवै: । सचक्रोपस्करं श्रीमान् हेमभाण्डपरिष्कृतम्,उस रथमें सब प्रकारकी युद्ध-सामग्री सजाकर रखी गयी थी। मनके समान वेगशाली घोड़े जुते हुए थे। चक्र और अन्य आवश्यक सामान भी प्रस्तुत थे। सोनेके भाण्ड उसकी शोभा बढ़ाते थे। सुवर्णसे ही उस रथका निर्माण हुआ था। उसपर सिंहके चिह्नवाली ऊँची ध्वजा फहरा रही थी। उस परम पूजित उत्तम रथपर सवार हो श्रीमान् राजा बभ्रुवाहन अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा
ସେଇ ଶ୍ରୀମାନ୍ ରଥଟି ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଯୁଦ୍ଧ-ଉପକରଣରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ସଜ୍ଜିତ ଥିଲା। ମନ ସମ ବେଗବାନ ଅଶ୍ୱମାନେ ତାହାରେ ଯୋଜିତ; ଚକ୍ର ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଆବଶ୍ୟକ ସାମଗ୍ରୀ ମଧ୍ୟ ପ୍ରସ୍ତୁତ ଥିଲା। ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଜଡାଉ ଓ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ପାତ୍ରଦ୍ୱାରା ଅଲଙ୍କୃତ ହୋଇ ସେ ରଥ ରାଜସ ମହିମାରେ ଝଲମଲ କରୁଥିଲା। ସିଂହ-ଚିହ୍ନିତ ଉଚ୍ଚ ଧ୍ୱଜା ଫଡ଼ଫଡ଼ାଉଥିବାବେଳେ, ସେଇ ପରମ ପୂଜିତ ଉତ୍ତମ ରଥରେ ଆରୋହଣ କରି ଶ୍ରୀମାନ୍ ରାଜା ବଭ୍ରୁବାହନ ଧର୍ମ ଓ ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଅନୁସାରେ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖୀନ ହେବାକୁ ଆଗେଇଲେ।
Verse 16
परमार्चितमुच्छित्य ध्वजं सिंहं हिरण्मयम् | प्रययौ पार्थमुद्दिश्य स राजा बभ्रुवाहन:,उस रथमें सब प्रकारकी युद्ध-सामग्री सजाकर रखी गयी थी। मनके समान वेगशाली घोड़े जुते हुए थे। चक्र और अन्य आवश्यक सामान भी प्रस्तुत थे। सोनेके भाण्ड उसकी शोभा बढ़ाते थे। सुवर्णसे ही उस रथका निर्माण हुआ था। उसपर सिंहके चिह्नवाली ऊँची ध्वजा फहरा रही थी। उस परम पूजित उत्तम रथपर सवार हो श्रीमान् राजा बभ्रुवाहन अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा
ପରମ ପୂଜିତ ସିଂହ-ଚିହ୍ନିତ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ଧ୍ୱଜାକୁ ଉଚ୍ଚେ ଉଠାଇ, ରାଜା ବଭ୍ରୁବାହନ ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ)ଙ୍କୁ ଲକ୍ଷ୍ୟ କରି ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 17
ततो<भ्येत्य हयं वीरो यज्ञियं पार्थरक्षितम् ग्राहयामास पुरुषैर्ठयशिक्षाविशारदै:,पार्थद्वारा सुरक्षित उस यज्ञसम्बन्धी अश्वके पास जाकर उस वीरने अश्वशिक्षाविशारद पुरुषोंद्वारा उसे पकड़वा लिया
ତାପରେ ସେ ବୀର ପାର୍ଥଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ରକ୍ଷିତ ଯଜ୍ଞୀୟ ଅଶ୍ୱଟିଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ, ଅଶ୍ୱ-ଶିକ୍ଷାରେ ପାରଙ୍ଗତ ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ତାହାକୁ ଧରାଇଲେ।
Verse 18
गृहीतं वाजिन दृष्टवा प्रीतात्मा स धनंजय: । पुत्र रथस्थं भूमिष्ठ: संन्यवारयदाहवे,घोड़ेको पकड़ा गया देख अर्जुन मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। यद्यपि वे भूमिपर खड़े थे तो भी रथपर बैठे हुए अपने पुत्रको युद्धके मैदानमें आगे बढ़नेसे रोकने लगे
ଅଶ୍ୱଟି ଧରାଯାଇଛି ଦେଖି ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ମନେମନେ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ। ସେ ନିଜେ ଭୂମିରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ରଥସ୍ଥ ପୁତ୍ରକୁ ଯୁଦ୍ଧରେ ଆଗେଇବାରୁ ରୋକିଲେ।
Verse 19
स तत्र राजा तं वीर॑ शरसंघैरनेकश: । अर्दयामास निशितैराशीविषविषोपमै:,राजा बभ्रुवाहनने वहाँ अपने वीर पिताको विषैले साँपोंके समान जहरीले और तेज किये हुए सैकड़ों बाण-समूहोंद्वारा बींधकर अनेक बार पीड़ित किया
ସେଠାରେ ରାଜା ସେଇ ବୀରଙ୍କୁ ପୁନଃପୁନଃ ଶରସଂଘାତରେ ଆକ୍ରମଣ କଲେ—ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଓ ବିଷଧର ସର୍ପବିଷ ସମ ଘାତକ। ସେଇ ବାଣସମୂହରେ ତାଙ୍କୁ ବାରମ୍ବାର ବିଦ୍ଧ କରି ଭୟଙ୍କର ପୀଡ଼ା ଦେଲେ।
Verse 20
तयो: समभवद् युद्ध पितु: पुत्रस्य चातुलम् । देवासुररणप्रख्यमुभयो: प्रीयमाणयो:,वे पिता और पुत्र दोनों प्रसन्न होकर लड़ रहे थे। उन दोनोंका वह युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर जान पड़ता था। उसकी इस जगत्में कहीं भी तुलना नहीं थी
ତେବେ ପିତା ଓ ପୁତ୍ରଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଏକ ଅଦ୍ଭୁତ ଯୁଦ୍ଧ ଉଦ୍ଭବ ହେଲା। ଉଭୟେ ପ୍ରସନ୍ନଚିତ୍ତରେ ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିଲେ; ସେମାନଙ୍କ ସଂଘର୍ଷ ଦେବାସୁର-ସଙ୍ଗ୍ରାମ ପରି ଭୟଙ୍କର ଲାଗୁଥିଲା—ଏହି ଜଗତରେ ତାହାର ସମାନ କେଉଁଠି ନଥିଲା।
Verse 21
किरीटिनं प्रविव्याध शरेणानतपर्वणा । जन्रुदेशे नरव्याप्र॑ प्रहसन् बभ्रुवाहन:,बभ्रुवाहनने हँसते-हँसते पुरुषसिंह अर्जुनके गलेकी हँसलीमें झुकी हुई गाँठवाले एक बाणद्वारा गहरी चोट पहुँचायी
ହସିହସି ବଭ୍ରୁବାହନ କିରୀଟଧାରୀ ନରବ୍ୟାଘ୍ର ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଝୁକା ଗାଠିଥିବା ଏକ ବାଣଦ୍ୱାରା ଗଳା/ହଁସଳି ପ୍ରଦେଶରେ ବିଦ୍ଧ କଲେ।
Verse 22
सो<भ्यगात् सह पुड्खेन वल्मीकमिव पन्नगः । विनिर्भिद्य च कौन्तेयं प्रविवेश महीतलम्,जैसे साँप बाँबीमें घुस जाता है, उसी प्रकार वह बाण अर्जुनके शरीरमें पंखसहित घुस गया और उसे छेदकर पृथ्वीमें समा गया
ଯେପରି ସାପ ବାଁବିରେ ପ୍ରବେଶ କରେ, ସେପରି ସେ ବାଣ ପଙ୍ଖସହିତ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଶରୀରରେ ପ୍ରବେଶ କଲା; ତାଙ୍କୁ ଭେଦି ଭୂମିତଳରେ ଲୀନ ହୋଇଗଲା।
Verse 23
स गाढवेदनो धीमानालम्ब्य धनुरुत्तमम् | दिव्यं तेज: समाविश्य प्रमीत इव सो5भवत्,इससे अर्जुनको बड़ी वेदना हुई। बुद्धिमान् अर्जुन अपने उत्तम धनुषका सहारा लेकर दिव्य तेजमें स्थित हो मुर्देके समान हो गये
ତାହାରେ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଭୟଙ୍କର ବେଦନା ହେଲା। ଧୀମାନ ଅର୍ଜୁନ ନିଜ ଉତ୍ତମ ଧନୁଷକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ଦିବ୍ୟ ତେଜରେ ପ୍ରବେଶ କରି, ମୃତ ପରି ନିଷ୍ପନ୍ଦ ହୋଇଗଲେ।
Verse 24
स संज्ञामुपलभ्याथ प्रशस्य पुरुषर्षभ: । पुत्र शक्रात्मजो वाक्यमिदमाह महाद्युति:,थोड़ी देर बाद होशमें आनेपर महातेजस्वी पुरुषप्रवर इन्द्रकुमार अर्जुनने अपने पुत्रकी प्रशंसा करते हुए इस प्रकार कहा--
ତାପରେ କିଛି ସମୟ ପରେ ସଞ୍ଜ୍ଞା ଫେରିଆସିଲାପରେ, ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ମହାଦ୍ୟୁତି ଶକ୍ରପୁତ୍ର ଅର୍ଜୁନ ପୁତ୍ରଙ୍କୁ ପ୍ରଶଂସା କରି ଏହି ବଚନ କହିଲେ।
Verse 25
साधु साधु महाबाहो वत्स चित्राड़्रदात्मज । सदृशं कर्म ते दृष्टवा प्रीतिमानस्मि पुत्रक,“महाबाहु चित्रांगदाकुमार! तुम्हें साधुवाद। वत्स! तुम धन्य हो। पुत्र! तुम्हारे योग्य पराक्रम देखकर मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ସାଧୁ, ସାଧୁ, ମହାବାହୁ! ବତ୍ସ, ଚିତ୍ରାଙ୍ଗଦଙ୍କ ପୁତ୍ର! ତୋର ବଂଶୋଚିତ ଯୋଗ୍ୟ କର୍ମ ଦେଖି ମୁଁ ପରମ ପ୍ରୀତିରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ, ପୁତ୍ର।”
Verse 26
विमुज्चाम्येष ते बाणान् पुत्र युद्धे स्थिरो भव | इत्येवमुक्त्वा नाराचैरभ्यवर्षदमित्रहा,“अच्छा बेटा! अब मैं तुमपर बाण छोड़ता हूँ। तुम सावधान एवं स्थिर हो जाओ।” ऐसा कहकर शत्रुसूदन अर्जुनने बभ्रुवाहनपर नाराचोंकी वर्षा आरम्भ कर दी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ପୁତ୍ର! ଏବେ ମୁଁ ଏହି ବାଣଗୁଡ଼ିକୁ ତୋ ଉପରେ ଛାଡ଼ୁଛି; ଯୁଦ୍ଧରେ ସ୍ଥିର ଓ ସଚେତନ ରୁହ।” ଏହିପରି କହି ଶତ୍ରୁସୂଦନ ଅର୍ଜୁନ ବଭ୍ରୁବାହନ ଉପରେ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ନାରାଚର ବର୍ଷା ଆରମ୍ଭ କଲେ।
Verse 27
तान् स गाण्डीवनिर्मुक्तान् वज़्ाशनिसमप्रभान् । नाराचानच्छिनद् राजा भल्लै:सर्वास्त्रिधा द्विधा,परंतु राजा बभ्रुवाहनने गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए वज और बिजलीके समान तेजस्वी उन समस्त नाराचोंको अपने भल्लोंद्वारा मारकर प्रत्येकके दो-दो, तीन-तीन टुकड़े कर दिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଗାଣ୍ଡୀବରୁ ଛୁଟିଥିବା ବଜ୍ର ଓ ବିଜୁଳି ସମ ଦୀପ୍ତିମାନ ସେହି ନାରାଚଗୁଡ଼ିକୁ ରାଜା ବଭ୍ରୁବାହନ ନିଜ ଭଲ୍ଲବାଣରେ କାଟି, ପ୍ରତ୍ୟେକକୁ ଦୁଇ କିମ୍ବା ତିନି ଖଣ୍ଡ କରିଦେଲେ।
Verse 28
तस्य पार्थ: शरैंदिव्यैर्ध्वजं हेमपरिष्कृतम् । सुवर्णतालप्रतिमं क्षुरेणापाहरद् रथात्,राजन्! तब पाण्डुपुत्र अर्जुनने हँसते हुए-से अपने क्षुर नामक दिव्य बाणोंद्वारा बभ्रुवाहनके रथसे सुनहरे तालवृक्षके समान ऊँची सुवर्णभूषित ध्वजा काट गिरायी। शत्रुदमन नरेश! साथ ही उन्होंने उसके महान् वेगशाली विशालकाय घोड़ोंके भी प्राण ले लिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ରାଜନ୍, ତାପରେ ପାର୍ଥ ଅର୍ଜୁନ ଦିବ୍ୟ ବାଣଦ୍ୱାରା ରଥରେ ଥିବା ସୁବର୍ଣ୍ଣାଳଙ୍କୃତ, ସୁବର୍ଣ୍ଣ ତାଳବୃକ୍ଷ ସଦୃଶ ଉଚ୍ଚ ଧ୍ୱଜକୁ ‘କ୍ଷୁର’ ନାମକ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବାଣରେ କାଟି ଫେଲାଇଦେଲେ।
Verse 29
हयांश्वास्य महाकायान् महावेगानरिंदम । चकार राजन् निर्जीवान् प्रहसन्निव पाण्डव:,राजन्! तब पाण्डुपुत्र अर्जुनने हँसते हुए-से अपने क्षुर नामक दिव्य बाणोंद्वारा बभ्रुवाहनके रथसे सुनहरे तालवृक्षके समान ऊँची सुवर्णभूषित ध्वजा काट गिरायी। शत्रुदमन नरेश! साथ ही उन्होंने उसके महान् वेगशाली विशालकाय घोड़ोंके भी प्राण ले लिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ରାଜନ୍, ଅରିନ୍ଦମ! ପାଣ୍ଡବ ଅର୍ଜୁନ ମାନୋ ହସୁଥିବା ପରି, ତାହାର ମହାକାୟ ଓ ମହାବେଗଶାଳୀ ଘୋଡ଼ାମାନଙ୍କୁ ବାଣରେ ମାରି ନିର୍ଜୀବ କରିଦେଲେ।
Verse 30
स रथादवतीर्याथ राजा परमकोपन: । पदाति: पितरं क्रुद्धो योधयामास पाण्डवम्,तब रथसे उतरकर परम क्रोधी राजा बभ्रुवाहन कुपित हो पैदल ही अपने पिता पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ युद्ध करने लगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ତେବେ ପରମ କ୍ରୋଧରେ ଆବିଷ୍ଟ ରାଜା ରଥରୁ ଅବତରିଲେ ଏବଂ ପଦାତି ହୋଇ କ୍ରୁଦ୍ଧ ମନେ ନିଜ ପିତା ପାଣ୍ଡବ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 31
सम्प्रीयमाण: पार्थानामृषभ: पुत्रविक्रमात् । नात्यर्थ पीडयामास पुत्र वज्रधरात्मज:,दुन्तीपुत्रोंमें श्रेष्ठ इन्द्रकुमार अर्जुन अपने बेटेके पराक्रमसे बहुत प्रसन्न हुए थे। इसलिये वे उसे अधिक पीड़ा नहीं देते थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ପାର୍ଥମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ବଜ୍ରଧର ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ର ଅର୍ଜୁନ ପୁତ୍ରର ପରାକ୍ରମରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ ଥିଲେ; ତେଣୁ ସେ ତାକୁ ଅତିରିକ୍ତ ଭାବେ ପୀଡ଼ା ଦେଲେ ନାହିଁ।
Verse 32
स मन्यमानो विमुखं पितरं बश्रुवाहन: । शरैराशीविषाकारै: पुनरेवार्दयद् बली,बलवान् बश्रुवाहन पिताको युद्धसे विरत मानकर विषधर सर्पोके समान विषैले बाणोंद्वारा उन्हें पुनः पीड़ा देने लगा
ପିତା ଯୁଦ୍ଧରୁ ବିମୁଖ ହେଲେ ବୋଲି ଭାବି, ବଳବାନ ବଭ୍ରୁବାହନ ବିଷଧର ସର୍ପ ସଦୃଶ ବିଷାକ୍ତ ଶରଦ୍ୱାରା ପୁନର୍ବାର ତାଙ୍କୁ ଆକ୍ରମଣ କଲେ।
Verse 33
ततः स बाल्यात् पितरं विव्याध हृदि पत्रिणा । निशितेन सुपुड्खेन बलवद् बश्रुवाहन:,उसने बालोचित अविवेकके कारण परिणामपर विचार किये बिना ही सुन्दर पाँखवाले एक तीखे बाणद्वारा पिताकी छातीमें एक गहरा आघात किया
ତାପରେ ବାଲ୍ୟଜନିତ ଅବିବେକରେ ବଳବାନ ବଭ୍ରୁବାହନ ସୁପକ୍ଷଯୁକ୍ତ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଶରଦ୍ୱାରା ବଳପୂର୍ବକ ପିତାଙ୍କ ହୃଦୟ-ପ୍ରଦେଶକୁ ବିଦ୍ଧ କଲେ।
Verse 34
विवेश पाण्डवं राजन् मर्म भित्त्वातिदुःखकृत् । स तेनातिभशं विद्धः पुत्रेण कुरुनन्दन:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ରାଜନ୍, ସେ ଶର ପାଣ୍ଡବଙ୍କ ମର୍ମସ୍ଥାନକୁ ଭେଦି ଭିତରକୁ ପ୍ରବେଶ କରି ଅତ୍ୟନ୍ତ ଯନ୍ତ୍ରଣା ଦେଲା। ସେହି ଆଘାତରେ କୁରୁନନ୍ଦନ ନିଜ ପୁତ୍ରଙ୍କ ହାତରେ ଭୟଙ୍କର ଭାବେ ଆହତ ହେଲେ।
Verse 35
महीं जगाम मोहार्तस्ततो राजन् धनंजय: । राजन! वह अत्यन्त दुःखदायी बाण पाण्बुपुत्र अर्जुनके मर्म-स्थलको विदीर्ण करके भीतर घुस गया। महाराज! पुत्रके चलाये हुए उस बाणसे अत्यन्त घायल होकर कुरुनन्दन अर्जुन मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़े ।। तस्मिन् निपतिते वीरे कौरवाणां धुरंधरे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍, ତାପରେ ମୋହାବିଷ୍ଟ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ଭୂମିରେ ପତିତ ହେଲେ। ମହାରାଜ, ସେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁଃଖଦାୟକ ବାଣ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ମର୍ମସ୍ଥଳକୁ ଭେଦି ଭିତରକୁ ପ୍ରବେଶ କଲା। ପୁତ୍ର ପ୍ରୟୁକ୍ତ ସେହି ବାଣରେ ଅତି ଆହତ ହୋଇ କୁରୁନନ୍ଦନ ଅର୍ଜୁନ ମୂର୍ଛିତ ହୋଇ ପୃଥିବୀରେ ପଡ଼ିଲେ। କୌରବମାନଙ୍କ ଧୁରନ୍ଧର ସେହି ବୀର ପତିତ ହେବା ସହ…
Verse 36
व्यायम्य संयुगे राजा दृष्टवा च पितरं हतम्,राजा बश्रुवाहन युद्धस्थलमें बड़ा परिश्रम करके लड़ा था। वह भी अर्जुनके बाणसमूहोंद्वारा पहलेसे ही बहुत घायल हो चुका था। अत: पिताको मारा गया देख वह भी युद्धके मुहानेपर अचेत होकर गिर पड़ा और पृथ्वीका आलिंगन करने लगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯୁଦ୍ଧରେ ଅତ୍ୟଧିକ ପରିଶ୍ରମ କରି ଲଢ଼ିଥିବା ରାଜା ବଭ୍ରୁବାହନ, ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ବାଣବୃଷ୍ଟିରେ ପୂର୍ବରୁ ହିଁ ଭୟଙ୍କର ଆହତ ଥିଲେ। ପିତା ହତ ହୋଇଥିବା ଦେଖି ସେ ମଧ୍ୟ ରଣମୁଖରେ ଅଚେତନ ହୋଇ ପଡ଼ିଲେ ଏବଂ ଧରଣୀକୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କଲେ।
Verse 37
पूर्वमेव स बाणौघचैर्गाढविद्धो<र्जुनेन ह पपात सो5पि धरणीमालिड्ग्य रणमूर्थनि,राजा बश्रुवाहन युद्धस्थलमें बड़ा परिश्रम करके लड़ा था। वह भी अर्जुनके बाणसमूहोंद्वारा पहलेसे ही बहुत घायल हो चुका था। अत: पिताको मारा गया देख वह भी युद्धके मुहानेपर अचेत होकर गिर पड़ा और पृथ्वीका आलिंगन करने लगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ପୂର୍ବରୁ ହିଁ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଘନ ବାଣସମୂହରେ ଗଭୀର ଭାବେ ବିଦ୍ଧ ହୋଇଥିଲେ। ତେଣୁ ସେ ମଧ୍ୟ ରଣମୁଣ୍ଡରେ ମୂର୍ଛିତ ହୋଇ ପଡ଼ିଲେ ଏବଂ ଧରଣୀକୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କଲେ—ଘାଉର ବେଦନା ଓ ପିତୃବଧ ଦେଖିଥିବା ଶୋକାଘାତରେ ପରାଜିତ ହୋଇ।
Verse 38
भर्तरें निहतं दृष्टवा पुत्रं च पतितं भुवि | चित्राड्भदा परित्रस्ता प्रविवेश रणाजिरे,पतिदेव मारे गये और पुत्र भी संज्ञाशून्य होकर पृथ्वीपर पड़ा है। यह देख चित्रांगदाने संतप्त हृदयसे समरांगणमें प्रवेश किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସ୍ୱାମୀ ହତ ଓ ପୁତ୍ର ଭୂମିରେ ସଞ୍ଜ୍ଞାଶୂନ୍ୟ ହୋଇ ପଡ଼ିଥିବା ଦେଖି, ଚିତ୍ରାଙ୍ଗଦା ଭୟ ଓ ଶୋକରେ ଆତଙ୍କିତ ହୋଇ ରଣାଜିରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ।
Verse 39
शोकसंतप्तहृदया रुदती वेपती भृशम् | मणिपूरपतेर्माता ददर्श निहतं पतिम्,मणिपुर-नरेशकी माताका हृदय शोकसे संतप्त हो उठा था! रोती और काँपती हुई चित्रांगदाने देखा कि पतिदेव मारे गये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଶୋକରେ ସନ୍ତପ୍ତ ହୃଦୟା, କାନ୍ଦୁଥିବା ଓ ଭୟଙ୍କର ଭାବେ କମ୍ପିଥିବା, ମଣିପୁରପତିଙ୍କ ମାତା ଚିତ୍ରାଙ୍ଗଦା ନିଜ ଭର୍ତ୍ତାକୁ ନିହତ ଅବସ୍ଥାରେ ଦେଖିଲେ।
Verse 79
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अर्जुनबभ्रुवाहनयुद्धे एकोनाशीतितमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବର ଅନୁଗୀତା-ପର୍ବରେ ଅର୍ଜୁନ ଓ ବଭ୍ରୁବାହନଙ୍କ ଯୁଦ୍ଧବିଷୟକ ଏକୋଣାଶୀତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 356
सो<पि मोहं जगामाथ ततत्रित्राड्रदासुत: । कौरव-धुरंधर वीर अर्जुनके धराशायी होनेपर चित्रांगदाकुमार बश्रुवाहन भी मूर्च्छित हो गया
ତେବେ ସେ ମଧ୍ୟ ମୋହଗ୍ରସ୍ତ ହେଲା। ସେଠାରେ ଚିତ୍ରାଙ୍ଗଦାଙ୍କ ପୁତ୍ର ବଭ୍ରୁବାହନ, କୌରବ-ଭାରର ଧୁରନ୍ଧର ବୀର ଅର୍ଜୁନ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଥିବାକୁ ଦେଖି, ସେ ମଧ୍ୟ ମୂର୍ଛିତ ହୋଇ ପଡ଼ିଗଲା।
How to assign responsibility when relational counsel and familial action lead to lethal outcomes: the chapter stages a conflict between blame (culpability) and the dharmic demand for immediate restorative action to protect life and public duty.
Grief is acknowledged but must be ethically directed: the narrative privileges life-preserving remediation, forgiveness, and continuity of duty over prolonged recrimination, especially when communal stability depends on a key agent’s survival.
No explicit phalaśruti appears in these verses; the chapter’s meta-function is contextual—demonstrating how post-war dharma operates through restoration, ritual obligation, and regulated emotion rather than through doctrinal reward statements.