
तमोगुण-निरूपण (Analysis of Tamas and its Marks)
Upa-parva: Guṇa-vyākhyāna (Discourse on the Three Guṇas) — Āśvamedhika Parva
Brahmā presents an instructional taxonomy of embodied life and the three guṇas. The body is described as an unmanifest yet stable, all-pervading ‘nine-gated city’ constituted by three guṇas and five elements; mind and intellect are treated as organizing powers within this system. The discourse then explains the interdependence and mutual regulation of tamas, rajas, and sattva, emphasizing how one guṇa becomes prominent when another is restrained. The chapter concentrates on tamas: it is characterized as nocturnal/obscuring (mohasaṃjñita), associated with adharmic tendencies and fixed patterns of harmful action. A detailed catalogue of tamasic traits is supplied—confusion, ignorance, non-renunciation, indecision, fear, greed, grief, disbelief, distorted affect, lack of empathy, moral dullness, heaviness, and downward orientation—followed by behavioral exemplars (e.g., wasteful initiatives, empty giving, reckless consumption, excessive speech, envy). The text links persistent tamasic conduct to lower destinies (immobile beings, various animal forms, and afflicted human conditions), while contrasting it with upward movement through refinement (saṃskāra) and disciplined action. It closes with a meta-instruction: sustained knowledge of the guṇas enables release from tamasic conditioning.
Chapter Arc: ब्रह्मा महर्षियों के प्रश्नों के उत्तर में सृष्टि के सूक्ष्म आधार—गुणों की साम्यावस्था और ‘अव्यक्त’ की स्थिर, सर्वव्यापी सत्ता—का संकेत देकर तमोगुण के रहस्य का द्वार खोलते हैं। → वह बताते हैं कि जब गुणों का संतुलन बिगड़ता है तो मन-बुद्धि-इन्द्रिय-प्रवृत्तियों का जाल फैलता है; चित्त-प्रवाह के ‘तीन स्रोत’ बार-बार उसी गुणात्मिका धारा में बहते हैं, और तमस के लक्षण—अस्मृति, अविपाक, नास्तिक्य, भिन्नवृत्ति, अन्धत्व, जघन्य प्रवृत्ति—जीव को नीचे खींचते जाते हैं। → तमस में डूबे ‘अवाक्स्रोतस’ प्राणी—दुर्वृत्त, स्वकर्म-चिह्नित—का चित्र उभरता है; फिर निर्णायक वाक्य आता है: ‘अतत्त्व में तत्त्व देखने वाला कौन है?’—अर्थात मोह की चरम सीमा, जहाँ विवेक ही उलट जाता है। → ब्रह्मा तमोगुण के बहुविध रूप, उसके कार्य और फल का यथावत निरूपण कर निष्कर्ष देते हैं: जो मनुष्य इन गुणों को सदा जानता है, वह तामस बन्धनों से मुक्त हो सकता है; संस्कार और यत्न से ऊर्ध्वगति का वैदिक आश्वासन भी रखा जाता है। → तमस के ‘नियम’ और नियंत्रण की ओर संकेत (जहाँ-जहाँ ये गुण रोके जाते हैं) आगे के विवेचन का निमंत्रण देता है।
Verse 1
अपन कराता बछ। रस: षटत्रिशो<ध्याय: ब्रह्माजीके द्वारा तमोगुणका, उसके कार्यका और फलका वर्णन ब्रह्मोवाच तदव्यक्तमनुद्रिक्त सर्वव्यापि ध्रुवं स्थिरम् । नदद्वारं पुरं विद्यात् त्रिगुणं पजचधातुकम्,ब्रह्माजीने कहा--महर्षियो! जब तीनों गुणोंकी साम्यावस्था होती है, उस समय उसका नाम अव्यक्त प्रकृति होता है। अव्यक्त समस्त प्राकृत कार्योंमें व्यापक, अविनाशी और स्थिर है। उपर्युक्त तीन गुणोंमें जब विषमता आती है, तब वे पञज्चभूतका रूप धारण करते हैं और उनसे नौ द्वारवाले नगर (शरीर)-का निर्माण होता है, ऐसा जानो। इस पुरमें जीवात्माको विषयोंकी ओर प्रेरित करनेवाली मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ हैं। इनकी अभिव्यक्ति मनके द्वारा हुई है। बुद्धि इस नगरकी स्वामिनी है, ग्यारहवाँ मन दस इन्द्रियोंसे श्रेष्ठ है
ବ୍ରହ୍ମା କହିଲେ—“ଅବିକ୍ଷୁବ୍ଧ, ସର୍ବବ୍ୟାପୀ, ଅବିନାଶୀ ଓ ସ୍ଥିର ଯେ ଅବ୍ୟକ୍ତ ପ୍ରକୃତି, ତାହାକୁ ମୂଳ ଆଧାର ଭାବେ ଜାଣ। ଯେତେବେଳେ ତିନି ଗୁଣ ସାମ୍ୟାବସ୍ଥାରେ ଥାଏ, ସେତେବେଳେ ତାହା ‘ଅବ୍ୟକ୍ତ’ କୁହାଯାଏ। ଏବଂ ଯେତେବେଳେ ସେହି ତିନି ଗୁଣରେ ବିଷମତା ହୁଏ, ସେମାନେ ପଞ୍ଚଭୂତରୂପ ଧାରଣ କରନ୍ତି; ସେଠାରୁ ‘ନଅ ଦ୍ୱାରବିଶିଷ୍ଟ ନଗର’—ଏହି ଶରୀର—ଉତ୍ପନ୍ନ ହୁଏ, ଏହା ଜାଣ।”
Verse 2
एकादशपरिक्षेपं मनोव्याकरणात्मकम् । बुद्धिस्वामिकमित्येतत् परमेकादशं भवेत्,ब्रह्माजीने कहा--महर्षियो! जब तीनों गुणोंकी साम्यावस्था होती है, उस समय उसका नाम अव्यक्त प्रकृति होता है। अव्यक्त समस्त प्राकृत कार्योंमें व्यापक, अविनाशी और स्थिर है। उपर्युक्त तीन गुणोंमें जब विषमता आती है, तब वे पञज्चभूतका रूप धारण करते हैं और उनसे नौ द्वारवाले नगर (शरीर)-का निर्माण होता है, ऐसा जानो। इस पुरमें जीवात्माको विषयोंकी ओर प्रेरित करनेवाली मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ हैं। इनकी अभिव्यक्ति मनके द्वारा हुई है। बुद्धि इस नगरकी स्वामिनी है, ग्यारहवाँ मन दस इन्द्रियोंसे श्रेष्ठ है
ବାୟୁ କହିଲେ—“ଏହା ‘ଏକାଦଶ ପରିକ୍ଷେପ’—ମନର ବିଭେଦକ କ୍ରିୟାରୁ ଉତ୍ପନ୍ନ—ଯାହାର ଉପରେ ବୁଦ୍ଧି ସ୍ୱାମିନୀ ଭାବେ ଅଧିଷ୍ଠିତ। ଏହିପରି ପରମ ଏକାଦଶର ବର୍ଣ୍ଣନା ହେଲା।”
Verse 3
त्रीणि स्रोतांसि यान्यस्मिन्नाप्यायन्ते पुन: पुनः । प्रनाड्यस्तिस्र एवैता: प्रवर्तन्ते गुणात्मिका:,इसमें जो तीन स्रोत (चित्तरूपी नदीके प्रवाह) हैं, वे उन तीन गुणमयी नाडियोंके द्वारा बार-बार भरे जाते एवं प्रवाहित होते हैं
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—“ଏହାର (ଅନ୍ତଃକରଣର) ଭିତରେ ତିନିଟି ସ୍ରୋତ ଅଛି, ଯାହା ପୁନଃପୁନଃ ପୂରିତ ହୁଏ। ଗୁଣମୟ ଏହି ତିନି ନାଡ଼ୀ ହିଁ ସେହି ସ୍ରୋତମାନଙ୍କୁ ପ୍ରବାହିତ କରି ଚାଲୁ ରଖେ।”
Verse 4
तमो रजस्तथा सत्त्वं गुणानेतान् प्रचक्षते । अन्योन्यमि थुना: सर्वे तथान्योन्यानुजीविन:,सत्त्व, रज और तम--इन तीनोंको गुण कहते हैं। ये परस्पर एक-दूसरेके प्रतिद्वन्द्दी, एक-दूसरेके आश्रित, एक-दूसरेके सहारे टिकनेवाले, एक-दूसरेका अनुसरण करनेवाले और परस्पर मिश्रित रहनेवाले हैं। पाँचों महाभूत त्रिगुणात्मक हैं
ବାୟୁ କହିଲେ—“ତମସ, ରଜସ ଓ ସତ୍ତ୍ୱ—ଏହି ତିନିଟିକୁ ଗୁଣ କୁହାଯାଏ। ସେମାନେ ପରସ୍ପର ବିରୋଧୀ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଏକାପରେ ଏକ ନିର୍ଭରଶୀଳ; ଏକାପରେ ଏକ ଭରସାରେ ଟିକିଥାନ୍ତି; ଏକାପରେ ଏକ ଅନୁସରଣ କରନ୍ତି; ଏବଂ ପରସ୍ପର ମିଶି ରହନ୍ତି।”
Verse 5
अन्योन्यापाश्रयाश्चापि तथान्योन्यानुवर्तिन: । अन्योन्यव्यतिषक्ताश्च त्रिगुणा: पज्चधातव:,सत्त्व, रज और तम--इन तीनोंको गुण कहते हैं। ये परस्पर एक-दूसरेके प्रतिद्वन्द्दी, एक-दूसरेके आश्रित, एक-दूसरेके सहारे टिकनेवाले, एक-दूसरेका अनुसरण करनेवाले और परस्पर मिश्रित रहनेवाले हैं। पाँचों महाभूत त्रिगुणात्मक हैं
ବାୟୁ କହିଲେ—ସତ୍ତ୍ୱ, ରଜ ଓ ତମ—ଏଇ ତିନି ଗୁଣ ପରସ୍ପର ଆଶ୍ରିତ। ସେମାନେ ପରସ୍ପର ବିରୋଧୀ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ପରସ୍ପରକୁ ଧାରଣ କରନ୍ତି, ପରସ୍ପରକୁ ଅନୁସରଣ କରନ୍ତି ଏବଂ ଗୁଞ୍ଜି ମିଶି ରହନ୍ତି। ଏହିପରି ପଞ୍ଚ ମହାଭୂତ ମଧ୍ୟ ତ୍ରିଗୁଣାତ୍ମକ।
Verse 6
तमसो मिथुन सत्त्वं सत्त्वस्य मिथुनं रज: । रजसश्षापि सत्त्वं स्यात् सत्त्वस्य मिथुनं तम:,तमोगुणका प्रतिद्वन्द्दी है सत््वगुण और सत्त्व-गुणका प्रतिद्वन्द्धी रजोगुण है। इसी प्रकार रजोगुणका प्रतिद्वन्द्दी सत््वगुण है और सत्त्वगुणका प्रतिद्वन्द्ी तमोगुण है
ତମର ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱୀ ସତ୍ତ୍ୱ, ଏବଂ ସତ୍ତ୍ୱର ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱୀ ରଜ। ଏହିପରି ରଜର ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱୀ ମଧ୍ୟ ସତ୍ତ୍ୱ, ଏବଂ ସତ୍ତ୍ୱର ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱୀ ତମ।
Verse 7
नियम्यते तमो यत्र रजत्तत्र प्रवर्तते । नियम्यते रजो यत्र सत्त्वं तत्र प्रवर्तते,जहाँ तमोगुणको रोका जाता है, वहाँ रजोगुण बढ़ता है और जहाँ रजोगुणको दबाया जाता है, वहाँ सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है
ଯେଉଁଠି ତମକୁ ନିୟମିତ କରାଯାଏ, ସେଠି ରଜ ପ୍ରବୃତ୍ତ ହୁଏ; ଏବଂ ଯେଉଁଠି ରଜକୁ ଦମନ କରାଯାଏ, ସେଠି ସତ୍ତ୍ୱ ପ୍ରବୃତ୍ତ ହୁଏ।
Verse 8
नैशात्मकं तमो विद्यात् त्रिगुणं मोहसंज्ञितम् । अधर्मलक्षणं चैव नियतं पापकर्मसु । तामसं रूपमेतत् तु दृश्यते चापि सड्भतम्,तमको अन्धकाररूप और त्रिगुणमय समझना चाहिये। उसका दूसरा नाम मोह है। वह अधर्मको लक्षित करानेवाला और पाप करनेवाले लोगोंमें निश्चित रूपसे विद्यमान रहनेवाला है। तमोगुणका यह स्वरूप दूसरे गुणोंसे मिश्रित भी दिखायी देता है
ତମକୁ ରାତ୍ରିସ୍ୱରୂପ ଅନ୍ଧକାରମୟ—ତ୍ରିଗୁଣମଧ୍ୟରୁ ଗୋଟିଏ, ‘ମୋହ’ ନାମରେ ପରିଚିତ—ବୋଲି ଜାଣିବା ଉଚିତ। ଏହା ଅଧର୍ମର ଲକ୍ଷଣ ଏବଂ ପାପକର୍ମରେ ଲିପ୍ତ ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ନିଶ୍ଚିତ ଭାବେ ସ୍ଥିର ପ୍ରବୃତ୍ତି ରୂପେ ରହେ। ଏହି ହେଉଛି ତାମସ ରୂପ; ଏବଂ ଏହା ଅନ୍ୟ ଗୁଣ ସହ ମିଶିଥିବା ଭାବରେ ମଧ୍ୟ ଦେଖାଯାଏ।
Verse 9
प्रकृत्यात्मकमेवाहू रज: पर्यायकारकम् । प्रवृत्तं सर्वभूतेषु दृश्यमुत्पत्तिलक्षणम्,रजोगुणको प्रकृतिरूप बतलाया गया है, यह सृष्टिकी उत्पत्तिका कारण है। सम्पूर्ण भूतोंमें इसकी प्रवृत्ति देखी जाती है। यह दृश्य जगत् उसीका स्वरूप है, उत्पत्ति या प्रवृत्ति ही उसका लक्षण है
ରଜକୁ ପ୍ରକୃତି-ସ୍ୱରୂପ ବୋଲି କୁହାଯାଏ; ଏହା ପରିବର୍ତ୍ତନର କାରଣତତ୍ତ୍ୱ। ଏହା ସମସ୍ତ ଭୂତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ ଦେଖାଯାଏ; ଏହି ଦୃଶ୍ୟ ଜଗତ ତାହାର ଚିହ୍ନ—ଉତ୍ପତ୍ତି ଓ ନିରନ୍ତର ପ୍ରବୃତ୍ତି ହିଁ ତାହାର ଲକ୍ଷଣ।
Verse 10
प्रकाशं सर्वभूतेषु लाघवं श्रद्दधधानता । सात्त्विकं रूपमेवं तु लाघवं साधुसम्मितम्,सब भूतोंमें प्रकाश, लघुता (गर्वहीनता) और श्रद्धा--यह सत्तवगुणका रूप है। गर्वहीनताकी श्रेष्ठ पुरुषोंने प्रशंसा की है
ବାୟୁ କହିଲେ— ସମସ୍ତ ଭୂତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରକାଶ, ଲାଘବ (ଅହଂକାରର ଲଘୁତା) ଏବଂ ଦୃଢ଼ ଶ୍ରଦ୍ଧା— ଏହି ସବୁ ସତ୍ତ୍ୱଗୁଣର ରୂପ। ଏପରି ନିର୍ଗର୍ବତାକୁ ସାଧୁଜନ ଉତ୍କର୍ଷର ସତ୍ୟ ଚିହ୍ନ ବୋଲି ମାନି ପ୍ରଶଂସା କରନ୍ତି।
Verse 11
एतेषां गुणतत्त्वानि वक्ष्यन्ते तत्त्वहेतुभि: । समासव्यासयुक्तानि तत्त्वतस्तानि बोधत,अब मैं तात्विक युक्तियोंद्वारा संक्षेप और विस्तारके साथ इन तीनों गुणोंके कार्योंका यथार्थ वर्णन करता हूँ, इन्हें ध्यान देकर सुनो
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ— ଏବେ ମୁଁ ସତ୍ୟକୁ ନେଇଯାଉଥିବା ତାତ୍ତ୍ୱିକ ଯୁକ୍ତିମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଏହି ଗୁଣମାନଙ୍କର ତତ୍ତ୍ୱ ଓ କାର୍ଯ୍ୟକୁ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ କହିବି। ସଂକ୍ଷେପ ଓ ବିସ୍ତାର— ଉଭୟରେ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବି; ସେଗୁଡ଼ିକୁ ତତ୍ତ୍ୱତଃ ବୁଝି ଧ୍ୟାନଦେଇ ଶୁଣ।
Verse 12
सम्मोहोऊज्ञानमत्याग: कर्मणामविनिर्णय: । स्वप्न: स्तम्भो भयं लोभ: स्वत: सुकृतदूषणम्,तत्र तत्र नियम्यन्ते सर्वे ते तामसा गुणा: । मोह, अज्ञान, त्यागका अभाव, कर्मोंका निर्णय न कर सकना, निद्रा, गर्व, भय, लोभ, स्वयं शुभ कर्मोंमें दोष देखना, स्मरणशक्तिका अभाव, परिणाम न सोचना, नास्तिकता, दुश्चरित्रता, निर्विशेषता (अच्छे-बुरेके विवेकका अभाव), इन्द्रियोंकी शिथिलता, हिंसा आदि निन्दनीय दोषोंमें प्रवृत्त होना, अकार्यको कार्य और अज्ञानको ज्ञान समझना, शत्रुता, काममें मन न लगाना, अअश्रद्धा, मूर्खतापूर्ण विचार, कुटिलता, नासमझी, पाप करना, अज्ञान, आलस्य आदिके कारण देहका भारी होना, भाव-भक्तिका न होना, अजितेन्द्रियता और नीच कर्मोमें अनुराग--ये सभी दुर्गुण तमोगुणके कार्य बतलाये गये हैं। इनके सिवा और भी जो-जो बातें इस लोकमें निषिद्ध मानी गयी हैं, वे सब तमोगुणी ही हैं
ବାୟୁ କହିଲେ— ମୋହ, ଅଜ୍ଞାନ, ତ୍ୟାଗର ଅଭାବ, କର୍ମମାନଙ୍କର ନିର୍ଣ୍ଣୟ କରିପାରିବା ଅସମର୍ଥତା, ନିଦ୍ରା-ତନ୍ଦ୍ରା, ଜଡତା, ଭୟ, ଲୋଭ, ଏବଂ ନିଜ ସୁକୃତରେ ମଧ୍ୟ ଦୋଷ ଦେଖିବା— ଏସବୁ ତମୋଗୁଣର ଲକ୍ଷଣ; ଏହିମାନଙ୍କ ଅଧୀନରେ ମନୁଷ୍ୟ ପୁନଃପୁନଃ ନିୟମିତ ଓ ବନ୍ଧିତ ହୁଏ।
Verse 13
अस्मृतिश्नचाविपाकश्च नास्तिकयं भिन्नवृत्तिता | निर्विशेषत्वमन्धत्वं जघन्यगुणवृत्तिता
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ— ଏପରି ଆଚରଣରୁ ସ୍ମୃତି ଓ ବିବେକ ନଷ୍ଟ ହୁଏ; କର୍ମଫଳ ଅପକ୍ୱ ଓ ନିଷ୍ଫଳ ରହିଯାଏ; ନାସ୍ତିକତା ଏବଂ ଭଙ୍ଗା-ଅସଙ୍ଗତ ଚରିତ୍ର ଜନ୍ମ ନେଇଥାଏ। ତେବେ ମନୁଷ୍ୟ ନୀତିଭେଦହୀନ ଅନ୍ଧତ୍ୱରେ ପଡ଼ି, ନିକୃଷ୍ଟ ଗୁଣ ଓ ଅଭ୍ୟାସରେ ଜୀବନ ଯାପନ କରେ।
Verse 14
अकृते कृतमानित्वमज्ञाने ज्ञानमानिता । अमैत्री विकृताभावो हा श्रद्धा मूढठभावना
ବାୟୁ କହିଲେ— ଯାହା କରା ହୋଇନାହିଁ, ତାହା କରିଛି ବୋଲି ଅଭିମାନ କରିବା; ଅଜ୍ଞାନରେ ଥାଇ ନିଜକୁ ଜ୍ଞାନୀ ଭାବିବା; ମୈତ୍ରୀର ଅଭାବ; ବିକୃତ ଓ ଦୂଷିତ ସ୍ୱଭାବ; ଶ୍ରଦ୍ଧାର ହ୍ରାସ; ଏବଂ ହଠୀ, ମୋହାନ୍ଧ ଚିନ୍ତା— ଏସବୁ ଅନ୍ତଃକରଣର ଦୁଷଣ ଓ ନୀତିପତନର ଚିହ୍ନ।
Verse 15
अनार्जवमसंज्ञत्वं कर्म पापमचेतना । गुरुत्वं सन्नभावत्वमवशित्वमवाग्गति:
ବାୟୁ କହିଲେ—କୁଟିଳତା, ଅସଞ୍ଜ୍ଞତା, ଅଚେତନତାରୁ ଜନ୍ମିତ ପାପକର୍ମ, ମନର ଭାରତ୍ୱ, ବନ୍ଧନକାରୀ ‘ସନ୍ନଭାବ’ (ଅହଂକାରାସକ୍ତ ଅସ୍ତିତ୍ୱବୋଧ), ପରାଧୀନତା ଓ ଅଧୋଗତି—ଏହିସବୁ ଧର୍ମପତନର ଲକ୍ଷଣ; ଏମାନେ ଜୀବକୁ ସତ୍ପଥରୁ ଦୂରେ ଟାଣିନେଇଯାନ୍ତି।
Verse 16
सर्व एते गुणा वृत्तास्तामसा: सम्प्रकीर्तिता: । ये चान्ये विहिता भावा लोके5स्मिन् भावसंज्ञिता:
ବାୟୁ କହିଲେ—ଏଠାରେ ବର୍ଣ୍ଣିତ ଏହି ସମସ୍ତ ଗୁଣ ଓ ବୃତ୍ତି ତାମସ ବୋଲି ପ୍ରକାଶିତ। ଏହି ଲୋକରେ ‘ଭାବ’/‘ବୃତ୍ତି’ ନାମରେ ଯେ ଅନ୍ୟ ମନୋଦଶା ଓ ଆଚରଣପ୍ରକାର ନିର୍ଦ୍ଦିଷ୍ଟ ଓ ସ୍ୱୀକୃତ, ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ଏହି ଏକେ ଶ୍ରେଣୀରେ ବୁଝିବା ଉଚିତ।
Verse 17
परिवादकथा नित्य देवब्राह्मणवैदिकी,देवता, ब्राह्मण और वेदकी सदा निन्दा करना, दान न देना, अभिमान, मोह, क्रोध, असहनशीलता और प्राणियोंके प्रति मात्सर्य--ये सब तामस बर्ताव हैं
ବାୟୁ କହିଲେ—ଦେବତା, ବ୍ରାହ୍ମଣ ଓ ବୈଦିକ ପରମ୍ପରାକୁ ଲକ୍ଷ୍ୟ କରି ସଦା ନିନ୍ଦା-ପରଚର୍ଚ୍ଚା କରିବା, ଦାନ ନ ଦେବା, ଅଭିମାନ, ମୋହ, କ୍ରୋଧ, ଅସହିଷ୍ଣୁତା ଓ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ମତ୍ସର୍ୟ—ଏହି ସବୁ ତାମସ ଆଚରଣ।
Verse 18
अत्यागश्चाभिमानश्चव मोहो मन्युस्तथाक्षमा । मत्सरश्रैव भूतेषु तामसं वृत्तमिष्यते,देवता, ब्राह्मण और वेदकी सदा निन्दा करना, दान न देना, अभिमान, मोह, क्रोध, असहनशीलता और प्राणियोंके प्रति मात्सर्य--ये सब तामस बर्ताव हैं
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—କୃପଣତା (ଦାନ ନ ଦେବା), ଅଭିମାନ, ମୋହ, କ୍ରୋଧ, ଅସହିଷ୍ଣୁତା ଓ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ମତ୍ସର୍ୟ—ଏପରି ଆଚରଣକୁ ତାମସ ବୋଲି ଗଣାଯାଏ।
Verse 19
वृथारम्भा हि ये केचिद् वृथा दानानि यानि च । वृथा भक्षणमित्येतत् तामसं वृत्तमिष्यते,(विधि और श्रद्धासे रहित) व्यर्थ कार्योका आरम्भ करना, (देश-काल-पात्रका विचार न करके अश्रद्धा और अवहेलनापूर्वक) व्यर्थ दान देना तथा (देवता और अतिथिको दिये बिना) व्यर्थ भोजन करना भी तामसिक कार्य है
ବାୟୁ କହିଲେ—ଯେ କିଛି କାର୍ଯ୍ୟ ବ୍ୟର୍ଥ ଆରମ୍ଭ ହୁଏ, ଯେ ଦାନ ବ୍ୟର୍ଥ ଦିଆଯାଏ, ଏବଂ ଯେ ଭୋଜନ ବ୍ୟର୍ଥ କରାଯାଏ—ଏହାକୁ ତାମସ ଆଚରଣ ବୋଲି ଗଣାଯାଏ; ଅର୍ଥାତ୍ ବିଧି ଓ ଶ୍ରଦ୍ଧା ବିନା, ଦେଶ-କାଳ-ପାତ୍ର ବିଚାର ନ କରି, ଦେବତା ଓ ଅତିଥିଙ୍କୁ ପ୍ରଥମେ ସତ୍କାର ନ କରି କରାଯାଇଥିବା କର୍ମ।
Verse 20
अतिवादो>तितिक्षा च मात्सर्यमभिमानिता | अश्रद्दधानता चैव तामसं वृत्तमिष्यते,अतिवाद, अक्षमा, मत्सरता, अभिमान और अश्रद्धाको भी तमोगुणका बर्ताव माना गया है
ବାୟୁ କହିଲେ—ଅତିବାଦ (ଅତ୍ୟଧିକ ବାଦବିବାଦ), ଅସହିଷ୍ଣୁତା (କ୍ଷମାର ଅଭାବ), ଈର୍ଷ୍ୟା, ଅଭିମାନ ଓ ଅଶ୍ରଦ୍ଧା—ଏସବୁକୁ ତମୋଗୁଣଜନ୍ୟ ଆଚରଣ ବୋଲି ମନାଯାଏ।
Verse 21
एवंविधाश्व ये केचिल्लोके5स्मित् पापकर्मिण: । मनुष्या भिन्नमर्यादास्ते सर्वे तामसा: स्मृता:,संसारमें ऐसे बर्ताववाले और धर्मकी मर्यादा भंग करनेवाले जो भी पापी मनुष्य हैं, वे सब तमोगुणी माने गये हैं
ବାୟୁ କହିଲେ—ଏହି ଲୋକରେ ଯେଉଁ ପାପକର୍ମୀ ମନୁଷ୍ୟ ଏପରି ଆଚରଣ କରି ଧର୍ମମର୍ଯ୍ୟାଦା ଭଙ୍ଗ କରନ୍ତି, ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ତମୋଗୁଣାଧୀନ ବୋଲି ସ୍ମୃତ।
Verse 22
तेषां योनी: प्रवक्ष्यामि नियता: पापकर्मिणाम् | अवाड्निरयभावा ये तिर्यडुनिरयगामिन:,ऐसे पापी मनुष्योंके लिये दूसरे जन्ममें जो योनियाँ निश्चित की हुई हैं, उनका परिचय दे रहा हूँ। उनमेंसे कुछ तो नीचे नरकोंमें ढकेले जाते हैं और कुछ तिर्यगयोनियोंमें जन्म ग्रहण करते हैं
ବାୟୁ କହିଲେ—ଏବେ ମୁଁ ସେହି ପାପକର୍ମୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ପରଜନ୍ମରେ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ଯୋନିଗୁଡ଼ିକୁ କହୁଛି; ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କେହି ଅଧୋନରକରେ ପତିତ ହୁଅନ୍ତି, କେହି ତିର୍ୟଗ୍ୟୋନିକୁ ଗମନ କରନ୍ତି।
Verse 23
स्थावराणि च भूतानि पशवो वाहनानि च । क्रव्यादा दन््दशूकाश्न कृमिकीटविहंगमा:
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ସ୍ଥାବର ଭୂତ, ପଶୁ ଓ ବାହନରୂପେ ବ୍ୟବହୃତ ପ୍ରାଣୀ; ମାଂସଭକ୍ଷୀ, ଦଂଶକାରୀ ସର୍ପ, ଏବଂ କୃମି-କୀଟ ଓ ବିହଙ୍ଗ—ଏସବୁ ମଧ୍ୟ (ଏହି ଶ୍ରେଣୀରେ) ଆସନ୍ତି।
Verse 24
अण्डजा जन्तवश्वैव सर्वे चापि चतुष्पदा: । उन्मत्ता बधिरा मूका ये चान्ये पापरोगिण:
ବାୟୁ କହିଲେ—ଅଣ୍ଡଜ ପ୍ରାଣୀମାନେ ଓ ସମସ୍ତ ଚତୁଷ୍ପଦ; ଉନ୍ମତ୍ତ, ବଧିର, ମୂକ ଏବଂ ଅନ୍ୟ ଯେଉଁମାନେ ଘୋର ରୋଗରେ ପୀଡ଼ିତ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ (ସେହି ଗଣନାରେ) ଆସନ୍ତି।
Verse 25
मग्नास्तमसि दुर्वत्ता: स्वकर्मकृतलक्षणा: । अवाक्स्रोतस इत्येते मग्नासतमसि तामसा:
Vāyu said: “These people, of corrupt conduct, bear the marks fashioned by their own deeds. Sunk in darkness, they are called ‘those whose current flows downward’; tamasic by nature, they remain immersed in that gloom.”
Verse 26
स्थावर (वृक्ष-पर्वत आदि) जीव, पशु, वाहन, राक्षस, सर्प, कीड़े-मकोड़े, पक्षी, अण्डज प्राणी, चौपाये, पागल, बहरे, गूँगे तथा अन्य जितने पापमय रोगवाले (कोढ़ी आदि) मनुष्य हैं, वे सब तमोगुणमें डूबे हुए हैं। अपने कर्मोंके अनुसार लक्षणोंवाले ये दुराचारी जीव सदा दुःखमें निमग्न रहते हैं। उनकी चित्तवृत्तियोंका प्रवाह निम्न दशाकी ओर होता है, इसलिये उन्हें अर्वाक् स्रोता कहते हैं। वे तमोगुणमें निमग्न रहनेवाले सभी प्राणी तामसी हैं || २३-- २५ || तेषामुत्कर्षमुद्रेक॑ वक्ष्याम्यहमत: परम् । यथा ते सुकृताललोकॉल्लभन्ते पुण्यकर्मिण:,इसके पश्चात् मैं यह वर्णन करूँगा कि उन तामसी योनियोंमें गये हुए प्राणियोंका उत्थान और समृद्धि किस प्रकार होती है तथा वे पुण्यकर्मा होकर किस प्रकार श्रेष्ठ लोकोंको प्राप्त होते हैं
Vāyu said: All beings such as immobile life-forms (trees, mountains and the like), animals, beasts of burden, rākṣasas, serpents, insects and worms, birds, egg-born creatures, four-footed animals, and also humans who are mad, deaf, mute, or afflicted with sinful diseases (such as leprosy)—all of them are submerged in the quality of darkness (tamas). Marked by the signs produced by their own deeds, these ill-conducted beings remain continually immersed in suffering. Since the current of their mental tendencies flows downward toward a lower condition, they are called ‘those whose stream runs downward’ (arvāk-srotas). All creatures sunk in tamas are thus termed tāmasa. Thereafter I shall explain how those who have fallen into such tamasic wombs can rise and prosper, and how, by becoming doers of merit, they attain higher worlds.
Verse 27
अन्यथा प्रतिपन्नास्तु विवृद्धा ये च कर्मण: । स्वकर्मनिरतानां च ब्राह्मणानां शुभैषिणाम्,जो विपरीत योनियोंको प्राप्त प्राणी हैं, उनके पापकर्मोंका भोग पूरा हो जानेपर) जब पूर्वकृत पुण्य-कर्मोंका उदय होता है, तब वे शुभकर्मोंके संस्कारोंके प्रभावसे स्वकर्मनिष्ठ कल्याणकामी ब्राह्मणोंकी समानताको प्राप्त होते हैं अर्थात् उनके कुलमें उत्पन्न होते हैं और वहाँ पुनः यत्नशील होकर ऊपर उठते हैं एवं देवताओंके स्वर्गलोकमें चले जाते हैं--यह वेदकी श्रुति है
Vāyu said: Those beings who have taken to a contrary course—who have become deeply enmeshed in actions—when the fruition of their sinful deeds is exhausted and the rise of previously performed merit begins, then, by the force of impressions left by auspicious acts, they attain the condition of Brahmins who are devoted to their own prescribed duties and who seek the good. That is, they are born in such families; there they strive again, rise upward, and go to the heavenly world of the gods—this is what Vedic revelation declares.
Verse 28
संस्कारेणोर्ध्वमायान्ति यतमाना: सलोकताम् | स्वर्गे गच्छन्ति देवानामित्येषा वैदिकी श्रुति:,जो विपरीत योनियोंको प्राप्त प्राणी हैं, उनके पापकर्मोंका भोग पूरा हो जानेपर) जब पूर्वकृत पुण्य-कर्मोंका उदय होता है, तब वे शुभकर्मोंके संस्कारोंके प्रभावसे स्वकर्मनिष्ठ कल्याणकामी ब्राह्मणोंकी समानताको प्राप्त होते हैं अर्थात् उनके कुलमें उत्पन्न होते हैं और वहाँ पुनः यत्नशील होकर ऊपर उठते हैं एवं देवताओंके स्वर्गलोकमें चले जाते हैं--यह वेदकी श्रुति है
Vāyu said: “Through the force of wholesome impressions (saṃskāras), striving beings rise upward and attain the same world (as the righteous). They go to the heaven of the gods—this is the Vedic teaching.” In context, the point is that even those who have fallen into adverse births, once the fruition of their sinful deeds is exhausted and earlier merit begins to ripen, can be reborn among virtuous, duty-steady Brahmins; there, by renewed effort, they ascend again toward the divine realms.
Verse 29
अन्यथा प्रतिपन्नास्ते विबुद्धा: स्वेषु कर्मसु । पुनरावृत्तिधर्माणस्ते भवन्तीह मानुषा:,वे पुनरावृतिशील सकाम धर्मका आचरण करनेवाले मनुष्य देवभावको प्राप्त हो जानेके अनन्तर जब वहाँसे दूसरी योनिमें जाते हैं तब यहाँ (मृत्युलोकमें) मनुष्य होते हैं
But those who have taken to a different course—though discerning in their own ritual and worldly duties—remain subject to return. Therefore, after enjoying higher states, they come back again and here in the mortal world they become human once more. The teaching underscores that action pursued with desire, even when skillfully performed, does not end rebirth; only a path that transcends attachment breaks the cycle.
Verse 30
पापयोनिं समापतन्नाश्वाण्डाला मूकचूचुका: । वर्णान् पर्यायशश्षापि प्राप्रुवन्त्युत्तरोत्तरम्,उनमेंसे कोई-कोई (बचे हुए पापकर्मका फल भोगनेके लिये) पुनः पापयोनिसे युक्त चाण्डाल, गूँगे और अटककर बोलनेवाले होते हैं और प्राय: जन्म-जन्मान्तरमें उत्तरोत्तर उच्च वर्णको प्राप्त होते हैं
ବାୟୁ କହିଲେ—କେତେକ ଲୋକ ପୁନର୍ବାର ପାପଯୋନିରେ ପତିତ ହୁଅନ୍ତି; ସେମାନେ ଚାଣ୍ଡାଳ, ମୂକ କିମ୍ବା ଅଟକି ଅଟକି କଥା କହୁଥିବା ଭାବେ ଜନ୍ମ ନେଉଥାନ୍ତି। ତଥାପି କର୍ମଶେଷ କ୍ଷୟ ଓ ପୁଣ୍ୟର ପରିପାକ ହେଲେ, ଜନ୍ମଜନ୍ମାନ୍ତରର କ୍ରମରେ ସେମାନେ ଉତ୍ତରୋତ୍ତର ଉଚ୍ଚ ବର୍ଣ୍ଣକୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତ କରିପାରନ୍ତି।
Verse 31
शूद्रयोनिमतिक्रम्य ये चान्ये तामसा गुणा: । स्रोतोमध्ये समागम्य वर्तन्ते तामसे गुणे,कोई शूद्रयोनिसे आगे बढ़कर भी तामस गुणोंसे युक्त हो जाते हैं और उसके प्रवाहमें पड़कर तमोगुणमें ही प्रवृत्त रहते हैं
ବାୟୁ କହିଲେ—ଶୂଦ୍ରଯୋନିକୁ ଅତିକ୍ରମ କରିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଯେ କେତେକ ତାମସ ଗୁଣରେ ପ୍ରବଳ, ସେମାନେ ପ୍ରବାହର ମଧ୍ୟଭାଗରେ ସଙ୍ଗ ହେଲେ ତାମସ ଗୁଣରେ ହିଁ ଚାଲିଥାନ୍ତି।
Verse 32
अभिष्वड्डस्तु कामेषु महामोह इति स्मृत: । ऋषयो मुनयो देवा मुहान्त्यत्र सुखेप्सव:,यह जो भोगोंमें आसक्त हो जाना है, यही महामोह बताया गया है। इस मोहमें पड़कर भोगोंका सुख चाहनेवाले ऋषि, मुनि और देवगण भी मोहित हो जाते हैं (फिर साधारण मनुष्योंकी तो बात ही क्या है?)
ଭୋଗବିଷୟରେ ଆସକ୍ତି ହେବାକୁ ‘ମହାମୋହ’ ବୋଲି ସ୍ମୃତି କହେ। ଏହି ମୋହରେ ପଡି ସୁଖ ଚାହୁଁଥିବା ଋଷି, ମୁନି ଓ ଦେବଗଣ ମଧ୍ୟ ମୋହିତ ହୋଇଯାନ୍ତି।
Verse 33
तमो मोहो महामोहस्तामिस््र: क्रोधसंज्ञित: । मरणं त्वन्धतामिस्रस्तामिस्र: क्रोध उच्यते,तम (अविद्या), मोह (अस्मिता), महामोह (राग), क्रोध नामवाला तामिस््र और मृत्युरूप अन्धतामिस्र-यह पाँच प्रकारकी तामसी प्रकृति बतलायी गयी है। क्रोधको ही तामिस्र कहते हैं
ତମ, ମୋହ, ମହାମୋହ, ‘କ୍ରୋଧ’ ନାମକ ତାମିସ୍ର ଏବଂ ମୃତ୍ୟୁରୂପ ଅନ୍ଧତାମିସ୍ର—ଏହିପରି ତମର ପାଞ୍ଚ ପ୍ରକାର କୁହାଯାଇଛି; କ୍ରୋଧକୁ ହିଁ ତାମିସ୍ର କୁହନ୍ତି।
Verse 34
वर्णतो गुणतश्चैव योनितश्वैव तत्त्वतः । सर्वमेतत्तमो विप्रा: कीर्तितं वो यथाविधि,विप्रवरो! वर्ण, गुण, योनि और तत्त्वके अनुसार मैंने आपसे तमोगुणका पूरा-पूरा यथावत् वर्णन किया
ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ ବିପ୍ରମାନେ, ବର୍ଣ୍ଣ, ଗୁଣ, ଯୋନି ଓ ତତ୍ତ୍ୱ ଅନୁସାରେ ତମସ୍ ବିଷୟରେ ଏହି ସମସ୍ତ ବର୍ଣ୍ଣନା ମୁଁ ତୁମମାନଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି କହିଦେଲି।
Verse 35
कोन्वेतद् बुध्यते साधु कोन्वेतत् साधु पश्यति । अतत्त्वे तत्त्वदर्शी यस्तमसस्तत्त्वलक्षणम्,जो अतत्त्वमें तत्त्व-दृष्टि रखनेवाला है, ऐसा कौन-सा मनुष्य इस विषयको अच्छी तरह देख और समझ सकता है? यह विपरीत दृष्टि ही तमोगुणकी यथार्थ पहचान है
ବାୟୁ କହିଲେ—ଏହାକୁ ଭଲଭାବେ କିଏ ବୁଝିପାରିବ? କିଏ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ଦେଖିପାରିବ? ଯେଉଁଠି ଅତତ୍ତ୍ୱରେ ତତ୍ତ୍ୱଦର୍ଶନ ହୁଏ—ସେଇ ବିପରୀତ ଦୃଷ୍ଟି ହିଁ ତମୋଗୁଣର ସତ୍ୟ ଲକ୍ଷଣ।
Verse 36
तमोगुणा बहुविधा: प्रकीर्तिता यथावदुक्त च तम: परावरम् | नरो हि यो वेद गुणानिमान् सदा स तामसै: सर्वगुणै: प्रमुच्यते,इस प्रकार तमोगुणके स्वरूप और उसके कार्यभूत नाना प्रकारके गुणोंका यथावत् वर्णन किया गया तथा तमोगुणसे प्राप्त होनेवाली ऊँची-नीची योनियाँ भी बतला दी गयीं। जो मनुष्य इन गुणोंको ठीक-ठीक जानता है, वह सम्पूर्ण तामसिक गुणोंसे सदा मुक्त रहता है इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे षट्त्रिंशो5ध्याय:
ତମୋଗୁଣର ବହୁବିଧ ରୂପ ଯଥାବତ୍ ପ୍ରକାଶିତ ହୋଇଛି, ଏବଂ ତମସର ଉଚ୍ଚ-ନୀଚ ଫଳ ମଧ୍ୟ ସତ୍ୟରୂପେ ବର୍ଣ୍ଣିତ ହୋଇଛି। ଯେ ମନୁଷ୍ୟ ଏହି ଗୁଣଗୁଡ଼ିକୁ ସ୍ପଷ୍ଟଭାବେ ଜାଣେ, ସେ ସଦା ସମସ୍ତ ତାମସିକ ଗୁଣରୁ ମୁକ୍ତ ରହେ।
Verse 166
तत्र तत्र नियम्यन्ते सर्वे ते तामसा गुणा: । मोह, अज्ञान, त्यागका अभाव, कर्मोंका निर्णय न कर सकना, निद्रा, गर्व, भय, लोभ, स्वयं शुभ कर्मोंमें दोष देखना, स्मरणशक्तिका अभाव, परिणाम न सोचना, नास्तिकता, दुश्चरित्रता, निर्विशेषता (अच्छे-बुरेके विवेकका अभाव), इन्द्रियोंकी शिथिलता, हिंसा आदि निन्दनीय दोषोंमें प्रवृत्त होना, अकार्यको कार्य और अज्ञानको ज्ञान समझना, शत्रुता, काममें मन न लगाना, अअश्रद्धा, मूर्खतापूर्ण विचार, कुटिलता, नासमझी, पाप करना, अज्ञान, आलस्य आदिके कारण देहका भारी होना, भाव-भक्तिका न होना, अजितेन्द्रियता और नीच कर्मोमें अनुराग--ये सभी दुर्गुण तमोगुणके कार्य बतलाये गये हैं। इनके सिवा और भी जो-जो बातें इस लोकमें निषिद्ध मानी गयी हैं, वे सब तमोगुणी ही हैं
ବାୟୁ କହିଲେ—ବିଭିନ୍ନ ଭାବରେ ତମସରୁ ଜନ୍ମିଥିବା ଏହି ସମସ୍ତ ଗୁଣ ନିୟମିତ ଓ ପରିଚିତ ହୁଅନ୍ତି: ମୋହ ଓ ଅଜ୍ଞାନ; ତ୍ୟାଗର ଅଭାବ; କ’ଣ କରିବା ଉଚିତ ତାହା ନିର୍ଣ୍ଣୟ କରିପାରିବାର ଅସମର୍ଥତା; ନିଦ୍ରା; ଗର୍ବ; ଭୟ; ଲୋଭ; ନିଜ ଶୁଭକର୍ମରେ ମଧ୍ୟ ଦୋଷ ଦେଖିବା; ସ୍ମୃତିହାନି; ପରିଣାମ ନ ଭାବିବା; ପରମ ସତ୍ୟରେ ଅବିଶ୍ୱାସ; ଦୁଶ୍ଚରିତ୍ରତା; ଭଲ-ମନ୍ଦ ବିବେକର ଅଭାବ; ଇନ୍ଦ୍ରିୟଶିଥିଳତା; ହିଂସା ଆଦି ନିନ୍ଦନୀୟ ଦୋଷରେ ପ୍ରବୃତ୍ତି; ଅକାର୍ଯ୍ୟକୁ କାର୍ଯ୍ୟ ଓ ଅଜ୍ଞାନକୁ ଜ୍ଞାନ ଭାବିବା; ଶତ୍ରୁତା; ସ୍ୱକର୍ତ୍ତବ୍ୟରେ ଅରୁଚି; ଅଶ୍ରଦ୍ଧା; ମୂର୍ଖ ଚିନ୍ତା; କୁଟିଳତା; ଅବୁଝପଣ; ପାପ କରିବା; ଅଜ୍ଞାନ ଓ ଆଳସ୍ୟରୁ ଦେହଭାର; ଭାବଭକ୍ତିର ଅଭାବ; ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ଅଜୟ; ଏବଂ ନୀଚ କର୍ମରେ ଆସକ୍ତି—ଏସବୁକୁ ତାମସିକ ଗୁଣର ଫଳ ବୋଲି ଘୋଷଣା କରାଯାଇଛି। ଏହାଛଡ଼ା ଏହି ଲୋକରେ ଯାହାକୁ ନିଷିଦ୍ଧ ମନାଯାଏ, ସେସବୁ ମଧ୍ୟ ତାମସିକ ହିଁ।
The chapter diagnoses tamasic confusion (moha) as an ethical-psychological condition that drives indecision, harmful action, and social deviation, thereby undermining dharmic agency.
To cultivate discernment of guṇa-operations in oneself—recognizing when tamas dominates and how restraint and disciplined practice can allow rajas or sattva to arise—thereby reorienting conduct toward clarity and responsibility.
Yes. The closing statement frames guṇa-knowledge as emancipatory: one who consistently understands these guṇas is said to become free from tamasic qualities, indicating a soteriological value beyond mere description.