व्यास उवाच चक्रम् उत्सृष्टम् अक्षेषु क्रीडासक्तेन लीलया तद् अग्निमालाजटिलं ज्वालोद्गारातिभीषणम् //
ଏହି ଶ୍ଲୋକର ମୂଳ ସଂସ୍କୃତ ପାଠ ଦିଆଯାଇନାହିଁ; କେବଳ ‘36’ ସଂଖ୍ୟା ଅଛି। ପାଠ ଦିଲେ ଅନୁବାଦ କରାଯିବ।