
Dhaumya’s Counsel on Incognito Conduct in a Royal Household (राजवसतौ आचरण-निति)
Upa-parva: Ajñātavāsa-nīti (Guidance for Incognito Service in a Royal Household)
This chapter presents a planning dialogue as the Pandavas prepare for ajñātavāsa. Yudhiṣṭhira outlines logistical measures: safeguarding ritual fires through the family priest, directing certain attendants toward Dvāravatī, sending Draupadī’s women toward Pāñcāla, and standardizing the public account that the Pandavas have dispersed from Dvaitavana. Dhaumya then delivers an extended nīti discourse on how to reside safely in a king’s residence: avoid overfamiliarity and conspicuous privilege; do not volunteer counsel unless asked; restrain speech, laughter, and displays of confidence; avoid entanglement with the inner quarters; follow instructions without hesitation across conditions; maintain truthfulness and composure; and cultivate usefulness without provoking jealousy or suspicion. The unit closes with Yudhiṣṭhira acknowledging the guidance and requesting Dhaumya to execute the immediate rites of departure; Vaiśaṃpāyana notes Dhaumya’s ritual performance (agnihotra-related actions, oblations for prosperity and success) and the group’s departure with Draupadī in front.
Chapter Arc: अज्ञातवास की कठोर शर्तें सामने हैं—एक वर्ष तक पहचान छिपानी है; पाण्डव अपने-अपने वेश और सेवाकार्य चुनने को बाध्य हैं, और द्रौपदी के लिए भी सुरक्षित आश्रय तय करना है। → युधिष्ठिर नीति-निर्देश देते हैं: राजा से बिना पूछे उपदेश न देना, मौन रहकर सेवा करना, सदा सावधान रहना, और यह मानकर चलना कि ‘मैं राजा का प्रिय नहीं’—तभी हित और प्रिय दोनों साधे जा सकते हैं। साथ ही धौम्य, रसोइये, पाकशालाध्यक्ष, द्रौपदी की परिचारिकाएँ और सेवकों (इन्द्रसेन आदि) की अलग-अलग व्यवस्था तय होती है, ताकि किसी एक स्थान पर सबका संदेह न जगे। → अंततः छहों (पाँच पाण्डव और द्रौपदी) अग्नि और तपस्वी ब्राह्मणों की प्रदक्षिणा कर, याज्ञसेनी को अग्र में रखकर प्रस्थान करते हैं—यह क्षण उनके संकल्प, त्याग और जोखिम का सार्वजनिक (परंतु गुप्त) उद्घोष बन जाता है। → वीरों के चले जाने पर धौम्य अग्निहोत्र सामग्री सहित पाञ्चाल-देश की ओर प्रस्थान करते हैं; इन्द्रसेन आदि सेवक आदेशानुसार रथ-अश्वों की रक्षा करते हुए सुरक्षित ठिकाने (यादवों की नगरी/आश्रय) की ओर चले जाते हैं। इस प्रकार अज्ञातवास की ‘लॉजिस्टिक्स’ और आचार-संहिता स्थापित हो जाती है। → अब प्रश्न यह है कि विराट-नगर में ये छद्मवेश कितने दिन टिकेंगे—और कौन-सा संयोग सबसे पहले उनकी पहचान को संकट में डालेगा?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ श्लोक मिलाकर कुल २५३ “लोक हैं।) #++ # ० ()) अपन असल ३. इस प्रसंगमें अर्जुनने अपनेको षण्ढक और बृहन्नला कहा है। षण्ढक शब्दका अर्थ है नपुंसक। अर्जुन इस समय उर्वशीके शापसे नपुंसक हो गये थे। बृहन्नलाका मूल शब्द बृहन्नल है। विद्वानोंने 'रर और “ल” को एक-सा माना है; अतः बृहन्नलका अर्थ बृहन्नर अर्थात् श्रेष्ठ या महान् मानव है। भगवान् नारायणके सखा होनेके कारण अर्जुन नरश्रेष्ठ हैं ही। २. परिचारिकाका एक अर्थ है सेविका और दूसरा अर्थ है सब ओर विचरण करनेवाली। इस प्रकार अर्जुनने गूढ़ अभिप्राययुक्त परिचारिका शब्दद्वारा अपनेको द्रौपदीका पति सूचित किया है। - नकुलने अपना नाम ग्रन्थिक बताया और अपनेको अश्वोंका अधिकारी कहा है। ग्रन्थिकका अर्थ है आयुर्वेद तथा अध्वर्युविद्यासम्बन्धी ग्रन्थोंको जाननेवाला। श्रुतिमें अश्विनीकुमारोंको देवताओंका वैद्य तथा अध्वर्यु कहा गया है। 'अश्विनौ वै देवाना भिषजावश्चिनावध्वर्यू” | नकुल अश्विनीकुमारोंके पुत्र हैं; अतः उनका अपनेको ग्रन्थिक कहना उपयुक्त ही है। “नास्ति श्वो येषां ते अश्वा: जिनके कलतक जीवित रहनेकी आशा न हो, वे अश्व हैं--इस व्युत्पत्तिके अनुसार जीवनकी आशा छोड़कर युद्धमें डटे रहनेवाले वीरोंको अश्व कहते हैं। नकुल उनके अधिकारी अर्थात् वीरोंमें प्रधान हैं। अत: उनका यह परिचय यथार्थ ही है। - “तस्य वाक्तन्तिर्नामानि दामानि” इस श्रुतिके अनुसार तन्ति शब्द वाणीका वाचक है। तन्तिपाल कहकर सहदेवने गूढ़रूपसे युधिष्ठिरको यह बताया कि मैं आपकी प्रत्येक आज्ञाका पालन करूँगा। साधारण लोगोंकी दृष्टिमें तन्तिपालका अर्थ है, बैलोंको बाँधनेकी रस्सीको सुरक्षित रखनेवाला। अतः सहदेवने भी अपना परिचय यथार्थ ही दिया। चतुथों5 ध्याय: धौम्यका पाण्डवोंको राजाके यहाँ रहनेका ढंग बताना और सबका अपने-अपने अभीष्ट स्थानोंको जाना युधिछिर उवाच कर्माप्युक्तानि युष्माभियानि यानि करिष्यथ । मम चापि यथा बुद्धिरुचिता विधिनिश्चयात्,युधिष्ठिर बोले--विराटके यहाँ रहकर तुम्हें जो-जो कार्य करने हैं, वे सब तुमने बताये। मुझे भी अपनी बुद्धिके अनुसार जो कार्य उचित प्रतीत हुआ, वह कह चुका। जान पड़ता है, विधाताका यही निश्चय है
ယုဓိဋ္ဌိရက ပြောသည်— «ဗိရာဋ္ဌ၏ နန်းတော်တွင် နေထိုင်စဉ် သင်တို့တစ်ဦးချင်းစီ လုပ်ဆောင်မည့် တာဝန်များကို အားလုံး ပြောပြီးကြပြီ။ ငါလည်း ကိုယ့်အမြင်အတိုင်း သင့်လျော်သည်ဟု ထင်သောအရာကို ပြောပြီးပြီ။ ဤသို့ဖြစ်ခြင်းသည် ကံကြမ္မာ၏ ဆုံးဖြတ်ချက်ပင် ဖြစ်သကဲ့သို့ ထင်ရသည်»။
Verse 2
पुरोहितो5यमस्माकमन्निहोत्राणि रक्षतु । सूदपौरोगवीै: सार्द्ध द्रपदस्य निवेशने,अब मेरी सलाह यह है कि ये पुरोहित धौम्यजी रसोइयों तथा पाकशालाध्यक्षके साथ राजा ट्रुपदके घर जाकर रहें और वहाँ हमारे अग्निहोत्रकी अग्नियोंकी रक्षा करें तथा ये इन्द्रसेन आदि सेवकगण केवल रथोंको लेकर शीघ्र यहाँसे द्वारकाको चले जायेँ
ယုဓိဋ္ဌိရက ပြောသည်— «ဤသည်မှာ ကျွန်ုပ်တို့၏ မိသားစု ပုရောဟိတ်သည် သန့်ရှင်းသော အဂ္နိဟောတြ မီးများကို ကာကွယ်စောင့်ရှောက်ပါစေ။ မီးဖိုချောင်အုပ်နှင့် ချက်ပြုတ်သူများနှင့်အတူ ဒြုပဒ မင်း၏ နန်းတော်တွင် နေထိုင်၍ ထိုနေရာ၌ ကျွန်ုပ်တို့၏ အဂ္နိဟောတြ မီးအဆက်မပြတ် တည်တံ့စေရန် စောင့်ရှောက်ပါစေ»။
Verse 3
इस प्रकार श्रीमह्य भारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें यगुधिछ्ठिर आदिकी परस्पर मन्त्रणाविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ,इन्द्रसेनमुखा श्लेमे रथानादाय केवलान् | यान्तु द्वारवतीं शीघ्रमिति मे वर्तते मति: अब मेरी सलाह यह है कि ये पुरोहित धौम्यजी रसोइयों तथा पाकशालाध्यक्षके साथ राजा ट्रुपदके घर जाकर रहें और वहाँ हमारे अग्निहोत्रकी अग्नियोंकी रक्षा करें तथा ये इन्द्रसेन आदि सेवकगण केवल रथोंको लेकर शीघ्र यहाँसे द्वारकाको चले जायेँ वैशम्पायन उवाच एवं तेडन्योन्यमामन्त्रय कर्माण्युक्त्वा पृथक् पृथक् । धौम्यमामन्त्रयामासु: स च तान् मन्त्रमब्रवीत् /
ယုဓိဋ္ဌိရက ပြောသည်— «အိန္ဒြစေနနှင့် အခြားအမှုထမ်းတို့သည် ရထားများကိုသာ ယူ၍ မြန်မြန် ဒွာရဝတီသို့ သွားကြပါစေ—ဤသည်မှာ ငါ၏ အကြံဉာဏ်ဖြစ်သည်»။ ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ဆိုသည်— ထိုသို့ အပြန်အလှန် တိုင်ပင်ကာ တာဝန်များကို တစ်ဦးချင်း ခွဲဝေသတ်မှတ်ပြီးနောက် ပုရောဟိတ် ဓౌမ்யကို ခေါ်ယူကြ၏။ ထိုသူကလည်း သူတို့အား လမ်းညွှန်စကားများ ပြောကြား하였다။
Verse 4
इमाश्ष नारयों द्रौपद्या: सर्वाश्ष॒ परिचारिका: । पाञ्जालानेव गच्छन्तु सूदपौरोगवै: सह,और ये जो द्रौपदीकी सेवा करनेवाली स्त्रियाँ हैं, वे सब रसोइयों और पाकशालाध्यक्षके साथ पांचालदेशको ही चली जायाँ इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि धौम्योपदेशे चतुर्थो5ध्याय: ।। ४ || इस प्रकार श्रीमह्ा भारत विराटपवके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें धौग्योपदेशसम्बन्धी चौथा अध्याय पूरा हुआ
ယုဓိဋ္ဌိရက ပြောသည်— «ဒြောပဒီ၏ အမှုထမ်းမိန်းမများ၊ အစေခံများ အားလုံးသည် ချက်ပြုတ်သူများနှင့် မီးဖိုချောင်အုပ်တို့နှင့်အတူ ပဉ္စာလ နိုင်ငံသို့ ပြန်သွားကြပါစေ»။
Verse 5
सर्वैरपि च वक्तव्यं न प्राज्ञायन्त पाण्डवा: । गता ह्[स्मानपाहाय सर्वे द्वैतववनादिति,वहाँ सब लोग यही कहें--“हमें पाण्डवोंका कुछ भी पता नहीं है। वे सब द्वैतवनसे ही हमें छोड़कर न जाने कहाँ चले गये”
ယုဓိဋ္ဌိရက ပြောသည်– «သင်တို့အားလုံးက ဒီလိုပဲ ပြောရမည်– ‘ပाण्डဝတို့အကြောင်း ကျွန်ုပ်တို့ မည်သည့်အရာမျှ မသိပါ။ သူတို့အားလုံးသည် ဒွိုင်တဝန တောမှ ကျွန်ုပ်တို့ကို ထားခဲ့ပြီး ထွက်ခွာသွားကြသည်—ဘယ်သို့သွားသည်ကို မည်သူမျှ မသိ’» ဟု။
Verse 6
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार आपसमें एक-दूसरेकी सलाह लेकर और अपने पृथक्-पृथक् कर्म बतलाकर पाण्डवोंने पुरोहित धौम्यकी भी सम्मति ली। तब पुरोहित धौम्यने उन्हें इस प्रकार सलाह दी
ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်– «အို ဇနမေဇယ၊ ဤသို့ အချင်းချင်း တိုင်ပင်ဆွေးနွေး၍ မိမိတို့၏ သီးသန့် တာဝန်များကို ရှင်းပြပြီးနောက် ပाण्डဝတို့သည် မိသားစု ပုရောဟိတ် ဓောမျ၏ သဘောတူညီချက်ကိုလည်း တောင်းယူ၍ ရရှိကြ၏။ ထို့နောက် ပုရောဟိတ် ဓောမျက သူတို့အား ဤသို့ အကြံပေးလေ၏»။
Verse 7
धौग्य उवाच विहितं पाण्डवा: सर्व ब्राह्मणेषु सुहृत्सु च । याने प्रहरणे चैव तथैवाग्निषु भारत,धौम्यजी बोले--पाण्डवो! ब्राह्मणों, सुहृदों, सवारी या युद्ध-यात्रा, आयुध या युद्ध तथा अग्नियोंके प्रति जो शास्त्रविहित कर्तव्य हैं, उन्हें तुम अच्छी तरह जानते हो और तदनुकूल तुमने जो व्यवस्था की है, वह सब ठीक है। भारत! अब मैं तुमसे यह कहना चाहता हूँ कि तुम और अर्जुन सावधान रहकर सरुदा द्रौपदीकी रक्षा करना। लोकव्यवहारकी सभी बातें अथवा साधारण लोगोंके व्यवहार तुम सब लोगोंको विदित हैं - ५ ५
ဓောမျက ပြောသည်– «အို ပाण्डဝတို့၊ ဗြာဟ္မဏတို့နှင့် မိတ်ကောင်းဆွေကောင်းတို့အပေါ်၌လည်းကောင်း၊ ယာဉ်စီးနင်းမှု၊ လက်နက်ပစ္စည်းတို့နှင့် ထို့အတူ မီးပူဇော်မှုတို့အပေါ်၌လည်းကောင်း၊ သာသနာကျမ်းညွှန်ထားသမျှကို သင်တို့ကောင်းစွာ သိနားလည်၍ ထိုအတိုင်း စီမံထားကြပြီ၊ အို ဘာရတ»။
Verse 8
त्वया रक्षा विधातव्या कृष्णाया: फाल्गुनेन च | विदितं वो यथा सर्व लोकवृत्तमिदं तव,धौम्यजी बोले--पाण्डवो! ब्राह्मणों, सुहृदों, सवारी या युद्ध-यात्रा, आयुध या युद्ध तथा अग्नियोंके प्रति जो शास्त्रविहित कर्तव्य हैं, उन्हें तुम अच्छी तरह जानते हो और तदनुकूल तुमने जो व्यवस्था की है, वह सब ठीक है। भारत! अब मैं तुमसे यह कहना चाहता हूँ कि तुम और अर्जुन सावधान रहकर सरुदा द्रौपदीकी रक्षा करना। लोकव्यवहारकी सभी बातें अथवा साधारण लोगोंके व्यवहार तुम सब लोगोंको विदित हैं
ဓောမျက ပြောသည်– «ကృష్ణာ (ဒြောပဒီ) ကို သင်နှင့် ဖာလ္ဂုန (အာర్జုန) တို့က ကာကွယ်စောင့်ရှောက်ရမည်။ သင်တို့သည် လောကဓလေ့၊ လူတို့၏ သာမန်အပြုအမူတို့ကို အားလုံး သိနှင့်ပြီးသားဖြစ်သည်။ ထို့ကြောင့် သတိကြီးစွာဖြင့် သူမ၏ လုံခြုံရေးကို သင့်လျော်စွာ စီမံကြလော့»။
Verse 9
विदिते चापि वक्तव्यं सुहृद्धिरनुरागत: । एष धर्मश्ष कामश्न अर्थशक्षैव सनातन:,विदित होनेपर भी हितैषी सुहृदोंका कर्तव्य है कि वे स्नेहवश हितकी बात बतावें। यही सनातन धर्म है और इसीसे काम एवं अर्थकी प्राप्ति होती है
အရာတစ်ခုကို သိပြီးသားဖြစ်သော်လည်း ချစ်ခင်စိတ်ကြောင့် အကျိုးရှိသောစကားကို ပြောကြားပေးခြင်းသည် အကျိုးလိုလားသော မိတ်ဆွေတို့၏ တာဝန်ဖြစ်၏။ ဤသည်မှာ ထာဝရသော ဓမ္မလမ်းစဉ်ဖြစ်ပြီး ထိုမှတစ်ဆင့် ကာမ (တရားသင့်သော ဆန္ဒ) နှင့် အర్థ (လောကီအကျိုးစီးပွား) တို့လည်း ရရှိလာ၏။
Verse 10
अतो5हमपि वक्ष्यामि हेतुमत्र निबोधत । हन्तेमां राजवसतिं राजपुत्रा ब्रवीम्पहम्,इसलिये मैं भी जो युक्तियुक्त बातें बताऊँगा, उन्हें यहाँ ध्यान देकर सुनो। राजपुत्रो! मैं यह बता रहा हूँ कि राजाके घरमें रहकर कैसा बर्ताव करना चाहिये? उसके अनुसार राजकुलमें रहते हुए भी तुमलोग वहाँके सब दोषोंसे पार हो जाओगे। कुरुनन्दन! विवेकी पुरुषके लिये भी राजमहलमें निवास करना अत्यन्त कठिन है
ဓောမျက ပြောသည်— «ထို့ကြောင့် ငါလည်း အကြောင်းရင်းကို ရှင်းပြမည်၊ ဤနေရာတွင် သေချာနားထောင်ကြလော့။ မင်းသားတို့၊ မင်း၏ နန်းတော်၌ နေရသည့်အခါ မည်သို့ အပြုအမူထားရမည်ကို ငါပြောမည်။ ထိုသို့ လိုက်နာပါက မင်းမျိုးအိမ်တော်အတွင်း နေထိုင်နေရသော်လည်း ထိုနေရာ၌ ပေါ်ပေါက်လာသော အပြစ်အနာအဆာများကို ကျော်လွန်နိုင်ကြလိမ့်မည်။ အကြောင်းမူကား ပညာရှိသူတောင် နန်းတော်၌ နေထိုင်ခြင်းသည် အလွန်ခက်ခဲလှသည်»။
Verse 11
यथा राजतकुले प्राप्य सर्वान् दोषांस्तरिष्यथ । दुर्वसं चैव कौरव्य जानता राजवेश्मनि,इसलिये मैं भी जो युक्तियुक्त बातें बताऊँगा, उन्हें यहाँ ध्यान देकर सुनो। राजपुत्रो! मैं यह बता रहा हूँ कि राजाके घरमें रहकर कैसा बर्ताव करना चाहिये? उसके अनुसार राजकुलमें रहते हुए भी तुमलोग वहाँके सब दोषोंसे पार हो जाओगे। कुरुनन्दन! विवेकी पुरुषके लिये भी राजमहलमें निवास करना अत्यन्त कठिन है
ဓောမျက ပြောသည်— «မင်းအိမ်တော်ထဲ ဝင်ရောက်ပြီးနောက် ထိုနေရာ၌ ပေါ်ပေါက်လာသော အပြစ်အနာအဆာအားလုံးကို မည်သို့ ကျော်လွန်နိုင်မည်ကို ငါရှင်းပြမည်။ အို ကောရဝျ၊ ပညာရှိသူတောင် မင်း၏ နန်းတော်၌ နေထိုင်ခြင်းသည် အလွန်ခက်ခဲသည်။ ထို့ကြောင့် မင်းအိမ်တော်၌ သင့်လျော်သော အပြုအမူအကြောင်း ငါတင်ပြမည့် သတိပညာရှိသော အကြံဉာဏ်ကို သေချာနားထောင်ကြလော့»။
Verse 12
अमानितैरमननितैर्वा अज्ञातै: परिवत्सरम् ततश्नतुर्दशे वर्षे चरिष्पथ यथासुखम्,वहाँ तुम्हारा अपमान हो या सम्मान, सब कुछ सहकर एक वर्षतक अज्ञातभावसे रहना चाहिये। तदनन्तर चौदहवें वर्षमें तुमलोग अपनी इच्छाके अनुसार सुखपूर्वक विचरण कर सकोगे
ဓောမျက ပြောသည်— «အရှက်ခွဲခြင်းဖြစ်စေ ဂုဏ်ပြုခြင်းဖြစ်စေ အားလုံးကို သည်းခံ၍ တစ်နှစ်ပတ်လုံး မသိမမြင်အဖြစ် လျှို့ဝှက်နေကြလော့။ ထို့နောက် ဆယ့်လေးနှစ်မြောက်တွင် မိမိဆန္ဒအတိုင်း လွတ်လပ်စွာ ပျော်ရွှင်စွာ သွားလာနိုင်ကြလိမ့်မည်»။
Verse 13
दृष्टद्वारो लभेद् द्रष्टं राजस्वेषु न विश्वसेत् । तदेवासनमन्विच्छेद् यत्र नाभिपतेत् पर:,राजासे मिलना हो, तो पहले द्वारपालसे मिलकर राजाको सूचना देनी चाहिये और मिलनेके लिये उनकी आज्ञा मँगा लेनी चाहिये। इन राजाओंपर पूर्ण विश्वास कभी न करे। अपने लिये वही आसन पसंद करे, जिसपर दूसरा कोई बैठनेवाला न हो
ဓောမျက ပြောသည်— «မင်းကို တွေ့ဆုံလိုပါက အရင်ဆုံး တံခါးစောင့်ထံ သွား၍ တွေ့ခွင့်တောင်းကာ အမြင်ခွင့်ရအောင် လုပ်ရမည်။ မင်းတို့ကို အပြည့်အဝ ယုံကြည်မထားရ။ မိမိအတွက်တော့ အခြားသူက လာယူထိုင်မည့် အလားအလာမရှိသော နေရာထိုင်ခုံကိုသာ ရွေးချယ်ရမည်»။
Verse 14
यो न यान॑ न पर्यड्कं न पीठं न गजं रथम् | आरोहेत् सम्मतो$5स्मीति स राजवसतिं वसेत्,जो “मैं राजाका प्रिय व्यक्ति हूँ", यों मानकर कभी राजाकी सवारी, पलंग, पादुका, हाथी एवं रथ आदिपर नहीं चढ़ता है, वही राजाके घरमें कुशलपूर्वक रह सकता है
ဓောမျက ပြောသည်— «‘ငါသည် မင်း၏ အချစ်တော်’ ဟု ထင်မြင်ကာ မင်း၏ ယာဉ်၊ အိပ်ရာ၊ ထိုင်ခုံ၊ ဆင်၊ ရထားတို့ကို မတက်မစီးမထိုင်သူသာ မင်းအိမ်တော်၌ လုံခြုံစွာ သင့်တင့်စွာ နေနိုင်သည်»။
Verse 15
यत्र यत्रैनमासीनं शड्केरन् दुष्टचारिण: । न तत्रोपविशेद् यो वै स राजवसतिं वसेत्,जिन-जिन स्थानोंपर बैठनेसे दुराचारी मनुष्य संदेह करते हों, वहाँ-वहाँ जो कभी नहीं बैठता, वही राजभवनमें रह सकता है
ဓောမ്യက ပြောသည်– «မကောင်းသောသူတို့က သူထိုင်နေသည်ကို မြင်လျှင် သံသယဖြစ်မည့်နေရာတိုင်းတွင် သူမထိုင်သင့်။ ထိုသို့ သံသယဖြစ်စေသောနေရာများကို ရှောင်ကြဉ်နိုင်သူသာ မင်းနန်းတော်အတွင်း၌ လုံခြုံစွာ နေထိုင်နိုင်သည်»။
Verse 16
न चानुशिष्याद् राजानमपृच्छन्तं कदाचन । तृष्णी त्वेममुपासीत काले समभिपूजयेत्,बिना पूछे राजाको कभी कर्तव्यका उपदेश न दे। मौनभावसे ही उसकी सेवा करे और उपयुक्त अवसरपर राजाकी प्रशंसा भी करे
ဓောမ്യက ပြောသည်– «မေးမြန်းခြင်းမရှိသေးသောအခါ မင်းကို မည်သည့်အခါမျှ သင်ကြားဆုံးမမပြုရ။ ထိုအစား လေးစားသည့် တိတ်ဆိတ်မှုဖြင့် အနားတော်၌ စောင့်ရှောက်၍ သင့်တော်သောအချိန်တွင် ဂုဏ်ပြုချီးမွမ်းရမည်»။
Verse 17
असूयन्ति हि राजानो जनाननृतवादिन: । तथैव चावमन्यन्ते मन्त्रिणं वादिनं मृषा,झूठ बोलनेवाले मनुष्योंके प्रति राजालोग दोषदृष्टि कर लेते हैं। इसी प्रकार वे मिथ्यावादी मन्त्रीका भी अपमान करते हैं
မင်းတို့သည် မမှန်ကန်သောစကားပြောသူတို့ကို သံသယနှင့် အပြစ်ရှာသဘောဖြင့် ကြည့်တတ်ကြသည်။ ထိုနည်းတူပင် မုသာပြောသော အမတ်အကြံပေးကိုလည်း အထင်သေး၍ မလေးစားကြသည်။ ဤကဗျာသည် နိုင်ငံရေးနှင့် သီလတရားအရ သတိပေးချက်တစ်ရပ်ဖြစ်၍—အထူးသဖြင့် အမတ်တို့အတွက် သစ္စာတရားသည် မင်း၏ယုံကြည်မှုနှင့် အုပ်ချုပ်ရေးကောင်းမွန်မှုကို ထောက်တိုင်ပေးသည်ဟု ဆိုလိုသည်။
Verse 18
नैषां दारेषु कुर्वीत मैत्रीं प्राज्ञ. कदाचन । अन्तःपुरचरा ये च द्वेष्टि यानहिताश्न ये
ပညာရှိသူသည် အခြားသူတို့၏ ဇနီးများနှင့် အလွန်နီးကပ်သော မိတ်ဖွဲ့မှုကို မည်သည့်အခါမျှ မပြုသင့်။ အတွင်းနန်းတော်ခန်းများတွင် သွားလာနေသူတို့နှင့် ရန်လိုစိတ်ကြောင့် အခြားသူ၏ အကျိုးပျက်စီးမှုကို ရှာဖွေသူတို့ကိုလည်း သတိဖြင့် ဆက်ဆံရမည်။
Verse 19
बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह राजाओंकी रानियोंसे मेल-जोल न करे और जो रनिवासमें आते-जाते हों, राजा जिनसे द्वेष रखते हों तथा जो लोग राजाका अहित चाहनेवाले हों, उनसे भी मैत्री स्थापित न करे ।। विदिते चास्य कुर्वीत कार्याणि सुलघून्यपि । एवं विचरतो राज्ञि न क्षतिर्जायते क्वचित्,छोटे-से-छोटे कार्य भी राजाको जनाकर ही करे। राजदरबारमें ऐसा आचरण करनेवाले मनुष्योंको कभी हानि नहीं उठानी पड़ती
ဓောမ്യက ပြောသည်– «သတိရှိသောသူသည် မင်းတို့၏ မိဖုရားများနှင့် နီးကပ်စွာ မပေါင်းသင်းသင့်။ အတွင်းနန်းတော်သို့ သွားလာနေသူတို့နှင့်လည်းကောင်း၊ မင်းက မနှစ်သက်သူတို့နှင့်လည်းကောင်း၊ မင်း၏ အကျိုးပျက်စီးမှုကို လိုလားသူတို့နှင့်လည်းကောင်း မိတ်ဖွဲ့မထားရ။ အလွန်သေးငယ်သော အလုပ်တောင် မင်းကို အသိပေးပြီးမှသာ ဆောင်ရွက်ရမည်။ ဤသို့ မင်းရဲ့ နန်းတော်တွင် ကျင့်ကြံသူသည် မည်သည့်နေရာတွင်မျှ အန္တရာယ်မကြုံရ»။
Verse 20
गच्छन्नपि परां भूमिमपृष्टो हनियोजित: । जात्यन्ध इव मन्येत मर्यादामनुचिन्तयन्,बैठनेके लिये अपनेको ऊँचा आसन प्राप्त होता हो, तो भी जबतक राजा न पूछें-- बैठनेका आदेश न दें, तबतक राजदरबारकी मर्यादाका खयाल करके अपनेको जन्मान्ध- सा माने, मानो उस आसनको वह देखता ही न हो। इस भावसे खड़ा रहकर राजाज्ञाकी प्रतीक्षा करता रहे
ရောက်လာ၍ ဂုဏ်ထူးထိုင်ခုံတစ်ခု ရှိနေသော်လည်း မင်းက မမေးမမြန်းဘဲ မထိုင်ရန် အမိန့်မပေးသရွေ့ နန်းတော်၏ စည်းကမ်းမရိုင်းမစိုင်းမှုကို သတိထားကာ မိမိကိုယ်ကို မွေးကတည်းက မျက်ကန်းသကဲ့သို့ ထင်မှတ်ရမည်—ထိုင်ခုံကို မမြင်သကဲ့သို့ ပြုမူ၍ မင်း၏ ခွင့်ပြုချက်ကို စောင့်ဆိုင်းကာ ရပ်နေသင့်သည်။ ဤသင်ခန်းစာသည် သည်းခံတည်ငြိမ်သော နှိမ့်ချမှုနှင့် ရာဇဝတ်တရားအညီ အမူအရာကို တင်းကျပ်စွာ လိုက်နာခြင်းကို ထောက်ပြသည်။
Verse 21
नहि पुत्र न नप्तारं न भ्रातरमरिंदमा: । समतिक्रान्तमर्यादं पूजयन्ति नराधिपा:,क्योंकि शत्रुविजयी राजालोग मर्यादाका उल्लंघन करनेवाले अपने पुत्र, नाती-पोते और भाईका भी आदर नहीं करते
အို ရန်သူတို့ကို နှိမ်နင်းသူရေ၊ မင်းတို့သည် စည်းကမ်းမရိုင်းမစိုင်းမှု၏ အကန့်အသတ်ကို ကျော်လွန်သူကို မိမိ၏ သား၊ မြေး၊ ညီအစ်ကို ဖြစ်စေကာမူ မလေးစားကြ။ ရာဇဂုဏ်သိက္ခာသည် သွေးသားဆက်နွယ်မှုထက် ဓမ္မနှင့် ပြည်သူ့စည်းကမ်းတရားပေါ်တွင် မူတည်သည်။
Verse 22
यत्नाच्चोपचरेदेनमग्निवद् देववत् त्विह । अनुतेनोपचीर्णो हि हन्यादेव न संशय:,इस जगतमें राजाको अग्निके समान दाहक मानकर उसके अत्यन्त निकट न रहे और देवताके समान निग्रह तथा अनुग्रहमें समर्थ जानकर उसकी कभी अवहेलना न करे। इस प्रकार यत्नपूर्वक उसकी परिचर्यामें संलग्न रहे। इसमें संदेह नहीं कि जो मिथ्या एवं कपटपूर्ण उपचारके द्वारा राजाकी सेवा करता है, वह एक दिन अवश्य उसके हाथसे मारा जाता है
ဓောမျာက ပြောသည်—“ဤလောက၌ မင်းကို သတိကြီးစွာဖြင့် အမှုထမ်းရမည်။ မီးကဲ့သို့ လောင်ကျွမ်းတတ်သည်ဟု သိ၍ အလွန်နီးကပ်မနေစေနှင့်။ နတ်ကဲ့သို့ ထိန်းချုပ်ခြင်းနှင့် ကရုဏာပေးခြင်းတို့၌ အာဏာရှိသည်ဟု သိ၍ မည်သည့်အခါမျှ မထီမဲ့မြင်မပြုစေနှင့်။ ထို့ကြောင့် ကြိုးစား၍ သူ့ကို စောင့်ရှောက်အမှုထမ်းလော့။ သံသယမရှိ—မင်းကို မုသာနှင့် လှည့်စားသော အပြုအမူဖြင့် အမှုထမ်းသူသည် တစ်နေ့ မင်း၏လက်ဖြင့် မလွဲမသွေ သတ်ဖြတ်ခံရမည်”။
Verse 23
यद् यद् भर्तानुयुञ्जीत तत् तदेवानुवर्तयेत् प्रमादमवलेपं च कोप॑ च परिवर्जयेत्,राजा जिस-जिस कार्यके लिये आज्ञा दे, उसीका पालन करे। लापरवाही, घमंड और क्रोधको सर्वथा त्याग दे
ဓောမျာက ပြောသည်—“အရှင်က အမိန့်ပေးသော အလုပ်မည်သည့်အရာမဆို ထိုအလုပ်ကိုသာ သစ္စာရှိစွာ ဆောင်ရွက်ရမည်။ ပေါ့ပျက်မှု၊ မာနထောင်လွှားမှုနှင့် ဒေါသကို လုံးဝ ရှောင်ကြဉ်ရမည်”။
Verse 24
समर्थनासु सर्वासु हितं च प्रियमेव च । संवर्णयेत् तदेवास्य प्रियादपि हितं॑ भवेत्,कर्तव्य और अकर्तव्यके निर्णयके सभी अवसरोंपर हितकारक और प्रिय वचन कहे। यदि दोनों सम्भव न हों, तो प्रिय वचनका त्याग करके भी जो हितकारक हो, वही बात कहे (हितविरोधी प्रिय वचन कदापि न कहे)
လုပ်သင့်လုပ်ထိုက်နှင့် မလုပ်သင့်မလုပ်ထိုက်ကို ဆုံးဖြတ်ရသည့် အခါတိုင်း အကျိုးရှိပြီး နားဝင်ချိုသော စကားကို ပြောရမည်။ နှစ်မျိုးလုံး မဖြစ်နိုင်လျှင် နားဝင်ချိုမှုကို စွန့်လွှတ်ပြီး အကျိုးရှိသော စကားကိုသာ ပြောရမည်—အကျိုးကို ဆန့်ကျင်သော ချိုသာစကားကို မပြောရ။
Verse 25
अनुकूलो भवेच्चास्य सर्वार्थेषु कथासु च । अप्रियं चाहित॑ यत् स्थात् तदस्मै नानुवर्णयेत्,सभी विषयों तथा सब बातोंमें राजाके अनुकूल रहे। कथावार्तामें भी राजाके सामने ऐसी बातोंकी बार-बार चर्चा न करे, जो उसे अप्रिय एवं अहितकर प्रतीत होती हों
အရာရာ၌လည်းကောင်း၊ စကားပြောဆိုရာ၌လည်းကောင်း မင်း၏စိတ်တော်နှင့်ကိုက်ညီအောင် နေထိုင်ရမည်။ မင်းအတွက် မနှစ်သက်ဖွယ်နှင့် အန္တရာယ်ဖြစ်စေနိုင်သော အကြောင်းအရာတို့ကို မင်းရှေ့တော်၌ ပြန်လည်မပြောကြားရ၊ ထပ်ခါတလဲလဲ မတင်ပြရ။
Verse 26
नाहमस्य प्रियो5स्मीति मत्वा सेवेत पण्डित: । अप्रमत्तश्न सततं हित॑ कुर्यात् प्रियं च यत्,दिद्वान् पुरुष “मैं राजाका प्रिय व्यक्ति नहीं हूँ", ऐसा मानता हुआ सदा सावधान रहकर उसकी सेवा करे। राजाके लिये जो हितकर और प्रिय हो, वही कार्य करे
ပညာရှိသည် “ငါသည် မင်း၏အချစ်တော်ဖြစ်ချင်မှဖြစ်မည်” ဟု တွေးကာ အမှုထမ်းရမည်။ အမြဲတမ်း သတိမလွတ်ဘဲ မပေါ့ပျက်မနေဘဲ၊ မင်းအတွက် အကျိုးရှိသည့်အရာနှင့် မင်းစိတ်တော်နှစ်သက်သည့်အရာတို့ကိုသာ ဆောင်ရွက်ရမည်။
Verse 27
नास्यानिष्टानि सेवेत नाहितै: सह संवदेत् । स्वस्थानान्न विकम्पेत स राजवसतिं वसेत्,जो चीज राजाको पसंद न हो, उसका कदापि सेवन न करे। उसके शत्रुओंसे बातचीत न करे और अपने स्थानसे कभी विचलित न हो। ऐसा बर्ताव करनेवाला मनुष्य ही राजाके यहाँ सकुशल रह सकता है
ဓောမျာက ပြောသည်– “မင်းမနှစ်သက်သောအရာကို မလွန်လွန်ကဲကဲ မလုပ်ရ။ ရန်လိုသူ၊ မကောင်းကြံသူတို့နှင့် မစကားပြောရ။ ကိုယ့်အပ်နှံထားသောနေရာနှင့် တာဝန်မှ မလှုပ်မယှက် မယိမ်းယိုင်ရ။ ဤသို့ စည်းကမ်းတကျ ပြုမူသူသာ မင်းနန်းတော်၌ လုံခြုံစွာ နေနိုင်သည်။”
Verse 28
दक्षिणं वाथ वाम॑ वा पाश्वमासीत पण्डित: । रक्षिणां ह्यात्तशस्त्राणां स्थानं पश्चात् विधीयते,विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह राजाके दाहिने या बायें भागमें बैठे; क्योंकि राजाके पीछे अस्त्र-शस्त्रधारी अंगरक्षक सैनिकोंका स्थान होता है
ဓောမျာက ပြောသည်– “ပညာရှိသည် မင်း၏ညာဘက် သို့မဟုတ် ဘယ်ဘက်တွင် ထိုင်ရမည်။ မင်း၏နောက်ဘက်နေရာသည် လက်နက်ကိုင် အစောင့်တပ်တို့အတွက် သတ်မှတ်ထားသောနေရာဖြစ်သည်။”
Verse 29
नित्यं हि प्रतिषिद्ध तु पुरस्तादासनं महत् | न च संदर्शने किज्चित् प्रवृत्तमपि संजयेत्,राजाके सामने किसीके लिये भी ऊँचा आसन लगाना सर्वथा निषिद्ध है। उसकी आँखोंके सामने यदि कोई पुरस्कार-वितरण या वेतनदान आदिका कार्य हो रहा हो, तो उसमें बिना बुलाये स्वयं पहले लेनेकी चेष्टा नहीं करनी चाहिये
ဓောမျာက ပြောသည်– “မင်းရှေ့တော်၌ မည်သူမဆို အမြင့်အာဆနာကို ချထားခြင်းသည် အမြဲတမ်း တားမြစ်ထားသည်။ ထို့ပြင် မင်းမျက်စိရှေ့တွင် ဆုချီးမြှင့်ခြင်း သို့မဟုတ် လစာပေးခြင်း စသည့် ခွဲဝေမှုတစ်စုံတစ်ရာ ဖြစ်နေသော်လည်း မခေါ်မဖိတ်ဘဲ ကိုယ်တိုင်ရှေ့တက်ကာ ယူရန် မကြိုးစားရ။”
Verse 30
अपि होतद् दरिद्राणां व्यलीकस्थानमुत्तमम् । न मृषाभिहितं राज्ञां मनुष्येषु प्रकाशयेत्,क्योंकि ऐसी ढिठाई तो दरिद्रोंको भी बहुत अप्रिय जान पड़ती है; फिर राजाओंकी तो बात ही क्या है? राजाओंकी किसी झूठी बातको दूसरे मनुष्योंके सामने प्रकाशित न करें
ဓောဂျယက ပြောသည်– «ဆင်းရဲသူတို့အကြား၌ပင် မျက်နှာမဲ့သော မာနကြီးမှုသည် အလွန်အမုန်းခံရဆုံးဖြစ်၏။ ထိုသို့ဆိုလျှင် မင်းတို့အမှု၌ မည်မျှပို၍ဖြစ်မည်နည်း။ ထို့ကြောင့် မင်းအပေါ်သို့ တင်ပေးထားသော မမှန်ကန်သည့်စကားကို အခြားသူများရှေ့တွင် မဖော်ထုတ်သင့်»။
Verse 31
असूयन्ति हि राजानो नराननृतवादिन: । तथैव चावमन्यन्ते नरान् पण्डितमानिन:,क्योंकि झूठ बोलनेवाले मनुष्योंसे राजालोग द्वेष मान लेते हैं। इसी तरह जो लोग अपनेको पण्डित मानते हैं, उनका भी राजा तिरस्कार करते हैं
မင်းတို့သည် အမှန်တကယ် မမှန်ကန်သောစကားပြောသူတို့ကို မနာလိုမုန်းတီးလာတတ်၏။ ထိုနည်းတူပင် ကိုယ့်ကိုယ်ကို ပညာရှိဟု ထင်ယောင်ထင်မှားနေသူတို့ကိုလည်း မင်းက အထင်သေးတတ်၏။ ဤအကြံဉာဏ်၏ အဓိပ္ပါယ်မှာ—နန်းတော်အတွင်း၌ မုသားကိုလည်းကောင်း၊ ပညာပြသလိုသည့် အလွန်အကျွံအပြောအဆိုကိုလည်းကောင်း ရှောင်ကြဉ်ရမည်ဟူ၍ ဖြစ်သည်။ အကြောင်းမူကား ထိုနှစ်မျိုးစလုံးသည် မင်း၏မနာလိုမှုကို ဖိတ်ခေါ်ပြီး ကိုယ့်အဆင့်အတန်းကိုလည်း ထိခိုက်စေတတ်သည်။
Verse 32
शूरोअस्मीति न दृप्तः स्याद् बुद्धिमानिति वा पुनः । प्रियमेवाचरन् राज्ञ: प्रियो भवति भोगवान्,“मैं शूरवीर हूँ अथवा बड़ा बुद्धिमान् हूँ", ऐसा घमंड न करे। जो सदा राजाको प्रिय लगनेवाले कार्य ही करता है, वही उसका प्रेमपात्र तथा ऐश्वर्यभोगसे सम्पन्न होता है
«ငါသည် သူရဲကောင်းဖြစ်သည်» ဟူ၍လည်းကောင်း၊ «ငါသည် ပညာရှိဖြစ်သည်» ဟူ၍လည်းကောင်း မာန်မတက်သင့်။ မင်း၏နှစ်သက်ရာကိုသာ အမြဲတမ်း လုပ်ဆောင်သူကသာ မင်း၏ချစ်ခင်ခံရသူဖြစ်ပြီး စည်းစိမ်အာဏာကိုလည်း ခံစားရ၏။
Verse 33
ऐश्वर्य प्राप्य दुष्प्रापं प्रियं प्राप्प च राजतः । अप्रमत्तो भवेद् राज्ञ: प्रियेषु च हितेषु च,राजासे दुर्लभ ऐश्वर्य तथा प्रिय भोग प्राप्त होनेपर मनुष्य सदा सावधान होकर उसके प्रिय एवं हितकर कार्योंमें संलग्न रहे
ရခဲလှသော အာဏာစည်းစိမ်ကို ရရှိပြီး မင်း၏အလိုတော်နှစ်သက်မှုကိုလည်း ရရှိထားလျှင် လူသည် အမြဲသတိမလွတ်ဘဲ ကိုယ့်ကိုယ်ကို ထိန်းချုပ်ကာ မင်းအတွက် နှစ်သက်ဖွယ်လည်းကောင်း အကျိုးရှိဖွယ်လည်းကောင်း ဖြစ်သော အလုပ်များတွင် ပါဝင်လုပ်ဆောင်သင့်သည်။ ဤသင်ခန်းစာသည် ရှားပါးသော စည်းစိမ်နှင့် မင်းနှင့်နီးစပ်မှုတို့သည် သေချာသတိထားသော အပြုအမူ၊ သစ္စာရှိသော ဝန်ထမ်းမှု၊ နှင့် အုပ်ချုပ်သူ၏ အကျိုးစီးပွားကို အမှန်တကယ် ထောက်ပံ့သည့်အရာများကို ဂရုစိုက်ခြင်းကို တောင်းဆိုကြောင်း အလေးပေးသည်—ကိုယ့်အလိုလိုက်ခြင်း မဟုတ်။
Verse 34
यस्य कोपो महाबाध: प्रसादश्ष महाफल: । कस्तस्य मनसापीच्छेदनर्थ प्राज्ञसम्मत:,जिसका क्रोध बड़ा भारी संकट उपस्थित कर देता है और जिसकी प्रसन्नता महान् फल-श्वर्य-भोग देनेवाली है, उस राजाका कौन बुद्धिमान् पुरुष मनसे भी अनिष्ट साधन करना चाहेगा?
«အမျက်တော်သည် ကြီးမားသောဘေးအန္တရာယ်ကို ဖြစ်စေပြီး၊ ကျေနပ်တော်မူခြင်းသည် ကြီးမားသောအကျိုးကို ပေးတတ်သော ထိုမင်းအပေါ်သို့ ပညာရှိသူမည်သူက စိတ်ထဲတွင်တောင် အန္တရာယ်ပြုလိုစိတ် ရှိမည်နည်း»။
Verse 35
नचोष्ठी न भुजौ जानू न च वाक्यं समाक्षिपेत् । सदा वातं च वाचं च छीवन॑ चाचरेच्छनै:,राजाके समक्ष अपने दोनों हाथ, ओठ और घुटनोंको व्यर्थ न हिलावे; बकवाद न करे। सदा शनैः:-शनै: बोले। धीरेसे थूके और दूसरोंको पता न चले, इस प्रकार अधोवायु छोड़े
ဓောမျာက ပြောသည်— «ဘုရင်ရှေ့တော်၌ မလိုအပ်ဘဲ လှုပ်ရှားကာ ရှုပ်ရှားမနေသင့်။ နှုတ်ခမ်း၊ လက်မောင်း၊ ဒူးတို့ကို အလဟဿ မလှုပ်စေသင့်။ စကားကို အလျင်အမြန် ပစ်ချမပြော၊ အပျင်းပြော မပြု။ စကားသည် တိုင်းတာ၍ နူးညံ့စွာ၊ ဖြည်းဖြည်း ပြောရမည်။ တံတွေးထွေးခြင်းနှင့် အောက်လေ ထုတ်ခြင်းတို့ပင် တိတ်တဆိတ်၊ သတိထား၍ အခြားသူမသိအောင် ပြုရမည်။»
Verse 36
हास्यवस्तुषु चान्यस्य वर्तमानेषु केषुचित् । नातिगाढढं प्रहष्येत न चाप्युन्मत्तवद्धसेत्,किसी दूसरे व्यक्तिके सम्बन्धमें कोई हास्यजनक वस्तु दिखायी दे, तो अधिक हर्ष न प्रकट करे एवं पागलोंकी तरह अट्टहास न करे तथा अत्यन्त धैर्यके कारण जडवत् निश्रैष्ट होकर भी न रहे। इससे वह गौरव (सम्मान) को प्राप्त होता है। मनमें प्रसन्नता होनेपर मुखसे मृदुल (मन्द) मुसकानका ही प्रदर्शन करे
ဓောမျာက ပြောသည်— «အခြားသူနှင့် ပတ်သက်၍ ရယ်စရာကိစ္စတစ်စုံတစ်ရာ ပေါ်လာလျှင် အလွန်အကျွံ ဝမ်းသာမပြ၊ အရူးကဲ့သို့ အော်ဟစ်ရယ်မမောရ။ သို့သော် အလွန်တင်းကျပ်သော သည်းခံမှုကို အကြောင်းပြ၍ သစ်တုံးကဲ့သို့ တောင့်တင်းမနေစေ။ စိတ်ထဲ၌ ပျော်ရွှင်မှု ပေါ်လာသော် မျက်နှာပေါ်တွင် နူးညံ့သိမ်မွေ့သော အနည်းငယ်သော အပြုံးသာ ပြပါ။ ထိုသို့ ညီမျှသင့်တင့်စွာ ပြုမူခြင်းဖြင့် ဂုဏ်သိက္ခာနှင့် လေးစားမှုကို ရရှိမည်။»
Verse 37
न चातिधैर्येण चरेद् गुरुतां हि व्रजेत् ततः । स्मितं तु मृदुपूर्वेण दर्शयेत प्रसादजम्,किसी दूसरे व्यक्तिके सम्बन्धमें कोई हास्यजनक वस्तु दिखायी दे, तो अधिक हर्ष न प्रकट करे एवं पागलोंकी तरह अट्टहास न करे तथा अत्यन्त धैर्यके कारण जडवत् निश्रैष्ट होकर भी न रहे। इससे वह गौरव (सम्मान) को प्राप्त होता है। मनमें प्रसन्नता होनेपर मुखसे मृदुल (मन्द) मुसकानका ही प्रदर्शन करे
ဓောမျာက ပြောသည်— «အလွန်တင်းကျပ်သော အပြုအမူ၊ သို့မဟုတ် ခိုင်မာလွန်းသော ကိုယ်ထိန်းချုပ်မှုဖြင့် မနေထိုင်သင့်။ ထိုသို့ဖြစ်လျှင် ဂုဏ်သိက္ခာ လျော့နည်းကာ လူမနီးကပ်နိုင်သည့် အလေးအနက်ကြီးသူ ဖြစ်လာနိုင်သည်။ ထို့ကြောင့် စိတ်ပျော်ရွှင်သော် အတွင်းစိတ်တည်ငြိမ်မှုမှ ပေါက်ဖွားသော နူးညံ့သိမ်မွေ့၍ ထိန်းထားသော အပြုံးကိုသာ ပြသရမည်—အခြားသူအကြောင်း ရယ်စရာကို တွေ့လျှင် အော်ဟစ်မရယ်၊ မိုက်မဲသူကဲ့သို့လည်း မပြုမူရ။»
Verse 38
लाभे न हर्षयेद् यस्तु न व्यथेद् योडवमानित: । असम्मूढश्न यो नित्यं स राजवसतिं वसेत्,जो अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होनेपर (अधिक) हर्षित नहीं होता अथवा अपमानित होनेपर अधिक व्यथाका अनुभव नहीं करता और सदा मोहशून्य होकर विवेकसे काम लेता है, वही राजाके यहाँ सुखपूर्वक रह सकता है
ဓောမျာက ပြောသည်— «အကျိုးအမြတ် ရလာသော် အလွန်အကျွံ မပျော်ရွှင်သူ၊ အရှက်ခွဲခံရသော် မတုန်လှုပ်သူ၊ အမြဲ မမောဟဘဲ ခွဲခြားသိမြင်နိုင်သူ—ထိုသူသာ ဘုရင်နန်းတော်၌ အေးချမ်းစွာ နေနိုင်သည်။»
Verse 39
राजानं राजपुत्रं वा संवर्णयति य: सदा | अमात्य: पण्डितो भूत्वा स चिरं तिष्ठते प्रिय:,जो बुद्धिमान सचिव सदा राजा अथवा राजकुमारकी प्रशंसा करता रहता है, वही राजाके यहाँ उसका प्रीतिपात्र होकर दीर्घकालतक टिक सकता है
ဓောမျာက ပြောသည်— «ဘုရင် သို့မဟုတ် ဘုရင်သားကို အမြဲတမ်း ချီးမွမ်းပြောဆိုတတ်သော ပညာရှိ အမတ်သည် ဉာဏ်ပညာရှိသူဟု သတ်မှတ်ခံရပြီး၊ အုပ်စိုးရှင်၏ ချစ်ခင်မှုကို ရရှိကာ အချိန်ကြာမြင့်စွာ မိမိနေရာကို တည်မြဲစွာ ထိန်းထားနိုင်သည်။»
Verse 40
प्रगृहीतश्च॒ यो5मात्यो निगृहीतस्त्वकारणै: । न निर्वदति राजानं लभते सम्पदं पुन:,यदि कोई मन्त्री पहले राजाका कृपापात्र रहा हो और पीछे अकारण उसे दण्ड भोगना पड़ा हो, उस दशामें भी जो राजाकी निन्दा नहीं करता, वह पुनः अपने पूर्व वैभवको प्राप्त कर लेता है। जो बुद्धिमान् राजाके आश्रित रहकर जीवननिर्वाह अथवा उसके राज्यमें निवास करता है, उसे राजाके सामने अथवा पीठ पीछे भी उसके गुणोंकी ही चर्चा करनी चाहिये
ဓောမျာက ပြောသည်– မင်း၏အနီးကပ်အမတ်တစ်ဦးသည် ယခင်က မင်း၏အကြင်နာကို ခံစားခဲ့သော်လည်း နောက်ပိုင်း အကြောင်းမဲ့ အပြစ်ဒဏ်ခံရလျှင်တောင် မင်းကို မကဲ့ရဲ့မပြစ်တင်ပါက မိမိ၏ ယခင်စည်းစိမ်အာဏာကို ပြန်လည်ရရှိနိုင်သည်။ မင်း၏ကာကွယ်စောင့်ရှောက်မှုအောက်တွင် အသက်မွေးဝမ်းကျောင်းပြုသူ သို့မဟုတ် မင်းနိုင်ငံအတွင်း နေထိုင်သူ ပညာရှိသည် မင်းရှေ့တွင်ဖြစ်စေ နောက်ကွယ်တွင်ဖြစ်စေ မင်း၏ဂုဏ်သတ္တိများကိုသာ ချီးမွမ်းပြောဆိုသင့်သည်။
Verse 41
प्रत्यक्ष च परोक्षं च गुणवादी विचक्षण: । उपजीवी भवेद् राज्ञो विषये योडपि वा भवेत्,यदि कोई मन्त्री पहले राजाका कृपापात्र रहा हो और पीछे अकारण उसे दण्ड भोगना पड़ा हो, उस दशामें भी जो राजाकी निन्दा नहीं करता, वह पुनः अपने पूर्व वैभवको प्राप्त कर लेता है। जो बुद्धिमान् राजाके आश्रित रहकर जीवननिर्वाह अथवा उसके राज्यमें निवास करता है, उसे राजाके सामने अथवा पीठ पीछे भी उसके गुणोंकी ही चर्चा करनी चाहिये
ဓောမျာက ပြောသည်– မင်းရှေ့တွင်ဖြစ်စေ နောက်ကွယ်တွင်ဖြစ်စေ သေချာသိမြင်တတ်သောသူသည် မင်း၏ဂုဏ်သတ္တိကိုသာ ချီးမွမ်းပြောဆိုသင့်သည်။ မင်း၏ကာကွယ်စောင့်ရှောက်မှုအောက်တွင် အသက်မွေးဝမ်းကျောင်းပြုသူ သို့မဟုတ် မင်းနိုင်ငံအတွင်း နေထိုင်သူတစ်ဦးသာဖြစ်စေ ထိုသို့ သစ္စာရှိသောစကားကို ထိန်းသိမ်းရမည်။ သင်ခန်းစာမှာ ထင်ရှားသည်– အားကိုးသူ၏တာဝန်မှာ ကျေးဇူးသိတတ်ခြင်းနှင့် စကားထိန်းချုပ်ခြင်းဖြစ်၏။ မတရားအပြစ်ဒဏ်ခံရသော်လည်း မင်း၏အပေးအယူကို အပြစ်တင်ခြင်းဖြင့် မပြန်လည်ပေးဆပ်သင့်၊ တည်ကြည်သောသစ္စာသည် ယခင်အဆင့်အတန်းကို ပြန်လည်ရစေနိုင်သည်။
Verse 42
अमात्यो हि बलाद् भोक्तुं राजानं प्रार्थयेत यः । न स तिष्ठेच्चिरं स्थानं गच्छेच्च प्राणसंशयम्,जो मन्त्री राजाको बलपूर्वक अपने अधीन करना चाहता है, वह अधिक समयतक अपने पदपर नहीं टिक सकता। इतना ही नहीं, उसके प्राणोंपर भी संकट आ जाता है
ဓောမျာက ပြောသည်– အမတ်တစ်ဦးက မင်းကို အင်အားဖြင့် ဖိအားပေးကာ မိမိအောက်သို့ ချုပ်ကိုင်၍ အာဏာကို “ခံစား” လိုပါက ထိုသူသည် ရာထူး၌ ကြာရှည်မတည်နိုင်။ ထို့ပြင် မကြာမီ မိမိအသက်တိုင်အောင် အန္တရာယ်ထဲသို့ ကျရောက်လိမ့်မည်။
Verse 43
श्रेयः सदा55त्मनो दृष्ट्वा परं राज्ञा न संवदेत् विशेषयेच्च राजानं योग्यभूमिषु सर्वदा,अपनी भलाई अथवा लाभ देखकर दूसरेको सदा राजाके साथ न मिलावे; न बातचीत करावे। उपयुक्त स्थान और अवसर देखकर सदा राजाकी विशेषता प्रकट करे
မိမိအကျိုးစီးပွားကို အဓိကထားမြင်၍ ကိုယ်ကျိုးအတွက် မင်းနှင့် အမြဲတမ်း လျှို့ဝှက်ပေါင်းဖက်လိုက်စားခြင်း မပြုသင့်၊ မလိုအပ်သော ရင်းနှီးစကားဝိုင်းဖြင့် မင်းကို မကြာခဏ မနှောင့်ယှက်သင့်။ ထိုအစား သင့်လျော်သော နေရာနှင့် အခါအခွင့်ကို ရွေးကာ မင်း၏ထူးကဲမြတ်နိုးဖွယ် အရည်အချင်းကို သင့်တင့်လျောက်ပတ်စွာ အသိအမှတ်ပြု၍ ချီးမြှောက်ကြေညာသင့်သည်—အကြံပေးမှုသည် သမာဓိရှိစေပြီး မင်းနှင့်ဆက်ဆံရေးသည် ဂုဏ်သိက္ခာမပျက်စေရန်။
Verse 44
अम्लानोबलवाउछूरश्छायेवानुगत: सदा । सत्यवादी मृदुर्दान्त: स राजवसतिं वसेत्,जो उत्साहसम्पन्न, बुद्धि-बलसे युक्त, शूरवीर, सत्यवादी, कोमलस्वभाव और जितेन्द्रिय होकर सदा छायाकी भाँति राजाका अनुसरण करता है, वही राजदरबारमें टिक सकता है
ဓောမျာက ပြောသည်– “စိတ်မပျက်မယွင်း၊ အင်အားပြည့်ဝ၍ ကြိုးစားအားထုတ်စိတ်ဓာတ်ရှိသူ၊ အရိပ်ကဲ့သို့ မင်းကို အမြဲလိုက်ပါသူ၊ စကားသစ္စာရှိ၍ အပြုအမူနူးညံ့ကာ ကိုယ်စိတ်ထိန်းချုပ်နိုင်သူသာလျှင် နန်းတော်တွင် အမှန်တကယ် တည်မြဲစွာ နေနိုင်သည်။”
Verse 45
अन्यस्मिन् प्रेष्यमाणे तु पुरस्ताद् यः समुत्पतेत् । अहं कि करवाणीति स राजवसतिं वसेत्,जब दूसरेको किसी कार्यके लिये भेजा जा रहा हो, उस समय जो स्वयं ही उठकर आगे जाय और पूछे--*मेरे लिये क्या आज्ञा है", वही राजभवनमें निवास कर सकता है
ဓောမျာက ဆိုသည်– «အခြားသူကို အလုပ်တစ်ခုအတွက် စေလွှတ်နေချိန်၌ မိမိက ချက်ချင်းထ၍ အရှေ့သို့ ဦးစွာတက်ကာ ‘ကျွန်ုပ် ဘာလုပ်ရမည်နည်း’ ဟု မေးသောသူသာလျှင် မင်းနန်းတော်၌ နေထိုင်ရန် သင့်တော်သည်»။
Verse 46
आन्तरे चैव बाहों च राज्ञा यश्चाथ सर्वदा । आदिट्टो नैव कम्पेत स राजवसतिं वसेत्,जो राजाके द्वारा आन्तरिक (धन एवं स्त्री आदिकी रक्षा) और बाहा (शत्रुविजय आदि) कार्योंके लिये आदेश मिलनेपर कभी शंकित या भयभीत नहीं होता, वही राजाके यहाँ रह सकता है
ဓောမျာက ဆိုသည်– «မင်းက အတွင်းရေး (ဥစ္စာနှင့် အမျိုးသမီးအခန်းတို့ကို ကာကွယ်ခြင်း) နှင့် အပြင်ရေး (ရန်သူကို နှိမ်နင်း၍ အောင်မြင်မှုကို ရယူခြင်း) တို့အတွက် အမိန့်ပေးသော်လည်း သံသယကြောင့်ဖြစ်စေ ကြောက်ရွံ့ကြောင့်ဖြစ်စေ မလှုပ်မယှက် မတုန်လှုပ်သောသူသာလျှင် မင်းအိမ်တော်၌ နေထိုင်သင့်သည်»။
Verse 47
यो वै गृहेभ्य: प्रवसन् प्रियाणां नानुसंस्मरेत् । दुःखेन सुखमन्विच्छेत् स राजवसतिं वसेत्,जो घर-बार छोड़कर परदेशमें पड़ा रहनेपर भी प्रियजनों एवं अभीष्ट भोगोंका स्मरण नहीं करता और कष्ट सहकर सुख पानेकी इच्छा करता है, वही राजदरबारमें टिक सकता है
ဓောမျာက ဆိုသည်– «အိမ်ကိုစွန့်၍ နိုင်ငံခြား၌ နေထိုင်ရသော်လည်း ချစ်ခင်သူများနှင့် လိုလားသော သက်သာချမ်းသာမှုတို့ကို မကြာခဏ မမှတ်မိမနေဘဲ၊ ဒုက္ခကို ခံနိုင်၍ နောင်အကျိုးအတွက် သုခကို ရှာဖွေသောသူသာလျှင် မင်းတော်အတွင်း၌ တည်ကြည်စွာ နေနိုင်သည်»။
Verse 48
समवेषं न कुर्वीत नोच्चै: संनिहितो वसेत् । न मन्त्र बहुधा कुयदिवं राज्ञ: प्रियो भवेत्,राजाके समान वेशभूषा न धारण करे। उसके अत्यन्त निकट न रहे। उसके सामने उच्च आसनपर न बैठे। अपने साथ राजाने जो गुप्त सलाह की हो, उसे दूसरोंपर प्रकट न करे। ऐसा करनेसे ही मनुष्य राजाका प्रिय हो सकता है
ဓောမျာက ဆိုသည်– «မင်း၏ ဝတ်စားဆင်ယင်ပုံကို မတုပမိစေ။ အလွန်နီးကပ်စွာ မနေစေ။ မင်းရှေ့တွင် မြင့်သော ထိုင်ခုံပေါ် မထိုင်စေ။ မင်းနှင့် မိမိကြား ပြောဆိုခဲ့သော လျှို့ဝှက်အကြံကို အခြားသူများထံ မဖြန့်ဝေစေ။ ထိုသို့ ထိန်းသိမ်းသတိထားခြင်းနှင့် လျှို့ဝှက်မှုကြောင့်သာ မင်း၏ ချစ်ခင်မှုကို ရနိုင်သည်»။
Verse 49
न कर्मणि नियुक्त: सन् धनं किज्चिदपि स्पृशेत् । प्राप्रोति हि हरन् द्रव्यं बन्धनं यदि वा वधम्,यदि राजाने किसी कामपर नियुक्त किया हो, तो उसमें घूसके रूपमें थोड़ा भी धन न ले; क्योंकि जो इस प्रकार चोरीसे धन लेता है, उसे एक दिन बन्धन अथवा वधका दण्ड भोगना पड़ता है
ဓောမျာက ဆိုသည်– «အလုပ်တစ်ခုအတွက် ခန့်အပ်ထားသူသည် ငွေကြေးကို အနည်းငယ်တောင် မထိမခိုက် မယူသင့်။ ထိုသို့ ပစ္စည်းကို ခိုးယူသူသည် တစ်နေ့တွင် ချုပ်နှောင်ခြင်း သို့မဟုတ် သတ်ဖြတ်ခြင်း၏ ဒဏ်ကို ခံရတတ်သည်»။
Verse 50
यान॑ वस्त्रमलड्कारं यच्चान्यत् सम्प्रयच्छति । तदेव धारयेन्नित्यमेवं प्रियतरो भवेत्,राजा प्रसन्न होकर सवारी, वस्त्र, आभूषण तथा और भी जो कोई वस्तु दे, उसीको सदा धारण करे या उपयोगमें लावे। ऐसा करनेसे वह राजाका अधिक प्रिय होता है
မင်းကြီးက ပေးအပ်သနားသော စီးနင်းယာဉ်၊ အဝတ်အစား၊ အလှဆင်ပစ္စည်းများ သို့မဟုတ် အခြားသော အရာဝတ္ထုမည်သည့်အရာမဆို—ထိုပေးအပ်သနားသည့်အရာကိုပင် အမြဲတမ်း ဝတ်ဆင်သုံးစွဲရမည်။ ထိုသို့ မင်း၏ကျေးဇူးကို တည်တံ့စွာ လက်ခံကာ မြင်သာအောင် အသုံးပြုနေခြင်းကြောင့် မင်းကြီး၏ချစ်ခင်မှုကို ပိုမိုရရှိလာမည်။
Verse 51
एवं संयम्य चित्तानि यत्नतः पाण्डुनन्दना: । संवत्सरमिमं तात तथाशीला बुभूषत । अथ स्वविषयं प्राप्प यथाकामं करिष्यथ,तात युधिष्ठिर एवं पाण्डवो! इस प्रकार प्रयत्न-पूर्वक अपने मनको वशमें रखकर पूर्वोक्त रीतिसे उत्तम बर्ताव करते हुए इस तेरहवें वर्षको व्यतीत करो और इसी रूपमें रहकर ऐश्वर्य पानेकी इच्छा करो। तदनन्तर अपने राज्यमें आकर इच्छानुसार व्यवहार करना
ဓောမျာက ဆို၏—«ပाण्डု၏သားတို့၊ သတိကြီးစွာ ကြိုးစား၍ စိတ်ကို ထိန်းချုပ်ကြလော့။ ချစ်သားတို့၊ သတ်မှတ်ထားသော အကျင့်အတိုင်း စည်းကမ်းတကျဖြင့် ဤနှစ်ကို ပြည့်စုံအောင် နေထိုင်ကြလော့။ ထို့နောက် ကိုယ့်နိုင်ငံကို ပြန်လည်ရရှိသည့်အခါ မိမိစိတ်တိုင်းကျ ပြုမူနိုင်လိမ့်မည်။ ထို့ကြောင့် ယုဓိဋ္ဌိရ၊ ပाण्डဝတို့သည် ဤနှစ်ကို ကိုယ်တိုင်ထိန်းသိမ်းမှုဖြင့် ခံနိုင်ရည်ရှိစွာ ဖြတ်သန်းကာ အာဏာအုပ်ချုပ်ခွင့်ကို ပြန်လည်ရယူရန် မျှော်လင့်ကြလော့»။
Verse 52
युधिछिर उवाच अनुशिष्टा: सम भद्रं ते नैतद् वक्तास्ति कश्नन । कुन्तीमृते मातरं नो विदुरं वा महामतिम्,युधिछिर बोले--ब्रह्म! आपका भला हो। आपने हमें बहुत अच्छी शिक्षा दी। हमारी माता कुन्ती तथा महाबुद्धिमान् विदुरजीको छोड़कर दूसरा कोई नहीं है, जो हमें ऐसी बात बतावे
ယုဓိဋ္ဌိရက ပြော၏—«အို ဘြာဟ္မဏ၊ သင့်အပေါ် မင်္ဂလာရှိပါစေ။ သင်သည် ကျွန်ုပ်တို့ကို အလွန်ကောင်းမွန်စွာ သင်ကြားပေးခဲ့သည်။ ကျွန်ုပ်တို့၏ မိခင် ကုန္တီနှင့် ဉာဏ်ကြီးသော ဝိဒုရမှတပါး၊ ဤသို့သောစကားကို ကျွန်ုပ်တို့အား ပြောနိုင်သူ အခြားမရှိပါ»။
Verse 53
यदेवानन्तरं कार्य तद् भवान् कर्तुमर्हति । तारणायास्य दुःखस्य प्रस्थानाय जयाय च,अब हमें इस दुःखसागरसे पार होने, यहाँसे प्रस्थान करने और विजय पानेके लिये जो कर्तव्य आवश्यक हो, उसे आप पूर्ण करें
«ယခုချက်ချင်း နောက်တစ်ဆင့် လုပ်ရမည့်အရာကို သင်ပင် ဆောင်ရွက်သင့်သည်—ဤဒုက္ခမှ ကျွန်ုပ်တို့ကို ကူးမြောက်စေဖို့၊ ဤနေရာမှ ထွက်ခွာစေဖို့၊ နှင့် အောင်ပွဲကို ရရှိစေဖို့»။
Verse 54
वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्ततो राज्ञा धौम्यो5थ द्विजसत्तम: | अकरोद् विधिवत सर्व प्रस्थाने यद् विधीयते,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! राजा युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर विप्रवर धौम्यजीने यात्राके समय जो आवश्यक शास्त्रविहित कर्तव्य है, वह सब विधिपूर्वक सम्पन्न किया
ဝိုင်သမ္ပာယနက ဆို၏—«ဘုရင် ယုဓိဋ္ဌိရက ထိုသို့ ပြောဆိုပြီးနောက်၊ ဒွိဇတို့အထဲမှ အမြတ်ဆုံးသော ဓောမျာသည် ခရီးထွက်ရာတွင် လိုအပ်သည့် ဓမ္မသတ်အတိုင်း ပြုလုပ်ရမည့် ကိစ္စအားလုံးကို စည်းကမ်းတကျ ဆောင်ရွက်ပြီး ပြည့်စုံစွာ ပြုလုပ်လေ၏»။
Verse 55
तेषां समिध्य तानग्नीन् मन्त्रवच्च जुहाव सः । समृद्धिवृद्धिलाभाय पृथिवीविजयाय च,पाण्डवोंकी अग्निहोत्रसम्बन्धी अग्निको प्रज्वलित करके उन्होंने उनकी समृद्धि, वृद्धि, राज्यलाभ तथा पृथ्वीपर विजय-प्राप्तिके लिये वेदमन्त्र पढ़कर होम किया
ဝိုင်ရှမ္ပာယန မိန့်တော်မူသည်– သူသည် ထိုသန့်ရှင်းသော မီးပူဇော်များကို သူတို့အတွက် မီးထွန်းကာ၊ ဝေဒမန်တရများဖြင့် အာဟုတိများကို ပူဇော်လှူဒါန်း하였다။ ထိုပူဇော်မှုသည် သူတို့၏ စည်းစိမ်တိုးပွားခြင်း၊ တိုးတက်ကြီးပွားခြင်း၊ သင့်တော်သော အာဏာပိုင်ခွင့်ရရှိခြင်းနှင့် မြေပြင်ပေါ် အောင်မြင်ခြင်းတို့ကို ရည်ရွယ်သည်။ ဤကိစ္စသည် အောင်မြင်မှုကို အင်အားတစ်ခုတည်းမဟုတ်ဘဲ၊ စည်းကမ်းရှိသော ရိတုအခမ်းအနား၊ တရားသဘောနှင့် ကိုက်ညီသော ဆန္ဒ၊ သန့်ရှင်းသော စည်းမျဉ်းတရားနှင့် ညီညွတ်ခြင်းတို့၏ အကျိုးဖြစ်ကြောင်း ဖော်ပြသည်။
Verse 56
अग्नीन् प्रदक्षिणीकृत्य ब्राह्मणांश्न तपोधनान् । याज्ञसेनीं पुरस्कृत्य षडेवाथ प्रवव्रजु:,तत्पश्चात् पाण्डवोंने अग्नि तथा तपस्वी ब्राह्मणोंकी परिक्रमा करके द्रौपदीको आगे रखकर वहाँसे प्रस्थान किया। कुल छः व्यक्ति ही आसन छोड़कर एक साथ चले थे
ဝိုင်ရှမ္ပာယန မိန့်တော်မူသည်– သူတို့သည် သန့်ရှင်းသော မီးပူဇော်များနှင့် တပဿာကြွယ်ဝသော အာသီတဗြာဟ္မဏများကို လေးစားစွာ ပတ်လည်လှည့်ဝန်း (ပရဒက္ခိဏာ) ပြုကာ၊ ယာဇ္ဉစေနီ (ဒြౌပဒီ) ကို ရှေ့တန်းထားပြီး ထို့နောက် ထွက်ခွာကြသည်။ ထိုင်ရာမှ ထပြီး တစ်ပြိုင်နက် ထွက်သွားသူမှာ ခြောက်ဦးသာ ဖြစ်၍၊ ထိုအပြုအမူသည် ရိတုလေးစားမှုနှင့် စည်းကမ်းတကျ ထိန်းသိမ်းမှုဖြင့် အမှတ်အသားတင်ထားသည်။
Verse 57
गतेषु तेषु वीरेषु धौम्यो5थ जपतां वर: । अग्निहोत्राण्युपादाय पाउ्चालानभ्यगच्छत,उन पाण्डव वीरोंके चले जानेपर जपयज्ञ करनेवालोंमें श्रेष्ठ धौम्यजी उस अनग्निहोत्रसम्बन्धी अग्निको साथ लेकर पांचालदेशमें चले गये
ထိုသူရဲကောင်း ပाण्डဝတို့ ထွက်ခွာသွားပြီးနောက်၊ ဂျပ (japa) နှင့် ယဇ္ဉပုဋ္ဌာနတော်မူခြင်းတွင် အထူးထင်ရှားသော ဓောမျ (Dhaumya) သည် အဂ္နိဟောတရ မီးပူဇော်အတွက် သန့်ရှင်းသော မီးများကို ယူဆောင်ကာ ပာဉ္စာလ ပြည်သို့ သွားရောက်하였다။ ဤကဗျာသည် နေရာပြောင်းလဲနေရသည့် အဝေးရောက်ဘဝနှင့် နိုင်ငံရေးအန္တရာယ်ကြားတွင်ပင် ဝေဒရိတုများကို စနစ်တကျ ထိန်းသိမ်းကာကွယ်သည့် အရေးကြီးမှုကို ထင်ဟပ်စေသည်—ဓမ္မသည် အကျပ်အတည်းတွင် စွန့်ပစ်ခြင်းမဟုတ်ဘဲ စည်းကမ်းရှိသော ဆက်လက်တည်တံ့မှုဖြင့် ဆက်ကာသယ်ဆောင်သွားသည်။
Verse 58
इन्द्रसेनादयश्वैव यथोक्ता: प्राप्प यादवान् । रथानश्चांश्व॒ रक्षन्त: सुखमूषु: सुसंवृता:,इन्द्रसेन आदि सेवक भी पूर्वोक्त आदेश पाकर यदुवंशियोंकी नगरी द्वारकामें जा पहुँचे और वहाँ स्वयं सुरक्षित हो रथ और घोड़ोंकी रक्षा करते हुए सुखपूर्वक रहने लगे
ဝိုင်ရှမ္ပာယန မိန့်တော်မူသည်– အင်ဒ္ရစေန (Indrasena) နှင့် အခြားအမှုထမ်းတို့သည် ယခင်က ပြောထားသည့် အမိန့်ကို လက်ခံရရှိပြီး ယာဒဝတို့ထံ ရောက်ရှိ하였다။ ထိုနေရာတွင် သူတို့သည် ကာကွယ်စောင့်ရှောက်မှုကောင်းစွာ ရရှိကာ စိတ်ချလက်ချ နေထိုင်လျက်၊ ရထားများနှင့် မြင်းများကို စောင့်ရှောက်ကာ မိမိတို့အပ်နှံထားသော တာဝန်ကို သစ္စာရှိစွာ ဆောင်ရွက်နေ하였다။
Maintaining integrity and safety while serving under concealment: behaving truthfully and respectfully without revealing identity, provoking suspicion, or creating courtly conflict.
In a royal household, minimize conspicuousness: speak only when appropriate, avoid overfamiliarity and sensitive spaces, follow orders promptly, and sustain composure so that service remains useful yet non-threatening.
No explicit phalaśruti is stated; the implied result is pragmatic—security, continuity of concealment, and successful completion of the incognito year enabling later restoration.