
Adhyāya 57: Tapas–Dāna Phala (On the Fruits of Austerity and Giving)
Upa-parva: Dāna–Tapas Upadeśa (Merit of Austerity and Gifts)
Yudhiṣṭhira voices intense remorse and cognitive disorientation after hearing reflections on the war’s consequences, describing the earth as depleted of prosperous rulers and lamenting the deaths of innumerable men. He worries about the condition of noble women now deprived of husbands, sons, and male kin, and anticipates negative posthumous consequences for having participated in the killing of gurus, relatives, and allies. Seeking expiation, he asks for precise instruction on rigorous tapas. Vaiśaṃpāyana reports Bhīṣma’s measured reply: Bhīṣma frames a ‘secret and wondrous’ teaching on attainments in the afterlife, then enumerates a graded economy of merit. Tapas yields heaven, fame, longevity, enjoyments, knowledge, health, beauty, prosperity, and good fortune; other disciplines (silence, brahmacarya, ahiṃsā, teacher-service, regular śrāddha) produce specific results. The chapter then systematizes dāna: water, food, comfort, light, and items of daily life generate durable reputation and capacities; major gifts—especially cows with ritual embellishments, land, and a brahmadeya maiden—are portrayed as rescuing the donor from dark destinies, likened to a boat in an ocean. The unit closes with Yudhiṣṭhira’s approval and his communication of Bhīṣma’s counsel to the Pāṇḍavas and Draupadī, who assent.
Chapter Arc: महर्षि च्यवन के प्रभाव से राजा कुशिक और उनकी रानी को एक अलौकिक, आश्चर्यमय लोक-प्रासादों का दर्शन होता है—मानो गन्धर्वनगर पृथ्वी पर उतर आया हो। → कुशिक स्वर्णमय प्रासाद, मणिस्तम्भों की सहस्र-श्रेणियाँ, रूप्य-शिखर पर्वत, नलिनियाँ, शीत-उष्ण जल, विचित्र आसन-शयन और मधुर पक्षी-ध्वनियाँ देखता जाता है; विस्मय बढ़ता है और मन में प्रश्न उठता है—यह सब किसकी माया/तपः-शक्ति है और इसका प्रयोजन क्या है? → ‘यह महान आश्चर्य क्या है?’ सोचते हुए राजा को मणिमय खम्भों से युक्त सुवर्ण-विमान के भीतर दिव्य पर्यङ्क पर शयन करते भृगुनन्दन च्यवन का साक्षात् दर्शन होता है; वहीं से उपदेश का शिखर आता है—राजा ने इन्द्रियों और मन को जीतकर तप-आराधना सिद्ध की है, इसलिए मुनि अत्यन्त प्रसन्न हैं। → च्यवन राजा की निष्कलुषता और आराधना की प्रशंसा करते हैं—उसमें सूक्ष्मतम भी दोष नहीं—और वर/अनुग्रह देने की तत्परता प्रकट करते हैं; राजा-रानी का विस्मय श्रद्धा में रूपान्तरित होता है। → मुनि कहते हैं—‘मैं तुम पर प्रसन्न हूँ; वर ग्रहण करो’—पर अध्याय का अंत वर के चयन/फल-निर्णय की प्रतीक्षा में छोड़ देता है।
Verse 1
ऑपनआक्रात बछ। सं: चतु:पञ्चाशत्तमो5 ध्याय: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना भीष्म उवाच ततः स राजा रात्र्यन्ते प्रतिबुद्धो महामना: । कृतपूर्वालह्निकः प्रायात् सभार्यस्तद् वन॑ प्रति,भीष्मजी कहते हैं--राजन! तत्पश्चात् रात्रि व्यतीत होनेपर महामना राजा कुशिक जागे और पूर्वह्निकालके नैत्यिक नियमोंसे निवृत्त होकर अपनी रानीके साथ उस तपोवनकी ओर चल दिये
भीष्म म्हणाले—त्यानंतर रात्र संपता संपता तो महामना राजा जागा झाला. पूर्वाह्नकाळची नित्यकर्मे करून तो पत्नीसमवेत त्या वनाश्रमाकडे निघाला.
Verse 2
ततो ददर्श नृपति: प्रासादं सर्वकाउ्चनम् । मणिस्तम्भसहस्राढ्यं गन्धर्वनगरोपमम्,वहाँ पहुँचकर नरेशने एक सुन्दर महल देखा, जो सारा-का-सारा सोनेका बना हुआ था। उसमें मणियोंके हजारों खम्भे लगे हुए थे और वह अपनी शोभासे गन्धर्वनगरके समान जान पड़ता था
तेथे पोहोचल्यावर नृपतीने एक प्रासाद पाहिला, जो पूर्णतः सुवर्णमय होता. मणिरत्नांनी जडविलेले हजारो स्तंभ त्यात होते; आपल्या तेजाने तो गंधर्वनगरासारखा भासत होता.
Verse 3
तत्र दिव्यानभिप्रायान् ददर्श कुशिकस्तदा । पर्वतान् रूप्यसानूंश्व नलिनीश्व सपड़कजा:
तेथे त्या वेळी कुशिकाने दिव्य अभिप्रायाने युक्त अद्भुत दृश्ये पाहिली—रुपेरी उतार असलेले पर्वत आणि पद्म-नीलोत्पलांनी भरलेली सरोवरे; जणू तो प्रदेश शुभ व उन्नत ध्येयांकडे मन ओढणारा होता।
Verse 4
चित्रशालाक्ष विविधास्तोरणानि च भारत । शाद्वलोपचितां भूमिं तथा काञ्चनकुट्टिमाम्
भीष्म म्हणाले—हे भारत, तेथे नानाविध सुशोभित चित्रशाळा व तोरणे होती; भूमी कुठे हिरव्या गवताने आच्छादित, तर कुठे सुवर्णमंडित पक्क्या फरशीने मढलेली होती।
Verse 5
भारत! उस समय राजा कुशिकने वहाँ शिल्पियोंके अभिप्रायके अनुसार निर्मित और भी बहुत-से दिव्य पदार्थ देखे। कहीं चाँदीके शिखरोंसे सुशोभित पर्वत, कहीं कमलोंसे भरे सरोवर, कहीं भाँति-भाँतिकी चित्रशालाएँ तथा तोरण शोभा पा रहे थे। भूमिपर कहीं सोनेसे मढ़ा हुआ पक्का फर्श और कहीं हरी-हरी घासकी बहार थी ।। सहकारान् प्रफुल्लांश्व केतकोद्दालकान् वरान् | अशोकान् सहकुन्दांश्व॒ फुल्लांश्वैवातिमुक्तकान्,अमराइयोंमें बौर लगे थे। जहाँ-तहाँ केतक, उद्दालक, अशोक, कुन्द, अतिमुक्तक, चम्पा, तिलक, कटहल, बेंत और कनेर आदिके सुन्दर वृक्ष खिले हुए थे। राजा और रानीने उन सबको देखा
भीष्म म्हणाले—हे भारत, त्या वेळी राजा कुशिकाने तेथे शिल्प्यांच्या अभिप्रायानुसार निर्मित अनेक दिव्य वस्तू पाहिल्या। कुठे रुपेरी शिखरांनी शोभलेले पर्वत, कुठे कमलांनी भरलेली सरोवरे; कुठे नानाविध चित्रशाळा व तेजस्वी तोरणे। भूमीवर कुठे सुवर्णमंडित दृढ फरशी, तर कुठे हिरव्या गवताची शोभा। आंब्यांना बहर आला होता; केतक, उद्दालक, अशोक-कुंद आणि फुललेले अतिमुक्तकही दिसत होते—म्हणून तो प्रदेश समृद्धी व मंगळ यांचा सुसंयोजित देखावा भासत होता।
Verse 6
चम्पकांस्तिलकान् भव्यान् पनसान् वज्जुलानपि । पुष्पितान् कर्णिकारांश्व तत्र तत्र ददर्श ह,अमराइयोंमें बौर लगे थे। जहाँ-तहाँ केतक, उद्दालक, अशोक, कुन्द, अतिमुक्तक, चम्पा, तिलक, कटहल, बेंत और कनेर आदिके सुन्दर वृक्ष खिले हुए थे। राजा और रानीने उन सबको देखा
भीष्म म्हणाले—तो तेथे तेथे फुललेले भव्य चंपक, तिलक, फणस, वंजुळ तसेच पुष्पित कर्णिकार वृक्ष पाहू लागला।
Verse 7
श्यामान् वारणपुष्पांश्व तथाष्टपदिका लता: । तत्र तत्र परिक्लृप्ता ददर्श स महीपति:,राजाने विभिन्न स्थानोंमें निर्मित श्याम तमाल, वारणपुष्प तथा अष्टपदिका लताओंका दर्शन किया
भीष्म म्हणाले—राजाने तेथे तेथे नीट मांडून लावलेले श्याम तमाल, वारणपुष्प आणि अष्टपदिका लता पाहिल्या।
Verse 8
रम्यान् पद्मोत्यलधरान् सर्वर्तुकुसुमांस्तथा । विमानप्रतिमांश्वापि प्रासादान् शैलसंनिभान्,कहीं कमल और उत्पलसे भरे हुए रमणीय सरोवर शोभा पाते थे। कहीं पर्वत-सदूश ऊँचे-ऊँचे महल दिखायी देते थे जो विमानके आकारमें बने हुए थे। वहाँ सभी ऋतुओंके फूल खिले हुए थे
कुठे कमळ-उत्पलांनी भरलेली रम्य सरोवरे शोभत होती; कुठे पर्वतासारखे उंच प्रासाद दिसत होते, जे विमानासारख्या आकाराचे होते. तेथे सर्व ऋतूंची फुले फुललेली होती.
Verse 9
शीतलानि च तोयानि क्वचिदुष्णानि भारत । आसनानि विचित्राणि शयनप्रवराणि च,भरतनन्दन! कहीं शीतल जल थे तो कहीं उष्ण, उन महलोंमें विचित्र आसन और उत्तमोत्तम शय्याएँ बिछी हुई थीं
भरतनंदना! कुठे शीतल पाणी होते तर कुठे उष्ण; आणि त्या भव्य भवनांत नानाविध आसने व उत्तमोत्तम शय्या सजविलेल्या होत्या.
Verse 10
पर्यड्कान् रत्नसौवर्णान् परारघ्यास्तरणावृतान् | भक्ष्यं भोज्यमनन्तं च तत्र तत्रोपकल्पितम्,सोनेके बने हुए रत्नजटित पलंगोंपर बहुमूल्य बिछौने बिछे हुए थे। विभिन्न स्थानोंमें अनन्त भक्ष्य, भोज्य पदार्थ रखे गये थे
सोन्याचे बनविलेले, रत्नांनी जडविलेले पलंग अत्यंत मौल्यवान आच्छादनांनी आच्छादित होते; आणि ठिकठिकाणी असंख्य भक्ष्य-भोज्य पदार्थ मांडून ठेवले होते.
Verse 11
वाणीवादान् शुकांश्वैव सारिकान् भृंगराजकान् | कोकिलान् शतपपत्रांक्ष सकोयष्टिककुक्कुभान्,समन््ततः प्रमुदितान् ददर्श सुमनोहरान् । राजाने देखा, मनुष्योंकी-सी वाणी बोलनेवाले तोते और सारिकाएँ चहक रही हैं। भृंगराज, कोयल, शतपत्र, कोयष्टि, कुक्कुभ, मोर, मुर्गे, दात्यूह, जीवजीवक, चकोर, वानर, हंस, सारस और चक्रवाक आदि मनोहर पशु-पक्षी चारों ओर सानन्द विचर रहे हैं
राजाने सर्वत्र मनोहर दृश्य पाहिले—मनुष्यांसारखी वाणी बोलणारे पोपट व सारिका, भृंगराज, कोकिळ, शतपत्र, कोयष्टि व कुक्कुभ इत्यादी; सर्वजण आनंदित होऊन चहूकडे विहरत होते.
Verse 12
मयूरान् कुक्कुटांश्चापि दात्यूहानू जीवजीवकान् । चकोरान् वानरान् हंसान् सारसां श्रक्रसाह्नयान्
मोर व कोंबडे, दात्यूह व जीवजीवक, चकोर, वानर, हंस, सारस आणि शक्रसाह्नय नावाचे पक्षीही (तेथे होते).
Verse 13
क्वचिदप्सरसां संघान् गन्धर्वाणां च पार्थिव,पृथ्वीनाथ! कहीं झुंड-की-झुंड अप्सराएँ विहार कर रही थीं। कहीं गन्धर्वोके समुदाय अपनी प्रियतमाओंके आलिंगन-पाशमें बँधे हुए थे। उन सबको राजाने देखा। वे कभी उन्हें देख पाते थे और कभी नहीं देख पाते थे
भीष्म म्हणाले—हे राजन्, पृथ्वीनाथ! कुठे अप्सरांचे समूह आनंदाने विहार करीत होते; कुठे गंधर्वांचे समुदाय आपल्या प्रियतमांच्या आलिंगन-पाशात जखडल्यासारखे दिसत होते. राजाने ते सर्व पाहिले—पण कधी दिसत, कधी दिसत नव्हते।
Verse 14
कान्ताभिरपरांस्तत्र परिष्वक्तान् ददर्श ह | न ददर्श च तान् भूयो ददर्श च पुनर्नुप:,पृथ्वीनाथ! कहीं झुंड-की-झुंड अप्सराएँ विहार कर रही थीं। कहीं गन्धर्वोके समुदाय अपनी प्रियतमाओंके आलिंगन-पाशमें बँधे हुए थे। उन सबको राजाने देखा। वे कभी उन्हें देख पाते थे और कभी नहीं देख पाते थे
तेथे राजाने काहींना त्यांच्या कान्तांच्या आलिंगनात गुंतलेले पाहिले. मग ते दिसेनासे झाले; आणि पुन्हा एकदा ते दिसले.
Verse 15
गीतध्वनिं सुमधुरं तथैवाध्यापनध्वनिम् । हंसान् सुमधुरांश्चापि तत्र शुश्राव पार्थिव:,राजा कभी संगीतकी मधुर ध्वनि सुनते, कभी वेदोंके स्वाध्यायका गम्भीर घोष उनके कानोंमें पड़ता और कभी हंसोंकी मीठी वाणी उन्हें सुनायी देती थी
तेथे राजा कधी गीताचा अतिमधुर नाद ऐके, कधी वेदस्वाध्यायाचा गंभीर घोष ऐके, आणि कधी हंसांचा गोड कलरव ऐके.
Verse 16
त॑ दृष्टवात्यद्भुतं राजा मनसाचिन्तयत् तदा । स्वप्लोडयं चित्तविभ्रंश उताहो सत्यमेव तु,उस अति अदभुत दृश्यको देखकर राजा मन-ही-मन सोचने लगे--“अहो! यह स्वप्न है या मेरे चित्तमें भ्रम हो गया है अथवा यह सब कुछ सत्य ही है
ते अति अद्भुत दृश्य पाहून राजा मनातल्या मनात विचार करू लागला—“अहो! हे स्वप्न आहे काय, की माझ्या चित्ताला भ्रम झाला आहे, की हे सर्व खरेच आहे?”
Verse 17
अहो सह शरीरेण प्राप्तो5स्मि परमां गतिम् । उत्तरान् वा कुरून् पुण्यानथवाप्यमरावतीम्,“अहो! क्या मैं इसी शरीरसे परम गतिको प्राप्त हो गया हूँ अथवा पुण्यमय उत्तरकुरु या अमरावतीपुरीमें-आ पहुँचा हूँ
“अहो! काय मी याच देहासह परम गतीला पोहोचलो आहे? की पुण्यमय उत्तरकुरु देशात आलो आहे—की देवांची अमरावती नगरीत?”
Verse 18
किंचेदं महदाश्चर्य सम्पश्यामीत्यचिन्तयत् । एवं संचिन्तयन्नेव ददर्श मुनिपुंगवम्,“यह महान् आश्वर्यकी बात जो मुझे दिखायी दे रही है, क्या है?” इस तरह वे बारंबार विचार करने लगे। राजा इस प्रकार सोच ही रहे थे कि उनकी दृष्टि मुनिप्रवर च्यवनपर पड़ी
भीष्म म्हणाले—“मी जे महान् आश्चर्य पाहतो आहे, ते काय?”—असा विचार करून तो वारंवार मनन करू लागला. असे चिंतन करत असतानाच राजाची दृष्टी तपस्व्यांतील श्रेष्ठ अशा मुनिपुंगवावर पडली.
Verse 19
तस्मिन् विमाने सौवर्णे मणिस्तम्भसमाकुले । महाहें शयने दिव्ये शयानं भूगुनन्दनम्
भीष्म म्हणाले—रत्नजडित स्तंभांनी भरलेल्या त्या सुवर्ण विमानात मी भृगुवंशाचा भूषण दिव्य, महान् शय्येवर शयन करताना पाहिला.
Verse 20
मणिमय खम्भोंसे युक्त सुवर्णमय विमानके भीतर बहुमूल्य दिव्य पर्यकपर वे भृगुनन्दन च्यवन लेटे हुए थे ।। तमभ्ययात् प्रहर्षेण नरेन्द्र: सह भार्यया । अन्तर्हितस्ततो भूयक्ष्यवन: शयनं च तत्,उन्हें देखते ही पत्नीसहित महाराज कुशिक बड़े हर्षके साथ आगे बढ़े। इतनेहीमें फिर महर्षि च्यवन अन्तर्धान हो गये। साथ ही उनका वह पलंग भी अदृश्य हो गया
मणिमय स्तंभांनी युक्त त्या सुवर्ण विमानात, बहुमूल्य दिव्य पर्यंकावर भृगुनंदन च्यवन शयन करत होते. त्यांना पाहताच नरेन्द्र कुशिक पत्नीसमवेत हर्षाने पुढे गेले; पण त्याच क्षणी महर्षि च्यवन आणि ती शय्याही अंतर्धान पावली.
Verse 21
ततोडन्यस्मिन् वनोद्देशे पुनरेव ददर्श तम् | कौश्यां बृस्यां समासीनं जपमानं महाव्रतम्,तदनन्तर वनके दूसरे प्रदेशमें राजाने फिर उन्हें देखा, उस समय वे महान् व्रतधारी महर्षि कुशकी चटाईपर बैठकर जप कर रहे थे
त्यानंतर वनाच्या दुसऱ्या भागात राजाने त्यांना पुन्हा पाहिले. त्या वेळी महान् व्रतधारी महर्षि कुशासनावर बसून मंत्रजपात तल्लीन होते.
Verse 22
एवं योगबलाद् विप्रो मोहयामास पार्थिवम् । क्षणेन तद् वनं॑ चैव ते चैवाप्सरसां गणा:,इस प्रकार ब्रह्मर्षि च्यवनने अपनी योगशक्तिसे राजा कुशिकको मोहमें डाल दिया। एक ही क्षणमें वह वन, वे अप्सराओंके समुदाय, गन्धर्व और वृक्ष सब-के-सब अदृश्य हो गये। नरेश्वर! गंगाका वह तट पुनः शब्द-रहित हो गया
अशा प्रकारे योगबलाने त्या ब्रह्मर्षींनी पार्थिवाला मोहात पाडले. एका क्षणात ते वन आणि अप्सरांचे ते गण—सर्वच दृष्टीआड झाले.
Verse 23
गन्धर्वा: पादपाश्रैव सर्वमन्तरधीयत । नि:शब्दम भवच्चापि गंगाकूलं॑ पुनर्न॒ूप,इस प्रकार ब्रह्मर्षि च्यवनने अपनी योगशक्तिसे राजा कुशिकको मोहमें डाल दिया। एक ही क्षणमें वह वन, वे अप्सराओंके समुदाय, गन्धर्व और वृक्ष सब-के-सब अदृश्य हो गये। नरेश्वर! गंगाका वह तट पुनः शब्द-रहित हो गया
भीष्म म्हणाले—गंधर्व आणि वृक्षसुद्धा क्षणार्धात सर्वचे सर्व दृष्टीआड झाले. आणि हे नरेश्वर, गंगेचा तो तीर पुन्हा पूर्णतः निःशब्द झाला.
Verse 24
कुशवल्मीकभूयिष्ठं बभूव च यथा पुरा । ततः स राजा कुशिक: सभार्यस्तेन कर्मणा,वहाँ पहलेके ही समान कुश और बाँबीकी अधिकता हो गयी। तत्पश्चात् पत्नीसहित राजा कुशिक ऋषिका वह महान् अद्भुत प्रभाव देखकर उनके उस कार्यसे बड़े विस्मयको प्राप्त हुए। इसके बाद हर्षमग्न हुए कुशिकने अपनी पत्नीसे कहा--
तो प्रदेश पूर्वीप्रमाणेच पुन्हा कुशगवताने व वारुळांनी दाट झाला. ते अद्भुत कार्यफल पाहून राजा कुशिक पत्नीसमवेत महान् विस्मयाने स्तब्ध झाला.
Verse 25
विस्मयं परम॑ प्राप्तस्तद् दृष्टया महदद्भुतम् । ततः प्रोवाच कुशिको भार्या हर्षसमन्वित:,वहाँ पहलेके ही समान कुश और बाँबीकी अधिकता हो गयी। तत्पश्चात् पत्नीसहित राजा कुशिक ऋषिका वह महान् अद्भुत प्रभाव देखकर उनके उस कार्यसे बड़े विस्मयको प्राप्त हुए। इसके बाद हर्षमग्न हुए कुशिकने अपनी पत्नीसे कहा--
ते महान् अद्भुत दृश्य पाहून कुशिक परम विस्मयाने भरून गेला. मग हर्षाने युक्त होऊन राजा कुशिक आपल्या पत्नीशी बोलू लागला.
Verse 26
पश्य भद्ठे यथा भावाश्षित्रा दृष्टा: सुदुर्लभा: । प्रसादाद् भगुमुख्यस्य किमन्यत्र तपोबलात्
हे भद्रे, पाहा—किती विचित्र व अत्यंत दुर्लभ भाव आपण प्रत्यक्ष पाहिले. भृगुकुलश्रेष्ठाच्या प्रसादावाचून, तपोबलाशिवाय, हे अन्यथा कसे घडेल?
Verse 27
“कल्याणी! देखो, हमने भूगुकुलतिलक च्यवन मुनिकी कृपासे कैसे-कैसे अद्भुत और परम दुर्लभ पदार्थ देखे हैं। भला, तपोबलसे बढ़कर और कौन-सा बल है? ।। तपसा तदवाप्यं हि यत् तु शक््यं मनोरथै: । त्रैलोक्यराज्यादपि हि तप एव विशिष्यते,“जिसकी मनके द्वारा कल्पना मात्र की जा सकती है, वह वस्तु तपस्यासे साक्षात् सुलभ हो जाती है। त्रिलोकीके राज्यसे भी तप ही श्रेष्ठ है
कल्याणी! भृगुकुलतिलक च्यवन मुनींच्या कृपेने आपण किती तरी अद्भुत व परम दुर्लभ पदार्थ पाहिले. तपोबलापेक्षा मोठे बल कोणते? जे मन केवळ मनोरथाने कल्पू शकते, ते तपस्येने प्रत्यक्ष प्राप्त होते. त्रैलोक्याच्या राज्यापेक्षाही तपच श्रेष्ठ आहे.
Verse 28
तपसा हि सुतप्तेन शक््यो मोक्षस्तपोबलात् । अहो प्रभावो ब्रह्मार्षेक्ष्यवनस्य महात्मन:,“अच्छी तरह तपस्या करनेपर उसकी शक्तिसे मोक्षतक मिल सकता है। इन ब्रह्मर्षि महात्मा च्यवनका प्रभाव अद्भुत है
भीष्म म्हणाले— जेव्हा तपस्या खरोखरच आणि अत्यंत तीव्रतेने केली जाते, तेव्हा त्या तपोबलाने मोक्षही प्राप्त होऊ शकतो. अहो! महात्मा ब्रह्मर्षि च्यवनांचा प्रभाव किती अद्भुत आहे!
Verse 29
इच्छयैष तपोवीर्यादन्यॉललोकान् सृजेदपि । ब्राह्मणा एव जायेरन् पुण्यवाग्बुद्धिकर्मण:
भीष्म म्हणाले— तपस्येतून उत्पन्न झालेल्या सामर्थ्याने तो केवळ इच्छामात्रानेही अन्य लोकांची सृष्टी करू शकतो; आणि त्या लोकांत फक्त ब्राह्मणच जन्म घेतील— ज्यांची वाणी, बुद्धी आणि कर्म पुण्य व पवित्र असतील.
Verse 30
'ये इच्छा करते ही अपनी तपस्याकी शक्तिसे दूसरे लोकोंकी सृष्टि कर सकते हैं। इस पृथ्वीपर ब्राह्मण ही पवित्रवाक्, पवित्रबुद्धि और पवित्र कर्मवाले होते हैं ।। उत्सहेदिह कृत्वैव को<न्यो वै च्यवनादते । ब्राह्मण्यं दुर्लभ लोके राज्यं हि सुलभं नरै:,“महर्षि च्यवनके सिवा दूसरा कौन है, जो ऐसा महान् कार्य कर सके? संसारमें मनुष्योंको राज्य तो सुलभ हो सकता है, परंतु वास्तविक ब्राह्मणत्व परम दुर्लभ है
भीष्म म्हणाले— जे केवळ संकल्प करताच तपोबलाने अन्य लोकांचीही सृष्टी करू शकतात, ते असे महात्मे होत. या पृथ्वीवर पवित्र वाणी, पवित्र बुद्धी आणि पवित्र कर्म असणारे ब्राह्मणच आहेत. महर्षि च्यवनांशिवाय येथे दुसरा कोण असा महान पराक्रम करू शकेल? मनुष्यांना राज्य मिळणे सुलभ असू शकते; पण खरे ब्राह्मण्य या लोकी अत्यंत दुर्लभ आहे.
Verse 31
ब्राह्माण्यस्य प्रभावाद्धि रथे युक्तौ स्वधुर्यवत् । इत्येवं चिन्तयान: स विदितश्न्यवनस्य वै,“ब्राह्मणत्वके प्रभावसे ही महर्षिने हम दोनोंको अपने वाहनोंकी भाँति रथमें जोत दिया था।” इस तरह राजा सोच-विचार कर ही रहे थे कि महर्षि च्यवनको उनका आना ज्ञात हो गया
‘ब्राह्मण्याच्या प्रभावामुळेच महर्षींनी आम्हा दोघांना आपल्या वाहकांसारखे रथाला जुंपले होते’— असा राजा मनात विचार करीत असतानाच महर्षि च्यवनांना त्याच्या आगमनाची जाणीव झाली.
Verse 32
सम्प्रेक्ष्योवाच नृपतिं क्षिप्रमागम्यतामिति । इत्युक्त: सहभार्यस्तु सो5भ्यगच्छन्महामुनिम्
पाहून महर्षींनी राजाला म्हटले— “लवकर येथे या.” असे सांगितल्यावर राजा पत्नीसमवेत त्या महामुनींकडे गेला.
Verse 33
शिरसा वन्दनीयं तमवन्दत च पार्थिव: । उन्होंने राजाकी ओर देखकर कहा--'भूपाल! शीघ्र यहाँ आओ।” उनके इस प्रकार आदेश देनेपर पत्नीसहित राजा उनके पास गये तथा उन वन्दनीय महामुनिको उन्होंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया ।। तस्याशिष: प्रयुज्याथ स मुनिस्तं नराधिपम्
भीष्म म्हणाले—त्या पार्थिवाने मस्तक झुकवून त्या वंदनीय महामुनींना प्रणाम केला. मग मुनिंनी आशीर्वाद देऊन त्या नराधिपाला संबोधून सांगितले—धर्म टिकविण्यासाठी राजतेजही विनयाने, तप व ज्ञानाचा मान राखूनच वापरावे.
Verse 34
ततः प्रकृतिमापन्नो भार्गवो नूपते नृपम्
त्यानंतर भार्गव आपल्या स्वाभाविक स्थितीत येऊन राजाला म्हणाले.
Verse 35
राजन् सम्यग् जितानीह पञड्च पज्च स्वयं त्वया
हे राजन्, येथे तू स्वतःच्या पुरुषार्थाने पाच आणि पाच यांना सम्यक् रीतीने जिंकले आहेस.
Verse 36
सम्यगाराधित: पुत्र त्वया प्रवदतां वर
वत्सा, तू सम्यक् आराधना केली आहेस; म्हणून देण्याजोग्या वरांपैकी श्रेष्ठ वर माग.
Verse 37
अनुजानीहि मां राजन् गमिष्यामि यथागतम्
हे राजन्, मला आज्ञा द्या; मी जसा आलो तसाच परत जाईन.
Verse 38
0 &.* 7 एप कतचजत णः हपफ तक ज्ज्ल्च्य कण का यक्ुम्त्ाप ग ः 2० [! 7472 5५2 ५ ॥#/ ८ कुशिक उवाच अग्निमध्ये गतेनेव भगवन् संनिधौ मया
कुशिक म्हणाला— भगवन्, आपल्या सान्निध्यात मला असे वाटते की जणू मी अग्नीच्या मध्यातच गेलो आहे।
Verse 39
वर्तितं भूगुशार्दूल यन्न दग्धो5स्मि तद् बहु । एष एव वरो मुख्य: प्राप्तो मे भूगुनन्दन
कुशिक म्हणाला— हे भृगुशार्दूल, या कसोटीतून जाऊनही मी दग्ध झालो नाही— हेच माझ्यासाठी महान वर आहे। हे भृगुनंदन, हाच मला प्राप्त झालेला सर्वोत्तम वर आहे।
Verse 40
कुशिक बोले--भगवन्! भृगुश्रेष्ठी मैं आपके निकट उसी प्रकार रहा हूँ, जैसे कोई प्रज्वलित अग्निके बीचमें खड़ा हो। उस अवस्थामें रहकर भी मैं जलकर भस्म नहीं हुआ, यही मेरे लिये बहुत बड़ी बात है। भृगुनन्दन! यही मैंने महान् वर प्राप्त कर लिया ।। यत् प्रीतोडसि मया ब्रह्मन् कुलं त्रातं च मेडनघ । एष मे&नुग्रहो विप्र जीविते च प्रयोजनम्,निष्पाप ब्रह्मर्ष! आप जो प्रसन्न हुए हैं तथा आपने जो मेरे कुलको नष्ट होनेसे बचा दिया, यही मुझपर आपका भारी अनुग्रह है। और इतनेसे ही मेरे जीवनका सारा प्रयोजन सफल हो गया
कुशिक म्हणाला— भगवन्, भृगुश्रेष्ठ, मी आपल्या जवळ असा राहिलो की जणू प्रज्वलित अग्नीच्या मध्यात उभा आहे। तरीही मी जळून भस्म झालो नाही— हेच माझ्यासाठी महान आश्चर्य आहे। हे भृगुनंदन, हाच मी महान वर प्राप्त केला आहे। हे ब्राह्मण, आपण माझ्यावर प्रसन्न झाला आहात आणि माझ्या कुलाला विनाशापासून वाचविले— हाच माझ्यावर आपला मोठा अनुग्रह आहे। हे निष्पाप ब्रह्मर्षी, एवढ्यानेच माझ्या जीवनाचे प्रयोजन सिद्ध झाले।
Verse 41
एतदू् राज्यफलं चैव तपसश्न॒ फलं मम । यदि त्वं प्रीतिमान् विप्र मयि वै भूगुनन्दन
कुशिक म्हणाला— हे विप्र, हे भृगुनंदन, जर आपण माझ्यावर खरोखर प्रसन्न असाल, तर हेच माझ्या राज्याचे फळ आणि हेच माझ्या तपाचे फळ आहे।
Verse 42
अस्ति मे संशय: कश्चित् तन्मे व्याख्यातुमहसि
कुशिक म्हणाला— माझ्या मनात एक संशय आहे; तो मला स्पष्ट करून सांगावा।
Verse 53
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ
अशा प्रकारे श्रीमहाभारताच्या अनुशासनपर्वातील दानधर्मपर्वात च्यवन व कुशिक यांच्या संवादविषयक त्रेपन्नावा अध्याय समाप्त झाला।
Verse 54
भृगुनन्दन! यही मेरे राज्यका और यही मेरी तपस्याका भी फल है। विप्रवर! यदि आपका मुझपर प्रेम हो तो मेरे मनमें एक संदेह है, उसका समाधान करनेकी कृपा करें ।। इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादे चतुः:पञ्चाशत्तमो5ध्याय:
भृगुनंदना! हेच माझ्या राज्याचे फळ आहे आणि हेच माझ्या तपस्येचेही फळ आहे। विप्रवर! जर माझ्यावर तुमचा स्नेह असेल, तर माझ्या मनात एक संशय आहे—कृपा करून त्याचे निरसन करा। इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादे चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः।
Verse 123
समन््ततः प्रमुदितान् ददर्श सुमनोहरान् । राजाने देखा, मनुष्योंकी-सी वाणी बोलनेवाले तोते और सारिकाएँ चहक रही हैं। भृंगराज, कोयल, शतपत्र, कोयष्टि, कुक्कुभ, मोर, मुर्गे, दात्यूह, जीवजीवक, चकोर, वानर, हंस, सारस और चक्रवाक आदि मनोहर पशु-पक्षी चारों ओर सानन्द विचर रहे हैं
राजाने सर्वत्र अत्यंत प्रसन्न व मनोहर दृश्य पाहिले। मनुष्यांसारखी वाणी बोलणारे पोपट व मैना किलबिलत होते। भृंगराज, कोकिळा, शतपत्र, कोयष्टि, कुक्कुभ, मोर, कोंबडे, दात्यूह, जीवजीवक, चकोर, वानर, हंस, सारस आणि चक्रवाक इत्यादी मनोहर पशु-पक्षी सर्वत्र आनंदाने संचार करीत होते।
Verse 336
निषीदेत्यब्रवीद् धीमान् सान्त्वयन् पुरुषर्षभ: । तब उन पुरुषप्रवर बुद्धिमान् मुनिने राजाको आशीर्वाद देकर सान्त्वना प्रदान करते हुए कहा--'“आओ बैठो”'
तेव्हा त्या पुरुषश्रेष्ठ राजाला सान्त्वना देत बुद्धिमान् मुनिने आशीर्वाद देऊन मृदुवाणीने म्हटले—“या, बसा।”
Verse 346
उवाच श्लक्ष्णया वाचा तर्पयन्निव भारत | भरतवंशी नरेश! तदनन्तर स्वस्थ होकर भृगुपुत्र च्यवन मुनि अपनी स्निग्ध मुधर वाणीद्वारा राजाको तृप्त करते हुए-से बोले--
भरतवंशी नरेशा! त्यानंतर स्वस्थ होऊन भृगुपुत्र च्यवन मुनि स्निग्ध, श्लक्ष्ण व मधुर वाणीने—जणू तृप्त करीत—राजाशी बोलू लागले।
Verse 353
मनः:षष्ठानीन्द्रियाणि कृच्छान्मुक्तोडसि तेन वै । “राजन! तुमने पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों और छठे मनको अच्छी तरह जीत लिया है। इसीलिये तुम महान् संकटसे मुक्त हुए हो
भीष्म म्हणाले—राजन्, तू पाचही इंद्रिये आणि सहावे मन यांना पूर्णपणे जिंकले आहेस; म्हणूनच तू महान् संकटातून मुक्त झालास।
Verse 363
नहि ते वृजिनं किंचित् सुसूक्ष्ममपि विद्यते । “वक्ताओंमें श्रेष्ठ पुत्र! तुमने भलीभाँति मेरी आराधना की है। तुम्हारे द्वारा कोई छोटे- से-छोटा या सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अपराध भी नहीं हुआ है
भीष्म म्हणाले—पुत्रा, तुझ्यात किंचितही अधर्म नाही—अतिसूक्ष्मसुद्धा नाही। तू माझी योग्य रीतीने सेवा-आराधना केली आहेस; म्हणून तू अगदी लहान दोषापासूनही मुक्त आहेस।
Verse 3736
प्रीतो5स्मि तव राजेन्द्र वरश्न प्रतिगृह्मताम् । “राजन! अब मुझे विदा दो। मैं जैसे आया था, वैसे ही लौट जाऊँगा। राजेन्द्र! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ; अतः तुम कोई वर माँगो”
भीष्म म्हणाले—राजेंद्र, मी तुझ्यावर अत्यंत प्रसन्न आहे; म्हणून एक वर स्वीकार. आता मला निरोप दे; मी जसा आलो होतो तसाच परत जाईन।
Yudhiṣṭhira confronts the ethical aftermath of kin-slaying and guru-slaying in a civil war: how to understand culpability, the suffering of survivors (especially bereaved women), and the prospect of adverse karmic destinies.
Expiation and restoration are operationalized through disciplined practices: tapas and targeted dāna are presented as structured means to generate merit, cultivate virtues, and re-anchor social order after collapse.
Yes in functional form: the chapter repeatedly attaches explicit ‘phala’ (fruits) to practices—asserting predictable outcomes in this world and posthumously (e.g., heaven, reputation, rescue from dark destinies), thereby positioning the teaching as an efficacy-mapped ethical manual.