Adhyaya 59
Sabha ParvaAdhyaya 5923 Verses

Adhyaya 59

Adhyāya 59: Vidura’s Admonition to Duryodhana after the Summons of Draupadī (सभा पर्व)

Upa-parva: Dyūta-anunaya / Vidura-nīti in the Dice-Game Aftermath (Sabhā-parva context)

The chapter opens with Duryodhana instructing the chamberlain (kṣattar) to bring Draupadī promptly to the assembly and to have her undertake menial cleaning, framing the command as a celebration of the Pandavas’ defeat. Vidura replies with a sequence of tightly linked warnings: Duryodhana is depicted as bound by the ‘noose’ of delusion, provoking forces beyond his control; anger is likened to handling deadly serpents; and Draupadī is argued not to be legitimately reduced to servitude because she was staked by one lacking rightful agency (anīśa) at the time of the wager. Vidura further characterizes gambling as a generator of enmity and great danger, and he develops an ethics of speech: avoid cruel, inflammatory, and destabilizing words whose effects return upon the speaker. Through analogies (self-harmful fruit, perilous door to naraka, inversions where stones float and boats sink), the counsel culminates in a prognosis that the Kuru line is approaching a comprehensive collapse because salutary advice is not heard and greed alone increases.

Chapter Arc: राजसूय-यश से दीप्त पाण्डव सभा में समस्त नरेश यथार्ह आसनों पर विराजते हैं; उसी भव्य शान्ति के बीच शकुनि का द्यूत-प्रस्ताव एक अशुभ छाया की तरह उतरता है। → शकुनि युधिष्ठिर को खेल के लिए उकसाता है। युधिष्ठिर द्यूत को ‘निकृति’ (छल), ‘पाप’ और क्षात्र-धर्म से परे बताकर आपत्ति करता है—जहाँ न पराक्रम है, न स्थिर नीति। फिर भी सभा-धर्म, क्षत्रिय-प्रतिस्पर्धा और चुनौती-स्वीकार की मर्यादा उसे खींचती है। दुर्योधन बीच में आकर कहता है कि दाँव पर धन-रत्न वह देगा, पर खेलेगा उसका मामा शकुनि—यानी खेल असमान और पूर्व-नियोजित होने का संकेत स्पष्ट होता जाता है। → युधिष्ठिर का निर्णायक प्रतिवाद—‘दूसरे के लिए दूसरे का जुआ मुझे विषम प्रतीत होता है’—और उसी क्षण दुर्योधन का कठोर उत्तर कि दाँव वह लगाएगा और शकुनि उसकी ओर से खेलेगा; यह घोषणा द्यूत को ‘प्रतिस्पर्धा’ से ‘षड्यंत्र’ में बदल देती है। → सभा में नियम-रूपरेखा बनती है: दुर्योधन दाँव देगा, शकुनि खेलेगा, और युधिष्ठिर को चुनौती स्वीकार करने के लिए नैतिक दबाव में रखा जाएगा। अध्याय का अंत निर्णय की दहलीज़ पर है—विवेक ने चेताया, पर प्रतिष्ठा और सभा-रीति ने जकड़ लिया। → युधिष्ठिर क्या द्यूत से विनिवृत्त होंगे, या ‘क्षत्रिय-लज्जा’ के नाम पर उसी खेल में उतरेंगे जो छल की गंध दे रहा है?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २३६ श्लोक मिलाकर कुल ६१३ “लोक हैं) भस्न्यैमा+ज () अिमान- एकोनषशष्टितमो< ध्याय: जूएके अनौचित्यके सम्बन्धमें युधिष्ठदिर और शकुनिका संवाद वैशम्पायन उवाच प्रविश्य तां सभां पार्था युधिष्ठिरपुरोगमा: । समेत्य पार्थिवान्‌ सर्वान्‌ पूजा्हनिभिपूज्य च,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! युधिष्ठिर आदि कुन्तीकुमार उस सभामें पहुँचकर सब राजाओंसे मिले। अवस्थाक्रमके अनुसार समस्त पूजनीय राजाओंका बारी- बारीसे सम्मान करके सबसे मिलने-जुलनेके पश्चात्‌ वे यथायोग्य सुन्दर रमणीय गलीचोंसे युक्त विचित्र आसनोंपर बैठे

វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ ព្រះបាទជនមេជ័យ! ព្រះអង្គយុធិស្ឋិរ ជាមុខមាត់ នាំព្រះរាជកុមារបណ្ឌវៈចូលទៅក្នុងសភារាជវាំង។ ពួកគេបានជួបព្រះមហាក្សត្រទាំងអស់ដែលមានវត្តមាន ហើយបានគោរពសក្ការៈដល់អ្នកគួរគោរពតាមលំដាប់ឋានានុក្រម។ បន្ទាប់ពីបានសួរសុខទុក្ខ និងបំពេញកិច្ចគោរពរួច ពួកគេក៏អង្គុយតាមសមគួរ លើអាសនៈចម្រុះដ៏វិចិត្រ ដែលមានកម្រាលព្រំស្រស់ស្អាត និងគ្រឿងបំពាក់អមអាសនៈយ៉ាងរមណីយ។

Verse 2

यथावय: समेयाना उपविष्टा यथार्हतः । आसजनेषु विचित्रेषु स्पर्थ्यास्तरणवत्सु च,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! युधिष्ठिर आदि कुन्तीकुमार उस सभामें पहुँचकर सब राजाओंसे मिले। अवस्थाक्रमके अनुसार समस्त पूजनीय राजाओंका बारी- बारीसे सम्मान करके सबसे मिलने-जुलनेके पश्चात्‌ वे यथायोग्य सुन्दर रमणीय गलीचोंसे युक्त विचित्र आसनोंपर बैठे

វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ ព្រះបាទជនមេជ័យ! ពេលពួកគេមកប្រជុំគ្នារួច ពួកគេអង្គុយតាមសមគួរនឹងអាយុ និងឋានៈ—លើអាសនៈចម្រុះដ៏រុងរឿង ដែលមានកម្រាលព្រំ និងគ្រឿងគ្របដណ្តប់អមអាសនៈគួរឲ្យសរសើរ។ នេះជារូបភាពនៃធម៌ក្នុងសាលារាជ្យ៖ គោរពអ្នកចាស់ និងអ្នកមានកិត្តិយស ដោយលំដាប់លំដោយ ការសមរម្យ និងការទទួលភ្ញៀវ។

Verse 3

तेषु तत्रोपविष्टेषु सर्वेष्वथ नृपेषु च शकुनि: सौबलस्तत्र युधिष्ठिरमभाषत,उनके एवं सब नरेशोंके बैठ जानेपर वहाँ सुबलकुमार शकुनिने युधिष्ठिरसे कहा

វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ ពេលបណ្ដាព្រះមហាក្សត្រទាំងអស់អង្គុយរួចហើយ នៅទីនោះ សកុនិ កូនប្រុសសុបលៈ បានបើកពាក្យនិយាយទៅកាន់យុធិស្ឋិរ។

Verse 4

शकुनिरुवाच उपस्तीर्णा सभा राजन सर्वे त्वयि कृतक्षणा: । अक्षानुप्त्वा देवनस्य समयो<स्तु युधिष्ठिर,शकुनि बोला--महाराज युधिष्ठिर! सभामें पासे फेंकनेवाला वस्त्र बिछा दिया गया है, सब आपकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं। अब पासे फेंककर जूआ खेलनेका अवसर मिलना चाहिये

សកុនិបាននិយាយថា៖ «ព្រះមហាក្សត្រ! កម្រាលសម្រាប់បោះគ្រាប់ព្រ័ត្រ ត្រូវបានប铺រួចហើយ; ព្រះមហាក្សត្រទាំងអស់កំពុងរង់ចាំព្រះអង្គ។ ឥឡូវនេះ គួរឲ្យមានឱកាសបោះគ្រាប់ព្រ័ត្រ ហើយលេងល្បែងភ្នាល់។»

Verse 5

युधिछिर उवाच निकृतिर्देवनं पापं न क्षात्रो5त्र पराक्रम: । न च नीतिर्धुवा राजन कि त्वं द्यूत॑ प्रशंभसि,युधिष्ठिरने कहा--राजन्‌! जूआ तो एक प्रकारका छल है तथा पापका कारण है! इसमें न तो क्षत्रियोचित पराक्रम दिखाया जा सकता है और न इसकी कोई निश्चित नीति ही है। फिर तुम द्यूतकी प्रशंसा क्यों करते हो?

យុធិស្ឋិរ បានមានព្រះវាចា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! ការលេងភ្នាល់គឺជាល្បិចបោកបញ្ឆោតមួយ និងជាមូលហេតុនៃបាប។ ក្នុងនោះ មិនអាចបង្ហាញវីរភាពសមនឹងក្សត្រយុទ្ធបានទេ ហើយក៏គ្មាននីតិធម៌ណាដែលប្រាកដថេរផង។ ដូច្នេះ ហេតុអ្វីបានជាអ្នកសរសើរល្បែងគ្រាប់ព្រ័ត្រនេះ?»

Verse 6

न हि मान प्रशंसन्ति निकृती कितवस्य हि । शकुने मैव नो जैषीरमार्गेण नृशंसवत्‌,शकुने! जुआरियोंका छल-कपटमें ही सम्मान होता है; सज्जन पुरुष वैसे सम्मानकी प्रशंसा नहीं करते। अतः तुम क्रूर मनुष्यकी भाँति अनुचित मार्गसे हमें जीतनेकी चेष्टा न करो

យុធិષ્ઠិរ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «កិត្តិយស មិនត្រូវបានសរសើរពិតប្រាកដទេ ប្រសិនបើវាអាស្រ័យលើល្បិចបោកបញ្ឆោត និងក្បាច់កលរបស់អ្នកលេងស៊ីសង។ ឱ សកុនិ! កុំស្វែងរកការឈ្នះយើងដោយផ្លូវអធម៌ ដូចមនុស្សសាហាវឡើយ។ កុំឲ្យជ័យជម្នះក្លាយជារបស់អ្នកដោយការបោកប្រាស់»។

Verse 7

शकुनिरुवाच यो वेत्ति संख्यां निकृती विधिज्ञ- श्रेष्टास्वखिन्न: कितवो$क्षजासु । महामतिर्यश्न जानाति द्यूतं स वै सर्व सहते प्रक्रियासु,शकुनि बोला--जिस अंकपर पासा पड़ता है, उसे जो पहले ही समझ लेता है, जो शठताका प्रतीकार करना जानता है एवं पासे फेंकने आदि समस्त व्यापारोंमें उत्साहपूर्वक लगा रहता है तथा जो परम बुद्धिमान्‌ पुरुष द्यूतक्रीड़ाविषयक सब बातोंकी जानकारी रखता है, वही जूएका असली खिलाड़ी है; वह द्यूतक्रीड़ामें दूसरोंकी सारी शठतापूर्ण चेष्टाओंको सह लेता है

សកុនិ បាននិយាយថា៖ «អ្នកលេងស៊ីសងដ៏ជំនាញពិត គឺអ្នកដែលអាចទាយដឹងជាមុនថាគ្រាប់ស៊ីសងនឹងធ្លាក់លើលេខណា; អ្នកដែលចេះច្បាប់ និងសិល្បៈនៃការបោកបញ្ឆោត; អ្នកដែលមិនបាក់ទឹកចិត្ត ទោះប្រឈមមុខនឹងគូប្រកួតខ្លាំងបំផុតក្នុងល្បែងគ្រាប់ស៊ីសង; ហើយអ្នកដែលមានបញ្ញាច្បាស់លាស់ ដឹងគ្រប់វិធីការនៃការលេងស៊ីសង។ អ្នកបែបនោះអាចទ្រាំទ្រ និងឈ្នះល្បិចកលទាំងអស់ដែលកើតឡើងក្នុងពេលលេង»។

Verse 8

अक्षग्लह: सो5भिभवेत्‌ परं न- स्तेनैव दोषो भवतीह पार्थ । दीव्यामहे पार्थिव मा विशड्कां कुरुष्य पाणं च चिरं च मा कृथा:

យុធិષ્ઠិរ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «អ្នកជំនាញល្បែងគ្រាប់ស៊ីសងនោះ នឹងអាចគ្រប់គ្រងយើងឲ្យចាញ់បានជាក់ជាមិនខាន; ប៉ុន្តែ ឱ បារថៈ កំហុសក្នុងរឿងនេះ នឹងធ្លាក់ទៅលើគាត់តែម្នាក់ឯង។ យើងចូរលេងទៅ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ—កុំសង្ស័យឡើយ។ ចូរដាក់ភ្នាល់ ហើយកុំឲ្យយឺតយ៉ាវ»។

Verse 9

कुन्तीनन्दन! यदि पासा विपरीत पड़ जाय तो हम खिलाड़ियोंमेंसे एक पक्षको पराजित कर सकता है; अतः जय-पराजय दैवाधीन पासोंके ही आश्रित है। उसीसे पराजयरूप दोषकी प्राप्ति होती है। हारनेकी शंका तो हमें भी है, फिर भी हम खेलते हैं। अतः भूमिपाल! आप शंका न कीजिये, दाँव लगाइये, अब विलम्ब न कीजिये ।। युधिषछिर उवाच एवमाहायमसितो देवलो मुनिसत्तम: । इमानि लोकद्दाराणि यो वै भ्राम्यति सर्वदा,युधिष्ठिरने कहा--मुनिश्रेष्ठ असित-देवलने, जो सदा इन लोदद्दारोंमें भ्रमण करते रहते हैं, ऐसा कहा है कि जुआरियोंके साथ शठतापूर्वक जो जूआ खेला जाता है, पाप है। धर्मानुकूल विजय तो युद्धमें ही प्राप्त होती है; अतः क्षत्रियोंके लिये युद्ध ही उत्तम है, जूआ खेलना नहीं

យុធិષ્ઠិរ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ កូនកុន្តី! ប្រសិនបើគ្រាប់ស៊ីសងធ្លាក់ផ្ទុយ វាអាចធ្វើឲ្យភាគីមួយក្នុងចំណោមអ្នកលេងចាញ់បាន; ដូច្នេះ ជ័យជម្នះ និងបរាជ័យ អាស្រ័យលើវាសនា ហើយពឹងផ្អែកលើគ្រាប់ស៊ីសងនោះឯង។ ពីនោះហើយ កំហុសដែលមានរូបជាបរាជ័យកើតឡើង។ យើងក៏មានការភ័យខ្លាចនៃការចាញ់ដែរ ប៉ុន្តែយើងនៅតែលេង។ ដូច្នេះ ឱ អ្នកអភិបាលផែនដី! កុំសង្ស័យឡើយ—ចូរដាក់ភ្នាល់ កុំឲ្យយឺតយ៉ាវឥឡូវនេះ»។ ហើយទ្រង់ក៏រំលឹកពាក្យរបស់មុនិសេដ្ឋ អសិត-ទេវល ដែលតែងតែធ្វើដំណើរឆ្លងកាត់ «ទ្វារនៃលោក» ថា៖ ការលេងស៊ីសងដោយល្បិចបោកបញ្ឆោតក្នុងចំណោមអ្នកលេងស៊ីសង គឺជាបាប; ជ័យជម្នះដែលស្របធម៌ ទទួលបានក្នុងសង្គ្រាម។ ដូច្នេះ សម្រាប់ក្សត្រិយៈ សង្គ្រាមជាផ្លូវខ្ពស់ជាង មិនមែនល្បែងស៊ីសងទេ។

Verse 10

इदं वै देवनं पापं निकृत्या कितवै: सह । धर्मेण तु जयो युद्धे तत्परं न तु देवनम्‌,युधिष्ठिरने कहा--मुनिश्रेष्ठ असित-देवलने, जो सदा इन लोदद्दारोंमें भ्रमण करते रहते हैं, ऐसा कहा है कि जुआरियोंके साथ शठतापूर्वक जो जूआ खेला जाता है, पाप है। धर्मानुकूल विजय तो युद्धमें ही प्राप्त होती है; अतः क्षत्रियोंके लिये युद्ध ही उत्तम है, जूआ खेलना नहीं

យុធិષ્ઠិរ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ការលេងស៊ីសងនេះ ជាបាបពិតប្រាកដ នៅពេលវាត្រូវបានប្រព្រឹត្តដោយល្បិចបោកបញ្ឆោត ក្នុងចំណោមអ្នកលេងស៊ីសង។ ជ័យជម្នះដែលស្របធម៌ ទទួលបានក្នុងសង្គ្រាម; ដូច្នេះ សម្រាប់ក្សត្រិយៈ ផ្លូវត្រឹមត្រូវគឺការប្តេជ្ញាចិត្តចំពោះសង្គ្រាម មិនមែនចំពោះល្បែងស៊ីសងទេ»។

Verse 11

नार्या म्लेच्छन्ति भाषाभिम्मायया न चरन्त्युत । अजिद्दमशठं युद्धमेतत्‌ सत्पुरुषव्रतम्‌,श्रेष्ठ पुरुष वाणीद्वारा किसीके प्रति अनुचित शब्द नहीं निकालते तथा कपटपूर्ण बर्ताव नहीं करते। कुटिलता और शठतासे रहित युद्ध ही सत्पुरुषोंका व्रत है

យុធិષ્ઠិរ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «បុរសសុចរិត មិនធ្វើឲ្យពាក្យសម្តីរបស់ខ្លួនសៅហ្មងដោយពាក្យមិនសមរម្យទេ ហើយក៏មិនប្រព្រឹត្តដោយល្បិចកលឡើយ។ នេះជាសង្គ្រាមដែលគ្មានភាពកោងកាច និងការបោកបញ្ឆោត; ការត្រង់ត្រូវក្នុងការប្រយុទ្ធបែបនេះហើយ ជាវ្រត និងវិន័យរបស់អ្នកធម៌»។

Verse 12

शत्तितो ब्राह्मणान्‌ नून॑ रक्षितुं प्रयतामहे । तद्‌ वै वित्त मातिदेवीर्मा जैषी: शकुने परान्‌

យុធិષ્ઠិរ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «តាមសមត្ថភាពរបស់យើង យើងកំពុងខិតខំការពារព្រះព្រាហ្មណ៍ទាំងឡាយជាក់ជាមិនខាន។ ដូច្នេះ សូមឲ្យអ្នកមានទ្រព្យ—ឱ សកុនិ—កុំឲ្យឈ្នះអ្នកដទៃ (បងប្អូនរបស់ខ្ញុំ) ឡើយ»។

Verse 13

शकुने! हमलोग जिस धनसे अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंकी रक्षा करनेका ही प्रयत्न करते हैं, उसको तुम जूआ खेलकर हमलोगोंसे हड़पनेकी चेष्टा न करो ।। निकृत्या कामये नाहं सुखान्युत धनानि वा । कितवस्येह कृतिनो वृत्तमेतन्न पूज्यते,मैं धूर्ततापूर्ण बर्तावके द्वारा सुख अथवा धन पानेकी इच्छा नहीं करता; क्योंकि जुआरीके कार्यको विद्वान्‌ पुरुष अच्छा नहीं समझते

យុធិષ્ઠិរ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ សកុនិ! កុំប៉ុនប៉ងយកទ្រព្យនោះពីយើងដោយល្បែងស៊ីសងឡើយ—ទ្រព្យដែលយើងប្រឹងប្រែងតាមសមត្ថភាព ដើម្បីការពារ និងគាំទ្រព្រះព្រាហ្មណ៍ទាំងឡាយ។ ខ្ញុំមិនប្រាថ្នាសុខសាន្ត ឬទ្រព្យសម្បត្តិ ដោយវិធីប្រព្រឹត្តបោកបញ្ឆោតទេ; ព្រោះការប្រព្រឹត្តរបស់អ្នកលេងស៊ីសង មិនត្រូវបានអ្នកប្រាជ្ញក្នុងលោកនេះគោរពថាគួរឲ្យកិត្តិយសឡើយ»។

Verse 14

शकुनिरुवाच श्रोत्रिय: श्रोत्रियानेति निकृत्यैव युधिष्ठिर । विद्वानविदुषो5भ्येति नाहुस्तां निकृतिं जना:,शकुनि बोला--युधिष्ठिर! श्रोत्रिय दिद्वान्‌ दूसरे श्रोत्रिय विद्वानोंके पास जब उन्हें जीतनेके लिये जाता है, तब शठतासे ही काम लेता है। विद्वान्‌ अविद्वानोंको शठतासे ही पराजित करता है; परंतु इसे जनसाधारण शठता नहीं कहते

សកុនិ បាននិយាយថា៖ «ឱ យុធិષ્ઠិរ! អ្នកប្រាជ្ញដែលចេះវេទៈ (ស្រូត្រីយ) ពេលចូលទៅរកអ្នកប្រាជ្ញស្រូត្រីយដទៃ ដើម្បីឈ្នះពួកគេ គេប្រើយុទ្ធសាស្ត្រប៉ុណ្ណោះ។ ដូចគ្នានេះដែរ អ្នកប្រាជ្ញឈ្នះអ្នកមិនចេះដោយវិធីឆ្លាតកល; ប៉ុន្តែមនុស្សទូទៅមិនហៅវាថា ‘ការបោកបញ្ឆោត’ ទេ»។

Verse 15

अक्षेहि शिक्षितो5भ्येति निकृत्यैव युधिष्ठिर । विद्वानविदुषो5भ्येति नाहुस्तां निकृतिं जना:,धर्मराज! जो द्यूतविद्यामें पूर्ण शिक्षित है, वह अशिक्षितोंपर शठतासे ही विजय पाता है। विद्वान्‌ पुरुष अविद्वानोंको जो परास्त करता है, वह भी शठता ही है; किंतु लोग उसे शठता नहीं कहते

យុធិષ્ઠិរ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ក្នុងល្បែងគ្រាប់ស៊ីសង អ្នកដែលបានហ្វឹកហាត់ពេញលេញ ឈ្នះអ្នកមិនបានហ្វឹកហាត់ ដោយល្បិចកលប៉ុណ្ណោះ។ ដូចគ្នានេះដែរ ពេលអ្នកប្រាជ្ញឈ្នះអ្នកមិនចេះ នោះក៏ជាប្រភេទមួយនៃការបោកបញ្ឆោតដែរ—ប៉ុន្តែមនុស្សមិនហៅវាថា ‘ការបោកបញ្ឆោត’ ទេ»។

Verse 16

अकृतान्त्र कृतास्त्रश्न दुर्बलं बलवत्तर: । एवं कर्मसु सर्वेषु निकृत्यैव युधिष्ठिर । विद्वानविदुषो5भ्येति नाहुस्तां निकृतिं जना:,धर्मराज युधिष्ठिर! अस्त्रविद्यामें निपुण योद्धा अनाड़ीको एवं बलिष्ठ पुरुष दुर्बलको शठतासे ही जीतना चाहता है। इस प्रकार सब कार्योंमें विद्वान्‌ पुरुष अविद्वानोंको शठतासे ही जीतते हैं; किंतु लोग उसे शठता नहीं कहते

បុរសខ្លាំងជាង ឈ្នះបុរសខ្សោយដោយល្បិចបោកបញ្ឆោត—ដូចជាអ្នកប្រយុទ្ធមិនទាន់ហាត់ហើយ អាចចង់ផ្តួលអ្នកជំនាញអាវុធដោយក្បត់កល។ ដូចគ្នានេះ ក្នុងកិច្ចការទាំងអស់ អ្នកមានចំណេះដឹងជាញឹកញាប់ឈ្នះអ្នកមិនដឹងដោយយុទ្ធសាស្ត្រ; ប៉ុន្តែមនុស្សមិនហៅវាថា «ការបោកបញ្ឆោត» ទេ យូធិស្ឋិរ។

Verse 17

एवं त्वं मामिहाभ्येत्य निकृतिं यदि मन्यसे । देवनाद्‌ विनिवर्तस्व यदि ते विद्यते भयम्‌

បើអ្នកមកជិតខ្ញុំនៅទីនេះ ហើយគិតថានឹងប្រើល្បិចបោកបញ្ឆោតលើខ្ញុំ—ចូរត្រឡប់ទៅភ្លាមៗ តាំងពីសំឡេងហៅដ៏ទេវភាពនេះ—បើនៅមានភ័យនៅក្នុងចិត្តអ្នក។

Verse 18

इसी प्रकार आप यदि मेरे पास आकर यह मानते हैं कि आपके साथ शठता की जायगी एवं यदि आपको भय मालूम होता है तो इस जूएके खेलसे निवृत्त हो जाइये ।। युधिछिर उवाच आहूतो न निवर्तेयमिति मे व्रतमाहितम्‌ । विधिश्व॒ बलवान्‌ राजन्‌ दिष्टस्यास्मि वशे स्थित:,युधिष्ठिरने कहा--राजन्‌! मैं बुलानेपर पीछे नहीं हटता, यह मेरा निश्चित व्रत है। दैव बलवान है। मैं दैवके वशमें हूँ

យូធិស្ឋិរ បាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! វាជាវ្រតដ៏មាំមួនរបស់ខ្ញុំថា ពេលត្រូវបានអញ្ជើញហើយ ខ្ញុំមិនដកថយទេ។ វាសនាមានអំណាចខ្លាំង; ខ្ញុំស្ថិតក្រោមអំណាចនៃអ្វីដែលបានកំណត់រួច»។

Verse 19

अस्मिन्‌ समागमे केन देवनं मे भविष्यति । प्रतिपाणश्च॒ को<न्यो<$स्ति ततो द्यूतं प्रवर्तताम्‌,अच्छा तो यहाँ जिन लोगोंका जमाव हुआ है, उनमें किसके साथ मुझे जूआ खेलना होगा? मेरे मुकाबलेमें बैठकर दूसरा कौन पुरुष दाँव लगायेगा? इसका निश्चय हो जाय, तो जूएका खेल प्रारम्भ हो

ក្នុងសភានេះ ដែលមានមនុស្សមកប្រមូលផ្តុំ如此នេះ តើខ្ញុំនឹងលេងល្បែងស៊ីសងជាមួយនរណា? តើនរណាផ្សេងទៀតនឹងអង្គុយប្រឈមមុខខ្ញុំ ដាក់ភ្នាល់ជាគូប្រកួត? បើកំណត់បានហើយ សូមឲ្យការលេងស៊ីសងចាប់ផ្តើម។

Verse 20

दुर्योधन उवाच अहं दातास्मि रत्नानां धनानां च विशाम्पते

ទុរយោធន បាននិយាយថា៖ «ឱ ម្ចាស់ប្រជាជន, ខ្ញុំជាអ្នកផ្តល់គ្រឿងអលង្ការ និងទ្រព្យសម្បត្តិ»។

Verse 21

युधिछिर उवाच अन्येनान्यस्यथ वै द्यूतं विषमं प्रतिभाति मे । एतद्‌ विद्वन्नुपादत्स्व काममेवं प्रवर्तताम्‌,युधिष्ठिरने कहा--दूसरेके लिये दूसरेका जूआ खेलना मुझे तो अनुचित ही प्रतीत होता है। विद्वन्‌! इस बातको समझ लो, फिर इच्छानुसार जूएका खेल प्रारम्भ हो

យុធិષ્ઠិរ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ចំពោះខ្ញុំ ការលេងស៊ីសងនេះ—ឲ្យមនុស្សម្នាក់លេងជំនួសមនុស្សម្នាក់ទៀត—ហាក់ដូចជាមិនយុត្តិធម៌ និងមិនសមរម្យឡើយ។ សូមលោកអ្នកប្រាជ្ញ យល់ឲ្យច្បាស់អំពីរឿងនេះសិន; បន្ទាប់មក បើនៅតែប្រាថ្នា ក៏ចូរឲ្យល្បែងដំណើរការតាមរបៀបនោះចុះ»។

Verse 59

इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरशकुनिसंवादे एकोनषष्टितमो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत सभापवके अन्तर्गत झ्यूतपर्वमें युधिष्ठिस्शकुनिसंवादविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

ដូច្នេះ ក្នុង «មហាភារត» ដ៏បរិសុទ្ធ នៅក្នុង «សភាបរវ»—ជាពិសេសផ្នែក «ទ្យូត» (ល្បែងស៊ីសង)—ជំពូកទី៥៩ ដែលពិពណ៌នាសន្ទនារវាង យុធិષ્ઠិរ និង សកុនិ បានបញ្ចប់នៅទីនេះ។

Verse 203

मदर्थ देविता चायं शकुनिर्मातुलो मम । दुर्योधन बोला--महाराज! दाँवपर लगानेके लिये धन और रत्न तो मैं दूँगा; परंतु मेरी ओरसे खेलेंगे ये मेरे मामा शकुनि

ទុរយោធន បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ព្រះមហាក្សត្រ! សម្រាប់ខ្ញុំ សកុនិ—មាមារបស់ខ្ញុំ—នឹងលេងផងដែរ។ ខ្ញុំនឹងផ្តល់ទ្រព្យសម្បត្តិ និងគ្រឿងអលង្ការដើម្បីដាក់ភ្នាល់; ប៉ុន្តែអ្នកដែលនឹងបោះគ្រាប់ស៊ីសងជំនួសខ្ញុំ គឺមាមា សកុនិ»។

Frequently Asked Questions

Whether coercive treatment of Draupadī can be justified through a wager when the one staking her is argued to be without rightful autonomy (anīśa); the dilemma tests the boundary between procedural claims and substantive dharma.

That a ruler must restrain anger and humiliating speech, avoid policy driven by greed, and recognize that dyūta and cruelty generate durable enmity and institutional ruin; ethical counsel is framed as a governance necessity.

No formal phalaśruti appears; instead, the chapter provides prognostic meta-commentary through Vidura’s warnings that ignoring pathya-vākya (beneficial counsel) accelerates collective downfall, positioning the episode as a cautionary ethical exemplar.