
कर्मनाशाभावः, गर्भे जीवप्रवेशः, आचारधर्मोपदेशः (Karma’s Non-Extinction, Jīva’s Entry into the Embryo, and Instruction on Conduct-Dharma)
Upa-parva: Āśvamedhika-parva — Adhyāya 18 (Karma, Garbha-praveśa, and Sādhu-ācāra Upadeśa)
A Brahmin speaker argues that neither auspicious nor inauspicious actions are destroyed; their results mature repeatedly across “fields” (kṣetra), i.e., successive embodiments. Merit and demerit are intensified by the purity or impurity of intention (śuddha/pāpa manas), with mind presented as the proximate driver of action. The discourse then shifts to embryology in a doctrinal register: mixed semen and blood reach the womb, and the being attains a karmically appropriate “field”; consciousness/jīva enters and organizes the embryo, illustrated through analogies (molten metal taking form, fire pervading iron, a lamp illuminating a dwelling). The speaker reiterates inevitability of experiencing prior-body karma, followed by accumulation and depletion until one comprehends mokṣa-oriented dharma. A prescriptive catalog follows—charity, vows, brahmacarya, restraint, calmness, compassion, non-cruelty, non-theft, truthfulness, service to parents, honoring deities and guests, teacher-veneration, cleanliness, and sense-control—culminating in the claim that ācāra reveals dharma and that alignment with sanātana-dharma prevents “durgati.” The chapter concludes by distinguishing the yogin/liberated type and introducing a further cosmological account (Brahmā’s creation, pradhāna, kṣara/akṣara) and the contemplative insight that enables crossing saṃsāra.
Chapter Arc: एक ब्राह्मण उपदेश-स्वर में जीव के गर्भ-प्रवेश का रहस्य खोलता है और कहता है कि शुभ-अशुभ कर्मों का फल इस लोक में अनिवार्य है—कोई भी उससे बच नहीं सकता। → वह बताता है कि जैसे फलने के समय वृक्ष बहुत फल देता है, वैसे ही शुद्ध मन से किया पुण्य विपुल फल देता है; और कलुषित मन से किया पाप भी बढ़कर फलित होता है—मन ही कर्म का अग्रदूत है। फिर वह जीव के गर्भ में प्रवेश की तीव्र, दाहक प्रक्रिया का दृष्टांत देता है—अग्नि जैसे लोहे में प्रवेश कर उसे तपाती है, वैसे ही जीव गर्भ में स्थित होकर देह-बंधन की तपन भोगता है। → उपदेश का शिखर तब आता है जब ब्राह्मण ‘सनातन धर्म’ को कर्म-आधारित, लोक-नियामक नियम के रूप में प्रतिष्ठित करता है: दान आदि सत्कर्मों में ही वह धर्म स्थित है; जो उसे अपनाता है, दुर्गति नहीं पाता। साथ ही वह संकेत करता है कि योगी/मुक्त पुरुष इस सामान्य बंधन-चक्र से भिन्न स्थिति को प्राप्त करता है। → अध्याय का निष्कर्ष वैराग्य और समदर्शन की ओर मुड़ता है: जन्म-मृत्यु-रोग से घिरे हुए भी जो पुरुष प्रधान-तत्त्व को जानकर समस्त चेतन प्राणियों में एक-सा चैतन्य देखता है, वह संसार से ऊबकर परम पद का मार्ग खोजता है—और ब्राह्मण उसके लिए ‘यथातथ्य’ उपदेश देने का वचन देता है। → ब्राह्मण कहता है—‘मैं अब उसका उपदेश बताऊँगा’—और आगे आने वाले अध्याय के लिए मुक्ति-मार्ग की विस्तृत शिक्षा का द्वार खोल देता है।
Verse 1
भीकम (2 अमान अष्टादशो< ध्याय: जीवके गर्भ-प्रवेश, आचार-धर्म, कर्म-फलकी अनिवार्यता तथा संसारसे तरनेके उपायका वर्णन ब्राह्मण उवाच शुभानामशुभानां च नेह नाशो<5स्ति कर्मणाम् । प्राप्य प्राप्पानुपच्यन्ते क्षेत्र क्षेत्र तथा तथा,सिद्ध ब्राह्मण बोले--काश्यप! इस लोकमें किये हुए शुभ और अशुभ कर्मोंका फल भोगे बिना नाश नहीं होता। वे कर्म वैसा-वैसा कर्मानुसार एकके बाद एक शरीर धारण कराकर अपना फल देते रहते हैं
ព្រះព្រាហ្មណ៍បានមានព្រះវាចាថា៖ «ឱ កាស្យប! ក្នុងលោកនេះ កម្មល្អ និងកម្មអាក្រក់ ដែលបានធ្វើ មិនរលាយបាត់ដោយមិនបានទទួលផលឡើយ។ វានឹងទុំជាបន្តបន្ទាប់ ហើយឲ្យផលក្នុង ‘វាល’ មួយទៅមួយទៀត តាមសមស្របនៃកម្មនោះៗ»។
Verse 2
यथा प्रसूयमानस्तु फली दद्यात् फलं बहु । तथा स्याद् विपुलं पुण्यं शुद्धेन मनसा कृतम्,जैसे फल देनेवाला वृक्ष फलनेका समय आनेपर बहुत-से फल प्रदान करता है, उसी प्रकार शुद्ध हृदयसे किये हुए पुण्यका फल अधिक होता है
ដូចដើមឈើដែលផ្ទុកផ្លែ ពេលដល់រដូវ វាប្រគល់ផ្លែជាច្រើន ដូច្នោះដែរ បុណ្យ (puṇya) ដែលបានធ្វើដោយចិត្តបរិសុទ្ធ នឹងឲ្យផលយ៉ាងសម្បូរបែប។
Verse 3
पापं चापि तथैव स्यात् पापेन मनसा कृतम् | पुरोधाय मनो हीदं कर्मण्यात्मा प्रवर्तते,इसी तरह कलुषित चित्तसे किये हुए पापके फलमें भी वृद्धि होती है; क्योंकि जीवात्मा मनको आगे करके ही प्रत्येक कार्यमें प्रवृत्त होता है
ដូចគ្នានេះដែរ បាបដែលបានធ្វើដោយចិត្តកខ្វក់ និងអាក្រក់ នឹងកើនឡើងក្នុងផលវិបាករបស់វា; ព្រោះជីវात्मា ដឹកនាំដោយចិត្ត ហើយទើបចូលរួមក្នុងសកម្មភាពទាំងអស់។
Verse 4
यथा कर्मसमाविष्ट: काममन्युसमावृतः । नरो गर्भ प्रविशति तच्चापि शृणु चोत्तरम्,काम-क्रोधसे घिरा हुआ मनुष्य जिस प्रकार कर्मजालमें आबद्ध होकर गर्भमें प्रवेश करता है, उसका भी उत्तर सुनो
ព្រះព្រាហ្មណ៍បានមានព្រះវាចាថា៖ «ដូចមនុស្សម្នាក់ ដែលជាប់ពាក់ក្នុងចលនានៃកម្មរបស់ខ្លួន ហើយត្រូវបាំងបិតដោយកាម និងកំហឹង ចូលទៅក្នុងផ្ទៃមាតា (ដើម្បីកើតឡើងវិញ) ដូច្នោះដែរ ចូរស្តាប់ចម្លើយបន្តអំពីរឿងនេះ»។
Verse 5
शुक्रे शोणितसंसूष्टं स्त्रिया गर्भाशयं गतम् । क्षेत्र कर्मजमाप्रोति शुभं वा यदि वाशुभम्,जीव पहले पुरुषके वीर्यमें प्रविष्ट होता है, फिर स्त्रीके गर्भाशयमें जाकर उसके रजमें मिल जाता है। तत्पश्चात् उसे कर्मानुसार शुभ या अशुभ शरीरकी प्राप्ति होती है
ជីវៈ (ព្រលឹងរស់) ចូលទៅក្នុងទឹកកាមរបស់បុរសជាមុនសិន ហើយបន្ទាប់មកចូលទៅក្នុងស្បូននារី រួមជាមួយឈាមរដូវ។ បន្ទាប់ពីនោះ វាទទួលបានរាងកាយល្អ ឬអាក្រក់ តាមអំពើកម្មរបស់ខ្លួន។
Verse 6
सौक्ष्म्यादव्यक्तभावाच्च न च क्वचन सज्जति | सम्प्राप्य ब्राह्मण: काम तस्मात् तद् ब्रह्म शाश्वतम्,जीव अपनी इच्छाके अनुसार उस शरीरमें प्रवेश करके सूक्ष्म और अव्यक्त होनेके कारण कहीं आसक्त नहीं होता है; क्योंकि वास्तवमें वह सनातन परब्रह्म-स्वरूप है
ដោយសារតែវាស្ដើងល្អិត និងមានសភាពមិនអាចមើលឃើញបាន ជីវៈចូលទៅក្នុងរាងកាយតាមបំណងរបស់ខ្លួន ហើយមិនជាប់ចិត្តនៅទីណាមួយឡើយ; ព្រោះតាមពិត វាជាព្រះព្រហ្មដ៏អស់កល្បជានិច្ច។
Verse 7
तद् बीजं सर्वभूतानां तेन जीवन्ति जन्तव: । स जीव: सर्वगात्राणि गर्भस्याविश्य भागश:,वह जीवात्मा सम्पूर्ण भूतोंकी स्थितिका हेतु है, क्योंकि उसीके द्वारा सब प्राणी जीवित रहते हैं। वह जीव गर्भके समस्त अंगमें प्रविष्ट हो उसके प्रत्येक अंशमें तत्काल चेतनता ला देता है और वही प्राणोंके स्थान--वक्षःस्थलमें स्थित हो समस्त अंगोंका संचालन करता है। तभी वह गर्भ चेतनासे सम्पन्न होता है
នោះជាគ្រាប់ពូជនៃសត្វទាំងអស់; ដោយវា សត្វលោករស់នៅ។ ជីវៈចូលទៅក្នុងភ胎 អវយវៈមួយៗ ហើយពាសពេញគ្រប់ផ្នែក បង្កើតស្មារតីភ្លាមៗ ដោយក្លាយជាមូលហេតុខាងក្នុងដែលធ្វើឲ្យរាងកាយមានជីវិត និងត្រូវបានថែរក្សា។
Verse 8
दधाति चेतसा सद्यः प्राणस्थानेष्ववस्थित: । ततः स्पन्दयतेड5ड्रानि स गर्भशक्षेतनान्वित:,वह जीवात्मा सम्पूर्ण भूतोंकी स्थितिका हेतु है, क्योंकि उसीके द्वारा सब प्राणी जीवित रहते हैं। वह जीव गर्भके समस्त अंगमें प्रविष्ट हो उसके प्रत्येक अंशमें तत्काल चेतनता ला देता है और वही प्राणोंके स्थान--वक्षःस्थलमें स्थित हो समस्त अंगोंका संचालन करता है। तभी वह गर्भ चेतनासे सम्पन्न होता है
ព្រះព្រាហ្មណ៍បាននិយាយថា៖ «នៅក្នុងទីតាំងនៃព្រលឹងដង្ហើម (ប្រាណ) ជីវៈដែលស្ថិតនៅខាងក្នុង ប្រោសប្រទានស្មារតីភ្លាមៗ ដោយអំណាចនៃការយល់ដឹងរបស់ខ្លួន។ បន្ទាប់មក វាធ្វើឲ្យអវយវៈចលនា; ដូច្នេះ ភ胎ក្លាយជាមានចេតនា។ ព្រោះជីវៈរស់នេះជាមូលហេតុនៃការប្រព្រឹត្តទៅពេញលេញរបស់សត្វទាំងឡាយ; ដោយវា សត្វទាំងអស់នៅរស់។ វាបានចូលទៅក្នុងគ្រប់ផ្នែកនៃភ胎 ហើយភ្លាមៗបំភ្លឺគ្រប់ចំណែកដោយស្មារតី; ហើយស្ថិតនៅតំបន់ប្រាណ (ទ្រូង) វាគ្រប់គ្រងសកម្មភាពនៃអវយវៈទាំងអស់»។
Verse 9
यथा लोहस्य निःस्यन्दो निषिक्तो बिम्बविग्रहम् । उपैति तद् विजानीहि गर्भ जीवप्रवेशनम्,जैसे तपाये हुए लोहेका द्रव जैसे साँचेमें ढाला जाता है उसीका रूप धारण कर लेता है, उसी प्रकार गर्भमें जीवका प्रवेश होता है, ऐसा समझो (अर्थात् जीव जिस प्रकारकी योनिमें प्रविष्ट होता है, उसी रूपमें उसका शरीर बन जाता है)
ព្រះព្រាហ្មណ៍បាននិយាយថា៖ «ដូចជាលោហៈដែកដែលរលាយ ហើយចាក់ទៅក្នុងពុម្ព នឹងទទួលយករូបរាងតាមពុម្ពនោះដែរ—ដូច្នេះហើយ ចូរយល់អំពីការចូលទៅក្នុងស្បូនរបស់ជីវៈ៖ តាមប្រភេទស្បូនដែលវាចូលទៅ រាងកាយសមស្របនឹងត្រូវបានបង្កើតឡើង»។
Verse 10
लोहपिण्डं यथा वल्रि: प्रविश्य हतितापयेत् । तथा त्वमपि जानीहि गर्भे जीवोपपादनम्,जैसे आग लोहपिण्डमें प्रविष्ट होकर उसे बहुत तपा देती है, उसी प्रकार गर्भमें जीवका प्रवेश होता है और वह उसमें चेतनता ला देता है। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो
ដូចភ្លើងចូលទៅក្នុងដុំដែក ហើយធ្វើឲ្យវាក្តៅខ្លាំងយ៉ាងណា ក៏ដូច្នោះដែរ ចូរអ្នកយល់ឲ្យច្បាស់ថា ពេលអាត្មាជីវៈចូលទៅក្នុងគភ៌ វាបង្កើតជីវិតនៅទីនោះ ហើយនាំមកនូវស្មារតីដល់អ្វីដែលមុននេះគ្មានចលនា។ ចូរចាប់យកសេចក្តីនេះឲ្យច្បាស់លាស់។
Verse 11
यथा च दीप: शरणे दीप्यमान: प्रकाशते । एवमेव शरीराणि प्रकाशयति चेतना,जिस प्रकार जलता हुआ दीपक समूचे घरमें प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार जीवकी चैतन्य शक्ति शरीरके सब अवयवोंको प्रकाशित करती है
ដូចចង្កៀងដែលបានបំភ្លឺនៅក្នុងផ្ទះ បញ្ចេញពន្លឺបំភ្លឺទាំងខាងក្នុងទាំងមូលយ៉ាងណា ក៏ដូច្នោះដែរ អំណាចចេតនា—គោលការណ៍ជីវិត—បំភ្លឺរាងកាយ ឲ្យអវយវៈ និងមុខងារទាំងអស់បង្ហាញខ្លួន និងដំណើរការបាន។ នេះបង្ហាញថា សកម្មភាព និងការយល់ដឹងរបស់រាងកាយ ពឹងផ្អែកលើស្មារតីខាងក្នុង មិនមែនលើសារធាតុអសកម្មតែប៉ុណ្ណោះទេ។
Verse 12
यद् यच्च कुरुते कर्म शुभं वा यदि वाशुभम् | पूर्वदेहकृतं सर्वमवश्यमुपभुज्यते,मनुष्य शुभ अथवा अशुभ जो-जो कर्म करता है, पूर्व-जन्मके शरीरसे किये गये उन सब कर्मोंका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है
ព្រះព្រាហ្មណ៍បាននិយាយថា៖ មនុស្សធ្វើកម្មអ្វីក៏ដោយ—ល្អឬអាក្រក់—គាត់ត្រូវតែទទួលផលរបស់វាដោយជៀសមិនរួច ព្រោះទាំងអស់នោះគឺជាកម្មដែលគាត់បានធ្វើក្នុងរាងកាយមុន។ វគ្គនេះបង្ហាញច្បាស់អំពីហេតុផលនៃសីលធម៌៖ អ្វីដែលយើងជួបប្រទះនៅបច្ចុប្បន្ន មិនមែនចៃដន្យទេ ប៉ុន្តែជាផលសุกទុំនៃអំពើមុនៗ ដើម្បីឲ្យមនុស្សប្រុងប្រយ័ត្ន និងទទួលខុសត្រូវ។
Verse 13
ततस्तु क्षीयते चैव पुनश्चान्यत् प्रचीयते । यावत् तन्मोक्षयोगस्थं धर्म नैवावबुध्यते,उपभोगसे प्राचीन कर्मका तो क्षय होता है और फिर दूसरे नये-नये कर्मोका संचय बढ़ जाता है। जबतक मोक्षकी प्राप्तिमें सहायक धर्मका उसे ज्ञान नहीं होता, तबतक यह कर्मोकी परम्परा नहीं टूटती है
បន្ទាប់មក ដោយការរីករាយក្នុងការបរិភោគបទពិសោធន៍ កម្មចាស់ៗត្រូវបានបន្ថយអស់ទៅពិតមែន ប៉ុន្តែកម្មថ្មីៗវិញត្រូវបានសន្សំកើនឡើងម្តងទៀត។ ដរាបណាមនុស្សមិនទាន់យល់ដឹងពិតប្រាកដអំពីធម៌ដែលស្ថិតនៅក្នុងវិន័យនៃយោគៈដើម្បីមោក្ខ (mokṣa-yoga) នោះ សង្វាក់នៃកម្មនេះមិនអាចបញ្ចប់បានឡើយ។
Verse 14
तत्र कर्म प्रवक्ष्यामि सुखी भवति येन वै | आवर्तमानो जातीषु यथान्योन्यासु सत्तम,साधुशिरोमणे! इस प्रकार भिन्न-भिन्न योनियोंमें भ्रमण करनेवाला जीव जिनके अनुष्ठानसे सुखी होता है, उन कर्मोका वर्णन सुनो
ឥឡូវនេះ ខ្ញុំនឹងប្រកាសអំពីកម្មទាំងឡាយ ដែលធ្វើឲ្យមនុស្សបានសុខពិតប្រាកដ។ ឱ អ្នកល្អប្រសើរបំផុត ឱ មកុដនៃអ្នកមានគុណធម៌! ខណៈដែលអាត្មាជីវៈនៅក្នុងរាងកាយ បន្តវិលវង់ឆ្លងកំណើតជាច្រើន ប្រព្រឹត្តពីយោនីមួយទៅយោនីមួយ ចូរស្តាប់អំពីអំពើដែលបើអនុវត្ត នាំមកនូវសុខសាន្តក្នុងការវង្វេងវង់នោះ។
Verse 15
दानं व्रतं ब्रह्मचर्य यथोक्तं ब्रह्मुधारणम् । दम: प्रशान्तता चैव भूतानां चानुकम्पनम्,दान, व्रत, ब्रह्मचर्य, शास्त्रोक्त रीतिसे वेदाध्ययन, इन्द्रियनिग्रह, शान्ति, समस्त प्राणियोंपर दया, चित्तका संयम, कोमलता, दूसरोंके धन लेनेकी इच्छाका त्याग, संसारके प्राणियोंका मनसे भी अहित न करना, माता-पिताकी सेवा, देवता, अतिथि और गुरुओंकी पूजा, दया, पवित्रता, इन्द्रियोंको सदा काबूमें रखना तथा शुभ कर्मोंका प्रचार करना--यह सब श्रेष्ठ पुरुषोंका बर्ताव कहलाता है। इनके अनुष्ठानसे धर्म होता है, जो सदा प्रजावर्गकी रक्षा करता है
The Brāhmaṇa said: “Charity, the observance of vows, celibate discipline, and the upholding of sacred knowledge as prescribed; self-restraint, inner calm, and compassion toward all living beings—these constitute the conduct of the truly excellent. By practicing such disciplines, dharma is established, and dharma, in turn, continually protects and sustains the people.”
Verse 16
संयमाश्चानृशंस्यं च परस्वादानवर्जनम् व्यलीकानामकरणं भूतानां मनसा भुवि,दान, व्रत, ब्रह्मचर्य, शास्त्रोक्त रीतिसे वेदाध्ययन, इन्द्रियनिग्रह, शान्ति, समस्त प्राणियोंपर दया, चित्तका संयम, कोमलता, दूसरोंके धन लेनेकी इच्छाका त्याग, संसारके प्राणियोंका मनसे भी अहित न करना, माता-पिताकी सेवा, देवता, अतिथि और गुरुओंकी पूजा, दया, पवित्रता, इन्द्रियोंको सदा काबूमें रखना तथा शुभ कर्मोंका प्रचार करना--यह सब श्रेष्ठ पुरुषोंका बर्ताव कहलाता है। इनके अनुष्ठानसे धर्म होता है, जो सदा प्रजावर्गकी रक्षा करता है
The brāhmaṇa said: “Self-restraint and non-cruelty; refraining from taking what belongs to others; not engaging in deceit; and not harming any living being even in thought while dwelling on earth—along with charity, vows, celibate discipline, Veda-study according to scriptural rule, control of the senses, inner peace, compassion toward all creatures, mastery of the mind, gentleness, renouncing the desire to seize another’s wealth, serving one’s mother and father, honoring the gods, guests, and teachers, maintaining purity, keeping the senses continually subdued, and promoting auspicious conduct—this is called the way of the noble. By practicing these, dharma arises, and that dharma ever protects the community of subjects.”
Verse 17
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ,मातापित्रोश्व शुश्रूषा देवतातिथिपूजनम् । गुरुपूजा घृणा शौचं नित्यमिन्द्रियसंयम: दान, व्रत, ब्रह्मचर्य, शास्त्रोक्त रीतिसे वेदाध्ययन, इन्द्रियनिग्रह, शान्ति, समस्त प्राणियोंपर दया, चित्तका संयम, कोमलता, दूसरोंके धन लेनेकी इच्छाका त्याग, संसारके प्राणियोंका मनसे भी अहित न करना, माता-पिताकी सेवा, देवता, अतिथि और गुरुओंकी पूजा, दया, पवित्रता, इन्द्रियोंको सदा काबूमें रखना तथा शुभ कर्मोंका प्रचार करना--यह सब श्रेष्ठ पुरुषोंका बर्ताव कहलाता है। इनके अनुष्ठानसे धर्म होता है, जो सदा प्रजावर्गकी रक्षा करता है
The Siddha declares that the conduct of the truly noble consists in a disciplined life of service and restraint: attending upon one’s mother and father, honoring the gods and guests, revering the teacher, maintaining compassion and purity, and keeping the senses continually under control. Along with these are charity, vows, celibate self-restraint, study of the Veda according to scriptural method, inner peace, kindness toward all beings, mastery of the mind, gentleness, renouncing any desire for another’s wealth, and not harming any creature even in thought—together with encouraging the spread of wholesome deeds. By practicing these observances, dharma arises; and that dharma, in turn, ever protects the community of subjects.
Verse 18
प्रवर्तनं शुभानां च तत् सतां वृत्तमुच्यते । ततो धर्म: प्रभवति य: प्रजा: पाति शाश्वती:,दान, व्रत, ब्रह्मचर्य, शास्त्रोक्त रीतिसे वेदाध्ययन, इन्द्रियनिग्रह, शान्ति, समस्त प्राणियोंपर दया, चित्तका संयम, कोमलता, दूसरोंके धन लेनेकी इच्छाका त्याग, संसारके प्राणियोंका मनसे भी अहित न करना, माता-पिताकी सेवा, देवता, अतिथि और गुरुओंकी पूजा, दया, पवित्रता, इन्द्रियोंको सदा काबूमें रखना तथा शुभ कर्मोंका प्रचार करना--यह सब श्रेष्ठ पुरुषोंका बर्ताव कहलाता है। इनके अनुष्ठानसे धर्म होता है, जो सदा प्रजावर्गकी रक्षा करता है इति श्रीमहा भारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अष्टादशोडध्याय:
The promotion and active encouragement of what is good—this is said to be the conduct of the virtuous. From such conduct arises dharma, the enduring principle that continually protects and sustains living beings and society. In this context, the Brahmin explains that dharma is generated and strengthened by disciplined, compassionate, and scripturally guided living—such as generosity, vows, celibate self-restraint, study of the Veda, control of the senses, inner peace, kindness to all creatures, purity, service to parents, and reverence toward gods, guests, and teachers—together forming the exemplary way of the noble.
Verse 19
एवं सत्सु सदा पश्येत् तत्राप्येषा ध्रुवा स्थिति: । आचारो धर्ममाचष्टे यस्मिन् शान्ता व्यवस्थिता:,सत्पुरुषोंमें सदा ही इस प्रकारका धार्मिक आचरण देखा जाता है। उन्हींमें धर्मकी अटल स्थिति होती है। सदाचार ही धर्मका परिचय देता है। शान्तचित्त महात्मा पुरुष सदाचारमें ही स्थित रहते हैं
Thus, among the truly good one should always observe this: even there, this is the steadfast condition—right conduct reveals what dharma is. The tranquil-minded noble persons remain established in such good conduct, and in them dharma stands firm and unshaken.
Verse 20
तेषु तत् कर्म निक्षिप्तं यः स धर्म: सनातन: । यस्तं समभिपद्येत न स दुर्गतिमाप्रुयात्,उन्हींमें पूर्वोक्त दान आदि कर्मोकी स्थिति है। वे ही कर्म सनातन धर्मके नामसे प्रसिद्ध हैं। जो उस सनातन धर्मका आश्रय लेता है, उसे कभी दुर्गति नहीं भोगनी पड़ती है
ក្នុងគុណធម៌ និងវិន័យទាំងនោះ មានការអនុវត្តនៃកិច្ចការដែលបាននិយាយមុន ដូចជា ការបរិច្ចាគ។ ផ្លូវប្រតិបត្តិដែលបានបង្កើតឡើងនោះ គេហៅថា «ធម៌អនន្ត»។ អ្នកណាដែលយកជាជម្រកដោយស្មោះត្រង់ចំពោះធម៌អនន្តនោះ មិនធ្លាក់ចូលទៅក្នុងអវសានអាក្រក់ ឬវាសនាអពមង្គលឡើយ។
Verse 21
अतो नियम्यते लोक: प्रच्यवन् धर्मवर्त्मसु । यश्च योगी च मुक्तश्चन स एतेभ्यो विशिष्यते,इसीलिये धर्ममार्गसे भ्रष्ट होनेवाले लोगोंका नियन्त्रण किया जाता है। जो योगी और मुक्त है, वह अन्य धर्मात्माओंकी अपेक्षा श्रेष्ठ होता है
ហេតុនេះហើយ សង្គមបានដាក់វិន័យទប់ស្កាត់អ្នកដែលរអិលចេញពីផ្លូវធម៌។ ចំណែកអ្នកដែលជាយោគី និងបានរួចផុត (មុក្ត) នោះ មិនអាចរាប់បញ្ចូលជាមួយអ្នកធម៌ធម្មតាទេ—គាត់ឈរលើសដោយសេរីភាពខាងក្នុង និងវិន័យដែលបានសម្រេច។
Verse 22
वर्तमानस्य धर्मेण शुभं यत्र यथा तथा । संसारतारणं हास्य कालेन महता भवेत्
ព្រាហ្មណ៍បាននិយាយថា៖ «ដោយប្រកាន់ខ្ជាប់កាតព្វកិច្ចសមស្របនឹងស្ថានភាពបច្ចុប្បន្នរបស់ខ្លួន គេគួរតែស្វែងរកអ្វីដែលជាមង្គល—នៅទីណា និងដោយរបៀបណា ដែលត្រឹមត្រូវតាមធម៌។ តាមកាលវេលា និងក្នុងដំណើរយូរអង្វែង វានឹងក្លាយជាវិធីឆ្លងផុតពីសង្សារ។»
Verse 23
जो धर्मके अनुसार बर्ताव करता है, वह जहाँ जिस अवस्थामें हो, वहाँ उसी स्थितिमें उसको अपने कर्मानुसार उत्तम फलकी प्राप्ति होती है और वह धीरे-धीरे अधिक काल बीतनेपर संसार-सागरसे तर जाता है ।। एवं पूर्वकृतं कर्म नित्यं जन्तु: प्रपद्यते । सर्व तत्कारणं येन विकृतोडयमिहागत:,इस प्रकार जीव सदा अपने पूर्वजन्मोंमें किये हुए कर्मॉंका फल भोगता है। यह आत्मा निर्विकार ब्रह्म होनेपर भी विकृत होकर इस जगत्में जो जन्म धारण करता है, उसमें कर्म ही कारण है
អ្នកដែលប្រព្រឹត្តតាមធម៌ មិនថានៅទីណា ឬនៅស្ថានភាពណា ក៏ទទួលបានផលល្អសមតាមកម្មរបស់ខ្លួននៅក្នុងស្ថានភាពនោះ ហើយបន្តិចម្តងៗ ពេលកាលយូរចេញទៅ គាត់ឆ្លងផុតពីសមុទ្រសង្សារ។ ដូច្នេះ សត្វលោកតែងតែប្រឈមនឹងផលនៃកម្មដែលបានធ្វើក្នុងអតីតជាតិជានិច្ច។ កម្មនោះហើយជាមូលហេតុដែលធ្វើឲ្យអាត្មា—ទោះជាពិតជាព្រហ្មអចលនៈ—ហាក់ដូចជាប្រែប្រួល ហើយមកកើតក្នុងលោកនេះ ដើម្បីទទួលបទពិសោធន៍តាមអំពើរបស់ខ្លួន។
Verse 24
शरीरग्रहणं चास्य केन पूर्व प्रकल्पितम् । इत्येवं संशयो लोके तच्च वक्ष्याम्पत: परम्,आत्माके शरीर धारण करनेकी प्रथा सबसे पहले किसने चलायी है, इस प्रकारका संदेह प्रायः लोगोंके मनमें उठा करता है, अतः उसीका उत्तर दे रहा हूँ
«ហើយប្រពៃណីនេះ—ដែលអាត្មាមកកាន់កាយ—តើអ្នកណាជាអ្នកបានដាក់ច្បាប់ដំបូង? សង្ស័យបែបនេះជាញឹកញាប់កើតឡើងក្នុងលោក។ ដូច្នេះ ឥឡូវនេះ ខ្ញុំនឹងបង្ហាញចម្លើយរបស់វា តាមលំដាប់សមគួរ។»
Verse 25
शरीरमात्मन: कृत्वा सर्वलोकपितामह: । त्रैलोक्यमसृजद् ब्रह्मा कृत्स्नं स्थावरजड्रमम्,सम्पूर्ण जगत॒के पितामह ब्रह्माजीने सबसे पहले स्वयं ही शरीर धारण करके स्थावर- जंगमरूप समस्त त्रिलोकीकी (कर्मानुसार) रचना की
ព្រះព្រាហ្មណ៍បានមានពាក្យថា៖ ដំបូងបង្អស់ ព្រះព្រហ្មា—ជាពិតាមហានៃលោកទាំងអស់—បានទទួលយករាងកាយសម្រាប់ព្រះអង្គឯង ហើយបង្កើតត្រៃលោកទាំងមូល ឲ្យពេញលេញទាំងអ្វីដែលអចល និងចល។
Verse 26
ततः प्रधानमसृजत् प्रकृतिं स शरीरिणाम् | यया सर्वमिदं व्याप्तं यां लोके परमां विदु:,उन्होंने प्रधान नामक तत्त्वकी उत्पत्ति की, जो देहधारी जीवोंकी प्रकृति कहलाती है। जिसने इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है तथा लोकमें जिसे मूल प्रकृतिके नामसे जानते हैं
បន្ទាប់មក ព្រះអង្គបានបង្កើត «ប្រធាន» គឺប្រក្រឹតិ (Prakṛti) នៃសត្វមានរាងកាយ ដោយអំណាចនោះ សកលលោកនេះត្រូវបានគ្របដណ្ដប់ ហើយនៅក្នុងលោក គេដឹងថាវាជាប្រក្រឹតិដ៏អធិក។
Verse 27
इदं तत्क्षरमित्युक्त परं त्वमृतमक्षरम् | त्रयाणां मिथुनं सर्वमेकेकस्य पृथक् पृथक्
ព្រះព្រាហ្មណ៍បានមានពាក្យថា៖ «នេះហៅថា ខ្សរ (kṣara) គឺអ្វីដែលរលាយបាត់; តែឆ្លងលើសពីវា មាន អក្សរ (akṣara) អមតៈ មិនរលាយបាត់។ អ្វីៗទាំងអស់មានសភាពជាគូក្នុងចំណោមបីនេះ ហើយទោះយ៉ាងណា មួយៗក៏ឈរដាច់ដោយឡែក តាមធម្មជាតិរបស់ខ្លួន។»
Verse 28
यह प्राकृत जगत् क्षर कहलाता है, इससे भिन्न अविनाशी जीवात्माको अक्षर कहते हैं। (इनसे विलक्षण शुद्ध परब्रह्म हैं)--इन तीनोंमेंसे जो दो तत्त्व--क्षर और अक्षर हैं, वे सब प्रत्येक जीवके लिये पृथक्-पृथक होते हैं ।। असृजत् सर्वभूतानि पूर्वदृष्ट: प्रजापति: । स्थावराणि च भूतानि इत्येषा पौर्विकी श्रुति:,श्रुतिमें जो सृष्टिके आरम्भमें सत्रूपसे निर्दिष्ट हुए हैं, उन प्रजापतिने समस्त स्थावर भूतों और जंगम प्राणियोंकी सृष्टि की है, यह पुरातन श्रुति है
ព្រះព្រាហ្មណ៍បានមានពាក្យថា៖ «លោកវត្ថុដែលបង្ហាញនេះ ហៅថា ខ្សរ (kṣara) គឺអ្វីដែលរលាយបាត់។ ខុសពីវា អាត្មានៃបុគ្គលដែលមិនរលាយបាត់ ហៅថា អក្សរ (akṣara)។ លើសពីទាំងពីរ មានព្រះព្រហ្មន៍អធិឧត្តមដ៏បរិសុទ្ធ ខុសប្រភេទពីវាទាំងពីរ។ ចំពោះគោលការណ៍ទាំងពីរ—ខ្សរ និងអក្សរ—សត្វមានជីវិតនីមួយៗពាក់ព័ន្ធដោយរបៀបខ្លួនឯង។ ដូច្នេះ ស្រុតិដ៏បុរាណបានប្រកាសថា៖ ‘ព្រះប្រជាបតិ (Prajāpati) អ្នកបង្កើត ដែលបានឃើញលំដាប់ដើមកំណើតជាមុន បានបង្កើតសត្វទាំងអស់ ទាំងអចល និងចល।’»
Verse 29
तस्य कालपरीमाणमकरोत् स पितामह: । भूतेषु परिवृत्तिं च पुनरावृत्तिमेव च,पितामहने जीवके लिये नियत समयतक शरीर धारण किये रहनेकी, भिन्न-भिन्न योनियोंमें भ्रमण करनेकी और परलोकसे लौटकर फिर इस लोकमें जन्म लेने आदिकी भी व्यवस्था की है
សម្រាប់សត្វមានរាងកាយនោះ ពិតាមហា (អ្នកបង្កើត) បានកំណត់មាត្រដ្ឋាននៃកាលៈ—ថាតើគួរទ្រទ្រង់រាងកាយយូរប៉ុនណា—ហើយក៏បានរៀបចំការវិលវល់ក្នុងយោនីផ្សេងៗ និងការត្រឡប់មកវិញផងដែរ៖ ចាកពីលោកក្រោយ ហើយកើតមកក្នុងលោកនេះម្ដងទៀត។
Verse 30
यथात्र कश्रिन्मेधावी दृष्टात्मा पूर्वजन्मनि । यत् प्रवक्ष्यामि तत् सर्व यथावदुपपद्यते,जिसने पूर्वजन्ममें अपने आत्माका साक्षात्कार कर लिया हो, ऐसा कोई मेधावी अधिकारी पुरुष संसारकी अनित्यताके विषयमें जैसी बात कह सकता है, वैसी ही मैं भी कहूँगा। मेरी कही हुई सारी बातें यथार्थ और संगत होंगी
ដូចដែលបុរសប្រាជ្ញាម្នាក់—អ្នកដែលបានដឹងច្បាស់អាត្មានៅជាតិមុន—អាចនិយាយនៅទីនេះអំពីភាពមិនថេរនៃលោកិយបានយ៉ាងណា ខ្ញុំក៏នឹងនិយាយយ៉ាងនោះដែរ។ អ្វីដែលខ្ញុំនឹងប្រកាសនេះ នឹងត្រឹមត្រូវ សមហេតុផល និងស្របតាមយុត្តិធម៌ទាំងស្រុង។
Verse 31
सुखदु:खे यथा सम्यगनित्ये य: प्रपश्यति । कायं चामेध्यसंघातं विनाशं कर्मसंहितम्,जो मनुष्य सुख और दु:ख दोनोंको अनित्य समझता है, शरीरको अपवित्र वस्तुओंका समूह समझता है और मृत्युको कर्मका फल समझता है तथा सुखके रूपमें प्रतीत होनेवाला जो कुछ भी है वह सब दुःख-ही-दुःख है, ऐसा मानता है, वह घोर एवं दुस्तर संसार-सागरसे पार हो जायगा
ព្រាហ្មណៈបាននិយាយថា៖ អ្នកណាដែលឃើញច្បាស់ថា សុខ និងទុក្ខ សុទ្ធតែមិនថេរ ចាត់ទុករាងកាយជាគំនររបស់មិនបរិសុទ្ធ ហើយយល់ថា មរណភាពជាផលដែលកើតពីកម្ម—មនុស្សនោះនឹងបន្ធូរចំណងចិត្តចំពោះរូបរាងលោកិយ ហើយអាចឆ្លងកាត់សមុទ្រសំសារាដ៏គួរភ័យ និងឆ្លងកាត់បានលំបាក។
Verse 32
यच्च किंचित्सुखं तच्च दुःखं सर्वमिति स्मरन् | संसारसागरं घोरं तरिष्यति सुदुस्तरम्,जो मनुष्य सुख और दु:ख दोनोंको अनित्य समझता है, शरीरको अपवित्र वस्तुओंका समूह समझता है और मृत्युको कर्मका फल समझता है तथा सुखके रूपमें प्रतीत होनेवाला जो कुछ भी है वह सब दुःख-ही-दुःख है, ऐसा मानता है, वह घोर एवं दुस्तर संसार-सागरसे पार हो जायगा
ព្រាហ្មណៈបាននិយាយថា៖ «ដោយចងចាំថា អ្វីៗដែលលេចឡើងជាសុខ នោះតាមពិតសុទ្ធតែទុក្ខទាំងមូល មនុស្សម្នាក់នឹងឆ្លងកាត់សមុទ្រនៃសំសារាដ៏គួរភ័យ និងឆ្លងកាត់បានលំបាក»។
Verse 33
जातीमरणरोगैश्व समाविष्ट: प्रधानवित् | चेतनावत्सु चैतन्यं सम॑ भूतेषु पश्यति
ព្រាហ្មណៈបាននិយាយថា៖ ទោះសត្វលោកត្រូវបានគ្របសង្កត់ដោយកំណើត មរណៈ និងជំងឺក្តី អ្នកដឹងប្រាធាន (Pradhāna) គឺគោលធាតុដើមនៃធម្មជាតិ នឹងឃើញចិត្តដឹងដូចគ្នានៅក្នុងសត្វមានចិត្តទាំងអស់ ហើយមើលឃើញស្មើភាពនៃស្មារតីខាងក្នុងនៅក្នុងសត្វទាំងពួង។
Verse 34
निर्विद्यते ततः कृत्स्नं मार्गमाण: परं पदम् | तस्योपदेशं वक्ष्यामि याथातथ्येन सत्तम
បន្ទាប់មក គាត់កើតការធុញទ្រាន់ចំពោះការខិតខំប្រឹងប្រែងលោកិយទាំងមូល ហើយស្វែងរកស្ថានភាពដ៏ខ្ពង់ខ្ពស់បំផុត។ ឱ អ្នកប្រកបដោយគុណធម៌ដ៏ល្អឥតខ្ចោះ ខ្ញុំនឹងប្រាប់អ្នកឥឡូវនេះអំពីសេចក្តីណែនាំសម្រាប់រឿងនោះ ដោយស្មោះត្រង់ តាមដែលវាជាក់ស្តែង។
Verse 35
जन्म, मृत्यु एवं रोगोंसे घिरा हुआ जो पुरुष प्रधान तत्त्व (प्रकृति)-को जानता है और समस्त चेतन प्राणियोंमें चैतन्यको समानरूपसे व्याप्त देखता है, वह पूर्ण परमपदके अनुसंधानमें संलग्न हो जगत्के भोगोंसे विरक्त हो जाता है। साधुशिरोमणे! उस वैराग्यवान् पुरुषके लिये जो हितकर उपदेश है, उसका मैं यथार्थरूपसे वर्णन करूँगा ।। शाश्वतस्याव्ययस्याथ यदस्य ज्ञानमुत्तमम् । प्रोच्यमानं मया विप्र निबोधेदमशेषत:,उसके लिये जो सनातन अविनाशी परमात्माका उत्तम ज्ञान अभीष्ट है, उसका मैं वर्णन करता हूँ। विप्रवर! तुम सारी बातोंको ध्यान देकर सुनो
ព្រះព្រាហ្មណ៍បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ បុរសម្នាក់ដែលត្រូវបានព័ទ្ធជុំវិញដោយកំណើត មរណៈ និងជំងឺ—ដែលដឹងច្បាស់អំពីធាតុដើម (ប្រក្រឹតិ/Prakṛti) ហើយឃើញចិត្តដឹងដូចគ្នា សាយភាយស្មើៗគ្នានៅក្នុងសត្វមានជីវិតទាំងអស់—នោះគេនឹងផ្តោតចិត្តលើការស្វែងរកស្ថានបរមសម្បូរបែប ហើយក្លាយជាអ្នកប្រាថ្នាវៀរចេញពីសុខបរិភោគនៃលោក។ ឱ អ្នកប្រសើរបំផុតក្នុងចំណោមអ្នកធម៌! ខ្ញុំនឹងពោលដោយត្រឹមត្រូវនូវឧបদেশមានប្រយោជន៍ សម្រាប់បុរសអ្នកវៀរចេញនោះ។ ឥឡូវនេះ ខ្ញុំនឹងបកស្រាយចំណេះដឹងខ្ពស់បំផុតអំពីព្រះអាត្មា បរម សនាតន អវិនាស; ឱ ព្រាហ្មណ៍ប្រសើរ! ចូរស្តាប់ទាំងអស់ដោយការយកចិត្តទុកដាក់ មិនឲ្យខ្វះខាត។
It asserts that śubha and aśubha karmas do not perish; their fruits mature repeatedly across appropriate “fields” (kṣetra), implying continuity across lives and inevitability of experiencing prior actions.
Dharma is operationalized as disciplined conduct—charity, restraint, compassion, service, purity, and sense-control—with ācāra (the settled practice of ethical exemplars) presented as a reliable indicator of sanātana-dharma.
Yes; it frames karmic cycling as continuing until one understands mokṣa-yoga-oriented dharma, and it marks the yogin/liberated person as distinct, introducing cosmological categories (kṣara/akṣara, pradhāna, Brahmā’s creation) to support that trajectory.