Kuvalāśva’s Lineage and Uttaṅka’s Petition concerning Dhundhu (धुन्धु-प्रसङ्गः)
अथ कदाचिच्छलो मृगयामनुचरन् मृगमासाद्य रथेनान्वधावत्,“तदनन्तर एक दिन महाराज शल शिकार खेलनेके लिये वनको गये। वहाँ उन्होंने एक हिंसक पशुको सामने पाकर रथके द्वारा ही उसका पीछा किया और सारथिसे कहा--“शीघ्र मुझे मृगके निकट पहुँचाओ'। उनके ऐसा कहनेपर सारथि बोला--“महाराज! आप इस पशुको पकड़नेका आग्रह न करें। यह आपकी पकड़में नहीं आ सकता। यदि आपके रथमें दोनों वाम्य घोड़े जुते होते, तब आप इसे पकड़ लेते।” यह सुनकर राजाने सूतसे पूछा --'सारथे! बताओ, वाम्य घोड़े कौन हैं, अन्यथा मैं तुम्हें अभी मार डालूँगा।” राजाके ऐसा कहनेपर सारथि भयसे काँप उठा। उधर घोड़ोंका परिचय देनेपर उसे वामदेव ऋषिके शापका भी डर था। अतः उसने राजासे कुछ नहीं कहा। तब राजाने पुनः तलवार उठाकर कहा--“अरे! शीघ्र बता, नहीं तो तुझे अभी मार डालूगा।' तब उसने राजाके भयसे त्रस्त होकर कहा--“महाराज! वामदेव मुनिके पास दो घोड़े हैं जिन्हें “वाम्य” कहते हैं। वे मनके समान वेगशाली हैं!
atha kadācic chalo mṛgayām anucaran mṛgam āsādya rathenānvadhāvat |
Vaiśampāyana said: Once, King Śala, while roaming about on a hunt, came upon a deer and pursued it in his chariot. The episode sets the stage for a moral tension: royal impatience and coercion press upon a subordinate, while the charioteer is caught between fear of the king’s violence and fear of a sage’s curse—showing how adharma arises when power demands speech or action against conscience and higher law.
वैशम्पायन उवाच