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Shloka 87

इत्येष विधिरुद्दिष्टो मया ते द्विपदां वर । श्रद्दधानेन वै भाव्यं यन्मां त्वं परिपृच्छसि,मनुष्योंमें श्रेष्ठ नरेश्वर! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे थे, उसके अनुसार यह मैंने महाभारतके सुनने तथा उसका पारायण करनेकी विधि बतलायी है। तुम्हें इसपर श्रद्धा करनी चाहिये

वैशम्पायन उवाच