Kṛṣṇa’s Departure, Auspicious Omens, and the Opening of the Uttaṅka Dialogue (कृष्णप्रयाण-निमित्त-उत्तङ्कसंवाद-प्रारम्भः)
त्वत्तेज: सम्भवो नित्यं भूतात्मा मधुसूदन । रति: क्रीडामयी तुभ्यं माया ते रोदसी विभो,“मधुसूदन! आपके ही तेजसे सदा सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति होती है। आप ही सब प्राणियोंके आत्मा हैं। प्रभो! नाना प्रकारकी लीलाएँ आपकी रति (मनोरंजन) हैं। आकाश और पृथिवी आपकी माया है
वैशम्पायन उवाच