अध्याय १८४ — भैक्षविभागः, शयनविधानम्, धृष्टद्युम्नस्य निवेदनम्
Alms Distribution, Night Lodging, and Dhṛṣṭadyumna’s Report
तत्र भैक्षं समाजहुर्ब्राह्मिणीं वृत्तिमाश्रिता: । तान् सम्प्राप्तांस्तथा वीराज्जज्ञिरे न नरा: क्वचित्,वहाँ ब्राह्मणवृत्तिका आश्रय ले वे भिक्षा माँगकर लाते (और उसीसे निर्वाह करते) थे। इस प्रकार वहाँ पहुँचे हुए पाण्डववीरोंको कहीं कोई भी मनुष्य पहचान न सके
वैशम्पायन उवाच