Adhyaya 139
Vana ParvaAdhyaya 13932 Verses

Adhyaya 139

Raibhya-putrayoḥ satra-vṛttāntaḥ — The Satra Episode of Raibhya’s Sons (Parāvasu and Arvāvasu)

Upa-parva: Tīrtha-yātrā / Āśrama-Upākhyāna Cycle (Lomāśa’s pilgrimage-legend sequence)

Lomāśa recounts that King Bṛhaddyumna sponsors a satra in which the sages Parāvasu and Arvāvasu, sons of Raibhya, assist. Returning at night to the āśrama, Parāvasu, impaired by sleep and darkness, mistakes his father for an animal and harms him fatally. After performing the funerary rites, Parāvasu returns to the satra and persuades Arvāvasu to undertake penance for brahmahatyā on his behalf while he continues the ritual responsibilities. Arvāvasu completes the penance and comes back; Parāvasu then publicly warns Bṛhaddyumna to bar Arvāvasu as a ‘brahmahā,’ leading to Arvāvasu’s attempted expulsion despite his repeated denial. Arvāvasu states that the act was committed by his brother and that he only protected the ritual order. The gods approve Arvāvasu’s conduct, select him for honor, and grant boons; he requests the restoration of his father and related figures (including Bharadvāja and Yavakrīta). When Yavakrīta questions how Raibhya could have overcome him, the gods explain that learning without proper guru-discipline is inferior to knowledge attained through arduous service and right method. The revived figures depart, and Lomāśa concludes by praising the sanctity of that āśrama as a place where residence yields release from sins.

Chapter Arc: लोमश ऋषि युधिष्ठिर को रैभ्य-वंश के दो तेजस्वी पुत्रों—अर्वावसु और परावसु—की कथा में ले जाते हैं, जहाँ यज्ञ-कार्य और ब्रह्महत्या-प्रायश्चित्त एक साथ चलने वाले हैं। → बुद्धिमान राजा बृहद्द्युम्न के सत्र-यज्ञ की पूर्ति हेतु रैभ्य के दोनों पुत्र सहाय बनकर जाते हैं; परावसु यज्ञ-व्यवस्था संभालता है, जबकि अर्वावसु अपने ऊपर आए ब्रह्महत्या-दोष से मुक्त होने के लिए कठोर तप और इन्द्रिय-संयम का व्रत लेता है। तप की उग्रता बढ़ती जाती है—वह दिवाकर (सूर्य) का आश्रय लेकर रहस्य-विद्या की साधना करता है। → अर्वावसु की उग्र तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्य-सम्बन्धी रहस्यमय ज्ञान/वेद का प्रादुर्भाव होता है; उसी क्रम में यवक्रीत की कथा-धारा में देवगण (अग्नि-पुरोगामी) प्रकट होकर विधिपूर्वक मृत/नष्ट हुए मुनियों को पुनर्जीवित करते हैं—यह अध्याय का चमत्कार-शिखर है। → देवगण मुनियों को संजीवित कर त्रिविष्टप लौट जाते हैं; यवक्रीत देवताओं से विधि और सामर्थ्य के विषय में प्रश्न करता है, और लोमश इस प्रसंग को युधिष्ठिर के सामने धर्म-बोध के रूप में स्थिर कर देते हैं—तप, प्रायश्चित्त और देव-कृपा की संगति स्पष्ट होती है। → यवक्रीत द्वारा देवताओं से किया गया प्रश्न आगे की कथा में उसके अहं/जिज्ञासा और परिणामों की ओर संकेत करता है।

Shlokas

Verse 1

हि >> आय न [हुक हि 7 आम अष्टात्रिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: अर्वावसुकी तपस्याके प्रभावसे परावसुका ब्रह्महत्यासे मुक्त होना और रैभ्य, भरद्वाज तथा यवक्रीत आदिका पुनर्जीवित होना लोगश उवाच एतस्मिन्नेव काले तु बृहद्द्युम्नो महीपति: । सत्र तेने महाभागो रैभ्ययाज्य: प्रतापवान्‌,लोमशजी कहते हैं--युधिष्ठिर! इन्हीं दिनों महान्‌ सौभाग्यशाली एवं प्रतापी नरेश बृहद्द्युम्नने एक यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया। वे रैभ्यके यजमान थे

Lomāśa berkata: “Pada waktu itu juga, Raja Bṛhaddyumna—mulia dan perkasa—memulai pelaksanaan satra (sidang kurban). Dalam upacara itu, ia menjadi yajamāna bagi resi Raibhya.”

Verse 2

तेन रैभ्यस्य वै पुत्रावर्वावसुपरावसू । वृतौ सहायौ सत्रार्थ बृहद्द्युम्नेन धीमता,बुद्धिमान बृहद्द्युम्नने यज्ञकी पूर्तिके लिये रैभ्यके दोनों पुत्र अर्वावसु तथा परावसुको सहयोगी बनाया

Karena itu, Bṛhaddyumna yang bijaksana mengangkat dua putra Raibhya—Arvāvasu dan Parāvasu—sebagai pembantunya demi menuntaskan satra (sidang kurban).

Verse 3

तत्र तौ समनुज्ञातौ पित्रा कौन्तेय जग्मतु:ः । आश्रमे त्वभवद्‌ रैभ्यो भार्या चैव परावसो:,कुन्तीनन्दन! पिताकी आज्ञा पाकर वे दोनों भाई राजाके यज्ञमें चले गये। आश्रममें केवल रैभ्य मुनि तथा उनके पुत्र परावसुकी पत्नी रह गयी। एक दिन घरकी देख-भाल करनेके लिये परावसु अकेले ही आश्रमपर आये। उस समय उन्होंने काले मृगचर्मसे ढके हुए अपने पिताको वनमें देखा

Wahai putra Kuntī, di sana kedua saudara itu, setelah memperoleh izin ayahnya, berangkat menuju yajña sang raja. Di āśrama tinggal hanya resi Raibhya dan istri Parāvasu.

Verse 4

अथावलोककोडगच्छद्‌ गृहानेक: परावसु: । कृष्णाजिनेन संवीतं ददर्श पितरं वने,कुन्तीनन्दन! पिताकी आज्ञा पाकर वे दोनों भाई राजाके यज्ञमें चले गये। आश्रममें केवल रैभ्य मुनि तथा उनके पुत्र परावसुकी पत्नी रह गयी। एक दिन घरकी देख-भाल करनेके लिये परावसु अकेले ही आश्रमपर आये। उस समय उन्होंने काले मृगचर्मसे ढके हुए अपने पिताको वनमें देखा

Kemudian Parāvasu, seorang diri untuk menengok urusan rumah, pergi ke āśrama. Di hutan ia melihat ayahnya berselimut kulit kijang hitam.

Verse 5

जघन्यरात्रे निद्रान्ध: सावशेषे तमस्यपि । चरन्तं गहने5रण्ये मेने स पितरं मृगम्‌,रातका पिछला पहर बीत रहा था और अभी अन्धकार शेष था। परावसु नींदसे अन्धे हो रहे थे; अतः उन्होंने गहन वनमें विचरते हुए अपने पिताको हिंसक पशु ही समझा

Pada jaga terakhir malam, ketika gelap masih tersisa, Parāvasu—terbutakan oleh kantuk—mengira ayahnya yang berjalan di rimba lebat itu sebagai seekor binatang buas.

Verse 6

मृगं तु मन्यमानेन पिता वै तेन हिंसितः । अकामयानेन तदा शरीरत्राणमिच्छता,और उसे हिंसक पशु समझकर धोखेसे ही उन्होंने अपने पिताकी हत्या कर डाली। यद्यपि वे ऐसा करना नहीं चाहते थे, तथापि हिंसक पशुसे अपने शरीरकी रक्षाके लिये उनके द्वारा यह क्रूरतापूर्ण कार्य बन गया

Mengira itu seekor binatang, demi menyelamatkan tubuhnya—meski tanpa niat di hati—ia saat itu mencelakai ayahnya hingga binasa.

Verse 7

तस्य स प्रेतकार्याणि कृत्वा सर्वाणि भारत । पुनरागम्य तत्‌ सत्रमब्रवीद्‌ भ्रातरं वच:,भारत! उसने पिताके समस्त प्रेतकर्म करके पुनः यज्ञमण्डपमें आकर अपने भाई अर्वावसुसे कहा--'भैया! वह यज्ञकर्म तुम अकेले किसी प्रकार निभा नहीं सकते। इधर मैंने हिंसक पशु समझकर धोखेसे पिताजीकी हत्या कर डाली है; इसलिये तात! तुम तो मेरे लिये ब्रह्महत्यानिवारणके हेतु व्रत करो और मैं राजाका यज्ञ कराऊँगा। मुने! मैं अकेला भी इस कार्यका सम्पादन करनेमें समर्थ हूँ"

Wahai Bhārata, setelah menunaikan seluruh upacara kematian baginya, ia kembali ke sidang kurban (satra) itu dan berkata demikian kepada saudaranya.

Verse 8

इदं कर्म न शक्तस्त्वं वोढुमेक: कथंचन । मया तु हिंसितस्तातो मन्यमानेन त॑ मृगम्‌,भारत! उसने पिताके समस्त प्रेतकर्म करके पुनः यज्ञमण्डपमें आकर अपने भाई अर्वावसुसे कहा--'भैया! वह यज्ञकर्म तुम अकेले किसी प्रकार निभा नहीं सकते। इधर मैंने हिंसक पशु समझकर धोखेसे पिताजीकी हत्या कर डाली है; इसलिये तात! तुम तो मेरे लिये ब्रह्महत्यानिवारणके हेतु व्रत करो और मैं राजाका यज्ञ कराऊँगा। मुने! मैं अकेला भी इस कार्यका सम्पादन करनेमें समर्थ हूँ"

Saudaraku, upacara ini tak mungkin kautanggung seorang diri. Sedangkan aku—mengiranya binatang buas—telah membunuh ayah kita.

Verse 9

सोअस्मदर्थ व्रतं तात चर त्वं ब्रह्महिंसनम्‌ । समर्थो5प्यहमेकाकी कर्म कर्तुमिदं मुने,भारत! उसने पिताके समस्त प्रेतकर्म करके पुनः यज्ञमण्डपमें आकर अपने भाई अर्वावसुसे कहा--'भैया! वह यज्ञकर्म तुम अकेले किसी प्रकार निभा नहीं सकते। इधर मैंने हिंसक पशु समझकर धोखेसे पिताजीकी हत्या कर डाली है; इसलिये तात! तुम तो मेरे लिये ब्रह्महत्यानिवारणके हेतु व्रत करो और मैं राजाका यज्ञ कराऊँगा। मुने! मैं अकेला भी इस कार्यका सम्पादन करनेमें समर्थ हूँ"

Wahai saudaraku, jalankanlah demi aku tapa-janji penebus dosa brahmahatyā. Wahai resi, meski aku pun sanggup menyelesaikan upacara ini seorang diri.

Verse 10

अववियुरुवाच करोतु वै भवान्‌ सत्र बृहद्द्युम्नस्य धीमत: । ब्रह्मवध्यां चरिष्ये5हं त्वदर्थ नियतेन्द्रिय:

Avaviyu berkata, “Laksanakanlah di sini satra bagi Bṛhaddyumna yang bijaksana. Demi engkau, dengan indria terkendali, aku akan menjalani penebusan dosa brahmahatyā.”

Verse 11

अर्वावसु बोले--भाई! आप परम बुद्धिमान्‌ राजा बृहद्द्युम्नका यज्ञकार्य सम्पन्न करें और मैं आपके लिये इन्द्रियसंयमपूर्वक ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त करूँगा ।। लोगश उवाच स तस्य ब्रह्मुवध्याया: पारं गत्वा युधिष्ठिर । अर्वावसुस्तदा सत्रमाजगाम पुनर्मुनि:,लोमशजी कहते हैं--युधिष्ठिर! अर्वावसु मुनि भाईके लिये ब्रह्महत्याका प्रायश्ित्त पूरा करके पुनः उस यज्ञमें आये। परावसुने अपने भाईको वहाँ उपस्थित देखकर राजा बृहद्द्युम्नसे हर्षगदगद वाणीमें कहा--'राजन! यह ब्रह्महत्यारा है। अतः इसे आपका यज्ञ देखनेके लिये इस मण्डपमें प्रवेश नहीं करना चाहिये। ब्रह्मघाती मनुष्य अपनी दृष्टिमात्रसे भी आपको महान्‌ कष्टमें डाल सकता है, इसमें संशय नहीं है”

Lomaśa berkata, “Wahai Yudhiṣṭhira, setelah menuntaskan sepenuhnya penebusan dosa brahmahatyā demi saudaranya, resi Arvāvasu kembali lagi ke satra itu.”

Verse 12

ततः परावसूुर्दष्टवा भ्रातरं समुपस्थितम्‌ । बृहद्द्युम्नमुवाचेदं वचन हर्षगद्गदम्‌,लोमशजी कहते हैं--युधिष्ठिर! अर्वावसु मुनि भाईके लिये ब्रह्महत्याका प्रायश्ित्त पूरा करके पुनः उस यज्ञमें आये। परावसुने अपने भाईको वहाँ उपस्थित देखकर राजा बृहद्द्युम्नसे हर्षगदगद वाणीमें कहा--'राजन! यह ब्रह्महत्यारा है। अतः इसे आपका यज्ञ देखनेके लिये इस मण्डपमें प्रवेश नहीं करना चाहिये। ब्रह्मघाती मनुष्य अपनी दृष्टिमात्रसे भी आपको महान्‌ कष्टमें डाल सकता है, इसमें संशय नहीं है”

Lomaśa berkata: Maka Parāvasu, melihat saudaranya berdiri di hadapannya, berkata kepada Raja Bṛhaddyumna dengan suara bergetar karena girang: “Wahai Raja, orang ini adalah pembunuh brāhmaṇa. Karena itu jangan izinkan ia memasuki pendapa kurban untuk menyaksikan yajña-mu. Seorang pembunuh brāhmaṇa dapat mendatangkan malapetaka besar kepadamu bahkan hanya dengan tatapannya—tanpa keraguan.”

Verse 13

एष ते ब्रह्महा यज्ञं मा द्रष्टूं प्रविशेदिति । ब्रह्माहा प्रेक्षितेनापि पीडयेत्‌ त्वामसंशयम्‌,लोमशजी कहते हैं--युधिष्ठिर! अर्वावसु मुनि भाईके लिये ब्रह्महत्याका प्रायश्ित्त पूरा करके पुनः उस यज्ञमें आये। परावसुने अपने भाईको वहाँ उपस्थित देखकर राजा बृहद्द्युम्नसे हर्षगदगद वाणीमें कहा--'राजन! यह ब्रह्महत्यारा है। अतः इसे आपका यज्ञ देखनेके लिये इस मण्डपमें प्रवेश नहीं करना चाहिये। ब्रह्मघाती मनुष्य अपनी दृष्टिमात्रसे भी आपको महान्‌ कष्टमें डाल सकता है, इसमें संशय नहीं है”

“Orang ini pembunuh brāhmaṇa; jangan biarkan ia masuk untuk menyaksikan yajña-mu. Seorang pembunuh brāhmaṇa, bahkan hanya dengan memandang, dapat mencelakakanmu—tanpa ragu.”

Verse 14

लोगश उवाच तच्छुत्वैव तदा राजा प्रेष्यानाह स विट्पते । प्रेष्यैरुत्सार्यमाणस्तु राजन्नर्वावसुस्तदा,लोमशजी कहते हैं--प्रजानाथ! परावसुकी यह बात सुनते ही राजाने अपने सेवकोंको यह आज्ञा दी कि “अर्वावसुको भीतर न आने दो।” राजन्‌! उस समय सेवकोंद्वारा हटाये जानेपर अर्वावसुने बार-बार यह कहा कि -मैंने ब्रह्महत्या नहीं की है।' भारत! तो भी राजाके सेवक उन्हें ब्रह्महत्यारा कहकर ही सम्बोधित करते थे

Lomaśa berkata: Mendengar kabar itu, sang raja, pelindung rakyat, segera memerintahkan para pengawal, “Usir dia.” Ketika Arvāvasu didorong keluar oleh para pelayan, ia berulang kali memohon di hadapan raja, “Aku tidak melakukan brahmahatyā.” Namun orang-orang raja tetap memanggilnya “brahmahantā”—pembunuh brāhmaṇa.

Verse 15

न मया ब्रह्माहत्येयं कृतेत्याह पुन: पुन: । उच्चमानो<5सकृप्प्रेष्यैर््रह्मह॒ज्निति भारत,लोमशजी कहते हैं--प्रजानाथ! परावसुकी यह बात सुनते ही राजाने अपने सेवकोंको यह आज्ञा दी कि “अर्वावसुको भीतर न आने दो।” राजन्‌! उस समय सेवकोंद्वारा हटाये जानेपर अर्वावसुने बार-बार यह कहा कि -मैंने ब्रह्महत्या नहीं की है।' भारत! तो भी राजाके सेवक उन्हें ब्रह्महत्यारा कहकर ही सम्बोधित करते थे

Berulang kali ia berkata, “Aku tidak melakukan brahmahatyā.” Namun, wahai Bhārata, ketika para pelayan berkali-kali mengusirnya, mereka tetap menyapanya sebagai “brahmahantā”—pembunuh brāhmaṇa.

Verse 16

नैव सम प्रतिजानाति ब्रह्मवध्यां स्वयंकृताम्‌ । मम क्रात्रा कृतमिदं मया स परिमोक्षित:,अर्वावसु किसी तरह उस ब्रह्महत्याको अपनी की हुई स्वीकार नहीं करते थे। उन्होंने बार-बार यही बतानेकी चेष्टा की कि "मेरे भाईने ब्रह्महत्या की है। मैंने तो प्रायश्षित्त करके उन्हें पापसे छुड़ाया है”

Arvāvasu sama sekali tidak mau mengakui bahwa brahmahatyā itu perbuatannya sendiri. Berkali-kali ia menegaskan, “Perbuatan ini dilakukan oleh saudaraku; akulah yang menjalankan penebusan (prāyaścitta) dan membebaskannya dari dosa itu.”

Verse 17

स तथा प्रवदन्‌ क्रोधात्‌ तैश्न प्रेष्यै: प्रभाषित: । तूष्णीं जगाम ब्रद्य॒र्षिवनमेव महातपा:,उनके ऐसा कहनेपर भी राजाके सेवकोंने उन्हें क्रोधपूर्वक फटकार दिया। तब वे महातपस्वी ब्रह्मर्षि चुपचाप वनको ही चले गये

Ketika ia masih berkata demikian, para pelayan raja yang diliputi amarah membalasnya dengan kata-kata keras. Sang Brahmarṣi yang bertapa agung memilih menahan diri; ia pun diam dan kembali berangkat menuju rimba—menunjukkan bahwa martabat dan pengendalian diri lebih luhur daripada membalas hinaan dengan hinaan.

Verse 18

उग्र॑ं तप: समास्थाय दिवाकरमथाश्रित: । रहस्यवेदं कृतवान्‌ सूर्यस्य द्विजसत्तम:

Sang dwija terbaik menempuh tapa yang dahsyat dan berlindung pada Divākara, Sang Surya. Dengan disiplin tapa dan bhakti, ia memperoleh rahasya-veda Surya—ajaran Weda yang esoteris dan tersembunyi.

Verse 19

लोगमश उवाच प्रीतास्तस्याभवन्‌ देवा: कर्मणार्वावसोर्नूप,लोमशजी कहते हैं--राजन्‌! अर्वावसुके उस कार्यसे सूर्य आदि सब देवता उसपर प्रसन्न हो गये। उन्होंने अर्वावसुका यज्ञमें वरण कराया एवं परावसुको निकलवा दिया। तत्पश्चात्‌ अग्नि-सूर्य आदि देवताओंने उन्हें वर देनेकी इच्छा प्रकट की

Lomaśa berkata, “Wahai Raja, karena perbuatan Ārvāvasu itu, para dewa menjadi berkenan kepadanya; Surya dan dewa-dewa lainnya pun puas. Mereka memilih Ārvāvasu dalam yajña dan mengusir Parāvasu. Sesudah itu Agni, Sūrya, dan para dewa lainnya menyatakan kehendak untuk menganugerahinya sebuah anugerah.”

Verse 20

त॑ ते प्रवरयामासुर्निरासुश्च॒ परावसुम्‌ । ततो देवा वरं तस्मै ददुरग्निपुरोगमा:,लोमशजी कहते हैं--राजन्‌! अर्वावसुके उस कार्यसे सूर्य आदि सब देवता उसपर प्रसन्न हो गये। उन्होंने अर्वावसुका यज्ञमें वरण कराया एवं परावसुको निकलवा दिया। तत्पश्चात्‌ अग्नि-सूर्य आदि देवताओंने उन्हें वर देनेकी इच्छा प्रकट की

Mereka memilihnya sebagai pelaksana dalam yajña dan mengusir Parāvasu. Lalu para dewa yang dipimpin Agni pun berkehendak menganugerahinya sebuah boon.

Verse 21

स चापि वरयामास पितुरुत्थानमात्मन: । अनागस्त्वं ततो भ्रातुः पितुश्नास्मरणं वधे,तब अर्वावसुने यह वर माँगा कि “मेरे पिताजी जीवित हो जायाँ। मेरे भाई निर्दोष हों और उन्हें पिताके वधकी बात भूल जाय'

Ia pun memilih anugerah: agar ayahnya hidup kembali. Lalu ia memohon pula supaya saudaranya dianggap tak bersalah, dan ingatan tentang pembunuhan sang ayah dihapuskan.

Verse 22

भरद्वाजस्य चोत्थानं यवक्रीतस्य चो भयो: । प्रतिष्ठां चापि वेदस्य सौरस्य द्विजसत्तम: । एवमस्त्विति तं देवा: प्रोचुश्नापि वरान्‌ ददु:,साथ ही उन्होंने यह भी माँगा कि “भरद्वाज तथा यवक्रीत दोनों जी उठें और इस सूर्यदेवतासम्बन्धी रहस्यमय वेदमन्त्रकी प्रतिष्ठा हो।' द्विजश्रेष्ठ अर्वावसुके इस प्रकार वर माँगनेपर देवता बोले--'ऐसा ही हो।” इस प्रकार उन्होंने पूर्वोक्त सभी वर दे दिये

Lomaśa berkata: “Ia memohon anugerah agar Bharadvāja dan Yavakrīta—keduanya—bangkit hidup kembali; dan, wahai yang terbaik di antara para dwija, agar pengetahuan Weda yang berhubungan dengan Dewa Surya ditegakkan kokoh serta memperoleh kewibawaan yang semestinya. Para dewa menjawab, ‘Demikianlah,’ dan mereka pun menganugerahkan karunia-karunia itu.”

Verse 23

ततः प्रादुर्बभूवुस्ते सर्व एव युधिष्ठिर । अथाब्रवीद्‌ यवक्रीतो देवानग्निपुरोगमान्‌,तथायुक्तेन विधिना निहन्तुममरोत्तमा: । युधिष्ठिर! इसके बाद पूर्वोक्त सभी मुनि जीवित हो गये। उस समय यवक्रीतने अग्नि आदि सम्पूर्ण देवताओंसे पूछा--*देवेश्वरो! मैंने वेदका अध्ययन किया है, वेदोक्त व्रतोंका अनुष्ठान भी किया है। मैं स्वाध्यायशील और तपस्वी भी हूँ, तो भी रैभ्यमुनि इस प्रकार अनुचित रीतिसे मेरा वध करनेमें कैसे समर्थ हो सके”

Kemudian, wahai Yudhiṣṭhira, semua resi itu tampak kembali dalam keadaan hidup. Lalu Yavakrīta berbicara kepada para dewa dengan Agni sebagai pemimpin mereka: “Wahai para abadi yang utama, aku telah mempelajari Weda, melaksanakan laku dan brata Weda, serta tekun dalam swādhyāya dan tapa; namun bagaimana mungkin resi Raibhya, dengan cara yang menyimpang dari tata yang benar, sanggup membunuhku?”

Verse 24

समधीतं मया ब्रह्म व्रतानि चरितानि च | कथं च रैभ्य: शक्तो मामधीयानं तपस्विनम्‌

“Aku telah mempelajari Brahman—yakni Weda—dengan semestinya, dan aku pun telah menjalankan brata. Bagaimana mungkin Raibhya berkuasa mencelakai diriku yang sedang tekun belajar dan hidup sebagai pertapa?”

Verse 25

देवा ऊचु मैवं कृथा यवक्रीत यथा वदसि वै मुने । ऋते गुरुमधीता हि सुखं वेदास्त्वया पुरा,देवताओंने कहा--मुनि यवक्रीत! तुम जैसी बात कहते हो, वैसा न समझो। तुमने पूर्वकालमें बिना गुरुके ही सुखपूर्वक सब वेद पढ़े हैं और इन रैभ्यमुनिने बड़े क्लेश उठाकर अपने व्यवहारसे गुरुजनोंको संतुष्ट करके दीर्घकालतक कष्टसहनपूर्वक उत्तम वेदोंका ज्ञान प्राप्त किया है

Para dewa berkata: “Yavakrīta, jangan berpikir seperti yang kau ucapkan, wahai resi. Dahulu engkau memang mempelajari Weda dengan mudah bahkan tanpa guru.”

Verse 26

अनेन तु गुरून्‌ दुःखात्‌ तोषयित्वा55त्मकर्मणा । कालेन महता क्लेशाद्‌ ब्रह्माधिगतमुत्तमम्‌,देवताओंने कहा--मुनि यवक्रीत! तुम जैसी बात कहते हो, वैसा न समझो। तुमने पूर्वकालमें बिना गुरुके ही सुखपूर्वक सब वेद पढ़े हैं और इन रैभ्यमुनिने बड़े क्लेश उठाकर अपने व्यवहारसे गुरुजनोंको संतुष्ट करके दीर्घकालतक कष्टसहनपूर्वक उत्तम वेदोंका ज्ञान प्राप्त किया है

“Namun melalui jalan inilah—dengan menanggung kesukaran dan dengan laku yang tertib—seseorang menyenangkan para sesepuh dan guru. Dalam rentang waktu yang panjang, melalui jerih payah yang besar, pengetahuan suci tertinggi (brahman/veda) dicapai.”

Verse 27

लोगमश उवाच यवक्रीतमथोकत्वैवं देवा: साग्निपुरोगमा: । संजीवयित्वा तानू्‌ सर्वान्‌ पुनर्जग्मुस्त्रिविष्टपम्‌,लोमशजी कहते हैं--राजन्‌! अग्नि आदि देवताओंने यवक्रीतसे ऐसा कहकर उन सबको नूतन जीवन प्रदान करके पुन: स्वर्गलोकको प्रस्थान किया

Lomaśa berkata: “Wahai Raja, para dewa—dengan Agni sebagai pemimpin—setelah berkata demikian kepada Yavakrīta, menghidupkan kembali mereka semua, lalu berangkat lagi menuju Triviṣṭapa (surga).”

Verse 28

आश्रमस्तस्य पुण्यो5यं सदापुष्पफलद्रुम: | अन्रोष्य राजशार्दूल सर्व पापं प्रमोक्ष्यसि,नृपश्रेष्ठ! यह उन्हीं रैभ्यमुनिका पवित्र आश्रम है। यहाँके वृक्ष सदा फ़ूल और फलोंसे लदे रहते हैं। यहाँ एक रात निवास करके तुम सब पापोंसे छूट जाओगे

Lomaśa berkata: “Inilah pertapaan suci sang resi; pepohonannya senantiasa sarat bunga dan buah. Wahai harimau di antara raja-raja, dengan bermalam satu malam di sini engkau akan terbebas dari segala dosa.”

Verse 137

इस प्रकार श्रीमह्ााभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें यवक्रीतोपाख्यानविषयक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-137 Mahābhārata, Vana Parva, dalam bagian Tīrtha-yātrā Parva, pada rangkaian kisah ziarah Lomāśa—bab ini memuat upākhyāna tentang Yavakrīta.

Verse 138

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां यवक्रीतोपाख्याने अष्टात्रिंशधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोगशती र्थयात्राके प्रसंगमें यवक्रीतोपाख्यानविषयक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian (tertandai) bab ke-138 Mahābhārata, Vana Parva, dalam Tīrtha-yātrā Parva, pada rangkaian kisah ziarah Lomāśa—mengenai upākhyāna Yavakrīta.

Verse 183

मूर्तिमांस्तं ददर्शाथ स्वयमग्रभुगव्यय: । वहाँ जाकर उन्होंने भगवान्‌ सूर्यकी शरण ली और बड़ी उग्र तपस्या करके उन ब्राह्मणशिरोमणिने सूर्यसम्बन्धी रहस्यमय वैदिक मन्त्रका अनुष्ठान किया। तदनन्तर अग्रभोजी एवं अविनाशी साक्षात्‌ भगवान्‌ सूर्यने साकाररूपमें प्रकट हो अर्वावसुको दर्शन दिया

Kemudian Sang Dewa Surya yang tak binasa—penikmat utama persembahan—menampakkan diri dalam wujud nyata, dan ia melihat-Nya secara langsung. Setelah berlindung pada Surya, menjalani tapa yang keras, serta melaksanakan upacara Weda menurut tata cara yang terkait dengan mantra rahasia Surya, Arvāvāsu memperoleh anugerah darśana sang dewa.

Verse 243

तथायुक्तेन विधिना निहन्तुममरोत्तमा: । युधिष्ठिर! इसके बाद पूर्वोक्त सभी मुनि जीवित हो गये। उस समय यवक्रीतने अग्नि आदि सम्पूर्ण देवताओंसे पूछा--*देवेश्वरो! मैंने वेदका अध्ययन किया है, वेदोक्त व्रतोंका अनुष्ठान भी किया है। मैं स्वाध्यायशील और तपस्वी भी हूँ, तो भी रैभ्यमुनि इस प्रकार अनुचित रीतिसे मेरा वध करनेमें कैसे समर्थ हो सके”

Lomaśa berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, dengan tata-cara yang tepat para dewa termulia di antara yang abadi berhasil memusnahkan bahaya itu; sesudahnya semua resi yang telah disebutkan sebelumnya hidup kembali. Pada saat itu Yavakrīta bertanya kepada Agni dan para dewa lainnya: ‘Wahai Penguasa para dewa, aku telah mempelajari Weda dan melaksanakan laku serta kaul yang diajarkan Weda. Aku tekun dalam swādhyāya dan bertapa; namun bagaimana mungkin resi Raibhya sanggup membunuhku dengan cara yang tidak semestinya?’”

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether preserving ritual continuity and personal reputation can justify concealment and blame transfer after unintended harm; the chapter critiques expedient misattribution and elevates transparent remediation.

The gods distinguish effortless learning without proper guru-framework from knowledge attained through sustained service and correct method, presenting discipline and right procedure as integral to legitimate attainment.

Yes: the closing assertion that the āśrama is inherently meritorious and that dwelling there leads to release from sins functions as a localized phalaśruti, framing the narrative as both exemplum and sacred-geographic endorsement.