
अष्टावक्र-प्रवेशः तथा ब्रह्मोद्य-प्रारम्भः (Aṣṭāvakra’s Entry and the Opening of the Brahmodya)
Upa-parva: Aṣṭāvakra–Bandī Saṃvāda (Debate at Janaka’s sacrificial assembly)
Chapter 133 presents a structured exchange among Aṣṭāvakra, a gatekeeper, and the presiding king (Janaka). The gatekeeper enforces a rule that only ‘elders’ may enter the sacrificial assembly; Aṣṭāvakra counters by arguing that bodily growth is not the measure of maturity, offering aphoristic criteria: true seniority is knowledge (prajñā), disciplined conduct, and Vedic competence. The dialogue escalates into a formal testing of speech-power through brahmodya riddles posed by the king and answered by Aṣṭāvakra, demonstrating mastery of symbolic Vedic imagery (e.g., wheel/cycle metaphors, categorical riddles about nature). Concluding the sequence, the king recognizes Aṣṭāvakra’s exceptional rhetorical and intellectual capacity and grants passage toward the confrontation with Bandī, establishing debate as a legitimate instrument for determining authority in the ritual court.
Chapter Arc: लोमश ऋषि अष्टावक्र के जन्म-वृत्तान्त का सूत्र उठाते हैं—एक ऐसे बालक का, जिसकी बुद्धि मन्त्रविद्-सी तीक्ष्ण है और जिसका भाग्य जनक के राजदरबार तक खिंचता है। → आश्रम-जीवन में श्वेतकेतु को सरस्वती का मानुष-रूप दर्शन होता है; उसी युग के श्रेष्ठ ब्रह्मकृत मुनियों में कहोड-पुत्र अष्टावक्र और उद्दालक-पुत्र श्वेतकेतु का निकट सम्बन्ध बनता है। गर्भवती सुजाता की व्यथा (दसवाँ महीना, साधनहीनता) और परिवार पर छाया संकट संकेत देता है कि विद्या और दरिद्रता, दोनों की परीक्षा निकट है। → बालक अष्टावक्र अपनी वाद-निपुणता से प्रतिवादियों को परास्त कर उन्हें नदी में डुबो देने तक की कठोर परिणति पहुँचा देता है—यह उसकी असाधारण प्रतिभा के साथ-साथ उसके भीतर पलते आक्रोश/प्रतिशोध का भी विस्फोट है। → सुजाता पुत्र के मन्त्र-रहस्य की रक्षा करती है; अष्टावक्र जन्म के बाद भी पिता-वियोग/अज्ञान की छाया में पलता है, उद्दालक को पिता-तुल्य और श्वेतकेतु को भ्राता-तुल्य मानता है। श्वेतकेतु अपने हृदय में चुभी कटूक्ति से व्याकुल होकर माता से पिता का समाचार पूछता है; दोनों (मामा-भानजा) जनक के यज्ञ-समृद्ध दरबार की ओर चल पड़ते हैं, जहाँ जाने से वाणी, प्रवचन-शक्ति और ब्रह्मघोष की मधुरता बढ़ने की आशा है। → मार्ग में अष्टावक्र का राजा से सामना होता है और उसे रोके/हटाए जाने की स्थिति बनती है—तभी वह तीखा वचन कहकर अपने अधिकार और उद्देश्य की घोषणा करता है; जनक के दरबार में होने वाला निर्णायक वाद अभी शेष है।
Verse 1
अपना स२ (0 अवज असल द्वात्रिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: अष्टावक्रके जन्मका वृत्तान्त और उनका राजा जनकके दरबारमें जाना लोगमश उवाच यः कथ्यते मन्त्रविदग्थबुद्धि- रौद्दालकि: श्वेतकेतु: पृथिव्याम् । तस्याश्रमं पश्य नरेन्द्र पुण्यं सदाफलैरुपपन्न महीजै:,लोमशजी कहते हैं--युधिष्ठिर! उद्दालकके पुत्र श्वेतकेतु हो गये हैं, जो इस भूतलपर मन्त्र-शास्त्रमें अत्यन्त निपुण कहे जाते थे, देखो यह पवित्र आश्रम उन्हींका है। जो सदा फल देनेवाले वृक्षोंसे हरा-भरा दिखायी देता है
Lomāśa berkata: “Wahai raja, inilah pertapaan suci Śvetaketu, putra Uddālaka—termashur di bumi karena kecerdasan yang ditempa oleh penguasaan mantra-mantra suci. Lihatlah āśrama yang murni ini, kaya oleh pepohonan yang berbuah di setiap musim.”
Verse 2
साक्षादत्र श्वेतकेतुर्ददर्श सरस्वती मानुषदेहरूपाम् | वेत्स्यामि वाणीमिति सम्प्रवृत्तां सरस्वती श्वेतकेतुर्बभाषे,इस आश्रममें श्वेतकेतुने मानवरूपधारिणी सरस्वती देवीका प्रत्यक्ष दर्शन किया था और अपने निकट आयी हुई उन सरस्वतीसे यह कहा था कि “मैं वाणीस्वरूपा आपके तत्त्वको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ
Lomāśa berkata: “Di pertapaan ini, Śvetaketu menyaksikan langsung Dewi Sarasvatī yang mengambil rupa manusia. Ketika beliau mendekat, Śvetaketu berkata kepada Sarasvatī, ‘Wahai Vāk, wujud sabda suci, aku ingin memahami hakikatmu yang sejati.’”
Verse 3
तस्मिन् युगे ब्रह्मकृतां वरिष्ठा- वास्तां मुनी मातुलभागिनेयौ । अष्टावक्रश्वचैव कहोडसूनु- रौद्दालकि: श्वेतकेतु: पृथिव्याम्,उस युगमें कहोड मुनिके पुत्र अष्टावक्र और उद्दालकनन्दन श्वेतकेतु ये दोनों महर्षि समस्त भूमण्डलके वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे। वे आपसमें मामा और भानजा लगते थे (इनमें श्वेतकेतु ही मामा था)
Lomāśa berkata: “Pada zaman itu, di bumi ada dua resi yang paling utama di antara para ahli Veda: Aṣṭāvakra, putra Kahōḍa, dan Śvetaketu, putra Uddālaka. Keduanya berkerabat sebagai paman dari pihak ibu dan keponakan; Śvetaketu adalah sang paman.”
Verse 4
विदेहराजस्य महीपतेस्तौ विप्रावुभी मातुलभागिनेयौ । प्रविश्य यज्ञायतनं विवादे बर्न्दि निजग्राहतुरप्रमेयौ,एक समय वे दोनों मामा-भानजे विदेहराजके यज्ञमण्डपमें गये। दोनों ही ब्राह्मण अनुपम विद्दान् थे। वहाँ शास्त्रार्थ होनेपर उन दोनोंने अपने (विपक्षी) बन्दीको जीत लिया
Lomāśa berkata: “Kedua Brahmana itu—paman dan keponakan—memasuki balai yajña raja Videha. Keduanya tiada banding dalam ilmu. Ketika perdebatan śāstra terjadi, mereka menundukkan lawan mereka, Bandin, dengan daya pengetahuan.”
Verse 5
उपास्स्व कौन्तेय सहानुजस्त्व॑ तस्याश्रमं पुण्यतमं प्रविश्य । अष्टाकक्रं यस्य दौहित्रमाहु- यॉ5सौ बरन्दि जनकस्याथ यज्ञे,कुन्तीनन्दन! विप्रशिरोमणि अष्टावक्र वाद-विवादमें बड़े निपुण थे। उन्होंने बाल्यावस्थामें ही महाराज जनकके यज्ञमण्डपमें पधारकर अपने प्रतिवादी बन्दीको पराजित करके नदीमें डलवा दिया था। वे अष्टावक्र मुनि जिन महात्मा उद्दालकके दौहित्र (नाती) बताये जाते हैं, उन््हींका यह परम पवित्र आश्रम है। तुम अपने भाइयोंसहित इसमें प्रवेश करके कुछ देरतक उपासना (भगवच्चिन्तन) करो
Lomaśa berkata: “Wahai putra Kuntī, masuklah ke pertapaan yang paling suci ini bersama adik-adikmu, dan berdiam sejenak dalam pemujaan serta perenungan. Inilah āśrama suci milik resi Aṣṭāvakra—yang disebut orang sebagai cucu Uddālaka—dialah yang di yajña Raja Janaka menundukkan Bandī dalam perdebatan.”
Verse 6
वादी विप्राग्रयो बाल एवाभिगम्य वादे भड़कत्वा मज्जयामास नद्याम्,कुन्तीनन्दन! विप्रशिरोमणि अष्टावक्र वाद-विवादमें बड़े निपुण थे। उन्होंने बाल्यावस्थामें ही महाराज जनकके यज्ञमण्डपमें पधारकर अपने प्रतिवादी बन्दीको पराजित करके नदीमें डलवा दिया था। वे अष्टावक्र मुनि जिन महात्मा उद्दालकके दौहित्र (नाती) बताये जाते हैं, उन््हींका यह परम पवित्र आश्रम है। तुम अपने भाइयोंसहित इसमें प्रवेश करके कुछ देरतक उपासना (भगवच्चिन्तन) करो
Lomaśa berkata: “Wahai putra Kuntī, Aṣṭāvakra—brahmana terkemuka itu—meski masih kanak-kanak, mendatangi gelanggang debat; dengan ikatan argumen ia menundukkan lawannya dan membuatnya dilempar ke sungai. Sang permata para resi, Aṣṭāvakra, amat mahir dalam disputasi; bahkan sejak kecil ia datang ke balairung yajña Raja Janaka, mengalahkan Bandī, lalu menjatuhkannya ke air. Aṣṭāvakra yang termasyhur sebagai cucu Uddālaka itulah pemilik pertapaan yang tersuci ini. Masuklah bersama saudara-saudaramu dan beribadahlah sejenak—tegakkan batin dalam ingatan kepada Tuhan.”
Verse 7
युधिछिर उवाच कथ्थंप्रभाव: स बभूव विप्र- स्तथाभूतं यो निजग्राह बन्दिम् । अष्टावक्र: केन चासौ बभूव तत् सर्व मे लोमश शंस तत्त्वम्,युधिष्ठिरने पूछा--लोमशजी! उन ब्रह्मर्षिका कैसा प्रभाव था, जिन्होंने बन्दी-जैसे सुप्रसिद्ध विद्वानको भी जीत लिया। वे किस कारणसे अष्टावक्र (आठों अड्ोंसे टेढ़े-मेढ़े) हो गये। ये सब बातें मुझे यथार्थरूपसे बताइये
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Lomaśa, keagungan apakah yang dimiliki brahmana itu hingga ia menaklukkan Bandin, sang pendebat termasyhur? Dan karena sebab apakah ia menjadi Aṣṭāvakra—bengkok pada delapan bagian? Ceritakan semuanya kepadaku dengan benar dan lengkap.”
Verse 8
लोगश उवाच उद्दालकस्य नियत: शिष्य एको नाम्ना कहोड इति विश्लुतो5भूत् । शुश्रूषुराचार्यवशानुवर्ती दीर्घ कालं सो5ध्ययनं चकार,लोमशजीने कहा--राजन्! महर्षि उद्दालकका कहोड नामसे विख्यात एक शिष्य था जो बड़े संयम-नियमसे रहकर आचार्यकी सेवा किया करता था। उसने गुरुकी आज्ञाके अंदर रहकर दीर्घकालतक अध्ययन किया
Lomaśa berkata: “Wahai Raja, Uddālaka memiliki seorang murid yang berdisiplin bernama Kahoda, yang kemudian termasyhur. Ia tekun melayani ācārya-nya, patuh pada perintah guru, dan menempuh pelajaran dalam waktu yang panjang.”
Verse 9
त॑ वै विप्र: पर्यचरत् सशिष्य- स््तां च ज्ञात्वा परिचर्या गुरु: सः । तस्मै प्रादात् सद्य एव श्रुतं च भार्या च वै दुहितरं स्वां सुजाताम्,विप्रवर “कहोड' एक विनीत शिष्यकी भाँति उद्दालक मुनिकी परिचर्यामें संलग्न रहते थे। गुरुने शिष्यकी उस सेवाके महत्त्वको समझकर शीघ्र ही उन्हें सम्पूर्ण वेद-शास्त्रोंका ज्ञान करा दिया और अपनी पुत्री सुजाताको भी उन्हें पत्नीरूपसे समर्पित कर दिया
Brahmana itu (Kahoda) melayani gurunya dengan tekun, laksana murid yang rendah hati. Menyadari nilai pengabdian itu, sang guru segera menganugerahkan kepadanya śruti-vidyā (ajaran Weda) dan juga menyerahkan putrinya yang mulia, Sujātā, sebagai istri.
Verse 10
तस्या गर्भ: समभवदग्निकल्प: सो<धीयानं पितरं चाप्युवाच । सर्वा रात्रिमध्ययनं करोषि नेदं पितः सम्यगिवोपवर्तते,< कुछ कालके बाद सुजाता गर्भवती हुई, उसका वह गर्भ अग्निके समान तेजस्वी था। एक दिन स्वाध्यायमें लगे हुए अपने पिता कहोड मुनिसे उस गर्भस्थ बालकने कहा, “पिताजी! आप रातभर वेदपाठ करते हैं तो भी आपका वह अध्ययन अच्छी प्रकारसे शुद्ध उच्चारणपूर्वक नहीं हो पाता”
Beberapa waktu kemudian Sujātā mengandung; anak dalam rahimnya bercahaya laksana api. Suatu hari, ketika ayahnya, resi Kahoda, tekun melantunkan bacaan suci sepanjang malam, sang putra yang masih dalam kandungan berkata, “Ayah, meski engkau belajar semalam suntuk, bacaanmu tampaknya belum berjalan dengan tepat, belum mantap dalam ketelitian dan kemurnian pelafalan.”
Verse 11
उपालब्ध: शिष्यमध्ये महर्षि: स त॑ं कोपादुदरस्थं शशाप । यस्मात् कुक्षौ वर्तमानो ब्रवीषि तस्माद् वक्रो भवितास्यष्टकृत्व:,शिष्योंके बीचमें बैठे हुए महर्षि कहोड इस प्रकार उलाहना सुनकर अपमानका अनुभव करते हुए कुपित हो उठे और उस गर्भस्थ बालकको शाप देते हुए बोले, “अरे! तू अभी पेटमें रहकर ऐसी टेढ़ी बातें बोलता है, अतः तू आठों अंगोंसे टेढ़ा हो जायगा'
Ditegur di hadapan para muridnya, resi agung itu merasa terhina; amarahnya menyala, lalu ia mengutuk anak yang masih dalam kandungan: “Karena engkau, meski berada dalam rahim, mengucapkan kata-kata yang menyimpang, maka engkau akan menjadi bengkok dalam delapan bagian (delapan anggota tubuh).”
Verse 12
स वै तथा वक्र एवाभ्यजाय- दष्टावक्र: प्रथितो वै महर्षि: | अस्यासीद् वै मातुल: श्वेतकेतु: स तेन तुल्यो वयसा बभूव,उस शापके अनुसार वे महर्षि आठों अंगोंसे टेढ़े होकर पैदा हुए। इसलिये अष्टावक्र नामसे उनकी प्रसिद्धि हुई। श्वेतकेतु उनके मामा थे, परंतु अवस्थामें उन्हींके बराबर थे
Sesuai kutukan itu, sang resi benar-benar terlahir dengan tubuh yang bengkok; karena itulah ia termasyhur dengan nama ‘Aṣṭāvakra’ (yang memiliki delapan lekuk). Paman dari pihak ibu baginya adalah Śvetaketu, namun Śvetaketu seumur dengannya.
Verse 13
सम्पीड्यमाना तु तदा सुजाता सा वर्धमानेन सुतेन कुक्षौ । उवाच भर्तारमिदं रहोगता प्रसाद्य हीनं वसुना धनार्थिनी,जब पेटमें गर्भ बढ़ रहा था, उस समय सुजाताने उससे पीड़ित होकर एकान्तमें अपने निर्धन पतिसे धनकी इच्छा रखकर कहा--
Pada saat itu, ketika anak dalam kandungannya kian membesar dan Sujātā merasa terhimpit oleh rasa sakit, ia menemui suaminya secara diam-diam. Berusaha melunakkan hati suaminya yang miskin, demi mengharap harta, ia berkata demikian.
Verse 14
कथं करिष्याम्यधुना महर्षे मासक्षायं दशमो वर्तते मे । नैवास्ति ते वसु किंचित् प्रजाता येनाहमेतामापदं निस्तरेयम्,“महर्षे! यह मेरे गर्भका दसवाँ महीना चल रहा है। मैं धनहीन नारी खर्चकी कैसे व्यवस्था करूँगी। आपके पास थोड़ा-सा भी धन नहीं है जिससे मैं प्रसवकालके इस संकटसे पार हो सकूँ”
“Wahai resi agung, apa yang harus kulakukan sekarang? Bulan kesepuluh kehamilanku hampir berakhir. Aku perempuan tanpa harta—bagaimana aku menanggung biaya? Engkau pun tak memiliki sedikit pun kekayaan, yang dengannya aku dapat melewati kesukaran ini pada saat melahirkan.”
Verse 15
उक्तस्त्वेवं भार्यया वै कहोडो वित्तस्यार्थे जनकमथाभ्यगच्छत् । स वै तदा वादविदा निगृहा निमज्जितो बन्दिनेहाप्सु विप्र:,पत्नीके ऐसा कहनेपर कहोड मुनि धनके लिये राजा जनकके दरबारमें गये। उस समय शात्त्रार्थी पण्डित बन्दीने उन ब्रह्मर्षिको विवादमें हराकर जलमें डुबो दिया
Didorong oleh istrinya, Kahoda pergi menghadap Raja Janaka untuk memperoleh harta. Di sana, dalam sidang itu, Bandi—ahli debat—mengalahkan sang brahmana dalam perdebatan, menundukkannya, lalu menyuruhnya ditenggelamkan ke dalam air.
Verse 16
उद्दालकस्तं तु तदा निशम्य सूतेन वादे5प्सु निमज्जितं तथा । उवाच तां तत्र ततः सुजाता- मष्टावक्रे गृहितव्योड्यमर्थ:,जब उद्दालकको यह समाचार मिला कि “कहोड मुनि शात्त्रार्थमें पराजित होनेपर सूत (बन्दी)-के द्वारा जलमें डुबो दिये गये।” तब उन्होंने सुजातासे सब कुछ बता दिया और कहा, “बेटी! अपने बच्चेसे इस वृत्तान्तको सदा ही गुप्त रखना”
Ketika Uddālaka mendengar bahwa Kahoda, setelah kalah dalam debat, ditenggelamkan ke dalam air oleh sang sais (Bandi), ia menceritakan seluruh perkara itu kepada Sujātā dan berkata, “Anakku, biarlah Aṣṭāvakra kelak memegang perkara ini teguh dalam hati—namun untuk saat ini, rahasiakanlah darinya.”
Verse 17
ररक्ष सा चापि तमस्य मन्त्र जातो>प्यसौ नैव शुश्राव विप्र: । उद्दालकं पितृवच्चापि मेने तथाष्टावक्रो भ्रातृवच्छवेतकेतुम्,सुजाताने भी अपने पुत्रसे उस गोपनीय समाचारको गुप्त ही रखा। इसीसे जन्म लेनेके बाद भी उस ब्राह्मण-बालकको इसके विषयमें कुछ भी पता न लगा। अष्टावक्र अपने नाना उद्दालकको ही पिताके समान मानते थे और श्वेतकेतुको अपने भाईके समान समझते थे
Sujātā pun menjaga rahasia itu, menyembunyikannya bahkan dari putranya. Karena itu, meski telah lahir, anak brahmana itu tidak mengetahui apa pun tentangnya. Aṣṭāvakra memandang Uddālaka seperti ayah, dan menganggap Śvetaketu seperti saudara.
Verse 18
ततो वर्षे द्वादशे श्वेतकेतु- रष्टावक्रं पितुरड्के निषण्णम् | अपाकर्षद् गृह पाणौ रुदन्तं नायं तवाड्कः: पितुरित्युक्तवांश्व,तदनन्तर एक दिन, जब अष्टावक्रकी आयु बारह वर्षकी थी और वे पितृतुल्य उद्दालक मुनिकी गोदमें बैठे हुए थे, उसी समय श्वेतकेतु वहाँ आये और रोते हुए अष्टावक्रका हाथ पकड़कर उन्हें दूर खींच ले गये। इस प्रकार अष्टावक्रको दूर हटाकर श्वेतकेतुने कहा--'यह तेरे बापकी गोदी नहीं है!
Kemudian, pada tahun kedua belas, Śvetaketu melihat Aṣṭāvakra duduk di pangkuan ayahnya. Ia menggenggam tangan anak yang menangis itu, menariknya menjauh, dan berkata, “Itu bukan pangkuan ayahmu.”
Verse 19
यत् तेनोक्तं दुरुक्त तत् तदानीं ह्ृदि स्थितं तस्य सुदुःखमासीत् | गृहं गत्वा मातरं सो5भिगम्य पप्रच्छेद॑ क्व नु तातो ममेति,ब्ेतकेतुकी उस कटूक्तिने उस समय अष्टावक्रके हृदयमें गहरी चोट पहुँचायी। इससे उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने घरमें माताके पास जाकर पूछा --'माँ! मेरे पिताजी कहाँ हैं?”
Ucapan pedas itu seketika menancap di hati Aṣṭāvakra dan menimbulkan duka yang amat dalam. Ia pulang ke rumah, mendekati ibunya, lalu bertanya, “Ibu, di manakah ayahku?”
Verse 20
ततः सुजाता परमार्तरूपा शापाद् भीता सर्वमेवाचचक्षे । तद् वै तत्त्वं सर्वमाज्ञाय रात्रा- वित्यब्रवीच्छवेतकेतुं स विप्र:,बालकके इस प्रश्नसे सुजाताके मनमें बड़ी व्यथा हुई, उसने शापके भयसे घबराकर सब बात बता दी। यह सब रहस्य जानकर उन्होंने रातमें श्वेतकेतुसे इस प्रकार कहा--'हम दोनों राजा जनकके यज्ञमें चलें। सुना जाता है, उस यजञ्ञमें बड़े आश्वर्यकी बातें देखनेमें आती हैं। हम दोनों वहाँ विद्वान ब्राह्मणोंका शास्त्रार्थ सुनेंगे और वहीं उत्तम पदार्थ भोजन करेंगे
Maka Sujātā, diliputi duka yang amat dalam dan gentar oleh kutukan, mengungkapkan semuanya. Setelah mengetahui seluruh kebenaran, brahmana itu berkata kepada Śvetaketu pada malam hari: “Marilah kita berdua pergi ke yajña Raja Janaka. Konon, di sana tampak hal-hal yang menakjubkan. Kita akan mendengarkan perdebatan para brahmana terpelajar tentang śāstra, dan di sana pula kita akan menyantap hidangan yang terbaik.”
Verse 21
गच्छाव यज्ञ जनकस्य राज्ञो बन्दाश्चर्य: श्रूयते तस्य यज्ञ: । श्रोष्यावोजत्र ब्राह्मणानां विवाद- मर्थ चाग्रयं तत्र भोक्ष्यावहे च,बालकके इस प्रश्नसे सुजाताके मनमें बड़ी व्यथा हुई, उसने शापके भयसे घबराकर सब बात बता दी। यह सब रहस्य जानकर उन्होंने रातमें श्वेतकेतुसे इस प्रकार कहा--'हम दोनों राजा जनकके यज्ञमें चलें। सुना जाता है, उस यजञ्ञमें बड़े आश्वर्यकी बातें देखनेमें आती हैं। हम दोनों वहाँ विद्वान ब्राह्मणोंका शास्त्रार्थ सुनेंगे और वहीं उत्तम पदार्थ भोजन करेंगे
“Mari kita pergi ke yajña Raja Janaka. Konon yajñanya penuh keajaiban. Di sana kita akan mendengarkan perdebatan para brahmana tentang śāstra, dan di sana pula kita akan menikmati santapan yang paling utama.”
Verse 22
विचक्षणत्वं च भविष्यते नौ शिवश्न सौम्यश्न हि ब्रह्मघोष:,“वहाँ जानेसे हमलोगोंकी प्रवचनशक्ति एवं जानकारी बढ़ेगी और हमें सुमधुर स्वरमें वेद-मन्त्रोंका कल्याणकारी घोष सुननेका अवसर मिलेगा”
“Jika kita pergi ke sana, daya pembedaan dan kemampuan kita dalam menguraikan ajaran akan bertambah; dan kita pun berkesempatan mendengar lantunan mantra-mantra Weda yang lembut dan membawa berkah dalam bunyinya.”
Verse 23
तौ जम्मतुर्मातुलभागिनेयौ यज्ञ समृद्धं जनकस्य राज्ञ: । अष्टावक्र: पथि राज्ञा समेत्य प्रोत्सार्यमाणो वाक्यमिदं जगाद,ऐसा निश्चय करके वे दोनों मामा-भानजे राजा जनकके समृद्धिशाली यज्ञमें गये। अष्टावक्रकी यज्ञ-मण्डपके मार्ममें ही राजासे भेंट हो गयी। उस समय राजसेवक उन्हें रास्तेसे दूर हटाने लगे, तब वे इस प्रकार बोले
Dengan tekad demikian, paman dari pihak ibu dan keponakannya berangkat menuju yajña Raja Janaka yang kaya persembahan. Di perjalanan, Aṣṭāvakra berjumpa dengan sang raja dekat kawasan pendapa yajña. Ketika para pengawal istana hendak menyingkirkannya dari jalan, Aṣṭāvakra mengucapkan kata-kata ini.
Verse 132
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामष्टावक्रीये द्वात्रिशदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्चमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगें अष्टावक्रीयोपाख्यानविषयक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikianlah dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva, dalam bagian Tīrthayātrā Parva, pada kisah perjalanan ziarah Lomasa, berakhirlah bab ke-132 dari upākhyāna Aṣṭāvakra.
The dilemma concerns eligibility and authority: whether access to sacred/public deliberation should be determined by external markers (age/appearance) or by demonstrable knowledge, discipline, and truthful speech.
Maturity is not identical with years; ‘elderhood’ is defined by understanding (prajñā), self-control, and learning—thus evaluative standards should prioritize inner qualification over bodily or social indicators.
No explicit phalaśruti is stated in this unit; the chapter’s meta-point is implicit—public reasoning and Vedic debate serve as a method for validating authority and refining dharmic judgment.