
Nṛga-upākhyāna: Brāhmaṇa-sva and the Consequence of Misappropriated Gift-Cattle (कृकलास-रूपे नृगोपाख्यानम्)
Upa-parva: Brāhmaṇa-sva Anuśāsana (Instruction on Brahmin Property and Non-appropriation)
Bhīṣma narrates an exemplum about King Nṛga to illustrate the severity of brāhmaṇa-sva appropriation. In Dvāravatī, water-seekers discover a concealed well in which a massive lizard (kṛkalāsa) is trapped. Unable to extract it, they inform Vāsudeva (Kṛṣṇa), who lifts it out. The being reveals himself as King Nṛga, renowned for extensive gifting, yet fallen into a degraded condition due to an inadvertent wrong: a cow from a brāhmaṇa’s herd strayed into Nṛga’s cattle and was later given away as a gift to another brāhmaṇa. When the original owner reclaimed it, both brāhmaṇas contested ownership and appealed to Nṛga as donor. Nṛga offered large compensations—hundreds and even vast numbers of cows, plus valuables—but the recipient refused, insisting on the original cow. Nṛga then recounts his post-mortem audience with Yama (Dharmarāja), who acknowledges Nṛga’s immense merit yet identifies a residual fault: an untrue pledge of protection, failure in promise, and taking brāhmaṇa property—described as a threefold transgression. Nṛga chooses to undergo the painful consequence first, resulting in his non-human embodiment in the well, while retaining memory. After a thousand years, Kṛṣṇa’s intervention—foretold by Yama—liberates him, and he ascends to higher worlds. Kṛṣṇa concludes with an explicit norm: one who understands should not take brāhmaṇa property; it destroys the taker as the brāhmaṇa’s cow destroyed Nṛga, and association with the virtuous is not fruitless, since it facilitated Nṛga’s release. The chapter closes by warning against wrongdoing toward cows and emphasizing that both giving and harm bear corresponding results.
Chapter Arc: युधिष्ठिर, दान-धर्म की सूक्ष्मताओं को जानने की उत्कंठा से, भीष्म से पूछते हैं—दह्यमान (कष्टग्रस्त) ब्राह्मण को उपानह (जूते) देने का फल क्या होता है? → भीष्म क्रमशः दानों की शृंखला खोलते हैं—जूता, शकट (गाड़ी), तिल, भूमि, गौ और अन्न—और बताते हैं कि दान केवल वस्तु-प्रदान नहीं, बल्कि जीवन-यात्रा के काँटों, विषमताओं और संकट-पथों को पार कराने वाला धर्म-सेतु है। भूमि-दान में ‘किस भूमि का दान न किया जाए’ जैसी मर्यादाएँ (ऊसर/निर्दग्ध भूमि) जोड़कर वे दान की शुद्धता और विवेक की कसौटी रखते हैं। → गोदान-माहात्म्य का उत्कर्ष आता है—गौ को तपस्वियों से भी श्रेष्ठ कहा जाता है; देव-स्तुति और महेश्वर का तप-सम्बन्धित संकेत (महेश्वर तपस्ताभिः सह) दान को ब्रह्माण्डीय धर्म-व्यवस्था से जोड़ देता है। गौ के बहुविध उपकार (दूध, दही, घी, गोबर, चमड़ा, हड्डी, सींग, बाल) और ब्रह्मलोक/चन्द्र-सहवास जैसी परमगति की प्रतिज्ञा गोदान को अध्याय का शिखर बना देती है। → भीष्म दानों के फल को ‘अक्षय’ और ‘लोक-प्राप्ति’ के रूप में स्थिर करते हैं—अन्नदान (विशेषतः कार्तिक शुक्लपक्ष/कौमुदी) से दुर्ग-संकट-तरण और परलोक में अनन्त्य; भूमि-दान में योग्य भूमि का विधान; और गोदान से दीर्घकालिक पुण्य-सम्पदा। युधिष्ठिर के प्रश्न का उत्तर व्यापक दान-धर्म के विधान में परिणत हो जाता है। → इसके बाद ‘गोदान का माहात्म्य’ और अधिक विस्तार से बताने का संकेत देकर भीष्म आगे की कथा-धारा के लिए द्वार खोलते हैं।
Verse 1
षट्षष्टितमो<5 ध्याय: जूता, शकट, तिल, भूमि, गौ और अन्नके दानका माहात्म्य युधिछिर उवाच दह्यमानाय विप्राय य: प्रयच्छत्युपानहौ । यत् फलं तस्य भवति तनमे ब्रूहि पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! गर्मीके दिनोंमें जिसके पैर जल रहे हों, ऐसे ब्राह्मणको जो जूते पहनाता है, उसको जो फल मिलता है, वह मुझे बताइये
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Kakek, katakan kepadaku pahala apakah yang diperoleh seseorang yang menghadiahkan alas kaki kepada seorang brāhmaṇa yang kakinya terbakar oleh panas.”
Verse 2
भीष्म उवाच उपानहीौ प्रयच्छेद् यो ब्राह्मणे भ्य: समाहित: । मर्दते कण्टकान् सर्वान् विषमान्निस्तरत्यपि,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! जो एकाग्रचित्त होकर ब्राह्मणोंके लिये जूते दान करता है, वह सब कण्टकोंको मसल डालता है और कठिन विपत्तिसे भी पार हो जाता है। इतना ही नहीं, वह शत्रुओंके ऊपर विराजमान होता है। प्रजानाथ! उसे जन्मान्तरमें खच्चरियोंसे जुता हुआ उज्ज्वल रथ प्राप्त होता है
Bhishma berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, siapa yang dengan batin terpusat memberikan alas kaki kepada para brāhmaṇa, ia menghancurkan segala ‘duri’ (rintangan) dan menyeberangi kesukaran yang paling berat sekalipun.”
Verse 3
स शत्रूणामुपरि च संतिष्ठति युधिष्ठिर । यान॑ चाश्वतरीयुक्त तस्य शुभ्र॑ं विशाम्पते,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! जो एकाग्रचित्त होकर ब्राह्मणोंके लिये जूते दान करता है, वह सब कण्टकोंको मसल डालता है और कठिन विपत्तिसे भी पार हो जाता है। इतना ही नहीं, वह शत्रुओंके ऊपर विराजमान होता है। प्रजानाथ! उसे जन्मान्तरमें खच्चरियोंसे जुता हुआ उज्ज्वल रथ प्राप्त होता है
Bhishma berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, ia berdiri di atas musuh-musuhnya dalam kemenangan; dan wahai pemimpin rakyat, pada kelahiran berikutnya ia memperoleh kendaraan yang cemerlang—sebuah kereta putih bercahaya yang ditarik oleh bagal.”
Verse 4
उपतिष्ठति कौन्तेय रौप्पकाउ्चन भूषितम् । शकटं दम्यसंयुक्तं दत्त भवति चैव हि,कुन्तीकुमार! जो नये बैलोंसे युक्त शकट दान करता है, उसे चाँदी और सोनेसे जटित रथ प्राप्त होता है
Bhīṣma berkata: “Wahai putra Kuntī, siapa yang bersedekah sebuah pedati yang dipasangi lembu-lembu baru yang terlatih, baginya datang sebagai buahnya sebuah kereta perang berhias perak dan emas.”
Verse 5
युधिछिर उवाच यत् फलं तिलदाने च भूमिदाने च कीर्तितम् | गोदाने चान्नदाने च भूयस्तद् ब्रूहि कौरव,युधिष्ठिरने पूछा--कुरुनन्दन! तिल, भूमि, गौ और अन्नका दान करनेसे क्या फल मिलता है? इसका फिरसे वर्णन कीजिये
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Kaurava, jelaskan lagi dengan lebih lengkap pahala yang dinyatakan bagi sedekah wijen, sedekah tanah, sedekah sapi, dan sedekah makanan.”
Verse 6
भीष्म उवाच शृणुष्व मम कौन्तेय तिलदानस्य यत् फलम् | निशम्य च यथान्यायं प्रयच्छ कुरुसत्तम,भीष्मजीने कहा--कुन्तीनन्दन! कुरुश्रेष्ठ! तिलदानका जो फल है, वह मुझसे सुनो और सुनकर यथोचित रूपसे उसका दान करो
Bhīṣma berkata: “Wahai putra Kuntī, wahai yang terbaik di antara para Kuru, dengarkan dariku buah sedekah wijen. Setelah mendengarnya, berdermalah dengan cara yang patut menurut dharma.”
Verse 7
पितृणां परमं भोज्यं तिला: सृष्टा: स्वयम्भुवा । तिलदानेन वै तस्मात् पितृपक्ष: प्रमोदते,ब्रह्माजीने जो तिल उत्पन्न किये हैं, वे पितरोंके सर्वश्रेष्ठ खाद्य पदार्थ हैं। इसलिये तिल दान करनेसे पितरोंको बड़ी प्रसन्नता होती है
Bhīṣma berkata: “Wijen, yang diciptakan oleh Sang Swabhū (Brahmā), adalah santapan persembahan yang paling utama bagi para Pitṛ. Karena itu, dengan bersedekah wijen, para leluhur bersukacita pada masa Pitṛpakṣa.”
Verse 8
माघमासे तिलान् यस्तु ब्राह्मणेभ्य: प्रयच्छति । सर्वसत्त्वसमाकीर्ण नरकं स न पश्यति,जो माघ मासमें ब्राह्मणोंको तिल दान करता है, वह समस्त जन्तुओंसे भरे हुए नरकका दर्शन नहीं करता
Bhīṣma berkata: “Barang siapa pada bulan Māgha bersedekah wijen kepada para Brāhmaṇa, ia tidak akan menyaksikan neraka yang dipenuhi segala macam makhluk.”
Verse 9
सर्वसत्रैश्न यजते यस्तिलैर्यजते पितृन् | न चाकामेन दातव्यं तिलश्राद्धं कदाचन,जो तिलोंके द्वारा पितरोंका पूजन करता है, वह मानो सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान कर लेता है। तिल-श्राद्ध कभी निष्काम पुरुषको नहीं करना चाहिये
Barangsiapa memuja para Leluhur (Pitṛ) dengan wijen, seakan-akan ia telah menunaikan seluruh upacara yajña. Namun persembahan wijen dalam śrāddha jangan sekali-kali diberikan tanpa niat dan kehendak; jangan dilakukan dengan sikap acuh, melainkan dengan tekad dan keyakinan yang penuh.
Verse 10
महर्षे: कश्यपस्यैते गात्रेभ्य: प्रसृतास्तिला: । ततो दिव्यं गता भावं प्रदानेषु तिला: प्रभो,प्रभो! ये तिल महर्षि कश्यपके अंगोंसे प्रकट होकर विस्तारको प्राप्त हुए हैं; इसलिये दानके निमित्त इनमें दिव्यता आ गयी है
Wahai tuan, biji wijen ini dikatakan memancar dan menyebar dari anggota tubuh Mahārṣi Kaśyapa. Karena itu, dalam hal dana (pemberian), wijen memperoleh sifat yang ilahi.
Verse 11
पौष्टिका रूपदाश्चैव तथा पापविनाशना: । तस्मात् सर्वप्रदानेभ्यस्तिलदानं विशिष्यते,तिल पौष्टिक पदार्थ है। वे सुन्दर रूप देनेवाले और पापनाशक हैं। इसलिये तिल-दान सब दानोंसे बढ़कर है
Wijen bersifat menyehatkan dan menguatkan; ia menganugerahkan keindahan rupa serta melenyapkan dosa. Karena itu, di antara segala bentuk dana, dana wijen dipandang paling unggul.
Verse 12
आपफस्तम्बश्न मेधावी शड्खश्न लिखितस्तथा । महर्षिगौतमश्नापि तिलदानैर्दिवं गता:,परम बुद्धिमान महर्षि आपस्तम्ब, शंख, लिखित तथा गौतम--ये तिलोंका दान करके दिव्यलोकको प्राप्त हुए हैं
Sang resi yang amat bijaksana Āpastamba, demikian pula Śaṅkha dan Likhita, serta Mahārṣi Gautama—dengan dana wijen mereka mencapai surga.
Verse 13
तिलहोमरता विदप्रा: सर्वे संयतमै थुना: । समा गव्येन हविषा प्रवृत्तिषु च संस्थिता:,वे सभी ब्राह्मण स्त्री-समागमसे दूर रहकर तिलोंका हवन किया करते थे, तिल गोघृतके समान हविके योग्य माने गये हैं, इसलिये यज्ञोंमें गृहीत होते हैं एवं हरेक कर्मोंमें उनकी आवश्यकता है
Semua brāhmaṇa itu mengekang hubungan seksual dan tekun melakukan homa dengan wijen. Wijen dipandang layak sebagai havis, setara dengan persembahan dari sapi seperti ghee; karena itu ia diterima dalam yajña dan diperlukan dalam banyak upacara.
Verse 14
सर्वेषामिति दानानां तिलदानं विशिष्यते । अक्षयं सर्वदानानां तिलदानमिहोच्यते
Bhīṣma berkata: “Di antara segala bentuk dana, pemberian wijen (tiladāna) adalah yang paling unggul. Di sini dinyatakan sebagai ‘tak binasa’—pahalanya tidak berkurang—melampaui dana lainnya dalam buah rohani yang lestari.”
Verse 15
अतः तिलदान सब दानोंसे बढ़कर है। तिलदान यहाँ सब दानोंमें अक्षय फल देनेवाला बताया जाता है ।। उच्छिन्ने तु पुरा हव्ये कुशिकर्षि: परंतप: । तिलैरन्नित्रयं हुत्वा प्राप्तवान् गतिमुत्तमाम्,पूर्वकालमें परंतप राजर्षि कुशिकने हविष्य समाप्त हो जानेपर तिलोंसे ही हवन करके तीनों अग्नियोंको तृप्त किया था; इससे उन्हें उत्तम गति प्राप्त हुई
Bhīṣma berkata: “Karena itu, tiladāna melampaui semua dana; di sini ia disebut memberi buah ‘tak binasa’. Pada masa lampau, ketika havis telah habis, raja resi Kuśika yang perkasa mempersembahkan wijen ke dalam tiga api suci dan memuaskan semuanya; oleh kebajikan itu ia meraih keadaan tertinggi.”
Verse 16
इति प्रोक्त कुरुश्रेष्ठ तिलदानमनुत्तमम् | विधान येन विधिना तिलानामिह शस्यते,कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार जिस विधिके अनुसार तिलदान करना उत्तम माना गया है, वह सर्वोत्तम तिलदानका विधान यहाँ बताया गया
Bhīṣma berkata: “Demikianlah, wahai yang terbaik di antara kaum Kuru, tiladāna yang tiada banding telah dijelaskan. Kini di sini kuterangkan tata cara—prosedur—yang dengannya pemberian wijen dipuji sebagai perbuatan yang berbuah kebajikan.”
Verse 17
अत ऊर्ध्व॑ निबोधेद॑ं देवानां यट्टमिच्छताम् । समागमे महाराज ब्रह्मणा वै स्वयम्भुवा
Bhīṣma berkata: “Sekarang, wahai raja agung, pahamilah apa yang terjadi sesudah itu—di pertemuan besar, di bawah arahan Brahmā Yang Lahir Sendiri—ketika para dewa menghendaki tercapainya maksud itu.”
Verse 18
महाराज! इसके बाद यज्ञकी इच्छावाले देवताओं और स्वयम्भू ब्रह्माजीका समागम होनेपर उनमें परस्पर जो बातचीत हुई थी, उसे बता रहा हूँ, इसपर ध्यान दो ।। देवा: समेत्य ब्रह्माणं भूमिभागे यियक्षव: । शुभं देशमयाचन्त यजेम इति पार्थिव,पृथ्वीनाथ! भूतलके किसी भागमें यज्ञ करनेकी इच्छावाले देवता ब्रह्माजीके पास जाकर किसी शुभ देशकी याचना करने लगे, जहाँ यज्ञ कर सकें
Bhīṣma berkata: “Wahai raja agung, setelah itu akan kuceritakan percakapan yang terjadi ketika para dewa—yang berhasrat melaksanakan yajña—berkumpul bersama Brahmā Yang Lahir Sendiri. Perhatikanlah. Para dewa, berniat mengadakan yajña, mendatangi Brahmā dan memohon sebidang tanah yang suci dan mujur di bumi, seraya berkata, ‘Wahai raja, anugerahkanlah kepada kami tempat yang baik di bumi agar kami dapat melaksanakan yajña.’”
Verse 19
देवा ऊचु भगवंस्त्व॑ प्रभुर्भूमे: सर्वस्य त्रिदिवस्य च । यजेमहि महाभाग यज्ञ भवदनुज्ञया,देवता बोले--भगवन्! महाभाग! आप पृथ्वी और सम्पूर्ण स्वर्गके भी स्वामी हैं; अतः हम आपकी आज्ञा लेकर पृथ्वीपर यज्ञ करेंगे
Para dewa berkata: “Wahai Bhagawan yang mulia, Engkau adalah penguasa bumi dan seluruh surga. Maka, wahai yang amat beruntung, dengan izin-Mu kami akan melaksanakan yajña di bumi.”
Verse 20
नाननुज्ञातभूमिहि यज्ञस्य फलमश्षुते । त्वं हि सर्वस्य जगत: स्थावरस्य चरस्य च
Bhīṣma berkata: “Buah yajña hanya diperoleh bila dilakukan di tanah yang telah diberi izin dan disahkan; jika tidak, pahala itu tidak sungguh-sungguh didapat. Sebab Engkaulah penguasa atas seluruh jagat—yang tak bergerak maupun yang bergerak.”
Verse 21
प्रभुर्भवसि तस्मात्त्वं समनुज्ञातुमरहसि । क्योंकि भूस्वामी जिस भूमिपर यज्ञ करनेकी अनुमति नहीं देता, उस भूमिपर यदि यज्ञ किया जाय तो उसका फल नहीं होता। आप सम्पूर्ण चराचर जगतके स्वामी हैं; अतः पृथ्वीपर यज्ञ करनेके लिये हमें आज्ञा दीजिये ।। ब्रह्मोवाच ददानि मेदिनीभागं भवद्धयो<हं सुरर्षभा:
Bhīṣma berkata: “Engkaulah penguasa; maka Engkau patut memberi izin kepada kami. (Sebab bila pemilik tanah tidak mengizinkan, yajña yang dilakukan di sana tidak berbuah.) Karena Engkau adalah tuan atas seluruh makhluk bergerak dan tak bergerak, perintahkanlah kami untuk melaksanakan yajña di bumi.” Brahmā menjawab: “Wahai para dewa terbaik, Kuberikan kepada kalian suatu bagian dari bumi.”
Verse 22
देवा ऊचु भगवन् कृतकार्या: सम यक्ष्महे स्वाप्तदक्षिणै:
Para dewa berkata: “Wahai Bhagawan, tujuan kami telah tercapai. Kini kami akan memuja-Mu sesuai tata-ritus, dengan dakṣiṇā yang semestinya.”
Verse 23
इमं तु देशं मुनय: पर्युपासन्ति नित्यदा । देवताओंने कहा--भगवन्! हमारा कार्य हो गया। अब हम पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञपुरुषका यजन करेंगे। यह जो हिमालयके पासका प्रदेश है, इसका ऋषि-मुनि सदासे ही आश्रय लेते हैं (अत: हमारा यज्ञ भी यहीं होगा) ।। ततोडगस्त्यश्व कण्वश्व भृगुरत्रिवृषाकपि:
Bhīṣma berkata: “Wilayah ini senantiasa didatangi dan dimuliakan oleh para resi.” Lalu para dewa berkata, “Wahai Yang Mulia, tugas kami telah terlaksana. Kini kami akan memuja Sang Puruṣa-Yajña dengan upacara yang disertai dakṣiṇā yang memadai. Daerah dekat Himalaya ini sejak dahulu menjadi tempat bernaung para pertapa; karena itu yajña kami pun akan berlangsung di sini.” Maka datanglah Agastya, Kaṇva, Bhṛgu, Atri, dan Vṛṣākapi.
Verse 24
असितो देवलश्वचैव देवयज्ञमुपागमन् । ततो देवा महात्मान ईजिरे यज्ञमच्युतम्
Bhishma berkata: “Asita dan Devala mendatangi yajña ilahi. Maka para dewa yang berhati luhur melaksanakan yajña Acyuta yang tak pernah meleset.”
Verse 25
तथा समापयामासुर्यथाकाल सुरपर्षभा: । तदनन्तर अगस्त्य, कण्व, भृगु, अत्रि, वृषाकपि, असित और देवल देवताओंके उस यज्ञमें उपस्थित हुए। तब महामनस्वी देवताओंने यज्ञपुरुष अच्युतका यजन आरम्भ किया और जन श्रेष्ठ देवगणोंने यथासमय उस यज्ञको समाप्त भी कर दिया || २३-२४ $ ।। त इष्टयज्ञास्त्रिदशा हिमवत्यचलोत्तमे
Bhishma berkata: Demikianlah, pada waktunya, para dewa terkemuka menuntaskan upacara itu. Sesudahnya, para resi Agastya, Kaṇva, Bhṛgu, Atri, Vṛṣākapi, Asita, dan Devala datang dan hadir dalam yajña para dewa tersebut. Lalu para dewa yang berhati luhur memulai pemujaan kepada Acyuta sebagai Yajña-Puruṣa, dan para dewa mulia menyelesaikan yajña itu tepat pada musim yang ditetapkan.
Verse 26
प्रादेशमात्र भूमेस्तु यो दद्यादनुपस्कृतम्
Bhishma berkata: Bahkan orang yang hanya menganugerahkan sebidang tanah kecil sekadar ukuran, diberikan polos tanpa hiasan atau perlengkapan tambahan, tetap melakukan dāna yang bermakna.
Verse 27
शीतवातातपसहां गृहभूमिं सुसंस्कृताम्
Bhishma berkata: Hendaknya diberikan tanah tempat tinggal yang telah dipersiapkan dengan baik, yang sanggup menahan dingin, angin, dan panas.
Verse 28
मुदितो वसति प्राज्ञ: शक्रेण सह पार्थिव
Bhishma berkata: “Wahai raja, orang bijak, dengan hati bersukacita, berdiam dalam kebersamaan Śakra (Indra).”
Verse 29
अध्यापककुले जात: श्रोत्रियो नियतेन्द्रिय:
Bhīṣma bersabda: “Seseorang yang lahir di keluarga seorang guru, menguasai Weda, dan mengekang inderanya—dialah yang dikenal karena didikan, keluhuran laku, dan pengendalian batin.”
Verse 30
तथा गवार्थे शरणं शीतवर्षसहं दृढम्
Bhīṣma bersabda: “Demikian pula, demi kesejahteraan sapi-sapi, hendaknya disediakan perlindungan yang kokoh—yang sanggup menahan dingin dan hujan.”
Verse 31
क्षेत्रभूमिं ददललोके शुभां श्रियमवाप्लुयात्
Bhīṣma bersabda: “Barangsiapa menganugerahkan sebidang tanah ladang yang subur kepada penerima yang layak, ia meraih kemakmuran dan kesejahteraan yang mujur.”
Verse 32
न चोषरां न निर्दग्धां महीं दद्यात् कथंचन
Bhīṣma bersabda: “Dalam keadaan apa pun, janganlah memberikan tanah yang asin dan tandus, ataupun tanah yang telah terbakar hingga menjadi tidak produktif.”
Verse 33
पारक्ये भूमिदेशे तु पितृणां निर्वपेत् तु यः
Bhīṣma bersabda: “Barangsiapa, meski berada di tanah milik orang lain atau di negeri asing, tetap melaksanakan persembahan yang ditetapkan bagi para Pitṛ (leluhur)… ”
Verse 34
तदभूमिं वापि पितृभि: श्राद्धकर्म विहन्यते । जो परायी भूमिमें पितरोंके लिये श्राद्ध करता है, अथवा जो उस भूमिको पितरोंके लिये दानमें देता है, उसके वे श्राद्धकर्म और दान दोनों ही नष्ट होते (निष्फल हो जाते) हैं ।। ३३ $ई || तस्मात् क्रीत्वा महीं दद्यात् स्वल्पामपि विचक्षण:
Barangsiapa melakukan śrāddha bagi para leluhur di tanah milik orang lain, atau menghadiahkan tanah itu sendiri atas nama para leluhur, maka baik upacara śrāddha maupun dana itu menjadi sia-sia. Karena itu, orang bijak hendaknya membeli tanah—meski sedikit—barulah memberikannya sebagai dana.
Verse 35
अटवीपर्वताश्रैव नद्यस्तीर्थानि यानि च,वन, पर्वत, नदी और तीर्थ--ये सब स्थान किसी स्वामीके अधीन नहीं होते हैं (इन्हें सार्वजनिक माना जाता है)। इसलिये वहाँ श्राद्ध करनेके लिये भूमि खरीदनेकी आवश्यकता नहीं है। प्रजानाथ! इस प्रकार यह भूमिदानका फल बताया गया है
Hutan, gunung, sungai, dan tīrtha (tempat suci penyeberangan) yang berada di sana—semuanya tidak berada di bawah kepemilikan pribadi seseorang; semuanya dipandang sebagai milik bersama. Karena itu, untuk melakukan śrāddha di tempat-tempat demikian, tidak perlu membeli tanah. Wahai pelindung rakyat, demikianlah buah dari dana tanah telah dijelaskan.
Verse 36
सर्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न हि तत्र परिग्रह: । इत्येतद् भूमिदानस्य फलमुक्तं विशाम्पते,वन, पर्वत, नदी और तीर्थ--ये सब स्थान किसी स्वामीके अधीन नहीं होते हैं (इन्हें सार्वजनिक माना जाता है)। इसलिये वहाँ श्राद्ध करनेके लिये भूमि खरीदनेकी आवश्यकता नहीं है। प्रजानाथ! इस प्रकार यह भूमिदानका फल बताया गया है
Mereka menyatakan bahwa semua tempat demikian tidak memiliki pemilik pribadi, sebab di sana tidak mungkin ada penguasaan perseorangan. Wahai penguasa kaum, demikianlah buah dari dana tanah telah dinyatakan.
Verse 37
अतः परं तु गोदानं कीर्तयिष्यामि तेडनघ । गावो5धिकास्तपस्वि भ्यो यस्मात् सर्वेभ्य एव च
Selanjutnya, wahai yang tanpa noda, akan kuuraikan kepadamu tentang go-dāna (sedekah sapi). Sebab sapi dipandang lebih utama—bahkan daripada para pertapa—dan daripada semua yang lain, karena manfaatnya yang meliputi semua.
Verse 38
ब्राह्मो लोके वसन्त्येता: सोमेन सह भारत
Wahai Bhārata, mereka (para wanita itu) berdiam di Brahma-loka bersama Soma.
Verse 39
पयसा हविषा दध्ना शकृता चाथ चर्मणा
Bhishma berkata: “Ritus yang ditetapkan dapat dilaksanakan dengan susu, dengan havis (persembahan suci), dengan dadhi (dadih), dengan kotoran sapi, dan juga dengan kulit.”
Verse 40
नासां शीतातपौ स्यातां सदैता: कर्म कुर्वते,इन्हें सर्दी, गर्मी और वर्षाका भी कष्ट नहीं होता है। ये सदा ही अपना काम किया करती हैं। इसलिये ये ब्राह्मणोंक साथ परमपदस्वरूप ब्रह्मलोकमें चली जाती हैं
Bhishma berkata: “Dingin dan panas tidak menyusahkan mereka; mereka senantiasa menjalankan tugas yang ditetapkan. Karena itu, bersama para Brahmana, mereka menuju Brahmaloka—keadaan tertinggi.”
Verse 41
न वर्षविषयं वापि दुःखमासां भवत्युत । ब्राह्मणैः सहिता यान्ति तस्मात् पारमकं पदम्,इन्हें सर्दी, गर्मी और वर्षाका भी कष्ट नहीं होता है। ये सदा ही अपना काम किया करती हैं। इसलिये ये ब्राह्मणोंक साथ परमपदस्वरूप ब्रह्मलोकमें चली जाती हैं
Bhishma berkata: “Bahkan kesusahan yang berkaitan dengan musim hujan pun tidak menimpa mereka. Karena itu, bersama para Brahmana, mereka menuju keadaan tertinggi.”
Verse 42
एंक गोब्राह्मणं तस्मात् प्रवदन्ति मनीषिण: । रन्तिदेवस्य यज्ञे ता: पशुत्वेनोपकल्पिता:,इसीसे गौ और ब्राह्मणको मनस्वी पुरुष एक बताते हैं। राजन! राजा रन्तिदेवके यज्ञमें वे पशुरूपसे दान देनेके लिये निश्चित की गयी थीं; अतः गौओंके चमड़ोंसे वह चर्मण्वती नामक नदी प्रवाहित हुई थी। वे सभी गौएँ पशुत्वसे विमुक्त थीं और दान देनेके लिये नियत की गयी थीं
Bhishma berkata: “Karena itu para bijak menyatakan sapi dan Brahmana satu dalam hakikat. Dalam yajña Raja Rantideva, sapi-sapi itu ditetapkan sebagai ‘korban’ hanya dalam pengertian ritual.”
Verse 43
अतश्चर्मण्वती राजन् गोचर्मभ्य: प्रवर्तिता । पशुत्वाच्च विनिर्मुक्ता: प्रदानायोपकल्पिता:,इसीसे गौ और ब्राह्मणको मनस्वी पुरुष एक बताते हैं। राजन! राजा रन्तिदेवके यज्ञमें वे पशुरूपसे दान देनेके लिये निश्चित की गयी थीं; अतः गौओंके चमड़ोंसे वह चर्मण्वती नामक नदी प्रवाहित हुई थी। वे सभी गौएँ पशुत्वसे विमुक्त थीं और दान देनेके लिये नियत की गयी थीं
Bhishma berkata: “Maka, wahai raja, sungai bernama Carmaṇvatī dikatakan mengalir dari kulit-kulit sapi. Sapi-sapi itu telah dilepaskan dari status sebagai hewan korban semata; mereka ditetapkan khusus untuk didanakan.”
Verse 44
ता इमा बिप्रमुख्येभ्यो यो ददाति महीपते । निस्तरेदापदं कृच्छां विषमस्थो5पि पार्थिव,भूपाल! पृथ्वीनाथ! जो श्रेष्ठ ब्राह्यणोंको इन गौओंका दान करता है, वह संकटमें पड़ा हो तो भी उस भारी विपत्तिसे उद्धार पा लेता है
Wahai raja agung, siapa pun yang menganugerahkan sapi-sapi ini kepada para brahmana yang paling utama, akan menyeberangi bahkan bencana yang amat berat. Sekalipun seorang penguasa terhimpit dalam keadaan genting, anugerah demikian menjadi jalan pembebasan dari kesusahan yang besar.
Verse 45
गवां सहस्रद: प्रेत्य नरकं न प्रपद्यते । सर्वत्र विजयं चापि लभते मनुजाधिप,जो एक सहस््र गोदान कर देता है, वह मरनेके बाद नरकमें नहीं पड़ता। नरेश्वर! उसे सर्वत्र विजय प्राप्त होती है
Wahai penguasa manusia, siapa yang mendermakan seribu ekor sapi, setelah wafat tidak jatuh ke neraka; dan di mana pun ia berada, kemenangan pun diraihnya.
Verse 46
अमृतं वै गवां क्षीरमित्याह त्रिदशाधिप: । तस्माद् ददाति यो धेनुममृतं स प्रयच्छति,देवराज इन्द्रने कहा है कि 'गौओंका दूध अमृत है"; जो दूध देनेवाली गौका दान करता है, वह अमृत दान करता है
Indra, penguasa para dewa, telah menyatakan bahwa susu sapi sungguh laksana amerta. Karena itu, siapa yang mendermakan sapi perah, sesungguhnya mempersembahkan anugerah amerta itu sendiri.
Verse 47
अग्नीनामव्ययं होतद्धौम्यं वेदविदो विदु: । तस्माद् ददाति यो थेनुं स हौम्यं सम्प्रयच्छति,वेदवेत्ता पुरुषोंका अनुभव है कि “गोदुग्धरूप हविष्यका यदि अग्निमें हवन किया जाय तो वह अविनाशी फल देता है।” अत: जो धेनु दान करता है, वह हविष्यका ही दान करता है
Para ahli Weda memahami bahwa persembahan yang disebut ‘haumya’ ke dalam api suci menghasilkan pahala yang tak binasa. Karena itu, siapa yang mendermakan sapi perah, sesungguhnya menganugerahkan bahan persembahan itu sendiri.
Verse 48
स्वर्गो वै मूर्तिमानेष वृषभं यो गवां पतिम् । विप्रे गुणयुते दद्यात् स वै स्वर्गे महीयते,बैल स्वर्गका मूर्तिमान् स्वरूप है। जो गौओंके पति--साँड़का गुणवान् ब्राह्मणको दान करता है, वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है
Banteng ini—penguasa kawanan sapi—bagaikan wujud nyata surga. Siapa yang menghadiahkannya kepada brahmana yang berbudi dan layak, ia dimuliakan dan diteguhkan kedudukannya di alam surga.
Verse 49
प्राणा वै प्राणिनामेते प्रोच्यन्ते भरतर्षभ । तस्माद् ददाति यो थेनुं प्राणानेष प्रयच्छति,भरतश्रेष्ठ! ये गौएँ प्राणियों (को दूध पिलाकर पालनेके कारण उन) के प्राण कहलाती हैं; इसलिये जो दूध देनेवाली गौका दान करता है, वह मानो प्राण दान देता है
Bhīṣma bersabda: “Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, sapi-sapi ini disebut sebagai ‘napas kehidupan’ makhluk hidup, sebab mereka menopang hidup dengan memberi gizi dan pemeliharaan. Karena itu, siapa pun yang bersedekah seekor sapi perah, sesungguhnya mempersembahkan anugerah kehidupan itu sendiri.”
Verse 50
गाव: शरण्या भूतानामिति वेदविदो विदु: । तस्माद् ददाति यो थेनुं शरणं सम्प्रयच्छति,वेदवेत्ता विद्वान् ऐसा मानते हैं कि “गौएँ समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाली हैं।' इसलिये जो धेनु दान करता है, वह सबको शरण देनेवाला है
Bhīṣma bersabda: Para ahli Weda menyatakan bahwa sapi adalah perlindungan bagi semua makhluk. Karena itu, siapa yang mendermakan seekor sapi perah, sesungguhnya menganugerahkan perlindungan—menjadi pelindung dan pemberi naungan bagi sesama.
Verse 51
न वधार्थ प्रदातव्या न कीनाशे न नास्तिके । गोजीविने न दातव्या तथा गौर्भरतर्षभ,(गोरसानां न विक्रेतुरपज्चयजनस्य च ।) भरतश्रेष्ठ! जो मनुष्य वध करनेके लिये गौ माँग रहा हो, उसे कदापि गाय नहीं देनी चाहिये। इसी प्रकार कसाईको, नास्तिकको, गायसे ही जीविका चलानेवालेको, गोरस बेचनेवाले और पंचयज्ञ न करनेवालेको भी गाय नहीं देनी चाहिये
Bhīṣma bersabda: “Wahai banteng di antara Bharata, sapi jangan pernah diberikan kepada orang yang memintanya untuk dibunuh. Jangan pula kepada tukang jagal, kepada yang menolak iman (nāstika), kepada orang yang mencari nafkah dengan mengeksploitasi sapi, kepada penjual hasil susu, maupun kepada mereka yang mengabaikan pañca-yajña. Anugerah sapi adalah amanah suci; ia patut diserahkan hanya kepada tangan yang akan melindungi dan memuliakannya.”
Verse 52
ददत् स तादृशानां वै नरो गां पापकर्मणाम् | अक्षयं नरकं यातीत्येवमाहुर्महर्षय:,ऐसे पापकर्मी मनुष्योंको जो गाय देता है, वह मनुष्य अक्षय नरकमें गिरता है, ऐसा महर्षियोंका कथन है
Bhīṣma bersabda: Seseorang yang memberikan sapi kepada orang-orang semacam itu—yang bergelimang perbuatan dosa—akan jatuh ke neraka yang tak berkesudahan; demikianlah para maharṣi menyatakan.
Verse 53
न कृशां नापवत्सां वा वन्ध्यां रोगान्वितां तथा । नव्यंगां न परिश्रान्तां दद्याद् गां ब्राह्मणाय वै,जो दुबली हो, जिसका बछड़ा मर गया हो तथा जो ठाँठ, रोगिणी, किसी अंगसे हीन और थकी हुई (बूढ़ी) हो, ऐसी गौ ब्राह्मणको नहीं देनी चाहिये
Bhīṣma bersabda: Janganlah memberikan kepada seorang Brāhmaṇa seekor sapi yang kurus, atau yang kehilangan anaknya, atau mandul, atau berpenyakit; jangan pula yang cacat, kehilangan anggota tubuh, atau yang telah letih oleh usia dan kepayahan. Persembahan demi kehormatan dharma haruslah layak dan menyejahterakan, bukan pemberian yang menjadi beban.
Verse 54
दशगोसहस््रदो हि शक्रेण सह मोदते । अक्षयॉल्लभते लोकान् नर: शतसहस्रश:
Barangsiapa mendermakan sepuluh ribu ekor sapi, ia bersukacita dalam kebersamaan Śakra (Indra). Orang demikian meraih dunia-dunia yang tak binasa—bahkan dalam ratusan ribu cara.
Verse 55
दस हजार गोदान करनेवाला मनुष्य इन्द्रके साथ रहकर आनन्द भोगता है और जो लाख गौओंका दान कर देता है, उस मनुष्यको अक्षय लोक प्राप्त होते हैं ।। इत्येतद् गोप्रदानं च तिलदानं च कीर्तितम् । तथा भूमिप्रदानं च शृणुष्वान्ने च भारत
Seseorang yang mendermakan sepuluh ribu sapi menikmati kebahagiaan dengan tinggal dalam kebersamaan Indra; dan ia yang menyumbangkan seratus ribu sapi meraih dunia-dunia yang tak binasa. Demikianlah derma sapi dan derma wijen telah dinyatakan. Kini dengarkan pula, wahai Bharata, tentang derma tanah dan derma makanan.
Verse 56
भारत! इस प्रकार गोदान, तिलदान और भूमिदानका महत्त्व बतलाया गया। अब पुनः अन्नदानकी महिमा सुनो ।। अन्नदानं प्रधानं हि कौन्तेय परिचक्षते । अन्नस्य हि प्रदानेन रन्तिदेवो दिवं गत:,कुन्तीनन्दन! विद्वान् पुरुष अन्नदानको सब दानोंमें प्रधान बताते हैं। अन्नदान करनेसे ही राजा रन्तिदेव स्वर्गलोकमें गये थे
Wahai Bharata, demikianlah keagungan derma sapi, wijen, dan tanah telah dijelaskan. Kini dengarkan kembali kemuliaan derma makanan. Wahai putra Kunti, para bijak menyatakan bahwa memberi makanan adalah yang utama di antara segala derma; sebab dengan memberi makanan, Raja Rantideva mencapai surga.
Verse 57
भ्रान्ताय क्षुधितायान्न यः प्रयच्छति भूमिप: । स्वायम्भुवं महत् स्थानं स गच्छति नराधिप,नरेश्वर! जो भूमिपाल थके-माँदे और भूखे मनुष्यको अन्न देता है, वह ब्रह्माजीके परमधाममें जाता है
Wahai raja, penguasa yang memberikan makanan kepada orang yang letih dan lapar akan mencapai kediaman agung Svayambhuva (Brahmā).
Verse 58
न हिरण्यैर्न वासोभिननान्यदानेन भारत । प्राप्रुवन्ति नरा: श्रेयो यथा ह्व[न्नप्रदा: प्रभो,भरतनन्दन! प्रभो! अन्नदान करनेवाले मनुष्य जिस तरह कल्याणके भागी होते हैं, वैसा कल्याण उन्हें सुवर्ण, वस्त्र तथा अन्य वस्तुओंके दानसे नहीं प्राप्त होता है
Wahai Bharata, wahai tuan, manusia tidak meraih kesejahteraan sejati melalui derma emas, pakaian, atau derma lainnya sebagaimana mereka meraihnya melalui derma makanan.
Verse 59
अन्न वै प्रथम द्रव्यमन्नं श्रीक्ष परा मता । अन्नात् प्राण: प्रभवति तेजो वीर्य बल॑ तथा,अन्न प्रथम द्रव्य है। वह उत्तम लक्ष्मीका स्वरूप माना गया है। अन्नसे ही प्राण, तेज, वीर्य और बलकी पुष्टि होती है
Bhishma berkata: Makanan adalah yang terutama di antara segala zat; ia dipandang sebagai wujud tertinggi Śrī (kemakmuran). Dari makanan timbul dan terpelihara napas kehidupan, cahaya daya, vigor, dan kekuatan.
Verse 60
सद्यो ददाति यश्चान्नं सदैकाग्रमना नर: | न स दुर्गाण्यवाप्रोतीत्येवमाह पराशर:,पराशर मुनिका कथन है कि “जो मनुष्य सदा एकाग्रचित्त होकर याचकको तत्काल अन्नका दान करता है, उसपर कभी दुर्गम संकट नहीं पड़ता”
Bhishma berkata: Parāśara menyatakan demikian—orang yang dengan pikiran senantiasa terpusat segera memberikan makanan kepada peminta, tidak akan jatuh ke dalam malapetaka yang sukar dilalui.
Verse 61
अर्चयित्वा यथान्यायं देवेभ्यो5न्न॑ निवेदयेत् यदन्ना हि नरा राजंस्तदन्नास्तस्य देवता:,राजन! मनुष्यको प्रतिदिन शास्त्रोक्त विधिसे देवताओंकी पूजा करके उन्हें अन्न निवेदन करना चाहिये। जो पुरुष जिस अन्नका भोजन करता है, उसके देवता भी वही अन्न ग्रहण करते हैं
Wahai Raja, hendaknya manusia setiap hari memuja para dewa menurut tata yang ditetapkan śāstra dan mempersembahkan makanan kepada mereka. Sebab, wahai Raja, makanan yang dimakan manusia, itulah pula yang diterima oleh dewata pelindungnya.
Verse 62
कौमुदे शुक्लपक्षे तु योऊन्नदानं करोत्युत | स संतरति दुर्गाणि प्रेत्य चानन्त्यमश्लुते,जो कार्तिक मासके शुक्लपक्षमें अन्नका दान करता है, वह दुर्गम संकटसे पार हो जाता है और मरकर अक्षय सुखका भागी होता है
Bhishma berkata: Pada paruh terang musim Kaumudī, siapa yang melakukan anugerah makanan, ia menyeberangi bahaya dan rintangan yang sukar; dan setelah wafat ia meraih kebahagiaan yang tiada berkesudahan (tak binasa).
Verse 63
अभुकक्त्वातिथये चाजन्न॑ प्रयच्छेद् य: समाहित: । स वैब्रद्याविदां लोकान् प्राप्तुयाद् भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! जो पुरुष एकाग्रचित्त हो स्वयं भूखा रहकर अतिथिको अन्नदान करता है, वह ब्रह्मवेत्ताओंके लोकोंमें जाता है
Wahai yang termulia di antara Bharata, orang yang dengan batin terhimpun memberikan makanan kepada tamu meski dirinya tetap lapar, ia akan mencapai alam para brahmavid (para pengenal Brahman).
Verse 64
सुकृच्छामापदं प्राप्तश्नान्नद: पुरुषस्तरेत् । पापं तरति चैवेह दुष्कृतं चापकर्षति,अन्नदाता मनुष्य कठिन-से-कठिन आपत्तिमें पड़नेपर भी उस आपत्तिसे पार हो जाता है। वह पापसे उद्धार पा जाता है और भविष्यमें होनेवाले दुष्कर्मोका भी नाश कर देता है
Orang yang memberi makanan (anna-dāna) mampu menyeberangi bahkan bencana yang paling berat ketika menimpanya. Dalam hidup ini juga ia melampaui dosa, dan ia pun menyingkirkan serta memusnahkan kecenderungan dan akibat dari perbuatan salah di masa mendatang.
Verse 65
इस प्रकार श्रीमह्ा भारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ,इत्येतदन्नदानस्य तिलदानस्य चैव ह | भूमिदानस्य च फलं गोदानस्य च कीर्तितम् इस प्रकार मैंने यह अन्नदान, तिलदान, भूमिदान और गोदानका फल बताया है
Bhīṣma berkata: “Demikianlah telah kujelaskan buah dari anna-dāna, tila-dāna, bhūmi-dāna, dan go-dāna.”
Verse 66
इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि षट्षष्टितमो5ध्याय:
Demikian berakhir bab ke-66 dalam bagian Dāna-dharma pada Anuśāsana Parva dari Śrī Mahābhārata.
Verse 213
यस्मिन् देशे करिष्यध्वं यज्ञान् काश्यपनन्दना: | ब्रह्माजीने कहा--काश्यपनन्दन सुरश्रेष्ठणण! तुमलोग पृथ्वीके जिस प्रदेशमें यज्ञ करोगे, वही भूभाग मैं तुम्हें दे रहा हूँ
Brahmā bersabda: “Wahai putra-putra Kaśyapa, di wilayah mana pun di bumi kalian melaksanakan yajña, wilayah itulah yang Kuberikan kepada kalian.”
Verse 256
षष्ठमंशं क्रतोस्तस्य भूमिदान प्रचक्रिरे । पर्वतराज हिमालयके पास यज्ञ पूरा करके देवताओंने भूमिदान भी किया, जो उस यज्ञके छठे भागके बराबर पुण्यका जनक था
Sesudah yajña itu selesai, mereka melaksanakan bhūmi-dāna (pemberian tanah), yang dipuji sebagai menghasilkan pahala setara seperenam dari pahala yajña tersebut.
Verse 266
न सीदति स कृच्छेषु न च दुर्गाण्यवाप्रुते । जिसको खोदखादकर खराब न कर दिया गया हो, ऐसे प्रादेशमात्र भूभागका भी जो दान करता है, वह न तो कभी दुर्गम संकटोंमें पड़ता है और न पड़नेपर कभी दुःखी ही होता है
Barangsiapa mendermakan walau sebidang kecil tanah yang belum digali dan dirusak, ia tidak tenggelam pada masa kesukaran; ia tidak jatuh ke dalam bahaya yang sukar dilalui—dan sekalipun bahaya itu datang, ia tidak menjadi sengsara.
Verse 273
प्रदाय सुरलोकस्थ: पुण्यान्तेडपि न चाल्यते । जो सर्दी, गर्मी और हवाके वेगको सहन करनेयोग्य सजी-सजायी गृह-भूमि दान करता है, वह देवलोकमें निवास करता है। पुण्यका भोग समाप्त होनेपर भी वहाँसे हटाया नहीं जाता
Siapa yang mendermakan tanah pekarangan yang telah dipersiapkan dengan baik—mampu melindungi dari dingin, panas, dan terpaan angin—ia berdiam di alam para dewa. Bahkan ketika kenikmatan pahala itu berakhir, ia tidak dijatuhkan dari sana.
Verse 286
प्रतिश्रयप्रदानाच्च सो$पि स्वर्गे महीयते । पृथ्वीनाथ! जो विद्वान् गृहदान करता है, वह भी उसके पुण्यसे इन्द्रके साथ आनन्दपूर्वक निवास करता और स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है
Dan dengan memberikan perlindungan, ia pun dimuliakan di surga. Wahai penguasa bumi, orang bijak yang menghadiahkan sebuah rumah, oleh pahala perbuatan itu, tinggal dengan sukacita di alam surga bersama Indra dan dihormati di sana.
Verse 296
गृहे यस्य वसेत् तुष्ट: प्रधानं लोकमश्रुते । अध्यापक-वंशमें उत्पन्न श्रोत्रिय एवं जितेन्द्रिय ब्राह्मण जिसके दिये हुए घरमें प्रसन्नतासे रहता है, उसे श्रेष्ठ लोक प्राप्त होते हैं
Bila seorang brāhmaṇa yang terpelajar dan berdisiplin—lahir dari garis keturunan para pengajar, seorang śrotriya dan menaklukkan indria—tinggal dengan puas di rumah yang dihadiahkan seseorang, maka sang pemberi memperoleh dunia-dunia yang paling utama.
Verse 303
आसप्तमं तारयति कुलं भरतसत्तम । भरतश्रेष्ठ) जो गौओंके लिये सर्दी और वर्षासे बचानेवाला सुदृढ़ निवासस्थान बनवाता है, वह अपनी सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है
Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, siapa yang membangun tempat berlindung yang kokoh bagi sapi—melindungi mereka dari dingin dan hujan—menjadi sebab keselamatan bagi keluarganya hingga tujuh generasi.
Verse 313
रत्नभूमिं प्रदद्यात् तु कुलवंशं प्रवर्धयेत् । खेतके योग्य भूमि दान करनेवाला मनुष्य जगत्में शुभ सम्पत्ति प्राप्त करता है और जो रत्नयुक्त भूमिका दान करता है, वह अपने कुलकी वंश-परम्पराको बढ़ाता है
Barangsiapa menganugerahkan tanah yang layak digarap, ia meraih kemakmuran yang mujur di dunia; dan barangsiapa mendermakan tanah yang kaya permata, ia membuat garis keturunan keluarganya tumbuh dan meluas.
Verse 326
न श्मशानपरीतां च न च पापनिषेविताम् । जो भूमि ऊसर, जली हुई और श्मशानके निकट हो तथा जहाँ पापी पुरुष निवास करते हों, उसे ब्राह्मणको नहीं देना चाहिये
Janganlah menghadiahkan—terutama kepada seorang brāhmaṇa—tanah yang dekat tempat pembakaran mayat, atau tanah yang tandus/terbakar, atau yang dihuni serta didatangi orang-orang berdosa.
Verse 346
पिण्ड: पितृभ्यो दत्तो वै तस्यां भवति शाश्वत: । अतः विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह थोड़ी-सी भी भूमि खरीदकर उसका दान करे। खरीदकर अपनी की हुई भूमिमें ही पितरोंको दिया हुआ पिण्ड सदा स्थिर रहनेवाला होता है
Piṇḍa yang dipersembahkan kepada para Pitṛ menjadi kekal bila dipersembahkan terkait tanah yang sungguh milik sendiri. Maka orang bijak hendaknya membeli walau sebidang kecil tanah lalu mendermakannya; sebab piṇḍa yang dipersembahkan di atas tanah yang telah dibeli dan dijadikan hak milik sendiri akan tetap teguh untuk selamanya.
Verse 373
तस्मान्महेश्वरो देवस्तपस्ताभि: सहास्थित: । अनघ! इसके बाद मैं तुम्हें गोदानका माहात्म्य बताऊँगा। गौएँ समस्त तपस्वियोंसे बढ़कर हैं; इसलिये भगवान् शंकरने गौओंके साथ रहकर तप किया था
Karena itu Dewa Maheshvara tinggal bersama sapi-sapi itu dan teguh dalam tapa. Wahai yang tanpa noda, setelah ini akan kukisahkan kemuliaan gō-dāna. Sapi-sapi melampaui semua pertapa; sebab itulah Śaṅkara sendiri bertapa dalam kebersamaan mereka.
Verse 386
यांतां ब्रह्मर्षय: सिद्धा: प्रार्थयन्ति परां गतिम् । भारत! ये गौएँ चन्द्रमाके साथ उस ब्रह्मलोकमें निवास करती हैं, जो परमगतिरूप है और जिसे सिद्ध ब्रह्मर्षि भी प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं
Wahai Bhārata! Kepada tujuan tertinggi yang bahkan para brahmarṣi yang telah sempurna pun merindukan untuk mencapainya—ke sanalah sapi-sapi itu melangkah. Mereka berdiam di Brahmaloka bersama Candra, alam yang merupakan parama-gati.
Verse 396
अस्थिभिश्नोपकुर्वन्ति शृंगैवलिश्व भारत । भरतनन्दन! ये गौएँ अपने दूध, दही, घी, गोबर, चमड़ा, हड्डी, सींग और बालोंसे भी जगत्का उपकार करती रहती हैं
Bhishma berkata: “Wahai Bharata, wahai kebanggaan wangsa Bharata—sapi-sapi pun berbakti melalui tulang dan tanduknya. Sesungguhnya, sapi-sapi itu senantiasa memberi manfaat bagi dunia lewat susu, dadih, ghee, kotoran, kulit, tulang, tanduk, dan bulunya.”
A mistaken transfer of a cow leads to conflicting brāhmaṇa claims; Nṛga must address competing rights while confronting the moral weight of having enabled retention of brāhmaṇa property despite offering compensatory restitution.
That brāhmaṇa property should not be taken by one who knows dharma; misappropriation is portrayed as ruinous, and wrongdoing toward cows is specifically discouraged due to its ethical and karmic gravity.
Yes: it asserts that association with the virtuous is not without result, exemplified by Nṛga’s liberation from a punitive condition through encounter with Vāsudeva and the fulfillment of Dharmarāja’s pronouncement.