
दैव–पुरुषकार-प्रश्नः (Daiva–Puruṣakāra Inquiry: Fate and Human Effort)
Upa-parva: Daiva–Puruṣakāra-vicāra (Discourse on Fate and Human Effort)
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma which is superior—daiva (destiny) or puruṣakāra (human effort). Bhīṣma responds by citing an ancient dialogue: Vasiṣṭha once questioned Brahmā on the same issue. Brahmā answers through a causality model using agricultural imagery: the ‘field’ is human effort and the ‘seed’ is daiva; only their conjunction yields fruition, yet without effort the seed cannot produce results. The chapter then develops a consistent karmic logic: the agent experiences the fruit of action; good action yields well-being, harmful action yields distress, and what is not done does not generate enjoyments. Multiple illustrations reinforce that prosperity, reputation, and even divine attainments are linked to exertion, discipline, and merit rather than inert reliance on fate. The discourse warns against fatalistic passivity, arguing that daiva ‘follows’ established effort and declines when action is depleted, like a lamp fading when oil is exhausted. The chapter closes by recommending purposeful initiative and regulated action as the practical route toward auspicious aims, including the ‘path to heaven’ as framed within epic ethics.
Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह भीष्म से तीखा, शाश्वत प्रश्न पूछते हैं—दैव (भाग्य) और पुरुषार्थ (स्वयं का प्रयत्न) में श्रेष्ठ कौन है? → भीष्म उत्तर को केवल मत-रूप में नहीं रखते; वे प्राचीन संवाद का आश्रय लेते हैं—वसिष्ठ द्वारा ब्रह्मा से पूछा गया वही प्रश्न। तर्क के साथ दृष्टान्त जुड़ते हैं: शुभ कर्म से सुख, पाप से दुःख; जो किया है वही फलता है, जो नहीं किया वह कहीं भोगा नहीं जाता। → संवाद का निर्णायक निष्कर्ष उभरता है—देवता भी किसी के कर्म का ‘व्यापार’ नहीं करते; विकर्म फलता नहीं, और दैव को सर्वशक्तिमान मानकर मनुष्य विमार्ग पर नहीं जा सकता। पुरुषार्थ ही संचित कर्म-शक्ति बनकर दैव-सा प्रतीत होता है और फल को वहाँ-वहाँ ले जाता है। → भीष्म वसिष्ठ-ब्रह्मा संवाद के सार को युधिष्ठिर के लिए स्थिर करते हैं—पुरुषार्थ का फल प्रत्यक्ष है; विधिपूर्वक आरम्भ किया गया कर्म स्वर्गमार्ग तक ले जा सकता है।
Verse 1
/ अपन ह< बक। है २ >> षष्ठो5 ध्याय: दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन युधिछिर उवाच पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । दैवे पुरुषकारे च किंस्वित् श्रेष्ठतरं भवेत्,युधिष्ठिरने पूछा--सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ महाप्राज्ञ पितामह! दैव और पुरुषार्थमें कौन श्रेष्ठ है?
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Pitāmaha, engkau amat bijaksana dan mahir dalam segala śāstra; di antara daiva (takdir) dan puruṣakāra (usaha manusia), manakah yang sungguh lebih unggul?”
Verse 2
भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । वसिष्ठस्य च संवादं ब्रह्मणश्न॒ युधिष्ठिर,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! इस विषयमें वसिष्ठ और ब्रह्माजीके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहण दिया जाता है
Bhishma berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, dalam perkara ini pun dikemukakan sebuah kisah purba sebagai teladan—yakni dialog Vasiṣṭha dengan Brahmā.”
Verse 3
दैवमानुषयो: किंस्वित् कर्मणो: श्रेष्ठमित्युत । पुरा वसिष्ठो भगवान् पितामहमपृच्छत,प्राचीन कालकी बात है, भगवान् वसिष्ठने लोकपितामह ब्रह्माजीसे पूछा--'प्रभो! दैव और पुरुषार्थमें कौन श्रेष्ठ है?
Bhishma berkata: “Di antara daiva dan usaha manusia, manakah yang lebih unggul? Pada masa silam, Bhagavān Vasiṣṭha menanyakan pertanyaan ini kepada Pitāmaha Brahmā.”
Verse 4
ततः पद्मोद्भवो राजन् देवदेव: पितामह: । उवाच मधुरं वाक्यमर्थवद्धेतुभूषितम्,राजन्! तब कमलजन्मा देवाधिदेव पितामहने मधुर स्वरमें युक्तियुक्त सार्थक वचन कहा--
Kemudian, wahai raja, Sang Kakek Padmaja—Brahmā, dewa para dewa—berbicara dengan nada lembut, mengucapkan kata-kata yang sarat makna dan dihiasi alasan yang tepat, wahai raja.
Verse 5
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शुक और इन्द्रका संवादविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ,ब्रह्मोवाच (बीजतो हाड्कुरोत्पत्तिरड्कुरात् पर्णसम्भव: । पर्णान्नाला: प्रसूयन्ते नालात् स्कन्ध: प्रवर्तते ।। स्कन्धात् प्रवर्तते पुष्पं पुष्पान्निर्वर्तती फलम् । फलानिरर्वर्यतेी बीजं॑ बीज॑ नाफलमुच्यते ।।) ब्रह्माजीने कहा--मुने! बीजसे अंकुरकी उत्पत्ति होती है, अंकुरसे पत्ते होते हैं। पत्तोंस नाल, नालसे तने और डालियाँ होती हैं। उनसे पुष्प प्रकट होता है। फ़ूलसे फल लगता है और फलसे बीज उत्पन्न होता है और बीज कभी निष्फल नहीं बताया गया है ।। नाबीजं जायते किंचिन्न बीजेन बिना फलम् | बीजादू बीज॑ प्रभवति बीजादेव फलं स्मृतम् बीजके बिना कुछ भी पैदा नहीं होता, बीजके बिना फल भी नहीं लगता। बीजसे बीज प्रकट होता है और बीजसे ही फलकी उत्पत्ति मानी जाती है
Brahmā bersabda: “Wahai resi, dari benih lahir tunas; dari tunas tumbuh daun. Dari daun muncul tangkai; dari tangkai berkembang batang. Dari batang mekar bunga; dari bunga lahir buah; dan dari buah benih terlahir kembali—maka benih tak pernah disebut mandul. Tiada sesuatu pun lahir tanpa benih, dan tanpa benih tiada buah. Dari benih, benih muncul; dan dari benih pula buah dipahami berasal.”
Verse 6
यादृशं वपते बीज क्षेत्रमासाद्य कर्षक: । सुकृते दुष्कृते वापि तादृश॑ लभते फलम्,किसान खेतमें जाकर जैसा बीज बोता है उसीके अनुसार उसको फल मिलता है। इसी प्रकार पुण्य या पाप--जैसा कर्म किया जाता है वैसा ही फल मिलता है इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि दैवपुरुषकारनिर्देशे षष्ठोडध्याय:
Bhīṣma berkata: “Sebagaimana seorang petani, setelah mencapai ladangnya, menuai hasil sesuai benih yang ia tabur, demikian pula seseorang memperoleh buah yang sepadan dengan perbuatannya—baik kebajikan maupun dosa.”
Verse 7
यथा बीजं विना क्षेत्रमुप्तं भवति निष्फलम् | तथा पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति,जैसे बीज खेतमें बोये बिना फल नहीं दे सकता, उसी प्रकार दैव (प्रारब्ध) भी पुरुषार्थके बिना नहीं सिद्ध होता
Bhīṣma berkata: “Sebagaimana ladang tanpa benih, meski ditabur dan dirawat, tetap tak berbuah, demikian pula takdir (buah karma lampau) tidak menjadi nyata tanpa upaya manusia.”
Verse 8
क्षेत्र पुरुषकारस्तु दैवं बीजमुदाहतम् । क्षेत्रत्रीणसमायोगात् ततः सस्यं समृद्ध्यते,पुरुषार्थ खेत है और दैवको बीज बताया गया है। खेत और बीजके संयोगसे ही अनाज पैदा होता है
Bhīṣma berkata: “Upaya manusia disebut sebagai ladang, dan takdir (faktor ilahi) disebut sebagai benih. Hanya dari pertemuan ladang dan benih itulah tanaman menjadi subur dan melimpah.”
Verse 9
कर्मण: फलनिर्वत्ति स्वयमश्नाति कारक: । प्रत्यक्ष दृश्यते लोके कृतस्यापकृतस्य च,कर्म करनेवाला मनुष्य अपने भले या बुरे कर्मका फल स्वयं ही भोगता है। यह बात संसारमें प्रत्यक्ष दिखायी देती है
Buah perbuatan yang matang dinikmati oleh pelakunya sendiri. Di dunia hal ini tampak nyata—dalam akibat dari yang telah dilakukan maupun yang dibiarkan tak dilakukan.
Verse 10
शुभेन कर्मणा सौख्यं दु:ःखं पापेन कर्मणा । कृतं फलति सर्वत्र नाकृतं भुज्यते क्वचित्,शुभ कर्म करनेसे सुख और पाप कर्म करनेसे दुःख मिलता है। अपना किया हुआ कर्म सर्वत्र ही फल देता है। बिना किये हुए कर्मका फल कहीं नहीं भोगा जाता
Kebahagiaan lahir dari perbuatan bajik, dan penderitaan dari perbuatan dosa. Apa yang telah dilakukan berbuah di mana pun; hasil dari yang tidak dilakukan tak pernah dialami di mana pun.
Verse 11
कृती सर्वत्र लभते प्रतिष्ठां भाग्यसंयुताम् । अकृती लभते भ्रष्ट: क्षते क्षारावसेचनम्,पुरुषार्थी मनुष्य सर्वत्र भाग्यके अनुसार प्रतिष्ठा पाता है; परंतु जो अकर्मण्य है वह सम्मानसे भ्रष्ट होकर घावपर नमक छिड़कनेके समान असहा दुःख भोगता है
Orang yang cakap dan tekun memperoleh kehormatan di mana-mana, ditopang oleh nasib baik. Tetapi yang tak cakap dan malas, jatuh dari hormat, menemui derita laksana garam ditaburkan pada luka.
Verse 12
तपसा रूपसौभाग्यं रत्नानि विविधानि च । प्राप्पते कर्मणा सर्व न दैवादकृतात्मना,मनुष्यको तपस्यासे रूप, सौभाग्य और नाना प्रकारके रत्न प्राप्त होते हैं। इस प्रकार कर्मसे सब कुछ मिल सकता है; परंतु भाग्यके भरोसे निकम्मे बैठे रहनेवालेको कुछ नहीं मिलता
Melalui tapa-brata diperoleh keelokan, keberuntungan, dan berbagai permata. Sesungguhnya segala sesuatu diraih lewat usaha; tetapi orang yang tak mengekang diri dan hanya bersandar pada nasib tak memperoleh apa-apa.
Verse 13
तथा स्वर्गक्ष भोगश्न निष्ठा या च मनीषिता । सर्व पुरुषकारेण कृतेनेहोपलभ्यते,इस जगतमें पुरुषार्थ करनेसे स्वर्ग, भोग, धर्ममें निष्ठा और बुद्धिमत्ता--इन सबकी उपलब्धि होती है
Demikian pula surga beserta kenikmatannya, keteguhan dalam dharma, dan kebijaksanaan yang dipuji—semuanya diperoleh di dunia ini melalui upaya manusia yang sungguh-sungguh.
Verse 14
ज्योतींषि त्रिदशा नागा यक्षाश्षन्द्रार्कमारुता: । सर्व पुरुषकारेण मानुष्याद् देवतां गता:,नक्षत्र, देवता, नाग, यक्ष, चन्द्रमा, सूर्य और वायु आदि सभी पुरुषार्थ करके ही मनुष्यलोकसे देवलोकको गये हैं
Bhīṣma berkata: “Para cahaya langit, para dewa, kaum Nāga, para Yakṣa, juga Bulan, Matahari, dan Angin—semuanya mencapai martabat ilahi semata-mata melalui upaya diri. Dengan mengerahkan daya sepenuhnya, mereka bangkit dari keadaan manusia menuju kedudukan para dewa.”
Verse 15
अर्थो वा मित्रवर्गो वा ऐश्वर्य वा कुलान्वितम् । श्रीक्षापि दुर्लभा भोक्तुं तथैवाकृतकर्मभि:,जो पुरुषार्थ नहीं करते वे धन, मित्रवर्ग, ऐश्वर्य, उत्तम कुल तथा दुर्लभ लक्ष्मीका भी उपभोग नहीं कर सकते
Bhīṣma berkata: “Mereka yang tidak berusaha tidak dapat sungguh menikmati kekayaan, sahabat-sahabat, kedaulatan, kemuliaan keturunan, bahkan keberuntungan langka (Lakṣmī) sekalipun.”
Verse 16
शौचेन लभते विे्र: क्षत्रियो विक्रमेण तु । वैश्य: पुरुषकारेण शूद्र: शुश्रूषया श्रियम्,ब्राह्मण शौचाचारसे, क्षत्रिय पराक्रमसे, वैश्य उद्योगसे तथा शूद्र तीनों वर्णोकी सेवासे सम्पत्ति पाता है
Bhīṣma berkata: “Seorang brāhmaṇa meraih kemakmuran melalui kemurnian dan tata laku; seorang kṣatriya melalui keberanian; seorang vaiśya melalui kerja-keras dan usaha; dan seorang śūdra melalui pengabdian dalam pelayanan. Demikianlah tiap golongan mencapai kesejahteraan dengan menempuh jalannya sendiri.”
Verse 17
नादातांर भजन्त्यर्था न क्लीबं नापि निष्क्रियम् नाकर्मशीलं नाशूरं तथा नैवातपस्विनम्,न तो दान न देनेवाले कंजूसको धन मिलता है, न नपुंसकको, न अकर्मण्यको, न कामसे जी चुरानेवालेको, न शौर्यहीनको और न तपस्या न करनेवालेको ही मिलता है
Bhīṣma berkata: “Kekayaan tidak berpihak kepada orang yang tidak memberi, tidak pula kepada yang lemah, atau yang tidak bergerak. Ia tidak mendatangi mereka yang lalai dalam kerja, yang tanpa keberanian, dan juga yang tanpa tapa (laku asketis).”
Verse 18
येन लोकास्त्रय: सृष्टा दैत्या: सर्वाश्व देवता: । स एष भगवान् विष्णु: समुद्रे तप्पते तप:,जिन्होंने तीनों लोकों, दैत्यों तथा सम्पूर्ण देवताओंकी भी सृष्टि की है, वे ही ये भगवान् विष्णु समुद्रमें रहकर तपस्या करते हैं
Dia yang menciptakan tiga dunia—beserta para Daitya dan seluruh dewa—Dialah Bhagavān Viṣṇu. Viṣṇu yang sama itu bersemayam di samudra dan menjalankan tapa (askese).
Verse 19
स्वं चेत् कर्मफलं न स्यात् सर्वमेवाफलं भवेत् । लोको दैवं समालक्ष्य उदासीनो भवेन्ननु,यदि अपने कर्मोंका फल न प्राप्त हो तो सारा कर्म ही निष्फल हो जाय और सब लोग भाग्यको ही देखते हुए कर्म करनेसे उदासीन हो जायेँ
Jika perbuatan seseorang tidak menghasilkan buah yang semestinya, maka segala tindakan akan menjadi sia-sia. Melihat takdir semata sebagai penentu, manusia niscaya menjadi acuh dan berhenti berusaha dengan tekad.
Verse 20
अकृत्वा मानुषं कर्म यो दैवमनुवर्तते । वृथा श्राम्यति सम्प्राप्पय पतिं क्लीबमिवाड़ना,मनुष्यके योग्य कर्म न करके जो पुरुष केवल दैवका अनुसरण करता है वह दैवका आश्रय लेकर व्यर्थ ही कष्ट उठाता है। जैसे कोई स्त्री अपने नपुंसक पतिको पाकर भी कष्ट ही भोगती है
Orang yang tidak melakukan usaha yang layak bagi manusia, lalu hanya mengikuti apa yang disebutnya ‘takdir’, akan letih sia-sia dengan bersandar pada nasib. Seperti seorang perempuan yang, meski telah memperoleh suami, tetap menderita—karena suaminya mandul.
Verse 21
न तथा मानुषे लोके भयमस्ति शुभाशुभे । तथा त्रिदशलोके हि भयमल्पेन जायते,इस मनुष्यलोकमें शुभाशुभ कर्मोंसे उतना भय नहीं प्राप्त होता, जितना कि देवलोकमें थोड़े ही पापसे भय होता है
Di dunia manusia, perbuatan baik maupun buruk tidak menimbulkan rasa takut sedemikian rupa; tetapi di alam para dewa, sedikit saja dosa segera melahirkan ketakutan.
Verse 22
कृत: पुरुषकारस्तु दैवमेवानुवर्तते । न दैवमकृते किंचित् कस्यचिद् दातुमहति,किया हुआ पुरुषार्थ ही दैवका अनुसरण करता है; परंतु पुरुषार्थ न करनेपर दैव किसीको कुछ नहीं दे सकता
Usaha manusia yang telah dilakukanlah yang membuat takdir mengikuti. Namun bila tidak ada usaha, takdir tidak layak memberi apa pun kepada siapa pun.
Verse 23
यथा स्थानान्यनित्यानि दूृश्यन्ते दैवतेष्वपि । कथं कर्म विना दैवं स्थास्यति स्थापयिष्यति,देवताओंमें भी जो इन्द्रादिके स्थान हैं वे अनित्य देखे जाते हैं। पुण्यकर्मके बिना दैव कैसे स्थिर रहेगा और कैसे वह दूसरोंको स्थिर रख सकेगा
Sebagaimana di antara para dewa pun kedudukan Indra dan lainnya tampak tidak kekal, demikian pula tanpa karma bagaimana ‘takdir’ dapat berdiri teguh—dan bagaimana ia dapat meneguhkan yang lain?
Verse 24
न दैवतानि लोके5स्मिन् व्यापारं यान्ति कस्यचित् । व्यासडूं जनयन्त्युग्रमात्माभिभवशड्कया,देवता भी इस लोकमें किसीके पुण्यकर्मका अनुमोदन नहीं करते हैं, अपितु अपनी पराजयकी आशंकासे वे पुण्यात्मा पुरुषमें भयंकर आसक्ति पैदा कर देते हैं (जिससे उनके धर्ममें विघ्न उपस्थित हो जाय)
Bhishma berkata: Di dunia ini para dewa tidak campur tangan secara langsung dalam urusan siapa pun. Namun, karena takut seorang insan yang sungguh saleh akan melampaui mereka, mereka dapat membangkitkan keterikatan yang dahsyat di dalam dirinya—sehingga rintangan muncul dalam laku dharmanya.
Verse 25
ऋषीणां देवतानां च सदा भवति विग्रह: । कस्य वाचा हादैवं स्याद् यतो दैवं प्रवर्तते,ऋषियों और देवताओंमें सदा कलह होता रहता है (देवता ऋषियोंकी तपस्यामें विघ्न डालते हैं तथा ऋषि अपने तपोबलसे देवताओंको स्थानभ्रष्ट कर देते हैं।। फिर भी दैवके बिना केवल कथन मात्रसे किसको सुख या दुःख मिल सकता है? क्योंकि कर्मके मूलमें दैवका ही हाथ है
Bhishma berkata: Antara para resi dan para dewa selalu ada pertentangan. Tanpa daya takdir, bagi siapa ucapan belaka dapat menjadi sebab suka atau duka? Sebab dari takdirlah gerak peristiwa dijalankan.
Verse 26
कथं तस्य समुत्पत्तिर्यतो दैवं प्रवर्तते । एवं त्रिदशलोके<पि प्राप्यन्ते बहवो गुणा:,दैवके बिना पुरुषार्थकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है? क्योंकि प्रवृत्तिका मूल कारण दैव ही है (जिन्होंने पूर्वजन्ममें पुण्यकर्म किये हैं, वे ही दूसरे जन्ममें भी पूर्वसंस्कारवश पुण्यमें प्रवृत्त होते हैं। यदि ऐसा न हो तो सभी पुण्यकर्मोंमें ही लग जायँ)। देवलोकमें भी दैववश ही बहुत-से गुण (सुखद साधन) उपलब्ध होते हैं
Bhishma berkata: Bagaimana mungkin upaya manusia lahir berdiri sendiri, bila takdirlah yang menggerakkan tindakan? Demikian pula, bahkan di alam para dewa, banyak keunggulan dan kenikmatan diperoleh karena takdir.
Verse 27
आत्मैव ह्ात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन: । आत्मैव हाात्मन: साक्षी कृतस्याप्यकृतस्य च,आत्मा ही अपना बन्धु है, आत्मा ही अपना शत्रु है तथा आत्मा ही अपने कर्म और अकर्मका साक्षी है
Bhishma berkata: Diri sendirilah sahabat bagi diri; diri sendirilah pula musuh bagi diri. Diri sendiri jugalah saksi atas apa yang telah diperbuat dan apa yang ditinggalkan.
Verse 28
कृतं चाप्यकृतं किंचित् कृते कर्मणि सिद्ध्यति | सुकृतं दुष्कृतं कर्म न यथार्थ प्रपद्यते,प्रबल पुरुषार्थ करनेसे पहलेका किया हुआ भी कोई कर्म बिना किया हुआ-सा हो जाता है और वह प्रबल कर्म ही सिद्ध होकर फल प्रदान करता है। इस तरह पुण्य या पापकर्म अपने यथार्थ फलको नहीं दे पाते हैं
Bhishma berkata: Ketika suatu upaya yang lebih kuat ditempuh, bahkan perbuatan yang telah dilakukan pun dapat, sampai batas tertentu, seakan menjadi seperti belum dilakukan; dan justru ikhtiar yang kuat itulah yang menjadi efektif serta berbuah. Karena itu, perbuatan—baik kebajikan maupun dosa—tidak selalu memberikan hasilnya secara lurus dan sepenuhnya sepadan.
Verse 29
देवानां शरणं पुण्य॑ सर्व पुण्यैरवाप्यते । पुण्यशील नर प्राप्य कि दैवं प्रकरिष्यति,देवताओंका आश्रय पुण्य ही है। पुण्यसे ही सब कुछ प्राप्त होता है। पुण्यात्मा पुरुषको पाकर दैव क्या करेगा?
Bhisma bersabda: “Bagi para dewa, perlindungan sejati adalah kebajikan (puṇya); oleh kebajikanlah segala buah kebajikan dan pencapaian diperoleh. Bila seorang yang berperilaku luhur telah didapatkan, apa lagi yang dapat diperbuat oleh ‘takdir’ terhadapnya?”
Verse 30
पुरा ययातिर्वि भ्रष्टक्ष्यावित: पतित: क्षितौ । पुनरारोपित: स्वर्ग दौहित्रै: पुण्यकर्मभि:,पूर्वकालमें राजा ययाति पुण्य क्षीण होनेपर स्वर्गसे च्युत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े थे; परंतु उनके पुण्यकर्मा दौह्ित्रोंने उन्हें पुन: स्वर्गलोकमें पहुँचा दिया
Bhisma bersabda: “Pada masa lampau, Raja Yayāti—ketika kebajikannya telah habis—jatuh dari surga dan terhempas ke bumi. Namun kemudian, berkat perbuatan dharma para cucunya, ia diangkat kembali dan dipulihkan ke surga.”
Verse 31
पुरूरवाश्च राजर्षिद्विजैरभिहित: पुरा । ऐल इत्यभिविख्यात: स्वर्ग प्राप्तो महीपति:,इसी तरह पूर्वकालमें ऐल नामसे विख्यात राजर्षि पुरूरवा ब्राह्मणोंके आशीर्वाद देनेपर स्वर्गलोकको प्राप्त हुए थे
Bhisma bersabda: “Demikian pula pada zaman dahulu, raja resi Purūravas—terkenal dengan nama Aila—mencapai surga, sang penguasa bumi itu, karena pujian dan restu para Brahmana.”
Verse 32
अश्वमेधादिभिर्यज्ञै: सत्कृत: कोसलाधिप: । महर्षिशापात् सौदास: पुरुषादत्वमागत:,(अब इसके विपरीत दृष्टन्त देते हैं--) अश्वमेध आदि यज्ञोंद्वारा सम्मानित होनेपर भी कोशलनरेश सौदासको महर्षि वसिष्ठके शापसे नरभक्षी राक्षस होना पड़ा
(Contoh yang berlawanan) Walau dimuliakan melalui yajña seperti Aśvamedha, penguasa Kosala, Saudāsa, karena kutukan seorang maharsi, jatuh ke keadaan sebagai raksasa pemakan manusia.
Verse 33
अश्व॒त्थामा च रामश्न मुनिपुत्रौ धनुर्थरौ । न गच्छत: स्वर्गलोक॑ सुकृतेनेह कर्मणा,इसी प्रकार अश्वत्थामा और परशुराम--ये दोनों ही ऋषिपुत्र और धनुर्धर वीर हैं। इन दोनोंने पुण्यकर्म भी किये हैं तथापि उस कर्मके प्रभावसे स्वर्गमें नहीं गये
Bhisma bersabda: “Demikian pula Aśvatthāmā dan Rāma (Paraśurāma)—keduanya putra resi dan pemanah perkasa. Walau mereka melakukan perbuatan bajik di dunia ini, mereka tidak mencapai alam surga semata-mata oleh daya perbuatan itu.”
Verse 34
वसुर्यज्ञशतैरिष्टवा द्वितीय इव वासव: । मिथ्याभिधानेनैकेन रसातलतलं गत:,द्वितीय इन्द्रके समान सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी राजा वसु एक ही मिथ्या भाषणके दोषसे रसातलको चले गये
Bhishma berkata: Raja Vasu, meski telah melaksanakan seratus yajña dan laksana Indra kedua, tetap jatuh ke kedalaman Rasātala karena satu ucapan dusta semata.
Verse 35
बलिदवीैरोचनिर्बद्धों धर्मपाशेन दैवतै: । विष्णो: पुरुषकारेण पातालसदन: कृत:,विरोचनकुमार बलिको देवताओंने धर्मपाशसे बाँध लिया और भगवान् विष्णुके पुरुषार्थसे वे पातालवासी बना दिये गये
Bhishma berkata: Bali putra Virocana diikat para dewa dengan jerat Dharma; dan melalui ketegasan upaya Viṣṇu, ia dijadikan penghuni Pātāla.
Verse 36
शक्रस्योद्गम्य चरणं प्रस्थितो जनमेजय: । द्विजस्त्रीणां वध कृत्वा कि दैवेन न वारित:,राजा जनमेजय द्विज स्त्रियोंका वध करके इन्द्रके चरणका आश्रय ले जब स्वर्गलोकको प्रस्थित हुए, उस समय दैवने उसे आकर क्यों नहीं रोका
Bhishma berkata: Setelah membunuh para istri Brahmana, Raja Janamejaya berangkat menuju surga dengan berlindung pada kaki Śakra. Mengapa daiva (takdir) tidak datang mencegahnya saat itu?
Verse 37
अज्ञानाद् ब्राह्मणं हत्वा स्पृष्टोे बालवधेन च | वैशम्पायनविप्रर्षि: कि दैवेन न वारित:,ब्रह्मर्षि वैशम्पायन अज्ञानवश ब्राह्णकी हत्या करके बाल-वधके पापसे भी लिप्त हो गये थे तो भी दैवने उन्हें स्वर्ग जानेसे क्यों नहीं रोका
Bhishma berkata: Karena ketidaktahuan telah membunuh seorang Brāhmaṇa dan juga ternoda oleh dosa membunuh seorang anak, mengapa resi-Brahmana Vaiśampāyana tidak dicegah oleh daiva (takdir)?
Verse 38
गोप्रदानेन मिथ्या च ब्राह्मणेभ्यो महामखे । पुरा नृगश्न राजर्षि: कूकलासत्वमागत:,पूर्वकालमें राजर्षि नृग बड़े दानी थे। एक बार किसी महायजञ्ञमें ब्राह्मणोंको गोदान करते समय उनसे भूल हो गयी; अर्थात् एक गऊको दुबारा दानमें दे दिया, जिसके कारण उन्हें गिरगिटकी योनिमें जाना पड़ा
Bhishma berkata: Pada masa lampau, resi-raja Nṛga, ketika menghadiahkan sapi kepada para Brahmana dalam suatu mahāyajña, melakukan satu kekeliruan dalam dāna; karena itulah ia terlahir sebagai seekor kadal.
Verse 39
धुन्धुमारश्न राजर्षि: सत्रेष्वेव जरां गत: । प्रीतिदायं परित्यज्य सुष्वाप स गिरिव्रजे
Bhishma berkata: Resi-raja Dhundhumāraśna, yang menua ketika tekun dalam rangkaian upacara kurban, meninggalkan segala yang menyenangkan dan memuaskan, lalu berbaring untuk tidur di pertapaan pegunungan Girivraja.
Verse 40
राजर्षि धुन्धुमार यज्ञ करते-करते बूढ़े हो गये तथापि देवताओंके प्रसन्नतापूर्वक दिये हुए वरदानको त्यागकर गिरिवत्रजमें सो गये (यज्ञका फल नहीं पा सके) ।। पाण्डवानां हूतं राज्यं धार्तराष्ट्रमहाबलै: । पुन: प्रत्याह्दतं चैव न दैवाद् भुजसंश्रयात्,महाबली धृतराष्ट्र-पुत्रोंने पाण्डवोंका राज्य हड़प लिया था। उसे पाण्डवोंने पुनः बाहुबलसे ही वापस लिया। दैवके भरोसे नहीं
Bhishma berkata: Resi-raja Dhundhumāra menua sambil terus melaksanakan kurban; namun ia bahkan melepaskan anugerah yang diberikan para dewa yang telah berkenan, lalu berbaring tidur di Girivraja—maka ia pun tidak memperoleh buah kurbannya. Demikian pula, kerajaan yang semestinya menjadi milik para Pandawa telah dirampas oleh putra-putra Dhritarashtra yang perkasa; dan para Pandawa merebutnya kembali bukan dengan bersandar pada nasib, melainkan dengan bertumpu pada kekuatan lengan mereka sendiri.
Verse 41
तपोनियमसंयुक्ता मुनयः संशितव्रता: । कि ते दैवबलात् शापमुत्सृजन्ते न कर्मणा,तप और नियममें संयुक्त रहकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनि क्या दैवबलसे ही किसीको शाप देते हैं, पुरुषार्थके बलसे नहीं?
Bhishma berkata: Para resi yang terikat oleh tapa dan pengendalian diri, yang teguh dalam laku-sumpah yang keras—apakah mereka melepaskan kutuk hanya oleh daya takdir, dan bukan oleh kehendak serta usaha tindakan mereka sendiri?
Verse 42
पापमुत्सृजते लोके सर्व प्राप्य सुदुर्लभम् । लोभमोहसमापन्न न दैवं त्रायते नरम्
Di dunia ini, sekalipun seseorang telah memperoleh segala sesuatu yang amat sukar didapat, ia tetap dapat jatuh ke dalam dosa. Bila seorang manusia dikuasai kerakusan dan delusi, bahkan keberuntungan ilahi pun tidak melindunginya.
Verse 43
संसारमें समस्त सुदुर्लभ सुख-भोग किसी पापीको प्राप्त हो जाय तो भी वह उसके पास टिकता नहीं, शीघ्र ही उसे छोड़कर चल देता है। जो मनुष्य लोभ और मोहमें डूबा हुआ है उसे दैव भी संकटसे नहीं बचा सकता ।। यथाग्नि: पवनोद्धूतः सुसूक्ष्मोडपि महान् भवेत् । तथा कर्मसमायुक्त दैवं साधु विवर्धते,जैसे थोड़ी-सी भी आग वायुका सहारा पाकर बहुत बड़ी हो जाती है, उसी प्रकार पुरुषार्थका सहारा पाकर दैवका बल विशेष बढ़ जाता है
Bhishma berkata: Sekalipun seorang pendosa memperoleh kenikmatan dan kesenangan yang paling langka di dunia, semuanya tidak akan menetap padanya; segera mereka meninggalkannya. Seorang manusia yang tenggelam dalam kerakusan dan delusi tidak dapat diselamatkan dari malapetaka bahkan oleh nasib sekalipun. Sebagaimana api yang amat kecil, bila disulut oleh angin, dapat menjadi kobaran besar, demikian pula takdir—bila disertai upaya manusia dan tindakan yang benar—bertambah kuat dengan luar biasa.
Verse 44
यथा तैलक्षयाद् दीप: प्रह्यासमुपगच्छति । तथा कर्मक्षयाद् दैवं प्रहासमुपगच्छति,जैसे तेल समाप्त हो जानेसे दीपक बुझ जाता है, उसी प्रकार कर्मके क्षीण हो जानेपर दैव भी नष्ट हो जाता है
Sebagaimana pelita padam ketika minyaknya habis, demikian pula ketika karma yang terkumpul telah terkuras, apa yang disebut orang sebagai ‘takdir’ pun kehilangan daya dan berakhir.
Verse 45
विपुलमपि धनौघं प्राप्य भोगान् स्त्रियो वा पुरुष इह न शक्त: कर्महीनो हि भोक्तुम् । सुनिहितमपि चार्थ दैवतै रक्ष्यमाणं पुरुष इह महात्मा प्राप्तुते नित्ययुक्त:,उद्योगहीन मनुष्य धनका बहुत बड़ा भण्डार, तरह-तरहके भोग और स्त्रियोंको पाकर भी उनका उपभोग नहीं कर सकता; किंतु सदा उद्योगमें लगा रहनेवाला महामनस्वी पुरुष देवताओंद्वारा सुरक्षित तथा गाड़कर रखे हुए धनको भी प्राप्त कर लेता है
Sekalipun seseorang memperoleh limpahan harta yang besar—beserta kenikmatan dan bahkan perempuan—namun bila ia tanpa usaha dan tindakan, ia tak sanggup menikmatinya. Sebaliknya, insan agung yang senantiasa berdisiplin dan tekun berupaya dapat meraih bahkan harta yang disembunyikan rapat dan dijaga para dewa.
Verse 46
व्ययगुणमपि साधु कर्मणा संश्रयन्ते भवति मनुजलोकाद् देवलोको विशिष्ट: । बहुतरसुसमृद्ध्या मानुषाणां गृहाणि पितृवनभवनाभं दृश्यते चामराणाम्,जो दान करनेके कारण निर्धन हो गया है, ऐसे सत्पुरुषके पास उसके सत्कर्मके कारण देवता भी पहुँचते हैं और इस प्रकार उसका घर मनुष्यलोककी अपेक्षा श्रेष्ठ देवलोक-सा हो जाता है। परंतु जहाँ दान नहीं होता वह घर बड़ी भारी समृद्धिसे भरा हो तो भी देवताओंकी दृष्टिमें वह श्मशानके ही तुल्य जान पड़ता है
Sekalipun orang baik menjadi miskin karena memberi, para dewa tetap mendatanginya berkat kebajikannya; maka rumahnya, dibanding dunia manusia, menjadi laksana surga yang lebih luhur. Namun di tempat tanpa kedermawanan, rumah yang melimpah harta pun tampak bagi para dewa tak lebih baik daripada tanah pembakaran mayat.
Verse 47
न च फलति विकर्मा जीवलोके न दैवं व्यपनयति विमार्ग नास्ति दैवे प्रभुत्वम् | गुरुमिव कृतमग्रयं कर्म संयाति दैवं नयति पुरुषकार: संचितस्तत्र तत्र,इस जीव-जगत्में उद्योगहीन मनुष्य कभी फूलता-फलता नहीं दिखायी देता। दैवमें इतनी शक्ति नहीं है कि वह उसे कुमार्गसे हटाकर सन्मार्गमें लगा दे। जैसे शिष्य गुरुको आगे करके चलता है उसी तरह दैव पुरुषार्थको ही आगे करके स्वयं उसके पीछे चलता है। संचित किया हुआ पुरुषार्थ ही दैवको जहाँ चाहता है, वहाँ-वहाँ ले जाता है
Di dunia makhluk hidup, orang yang tak berusaha tak pernah sungguh-sungguh berjaya. Takdir tidak memiliki kuasa mandiri untuk menarik si pemalas dari jalan sesat dan menegakkannya di jalan benar. Justru takdir mengikuti ikhtiar manusia: sebagaimana murid berjalan dengan guru di depan, demikianlah nasib bergerak di belakang daya upaya. Upaya yang terkumpullah yang menyeret ‘takdir’ ke mana pun ia diarahkan.
Verse 48
एतत् ते सर्वमाख्यातं मया वै मुनिसत्तम | फलं पुरुषकारस्य सदा संदृश्य तत्त्वतः,मुनिश्रेष्ठ! मैंने सदा पुरुषार्थके ही फलको प्रत्यक्ष देखकर यथार्थरूपसे ये सारी बातें तुम्हें बतायी हैं
Wahai yang terbaik di antara para resi, semuanya telah kukatakan kepadamu dengan lengkap. Karena aku senantiasa menyaksikan secara langsung dan dalam kebenaran buah dari usaha manusia, maka demikianlah aku menjelaskannya kepadamu sebagaimana adanya.
Verse 49
अभ्युत्थानेन दैवस्य समारब्धेन कर्मणा । विधिना कर्मणा चैव स्वर्गमार्गमवाप्लुयात्,मनुष्य दैवके उत्थानसे आरम्भ किये हुए पुरुषार्थसे उत्तम विधि और शास्त्रोक्त सत्कर्मसे ही स्वर्गलोकका मार्ग पा सकता है
Bhishma berkata: Dengan bangkit penuh tekad, memulai tindakan selaras dengan ketetapan takdir, serta menjalankan perbuatan menurut tata yang benar dan tuntunan suci, seseorang mencapai jalan menuju surga.
The tension is between moral responsibility and fatalism: whether one should attribute outcomes to daiva or treat oneself as accountable through puruṣakāra and karma, especially in contexts where consequences appear unequal or unpredictable.
It instructs that intentional, regulated action is causally primary for outcomes; daiva is portrayed as effective when aligned with effort, while passive reliance on fate is criticized as practically and ethically disabling.
Rather than a formal phalaśruti, it ends with a pragmatic prescription: by initiative (abhyutthāna), commenced and properly performed action (vidhinā karmaṇā), one attains auspicious goals, framed here as access to the ‘svarga-mārga’ (path to heaven).