Adhyaya 173
Anushasana ParvaAdhyaya 17353 Versesयुद्ध समाप्त; यह अध्याय युद्धोत्तर पुनर्स्थापन, दान और भीष्म-उपदेश/स्वर्गारोहण-प्रसंग की ओर अग्रसर है।

Adhyaya 173

Chapter Arc: राज्याभिषेक के बाद धर्मराज युधिष्ठिर युद्ध-विधवाओं और अनाथों को अर्थदान देकर सान्त्वना देते हैं—पर मन का बोझ उन्हें बाण-शय्या पर पड़े भीष्म के पास खींच लाता है। → युधिष्ठिर भाइयों सहित भीष्म के निकट पहुँचते हैं; गुरु-शिष्य, पितामह-पौत्र और विजेता-पराजित की सारी गाँठें एक ही शय्या के पास कस जाती हैं—अब राज्य का भार, प्रजा का दुःख और धर्म का मार्ग एक साथ पूछे जाने हैं। → भीष्म युधिष्ठिर के शुद्ध-हृदय और गुरु-वत्सल स्वभाव की प्रशंसा करते हुए उन्हें धर्म में स्थित रहकर प्रजा-पालन, गुरु-सेवा और विशेषतः ब्राह्मणों, आचार्यों व ऋत्विजों के सत्कार का आदेश देते हैं; साथ ही विजय-सूत्र उद्घोषित होता है—“यतः कृष्णस्ततो धर्मो, यतो धर्मस्ततो जयः।” → भीष्म समस्त सुहृदों को आलिंगन कर युधिष्ठिर को पुनः उपदेश देते हैं—राज्य का स्थैर्य दया, दान और धर्म-पालन से है; युधिष्ठिर उनके निर्देश को स्वीकार कर शासन-धर्म के पथ पर दृढ़ होते हैं। → भीष्म का ‘स्वर्गारोहण’ निकट है—उपदेश के बाद भी शय्या पर पड़े पितामह के प्राण-प्रस्थान की घड़ी आसन्न होकर अगले प्रसंग की ओर संकेत करती है।

Shlokas

Verse 1

४। 788 | रु हर े 4667“ गा वि | हट 00 ब््झे शर-शय्यापर पड़े भीष्मकी युधिषछ्विरसे बातचीत (भीष्मस्वर्गारोहणपर्व) सप्तषष्ट्यधिकशततमो< ध्याय: भीष्मके अन्त्येष्टि-संस्कारकी सामग्री लेकर युधिष्ठिर आदिका उनके पास जाना और भीष्मका श्रीकृष्ण आदिसे देहत्यागकी अनुमति लेते हुए धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरको कर्तव्यका उपदेश देना वैशम्पायन उवाच ततः कुन्तीसुतो राजा पौरजानपदं जनम्‌ | पूजयित्वा यथान्यायमनुजज्ञे गृहान्‌ प्रति,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! हस्तिनापुरमें जानेके बाद कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिरने नगर और जनपदके लोगोंका यथोचित सम्मान करके उन्हें अपने-अपने घर जानेकी आज्ञा दी

Vaiśampāyana berkata: Kemudian raja, putra Kuntī (Yudhiṣṭhira), setelah menghormati warga kota dan rakyat negeri sekitarnya menurut tata yang semestinya, memberi mereka izin untuk pulang ke rumah masing-masing.

Verse 2

सान्त्वयामास नारीक्ष हतवीरा हतेश्वरा: । विपुलैरर्थदानै: स तदा पाण्डुसुतो नूप:,इसके बाद जिन स्त्रियोंके पति और वीर पुत्र युद्धमें मारे गये थे, उन सबको बहुत-सा धन देकर पाण्बुपुत्र राजा युधिष्ठिरने धैर्य बँधाया

Kemudian raja putra Pāṇḍu itu menenteramkan para perempuan yang pahlawan-pahlawannya gugur dan yang kehilangan suami, dengan menganugerahkan harta yang berlimpah.

Verse 3

सो$भिषिक्तो महाप्राज्ञ: प्राप्प राज्यं युधिष्ठिर: । अवस्थाप्य नरश्रेष्ठ: सर्वा: स्वप्रकृतीस्तथा,महाज्ञानी और धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने राज्याभिषेक हो जानेके पश्चात्‌ अपना राज्य पाकर मन्त्री आदि समस्त प्रकृतियोंको अपने-अपने पदपर स्थापित करके वेदवेत्ता एवं गुणवान्‌ ब्राह्मणोंसे उत्तम आशीर्वाद ग्रहण किया

Setelah ditahbiskan, Yudhiṣṭhira yang amat bijaksana memperoleh kerajaannya; sang terbaik di antara manusia itu pun menegakkan kembali seluruh perangkat negara—para menteri dan lainnya—pada kedudukan masing-masing.

Verse 4

द्विजेभ्यो गुणमुख्येभ्यो नैगमेभ्यश्व सर्वश: । प्रतिगृह्मयाशिषो मुख्यास्तथा धर्मभूतां वर:,महाज्ञानी और धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने राज्याभिषेक हो जानेके पश्चात्‌ अपना राज्य पाकर मन्त्री आदि समस्त प्रकृतियोंको अपने-अपने पदपर स्थापित करके वेदवेत्ता एवं गुणवान्‌ ब्राह्मणोंसे उत्तम आशीर्वाद ग्रहण किया

Yudhiṣṭhira, yang utama di antara para penegak dharma, menerima berkat-berkat terbaik dari para dvija yang unggul dalam kebajikan serta dari para brāhmaṇa yang mahir dalam Veda dan tradisi suci.

Verse 5

उषित्वा शर्वरी: श्रीमान्‌ पञ्चाशन्नगरोत्तमे । समयं कौरवाग्रयस्य सस्मार पुरुषर्षभ:,पचास राततक उस उत्तम नगरमें निवास करके श्रीमान्‌ पुरुषप्रवर युधिष्ठिरको कुरुकुल-शिरोमणि भीष्मजीके बताये हुए समयका स्मरण हो आया

Setelah tinggal lima puluh malam di kota yang unggul itu, Yudhiṣṭhira—sang mulia, laksana banteng di antara manusia—teringat akan waktu yang telah ditetapkan oleh Bhīṣma, yang terkemuka di antara para Kaurava.

Verse 6

स निर्ययौ गजपुराद्‌ याजकैः परिवारित: । दृष्टवा निवृत्तमादित्यं प्रवृत्तं चोत्तरायणम्‌,उन्होंने यह देखकर कि सूर्यदेव दक्षिणायनसे निवृत्त हो गये और उत्तरायणपर आ गये, याजकोंसे घिरकर हस्तिनापुरसे बाहर निकले

Melihat Sang Surya telah berbalik dari lintasan selatan dan memasuki lintasan utara (Uttarāyaṇa), ia pun berangkat keluar dari Hastināpura, dikelilingi para pendeta pelaksana upacara.

Verse 7

घृतं माल्यं च गन्धांश्व॒ क्षौमाणि च युधिष्ठिर: । चन्दनागुरुमुख्यानि तथा कालीयकान्यपि,कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने भीष्मजीका दाह-संस्कार करनेके लिये पहले ही घृत, माल्य, गन्ध, रेशमी वस्त्र, चन्दन, अगुरु, काला चन्दन, श्रेष्ठ पुरुषके धारण करनेयोग्य मालाएँ तथा नाना प्रकारके रत्न भेज दिये थे

Yudhiṣṭhira, putra Kuntī, telah lebih dahulu mengirimkan ghee, rangkaian bunga, wewangian, kain halus, serta bahan harum utama seperti cendana dan agaru, juga kālīyaka (cendana hitam/pasta), untuk upacara kremasi Bhīṣma.

Verse 8

प्रस्थाप्य पूर्व कौन्तेयो भीष्मसंस्करणाय वै | माल्यानि च वराहाणि रत्नानि विविधानि च,कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने भीष्मजीका दाह-संस्कार करनेके लिये पहले ही घृत, माल्य, गन्ध, रेशमी वस्त्र, चन्दन, अगुरु, काला चन्दन, श्रेष्ठ पुरुषके धारण करनेयोग्य मालाएँ तथा नाना प्रकारके रत्न भेज दिये थे

Sebelumnya, putra Kuntī itu telah mengirimkan untuk upacara pemakaman Bhīṣma: rangkaian bunga yang terbaik, persembahan pilihan, serta berbagai macam permata.

Verse 9

धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य गान्धारीं च यशस्विनीम्‌ । मातरं च पृथां धीमान्‌ भ्रातृश्न पुरुषर्षभान्‌,विभो! कुरुकुलनन्दन बुद्धिमान्‌ युधिष्छिर राजा धृतराष्ट्र यशस्विनी गान्धारी देवी, माता कुन्ती तथा पुरुषप्रवर भाइयोंको आगे करके पीछेसे भगवान्‌ श्रीकृष्ण, बुद्धिमान्‌ विदुर, युयुत्सु तथा सात्यकिको साथ लिये चल रहे थे

Raja Yudhiṣṭhira yang bijaksana—kebanggaan wangsa Kuru—berjalan dengan menempatkan Dhṛtarāṣṭra di depan, bersama Gāndhārī yang termasyhur, ibu mereka Pṛthā (Kuntī), serta para saudara laksana banteng di antara manusia; dan di belakang mereka menyusul Bhagavān Śrī Kṛṣṇa, Vidura yang arif, Yuyutsu, dan Sātyaki.

Verse 10

जनार्दनेनानुगतो विदुरेण च धीमता । युयुत्सुना च कौरव्यो युयुधानेन वा विभो,विभो! कुरुकुलनन्दन बुद्धिमान्‌ युधिष्छिर राजा धृतराष्ट्र यशस्विनी गान्धारी देवी, माता कुन्ती तथा पुरुषप्रवर भाइयोंको आगे करके पीछेसे भगवान्‌ श्रीकृष्ण, बुद्धिमान्‌ विदुर, युयुत्सु तथा सात्यकिको साथ लिये चल रहे थे

Waiśaṃpāyana berkata: Wahai yang perkasa, raja dari wangsa Kuru melangkah maju; di belakangnya mengikuti Janārdana Śrī Kṛṣṇa, Vidura yang bijaksana, serta Yuyutsu dan Yuyudhāna (Sātyaki).

Verse 11

महता राजभोगेन पारिबर्ेण संवृत: । स्तूयमानो महातेजा भीष्मस्याग्नीननुव्रजन्‌,वे महातेजस्वी नरेश विशाल राजोचित उपकरण तथा वैभवके भारी ठाट-बाटसे सम्पन्न थे, उनकी स्तुतिकी जा रही थी और वे भीष्मजीके द्वारा स्थापित की हुई त्रिविध अग्नियोंको आगे रखकर स्वयं पीछे-पीछे चल रहे थे

Waiśaṃpāyana berkata: Dikelilingi kemegahan kenikmatan raja dan iring-iringan besar, sang raja yang bercahaya berjalan diiringi pujian; ia menempatkan di depan api suci tiga macam yang ditegakkan oleh Bhīṣma, lalu melangkah mengikutinya dari belakang.

Verse 12

निश्चक्राम पुरात्‌ तस्माद्‌ यथा देवपतिस्तथा । आससाद कुरुक्षेत्रे ततः शान्तनवं नृप:,वे देवराज इन्द्रकी भाँति अपनी राजधानीसे बाहर निकले और यथासमय कुरुक्षेत्रमें शान्तनुनन्दन भीष्मजीके पास जा पहुँचे

Waiśaṃpāyana berkata: Lalu sang raja berangkat dari kota itu bagaikan Indra, penguasa para dewa; dan pada waktunya ia tiba di Kurukṣetra, mendekati Bhīṣma, putra Śāntanu.

Verse 13

उपास्यमान व्यासेन पाराशर्येण धीमता । नारदेन च राजर्षे देवलेनासितेन च,राजर्षे! उस समय वहाँ पराशरनन्दन बुद्धिमान व्यास, देवर्षि नारद और असित देवल ऋषि उनके पास बैठे थे

Waiśaṃpāyana berkata: Wahai raja-ṛṣi, pada saat itu Vyāsa yang bijaksana, putra Parāśara, bersama Devarṣi Nārada dan resi Asita Devala, duduk dekat Bhīṣma, menghormati dan melayaninya.

Verse 14

हतशिष्टैनुपैश्चान्यै्नानादेशसमागतै: । रक्षिभिश्व महात्मानं रक्ष्यमाणं समन्ततः,नाना देशोंसे आये हुए नरेश, जो मरनेसे बच गये थे, रक्षक बनकर चारों ओरसे महात्मा भीष्मकी रक्षा करते थे

Waiśaṃpāyana berkata: Raja-raja yang tersisa dari pembantaian, bersama para penguasa lain yang datang dari berbagai negeri, berdiri sebagai penjaga di sekeliling, melindungi Bhīṣma yang berhati luhur dari segala arah.

Verse 15

शयानं वीरशयने ददर्श नृपतिस्तत: । ततो रथादवातीर्य भ्रातृभि: सह धर्मराट्‌,धर्मराज राजा युधिष्ठिर दूरसे ही बाणशय्यापर सोये हुए भीष्मजीको देखकर भाइयोंसहित रथसे उतर पड़े

Saat itu sang raja melihat Bhisma terbaring di ranjang para kesatria—ranjang panah. Maka Raja Yudhisthira, penguasa dharma, turun dari keretanya bersama saudara-saudaranya dan mendekati sang kakek agung dengan hormat, meski suasana masih sarat jejak perang.

Verse 16

अभिवाद्याथ कौन्तेय: पितामहमरिंदम । द्वैपायनादीन वि्रांश्न तैश्न प्रत्यभिनन्दित:,शत्रुदमन नरेश! कुन्तीकुमारने सबसे पहले पितामहको प्रणाम किया। उसके बाद व्यास आदि ब्राह्मणोंको मस्तक झुकाया। फिर उन सबने भी उनका अभिनन्दन किया

Kemudian putra Kunti, penakluk musuh, terlebih dahulu bersujud hormat kepada Sang Kakek Agung. Sesudah itu ia memberi salam takzim kepada Vyasa dan para brahmana lainnya; dan mereka pun menyambutnya dengan kata-kata yang selaras dengan dharma.

Verse 17

ऋष्विम्भिब्रह्मकल्पैश्व भ्रातृभि: सह धर्मज: । आसाटद्य शरतल्पस्थमृषिभि: परिवारितम्‌,तदनन्तर कुरुनन्दनके धर्मपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ब्रह्माजीके समान तेजस्वी ऋत्विजों भाइयों तथा ऋषियोंसे घिरे और बाण-शय्यापर सोये हुए भरतश्रेष्ठ गंगापुत्र भीष्मजीसे भाइयोंसहित इस प्रकार बोले--

Sesudah itu Dharmaraja Yudhisthira, putra Dharma, bersama saudara-saudaranya dan dikelilingi para resi serta para pendeta yang suci laksana Brahma, mendekati Bhisma—putra Gangga, yang terbaik di antara Bharata—yang terbaring di ranjang panah. Di tengah para imam, saudara, dan ṛṣi, Yudhisthira yang bercahaya bak Brahma pun berkata demikian.

Verse 18

अब्रवीद्‌ भरतश्रेष्ठ धर्मराजो युधिष्ठिर: । भ्रातृभि: सह कौरव्य: शयानं निम्नगासुतम्‌,तदनन्तर कुरुनन्दनके धर्मपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ब्रह्माजीके समान तेजस्वी ऋत्विजों भाइयों तथा ऋषियोंसे घिरे और बाण-शय्यापर सोये हुए भरतश्रेष्ठ गंगापुत्र भीष्मजीसे भाइयोंसहित इस प्रकार बोले--

Maka Yudhisthira, raja yang menegakkan dharma dan yang utama di antara Bharata, pun berbicara. Dikelilingi saudara-saudaranya beserta para pendeta dan resi, ia mendekati Bhisma, putra Gangga, yang terbaring di ranjang panah, lalu berkata demikian.

Verse 19

युधिष्ठिरो5हं नृपते नमस्ते जाह्नवीसुत । शृणोषि चेन्महाबाहो ब्रूहि किं करवाणि ते,“गंगानन्दन! नरेश्वर! महाबाहो! मैं युधिष्ठिर आपकी सेवामें उपस्थित हूँ और आपको नमस्कार करता हूँ। यदि आपको मेरी बात सुनायी देती हो तो आज्ञा दीजिये कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ?

Wahai putra Jāhnavī (Gangga), wahai raja, wahai berlengan perkasa! Aku Yudhisthira; hamba bersujud memberi hormat. Jika engkau mendengar ucapanku, katakanlah—apa yang harus kulakukan untuk melayanimu?

Verse 20

प्राप्तोडस्मि समये राजन्नग्नीनादाय ते विभो । आचार्य ब्राद्मणांश्वैव ऋत्विजो भ्रातरश्ष मे,“राजन! प्रभो! आपकी अग्नियों और आचार्य;ो, ब्राह्मणों तथा ऋत्विजोंको साथ लेकर मैं अपने भाइयोंके साथ ठीक समयपर आ पहुँचा हूँ

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja, wahai tuan yang perkasa! Pada waktu yang telah ditetapkan aku telah tiba, membawa api suci milikmu, juga para ācārya, para Brāhmaṇa, dan para ṛtvij (imam upacara); saudara-saudaraku pun menyertaiku.”

Verse 21

पुत्रश्न ते महातेजा धृतराष्ट्रो जनेश्वर: । उपस्थित: सहामात्यो वासुदेवश्च वीर्यवान्‌,“आपके पुत्र महातेजस्वी राजा धृतराष्ट्र भी अपने मन्त्रियोंक साथ उपस्थित हैं और महापराक्रमी भगवान्‌ श्रीकृष्ण भी यहाँ पधारे हुए हैं

Vaiśampāyana berkata: “Putramu, Dhṛtarāṣṭra, penguasa manusia yang bercahaya perkasa, hadir di sini bersama para menterinya; dan Vāsudeva—Kṛṣṇa yang gagah—juga telah datang.”

Verse 22

हतशिष्टाश्व॒ राजान: सर्वे च कुरुजांगला: । तान्‌ पश्य नरशार्दूल समुन्मीलय लोचने,'पुरुषसिंह! युद्धमें मरनेसे बचे हुए समस्त राजा और कुरुजांगल देशकी प्रजा भी उपस्थित है। आप आँखें खोलिये और इन सबको देखिये

Vaiśampāyana berkata: “Wahai harimau di antara manusia! Para raja yang tersisa setelah pembantaian, dan seluruh rakyat Kuru-jāṅgala pun ada di sini. Bukalah matamu dan pandanglah mereka semua.”

Verse 23

यच्चेह किंचित्‌ कर्तव्यं तत्सव॑ प्रापितं मया । यथोक्तं भवता काले सर्वमेव च तत्‌ कृतम्‌,“आपके कथनानुसार इस समयके लिये जो कुछ संग्रह करना आवश्यक था, वह सब जुटाकर मैंने यहाँ पहुँचा दिया है। सभी उपयोगी वस्तुओंका प्रबन्ध कर लिया गया है!

Vaiśampāyana berkata: “Apa pun yang perlu dilakukan di sini, semuanya telah kuselesaikan. Tepat seperti yang engkau perintahkan, pada waktunya, semuanya telah dikerjakan.”

Verse 24

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु गाड़ेय: कुन्तीपुत्रेण धीमता । ददर्श भारतान्‌ सर्वान्‌ स्थितान्‌ सम्परिवार्य ह,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! परम बुद्धिमान कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके इस प्रकार कहनेपर गंगानन्दन भीष्मजीने आँखें खोलकर अपनेको सब ओरसे घेरकर खड़े हुए सम्पूर्ण भरतवंशियोंको देखा

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya! Setelah demikian diucapkan oleh putra Kuntī yang bijaksana (Yudhiṣṭhira), Bhīṣma, putra Gaṅgā, membuka matanya dan memandang semua Bhārata yang berdiri mengelilinginya dari segala sisi.”

Verse 25

ततश्च तं बली भीष्म: प्रगृह्म विपुलं भुजम्‌ उद्यन्मेघस्वरो वाग्मी काले वचनमत्रवीत्‌,फिर प्रवचनकुशल बलवान भीष्मने युधिष्ठिरकी विशाल भुजा हाथमें लेकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें यह समयोचित वचन कहा--

Lalu Bhīṣma yang perkasa menggenggam lengan Yudhiṣṭhira yang lebar, dan dengan suara dalam laksana gemuruh awan yang sedang bangkit—fasih serta tepat waktu—ia mengucapkan kata-kata yang semestinya, menegakkan bingkai etika tentang apa yang harus dilakukan menurut dharma.

Verse 26

दिष्ट्या प्राप्तोड्सि कौन्तेय सहामात्यो युधिष्ठिर । परिवृत्तो हि भगवान्‌ सहस्रांशुर्दिवाकर:,“कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! सौभाग्यकी बात है कि तुम मन्त्रियोंसहित यहाँ आ गये। सहस्र किरणोंसे सुशोभित भगवान्‌ सूर्य अब दक्षिणायनसे उत्तरागणकी ओर लौट चुके हैं

Wahai Kaurteya Yudhiṣṭhira, sungguh beruntung engkau tiba di sini bersama para menteri. Sebab Sang Dewa Matahari, yang bersinar dengan seribu sinar, telah berbalik dari dakṣiṇāyana menuju uttarāyaṇa.

Verse 27

अष्टपज्चाश तं॑ रात्र्य: शयानस्याद्य मे गता: । शरेषु निशिताग्रेषु यथा वर्षशतं तथा,“इन तीखे अग्रभागवाले बाणोंकी शय्यापर शयन करते हुए आज मुझे अट्ठावन दिन हो गये; किंतु ये दिन मेरे लिये सौ वर्षोके समान बीते हैं

Hari ini telah berlalu lima puluh delapan malam bagiku, sementara aku terbaring di atas ranjang anak panah yang ujungnya setajam silet; namun hari-hari itu terasa bagai seratus tahun lamanya.

Verse 28

माघो<यं समनुप्राप्तो मास: सौम्यो युधिष्ठिर । त्रिभागशेष: पक्षोडयं शुक्लो भवितुमहति,'युधिष्ठिर! इस समय चान्द्रमासके अनुसार माघका महीना प्राप्त हुआ है। इसका यह शुक्लपक्ष चल रहा है, जिसका एक भाग बीत चुका है और तीन भाग बाकी है (शुक्लपक्षसे मासका आरम्भ माननेपर आज माघ शुक्ला अष्टमी प्रतीत होती है)”

Yudhiṣṭhira, menurut perhitungan bulan, kini telah tiba bulan Māgha yang lembut. Ini adalah paruh terang; satu bagiannya telah berlalu, dan tiga bagian masih tersisa.

Verse 29

एवमुकक्‍त्वा तु गाड़ेयो धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम्‌ । धृतराष्ट्रमथामन्त्रय काले वचनमत्रवीत्‌,धर्मपुत्र युधिष्ठिस्से ऐसा कहकर गंगानन्दन भीष्मने धृतराष्ट्रको पुकारकर उनसे यह समयोचित वचन कहा--

Setelah berkata demikian kepada Yudhiṣṭhira, putra Dharma, Bhīṣma—putra Sungai Gaṅgā—lalu memanggil Dhṛtarāṣṭra dan mengucapkan kata-kata yang tepat pada waktunya, sesuai dengan keadaan.

Verse 30

भीष्म उवाच राजन्‌ विदितधर्मोडसि सुनिर्णीतार्थसंशय: । बहुश्रुता हि ते विप्रा बहव: पर्युपासिता:,भीष्मजी बोले--राजन्‌! तुम धर्मको अच्छी तरह जानते हो। तुमने अर्थतत्त्वका भी भलीभाँति निर्णय कर लिया है। अब तुम्हारे मनमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है; क्योंकि तुमने अनेक शास्त्रोंका ज्ञान रखनेवाले बहुत-से दिद्वान्‌ ब्राह्मणोंकी सेवा की है--उनके सत्संगसे लाभ उठाया है

Bhishma berkata: “Wahai Raja, engkau telah mengenal dharma dengan baik dan telah menuntaskan keraguanmu tentang tujuan sejati kehidupan. Tiada lagi kebimbangan di benakmu, sebab engkau tekun melayani banyak Brahmana terpelajar—mereka yang luas pengetahuan kitab sucinya—dan engkau memperoleh manfaat dari pergaulan serta ajaran mereka.”

Verse 31

वेदशास्त्राणि सर्वाणि धर्माश्न मनुजेश्वर । वेदांश्न चतुर: सर्वान्‌ निखिलेनानुबुद्धयसे,मनुजेश्वर! तुम चारों वेदों, सम्पूर्ण शास्त्रों और धर्मोका रहस्य पूर्णरूपसे जानते और समझते हो

Bhishma berkata: “Wahai penguasa manusia, engkau telah memahami sepenuhnya keempat Veda, seluruh pustaka śāstra suci, dan juga hakikat dharma secara utuh.”

Verse 32

न शोचितव्यं कौरव्य भवितव्यं हि तत्‌ तथा । श्रुत॑ देवरहस्यं ते कृष्णद्वैघधायनादपि,कुरुनन्दन! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। जो कुछ हुआ है, वह अवश्यम्भावी था। तुमने श्रीकृष्ण-द्वैणायन व्यासजीसे देवताओंका रहस्य भी सुन लिया है (उसीके अनुसार महाभारतयुद्धकी सारी घटनाएँ हुई हैं)

Bhishma berkata: “Wahai keturunan Kuru, janganlah berduka. Apa yang terjadi memang harus terjadi demikian. Engkau pun telah mendengar dari Krishna Dwaipayana Vyasa rahasia kehendak para dewa—dan menurut ketetapan itulah seluruh jalannya perang Mahabharata berlangsung.”

Verse 33

यथा पाण्डो: सुता राज॑स्तथैव तव धर्मत: । तान्‌ पालय स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रतान्‌,ये पाण्डव जैसे राजा पाण्डुके पुत्र हैं, वैसे ही धर्मकी दृष्टिसे तुम्हारे भी हैं। ये सदा गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहते हैं। तुम धर्ममें स्थित रहकर अपने पुत्रोंके समान ही इनका पालन करना

Bhishma berkata: “Wahai Raja, sebagaimana mereka adalah putra-putra Pandu, demikian pula—menurut ukuran dharma—mereka adalah milikmu juga. Mereka senantiasa tekun melayani para guru dan para sesepuh; maka, teguhlah dalam kebenaran dan lindungilah serta peliharalah mereka seperti engkau memelihara putra-putramu sendiri.”

Verse 34

धर्मराजो हि शुद्धात्मा निदेशे स्थास्यते तव । आनृशंस्यपरं होनं जानामि गुरुवत्सलम्‌,धर्मराज युधिष्ठिरका हृदय बहुत ही शुद्ध है। ये सदा तुम्हारी आज्ञाके अधीन रहेंगे। मैं जानता हूँ, इनका स्वभाव बहुत ही कोमल है और ये गुरुजनोंके प्रति बड़ी भक्ति रखते हैं

Bhishma berkata: “Dharmaraja Yudhishthira berhati suci; ia akan tetap patuh pada titahmu. Aku mengenalnya: ia menempatkan welas asih di atas segalanya, bebas dari kekejaman, dan sangat berbakti kepada para guru serta para sesepuh.”

Verse 35

तव पुत्रा दुरात्मान: क्रोधलो भपरायणा: । ईर्ष्याभि भूता दुर्वत्तास्तानू न शोचितुमहसि,तुम्हारे पुत्र बड़े दुरात्मा, क्रोधी, लोभी, ईष्यके वशीभूत तथा दुराचारी थे। अतः उनके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये

Putra-putramu berwatak jahat—tunduk pada amarah dan ketamakan, dikuasai iri hati, serta berperilaku bejat; karena itu engkau tidak patut berduka atas mereka.

Verse 36

वैशम्पायन उवाच एतावदुक्त्वा वचन धृतराष्ट्र मनीषिणम्‌ । वासुदेव॑ महाबाहुम भ्यभाषत कौरव:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! मनीषी धृतराष्ट्रसे ऐसा वचन कहकर कुरुवंशी भीष्मने महाबाहु भगवान्‌ श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा

Vaiśampāyana berkata: Setelah mengucapkan kata-kata itu kepada Dhṛtarāṣṭra yang bijaksana, sesepuh Kuru lalu berbicara kepada Vāsudeva (Śrī Kṛṣṇa) yang berlengan perkasa, demikianlah—

Verse 37

भीष्म उवाच भगवन्‌ देवदेवेश सुरासुरनमस्कृत । त्रिविक्रम नमस्तुभ्यं शड्खचक्रगदाधर,भीष्मजी बोले--भगवन! देवदेवेश्वर! देवता और असुर सभी आपके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं। अपने तीन पगोंसे त्रिलोकीको नापनेवाले तथा शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले नारायणदेव! आपको नमस्कार है

Bhīṣma berkata: “Wahai Bhagavān, Penguasa para dewa, yang disembah para dewa dan asura; wahai Trivikrama, pemegang sangkha, cakra, dan gada—hormatku kepadamu, Nārāyaṇa.”

Verse 38

वासुदेवो हिरण्यात्मा पुरुष: सविता विराट । जीवभूतो<नुरूपस्त्वं परमात्मा सनातन:,आप वासुदेव, हिरण्यात्मा, पुरुष, सविता, विराट, अनुरूप, जीवात्मा और सनातन परमात्मा हैं

Engkau adalah Vāsudeva—berjiwa keemasan; Sang Puruṣa; Savitṛ, sang pemberi hidup; dan Virāṭ, wujud semesta. Engkau hadir sebagai prinsip hidup dalam diri makhluk sesuai kodratnya, dan Engkau pula Ātman Tertinggi yang kekal.

Verse 39

त्रायस्व पुण्डरीकाक्ष पुरुषोत्तम नित्यश: । अनुजानीहि मां कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम,कमलनयन श्रीकृष्ण! पुरुषोत्तम! वैकुण्ठ! आप सदा मेरा उद्धार करें। अब मुझे जानेकी आज्ञा दें

Wahai Puṇḍarīkākṣa, Puruṣottama, Vaikuṇṭha—lindungilah dan selamatkanlah aku senantiasa. Wahai Kṛṣṇa, Puruṣottama—anugerahkanlah izin bagiku untuk berangkat.

Verse 40

रक्ष्याश्न ते पाण्डवेया भवान्‌ येषां परायणम्‌ | उक्तवानस्मि दुर्बुद्धिं मन्‍्द दुर्योधनं तदा

Bhīṣma berkata: “Engkau patut dilindungi oleh para pangeran Pāṇḍava, sebab bagi merekalah engkau menjadi tumpuan perlindungan tertinggi. Pada waktu itu aku telah menasihati dan memperingatkan Duryodhana yang tumpul budi.”

Verse 41

“यत: कृष्णस्ततो धर्मो” यतो धर्मस्ततो जय: । वासुदेवेन तीर्थेन पुत्र संशाम्य पाण्डवै:

Bhīṣma berkata: “Di mana Kṛṣṇa berdiri, di sanalah Dharma; dan di mana Dharma berdiri, di sanalah kemenangan.” Maka, wahai putra, berlindunglah pada kehadiran suci Vāsudeva dan damaikanlah para Pāṇḍava—padamkan permusuhan dan tempuh rekonsiliasi selaras dengan kebenaran.

Verse 42

संधानस्य पर: कालस्तवेति च पुन: पुनः । न च मे तद्‌ वचो मूढ: कृतवान्‌ स सुमन्दधी: । घातयित्वेह पृथिवीं ततः स निधनं गत:

Bhīṣma berkata: “Berkali-kali aku berkata kepadanya, ‘Inilah saat terbaik bagimu untuk berdamai.’ Namun orang yang tersesat itu, yang sangat dangkal budinya, tidak menjalankan nasihatku. Setelah menumpahkan pembantaian di muka bumi, akhirnya ia sendiri menuju kebinasaan.”

Verse 43

प्रभो! आप ही जिनके परम आश्रय हैं, उन पाण्डवोंकी सदा आपको रक्षा करनी चाहिये। मैंने दुर्बुद्धि एवं मन्द दुर्योधनसे कहा था कि “जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है, उसी पक्षकी जय होगी; इसलिये बेटा दुर्योधन! तुम भगवान्‌ श्रीकृष्णकी सहायतासे पाण्डवोंके साथ सन्धि कर लो। यह सन्धिके लिये बहुत उत्तम अवसर आया है।' इस प्रकार बार-बार कहनेपर भी उस मन्दबुद्धि मूढने मेरी वह बात नहीं मानी और सारी पृथ्वीके वीरोंका नाश कराकर अन्तमें वह स्वयं भी कालके गालमें चला गया || ४० --४२ || त्वां तु जानाम्यहं देवं पुराणमृषिसत्तमम्‌ । नरेण सहित देव बदर्या सुचिरोषितम्‌,देव! मैं आपको जानता हूँ। आप वे ही पुरातन ऋषि नारायण हैं, जो नरके साथ चिरकालतक बदरिकाश्रममें निवास करते रहे हैं

Bhīṣma berkata: “Wahai Prabhu! Para Pāṇḍava—yang bagimu Engkau adalah perlindungan tertinggi—merekalah yang seharusnya senantiasa menjaga dan melindungimu. Aku telah berkata kepada Duryodhana yang tumpul budi: ‘Di mana Śrī Kṛṣṇa berada, di sanalah Dharma; dan di mana Dharma berada, di sanalah kemenangan berpihak. Maka, wahai anak Duryodhana, berdamailah dengan para Pāṇḍava dengan pertolongan Bhagavān Śrī Kṛṣṇa; inilah saat yang paling baik untuk perjanjian damai.’ Namun, meski berulang kali kukatakan, si dungu itu tidak mengindahkan; ia membinasakan para kesatria di muka bumi, dan akhirnya ia sendiri jatuh ke dalam kebinasaan. Adapun Engkau, wahai Dewa, aku mengenal-Mu: Engkau adalah Nārāyaṇa purba, yang termulia di antara para ṛṣi, yang bersama Nara berdiam lama di Badarī (Badarikāśrama).”

Verse 44

तथा मे नारद: प्राह व्यासश्व॒ सुमहातपा: । नरनारायणावेतौ सम्भूतौ मनुजेष्विति,देवर्षि नारद तथा महातपस्वी व्यासजीने भी मुझसे कहा था कि ये श्रीकृष्ण और अर्जुन साक्षात्‌ भगवान्‌ नारायण और नर हैं, जो मानव-शरीरमें अवतीर्ण हुए हैं

Bhīṣma berkata: “Demikian pula Devarṣi Nārada pernah berkata kepadaku, dan Vyāsa sang pertapa agung juga: ‘Keduanya ini—Kṛṣṇa dan Arjuna—sesungguhnya adalah Nārāyaṇa dan Nara, yang terlahir di tengah manusia.’”

Verse 45

स मां त्वमनुजानीहि कृष्ण मोक्ष्ये कलेवरम्‌ | त्वयाहं समनुज्ञातो गच्छेयं परमां गतिम्‌,श्रीकृष्ण! अब आप आज्ञा दीजिये, मैं इस शरीरका परित्याग करूँगा। आपकी आज्ञा मिलनेपर मुझे परम गतिकी प्राप्ति होगी

Bhishma berkata: “Wahai Krishna, berilah aku izin. Kini aku akan melepaskan raga ini. Dengan restumu, aku akan berangkat menuju keadaan tertinggi.”

Verse 46

वासुदेव उवाच अनुजानामि भीष्म त्वां वसून्‌ प्राप्तुहि पार्थिव । न ते$स्ति वृजिनं किंचिदिहलोके महाद्युते,भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा--पृथ्वीपालक महातेजस्वी भीष्मजी! मैं आपको (सहर्ष) आज्ञा देता हूँ। आप वसुलोकको जाइये। इस लोकमें आपके द्वारा अणुमात्र भी पाप नहीं हुआ है

Vasudeva bersabda: “Wahai Bhishma, wahai raja yang bercahaya agung, aku mengizinkanmu—pergilah menuju alam para Vasu. Wahai yang bersinar mulia, di dunia ini tak ada sedikit pun noda kesalahan padamu.”

Verse 47

पितृभक्तो5सि राजर्षे मार्कण्डेय इवापर: । तेन मृत्युस्तव वशे स्थितो भृत्य इवानतः,राजर्ष! आप दूसरे मार्कण्डेयके समान पितृभक्त हैं; इसलिये मृत्यु विनीत दासीके समान आपके वशमें हो गयी है

Vasudeva bersabda: “Wahai resi-raja, engkau berbakti kepada para Pitri laksana Mārkaṇḍeya yang lain. Karena itu, Maut pun berdiri di bawah kuasamu, tunduk seperti seorang pelayan.”

Verse 48

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु गाड़ेय: पाण्डवानिदमब्रवीत्‌ | धृतराष्ट्रमुखां श्वापि सर्वाश्व सुहृदस्तथा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भगवान्‌के ऐसा कहनेपर गंगानन्दन भीष्मने पाण्डवों तथा धृतराष्ट्र आदि सभी सुहृदोंसे कहा--

Vaiśampāyana berkata: Setelah demikian disapa, Bhishma putra Gangga pun berkata kepada para Pāṇḍava, dan juga kepada semua sahabat-penyokong mereka, dengan Dhṛtarāṣṭra sebagai yang terdepan.

Verse 49

प्राणानुत्स्रष्टमिच्छामि तत्रानुज्ञातुमर्ह थ । सत्येषु यतितव्यं व: सत्यं हि परमं बलम्‌,“अब मैं प्राणोंका परित्याग करना चाहता हूँ। तुम सब लोग इसके लिये मुझे आज्ञा दो। तुम्हें सदा सत्य धर्मके पालनका प्रयत्न करते रहना चाहिये; क्योंकि सत्य ही सबसे बड़ा बल है

Kini aku hendak melepaskan nyawa; maka berilah aku izin untuk itu. Hendaklah kalian senantiasa berusaha menegakkan dharma kebenaran, sebab kebenaranlah kekuatan tertinggi.

Verse 50

आनुृशंस्यपरैर्भाव्यं सदैव नियतात्मभि: । ब्रह्मण्यैर्धर्मशीलैश्व तपोनित्यैश्ष भारता:,“भरतवंशियो! तुमलोगोंको सबके साथ कोमलताका बर्ताव करना, सदा अपने मन और इन्द्रियोंको अपने वशमें रखना तथा ब्राह्मणभक्त, धर्मनिष्ठ एवं तपस्वी होना चाहिये”

Wahai keturunan Bharata! Mereka yang mampu mengendalikan diri hendaknya senantiasa berperilaku penuh welas asih dan lemah lembut kepada semua; menundukkan pikiran serta indria; berbakti kepada para Brāhmaṇa, teguh dalam dharma, dan tekun dalam tapa.

Verse 51

इत्युक्त्वा सुह्ृद: सर्वान्‌ सम्परिष्वज्य चैव ह । पुनरेवाब्रवीद्‌ धीमान्‌ युधिष्ठिरमिदं वच:,ऐसा कहकर बुद्धिमान्‌ भीष्मजीने अपने सब सुहृदोंको गले लगाया और युधिष्छिरसे पुनः इस प्रकार कहा--'युधिष्ठिर! तुम्हें सामान्यतः सभी ब्राह्मणोंकी विशेषतः विद्वानोंकी और आचार्य तथा ऋत्विजोंकी सदा ही पूजा करनी चाहिये”

Setelah berkata demikian, Bhīṣma yang bijaksana memeluk semua sahabat dan para simpatisannya; lalu ia kembali berbicara kepada Yudhiṣṭhira dengan kata-kata ini.

Verse 52

ब्राह्मणाश्रैव ते नित्यं प्राज्ञाश्रैव विशेषत: | आचार्या ऋत्विजश्वचैव पूजनीया जनाधिप,ऐसा कहकर बुद्धिमान्‌ भीष्मजीने अपने सब सुहृदोंको गले लगाया और युधिष्छिरसे पुनः इस प्रकार कहा--'युधिष्ठिर! तुम्हें सामान्यतः सभी ब्राह्मणोंकी विशेषतः विद्वानोंकी और आचार्य तथा ऋत्विजोंकी सदा ही पूजा करनी चाहिये”

Wahai penguasa manusia! Engkau hendaknya senantiasa menghormati para Brāhmaṇa—terutama yang bijaksana. Demikian pula para ācārya (guru) dan ṛtvij (imam upacara) patut selalu dimuliakan.

Verse 167

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि भीष्मस्वर्गारोहणपर्वणि दानधर्मे सप्तषष्ट्यधिकशततमो<ध्याय:

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Anuśāsana Parva—di bagian Bhīṣma-svargārohaṇa—berakhirlah bab ke-167, yang termasuk uraian tentang dharma kedermawanan (dāna).