
Viṣṇu-sahasranāma—Yudhiṣṭhira’s Inquiry and Bhīṣma’s Recitation (विष्णोर्नामसहस्रम्)
Upa-parva: Viṣṇu-sahasranāma Upākhyāna (Stotra-Prakaraṇa) within Anuśāsana-parva
Vaiśaṃpāyana reports that, after hearing extensive dharma-instructions, Yudhiṣṭhira again questions Bhīṣma for a singular theological and practical solution: (i) the one deity in the world, (ii) the one supreme refuge, (iii) the object of praise and worship by which humans attain auspiciousness, (iv) the highest dharma among all dharmas, and (v) the recitative practice by which beings are released from the bondage of birth and worldly continuity. Bhīṣma answers by elevating Viṣṇu/Nārāyaṇa—described as anādi-nidhana (without beginning or end), jagat-prabhu (lord of the world), and sarva-loka-maheśvara (sovereign over all realms)—and introduces the Viṣṇu-sahasranāma as a continuous discipline of praise, worship, meditation, and salutation. The chapter then presents the sahasranāma catalogue of epithets, followed by explicit phalaśruti: claims of protection from inauspiciousness, social and personal flourishing, relief from fear and affliction, and orientation toward brahman/sanātana. The close reiterates cosmological dependence on Vāsudeva and frames the stotra as Vyāsa’s composition for śreyas and sukha.
Chapter Arc: भीष्म धर्मराज से कहते हैं कि ऋषिगण, पितर और देवता एकत्र होकर अरुन्धती से ‘धर्म-रहस्य’ सुनना चाहते हैं—गुह्यतम सत्य को प्रकट करने का आग्रह उठता है। → वसिष्ठ-पत्नी अरुन्धती तपोवृद्धि और देव-आह्वान का स्मरण कर शाश्वत धर्मों का वचन देती हैं; फिर चित्रगुप्त द्वारा कर्म-लेखा और दानधर्म के ‘पृथक्-पृथक् फल’ का विधान सामने आता है—कौन-सा दान किस पाप/दुःख को काटता है, यह सूक्ष्म प्रश्न तीखा होता जाता है। → चित्रगुप्त का निर्णायक मत: इस लोक में दिया हुआ दान नष्ट नहीं होता; और विशेषतः ‘कपिला गौ’ का दान ब्रह्महत्या-सदृश पापों तक को शुद्ध करने में समर्थ बताया जाता है—यह सुनकर सूर्यदेव तक रोमांचित हो उठते हैं, मानो दान की महिमा पर देव-समाज की मुहर लग जाती है। → अग्निहोत्र के पालन और उपानह (जूता), छत्र, कपिला गौ आदि के यथोचित दान का विधान, तथा पुष्कर-तीर्थ/ज्येष्ठ-पुष्कर जैसे पुण्य-क्षेत्रों का संकेत देकर अध्याय दानधर्म के व्यावहारिक मार्गदर्शन पर टिकता है।
Verse 1
2 अं ड-ऑ का त्रिशर्दाधिकशततमो<्ध्याय: अरुन्धती, धर्मराज और चित्रगुप्तद्वारा धर्मसम्बन्धी रहस्यका वर्णन भीष्म उवाच ततस्त्वृषिगणा: सर्वे पितरश्न॒ सदेवता: । अरुन्धतीं तपोवृद्धामपृच्छन्त समाहिता:,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! तदनन्तर सभी ऋषियों, पितरों और देवताओंने तपस्यामें बढ़ी-चढ़ी हुई अरुन्धती देवीसे, जो शील और शक्तिमें महात्मा वसिष्ठजीके ही समान थीं, एकाग्रचित्त होकर पूछा--“भद्रे! हम आपके मुँहसे धर्मका रहस्य सुनना चाहते है। आपकी दृष्टिमें जो गुह्मतम धर्म हो, उसे बतानेकी कृपा करें”
Bhishma berkata: Kemudian semua rombongan resi, bersama para Pitṛ dan para dewa, mendatangi Arundhatī yang telah menjadi agung karena tapa; dengan batin yang hening mereka mengajukan pertanyaan, ingin mendengar dari mulutnya rahasia terdalam tentang dharma.
Verse 2
समानशीलां वीर्येण वसिष्ठस्थ महात्मन: । त्वत्तों धर्मरहस्यानि श्रोतुमिच्छामहे वयम् । यत्ते गुहमतमं भद्ठे तत् प्रभाषितुमरहसि,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! तदनन्तर सभी ऋषियों, पितरों और देवताओंने तपस्यामें बढ़ी-चढ़ी हुई अरुन्धती देवीसे, जो शील और शक्तिमें महात्मा वसिष्ठजीके ही समान थीं, एकाग्रचित्त होकर पूछा--“भद्रे! हम आपके मुँहसे धर्मका रहस्य सुनना चाहते है। आपकी दृष्टिमें जो गुह्मतम धर्म हो, उसे बतानेकी कृपा करें”
Bhishma berkata: “Wahai wanita mulia, dalam laku dan daya rohani engkau setara dengan Maharsi Vasiṣṭha. Dari engkau kami ingin mendengar rahasia-rahasia dharma. Apa pun yang engkau pandang sebagai dharma yang paling tersembunyi dan paling mendalam—mohon nyatakanlah.”
Verse 3
अरुन्धत्युवाच तपोवृद्धिर्मया प्राप्ता भवतां स्मरणेन वै । भवतां च प्रसादेन धर्मान् वक्ष्यामि शाश्वतान्,अरुन्धती बोली--देवगण! आपलोगोंने मुझे स्मरण किया, इससे मेरे तपकी वृद्धि हुई है। अब मैं आप ही लोगोंकी कृपासे गोपनीय रहस्योंसहित सनातन धर्मोंका वर्णन करती हूँ, आपलोग वह सब सुनें। जिसका मन शुद्ध हो, उस श्रद्धालु पुरुषको ही इन धर्मोंका उपदेश करना चाहिये
Arundhatī berkata: “Karena kalian mengingatku, kekuatan tapaku bertambah. Dan berkat kemurahan kalian, kini akan kuuraikan dharma yang kekal, beserta makna-makna batinnya yang terjaga. Dengarkanlah. Ajaran ini hendaknya diberikan hanya kepada orang beriman yang batinnya telah disucikan.”
Verse 4
सगुह्यान् सरहस्यांश्न॒ तान् शृणुध्वमशेषत: । श्रद्दधाने प्रयोक्तव्या यस्य शुद्धं तथा मन:,अरुन्धती बोली--देवगण! आपलोगोंने मुझे स्मरण किया, इससे मेरे तपकी वृद्धि हुई है। अब मैं आप ही लोगोंकी कृपासे गोपनीय रहस्योंसहित सनातन धर्मोंका वर्णन करती हूँ, आपलोग वह सब सुनें। जिसका मन शुद्ध हो, उस श्रद्धालु पुरुषको ही इन धर्मोंका उपदेश करना चाहिये
Bhishma berkata: “Dengarkanlah sepenuhnya ajaran ini, yang memuat hal-hal yang rahasia dan sangat esoteris. Ajaran ini hanya patut disampaikan kepada orang yang beriman dan berhati suci.”
Verse 5
अश्रद्दधानो मानी च ब्रह्महा गुरुतल्पग: । असम्भाष्या हि चत्वारो नैषां धर्म: प्रकाशयेत्,जो श्रद्धासे रहित, अभिमानी, ब्रह्महत्यारे और गुरुस्त्रीगामी हैं, इन चार प्रकारके मनुष्योंस बात भी नहीं करनी चाहिये। इनके सामने धर्मके रहस्यको प्रकाशित न करे
Bhishma berkata: Orang yang tanpa iman, yang congkak, pembunuh brāhmaṇa, dan pelanggar ranjang guru (yakni berzina dengan istri guru)—empat golongan ini bahkan tidak layak diajak bicara. Di hadapan mereka, janganlah menyingkapkan rahasia dan hakikat dharma.
Verse 6
अहन्यहनि यो दद्यात् कपिलां द्वादशी: समा: । मासि मासि च सत्रेण यो यजेत सदा नर:,जो मनुष्य बारह वर्षोतक प्रतिदिन एक-एक कपिला गौका दान करता है, हर महीनेमें निरन्तर सत्रयाग चलाता और ज्येष्ठपुष्कर तीर्थमें जाकर एक लाख गोदान करता है, उसके धर्मका फल उस मनुष्यके बराबर नहीं हो सकता, जिसके द्वारा की हुई सेवासे अतिथि संतुष्ट हो जाता है
Bhishma berkata: Sekalipun seseorang selama dua belas tahun penuh setiap hari menyedekahkan seekor sapi kapilā, dan bulan demi bulan terus-menerus menyelenggarakan satra-yajña, tetap saja pahala kebajikan itu tidak sebanding dengan pahala orang yang melalui pelayanannya membuat tamu sungguh puas.
Verse 7
गवां शतसहसंत्रं च यो दद्याज्ज्येष्ठपुष्करे । न तद्धर्मफलं तुल्यमतिथिर्यस्य तुष्यति,जो मनुष्य बारह वर्षोतक प्रतिदिन एक-एक कपिला गौका दान करता है, हर महीनेमें निरन्तर सत्रयाग चलाता और ज्येष्ठपुष्कर तीर्थमें जाकर एक लाख गोदान करता है, उसके धर्मका फल उस मनुष्यके बराबर नहीं हो सकता, जिसके द्वारा की हुई सेवासे अतिथि संतुष्ट हो जाता है
Bhishma berkata: Sekalipun seseorang menghadiahkan seratus ribu ekor sapi di Jyeṣṭha-Puṣkara, pahala dharmanya tidak setara dengan pahala orang yang membuat tamunya sungguh puas melalui pelayanan yang diberikannya.
Verse 8
श्रूयतां चापरो धर्मो मनुष्याणां सुखावह: । श्रद्दधानेन कर्तव्य: सरहस्यो महाफल:,अब मनुष्योंके लिये सुखदायक तथा महान् फल देनेवाले दूसरे धर्मका रहस्यसहित वर्णन सुनो। श्रद्धापूर्वक इसका पालन करना चाहिये
Bhishma berkata: “Sekarang dengarkanlah satu dharma lain yang membawa kebahagiaan bagi manusia. Ia harus dijalankan dengan iman; ajaran ini disampaikan beserta rahasianya dan menghasilkan buah yang agung.”
Verse 9
कल्यमुत्थाय गोमध्ये गृह दर्भान् सहोदकान् । निषिज्चेत गवां शुद्ध मस्तकेन च तज्जलम्
Pada pagi hari, bangunlah lalu pergi ke tengah-tengah sapi; bawalah rumput kuśa (darbha) beserta air, dan percikkan air itu pada sapi-sapi. Setelah menjadi suci, percikkan pula air yang sama ke atas kepala sendiri.
Verse 10
श्रूयन्ते यानि तीर्थानि त्रिषु लोकेषु कानिचित्,तीनों लोकोंमें सिद्ध, चारण और महर्षियोंसे सेवित जो कोई भी तीर्थ सुने जाते हैं, उन सबमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है वही गायोंके सींगके जलसे अपने मस्तकको सींचनेसे प्राप्त होता है
Segala tīrtha yang termasyhur di tiga alam—yang dihormati dan didatangi para Siddha, Cāraṇa, serta mahārṣi—pahala yang diperoleh seseorang dengan mandi di semuanya itu, sama pula diperoleh dengan memercikkan ke kepala air yang telah menyentuh tanduk sapi.
Verse 11
सिद्धचारणजुष्टानि सेवितानि महर्षिभि: । अभिषेक: समस्तेषां गवां शूड्रोदकस्य च,तीनों लोकोंमें सिद्ध, चारण और महर्षियोंसे सेवित जो कोई भी तीर्थ सुने जाते हैं, उन सबमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है वही गायोंके सींगके जलसे अपने मस्तकको सींचनेसे प्राप्त होता है
Tīrtha-tīrtha yang didatangi para Siddha dan Cāraṇa serta dilayani para mahārṣi—semuanya di tiga alam—pahala mandi di seluruhnya itu diperoleh dengan memercikkan ke kepala air yang membasuh tanduk sapi.
Verse 12
साधु साध्विति चोद्दिष्टं देवतै: पितृभिस्तथा । भूतैश्नेव सुसंहृष्टे: पूजिता साप्यरुन्धती,यह सुनकर देवता, पितर और समस्त प्राणी बहुत प्रसन्न हुए। उन सबने उन्हें साधुवाद दिया और अरुन्धती देवीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की
Mendengar hal itu, para dewa, para leluhur, dan segenap makhluk diliputi sukacita. Mereka berseru, “Sādhu! Sādhu!” seraya memuliakan; dan Arundhatī pun dihormati serta dipuji dengan berlimpah.
Verse 13
पितामह उवाच अहो धर्मों महाभागे सरहस्य उदाहृत: । वरं ददामि ते धन्ये तपस्ते वर्धतां सदा,ब्रह्माजीने कहा--महाभागे! तुम धन्य हो, तुमने रहस्यसहित अद्भुत धर्मका वर्णन किया है। मैं तुम्हें वरदान देता हूँ, तुम्हारी तपस्या सदा बढ़ती रहे
Pitāmaha bersabda: “Ah, wahai wanita mulia, engkau telah menguraikan Dharma dengan menakjubkan, beserta rahasianya yang halus. Wahai yang diberkahi, kuanugerahkan kepadamu sebuah karunia—semoga tapa-bratamu senantiasa bertambah.”
Verse 14
यम उवाच रमणीया कथा दिव्या युष्मत्तो या मया श्रुता । श्रूयतां चित्रगुप्तस्य भाषितं मम च प्रियम्
Yama berkata: “Wahai para dewa dan maharesi! Kisah indah dan ilahi yang telah kudengar dari kalian sungguh patut dipuji. Kini dengarkanlah ujaran Citragupta—kata-kata yang juga kusayangi.”
Verse 15
यमराजने कहा--देवताओ और महर्षियो! मैंने आपलोगोंके मुखसे दिव्य एवं मनोरम कथा सुनी है, अब आपलोग चित्रगुप्तका तथा मेरा भी प्रिय भाषण सुनिये ।। रहस्यं धर्मसंयुक्तं शक््यं श्रोतुं महर्षिभि: । श्रद्दधानेन मर्त्येन आत्मनो हितमिच्छता,इस धर्मयुक्त रहस्यको महर्षि भी सुन सकते हैं। अपना हित चाहनेवाले श्रद्धालु मनुष्यको भी इसे श्रवण करना चाहिये
Yama berkata: “Wahai para dewa dan maharesi! Dari mulut kalian sendiri aku telah mendengar kisah yang ilahi dan menawan. Kini dengarkanlah wejangan yang dicintai baik oleh Citragupta maupun olehku. Ini adalah ajaran rahasia yang berpadu dengan dharma—layak didengar para resi agung; dan hendaknya juga didengar oleh manusia beriman yang menghendaki kesejahteraan sejatinya.”
Verse 16
न हि पुण्यं तथा पापं कृतं किंचिद् विनश्यति । पर्वकाले च यत् किंचिदादित्यं चाधितिष्ठति
Yama berkata: “Sesungguhnya, tiada kebajikan maupun dosa yang telah diperbuat akan lenyap. Dan apa pun yang dilakukan pada waktu parwa yang suci—di bawah naungan Aditya—akan menempati tempatnya dalam tatanan dharma dan memberi buah yang semestinya.”
Verse 17
मनुष्यका किया हुआ कोई भी पुण्य तथा पाप भोगके बिना नष्ट नहीं होता। पर्वकालमें जो कुछ भी दान किया जाता है, वह सब सूर्यदेवके पास पहुँचता है ।। प्रेतलोक॑ गते मत्यें तत् तत् सर्व विभावसु: । प्रतिजानाति पुण्यात्मा तच्च तत्रोपयुज्यते
Yama berkata: “Tiada kebajikan maupun dosa yang dilakukan manusia akan lenyap tanpa dialami buahnya. Segala dana yang diberikan pada waktu parwa yang suci sampai kepada Dewa Surya. Ketika seorang insan berangkat ke alam para arwah, Vibhavasu—Surya—mengakui dan menyerahkannya di sana; dan jiwa yang saleh menikmati persembahan itu di alam seberang.”
Verse 18
जब मनुष्य प्रेतलोकको जाता है, उस समय सूर्यदेव वे सारी वस्तुएँ उसे अर्पित कर देते हैं और पुण्यात्मा पुरुष परलोकमें उन वस्तुओंका उपभोग करता है ।। किंचिद् धर्म प्रवक्ष्यामि चित्रगुप्तमतं शुभम् । पानीयं चैव दीपं च दातव्यं सततं तथा,अब मैं चित्रगुप्तके मतके अनुसार कुछ कल्याण-कारी धर्मका वर्णन करता हूँ। मनुष्यको जलदान और दीपदान सदा ही करने चाहिये
Yama berkata: “Ketika seseorang pergi ke alam para arwah, Dewa Surya mempersembahkan kepadanya semua pemberian itu, dan jiwa yang saleh menikmatinya di alam seberang menurut ketentuan. Kini akan kusampaikan sebagian dharma yang membawa berkah, sesuai ajaran Citragupta: hendaknya senantiasa memberi dana air minum, dan demikian pula dana pelita (cahaya).”
Verse 19
उपानहौ च छत्रं च कपिला च यथातथम् । पुष्करे कपिला देया ब्राह्मणे वेदपारगे
Yama bersabda: “Hendaknya seseorang mendanakan alas kaki dan payung, serta seekor sapi kapilā (berwarna keemasan-kecokelatan) sebagaimana patut. Di Puṣkara, sapi kapilā harus dihadiahkan kepada seorang Brāhmaṇa yang telah menguasai Weda.”
Verse 20
अयं चैवापरो धर्मश्नित्रगुप्तेन भाषित:
Yama bersabda: “Dan ini pun adalah satu lagi ketentuan dharma, sebagaimana dinyatakan oleh Śnitragupta.”
Verse 21
फलमस्य पृथक््त्वेन श्रोतुमर्हन्ति सत्तमा: । प्रलयं सर्वभूतैस्तु गन्तव्यं कालपर्ययात्
Wahai insan utama, kalian layak mendengar hasilnya yang berbeda-beda. Namun, karena pergiliran Kala, semua makhluk niscaya menuju pralaya (peleburan).
Verse 22
इसके सिवा यह एक दूसरा धर्म भी चित्रगुप्तने बताया है। उसके पृथक्ू-पृथक् फलका वर्णन सभी साधु पुरुष सुनें। समस्त प्राणी कालक्रमसे प्रलयको प्राप्त होते हैं ।। तत्र दुर्गमनुप्राप्ता: क्षुत्तृष्णारिपीडिता: । दहामाना विपच्यन्ते न तत्रास्ति पलायनम्
Di sana, setelah mencapai wilayah yang sukar dilalui, makhluk-makhluk disiksa oleh musuh berupa lapar dan dahaga. Terbakar, mereka seakan ‘dimasak’ oleh derita; dari tempat itu tiada pelarian.
Verse 23
पापोंके कारण दुर्गम नरकमें पड़े हुए प्राणी भूख-प्याससे पीड़ित हो अतामें जलते हुए पकाये जाते हैं। वहाँ उस यातनासे निकल भागनेका कोई उपाय नहीं है ।। अन्थकाररं तमो घोरें प्रविशन्त्यल्पबुद्धय: । तत्र धर्म प्रवक्ष्यामि येन दुर्गाणि संतरेत्,मन्दबुद्धि मनुष्य ही नरकके घोर दुःखमय अन्धकारमें प्रवेश करते हैं। उस अवसरके लिये मैं धर्मका उपदेश करता हूँ, जिससे मनुष्य दुर्गम नरकसे पार हो सकता है
Mereka yang berakal kecil memasuki kegelapan yang mengerikan—kelam pekat. Karena itu aku nyatakan dharma, yang dengannya seseorang dapat menyeberangi keadaan-keadaan yang sukar dilalui.
Verse 24
अल्पव्ययं महार्थ च प्रेत्य चैव सुखोदयम् । पानीयस्य गुणा दिव्या: प्रेतलोके विशेषत:,उस धर्ममें व्यय बहुत थोड़ा है, परंतु लाभ महान् है। उससे मृत्युके पश्चात् भी उत्तम सुखकी प्राप्ति होती है। जलके गुण दिव्य हैं। प्रेतलोकमें ये गुण विशेषरूपसे लक्षित होते हैं
Yama bersabda: “Dharma ini menuntut pengorbanan yang kecil, namun berbuah manfaat besar; bahkan setelah kematian pun darinya terbit kebahagiaan sejati. Sifat-sifat air bersifat ilahi, dan di alam para arwah sifat itu tampak dengan sangat nyata.”
Verse 25
तत्र पुण्योदका नाम नदी तेषां विधीयते । अक्षयं सलिलं तत्र शीतलं हामृतोपमम्
Di sana, bagi mereka ditetapkan sebuah sungai bernama Puṇyodakā. Airnya tak pernah habis—sejuk, suci, dan laksana nektar.
Verse 26
वहाँ पुण्योदका नामसे प्रसिद्ध नदी है, जो यमलोकनिवासियोंके लिये विहित है। उसमें अमृतके समान मधुर, शीतल एवं अक्षय जल भरा रहता है ।। स तत्र तोयं पिबति पानीयं य: प्रयच्छति । प्रदीपस्य प्रदानेन श्रूयतां गुणविस्तर:,जो यहाँ जलदान करता है, वही परलोकमें जानेपर उस नदीका जल पीता है। अब दीपदानसे जो अधिकाधिक लाभ होता है, उसको सुनो
Yama bersabda: Di sana ada sungai termasyhur bernama Puṇyodakā, yang ditetapkan bagi para penghuni alam Yama. Sungai itu penuh air laksana nektar—manis, sejuk, dan tak pernah habis. Siapa yang di dunia ini menganugerahkan air minum, dialah yang di alam seberang akan meminum air sungai itu. Sekarang dengarkan uraian luas tentang kebajikan yang lahir dari persembahan pelita (dīpa-dāna).
Verse 27
तमो<न्धकारं नियतं दीपदो न प्रपश्यति । प्रभां चास्य प्रयच्छन्ति सोमभास्करपावका:,दीपदान करनेवाला मनुष्य नरकके नियत अन्धकारका दर्शन नहीं करता। उसे चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि प्रकाश देते रहते हैं
Yama bersabda: Orang yang mempersembahkan pelita tidak akan menyaksikan kegelapan neraka yang telah ditetapkan. Bulan, Matahari, dan Api senantiasa menganugerahkan sinar mereka kepadanya.
Verse 28
देवताश्चानुमन्यन्ते विमला: सर्वतो दिशः । द्योतते च यथा55दित्य: प्रेतलोकगतो नर:
Yama bersabda: “Para dewa pun menyetujuinya, dan segala penjuru menjadi bersih serta membawa berkah. Seorang manusia yang telah pergi ke alam para arwah bersinar di sana laksana matahari.”
Verse 29
देवता भी दीपदान करनेवालेका आदर करते हैं। उसके लिये सम्पूर्ण दिशाएँ निर्मल होती हैं तथा प्रेतलोकमें जानेपर वह मनुष्य सूर्यके समान प्रकाशित होता है ।। तस्माद् दीप: प्रदातव्य: पानीयं च विशेषतः । कपिलां ये प्रयच्छन्ति ब्राह्मणे वेदपारगे
Para dewa pun menghormati mereka yang mempersembahkan dana pelita. Karena itu segenap penjuru menjadi suci, dan ketika ia tiba di alam para arwah, manusia itu bersinar laksana matahari. Maka pelita patutlah diberikan, dan terlebih lagi air minum. Mereka yang menghadiahkan sapi kapilā kepada seorang brāhmaṇa yang telah menuntaskan Weda memperoleh kebajikan yang amat luhur.
Verse 30
पुष्करे च विशेषेण श्रूयतां तस्य यत् फलम् | गोशतं सवृषं तेन दत्तं भवति शाश्वतम्
Dan terutama di Puṣkara—dengarkanlah buahnya. Dengan melakukannya di sana, seseorang memperoleh pahala kekal seakan-akan telah mendermakan seratus ekor sapi, masing-masing beserta seekor banteng.
Verse 31
इसलिये विशेष यत्न करके दीप और जलका दान करना चाहिये। विशेषतः पुष्कर तीर्थमें जो वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको कपिला दान करते हैं, उन्हें उस दानका जो फल मिलता है, उसे सुनो। उसे साँड़ों-लहित सौ गौओंके दानका शाश्वत फल प्राप्त होता है ।। पापं कर्म च यत् किंचिद् ब्रह्महत्यासमं भवेत् । शोधयेत् कपिला होका प्रदत्तं गोशतं यथा
Karena itu, dengan upaya yang sungguh-sungguh hendaklah orang berdana pelita dan air. Terutama di tīrtha Puṣkara, mereka yang menghadiahkan sapi kapilā kepada brāhmaṇa yang mahir dalam Weda—dengarkanlah buah dana itu: mereka memperoleh pahala kekal seakan-akan telah mendermakan seratus ekor sapi beserta bantengnya. Dan dosa apa pun—bahkan yang setara dengan pembunuhan brāhmaṇa—dapat disucikan oleh dana sapi kapilā, sebagaimana pahala dana seratus sapi pun tercapai.
Verse 32
न तेषां विषम किंचिन्न दु:खं न च कण्टका:
Bagi mereka tiada sesuatu pun yang timpang atau merugikan; tiada duka, tiada pula “duri”—tiada rintangan yang menyakitkan.
Verse 33
उपानहौ च यो दद्यात् पात्रभूते द्विजोत्तमे । छत्रदाने सुखां छायां लभते परलोकग:
Siapa pun yang mendermakan sepasang sandal kepada penerima yang layak—terutama seorang dvija utama—akan memperoleh kenyamanan di alam baka; dan dengan dana payung, ia yang menuju alam sana meraih naungan yang sejuk dan menyenangkan.
Verse 34
जो श्रेष्ठ एवं सुपात्र ब्राह्मणको उपानह (जूता) दान करता है, उसके लिये कहीं कोई विषम स्थान नहीं है। न उसे दुःख उठाना पड़ता है और न काँटोंका ही सामना करना पड़ता है। छत्र-दान करनेसे परलोकमें जानेपर दाताको सुखदायिनी छाया सुलभ होती है ।। न हि दत्तस्य दानस्य नाशो5स्तीह कदाचन । चित्रगुप्तमतं श्रुत्वा हृष्टरोमा विभावसु:
Yama bersabda: “Barang siapa menghadiahkan sepasang sandal kepada seorang brāhmaṇa yang unggul dan layak, ia takkan pernah menjumpai tanah yang timpang atau sukar dilalui; ia tak perlu menanggung derita, dan takkan tersiksa oleh duri. Dengan mempersembahkan payung, ketika sang dermawan tiba di alam baka, naungan yang sejuk dan menenteramkan akan mudah diperolehnya. Sungguh, sedekah yang telah diberikan tak pernah lenyap. Mendengar putusan Citragupta, Vibhāvasu (Sang Surya) pun merinding oleh sukacita.”
Verse 35
उवाच देवता: सर्वा: पितंश्चैव महाद्युति: । श्रुतं हि चित्रगुप्तस्य धर्मगुहूं महात्मन:
Sang Yama yang bercahaya agung berkata kepada para dewa dan para Pitṛ: “Sungguh, telah kudengar ajaran dharma yang mendalam dan terjaga rapat dari Mahātma Citragupta.”
Verse 36
इस लोकमें दिये हुए दानका कभी नाश नहीं होता। चित्रगुप्तका यह मत सुनकर भगवान् सूर्यके शरीरमें रोमांच हो आया। उन महातेजस्वी सूर्यने सम्पूर्ण देवताओं और पितरोंसे कहा--“आपलोगोंने महामना चित्रगुप्तके धर्मविषयक गुप्त रहस्यको सुन लिया ।। श्रद्धानाश्ष ये मर्त्या ब्राह्मणेषु महात्मसु । दानमेतत् प्रयच्छन्ति न तेषां विद्यते भयम्,“जो मनुष्य महामनस्वी ब्राह्मणोंपर श्रद्धा करके यह दान देते हैं, उन्हें भय नहीं होता'
Di dunia ini, sedekah yang telah diberikan tak pernah lenyap. Mendengar putusan Citragupta, Sang Surya yang mulia pun bergetar oleh rasa takzim. Lalu Surya yang bercahaya agung itu berkata kepada para dewa dan para leluhur: “Kalian telah mendengar rahasia dharma yang tersembunyi, diucapkan oleh Citragupta yang berhati luhur. Mereka yang fana, dengan iman kepada brāhmaṇa yang berjiwa luhur, mempersembahkan sedekah ini—bagi mereka tiada ketakutan.”
Verse 37
धर्मदोषास्त्विमे पञज्च येषां नास्तीह निष्कृति: । असम्भाष्या अनाचारा वर्जनीया नराधमा:,आगे बताये जानेवाले पाँच धर्मविषयक दोष जिनमें विद्यमान हैं, उनका यहाँ कभी उद्धार नहीं होता। ऐसे अनाचारी नराधमोंसे बात नहीं करनी चाहिये। उन्हें दूरसे ही त्याग देना चाहिये
Yama bersabda: “Inilah lima cela terhadap dharma yang di sini tiada penebusannya. Mereka yang tak beradab tak patut diajak bicara; orang-orang hina semacam itu harus dijauhi dan ditinggalkan dari kejauhan.”
Verse 38
ब्रह्महा चैव गोघ्नक्ष परदाररतश्न यः । अश्रद्दधानश्न नर: स्त्रियं यश्चोपजीवति,ब्रह्महत्यारा, गोहत्या करनेवाला, परस्त्रीलम्पट, अश्रद्धालु तथा जो स्त्रीपर निर्भर रहकर जीविका चलाता है--ये ही पूर्वोक्त पाँच प्रकारके दुराचारी हैं
Yama bersabda: “Pembunuh brāhmaṇa, pembunuh sapi, orang yang tergila-gila pada istri orang lain, manusia tanpa iman, dan dia yang mencari nafkah dengan bergantung pada seorang perempuan—merekalah lima golongan bejat yang telah disebutkan.”
Verse 39
प्रेतलोकगता होते नरके पापकर्मिण: । पच्यन्ते वै यथा मीना: पूयशोणितभोजना:,ये पापकर्मी मनुष्य प्रेतलोकमें जाकर नरककी आगमें मछलियोंकी तरह पकाये जाते हैं और पीब तथा रक्त भोजन करते हैं
Yama bersabda: “Mereka yang melakukan perbuatan dosa, setelah pergi ke alam para arwah, jatuh ke neraka. Di sana mereka dimasak dalam api bagaikan ikan, dan dipaksa hidup dengan santapan nanah dan darah.”
Verse 40
असम्भाष्या: पितृणां च देवानां चैव पञज्च ते । स्नातकानां च विप्राणां ये चानये च तपोधना:,इन पाँचों पापाचारियोंसे देवताओं, पितरों, स्नातक ब्राह्मणों तथा अन्यान्य तपोधनोंको बातचीत भी नहीं करनी चाहिये
Yama bersabda: “Lima golongan ini tidak patut diajak berbicara. Para dewa dan para pitṛ (leluhur), demikian pula para brāhmaṇa snātaka dan para pertapa yang kaya tapa, hendaknya tidak berucap sepatah kata pun kepada para pelaku dosa semacam itu.”
Verse 96
प्रतीच्छेत निराहारस्तस्य धर्मफलं शृणु । सबेरे उठकर कुश और जल हाथमें ले गौओंके बीचमें जाय। वहाँ गौओंके सींगपर जल छिड़के और सींगसे गिरे हुए जलको अपने मस्तकपर धारण करे। साथ ही उस दिन निराहार रहे। ऐसे पुरुषको जो धर्मका फल मिलता है, उसे सुनो
Lakukanlah ini sambil berpuasa; dengarkan buah dharma dari laku tersebut. Pagi-pagi bangun, bawalah rumput kuśa dan air di tangan, lalu pergilah ke tengah-tengah sapi. Di sana percikkan air pada tanduk-tanduk sapi, kemudian letakkan di kepala sendiri air yang menetes dari tanduk itu. Pada hari itu tetaplah berpuasa. Dengarkanlah pahala dharma yang diperoleh orang yang melakukannya.
Verse 130
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अरुन्धतीचित्रगुप्तरहस्ये त्रिंशयवधिकशततमो<ध्याय:
Demikianlah berakhir, dalam Śrī Mahābhārata pada Anuśāsana Parva—di bagian Dharma tentang Dana—bab yang berjudul “Rahasia mengenai Arundhatī dan Citragupta”, yakni bab ke-seratus tiga puluh.
Verse 196
अन्निहोत्रं च यत्नेन सर्वश: प्रतिपालयेत । उपानह (जूता), छत्र तथा कपिला गौका भी यथोचित रीतिसे दान करना चाहिये। पुष्कर तीर्थमें वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्गणणको कपिला गाय देनी चाहिये और अग्निहोत्रके नियमका सब तरहसे प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये
Yama mengajarkan: “Agnihotra hendaknya dipelihara dengan tekun dalam segala hal. Bersamaan dengan disiplin itu, berikanlah dana yang patut—seperti alas kaki dan payung—dan terutama seekor sapi kapilā (berwarna cokelat kemerahan). Di tīrtha Puṣkara, hormatilah seorang brāhmaṇa yang mahir dalam Weda dengan menghadiahkan sapi kapilā, dan tegakkanlah aturan Agnihotra dengan upaya yang cermat dalam segala cara.”
Verse 313
तस्मात्तु कपिला देया कौमुद्रां ज्येष्ठपुष्करे । ब्रह्म हत्याके समान जो कोई पाप होता है, उसे एकमात्र कपिलाका दान शुद्ध कर देता है। वह एक ही गोदान सौ गोदानोंके बराबर है। इसलिये ज्येष्ठपुष्कर तीर्थमें कार्तिककी पूर्णिमाको अवश्य कपिला गौका दान करना चाहिये
Karena itu, pada hari purnama bulan Kārtika hendaknya seseorang mempersembahkan sedekah seekor sapi kapilā—sapi berwarna keemasan kecokelatan—di Jyeṣṭha-Puṣkara. Diajarkan bahwa satu pemberian ini saja sanggup menyucikan dosa seberat brahmahatyā (membunuh seorang brāhmaṇa), dan satu go-dāna ini dinyatakan setara pahalanya dengan seratus pemberian sapi biasa. Maka, di tīrtha Jyeṣṭha-Puṣkara pada purnama Kārtika, dāna sapi kapilā patut dilakukan tanpa lalai.
He seeks a single, reliable criterion for auspiciousness and liberation—one deity, one refuge, one highest dharma, and one recitative practice capable of loosening saṃsāra-bondage amid plural duties and teachings.
That sustained praise and remembrance of Viṣṇu/Nārāyaṇa through the sahasranāma—joined with devotion, worship, and mental focus—constitutes a superior, integrative dharma that supports both well-being and release.
Yes. It presents outcomes attributed to hearing/reciting the names—avoidance of inauspiciousness, mitigation of fear and affliction, attainment of prosperity and stability, and a culminating orientation toward brahman/sanātana—functioning as meta-commentary on the practice’s perceived efficacy.