
Sukta 8.62
Indra
This Indra hymn urges the community of Soma-pressers to bring forward exalted praise, because Indra delights in well-formed stotra and uktha and responds with “bhadrā rātayaḥ” (auspicious gifts). It celebrates Indra’s divinely-endowed heroism and guardianship over all becoming, contrasting the prosperity and “many lights” granted to Soma-offerers with the severe consequence for neglecting the Soma rite.
Mantra 1
प्रो अस्मा उपस्तुतिं भरता यज्जुजोषति । उक्थैरिन्द्रस्य माहिनं वयो वर्धन्ति सोमिनो भद्रा इन्द्रस्य रातयः ॥
इंद्र के लिए गाना लाओ, वो उसे पसंद है। जो लोग सोम चढ़ाते हैं, वो इंद्र की महिमा गाते हैं। इससे हमारी ताकत बढ़ती है। इंद्र जो देता है वो अच्छा होता है।
Mantra 2
अयुजो असमो नृभिरेकः कृष्टीरयास्यः । पूर्वीरति प्र वावृधे विश्वा जातान्योजसा भद्रा इन्द्रस्य रातयः ॥
इंद्र किसी के बराबर नहीं है। कोई उससे जोड़ के नहीं चल सकता, वो अकेला है और कभी थकता नहीं। वो सब लोगों से बड़ा हो गया है, पुरानी हदों से आगे बढ़ गया है। उसकी ताकत से सारी दुनिया उसके नीचे आ गई है। इंद्र के जो उपहार मिलते हैं वो अच्छे होते हैं।
Mantra 3
अहितेन चिदर्वता जीरदानुः सिषासति । प्रवाच्यमिन्द्र तत्तव वीर्याणि करिष्यतो भद्रा इन्द्रस्य रातयः ॥
जब साथ अच्छा नहीं होता तब भी वो जल्दी देनेवाला जीतने की कोशिश करता है। इंद्र, तेरे बलिदान की बात सबको बतानी चाहिए। जो कुछ करना चाहता है वो तेरे बल से कर सकता है। इंद्र के जो उपहार मिलते हैं वो अच्छे होते हैं।
Mantra 4
आ याहि कृणवाम त इन्द्र ब्रह्माणि वर्धना । येभिः शविष्ठ चाकनो भद्रमिह श्रवस्यते भद्रा इन्द्रस्य रातयः ॥
इंद्र, आ जा। हम तेरे लिए ऐसे शब्द बोलेंगे जो तेरी ताकत बढ़ा दें। इनसे तु खुश होके यहाँ अच्छा कमाएगा, तेरा नाम बनेगा। इंद्र के जो उपहार मिलते हैं वो अच्छे होते हैं।
Mantra 5
धृषतश्चिद्धृषन्मनः कृणोषीन्द्र यत्त्वम् । तीव्रैः सोमैः सपर्यतो नमोभिः प्रतिभूषतो भद्रा इन्द्रस्य रातयः ॥
जो हिम्मत वाले हैं उनका मन और भी हिम्मत वाला इंद्र कर देता है। जब उससे सोम रस से पूजा की जाती है और सजदे किए जाते हैं। इंद्र के जो उपहार मिलते हैं वो अच्छे होते हैं।
Mantra 6
अव चष्ट ऋचीषमोऽवताँ इव मानुषः । जुष्ट्वी दक्षस्य सोमिनः सखायं कृणुते युजं भद्रा इन्द्रस्य रातयः ॥
जो रिशि लोग हैं वो नीचे देखते हैं जैसे कोई इंसान दूसरों में रहता है। सोम रस चढ़ा के वो इंद्र को अपना यार बना लेते हैं, अपना साथी बना लेते हैं। इंद्र के जो उपहार मिलते हैं वो अच्छे होते हैं।
Mantra 7
विश्वे त इन्द्र वीर्यं देवा अनु क्रतुं ददुः । भुवो विश्वस्य गोपतिः पुरुष्टुत भद्रा इन्द्रस्य रातयः ॥
सब देवता ने इंद्र को ताकत दी है। वो चाहते थे कि इंद्र यह काम करे। अब इंद्र सब दुनिया का रक्षक बन गया है। लोग बहुत तारीफ करते हैं उसकी। इंद्र के तोहफे अच्छे होते हैं।
Mantra 8
गृणे तदिन्द्र ते शव उपमं देवतातये । यद्धंसि वृत्रमोजसा शचीपते भद्रा इन्द्रस्य रातयः ॥
मैं इंद्र की ताकत की बात कर रहा हूँ। जब उसने वृत्र को मारा, तब दिख गया कि वो कितना बलवान है। वो बुद्धि का मालिक है। इंद्र के तोहफे अच्छे होते हैं।
Mantra 9
समनेव वपुष्यतः कृणवन्मानुषा युगा । विदे तदिन्द्रश्चेतनमध श्रुतो भद्रा इन्द्रस्य रातयः ॥
इंद्र ने इंसान की ज़िन्दगी को ऐसे बनाया जैसे कोई चीज़ बनाता है। उसकी सोच को समझना चाहिए। जब वो सुनाई देता है तब पता चलता है। इंद्र के तोहफे अच्छे होते हैं।
Mantra 10
उज्जातमिन्द्र ते शव उत्त्वामुत्तव क्रतुम् । भूरिगो भूरि वावृधुर्मघवन्तव शर्मणि भद्रा इन्द्रस्य रातयः ॥
इंद्र की ताकत उठ खड़ी हुई है। वो और उसकी सोच दोनों तैयार हैं। जो लोग अच्छा देते हैं वो उसकी शरण में बढ़ गए। इंद्र बहुत देता है। इंद्र के तोहफे अच्छे होते हैं।
Mantra 11
अहं च त्वं च वृत्रहन्त्सं युज्याव सनिभ्य आ । अरातीवा चिदद्रिवोऽनु नौ शूर मंसते भद्रा इन्द्रस्य रातयः ॥
मैं और इंद्र साथ में जुड़ गए हैं। हम जीतने के लिए तैयार हैं। वृत्र को मारना उसका काम है। जो लोग हमारे ख़िलाफ़ हैं वो भी पीछे पीछे आते हैं। इंद्र के तोहफे अच्छे होते हैं।
Mantra 12
सत्यमिद्वा उ तं वयमिन्द्रं स्तवाम नानृतम् । महाँ असुन्वतो वधो भूरि ज्योतींषि सुन्वतो भद्रा इन्द्रस्य रातयः ॥
हम सच में इंद्र की तारीफ करते हैं, झूठ नहीं। जो लोग सोम नहीं निकालते, उनपे बड़ा वार पड़ता है। पर जो सोम निकालते हैं, उनके लिए बहुत रोशनी होती है। इंद्र के तोहफे अच्छे होते हैं।
An imperative call to bring forward uplifting praise because Indra delights in it, linking hymn and Soma to growth and auspicious gifts.
Indra’s greatness is amplified by the community’s chants; his heroic power is affirmed as sanctioned by the gods and aligned with purposeful will (kratu).
Indra is proclaimed guardian-lord of all becoming (bhuvaḥ viśvasya gopatiḥ), emphasizing universal sovereignty and protection.
The hymn ends on truth-centered praise and a moral-ritual contrast: great smiting for the non-presser, many lights for the Soma-presser—closing again with ‘auspicious are Indra’s gifts.’
bhadrā indrasya rātayaḥ
bhuvo viśvasya gopatiḥ
सत्यमिद्वा उ तं वयमिन्द्रं स्तवाम नानृतम् । महाँ असुन्वतो वधो भूरि ज्योतींषि सुन्वतो भद्रा इन्द्रस्य रातयः ॥It teaches that Indra delights in sincere, well-crafted praise joined to Soma offering, and that such worship brings protection, growth, and auspicious gifts.
It highlights a Vedic principle: disciplined participation in the Soma rite leads to illumination and prosperity, while neglect of the rite leads to loss and hardship.
It is a recurring refrain affirming that Indra’s boons—strength, protection, success, and inner clarity—arrive in a beneficial, life-supporting form for the worshipper.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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