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Sukta 8.101
Kāṇva tradition (probable for RV 8.101; exact seer not provided in input)
Mitra-Varuṇa
Triṣṭubh (probable; verification needed)
This hymn primarily invokes Mitra and Varuṇa as the twin guardians of ṛta (cosmic order), asking them to be set “in front” as protectors so the sacrifice and the sacrificer may prosper. Along the way it touches allied sacrificial powers (notably Vāyu and the clarified Soma-stream) and culminates in a striking reverence for Vāc as the divine Cow—speech/insight that must not be harmed or driven away. Overall, it weaves social-ethical order, ritual correctness, and inspired speech into one vision of protection and flourishing.
Mantra 1
ऋधगित्था स मर्त्यः शशमे देवतातये । यो नूनं मित्रावरुणावभिष्टय आचक्रे हव्यदातये ॥
वो इंसान अपना काम बनाता है जो भगवान के लिए मेहनत करता है। उसने मित्र और वरुण को आगे रखा है कि वो उसकी हिफाज़त करें। वो भगवानों के लिए हवन करता है।
Mantra 2
वर्षिष्ठक्षत्रा उरुचक्षसा नरा राजाना दीर्घश्रुत्तमा । ता बाहुता न दंसना रथर्यतः साकं सूर्यस्य रश्मिभिः ॥
दो राजा हैं, दोनों बहुत ताकतवार। इनकी नज़र बहुत चौड़ी है, और कान बहुत तेज़ हैं। इनके हाथ में ताकत है, अपनी शक्ति से यह अपनी रथ में चलते हैं। सूर्य की किरणों के साथ साथ चलते हैं।
Mantra 3
प्र यो वां मित्रावरुणाजिरो दूतो अद्रवत् । अयःशीर्षा मदेरघुः ॥
मित्र और वरुण का एक दौड़ता हुआ दूत आगे बढ़ रहा है। उसका सर लोहे का है, वो खुशी में हल्का होकर चलता है। यह ताकत हमारी इच्छा को सच्चाई की तरफ ले जाए।
Mantra 4
न यः सम्पृच्छे न पुनर्हवीतवे न संवादाय रमते । तस्मान्नो अद्य समृतेरुरुष्यतं बाहुभ्यां न उरुष्यतम् ॥
जो आदमी किसी से बात नहीं करता, दोबारा बुलाने पर भी नहीं आता, सच्चाई में खुशी नहीं पाता, ऐसे आदमी से आज हमें बचा लो। अपनी ताकत वाले हाथों से हमारी रक्षा करो, हमारी रक्षा करो।
Mantra 5
प्र मित्राय प्रार्यम्णे सचथ्यमृतावसो । वरूथ्यं वरुणे छन्द्यं वचः स्तोत्रं राजसु गायत ॥
मित्र के लिए अच्छी बात गाओ, आर्यमन के लिए भी गाओ। सच्चाई के रखने वालो, वरुण के लिए भी सुरु बना के गाओ। यह गाना राजाओं के बीच में गाओ।
Mantra 6
ते हिन्विरे अरुणं जेन्यं वस्वेकं पुत्रं तिसॄणाम् । ते धामान्यमृता मर्त्यानामदब्धा अभि चक्षते ॥
वो लाल रंग का एक खज़ाना आगे बढ़ा रहे हैं, जो तीनों में से एक बेटा है। अमरतावाली लोग, जो कभी हार नहीं मानते, वो इंसानों के घरों को देखते हैं और उन्हे सही रास्ता दिखाते हैं।
Mantra 7
आ मे वचांस्युद्यता द्युमत्तमानि कर्त्वा । उभा यातं नासत्या सजोषसा प्रति हव्यानि वीतये ॥
मेरी बात को आसमान तक पहुँचाओ। उसमें इतनी ताकत डालो कि चमकने लगे। दोनों नसत्य देवता, खुशी से आओ। हमारी भेंट ले के अपना आनंद लो।
Mantra 8
रातिं यद्वामरक्षसं हवामहे युवाभ्यां वाजिनीवसू । प्राचीं होत्रां प्रतिरन्तावितं नरा गृणाना जमदग्निना ॥
तुम दोनों जो शक्ति में बड़े हो, तुमसे वो देना माँगते हैं जो किसी को नुकसान न करे। जब हम पुकारते हैं, तब तुम दोनों वीर आओ। पूजा के साथ आगे बढ़ो। जमदग्नि रिशि भी हमारे साथ गा रहे हैं।
Mantra 9
आ नो यज्ञं दिविस्पृशं वायो याहि सुमन्मभिः । अन्तः पवित्र उपरि श्रीणानोऽयं शुक्रो अयामि ते ॥
वायु देवता, हमारी यज्ञ में आओ जो आसमान तक जाती है। अच्छे मन से आओ। यह पानी साफ करता है, ऊपर से पवित्र करता है। यह चमकता हुआ सोम का प्याला मैं तुम्हारे लिए फैला रहा हूँ।
Mantra 10
वेत्यध्वर्युः पथिभी रजिष्ठैः प्रति हव्यानि वीतये । अधा नियुत्व उभयस्य नः पिब शुचिं सोमं गवाशिरम् ॥
पूजा करने वाला पंडित सीधी राह पर चलता है। भेंट लेने के लिए आता है। फिर तुम दोनों तरफ का आनंद लो। साफ सोम का जूस पीओ, जो गाय के दूध से मिला हुआ है।
Mantra 11
बण्महाँ असि सूर्य बळादित्य महाँ असि । महस्ते सतो महिमा पनस्यतेऽद्धा देव महाँ असि ॥
सूर्य देव, तुम सच में बड़े हो। आदित्य, तुम भी बड़े हो। तुम्हारी असली ताकत बड़ी है। तुम्हारी बड़ाई सब करते हैं। देवता, तुम सच में बड़े हो।
Mantra 12
बट् सूर्य श्रवसा महाँ असि सत्रा देव महाँ असि । मह्ना देवानामसुर्यः पुरोहितो विभु ज्योतिरदाभ्यम् ॥
सूर्य, तुम्हारी बड़ाई से तुम बड़े हो। भगवान, तुम हमेशा बड़े हो। तुम्हारी ताकत से तुम देवियों के आगे खड़े हो। तुम्हारी रोशनी इतनी चमकदार है, कोई इसे अंधेरा नहीं कर सकता।
Mantra 13
इयं या नीच्यर्किणी रूपा रोहिण्या कृता । चित्रेव प्रत्यदर्श्यायत्यन्तर्दशसु बाहुषु ॥
यह ताकत नीचे दिखती है, पर अंदर से चमक रही है। रोहिणी ने इसकी शकल बनाई है। यह दस हाथों से निकल कर आती है, जैसे कोई चमत्कार हो।
Mantra 14
प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुर्न्यन्या अर्कमभितो विविश्रे । बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः पवमानो हरित आ विवेश ॥
तीन जन्में आगे बढ़ जाते हैं। बाकी लोग उस रोशनी के पास आके रहते हैं। बड़ा ब्रह्मांड में खड़ा है। वो अपने आप को साफ करता है और हरी चमक के साथ अंदर जाता है।
Mantra 15
माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः । प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट ॥
यह रुद्रों की माँ है, वसुओं की बेटी है, आदित्यों की बहन है। यह अमृत की जड़ है। मैं समझदार लोगों को बताता हूँ। इस गाय को मत मारो, यह पाप नहीं करती। यह अमृत की जड़ है, इसे मत तोड़ो।
Mantra 16
वचोविदं वाचमुदीरयन्तीं विश्वाभिर्धीभिरुपतिष्ठमानाम् । देवीं देवेभ्यः पर्येयुषीं गामा मावृक्त मर्त्यो दभ्रचेताः ॥
यह गाय शब्द जानती है, शब्द बोलती है। वो समझ के साथ पास खड़ी है। यह देवी देवियों के बीच चलती है। छोटा दिल वाला इंसान इसे न ठुकराए, न हाथ लगाए।
They are twin Āditya deities who protect truth and right order (ṛta). The hymn asks them to stand in front as guardians so the sacrifice and the worshiper are kept safe and successful.
In Soma rituals, the pressed Soma is purified and offered, and Vāyu is a key recipient associated with swift movement and the first draught. The verse highlights the “heaven-touching” sacrifice and the clarified flow that draws the gods.
It refers to Vāc—sacred Speech and inspired understanding—pictured as a goddess-cow who knows and raises the Word. The hymn prays that no careless person should harm or drive away this power, because it sustains right praise and wisdom.
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