
Sukta 7.59
Vasiṣṭha
Viśve Devāḥ (Agni, Varuṇa, Mitra, Aryaman, Maruts)
Anuṣṭubh (probable; short pādas—traditional classification may vary by recension)
This hymn of Vasiṣṭha invokes the Viśve Devāḥ—especially Agni, Varuṇa, Mitra, Aryaman, and the Maruts—for step-by-step protection, safe guidance, and a settled “shelter of peace” around the worshipper. It crescendos into the famed Tryambaka prayer (Mahāmṛtyuñjaya), seeking release from the bond of death while remaining anchored in amṛtatva (deathless fullness).
Mantra 1
यं त्रायध्व इदमिदं देवासो यं च नयथ । तस्मा अग्ने वरुण मित्रार्यमन्मरुतः शर्म यच्छत ॥
जिसे तुम देवता हर कदम पे बचाते हो, जिसे तुम आगे ले जाते हो। उस इंसान को शांति और सुरक्षा दो। अग्नि, वरुण, मित्र, अर्यमन और मरुत्स, तुम सब मिलकर उसकी रक्षा करो।
Mantra 2
युष्माकं देवा अवसाहनि प्रिय ईजानस्तरति द्विषः । प्र स क्षयं तिरते वि महीरिषो यो वो वराय दाशति ॥
जब देवता साथ देते हैं, जो इंसान भगवान को पूजा करके समर्पित होता है, वो दुश्मनों से आगे निकल जाता है। उसको घर मिलता है, उसकी ताकत बढ़ जाती है। क्योंकि वो तुम्हे अपनी खुशी से देता है।
Mantra 3
नहि वश्चरमं चन वसिष्ठः परिमंसते । अस्माकमद्य मरुतः सुते सचा विश्वे पिबत कामिनः ॥
ऋषि वसिष्ठ तुम्हे कभी नहीं भूलते, ना ही आखरी वक्त में। आज मरुत्स, तुम सब मिलकर हमारे साथ सोम पियो। तुम्हारी इच्छा पूरी हो और तुम खुश रहो।
Mantra 4
नहि व ऊतिः पृतनासु मर्धति यस्मा अराध्वं नरः । अभि व आवर्त्सुमतिर्नवीयसी तूयं यात पिपीषवः ॥
जिस इंसान को तुम खुश कर देते हो, उसकी लड़ाई में तुम्हारी मदद कभी नहीं हारती। तुम्हारी सोच और अच्छी होती जाती है। जल्दी आओ, तुम्हारी प्यास बढ़ने दो और हमें बरकत दो।
Mantra 5
ओ षु घृष्विराधसो यातनान्धांसि पीतये । इमा वो हव्या मरुतो ररे हि कं मो ष्वन्यत्र गन्तन ॥
मरुत, तुम लोग बहुत चमकदार हो। आओ और अंधेरा भगा दो ताकि हम लोग अपना काम पूरा कर सकें। यह सब चीज़ें तुम्हारे लिए रख दी हैं। तुम और कहाँ जाओगे? यहीं आओ।
Mantra 6
आ च नो बर्हिः सदताविता च नः स्पार्हाणि दातवे वसु । अस्रेधन्तो मरुतः सोम्ये मधौ स्वाहेह मादयाध्वै ॥
आओ और हमारे लिए बैठो। हमारी मदद करो और जो चीज़ें चाहिए वो दो। मरुत, तुम कभी हारते नहीं। सोम रस में खुश हो जाओ। यहाँ आओ और मस्ती करो।
Mantra 7
सस्वश्चिद्धि तन्वः शुम्भमाना आ हंसासो नीलपृष्ठा अपप्तन् । विश्वं शर्धो अभितो मा नि षेद नरो न रण्वाः सवने मदन्तः ॥
मरुत खुद ही सज के आते हैं, जैसे हंस उड़ते हैं। उनका पूरा ग्रुप मेरे पास आके बैठ जाओ। जैसे बहादुर लोग खुश होके आते हैं, वैसे ही यह भी आते हैं।
Mantra 8
यो नो मरुतो अभि दुर्हृणायुस्तिरश्चित्तानि वसवो जिघांसति । द्रुहः पाशान्प्रति स मुचीष्ट तपिष्ठेन हन्मना हन्तना तम् ॥
मरुत, अगर कोई हमे तकलीफ देना चाहे या हमारा दिमाग घुला दे, उसको पकड़ के उसकी धोखेबाज़ी में फंसा दो। अपनी ताकत से उसको मार डालो।
Mantra 9
सांतपना इदं हविर्मरुतस्तज्जुजुष्टन । युष्माकोती रिशादसः ॥
मरुत, तुम बुरी चीज़ें जला देते हो। यह हमारा सम्मान ले लो और इसमें खुश हो जाओ। हमें तुम्हारी ज़रूरत है, तुम दुश्मनों को खत्म करते हो।
Mantra 10
गृहमेधास आ गत मरुतो माप भूतन । युष्माकोती सुदानवः ॥
मरुत, यहाँ आओ। तुम लोग घर में होते हो जब पूजा होती है। हमसे दूर मत जाओ। तुम लोग बहुत देते हो, तुम्हारी मदद हमारे पास रहे।
Mantra 11
इहेह वः स्वतवसः कवयः सूर्यत्वचः । यज्ञं मरुत आ वृणे ॥
मैं तुम्हे यहाँ बुला रहा हूँ पूजा के लिए। मरुत, तुम लोग खुद में ताकत रखते हो। तुम रिशि जैसे हो, तुम्हारा चमकना सूरज जैसा है।
Mantra 12
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥
हम तीन आँखों वाले शिव को पूजा करते हैं। वो महकता है और अच्छा करता है। जैसे कद्दू पेड़ से टूट के गिर जाता है, वैसे ही मुझे मौत से आज़ाद कर दो। पर मुझे ज़िन्दगी से मत तोड़ना।
A direct appeal to the Gods who protect “at each step” and lead onward, asking for śarma—sheltering peace.
The hymn expands from general protection to a vivid gathering of divine forces, especially the Maruts, envisioned as an arriving, radiant host that encircles and strengthens the worshipper.
The liberation motif: the prayer to Tryambaka for release from mṛtyu’s bond—an existential turning from mere safety to freedom.
An affirmation of continued connection to amṛta (immortality/deathless fullness), ending in steadiness, protection, and well-being under divine order.
śarma yacchata
सस्वश्चिद्धि तन्वः शुम्भमाना आ हंसासो नीलपृष्ठा अपप्तन् । विश्वं शर्धो अभितो मा नि षेद नरो न रण्वाः सवने मदन्तः ॥urvārukam iva bandhanān mṛtyor mukṣīya māmṛtāt
Because it prays to Tryambaka (Rudra) for victory over death: “May I be released from the bond of death, not from immortality.” It became the best-known Vedic healing and protection verse in later tradition.
They are the “All Gods” invoked as a unified divine assembly—here especially Agni, Varuṇa, Mitra, Aryaman, and the Maruts—called to protect, guide, and grant sheltering peace.
Ask the divine powers to guard you at every step, gather strength and support around you, and free you from fear and bondage—ultimately even the bondage of death—while keeping you rooted in life’s deeper, deathless reality.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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