Opening the text

Sukta 6.52
Bharadvāja (Bārhaspatya) tradition (Mandala 6 affiliation; hymn to Viśve Devāḥ)
Viśve Devāḥ (All the Gods) with polemical focus against the brahma-dviṣ (hater of sacred word) across the hymn
Triṣṭubh (dominant in Mandala 6; this verse conforms to triṣṭubh cadence)
This hymn to the Viśve Devāḥ gathers the whole divine host to hear the poet’s speech, protect the rite, and grant well-being to the sacrificer. A sharp polemical edge runs through it: the brahma-dviṣ (hater of sacred word) and the misguided or overreaching offerer are to be pressed down and made to fall away from the path. The sukta culminates in a formal invitatory scene at the kindled Agni, where the All-Gods are asked to rejoice in the oblation and in the community’s sacred assembly.
Mantra 1
न तद्दिवा न पृथिव्यानु मन्ये न यज्ञेन नोत शमीभिराभिः । उब्जन्तु तं सुभ्वः पर्वतासो नि हीयतामतियाजस्य यष्टा ॥
मैं आसमान की ऊँचाई से नहीं नाप रहा, न ज़मीन की चौड़ाई से। न ही यज्ञ के तरीके से, न ही शांति के काम से। पहाड़ जैसी ताकतवाली चीज़ें उस आदमी को दबाएं जो गलत तरीके से पूजा करता है। वो आदमी अपने रास्ते से गिर जाए।
Mantra 2
अति वा यो मरुतो मन्यते नो ब्रह्म वा यः क्रियमाणं निनित्सात् । तपूंषि तस्मै वृजिनानि सन्तु ब्रह्मद्विषमभि तं शोचतु द्यौः ॥
जो आदमी खुद को हमसे बड़ा समझता है मरुत, या जो ब्रह्मन के काम को बिगाड़ना चाहता है। उसके लिए बड़ी तकलीफ़ें हों। आसमान उस आदमी को जला दे जो ब्रह्मन को नहीं मानता।
Mantra 3
किमङ्ग त्वा ब्रह्मणः सोम गोपां किमङ्ग त्वाहुरभिशस्तिपां नः । किमङ्ग नः पश्यसि निद्यमानान्ब्रह्मद्विषे तपुषिं हेतिमस्य ॥
सोम, लोग तुम्हे ब्रह्मन का रक्षक क्यों कहते हैं? तुम हमारे दुश्मनों से हमारी रक्षा कैसे करते हो? जब लोग हमारा बुरा कहते हैं तब तुम हमारी तरफ देखते हो। तुम उस आदमी पर अपनी आग भेजते हो जो ब्रह्मन को नहीं मानता।
Mantra 4
अवन्तु मामुषसो जायमाना अवन्तु मा सिन्धवः पिन्वमानाः । अवन्तु मा पर्वतासो ध्रुवासोऽवन्तु मा पितरो देवहूतौ ॥
सुबह की रोशनी मुझे बचाए। नदियाँ जो भरी बह रही हैं वो मुझे बचाए। पहाड़ जो पक्के खड़े हैं वो मुझे बचाए। हमारे पुर्वज जो देवताओं को बुलाते हैं वो मुझे बचाए।
Mantra 5
विश्वदानीं सुमनसः स्याम पश्येम नु सूर्यमुच्चरन्तम् । तथा करद्वसुपतिर्वसूनां देवाँ ओहानोऽवसागमिष्ठः ॥
हमारी यह दुआ है कि हमारा मन हमेशा साफ और शांत रहे। हम सूरज को उगते हुए देखें। जो धन का मालिक है, वो ऐसा करे। वो देवताओं को पास लाए और हमें अच्छी चीज़ें दे।
Mantra 6
इन्द्रो नेदिष्ठमवसागमिष्ठः सरस्वती सिन्धुभिः पिन्वमाना । पर्जन्यो न ओषधीभिर्मयोभुरग्निः सुशंसः सुहवः पितेव ॥
इंद्र हमारे सबसे पास आए और मदद करे। सरस्वती नदियों के साथ बढ़के और हम में बढ़े। पर्जन्य पौधों के थ्रू हमें खुशी दे। अग्नि जिसको आसान से बुलाया जा सके, वो हमारे लिए बाप जैसा हो।
Mantra 7
विश्वे देवास आ गत शृणुता म इमं हवम् । एदं बर्हिर्नि षीदत ॥
हे सारे देवता, आओ। मेरी यह पुकार सुनो। इस जगह पर बैठ जाओ जो हमने तैयार की है।
Mantra 8
यो वो देवा घृतस्नुना हव्येन प्रतिभूषति । तं विश्व उप गच्छथ ॥
हे देवता, तुम में से जिसको भी यह ऑफरिंग मिल रही है, उसके पास सब जाओ। सब मिलकर उसकी मदद करो।
Mantra 9
उप नः सूनवो गिरः शृण्वन्त्वमृतस्य ये । सुमृळीका भवन्तु नः ॥
जो अमृत के बेटे हैं, वो हमारी बात सुनें। वो हमारे पास आएँ। वो हमारे लिए मेहरबान हों।
Mantra 10
विश्वे देवा ऋतावृध ऋतुभिर्हवनश्रुतः । जुषन्तां युज्यं पयः ॥
सारे देवता जो सच्चाई से बड़े होते हैं, आज यहाँ आओ। तुम लोग सही समय पर बुलावा सुनते हो। यह दूध की ऑफरिंग है, जो हमने धरम के साथ तैयार की है। इसे स्वीकार करो और खुश हो जाओ।
Mantra 11
स्तोत्रमिन्द्रो मरुद्गणस्त्वष्टृमान्मित्रो अर्यमा । इमा हव्या जुषन्त नः ॥
इंद्र आए, मरुत गण के साथ। त्वष्ट्र भी आए जो सब कुछ बनाता है। मित्र और अर्यमन भी आए। यह सब हमारी ऑफरिंग्स ले लें और खुश हों। हमने दिल से यह सब भगवान के लिए रखा है।
Mantra 12
इमं नो अग्ने अध्वरं होतर्वयुनशो यज । चिकित्वान्दैव्यं जनम् ॥
अग्नि, तू हमारा होता है, तू यह पूजा समझो और कर दे। तू जानता है कि देवता लोग कैसे हैं। उनके लिए यह ऑफरिंग कर दे। तू एक्सपर्ट है, इसलिए तुझसे ही यह काम होगा।
Mantra 13
विश्वे देवाः शृणुतेमं हवं मे ये अन्तरिक्षे य उप द्यवि ष्ठ । ये अग्निजिह्वा उत वा यजत्रा आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयध्वम् ॥
सारे देवता, मेरा बुलावा सुनो। तुम आसमान में हो या बीच में, कोई फर्क नहीं पड़ता। तुम अग्नि जैसी जीभ वाले हो या पूजा के लायक हो, सब यहाँ आओ। यह बैठने की जगह है, इसपर बैठो और यह ऑफरिंग से खुश हो जाओ।
Mantra 14
विश्वे देवा मम शृण्वन्तु यज्ञिया उभे रोदसी अपां नपाच्च मन्म । मा वो वचांसि परिचक्ष्याणि वोचं सुम्नेष्विद्वो अन्तमा मदेम ॥
सारे देवता जो यज्ञ के लायक हैं, मेरी बात सुनो। धरती और आसमान, दोनों सुनो। पानी का देवता भी सुनो। मैं ऐसी बात नहीं कहूँगा जो तुम्हे बुरी लगे। तुम्हारी कृपा से हम तुम्हारे पास आएंगे और खुश रहेंगे।
Mantra 15
ये के च ज्मा महिनो अहिमाया दिवो जज्ञिरे अपां सधस्थे । ते अस्मभ्यमिषये विश्वमायुः क्षप उस्रा वरिवस्यन्तु देवाः ॥
जो भी बड़े-बड़े देवता आसमान से पैदा हुए या पानी में रहते हुए पैदा हुए, वो सब नज़रबंदी तोड़ के आज़ाद हो गए। अब वो देवता हमारे लिए रास्ता खोलें। हमें पूरी उमर तक जीने दो, रातें और सुबह की रोशनी हमारे साथ रहे।
Mantra 17
स्तीर्णे बर्हिषि समिधाने अग्नौ सूक्तेन महा नमसा विवासे । अस्मिन्नो अद्य विदथे यजत्रा विश्वे देवा हविषि मादयध्वम् ॥
यहाँ पूजा के लिए आसन बिछा दिया है और अग्नि जल रही है। मैं आप सब देवताओं को अपना गीत सुना के प्रणाम करता हूँ। आज हमारी सभा में आप सब हवि खुश हो के स्वीकार करें।
They are the “All-Gods,” a collective address to the divine powers together. The hymn calls them to come near, hear the recited words, protect the sacrifice, and grant well-being.
Brahma-dviṣ means “hater of brahman,” i.e., one who opposes sacred truth-speech and the right order it supports. The hymn asks the divine powers to restrain and remove this hostile force so the rite can succeed.
It fits an invitatory moment in fire-worship: the barhis is spread, Agni is kindled, and the All-Gods are invoked to attend and rejoice in the offering. It is especially apt when seeking protection of the rite and harmony in the assembly.
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