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Sukta 2.32
Gṛtsamada (Bhārgava)
Dyāvā-Pṛthivī (Heaven and Earth)
Triṣṭubh
This hymn begins by invoking Dyāvā-Pṛthivī (Heaven and Earth) as guardians of the poet’s word, aligned with ṛta, and as the vast parents who grant breadth, protection, and prosperity. It then widens into a plea for auspicious feminine powers—especially Rākā and related goddesses—to bestow fertility, wealth, and well-being, culminating in an inclusive call to several divine women for aid and svasti.
Mantra 1
अस्य मे द्यावापृथिवी ऋतायतो भूतमवित्री वचसः सिषासतः । ययोरायुः प्रतरं ते इदं पुर उपस्तुते वसूयुर्वां महो दधे ॥
मेरे बोलने के लिए आसमान और धरती हमारी रक्षा करें। यह दोनों सही रास्ते पर चलते हैं और हमारी बात को मजबूत करना चाहते हैं। जिनकी ज़िन्दगी आगे बढ़ रही है, उनके आगे मैं यह तारीफ रख देता हूँ। मैं तुमसे बड़ी चीज़ें माँग रहा हूँ और तुम में एक बड़ी छोड़ पाई।
Mantra 2
मा नो गुह्या रिप आयोरहन्दभन्मा न आभ्यो रीरधो दुच्छुनाभ्यः । मा नो वि यौः सख्या विद्धि तस्य नः सुम्नायता मनसा तत्त्वेमहे ॥
छिपे हुए दुश्मन हमारी ज़िन्दगी को मार न डालें। करीब से या दूर से कोई बुराई हमें तकलीफ न दे। तुम्हारी हमारी दोस्ती न टूटे। हम जानते हैं यह बात, और दिल से तुम्हारी दया माँगते हैं कि तुम हमें सच में बचाओ।
Mantra 3
अहेळता मनसा श्रुष्टिमा वह दुहानां धेनुं पिप्युषीमसश्चतम् । पद्याभिराशुं वचसा च वाजिनं त्वां हिनोमि पुरुहूत विश्वहा ॥
बिना किसी बुराई के दिल से तुम यह सुनो और मानो। जैसे गाय दूध देती है और कभी रुकती नहीं, वैसे ही तुम्हारी सुन्नई मान ने में आए। मैं तेज़ कदम चल के और बोल के तुम्हे बुलाता हूँ। तुम बहुत लोगों की सुनते हो, हर वक्त हमारे अंदर ताकत बना के रखना।
Mantra 4
राकामहं सुहवां सुष्टुती हुवे शृणोतु नः सुभगा बोधतु त्मना । सीव्यत्वपः सूच्याच्छिद्यमानया ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम् ॥
मैं राका देवी को बुला रहा हूँ, अच्छे से, सही तरीके से। वो सुन लें, वो खुद जाग जाएँ। वो नदियों को ऐसे जोड़ें जैसे सुई से सिलना हो, जो न टूटे। हमें ताकत दें, जो सौ तरह के उपहार लाए।
Mantra 5
यास्ते राके सुमतयः सुपेशसो याभिर्ददासि दाशुषे वसूनि । ताभिर्नो अद्य सुमना उपागहि सहस्रपोषं सुभगे रराणा ॥
राका देवी, तुम्हारे जो अच्छे विचार हैं, उनसे ही तोह तुम लोगों को धन देती हो। आज खुशी से हमारे पास आओ। हमें इतना दो कि सौ गुना बढ़ जाए।
Mantra 6
सिनीवालि पृथुष्टुके या देवानामसि स्वसा । जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि दिदिड्ढि नः ॥
सिनिवाली देवी, तुम देवियों की बहन हो, तुम्हारी बहुत बड़ाई है। यह हवन सामग्री स्वीकार करो। देवी, हमारे घर में संतान की शक्ति बना दो, उसे स्थिर कर दो।
Mantra 7
या सुबाहुः स्वङ्गुरिः सुषूमा बहुसूवरी । तस्यै विश्पत्न्यै हविः सिनीवाल्यै जुहोतन ॥
जिन देवी के हाथ अच्छे हैं, उंगलियाँ सुंदर हैं, वो बहुत प्रकाश देती हैं। उस सिनिवाली देवी के लिए यह हवन सामग्री चढ़ा दो। वो सबकी रानी है।
Mantra 8
या गुङ्गूर्या सिनीवाली या राका या सरस्वती । इन्द्राणीमह्व ऊतये वरुणानीं स्वस्तये ॥
चाहे वो गुंगू हो, या सिनिवाली, या राका, या सरस्वती। इंद्राणी देवी को मदद के लिए बुला रहा हूँ। वरुणानी देवी से शांति माँग रहा हूँ।
They are Heaven and Earth as a divine pair—the cosmic parents who uphold order (ṛta), protect the sacrifice, and support life with stability and spaciousness.
These feminine devatās represent auspicious increase and fulfillment—linked with growth, fertility, prosperity, and the ripening of blessings—so the hymn asks them to bring abundance and well-being.
It is commonly used as a prayer for protection of one’s efforts and speech, for household prosperity and increase, and for general welfare (svasti), especially at auspicious times like early morning or lunar observances.
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